February 2007

प्रतिष्ठित, व्यावसायिक रूप से अत्यंत सफल, अंग्रेज़ी चिट्ठाकार अमित अग्रवाल ने हिन्दी चिट्ठों में भी व्यावसायिक संभावनाएँ देखी हैं.

उन्होंने अपने चिट्ठा-पोस्ट में हिन्दी भाषा के चिट्ठाकारों के लिए कुछ व्यावसायिक संभावनाओं तो तो तलाशा ही है, कुछ गुर भी बताए हैं.

धन्यवाद अमित. आपके दिशानिर्देशों का हमेशा स्वागत है!

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this

जब से नारद जी ने प्रत्येक चिट्ठों पर क्लिक नुमा तिलक लगाना प्रारंभ किया है तब से मैं कुछ व्यथित सा हूँ और तब से ही अपनी व्यथा कथा लिखने की सोच रहा था. नारद अब पहले जैसा साफ-सुथरा नहीं रहा. अब तो वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो गया है, पक्षपाती हो गया है. तरह तरह के चिट्ठों पर अजीब अजीब आकारों में तिलक लगाता है. किसी पर उसकी कृपा दृष्टि ज्यादा पड़ती है तो किसी पर कम. अब जब-जब भी मैं नारद के पन्नों पर जाता हूँ, अपने चिट्ठे के माथे कोई तिलक नहीं पाता हूँ या यदा कदा अपवाद स्वरूप छोटा सा तिलक कुछ इस तरह पाता हूँ -

तो फिर बड़ी देर तक सोचता रहता हूँ कि मेरे चिट्ठे के माथे पर इतने कम क्लिकों का इतना महीन, न्यून, नगण्य सा तिलक क्यूँ? जबकि बगल में, ऊपर-नीचे चिट्ठों में तिलक का आकार - संख्या में दहाई और सैकड़ा से भी ऊपर जा रहा होता है. और, अकसर मैं, ‘मेरे चिट्ठे के माथे का तिलक - तेरे चिट्ठे के माथे के तिलक से छोटा क्यूं' के चक्कर में उलझ जाया करता हूँ.

अपने तिलक का रूपाकार बड़ा करने के लिए कभी सोचता हूँ कि फ़ुरसत में सुंदर, सहज, सरल भाषा में कुछ बढ़िया आख्यान लिखूं. फिर कभी सोचता हूँ कि अपने लेखन-मोहल्ले में कोई सदा-सर्वदा विवादास्पद मुद्दा उछालूं और बड़े तिलक का आनंद लूं. कभी सोचता हूँ हास्य-व्यंग्य में जोर आजमाइश करूं तो कभी कविता, हाइकू, ग़ज़ल, व्यंज़ल, कुंडलियाँ-मुंडलियाँ चालू करूं. कभी कोई तकनीकी बातें लिखने की सोचता हूँ तो कभी सर्वकालिक लोकप्रिय विषय - क्रिकेट, राजनीति और लालू पर. परंतु मैं सिर्फ सोचते रह जाता हूँ और मेरा राइटर्स ब्लॉक चालू हो जाता है - भइए, लिख तो लेगा - लिख ले दिन भर मेहनत कर - रात्रि जागरण कर. परंतु नारद पर तेरे चिट्ठे को क्लिक कौन करेगा? अंततः जब उसे अंतरजाल के महासागर में अस्तित्वहीन होना ही है - तो उसे अपने मन के अंदर ही अस्तित्व विहीन रूप में ही रहने दे. और फिर मेरा उत्साह ठंडा हो जाता है.

अभी तक तो मैं निस्पृह भाव से अपने चिट्ठे पर लिखता रहता था. इस बात की परवाह किए बगैर कि कोई इसे कहीं क्लिक करता भी है या नहीं. क्योंकि वह दिखता ही नहीं था. भले ही, अंदर ही अंदर अपने टैम्प्लेट में मैंने दर्जन भर स्टेट काउंटर लगा रखे हैं, और अंदर का हाल मुझे मालूम है, मगर प्रकट तौर पर तो मैं सबको यही दर्शाता रहता था कि भइए, हमारे चिट्ठा पोस्टों को तो बहुतेइच पढ़ते हैं. मगर अब नारद के तिलक ने तो ऐसा लगता है कि मुझे, मेरे चिट्ठे को सरे बाजार वस्त्रहीन कर दिया है. चिट्ठा पोस्ट करने के घंटे भर बाद भी वही स्थिति रहती है, चौबीस घंटे बाद भी और चौबीस दिन बाद भी. तिलक के आकार में परिवर्तन नहीं होना होता है तो नहीं ही होता है. विधवा के सूनी मांग की तरह मेरे चिट्ठे का तिलक अस्तित्वहीन ही बना रहता है. और कभी कभार, यदा कदा क्लिकों की कोई संख्या दिखाई दे भी जाती है, जैसे कि हो सकता है कि अभी आपको दिखाई दे रही हो, तो संभवतः वह मेरे द्वारा ही किए गए क्लिकों की संख्या होती है - मैं ही स्वयं दुबारा-तिबारा-चौबारा, अनगिनत बार जांचता रहता हूं कि लिंक वाकई काम कर रही है भी या नहीं!

अब आप मुझे यह तत्वज्ञान देने मत बैठ जाइएगा कि बंधु! सिर्फ नारद ही एक जरिया नहीं है तेरे चिट्ठे पर आने का - गूगल है, फ़ीड रीडर्स हैं, बुकमार्क्स हैं, और अब तो कैफ़े हिन्दी भी है और याहू! भी है. परंतु भइए, वे सब सार्वजनिक नहीं हैं ना! यही तो कष्ट है. अंदर से, और दूसरे रस्ते से भले ही हजार लोग आएँ, परंतु नारद का तिलक तो दूसराईच कहानी कह रहा होता है. और, लोग वही मानते हैं जो प्रकट में दिखाई देता है. और जो मेरे लिए दिखाई दे रहा है वह तो मेरे अपने लिए हास्यास्पद है. और मुझे कर्मण्येवाधिकारस्ते... में यकीन नहीं. मैंने कर्म किया है तो फल चाहिए - चिट्ठा लिखा है तो क्लिक चाहिए.

मुझे लगता है कि नारद जी को मुझे अपनी व्यथा सुनानी ही पड़ेगी. प्रभो! मुझे मेरी इस हास्यास्पद स्थिति से उबारो, हे! नारद, आप तो सर्व-व्यापी, सर्वज्ञानी हैं. आपको मेरे बारे में, मेरे चिट्ठे के बारे में सब-कुछ पता है. परंतु आपने तो इन अत्यंत गोपनीय बातों को सरे राह प्रकट कर दिया है - सर्व-सुलभ कर दिया है. सरेआम मुझे बेइज़्ज़त कर दिया है. मुझे कहीं का मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा है. थोड़ी सी इज़्ज़त मुझे भी बख्श दो नारद मुनि! कुछ ऐसा उपाय करो कि आपका काम भी हो जाए और सरे बाजार मेरी पूछ-परख भी बनी रहे. मेरे चिट्ठे के इस तिलक को अदृश्य कर दो महाराज! और यदि दूसरे सफल-असफल भक्तों को अपने या दूसरों के तिलक के आकार-प्रकार की जानकारी चाहिए हो तो वह दिखाई तो दे, मगर माउस-ओवर से - जैसा कि देसी-पंडित पर होता है, तब भी मुझे बहुत राहत मिलेगी. अब जिस बंदे को देखना है कि उसके चिट्ठे पर तिलक का आकार कितना है, वही तो माउस ओवर करेगा और उसे ही दिखेगा. फिर दलाल-स्ट्रीट के इंडेक्स के शेयरों के भाव की तरह तमाम चिट्ठों का रेडी-रिकोनर क्लिक-दर तो नहीं दिखाई देगा. जब तक माउसओवर कर्ता एक से दूसरे चिट्ठे के माथे के तिलक का आकार देखने जाएगा, तब तक पिछले चिट्ठे का शेयर मूल्य उसके दिमाग से उतर जाएगा - और इस तरह सरे आम तुलनात्मक बेइज्जती तो नहीं होगी. उम्मीद है आप भक्त की इस छोटी सी समस्या को सुनेंगे और मेरे चिट्ठे को मुँह दिखाने लायक बनाए रखेंगे.

**-**

व्यंज़ल

**-**

नारद ने खड़ी कर दी ये कैसी अजीब सी परेशानी

मैं हैरान हूँ कि मुझे ही क्यों हो रही है ऐसी हैरानी


अभी तक तो मैं लिखता रहा, बस लिखता रहा था

जाने क्यों बन गई मेरी निगाहें क्लिकों की दीवानी


श्रोताओं की तलाश जारी है, भले ही ये मालूम हो

हर कोई कहने ही आया है यहाँ अपनी राम कहानी


जाने कहाँ से लग गया है चिट्ठा लेखन का व्यसन

चाह कर भी अब छूटती नहीं ये बेकार की नादानी


अंदाज का बस यहाँ थोड़ा सा खेल ही तो है रवि

बातें सब एक सी होती हैं चाहे नयी हों या पुरानी

**-**

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this



हिन्दी चिट्ठाजगत में फंसने-फांसने का नेटवर्क दूसरी बार आया है. और, खुदा करे, यह तिबारा-चौबारा, फिर कभी नहीं आए. फंसने-फांसने का क्यों? यह मैं आगे बताता हूं.

उन्मुक्त ने मुझे फांसा (टैग किया) तो मैं नादान बनकर कि मैंने उसकी पोस्ट पढ़ी ही नहीं, पीछा छुड़ा सकता था. और छुड़ा ही लिया था...

परंतु उन्होंने मुझे ई-मेल किया, और उनका ईमेल मेरे गूगल ईमेल के स्पैम फ़िल्टर से जाने कैसे बचता-बचाता मेरे इनबॉक्स में आ गया. उन्होंने लिखा था-

Hi I have a request to make. It is contained here
http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/02/blog-post_18.html

I hope you will not mind.

मैंने वह पोस्ट दुबारा पढ़ी (उस पोस्ट को पहले पढ़ कर नादान बन कर भूल चुका था) और यह प्रत्युत्तर लिखा:

well, I DO MIND, but will reply not-so-mindfully in my post :)

जाहिर है, मैं फुल्ली माइंडफुली प्रत्युत्तर दे रहा हूँ.

तो, सबसे पहले फंसने-फांसने का गणित.

पहले स्तर पर एक चिट्ठाकार ने फांसा - 5 चिट्ठाकारों को.

दूसरे स्तर पर पाँच चिट्ठाकारों ने शिकार फांसे - 25

तीसरे स्तर पर पच्चीस चिट्ठाकारों ने फांसे - 125

चौथे स्तर पर 125 चिट्ठाकारों ने फांसे - 625

पर, क्या इतने हिन्दी चिट्ठाकार हैं भी? और, बाकी के बेचारे चौथे स्तर के चिट्ठाकार किन्हें फांसेंगे? चलिए, मान लिया कि अनगिनत चिट्ठाकार हैं - तब भी, दसवें और पंद्रहवें स्तर पर आते-आते तो पृथ्वी की सारी जनसंख्या फ़ंस-फंसा चुकी होगी और वे अपने शिकार को तलाश रहे होंगे. स्थिति भयावह होगी - सचमुच भयावह.

चलिए, अब बारी है माइंडफुल्ली प्रत्युत्तर की :

आपकी सबसे प्रिय पुस्तक और पिक्चर कौन सी है?

अपने प्रिय पुस्तक का वर्णन मैंने अपने चिट्ठा-पोस्ट में किया था - जिसका शीर्षक मैंने दिया था - "आधुनिक युग का वास्तविक धर्मग्रंथ" - इससे ही जाहिर है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए कितना आवश्यक है इस पुस्तक को पढ़ना. व्हाई मेन लाई एंड वीमन क्राई नाम की यह पुस्तक स्त्री-पुरुष संबंध - मां-बाप, भाई-बहन, पति-पत्नी (और सास-बहू भी,) को समझने में बहुत मदद करती है. इसे मैंने अपने जीवन के चालीसवें वर्ष में पढ़ा (यह आई ही अभी!) और लगता है कि इसे मैं पहले पढ़ा होता तो शायद मेरा व्यक्तित्व दूसरा होता और मैं अपने आस पास के व्यक्तियों को समझने में, रिश्ते निभाने में ज्यादा कारगर होता. इसी तरह की एक दूसरी पसंदीदा किताब - हू मूव्ड माई चीज है, जो जीवन के कठिन परिस्थितियों में जूझने के लिए मजेदार तरीके से रास्ता दिखाती है. पिक्चरें वैसे तो मैं कम ही देखता हूं - जब सारी जनता शोले देख रही थी तो भी मैंने नहीं देखा था - परंतु फिर भी, टाइटेनिक का प्रस्तुतिकरण लाजवाब था, और उसे देखने के बाद मेरे जेहन में कुछ समय तक उसका असर भी रहा था. लिओनार्दो का बर्फ में जमा चेहरा और उसका गहरे समुद्र में डूबना अभी भी आँखों में झिलमिलाता है.

आपकी अपनी सबसे प्रिय चिट्ठी कौन सी है?

अभी तक तो अपनी सबसे प्रिय चिट्ठी मैंने नहीं लिखी. जिस दिन मेरी चिट्ठी को एक लाख लोग हिट कर पढ़ेंगे, तथा उससे मुझे $999.99 आय हो जाएगी, वह मेरी सबसे प्रिय चिट्ठी हो जाएगी.

इस चुटकुले को छोड़ दें, तो कुछ चिट्ठी हैं जिन्हें मैं याद करता हूँ, या कहें कि मेरे पाठक मुझे याद दिलाते हैं. अभी हाल ही में जगदीश भाटिया जी ने मेरे इस चिट्ठे पर यह टिप्पणी की -

"...और हम जिंदगी की छोटी छोटी बाधाओं से कैसे घबरा जाते हैं।

आज अनूप जी के इंडीब्लागीस वाले लेख से लिंक पढ़ते पढ़ते यहां चला आया।

आंख से अश्रू की एक धार निकल पड़ी।

अब जब भी जिंदगी में कभी निराशा घेर लेगी तो इसे आकर पढ़ लिया करूंगा।

आपको प्रणाम।..."

तो, मुझे लगा कि मेरा लिखा थोड़ा सा सफल हो गया है. इस चिट्ठे का कुछ संशोधित रूप सर्वोत्तम (रीडर्स डाइजेस्ट का हिन्दी संस्करण जो अब बंद हो चुका है) में छप चुका है.

आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसंद करते हैं?

मैं हर तरह के चिट्ठे पढ़ता हूँ. चिट्ठा चर्चा के लिए तो हर तरह के चिट्ठे पढ़ना मजबूरी होती है - भले ही वह हाइकू हो या अति-अति-आधुनिक कविता. वैसे, मुझे तकनॉलाज़ी के चिट्ठे पढ़ने में मजा आता है जिसमें दिमाग का कुछ भुरता बने. नई तकनीक के बारे में, नए गॅजेट्स के बारे में पढ़ने में आनंद आता है. और, सर्वोपरि तो व्यंग्य है ही - बस पठनीयता होनी चाहिए.

क्या चिट्ठाकारी ने आपके व्यक्तित्व में परिवर्तन या निखार किया?

हाँ, यह तो शत-प्रतिशत तय है. और इस बात को मैंने पहले भी स्वीकारा है, अब भी स्वीकारता हूँ. मुहल्ले के लोग मुझे थोड़ा इज्जत देने लगे हैं - कहते फिरते हैं - यह इंटरनेट पर जाने क्या करता रहता है. तो मैं भी थोड़ा सिर उठाकर चलता हूँ :) डिजिटल डिवाइड है यहाँ पर तो - श्रेष्ठी वर्ग वह है जो इंटरनेट इस्तेमाल करता है, और हिन्दी चिट्ठे लिखता है.

भारत वर्ष को बदलने का वरदान -

आह!, क्या सचमुच? ऐसा वरदान मिले तो बिना कोई दूसरी बात सोचे मैं यहाँ की जात-पांत, धर्म-पंथ सबको खत्म करने का वरदान मांग लूंगा. परंतु मुझे लगता है कि इस वरदान की आवश्यकता नहीं है. लोग शिक्षित हो जाएंगे तो यह खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा, या फिर उतना प्रासंगिक भी नहीं रहेगा - संभवत: सन् 2150 तक.

अब फिर से आते हैं - फंसने फांसने के चक्र पर. मैं अपने आपको चौथे और पांचवे चक्र के चिट्ठाकारों के समक्ष खड़ा पाता हूँ - जिनके पास फांसने के लिए कोई शिकार हैं ही नहीं! मैं इस नेटवर्क कड़ी की सबसे कमजोर कड़ी हूँ. मेरा क्रम टूट गया है.

और, वैसे भी, मुझे जिन्हें फ़ांसना है या फांसना चाहिए, या तो वे फंस चुके हैं या अंततोगत्वा फंस ही जाएंगे - ‘इस' या ‘उस' चक्र पर.


Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this



मैंने तीन दर्जन से अधिक फ़ीड सब्सक्राइब कर रखे हैं. उनकी फ़ीड सम्हाल कर रखना और समय निकाल कर पढ़ना बड़ा मुश्किल काम है - खासकर तब जब ये एकत्र हो जाएँ. इनफ़ॉर्मेशन ओवरलोड के जमाने में क्या पढ़ें और क्या छोड़ें यही समझने में दिक्कतें होती हैं. अब लगता है, नए नवेले याहू! पाइप्स बीटा, के जरिए मैं उन्हें एक स्थान पर न सिर्फ संजो सकता हूँ, बल्कि उन्हें छांट कर, बीन कर, जमा कर भी रख सकता हूँ, और मेरे पढ़ने के लिए फिर छंटा-छंटाया माल मिलेगा और मेरी प्रकृति और मेरे स्वाद के अनुसार सामग्री एक ही स्थल पर मिला करेगी.

याहू! पाइप्स की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मुझे एक पंक्ति का भी जटिल किस्म का कोड लिखना नहीं है, सारा कुछ ब्राउज़र अनुप्रयोग के जरिए, चित्रमय खींचो-व-छोड़ो (ड्रैग एण्ड ड्रॉप) इंटरफ़ेस के जरिए आसानी से किया जा सकता है. अंतिम परिणाम सादा, परंतु दिमाग को ध्वस्त कर सकने वाला होता है. यही नहीं, मैं अपने मनोनुकूल बनाए गए फ़ीडों को इंटरनेट पर हर किसी के साथ साझा कर सकता हूँ. इसका आउटपुट स्वयं एक आरएसएस फ़ॉर्मेट में होता है - यानी की अब तीन दर्जन फ़ीड के बजाए मेरे पास छना हुआ, चुना हुआ, सभी फ़ीडों का सम्मिलित, सिर्फ एक ही फ़ीड होगा. वाह! क्या कहने!

यहाँ पर एक सरल, त्वरित उदाहरण आपके लिए है - नारद, जो कि हिन्दी चिट्ठों का लोकप्रिय ब्लॉग एग्रीगेटर है, वह हमें चिट्ठों के प्रकाशित होने के समय के अनुसार जमा कर चिट्ठों को एकत्र कर प्रस्तुत करता है. मैंने नारद की फ़ीड से याहू पाइप्स के जरिए इसे अकारादिक्रम में छाना. फिर मैंने इसमें एक और छन्नी लगाई कि क्रिकेट से सम्बन्धित तमाम चिट्ठों को वह छानकर रोक दे - क्योंकि क्रिकेट से मुझे चिढ़ है. इसका आउटपुट बहुत ही कमाल का है - जो कि आप यहाँ देख सकते हैं.

वर्तमान में याहू! पाइप्स सिर्फ आरएसएस तथा एटम फ़ीड में ही काम करता है. हालाकि एक ऐसा ही औजार जो कि फ़ीड के साथ साथ स्टैटिक सामग्री में क्राउलर के साथ भी कार्य करता है वह है न्यूज़ रैक परंतु उसमें फिर आपको थोड़े से जटिल तरीके से अपने फ़ीड बनाने होते हैं.

आने वाले दिन फ़ीडों का ही होगा ऐसा लगता है और हम सभी इंटरनेट पर अच्छी खासी सामग्री फ़ीड के जरिए ही पढ़ पढ़ा रहे होंगे - किसी को अनावश्यक जाल पर विचरने की आवश्यकता ही नहीं होगी.

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this

विश्व की प्रथम ब्लॉगज़ीन निरंतर के ताज़े अंक में पढ़िए तकनॉलाजी से लेकर सम-सामयिक विषयों पर एक से बढ़कर एक बेहतरीन आलेख.

निरंतर - विश्व की प्रथम ब्लॉगज़ीन में पढ़ें मेरे ये दो आलेख...

विकिलीक्स : इंटरनेट पर सैद्धांतिक (सविनय) अवज्ञा आंदोलन की नई गांधीगिरी?

तमाम विश्व के हर क्षेत्र के स्वयंसेवी सम्पादकों के बल पर मात्र कुछ ही वर्षों में विकिपीडिया आज कहीं पर भी, किसी भी फ़ॉर्मेट में उपलब्ध एनसाइक्लोपीडिया में सबसे बड़ा, सबसे वृहद एनसाइक्लोपीडिया बन चुका है. कुछेक गिनती के उदाहरणों को छोड़ दें तो इसकी सामग्री की वैधता पर कहीं कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगा. इसी की तर्ज पर एक नया प्रकल्प प्रारंभ किया जाने वाला है विकिलीक्स.

विकिलीक्स तकनीक में तो भले ही विकिपीडिया के समान है - विकि आधारित तंत्र पर कोई भी उपयोक्ता इसमें अपनी सामग्री डाल सकेगा, परंतु इसकी सामग्री पूरी तरह अलग किस्म की होगी. इसमें हर किस्म के, बिना सेंसर किए वे गोपनीय दस्तावेज़ हो सकेंगे जिन्हें सरकारें और संगठन अपने फ़ायदे के लिए आम जन की पहुँच से दूर रखती हैं. यही विकिलीक्स का मूल सिद्धान्त है.

आगे पढ़ें >>

सुंदरलाल बहुगुणा से एक मुलाकात :

पर्यावरणविद् व चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा पिछले दिनों रतलाम प्रवास पर थे। जनशिक्षण मंच में पर्यावरण विषय पर उनका व्याख्यान था। इस दौरान उन्होंने पर्यावरण डाइजेस्ट नामक पत्रिका के इंटरनेट संस्करण का लोकार्पण भी किया तथा जालघर की अपने तरह की अकेली व पहली चिट्ठा-पत्रिका निरंतर का अवलोकन भी किया। इस अवसर पर निरंतर के लिए पर्यावरण विषयों पर सुंदरलाल बहुगुणा से खास बातचीत की निरंतर के वरिष्ठ संपादक रविशंकर श्रीवास्तव ने। संवाद में प्रस्तुत है उसी बातचीत के कुछ अंश:

आप चिपको आंदोलन के प्रणेता रहे हैं। कश्मीर से कोहिमा तक वन को बचाने के लिए आपने गंभीर आंदोलन चलाए हैं। अपनी इस यात्रा के बारे में कुछ प्रकाश डालेंगे?

मनुष्य प्रकृति को अपनी निजी संपत्ति मानने की भूल कर बैठा है तथा इसके अंधाधुंध दोहन की वजह से संसार में अनेक विसंगतियाँ और समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। प्रकृति के असंतुलन से मौसम का चक्र ही बदल गया है नतीजतन दुनिया के अनेक हिस्सों में प्राकृतिक प्रकोप बढ़ चला है। प्रकृति को बचाने के लिए प्रकृति को प्रकृति के पास वापस रहने देने के लिए ही चिपको आंदोलन की सर्जना की गई थी। संतोष की बात यह है कि देश में ही नहीं तमाम विश्व में इस मामले में जागृति आई है। वृक्षों को काटने के बजाए वृक्षों की खेती करना जरूरी है यह बात बड़े पैमाने पर महसूस की जा रही है और इस क्षेत्र में प्रयास भी किए जा रहे हैं।

टिहरी बाँध के निर्माण को रोकने के लिए आपका दो दशकों का लंबा, गहन आंदोलन भी फलीभूत नहीं हो पाया। आपका यह आंदोलन असफल क्यों हो गया?

ऐसा मानना तो अनुचित होगा। जन जागृति तो आई है कि बड़े बाँध नहीं बनेंगे। बड़े बाँध स्थाई समस्याओं के अस्थाई हल हैं। नदी का पानी हमेशा प्रवाहमान रहता है। बाँध कुछ समय बाद गाद से भर जाते हैं और मर जाते हैं। दूसरी बात यह है कि बाँध जिंदा जल को मुर्दा कर देते हैं। पानी के स्वभाव पर अध्ययन से यह बात स्पष्ट हुई है कि रुके हुए जल में मछलियों व अन्य जीव जंतुओं, जिनका जीवन प्रवाहमान पानी के अंदर होता है उनके स्वभाव में विपरीत व उलटे परिवर्तन हुए हैं। बड़े बाँध एक दिन अंततः सर्वनाश का ही कारण बनेंगे।

आगे पढ़ें >>

और अंत में, चिट्ठा-चर्चा में पूर्वप्रकाशित व्यंज़ल:


कटा ली हमने अपने अरमानों की पतंग

कुछ इस तरह स्वयं ही बन गए अपंग


अहसास तो हो चुके हैं जाने कब से खार

फिर क्या कर लेगा अपने तीरों से अनंग


कैसे करें शिकवा कि हमें कुछ नहीं मिला

ये दुनिया तो उसकी है जो है नंग धड़ंग


साथ चलने का आमंत्रण यूँ तो बहुत था

कुछ तो हमें ही बहुत पसंद था असंग


चार पंक्ति जमा के हो रही है भ्रांति रवि

सोचते हैं अब हम भी हो गए हैं अखंग

**-**

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this

चाहे जो हो, चिट्ठा लेखन सोद्देश्य होता है. अब वह भले ही आमतौर पर स्वांतः सुखाय, छपास की पीड़ा के मारे हुओं का, मन की भड़ास निकालने का यह मात्र एक साधन ही क्यों न हो.

और, यदि इसमें कुछ व्यावसायिक संभावनाएँ जोड़ दी जाएँ तब? सोने में सुहागा.

अंग्रेज़ी के कई चिट्ठाकार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यावसायिक रूप से बेहद सफल हुए हैं, और उनमें से एक तो भारतीय, अमित अग्रवाल हैं. उन्हें उनकी चिट्ठाकारी के दम पर ही माइक्रोसॉफ़्ट मोस्ट वेल्यूएबल प्रोफ़ेशनल का सम्मान मिला है. वे प्रतिदिन 10-12 घंटे चिट्ठाकारी में बिताते हैं और प्रतिदिन 5-6 चिट्ठा-पोस्ट लिखते हैं, वह भी सारगर्भित और उम्दा सामग्री युक्त. उनके चिट्ठे के छः हजार से ऊपर नियमित पाठक हैं जो आरएसएस फ़ीड के जरिए सब्सक्राइब कर पढ़ते हैं तथा उनका पेज हिट्स महीने में दस लाख से ऊपर होता है - जिनमें अधिकतर गूगल सर्च के जरिए आते हैं.

क्या हिन्दी चिट्ठाकारी में ऐसी सफलता की संभावना है?

हाँ, बिलकुल है. परंतु जरा ठहरिये, अभी नहीं. निकट भविष्य में तो नहीं. शायद 2015 तक हिन्दी चिट्ठा जगत से सफलता की ऐसी इक्का-दुक्का कहानियाँ पढ़ने-सुनने को मिलने लगें.

हिन्दी चिट्ठाकारी में व्यावसायिक संभावनाओं को तलाशने की जोरदार शुरूआत मैंने जुलाई 06 में की थी. परंतु मामला उत्साहजनक नहीं रहा. परंतु फिर लगता है कि मामला उतना अंधकारमय भी नहीं है.

एक नज़र मेरे पिछले माह के एडसेंस चैनलों के पेजहिट्स पर डालिए -


इसमें सबसे ऊपर का, सर्वाधिक हिट्स प्राप्त मेरा अंग्रेजी का चिट्ठा टेक-ट्रबल है. दूसरे नंबर पर मेरा हिन्दी चिट्ठा है. तीसरे और चौथे क्रमांक पर गूगल पेजेस हैं तथा पांचवे स्थान पर रचनाकार है. मुझे औसतन जो आय होती है (सही आंकड़े मैं सार्वजनिक नहीं कर सकता चूंकि इससे गूगल एडसेंस की सेवा शर्तों का उल्लंघन होता है) उसमें से अस्सी प्रतिशत तो अंग्रेज़ी चिट्ठे से आता है, जो कि जाहिर है अधिक पेज हिट्स व अधिक क्लिक-थ्रो के कारण मिलता है. बाकी के बीस प्रतिशत में से में से करीब अठारह प्रतिशत मेरे हिन्दी चिट्ठे से आता है. आप देखेंगे कि पेज हिट्स में बहुत कम होने के बावजूद (यूनिकोड हिन्दी के पाठक अभी बेहद कम ही हैं - प्रभासाक्षी के यूनिकोड जांच संस्करण से भी यह बात साबित हुई है - पाठक पुराने फ़ान्ट युक्त पृष्ठों को ही पढ़ते हैं) हिन्दी चिट्ठे से आय का प्रतिशत तुलनात्मक दृष्टि से अंग्रेज़ी से ज्यादा है - यानी अगर इतने ही हिट्स मेरे हिन्दी चिट्ठे को मिलें, तो भूगोल बदल सकता है.

इसका अर्थ क्या हुआ? इसका अर्थ हुआ - इट इज जस्ट ए मैटर ऑफ टाइम. यह सिर्फ समय की बात है दोस्तों - हिन्दी चिट्ठाकारी भी व्यावसायिक रूप से सफलता के झंडे गाड़ने के लिए तत्पर और तैयार है.

गूगल एडसेंस ने भारतीय भाषाओं में पैठ बनाने के लिए कमर कस ली है. कुछ समय से यदा कदा इक्का दुक्का हिन्दी के एडसेंस विज्ञापन दिखाई दे जाते थे - वे सब जाँच विज्ञापन थे. कुछ समय से इनमें बढ़ोत्तरी हुई है, और क्या संयोग है - आज का गूगल एडसेंस हिन्दी विज्ञापनों से अटा पडा है -

इसका अर्थ क्या हुआ? इसका अर्थ हुआ कि अब हिन्दी में भी विषय-संदर्भित विज्ञापनों की भरमार होगी और जाहिर है, आपके चिट्ठे का क्लिक थ्रो रेट ज्यादा होगा.

तो आप तैयार हैं? बेहतर यही होगा कि आप तैयार रहें.

मुझसे कई अवसरों पर हिन्दी चिट्ठाकारिता की व्यावसायिकता के बारे में सवाल जवाब किए जाते रहे हैं. कुछ ऐसे ही बारंबार पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर ईमानदारी से देने की मेरी कोशिश है:

प्रश्न - क्या हिन्दी में व्यावसायिक चिट्ठाकारी संभव है?

उत्तर - बिलकुल संभव है. बस थोड़े से समय का फेर है. तीन साल पहले तो हिन्दी भाषा में ही चिट्ठाकारी संभव नहीं थी! वैसे भी, एक अध्ययन के अनुसार, कुछेक खास बेहद सफल चिट्ठों को छोड़ दें तो अधिकांश अंग्रेज़ी चिट्ठे बमुश्किल 100 डॉलर प्रतिमाह आय अर्जित कर पाते हैं.

प्रश्न - मुझे अपने चिट्ठे में एडसेंस विज्ञापन लगाने चाहिए या नहीं?

उत्तर - यह व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर है. यदि आप किसी भी तरह की अतिरिक्त आय अर्जित करना चाहते हैं तो एडसेंस एक बेहतर विकल्प है. एडसेंस विज्ञापन पूरी तरह जाँच परख कर गूगल द्वारा लिए जाते हैं जिसमें किसी आपत्तिजनक साइटों के लिंक कभी भी नहीं होते. इनकी सारी प्रक्रिया विश्वसनीय व पारदर्शी होती है. वैसे दूसरे विकल्प - जैसे कि चिटिका इत्यादि भी हैं, परंतु उनके बारे में मुझे कोई विशेष जानकारी नहीं है.

प्रश्न - मुझे अपने चिट्ठे में एडसेंस विज्ञापन कब लगाना चाहिए - प्रारंभ से या बाद में चिट्ठे के लोकप्रिय होने के बाद?

उत्तर - विज्ञापन कभी भी लगा सकते हैं परंतु प्रारंभ से लगा रहेगा तो आपके पाठकों को झटका नहीं लगेगा :)

प्रश्न - हिन्दी चिट्ठे से अभी विज्ञापनों के जरिए कितनी आय हो रही है व कितनी संभावित है?

उत्तर - अभी तो नगण्य आय हो रही है व निकट भविष्य में भी नगण्य ही रहेगी, परंतु भविष्य उज्जवल है. बोलने-बताने-लायक आय कुछ चिट्ठों को वर्ष 2008 के दौरान होने लगेगी.

प्रश्न - एडसेंस मेरे हिन्दी चिट्ठे को अस्वीकृत कर देता है मैं क्या करूं?

उत्तर - इंतजार कीजिए. हिन्दी समर्थन आने ही वाला है. ऊपर का चित्र फिर से देख कर तसल्ली करें.

प्रश्न - एडसेंस कितना लगाएँ ? क्या चिट्ठे को विज्ञापनों से भर दें?

उत्तर - यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न है. अमित के चिट्ठे में आमतौर पर एक पृष्ठ में सात बड़े विज्ञापन रहते हैं. विज्ञापनों से पाठक भले ही प्रकट में नाराज हों, गरियाएँ-भपकाएं, परंतु यकीन मानिए, यदि आपका लिखा सारगर्भित है, उसमें तत्व है, पठनीयता है, सामग्री है, तो वे आपको कोसते हुए ही सही, पढ़ेंगे जरूर और हो सकता है कि यदा-कदा आपको उपकृत करते हुए कोई विज्ञापन क्लिक भी कर दें. परंतु आप ऐसा कतई न करें कि अपने मित्रों को अपने चिट्ठे के विज्ञापनों को क्लिक करने बैठा दें. यह क्लिक फ्रॉड कहलाता है और आपकी साइट ब्लैकलिस्ट करार दी जाकर आपका गूगल एडसेंस खाता बंद किया सकता है.

प्रश्न - वर्डप्रेस पर विज्ञापन नहीं लग सकते, मैं क्या करूं?

उत्तर - अगर आप मुफ़्त वर्डप्रेस का प्लटैफ़ॉर्म नहीं छोड़ना चाहते तो अपना स्वयं का डोमेन ले सकते हैं जिसमें आप अपना वर्डप्रेस संस्करण लगा सकते हैं, या फिर वर्डप्रेस का प्रीमियम संस्करण वांछित राशि भुगतान कर ले सकते हैं जिसमें आपको यह अतिरिक्त सुविधा मिल सकती है. अन्यथा ब्लॉगर का विकल्प नहीं.

प्रश्न - मेरे चिट्ठे को नित्य कम से कम कितने लोग पढ़ेंगे तब आय होगी?

उत्तर - एडसेंस दो तरह से भुगतान करता है - प्रतिहजार पेज लोड तथा प्रति क्लिक. यदि मात्र दस लोग भी आपके चिट्ठे को पढ़ते हैं और दसों उच्च भुगतान वाले विज्ञापनों को क्लिक करते हैं तो आपको हो सकता है दस डॉलर मिल जाएँ, और, यह भी हो सकता है कि हजार लोग पढ़ें और कोई क्लिक न करे तो एक भी डालर न मिले. परंतु औसतन यह बात भी सत्य है कि जितना अधिक आपका चिट्ठा पढ़ा जाएगा उतना ही पेज लोड व पेज क्लिक के जरिए अधिक आय होने की संभावना होगी. नित्य कम से कम एक हजार पेज लोड होने पर कुछ बोलने-बताने-लायक आय हो सकेगी. और, जब आपके चिट्ठे को एक लाख लोग प्रतिदिन पढ़ने लगेंगे तो आप यकीन मानिए, अमित अग्रवाल से बाजी मार ले जाएंगे.

प्रश्न - आपके मन में उभर रहे प्रश्न यदि कोई हों?

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this

बॉस - ( BOSS ) भारत ऑपरेटिंग सिस्टम सॉल्यूशन - लाइव सीडी संस्करण 1.0 (तरंग) के जांच परख इस्तेमाल करने के बाद मेरा अंतिम मत कुछ-कुछ निम्न रहा-

प्रभावशाली, इस्तेमाल में आसान तथा भारतीय भाषाओं का आउट-ऑफ़-द-बॉक्स समर्थन.

बॉस एक नया लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम वितरण है जिसे आपके लिए सीडॅक लेकर आए हैं. बॉस का प्रमुख ध्येय है भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटिंग संबंधी समस्याओं का समाधान, वह भी जीएनयू - यानी मुक्त व मुफ़्त स्रोत के संसाधनों से. इस वितरण में आपको वर्तमान में मुक्त स्रोत में मौजूद भारतीय भाषाओं के संसाधनों को संजोने की कोशिश की गई है. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें स्किम (एससीआईएम - स्मार्ट कॉमन इनपुट मेथड) को भारतीय भाषाओं के लिए पूर्व नियोजित व पूरी तरह सक्षम कर रखा गया है. इसमें निम्न लिखित भाषाओं तथा संबंधित कुंजीपटों का समर्थन है-

भाषा उपलब्ध कुंजीपट:

हिन्दी : इनस्क्रिप्ट, फ़ॉनेटिक, रेमिंगटन

बंगाली : इनस्क्रिप्ट, प्रोभात (फ़ॉनेटिक)

गुजराती : इनस्क्रिप्ट, फ़ॉनेटिक

कन्नड़ : इनस्क्रिप्ट, केजीपी

मलयालम : इनस्क्रिप्ट

नेपाली : रोमन, पारंपरिक

पंजाबी : इनस्क्रिप्ट, झेलम, फ़ॉनेटिक, रेमिंगटन

तमिल : इनस्क्रिप्ट, फ़ॉनेटिक, रेमिंगटन

तेलुगु : इनस्क्रिप्ट

मराठी : इनस्क्रिप्ट

इन सभी भाषाओं के फ़ॉन्ट तथा कुंजीपट पहले से ही संस्थापित हैं जिन्हें सिर्फ एक माउस क्लिक के जरिए सक्षम किया जाकर सीधे ही किसी भी अनुप्रयोग में या ब्राउज़र में उस भाषा में लिखा जा सकता है. उपयोक्ता को और किसी अन्य प्रकार के सेटिंग करने या बदलने की आवश्यकता नहीं होती.

बॉस लिनक्स के इस वितरण में भारतीय ओपनऑफ़िस - भारतीय-ओ-ओ संस्करण का समावेश किया गया है. यदि आप हिन्दी भाषा के वातावरण में लॉगइन करते हैं तो आपको अन्य तमाम अनुप्रयोगों समेत, ओपनऑफ़िस भी संपूर्ण हिन्दी में अपने मेन्यू सहित इस्तेमाल के लिए उपलब्ध होता है. इसके अतिरिक्त, इसमें एक विशेष अनुप्रयोग - डाक्यूमेंट कनवर्टर - दस्तावेज़ परिवर्तक को भी शामिल किया गया है जिसके जरिए आप माइक्रोसॉफ़्ट दस्तावेज़ों को ओपनऑफ़िस फ़ॉर्मेट में बदल सकते हैं. इसमें यूएसबी तथा ब्लूटूथ का भी पूरा समर्थन है.

एक कमी इसमें अखरती है वह यह कि इसमें मल्टीमीडिया का पूरा समर्थन नहीं है. इसमें बहुत से मीडिया फ़ॉर्मेट को बजाने व देखने के लिए मीडिया कोडेक्स को आपको अलग से संस्थापित करना पड़ेगा. एक अच्छी बात यह है कि इसमें आम उपयोक्ता के लिए विधियाँ दे दी गई हैं कि वह कैसे इन कोडेक को डाउनलोड कर संस्थापित करे. बॉस को इस्तेमाल करने के लिए पीडीएफ़ में गाइड एक भी है.

बॉस में एक और सुविधा है - यह एनटीएफ़एस पार्टीशनों पर लिखने-पढ़ने की सुविधा देता है. यानी आप लाइव सीडी से काम कर सकते हैं, और अपने काम को एनटीएफ़एस वॉल्यूम में सहेज सकते हैं. और यदि आपके पास हार्डवेयर क्षमता है तो आप 3डी डेस्कटॉप का भी इस्तेमाल कर सकते हैं - जिसके लिए विंडोज़ विस्ता हाल ही में चर्चित रहा है.

बॉस को आप अपने हार्ड ड्राइव में संस्थापित तो कर ही सकते हैं, परंतु यदि आप संस्थापित नहीं भी करना चाहते हैं तो भी, इसमें यदि आप परसिस्टेंट होम डिरेक्ट्री इस्तेमाल करते हैं तो आप अपने प्रोग्रामों को अपग्रेड कर रख सकते हैं तथा नए प्रोग्राम संस्थापि कर रख सकते हैं. इसके लिए डेबियन पैकेजों के लिए apt की सुविधा तो है ही, आरपीएम पैकेजों के लिए alien की सुविधा भी दी गई है.

डिफ़ॉल्ट रूप में बॉस अंग्रेज़ी के वातावरण में बूट होता है, और हिन्दी वातावरण के लिए आपको डेस्कटॉप हिन्दी में स्विच करना होता है या लॉगआउट होकर हिन्दी भाषा में लागइन होना होता है. यदि भाषा का चयन बूट प्रक्रिया के दौरान दिया जाता जैसा कि एक अन्य भारतीय-बहुभाषी रंगोली लिनक्स में है, तो यह ज्यादा उत्तम होता. परंतु रंगोली में बहुत से बग थे. बॉस में हिन्दी में काम करते समय मुझे कोई बग नहीं मिला और दस्तावेज़ों तथा ब्राउज़रों में, इंटरनेट पर विचरण करते समय कहीं कोई मुश्किल नहीं आई.

आप बॉस लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम की जीवंत सीडी यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए, बॉस का अंग्रेज़ी में विकि पृष्ठ यहाँ है.

अपने हार्ड डिस्क पर बिना संस्थापित किए (सीडी से सीधे बूट करें, परंतु रैम कम से कम 256 मेबा हो) लिनक्स सीखने के लिए तथा साथ ही साथ हिन्दी (या दूसरी अन्य उपर्युक्त सूची अनुसार भारतीय भाषाओं) में सारा कार्य करने के लिए निःसंदेह यह एक बेहतरीन संसाधन है.

हालाकि ऊपर का चित्र किसी सूरत बॉस से सम्बन्ध नहीं रखता है, मगर फिर सच्चे भारतीय पेंगुइन का प्रतीक तो है ही!

**-**

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this



**-**

यूँ तो इंटरनेट में हर संभव स्थल पर तथा तमाम तकनीकी पत्र-पत्रिकाओं में विंडोज़ विस्ता पर हजारों समीक्षाएँ आ चुकी हैं और हर एक ने अपने-अपने हिसाब से विंडोज़ विस्ता को समान रूप से भला और बुरा कहा है. परंतु हिन्दी में, तथा विंडोज़ विस्ता की हिन्दी भाषा की काबिलियत और सुविधाओं के बारे में बातें करती समीक्षा अब तक कहीं पढ़ने में नहीं आई थी.

तो लीजिए आपके लिए प्रस्तुत है विंडोज़ विस्ता पर हिन्दी में, हिन्दी के हिसाब से समीक्षा.

हालांकि विंडोज़ विस्ता के लिए हार्डवेयर की न्यूनतम आवश्यकताएँ मुझे पता थीं, परंतु फिर भी मैंने अपने 2.8 मे. हर्त्ज, 256 रैम युक्त पीसी पर इसे संस्थापित करने की कोशिश की जो कि जाहिर है नाकाम रही. विंडोज़ विस्ता के लिए न्यूनतम रैम 512 मे.बा. है, अन्यथा इसकी संस्थापना आरंभिक स्क्रीन के पश्चात् आगे ही नहीं बढ़ती. मजबूरन मुझे बाजार की ओर दौड़ना पडा - रैम खरीदने. यह समीक्षा जो लिखनी थी.

कम्प्यूटर का रैम 512 मे.बा. बढ़ाने के बाद संस्थापना फिर से चलाया गया. आगे के दो चरणों के बाद इसके संस्थापक ने न्यूनतम हार्डडिस्क की जगह 6.8 गी.बा. बताई (संस्तुति तो 8.3 गी.बा. की की गई थी!), वह भी एनटीएफ़एस पार्टीशन पर. विंडोज़ विस्ता सुरक्षा के प्रति चिंतित है अतः उसने असुरक्षित एफ़एटी पार्टीशन को अलविदा कर ही दिया. चूंकि जगह पर्याप्त नहीं थी, विंडोज़ विस्ता की संस्थापना फिर अटक गई. मेरे दोनों, 20 तथा 80 गीबा हार्ड डिस्क में कई-कई पार्टीशन हैं, और दो-तीन क़िस्म के लिनक्स भी संस्थापित हैं. किसी में भी एक साथ इतनी जगह खाली नहीं थी. मजबूरन एक पार्टीशन को जैसे तैसे खाली किया और उसे एनटीएफ़एस पार्टीशन में परिवर्तित किया.

तीसरी दफ़ा विंडोज़ विस्ता की संस्थापना आगे बढ़ी जो करीब एक घंटे में पूरी हुई. इसके आरंभिक संस्थापना स्क्रीन में एक नई चीज़ का अनुभव होता है. आरंभिक चयन के दौरान ही भाषा व कुंजीपट चुनने के विकल्प मिलते हैं. चूंकि संस्थापित किया जा रहा विंडोज़ विस्ता अल्टीमेट अंग्रेज़ी (हिन्दी संस्करण अभी वर्तमान में अनुपलब्ध है) संस्करण का था अतः इसकी भाषा में अंग्रेज़ी के अलावा अन्य विकल्प नहीं था, परंतु कुंजीपट में विश्व की तमाम भाषाओं में से चुनने का विकल्प था जिसमें हिन्दी भी एक थी. मैंने, जाहिर है हिन्दी कुंजीपट ही चुना. इसमें हिन्दी का डिफ़ॉल्ट कुंजीपट इनस्क्रिप्ट है. संस्थापना पूरा होने पर मेरे कम्प्यूटर का डिफ़ॉल्ट कुंजीपट हिन्दी हो गया जो कि लॉगइन स्क्रीन से ही प्रभावी था. परंतु राहत की बात यह थी कि लॉगइन स्क्रीन पर ही कुंजीपट भाषा बदलने की पट्टी थी और ऑल्ट+शिफ़्ट के जरिए हिन्दी तथा अंग्रेज़ी कुंजीपट में टॉगल किया जा सकता था. बाद में नियंत्रण पटल पर अतिरिक्त कुंजीपट लगाया जा सकता है, जिनमें हिन्दी पारंपरिक भी शामिल है. परंतु संस्थापना के दौरान एक दफ़ा मुख्य भाषा हिन्दी तय कर लेने के बाद डिफ़ॉल्ट को वापस अंग्रेज़ी में करने की कोई विधि मुझे नहीं दिखी.

एक बार संस्थापना चालू हो जाने के बाद इसका एनीमेटेड कर्सर घंटे भर घूमता रहा. न तो स्क्रीन पर बताया गया कि क्या हो रहा है और न ही यह बताया गया कि कितनी देर तक होता रहेगा.

यदि आप अपने इन चुनावों में संस्थापना के दौरान बाद में कुछ परिवर्तन करना चाहेंगे तो यह संभव नहीं है, चूंकि संस्थापना स्क्रीन में कहीं पर भी बैक (पीछे जाएँ) का बटन नहीं है.

संस्थापना पूर्ण होने के बाद पता चला कि विंडोज़ विस्ता मेरे कम्प्यूटर के पीसीआई-लैनकार्ड (रीयलटैक) व ऑनबोर्ड ऑडियो को स्वचालित कॉन्फ़िगर नहीं कर पाया. जबकि विंडोज़ एक्सपी पर ऐसी कोई समस्या नहीं आई थी. लैनकार्ड के पुराने ड्राइवर को तो इसने पहचानने से ही इनकार कर दिया.

विंडोज़ विस्ता की संस्थापना के उपरांत आपको पहली चीज आकर्षित करती है - इसकी साज सज्जा. बहु चर्चित ट्रांसल्यूसैंट 3डी डेस्कटॉप (जो कि हार्डवेयर पर निर्भर है अन्यथा अक्षम ही रहता है) के साथ आकर्षक रंगों, व थीम के साथ तथा कुछ बढ़िया वॉलपेपर जो आपके चुनते ही स्वतः बदल जाते हैं, के साथ आपका स्वागत होता है. प्रोग्राम मेन्यू को नया रूपाकार दिया गया है - (चालू करने का बटन तो है, परंतु स्टार्ट बटन नहीं!) जो कि स्वचालित ड्रापडाउन तो होता ही है, स्वचालित नेविगेट भी होता है. प्रोग्रामों को नए रूप में जमाया गया है जिससे विंडोज़ के पुराने प्रयोक्ताओं को उन्हें शुरू में ढूंढना पड़ सकता है. कुछ नए खेल भी सम्मिलित किए गए हैं जिनमें शतरंज भी एक है. माइन्सस्वीपर को अपग्रेड किया गया है - और अब बम एक-एक कर आवाज के साथ, धुआँ छोड़ते हुए फूटते हैं. आवाज निर्धारक (वॉल्यूम) पट्टी में यूवी मीटर अंतर्निर्मित है, जो कि संगीत के साथ नाचता है. स्क्रीन कैप्चर करने के लिए एक नया, स्निपी औजार दिया गया है जिसमें आप कैप्चर किए विंडो स्क्रीन में अलग रंग से हाईलाइट भी कर सकते हैं.

विंडोज़ एक्सप्लोरर का पूरा कायाकल्प कर दिया गया है. सबसे ऊपर फ़ाइलों को खोजने के लिए छोटा सा इनपुट बक्सा दिया गया है, जो लिखते-लिखते ही फ़ाइलों को मौजूदा डिरेक्ट्री में ढूंढता है. मैंने ‘कहानी' अक्षर युक्त फ़ाइलों के लिए ढूंढना चाहा तो इसने तत्काल ही उस डिरेक्ट्री में मौजूद चार फ़ाइलों को सामने प्रस्तुत कर दिया. परंतु जब मैंने इसमें दिए विकल्प - फ़ाइलों के भीतर शब्दों में खोजें विकल्प को चुना तो कम्प्यूटर हैंग ही हो गया. इसी तरह, एक स्क्रीन कैप्चर प्रोग्राम स्निपी (विंडोज़ विस्ता के साथ उपलब्ध स्निपी औजार नहीं) को चलाने पर विंडोज़ विस्ता प्रायः हर बार क्रैश हुआ व स्वचालित पुनः प्रारंभ हुआ. विंडोज़ एक्सप्लोरर में विभिन्न फ़ोल्डरों के बीच नेविगेशन को सरल बनाया गया है - नेविगेशन लिनक्स के कॉन्करर शैली का है, परंतु थोड़ा उन्नत है. फ़ोल्डर ब्राउज़ व्यू में प्रविष्टियाँ खिड़की की उपलब्धता के अनुसार आगे-पीछे स्वचालित होती हैं, जिससे कार्य निष्पादन में आसानी होती है.

विंडोज़ विस्ता में सुरक्षा को हर स्तर पर ध्यान में रखा गया है. जैसे ही कोई नया प्रोग्राम सेटअप करते हैं या सिस्टम स्तर की कोई सेटिंग करते हैं इसका ‘यूजर अकाउन्ट कंट्रोल' आपसे अनुमति मांगता है. बगैर अनुमति लिए यह आपके लॉक किए स्क्रीन को छोड़ता नहीं है. यदा कदा चालू करने व बंद करने के दौरान यह काफी समय लगाता है.

विंडोज़ एक्सपी के नोटपैड में तो पहले से ही यूनिकोड हिन्दी समर्थन था, परंतु वर्डपैड में समर्थन बगी किस्म का था. विंडोज़ विस्ता का वर्डपैड अब पूरी तरह यूनिकोड हिन्दी को समर्थित करता है. जब आप इसमें हिन्दी में लिख कर कुछ सहेजते हैं तो यह यूनिकोड पाठ में सहेजने के लिए एक विकल्प भी देता है.

विंडोज़ विस्ता का आरंभिक इस्तेमाल करते समय जाने क्यूँ हर समय लगता रहा जैसे लिनक्स वातावरण में कॉन्करर और केडीई के साथ काम कर रहे हों. और, उधर, इसी आश्चर्यजनक तरीके से, फ़ेदोरा कोर 7 में प्रोग्राम मेन्यू को विंडोज़ शैली में सरल और उपयुक्त बनाया गया है. तो, इसका अर्थ क्या हुआ? विंडोज़ लिनक्स की तरह बनने चला है - कुछ कुछ गीकी और सुरक्षित तो लिनक्स विंडोज़ का रुप धरने चला है - कुछ कुछ सरल और इस्तेमाल में आसान. बढ़िया है!

यूं तो विंडोज़ विस्ता की तकनीकी विशेषताएँ और भी बहुत हैं, जिनका वर्णन इस आलेख की विषय सीमा के बाहर है, परंतु इतना तो तय है कि विंडोज विस्ता धीरे से लोकप्रियता की सीढ़ियाँ चढ़ेगा और आपका कम्प्यूटिंग काम आसान बनाने के साथ-साथ खासा सुरक्षित भी रहेगा.

मेरा अंतिम मत? - विंडोज़ विस्ता आपके वर्तमान ऑपरेटिंग सिस्टम तथा वर्तमान कम्प्यूटर के अपग्रेड के लिए नहीं है. यदि आप नया कम्प्यूटर ले रहे हैं, तभी विंडोज़ विस्ता के बारे में सोचें, अन्यथा आपको हार्डवेयर के लिए बाजार की ओर दौड़ तो लगानी ही होगी, और हो सकता है कि आपके कुछ पुराने हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर काम ही न करें. मगर, फिर, आपके अपने पुराने कबाड़ बनते जा रहे कमप्यूटर से छुटकारा पाने का क्या यह उचित समय नहीं है?

**-**

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this


अगर आप मुझ पर विश्वास करें, तो दस सबसे उत्तम उपहार जैसी चीज़ें वेलेंटाइन दिवस के लिए नहीं होतीं. दीपावली और जन्म दिवस के लिए भी नहीं. हर अवसर के लिए सिर्फ और सिर्फ एक ही सबसे उत्तम उपहार ( पुरुष तथा महिला के लिए अलग-अलग यदि विशिष्टता में कहें,) होता है. यदि आप अब भी मेरे कहे पर विश्वास कर रहे हैं तो आगे पढ़ें -

पुरुष के लिए वेलेंटाइन दिवस का सर्वोत्तम उपहार:

पुरुष को गॅज़ेट्स और हाई टैक उपकरण बहुत अच्छे लगते हैं. उपकरण जितने ज्यादा जटिल और पेचीदे होंगे, पुरुष उन्हें उतने ही ज्यादा पसंद करेंगे. यदि पुरुष को आधे पैरा के दर्जन भर वाक्य लिखने के लिए किसी जटिल प्रोग्राम को अपने कम्प्यूटर पर संस्थापित कर चलाने में डेढ़ दिन लग जाता है तब भी उसे बहुत आनंद आता है और बड़ी खुशी मिलती है. सीधी सरल चीजों में पुरूष को कतई मजा नहीं आता. यदि आप अपने पुरुष मित्र को कोका कोला की बोतल के ढक्कन को खोलने के लिए माइक्रोप्रोसेसर नियंत्रित, सचमुच जटिल दिखाई दे रहा, वास्तविक जटिल औजार उपहार में देंगीं तो वह आपका लाख-लाख शुक्रिया अदा करेगा, आपको लाख गुना अधिक प्यार करेगा और अपने इस नायाब उपकरण को हर एक को गर्व से दिखाता फिरेगा. मेरी बात कुछ समझ में आई? तो अभी ही किसी इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर गॅज़ेट की दुकान पर जाएँ, और अपने वेलेंटाइन के लिए कोई बढ़िया सा, आवश्यक रूप से जटिल सा, एकदम नई खूबियों वाला गॅजेट खरीदें. भले ही उनके पास औजारों और उपकरणों का ढेर लगा हो, आप वैसा ही थोड़ा सा अलग किस्म का गॅजेट उपहार में आँख मूंद कर दे दें. वह इसे पाकर प्रसन्न होगा. वह इस तरह के सभी औजारों, उपकरणों को पाकर प्रसन्न होगा.

स्त्री के लिए वेलेंटाइन दिवस का सर्वोत्तम उपहार:

स्त्रियों को उपहार पसंद हैं. उन्हें हर किस्म के उपहार पसंद हैं. उन्हें छोटे, उपयोगी उपहार भी बहुत पसंद हैं. परंतु इससे भी ज्यादा उन्हें ‘उपहार खरीदना' पसंद हैं. स्त्रियों को खरीदारी, शॉपिंग में आनंद आता है, वे शॉपिंग कर प्रसन्न होती हैं. आपको मेरी बात समझ में आई? चलिए, मैं आगे और समझाता हूं. आप अपने वेलेंटाइन के लिए बढ़िया, क़ीमती उपहार खरीदते हैं. विशिष्ट मौक़े पर सोल्लास उसे वह उपहार प्रस्तुत करते हैं. प्रकट में तो वह बहुत खुश दिखाई देती है और आपको धन्यवाद देती है, परंतु वह अंदर ही अंदर आहत हो जाती है - उसे तत्क्षण पता चल जाता है कि यह उपहार उसके मनमाफ़िक रंग का नहीं है. अब वह या तो अपनी आलमारी में बंद कर हमेशा के लिए भूल जाती है या अगले ही दिन उसे बदलवा (चूंकि अगर रंग मेल खा भी जाता है तो साइज माफ़िक नहीं होता है) कर ले आती है. अब आई बात समझ में? जी हाँ, स्त्रियों को शॉपिंग पसंद है, और सर्वोत्तम वेलेंटाइन उपहार होगा - उन्हें शॉपिंग करवाना. उसे किसी बढ़िया शॉपिंग माल में स्वयं के लिए वेलेंटाइन उपहार खरीदवाने ले जाइए. उन्हें ढूंढ ढूंढ कर, मोल भाव कर, देख दाख कर खरीदने दें. कोई जल्दी न मचाएँ. बल्कि चार और दुकानें देखने का प्रस्ताव रखें. खरीदारी का बिल आप भरें. अब आप अपने जेब की ओर निगाह मत दौड़ाइये. आप उन्हें खरीदी की ऊपरी सीमा ईमानदारी से बता दें, बहुत संभव है, वे उससे भी बहुत कम में, मितव्ययिता में अपनी मन माफ़िक खरीदारी कर लेंगी और बहुत खुश रहेंगीं. आपके जेब में माल अब भी बच रहेगा. उनकी (व आपकी भी) वह शाम अतिरिक्त रूप से बेहतरीन रहेगी यह आपको बोनस के रूप में मिलेगा.

तो, चलें वेलेंटाइन दिवस की खरीदारी करने?

**-**

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this

आप पूछेंगे कि दोनों में क्या समानता है?

पहले पूरा आलेख तो पढ़िए जनाब. समानता है भी या नहीं आपको खुद-बख़ुद पता चल जाएगा.

तो आइए, पहले बात करें कार्पेल टनल सिंड्रोम की. मेरे एक बार निवेदन करने पर ही फुरसतिया जी ने मेरी फ़रमाइश पूरी कर दी. उन्होंने दो-दो बार फ़रमाइशें दे कर मुझे शर्मिंदा कर दिया कि मैं कार्पेल टनेल सिंड्रोम के बारे में लिखूं. अब भले ही मैं कार्पेल टनल सिंड्रोम के बारे में ज्यादा बोलने बताने का अधिकारी नहीं हूं, मैं स्वयं मरीज हूँ - चिकित्सक नहीं, मगर उनका आग्रह तो मानना पड़ेगा.

मगर, फिर, कार्पेल टनल सिंड्रोम के बारे में बात करने से पहले चर्चा कर ली जाए ब्लॉगों की - खासकर हिन्दी ब्लॉगों की. पिछला हफ़्ता हिन्दी ब्लॉगों के लिए कई महत्वपूर्ण मुकाम लेकर आया. एनडीटीवी पर हिन्दी चिट्ठों के बारे में नियमित क्लिप दिए जाने हेतु कुछ चिट्ठाकारों की बात अभी हुई ही थी कि याहू हिन्दी ने अपने पृष्ठ पर नारद के सौजन्य से हिन्दी चिट्ठों को जोड़ लिया. बीबीसी से भी प्रस्ताव आया है और इधर जीतू भाई बता रहे हैं कि उनकी सीक्रेट बातचीत गूगल से भी चल रही है. एमएसएन पिछड़ क्यों रहा है यह मेरी मोटी बुद्धि में समझ में नहीं आया. मैं उन्हें खुला निमंत्रण देता हूँ - भई, मुझसे भी तो कोई बात करो. इस बीच, कुछ और साथियों ने अपने फ़ुरसतिया जी से उनके फ़ुरसत के लम्हों में हिन्दी देसी पंडित को पुनर्जीवित करने की बात भी कही है. और, उससे थोड़ा ही पहले हिन्दी चिट्ठों के हस्तचालित-सुंदर-सुव्यवस्थित-एग्रीगेटर पर बवाल मच ही चुका था. समानांतर में हिन्दी चिट्ठों के इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कारों के लिए लड़ाइयों का दौर उधर चल ही रहा है. इधर डिजिट पत्रिका ने 150 से अधिक पृष्ठों का ब्लॉगिंग फास्ट ट्रैक निकाला है जिसमें देसी पंडित समेत हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेटर हिन्दी ब्लॉग डाट कॉम की खास चर्चा हुई है.

अब जब हर ओर से हिन्दी चिट्ठा जगत में आपाधापी मच गई है तो मैं पीछे क्यों रहूँ - मुझे याहू में भी दिखना है, मुझे बीबीसी के मुखपृष्ठ पर भी अवतरित होना है, गूगल की पेज रेंकिंग पर भी मेरी निगाह है, गूगल के सीक्रेट काम काज में भी मुझे आना ही होगा, एनडीटीवी के क्लिप में भी नजर आना है तो मुझे अतिरिक्त मेहनत तो करनी पड़ेगी ही. अपने चिट्ठास्थल को चिट्ठों से पाटना होगा नहीं तो मैं पिछड़ जाऊंगा. जाहिर है, मुझे कार्पेल टनल सिंड्रोम होना तो लाजिमी है.

कार्पेल टनल सिंड्रोम एक ऐसी बीमारी है जिसमें अत्यधिक टाइप करने पर रिपिटिव स्ट्रेस इंज्यूरी के चलते उंगलियाँ अत्यधिक अतिसंवेदनशील हो जाती हैं और उनमें भयंकर दर्द होने लगता है. परंतु यहाँ उस तरह के इंज्यूरी की बात नहीं हो रही. चिट्ठाकारों और टिप्पणीकारों में एक अलग तरह का, कार्पेल टनल सिंड्रोम होता है. बात उसकी हो रही है.

मुझ समेत हिन्दी चिट्ठाकार इस समय अलग तरह के, चिट्ठाकारी-कार्पेल टनल सिंड्रोम की महामारी से ग्रसित हो गए हैं. इस बीमारी के लक्षण कुछ-कुछ यूँ है -

  • कम्प्यूटर का कुंजीपट देखते ही उंगलियाँ चिट्ठापोस्ट, टिप्पणी पोस्ट करने के लिए मचलती रहती हैं. और जब तक चार लाइनें टाइप नहीं हो जाती उंगलियों का दर्द, उंगलियों की अतिसंवेदनशीलता, उंगलियों की खुजली खत्म नहीं होती.
  • उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते दिमाग पर चिट्ठा पोस्ट का भूत सवार रहता है. यह सिंड्रोम हाथ की उंगलियों के साथ-साथ दिमाग की चूलों को भी संवेदनशील बना देता है. जब तक वह चार टिप्पणियां और दो चिट्ठापोस्ट नहीं कर लेता, दिमाग में चिड़चिड़ापन बना रहता है. और यदि किसी वजह से ये चीज़ें नहीं हो पाईं या कम हो पाईं, तो कुछ का कुछ टाइप हो जाता है, और पोस्ट हो जाता है.
  • चिट्ठे के साज संवार, ब्लॉग स्टेट्स की जाँच और लिंक जोड़ने घटाने आदि के चलते माउस हैंडलिंग व माउस क्लिक के कारण कलाइयों में आरएसआई (रिपिटिटिव स्ट्रेस इंज्यूरी) हो जाती है. मगर उसका दर्द तभी काफूर होता है जब कोई मनमाफ़िक हैक चल जाता है और चिट्ठे के रंगरूप का कायाकल्प हो जाता है. अब ये बात दीगर है कि चिट्ठे के रंगरुप से अनभिज्ञ पाठक को अब भी चिट्ठा पढ़ने में समस्या आ रही होती है और विज्ञापनों के बीच फंसे सामग्री में पठन सामग्री को नहीं ढूंढ पाने की शिकायत करता हुआ वो अंततः खोजबीन कर पुनःपुनः वही पढ़ता है जिसमें सचमुच पढ़ने लायक कुछ होता है. पढ़ने के बाद फिर शिकायत करता है.
  • इस बीमारी के एक अन्य किस्म के स्ट्रेन में चिट्ठाकार अपने चिट्ठापोस्ट में कुछ नया, कुछ ताज़ा, कुछ भड़काऊ, कुछ उकसाऊ किस्म का लिखता है क्योंकि उसके सीधे साधे लिखे को कोई तवज्जो नहीं देता होता है. फिर तो एक और अन्य किस्म के रिवर्स कार्पेल टनल सिंड्रोम के स्ट्रेन से पीड़ित तमाम दूसरे चिट्ठाकार अपनी मारक टिप्पणियों से अपना इलाज करते हैं. प्रकट में तो प्रतीत होता है कि वे चिट्ठाकार के चिट्ठापोस्ट के चीथड़े उड़ा रहे हैं, परंतु वे दरअसल अपना स्वयं का झाड़-फूंक टाइप इलाज कर रहे होते हैं.
  • इसी तरह के एक अन्य किस्म के स्ट्रेन में चिट्ठाकार अत्यंत विचलित दिखाई देता है - रेस्टलेस लैग सिंड्रोम की तरह उसका चिट्ठाकार मन रेस्टलेस रहता है और उसकी लालची उंगलियाँ अपने चिट्ठा स्थल के लिए कभी वर्डप्रेस तो कभी ब्लॉगर तो कभी इबिबो के अकाउंट पर दौड़ती भागती रहती हैं. एडसेंस, चिटिका, अमेजन के दिवास्वप्न में वह अकसर दिखाई देता है.
  • चिट्ठाकारों में कार्पेल टनल सिंड्रोम के जो वायरस फैले हैं वे जुकाम के अनगिनत वायरस की तरह अलग अलग हैं, और हर एक का अपना लक्षण और इलाज है - बल्कि जैसा कि कहा जाता है जुकाम के हजारों इलाज हैं फिर भी उसका कोई इलाज नहीं है - वैसा ही इस सिंड्रोम के साथ है. चिट्ठाकार एक पोस्ट लिख लेता है तो सोचता है कि उसने झंडे गाड़ दिए, तमाम दुनिया उसे अब शाबासी देगी. परंतु यदि कोई भूले से भी जरा सी उलटी टिप्पणी पेल देता है तो वह बागी हो जाता है और तमाम पटेलों, चौधरियों, मुखियाओं की बड़ी ही खराब स्वाद वाली भाषा और उतने ही खराब अंदाज में खुलेआम जूतम पैजार को उतारू हो जाता है. सिंड्रोम की यह मारक किस्म बर्ड फ़्लू जैसे डेडली वायरस के म्यूटेशन के फलस्वरूप पैदा हुए वायरस से होती है और आमतौर पर नए-नवेले चिट्ठाकारों को ग्रसित करती है. पुराने चिट्ठाकार इस सिंड्रोम की किस्म से इम्यून हो चुके होते हैं क्यों कि इससे पहले वे कइयों की उतारने के चक्कर में कइयों दफ़ा अपनी उतरवा चुके होते हैं.
  • तो ये थे मोटे मोटे लक्षण. यूं तो और भी बहुत से बारीक लक्षण हैं, परंतु चूंकि वे आम नहीं हैं, इसीलिए उनकी चर्चा करना महज जगह भरने जैसी बात होगी. जैसे ही हमें बड़े लक्षण मिलेंगे उनकी चर्चा की जाएगी.

अब आइए, कुछ बात करते हैं ब्लागिंग एथिक्स की. चिटठों में नैतिकता की. डिजिट पत्रिका के फ़ास्ट ट्रैक में दर्जनों पन्ने ब्लॉगिंग एथिक्स पर बे-फ़जूल रंगा गया है. मरफ़ी महोदय के अनुसार - ब्लॉगिंग और एथिक्स - एक प्रश्नवाचक चिह्न है, और सदैव बना रहेगा. फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन तो ब्लॉग की सबसे बड़ी खासियत, पूंजी और न जाने क्या-क्या है. भारत सरकार समूचे ब्लॉगर पर प्रतिबंध लगाकर अपनी भद पिटवा चुकी है - प्रॉक्सी सर्वर के जरिए आपका चिट्ठा ब्रह्मास्त्र की तरह हर कहीं मार करने चला जाएगा अतः निश्चिंत हो, नैतिकता-अनैतिकता के बंधन से परे लिखते रहिए. नहीं मानते, चलिए, तो फिर आपके लिए कुछ एथिक्स की बातें कुछ चिट्ठा नैतिकता की बातें लिख ही देते हैं ताकि आप ध्यान रखें और बख़ूबी ध्यान रखें.

  • आपका चिट्ठा आपका नहीं है. आपके चिट्ठे की सामग्री आपकी नहीं है. वह पाठक का, पाठक के लिए है. अतः आप अपने चिट्ठे में ऐसा लिखें, इतना लिखें कि यदि पाठक आपसे हजार मील दूर बैठकर अपने कम्प्यूटर पर नहीं पढ़ता होता तो शर्तिया आपको एक घूंसा तो मार ही देता. प्रतिक्रिया स्वरूप कम्प्यूटर मॉनीटर कुंजीपट इत्यादि तोड़ने की खबरें अगर आती हैं तो इंडीब्लॉगीज़ से भी बड़ा पुरस्कार मिला समझें.
  • अपने चिट्ठे की भाषा नया, नायाब, बे-स्वाद, असंसदीय शब्दों युक्त रखेंगे तो आपके चिट्ठे के शिघ्रातिशीघ्र सफ़ल होने की पूरी संभावनाएँ होंगी. पारंपरिक लेखों को कौन बेवकूफ़ पाठक पढ़ता है. ऐसा लिखें कि चार टिप्पणियों में प्रत्युत्तर रूप में गालियाँ अवश्य मिलें. इससे चर्चे होंगे, खूब चर्चे होंगे और बहुत संभव है कि आपका चिट्ठा, याहू के नए हिन्दी अवतार के प्रथम पृष्ठ पर ब्लॉग ऑफ़ द डे से नवाजा जाए.
  • हू-इज़, व्हेयर इज़, आईपी एड्रेस लॉगिंग की चिंता किए बगैर (वैसे भी कितनों को पता होता है और पता भी होता है तो कितने चिंता करते हैं) अनाम, छद्मनाम और विविध नामों से चिट्ठा लिखें और आपके चिट्ठे के पाठक टिप्पणीकार न हों तो इन्हीं छद्मनामों से अपने इन्हीं चिट्ठों में अदला-बदली में टिपियाएँ ताकि लोगों को लगे कि चिट्ठा तो बहुत पढ़ा जा रहा है. और, जब लोगों को लगने लगता है, तो भीड़ तो बढ़नी ही है.
  • अंग्रेज़ी में सामग्री की चोरी कर चिट्ठा लिखना और लिखकर सफल होना आम बात है. इससे भी ज्यादा आम बात है चार जगह से सामग्री इकट्ठी कर उसे कांट छांट कर दो शब्द इधर घुसाया, दो कामा इधर से निकाला इत्यादि कार्य कर अपना बढ़िया मौलिक सामग्री तैयार कर चिट्ठे में परोसना और सफल होना. परंतु हिन्दी चिट्ठा जगत में यह संभव नहीं है. हिन्दी के महज चार सौ चिट्ठे हैं जबकि अंग्रेजी के चालीस करोड़. हिन्दी में सुबह चोरी करो तो दोपहर आने से पहले हल्ला हो जाता है कि चोरी हो गई. ऐसे में दूसरा तरीका कारगर हो सकता है. कम से कम एक दर्जन हिन्दी चिट्ठों को बेतरतीब चुनकर उनकी सामग्री को बेतरतीब जोड़-जाड़ कर एक चिट्ठापोस्ट तैयार करें. शर्तिया यह मौलिक होगा. यह नकल-चिपकाया माल गद्य भले ही न लगे, परंतु धांसू पद्य जरूर होगा. हो सकता है ऐसे किसी पद्य के लिए आपको हिन्दी युग्म का पुरस्कार मिल जाए. न मिले तो भी कोई वांदा नहीं. गूगल है ही गूगल का एडसेंस तो है ही - ढेरों चिट्ठों से मारी हुई सामग्री युक्त आपका पेज गूगल पेज रैंक पर पहले स्थान पर आएगा और आज नहीं तो दस साल बाद डालरों में कमाई होगी ही. नकल-चिपकाने वाली विधि से आपको बना-बनाया माल भी तैयार मिलता है- रंग लगे न फ़िटकरी और हींग का स्वाद बढ़िया आए - ओह, माफ़ कीजिए, यहाँ भी कटपेस्ट हो गया.
  • अपनी गलतियों को कभी नहीं स्वीकारें, बल्कि ज्यादा दमदार तरीके से हर संभव तरीके से सामने वाले को गलत ठहराएँ. अपनी बात रखने को आधा दर्जन टिप्पणी व दो-तीन चिट्ठापोस्ट अवश्य लिखें. सामने वाला भले न माने, दर्जनों अन्य पाठक अवश्य मान जाएंगे.

मुझे आज के अपने कार्पेल टनल सिंड्रोम की समस्या से राहत मिल गई है. अब आपकी बारी है अपने-अपने सिंड्रोमों से राहत पाने की. टिपियाएँ, प्रति-चिट्ठापोस्ट करें, फ़ोरम में चर्चियाएँ. वैसे, आपको अपने पुराने मॉनीटर से निजात पाने का सबसे बढ़िया मुहूर्त भी अभी ही है.

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this



  • अंततः जब आप अपनी नई कार खरीदने लायक पैसा बचा लेते हैं, तभी आपकी जमी जमाई नौकरी छूट जाती है.
  • कोई भी कार तभी खराब होती है जब बहुत जरूरी में कहीं जाना होता है और दूसरा कोई विकल्प नहीं होता. और प्रायः वह मामूली सी खराबी होती है, जिसको ठीक करने के लिए इंजिन बाहर निकालना जरूरी होता है.
  • भले ही आप अपनी कार को कितने ही अच्छे तरीके से मेंटेन कर रखते हों, पेंदे से तेल तो तब भी टपकेगा.
  • कार से आ रही अजीब सी आवाजों से चिंतित होकर जब आप अपनी कार को मेकेनिक के पास दिखाने ले जाते हैं तो वह आवाज आश्चर्य जनक रूप से उस वक्त गायब हो जाती है और आपके पास उस आवाज को, उस खराबी को वर्णन करने के लिए शब्द नहीं रहते.
  • हर बार, जब आप सार्वजनिक वाहन से जाते हैं तो कार पार्किंग खाली रहता है परंतु जब आप कार लेकर जाते हैं तो पार्किंग में जगह नहीं रहती.

  • यदि आप कार के हुड के नीचे कुछ काम कर रहे होते हैं तो कुछ न कुछ ऐसा उसमें गिर ही जाता है जो पहुँच से बाहर हो जाता है.

  • कार ढंकने के लिए प्रयोग में आने वाले विनाइल शीट का तापक्रम आपके हाथों के तापक्रम के व्युत्क्रमानुपाती होता है तथा उसमें धूल अंदर-बाहर दोनों तरफ बराबर रहता है.
  • आपकी कार का विंड स्क्रीन जितना ज्यादा साफ होता है, वह उतना ही ज्यादा कीटों को आकर्षित करता है.
  • आपकी कार में कोई डेंट व डैश तभी पड़ती है जब बीमे की अवधि खतम हो जाती है.
  • आपकी पसंदीदा - हर किस्म की कार के लिए - भले ही आप उसे अफ़ोर्ड नहीं कर पाएँ, हर कार विक्रेता के पास ‘बढ़िया मासिक भुगतान ऋण प्लान' होता ही है.

  • आपके कार की कुंजी हमेशा उसी जेब में रहती है जो सबसे ज्यादा भरी हुई होती है. और अकसर जेब में सबसे नीचे रहती है.

  • गंतव्य पर पहुँचने के ठीक पाँच मिनट पहले आपके बच्चे कार में ही सो जाते हैं.
  • कार की टायरों में पंचर रात के समय, खाली रोड पर ही होता है. और रोड साइड के टायरों में होता है.
  • जब आपको देरी हो रही होती है तभी हर चौराहे पर लाल बत्ती ही मिलती है.

  • जितनी शिद्दत से आप कहीं जाना नहीं चाहते और मजबूरी में जा रहे होते हैं तो उतनी ही शिद्दत से ट्रैफ़िक आपको वहाँ शीघ्र पहुँचाने में साथ देता है.
  • किसी दिन आप ट्रैफ़िक जाम में फंसते हैं और फास्ट लेन में चले जाते हैं तो वह लेन भी ट्रैफ़िक जाम में फंस जाता है.
  • कार में पंचर तभी होता है जब आपके पास औजार नहीं होता है. और खासकर तब तो होता ही है जब आपके साथी ने औजार नहीं भूलने के लिए आपको पहले ही कह रखा होता है.
  • जब तक आपकी कार में स्टेपनी होता है कार में पंचर नहीं होता.
  • जब भी आप अचानक अपनी कार रोकना चाहते हैं तो हर हमेशा पीछे से कोई न कोई वाहन तेज गति से आता ही होता है.

  • जब आप तेजी से और शीघ्रता से कहीं जाना चाहते हैं तो आपकी कार के सामने चल रहा वाहन कछुए की चाल से चलता रहता है और ओवरटेक करने की कोई संभावना नहीं रहती.
  • यदि आप लेट हो गए हैं तो संकरी सड़क पर आपकी कार के सामने एक बस चल रही होती है जो कि हर स्टाप पर रुकती है.
  • यदि आप ज्यादा लेट हो गए हैं तो संकरी सड़क पर आपकी कार के सामने एक स्कूल बस चल रही होती है जो कि हर स्टाप पर और अचानक रुकती चलती है.
  • मरफ़ी का संकरी पुलिया का नियम: यदि किसी लम्बे सड़क पर कहीं पर एक लेन की संकरी पुलिया होती है और यदि उस सड़क पर मात्र दो कारें ही चल रही होती हैं तो- 1) दोनों कारें विपरीत दिशा में चलती होती हैं और, 2) वे ठीक पुलिया पर ही एक दूसरे को क्रास करती हैं.
  • आपकी कार का डेप्रिसिएशन आपके पड़ोसी की नई चमचमाती कार की कीमत के सीधे अनुपात में, और एक्सपोनेंशियली होता है.

  • पेट्रोल पंप पर आप चाहे जिधर से भी अपनी कार ले जाएँ, पेट्रोल टंकी का ढक्कन पंप के दूसरे तरफ ही होता है.

  • बरसात में जब आपको अपनी कार तक जाना होता है, घनघोर बारिश रुकने का नाम ही नहीं लेती. जैसे ही आप कार के भीतर जैसे तैसे तरबतर घुसते हैं, बादल छंट जाते हैं, चिड़िया चहचहाने लगती हैं, और आसमान में इन्द्रधनुष निकल आता है.
  • किसी लम्बे ट्रिप में आपकी कार में पेट्रोल तभी खतम होता है जब पेट्रोल पम्प कम से कम पचास किलोमीटर दूर होता है.

  • अपनी कार में अतिरिक्त अवयवों को लगाकर तथा खर्चीले परिवर्तन कर आप अपनी कार के तथा अन्य विशाल वस्तुओं के बीच गुरूत्व बल में इजाफ़ा करते हैं.
  • यदि आप अपनी कार को रेसिंग कार की तरह इस्तेमाल करेंगे तो इसमें समस्याएँ भी उसी गति से आएंगीं.
  • भले ही आप जेट की गति से ड्राइव कर रहे हों, आपके पीछे आ रहा कोई न कोई वाहन आपसे भी जल्दी में होगा.
  • भले ही आप जेट की गति से जा सकते हों, आपके आगे चल रहा कोई न कोई वाहन आपकी देरी का कारण बन ही जाता है.
  • किसी शांत चौराहे में तब तक कोई ट्रैफ़िक नहीं होता जब तक कि आपको उसे क्रास नहीं करना होता है.
  • किसी भी नाले में आप अपनी कार उतार सकते हैं परंतु जरूरी नहीं कि उसे पार कर ही लें.
  • किसी भी चौराहे पर लाल बत्ती हमेशा ही हरी बत्ती से ज्यादा देर तक जलती रहती है.
  • आपकी कार का हार्न जितना ज्यादा तेज आवाज करेगा उतना ज्यादा ही संभावना इस बात की होगी कि वह आपके सिवाय अन्य किसी को सुनाई नहीं दे.

  • यदि किसी सड़क में कोई ट्रैफ़िक नहीं है तो वह मरम्मत के लिए खुदा हुआ होगा.

  • पानी का डबरा हमेशा ही अनुमान से ज्यादा गहरा होता है.
  • बारिश में कीचड़ वहाँ-वहाँ जाती है जहाँ-जहाँ आपकी कार जाती है.
  • कार जितनी भारी, जितनी मंहगी होगी कीचड़ में वह उतनी ही गहरी धंसेगी.
  • जहाँ कीचड़ में आपकी कार धंसती है वहाँ आसपास उसे निकालने का कोई साधन, यहाँ तक कि कोई एक पेड़ भी नहीं होता.
  • टायर जितना बड़ा होता है ट्रैक उतना ही गहरा होता है.
  • जितना दिखाई देता है पानी उससे ज्यादा गहरा होता है.
  • यदि आप फ़ोर व्हील ड्राइव कार में जा रहे होते हैं तो आते जाते सड़क सूखी मिलती है और जब आप टू व्हील ड्राइव में जा रहे होते हैं तो वापसी में बारिश आ जाती है.
  • आप अपनी कार को चाहे जैसे बढ़िया तरीके से रखते हों, आश्चर्यजनक और नामालूम तरीके से दाग-धब्बे और डेंट तो लग ही जाते हैं - और ये आपके कार की कीमत के वर्ग के सीधे अनुपात में होते हैं.

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this

ब्लॉग टैम्प्लेट (चाहे वर्ड प्रेस हो या ब्लॉगर) में यदि सीएसएस में कैरेक्टर स्पेसिंग या कैरेक्टर जस्टीफ़ाई हेतु कुछ कोड डाल दिया जाता है तो फ़ॉयरफ़ॉक्स में कबाड़ा हो जाता है. उदाहरण स्वरूप तीन चिट्ठों के ताजा स्क्रीन शॉट हैं-

सुनील का चिट्ठा

मनीषा का चिट्ठा

श्रीश का चिट्ठा

यूं तो फ़ॉयरफ़ॉक्स के लिए कई एक्सटेंशन हैं जिससे यह समस्या दूर की जा सकती है, और यदि पेज व्यू बेसिक कर दिया जाए, तो भी सामग्री पढ़ने में आ जाती है. परंतु एक आम कम्प्यूटर उपयोक्ता से यह उम्मीद नहीं रखी जा सकती कि वह एक्सटेंशन इस्तेमाल कर आपके चिट्ठे को पढ़े. यूं तो आमतौर पर लोग-बाग़ इंटरनेट एक्सप्लोरर ही इस्तेमाल करते हैं, परंतु मेरे जैसे कुछ लोग बाइ डिफ़ॉल्ट फ़ॉयरफ़ॉक्स भी इस्तेमाल करते हैं.

टैम्प्लेट में मामूली फेरबदल कर यह समस्या दूर की जा सकती है, या फिर समूचा टैम्प्लेट ही बदल दिया जाए (जिसमें कैरेक्टर स्पेसिंग व जस्टीफ़ाई डिफ़ाइन न हों) तब भी यह समस्या दूर हो सकती है.

यह सब कैसे करें? अधिक जानकारी के लिए यह कड़ी देखें

और, हाँ, जब भी टैम्प्लेट में कोई फेर बदल करें, एक बार फ़ॉयरफ़ॉक्स में अपना चिट्ठा चलाकर अवश्य देख लें.



Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this


पता नहीं कब चुपके से भारतीय भाषाओं का याहू! बीटा अवतरित हो गया. हो सकता है आपको पहले से पता हो, मुझे तो आज ही पता चला :)

नजारा मजेदार है.

आप भी देखें व आनंद लें.

कड़ी है-

http://in.hindi.yahoo.com/

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget