ब्लॉगर, साहित्यकार से आगे है, और रहेगा.

chithakar banam sahityakar (WinCE)

(पिछले दिनों अनिल ने ब्लॉगर बनाम आम साहित्यकार पर विचारोत्तेजक लेख लिखा था जिसे आगे बढ़ाते हुए दिलीप ने हिन्दी चिट्ठाजगत् में गैंग और माफ़िया की बातें कीं और आरोप लगे कि लोगों ने ब्लॉग दुकानें सजा ली हैं. मगर, मेरा मानना है कि चिट्ठाकारी में गैंग और माफिया जैसी चीजें सिर्फ और सिर्फ काल्पनिक हैं, ठेठ कल्पना की उपज हैं और न कभी हो सकती हैं और न हो सकेंगी. जिसकी दुकान में माल बढ़िया, सार्थक होगा मक्खियों के माफ़िक पाठक और टिप्पणीकार वहीं मंडराएंगे. और, साथ ही, चिट्ठाकार सदैव ही आम साहित्यकार से एक कदम आगे रहेगा. और, यकीन मानिए, भविष्य में चिट्ठाकारी के जरिए ऐसे साहित्य रचे जाएंगे जिसकी कल्पना भी हमें (अब भी!) नहीं होगी. कारण ऑब्वियस है. चिट्ठों में संपादकीय संस्तुति, संपादकीय कैंची जैसी चीजों का सर्वथा अभाव और चिट्ठों की सर्वसुलभता, उसका अमरत्व और चिटठों के बहुआयामी-मल्टीमीडिया युक्त होना. प्रस्तुत आलेख बालेंदु के वृहत आलेख से प्रेरित है और इसे रेडियो वार्ता हेतु बेस के लिए तैयार किया गया था. चूंकि ब्लॉगर बनाम साहित्यकार की बहस कई मंचों पर चल रही है, इसे यहाँ प्रकाशित करना समीचीन होगा)

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अगर आप बकरी की लेंड़ी के ऊपर भाषा से अलंकृत कोई कविता लिखते हैं तो क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि उसे कोई प्रकाशक या संपादक प्रकाशित कर आपको उपकृत करेगा? संभवतः नहीं.

परंतु निजी ब्लॉगों के जरिए आप इंटरनेट पर इस तरह की तमाम प्रयोग धर्मी रचनाओं को धड़ल्ले से प्रकाशित कर सकते हैं. और, न सिर्फ प्रकाशित कर सकते हैं, बल्कि इस तरह की आपकी ऑफ़-बीट रचनाओं और सर्वथा नवीन रचनाशैली के प्रशंसकों और पाठकों की कतारें भी लग सकती हैं.

और, जो बकरी की लेंड़ी पर कविता का जो उदाहरण दिया गया है, वो कोई काल्पनिक नहीं है. बकरी की लेंड़ी (http://azdak.blogspot.com/2007/06/blog-post_14.html ) नामक यह कविता, मशहूर साहित्यकार और फ़िल्म समीक्षाकार प्रमोद सिंह ने अपने ब्लॉग अजदक पर लिखा और उस कविता पर बहुत से पाठकों ने उत्साहजनक टिप्पणियाँ भी कीं. जिनमें शामिल हैं – हिन्दी के स्थापित और बहुचर्चित व्यंग्यकार आलोक पुराणिक – जिनकी तारीफ के ये शब्द थे –

क्या कहने, लिटिल लेंड़ी में क्या अनुप्रास अलंकार साधा है प्रमोदजी। वाह, वाह।“

निजी ब्लॉगों पर संपादक, प्रकाशक और मालिक स्वयं रचनाकार होता है. अतः यहाँ प्रयोग अंतहीन हो सकते हैं, प्रयोगों की कोई सीमा नहीं हो सकती. यही कारण है कि जहाँ आलोक पुराणिक (http://alokpuranik.com/ ) नित्य प्रति अपनी व्यंग्य रचनाओं को अपने ब्लॉग में प्रकाशित करते हैं तो दूसरी ओर भारतीय प्रसाशनिक सेवा की लीना महेंदले (http://hai-koi-vakeel-loktantra-ka.blogspot.com/ ) सामाजिक सारोकारों से संबंधित अपने अनुभवों को लिखती हैं.

हिन्दी ब्लॉगों की संख्या में पिछली छमाही में तेजी से वृद्धि हुई है. पत्रकारों व स्थापित लेखकों के आने से ब्लॉगों के पाठक संख्या में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है. प्रिंट मीडिया में भी हिन्दी ब्लॉगों के चर्चे होने लगे हैं. कथादेश में अविनाश नियमित कॉलम लिखते हैं. कादम्बिनी का अक्तूबर अंक हिन्दी ब्लॉग विशेषांक था, जिसमें बालेंदु दाधीच (http://www.balendu.com/hindi_blogs_article_by_balendu_sharma_dadhich.htm ) ने विस्तार से, बड़े ही शोधपरक अंदाज में हिंदी ब्लॉगों के बारे में बताया है.

आज हिन्दी ब्लॉग जगत् विषयों की प्रचुरता से सम्पन्न हो चुका है, और इसमें दिन प्रतिदिन इजाफ़ा होता जा रहा है. इरफान का ब्लॉग सस्ता शेर (http://ramrotiaaloo.blogspot.com/ ) प्रारंभ होते ही लोकप्रियता की ऊँचाईयाँ छूने लगा. इसमें उन आम प्रचलित शेरों, दोहों, और तुकबंदियों को प्रकाशित किया जाता है, जो हम आप दोस्त आपस में मिल बैठकर एक दूसरे को सुनाते और मजे लेते हैं. ऐसे शेर किसी स्थापित प्रिंट मीडिया की पत्रिका में कभी प्रकाशित हो जाएँ, ये अकल्पनीय है. सस्ता शेर में शामिल शेर फूहड़ व अश्लील कतई नहीं हैं, बस, वे अलग तरह की, अलग मिज़ाज में, अल्हड़पन और लड़कपन में लिखे, बोले बताए और परिवर्धित किए गए शेर होते हैं, जो आपको बरबस ठहाका लगाने को मजबूर करते हैं.

तकनालाजी पर भी हिन्दी ब्लॉग लिखे जा रहे हैं. ईपण्डित (http://epandit.blogspot.com/ ) सेल गुरु (http://cell-guru.blogspot.com/ ) और दस्तक (http://nahar.wordpress.com/ ) नाम के चिट्ठों में तकनालाजी व कम्प्यूटरों में हिन्दी में काम करने के बारे में चित्रमय आलेख होते हैं. हालाकि तकनालाजी विषयों पर अभी हिन्दी में ब्लॉग कम हैं. बहुतेरे हिन्दी ब्लॉग कविता, हिन्दी साहित्य, व्यंग्य और कहानी पर ही हैं. बहुत से ब्लॉगों में समसामयिक घटनाओं पर त्वरित टिप्पणियाँ प्रकाशित की जाती हैं.

कुछ हिन्दी ब्लॉग सामग्री की दृष्टि से अत्यंत उन्नत, परिष्कृत और उपयोगी भी हैं. जैसे, अजित वडनेकर का शब्दों का सफर (http://shabdavali.blogspot.com/ ). अपने इस ब्लॉग में अजित हिन्दी शब्दों की उत्पत्ति के बारे में शोधपरक, चित्रमय, रोचक जानकारियाँ देते हैं जिसकी हर ब्लॉग प्रविष्टि गुणवत्ता और प्रस्तुतिकरण में लाजवाब होती हैं. इस ब्लॉग की हर प्रविष्टि हिन्दी जगत् के लिए एक घरोहर के रूप में होती हैं. मध्यप्रदेश के एक छोटे से शहर के पत्रकार रमाशंकर अपने ब्लॉग सेक्स क्या (http://sexkya.blogspot.com/ ) में यौन जीवन के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारियाँ देते हैं. बाल उद्यान (http://baaludyan.blogspot.com/ ) में बाल रचनाएँ होती हैं तो रचनाकार (http://rachanakar.blogspot.com/ ) में हिन्दी साहित्य की हर विधा की रचनाएँ.

अर्थ शास्त्र, शेयर बाजार संबंधी गूढ़ जानकारियाँ अपने अत्यंत प्रसिद्ध चिट्ठे वाह मनी (http://wahmoney.blogspot.com/ ) में कमल शर्मा नियमित प्रदान करते हैं. वे अपने ब्लॉग में निवेशकों के लाभ के लिए समय समय पर टिप्स भी देते हैं कि कौन से शेयर खरीदने चाहिएँ और कौन से निकालने. शेयर मार्केट में उतार चढ़ाव की उनके द्वारा की गई भविष्यवाणियाँ अब तक पूरी खरी उतरी हैं.

चूंकि ब्लॉग प्रकाशनों में संपादकीय कैंची सर्वथा अनुपस्थित होती है, अतः हिन्दी ब्लॉग जगत भी भविष्य में अवांछित, अप्रिय सामग्रियों से भरने लगेगा इसमें कोई दो मत नहीं. हालाकि इस तरह की ब्लॉग सामग्री हाल फिल हाल नगण्य ही है, मगर जब यह माध्यम चहुँओर लोकप्रिय होने लगेगा तो इसमें फूहड़ता का समावेश अवश्यंभावी है. कुछ ब्लॉग पोस्टों में बेनामी टिप्पणियों के माध्यम से इसका आगाज़ हो ही गया है.

क्या आपको भड़ास, कबाड़खाना, अखाड़े का उदास मुदगर, नुक्ताचीनी, नौ-दौ-ग्यारह, विस्फोट, आरंभ, उधेड़-बुन, बतंगड़, चवन्नी चैप, खंभा इत्यादि नामों में कोई चीज एक सी नजर आती है? जी हाँ, ये सभी हिन्दी ब्लॉगों के नाम हैं और इनमें से तो कई बेहद प्रसिद्ध और सर्वाधिक पढ़े जाने वाले हिन्दी ब्लॉगों में से हैं. उदाहरण के लिए, हिन्दी के पहले ब्लॉग का नाम ही है – नौ दो ग्यारह!

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विषय:

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आप का कहना बहुत वाजिब है! हिंदी ब्लॉगकारिता का हाल हरहाल में छापे के साहित्यादि से बेहतर ही होगा !

रवि जी, हिंदी ब्लॉगिंग ने आम आदमी को भी लेखक बना दिया है। इसका क्या परिणाम होगा, इस पर आगे शोधग्रंथ लिखे जाएंगे। एक दबे हुए दार्शनिक समाज में अभिव्यक्ति का ऐसा सुलभ साधन मिल जाना अपने आप में एक परिघटना है। आगे-आगे देखिए होता है क्या...

वाकई ऐसा तो कोई मंच था ही नही जहां मानव मन को टटोला जा सके,मेरे लिये तो ब्लॉग मानसिक आहार है, कागज़ में जज़्ब इबारत से इसकी तुलना करना जायज़ नही है,

कुछ अन्य विचार इसी विषय पर:

१)अच्छे चिट्टों का संकलन छ्प सकते हैं।
२)चिट्ठों में शब्द, चित्र, चल-चित्र, ध्वनि, रेखा-चित्र मिश्रित रूप में प्रस्तुत की जा सकती है।
३)लेखक तब सफ़ल हो सकता है जब वह अच्छा लिख सकता है, लेकन सफ़ल चिट्ठाकार बनने के लिए हिन्दी में पंडित होना जरूरी नहीं है।
४)सोचने और लिखने में समय लगता है लेकिन चिट्टा क्षण में छप सकता है, किताब को तो कई दिन लग जाते हैं।
५)चिट्ठों को लिखने में और पढ़ने में पैसा खर्च नहीं होता।
६)अच्छे लेखक अच्छे, लोकप्रिय और सफ़ल चिट्ठाकार भी बन सकते हैं लेकिन अच्छे चिट्ठाकार सफ़ल लेखक आसानी से नहीं बन सकता। प्रकाशकों के सामने घुटने टेकने पढेंगे।
७)चिट्ठों की एक कमजोरी है कि कोई भी आपका लेख चुरा सकता है और वह भी आसानी से।
८)जो लेखक पत्रिकाओं और अखबारों के लिए लिखते हैं, उन्हें समय की सीमा का ध्यान रखना पढ़ता है, लेकिन चिट्ठाकारों पर Deadline का भोज नहीं होता और इस कारण वे अपने लेख का स्तर को और भी ऊँचा ले जा सकते हैं।
९)चिट्ठाकार अपने पाठकों से सम्बन्ध जोड़ सकते हैं (टिप्पणियों के जरिए)। लेखकों के लिए यह आसान नहीं है।
१०)पुराने जमाने के लेखक आधुनिक औजारों के लाभ से वंचित रह जाते हैं।
११)चिट्ठाकार, प्रकाशित करने के बाद भी, अपने लेखों में त्रुटि सुधार कर सकते हैं और वह भी एक क्षण में। लेखक को अगले संस्करण की प्रतीक्षा करना पढ़ता है।
१२)चिट्ठा क्षण भर में सारे संसार में उपलब्ध हो जाता है।
१३)चिट्ठा अगर कोई पढ़ता नहीं को किसी को पता भी नहीं चलता। किसी को नुकसान नहीं होता। चिट्टा एक environment friendly माध्यम है। उन किताबों पर (जो नहीं बिक सके) अलमारियों में धूल जम जाता है।
१४)गुरु दत्त की फ़िल्म प्यासा याद आती है आज। एक अच्छे लेखक का आज वो हाल नहीं होता जैसा इस फ़िल्म में दर्शाया गया है।

G विश्वनाथ, जे पी नगर, बेंगळूरु

संजय बेंगाणी

'जोगलिखी' अहमदाबाद से संजय का नमस्कार,

'फुरसतीया' नहीं हैं मगर कह देने से मन हल्का हो जाता है, अपन इसी सिद्धांत के तहत चिट्ठा लिखते है.

सर्वाधिक टिप्पणी पाने वाले ब्लॉग का जिक्र भी होना चाहिए था. यह 'नुक्ताचीनि' नहीं है, मन की 'भड़ास' निकाली है भाई. :)

आप से सहमत हूँ। आज छपे हुए साहित्य को कितने लोग पढ़ रहे हैं? मूल बात तो यह है कि आप की बात कितनी तेजी से लोगों तक पहुँच रही है। ब्ल़ॉगिंग छापे से आगे की पीढ़ी का माध्यम है, इस में इन्ट्रेक्शन तगड़ा है जो इस को ताजगी प्रदान करता है। मेरी समझ में झगड़ा ब्लॉगर और साहित्यकार का नहीं बल्कि ब्लागिंग और छापे का है। साहित्यकार तो दोनों ही स्थानों पर हैं। ब्ल़ॉगिंग को छापे से तो आगे रहना ही है।

आपकी बात में दम है!!!!!!!!!!!!!!

देवी

शुक्रिया रवि जी,
आपकी बातों से सहमत हूं। शब्दों के सफर को शुरू हुए अभी छह महिने ही हुए हैं और कल इसने दस हजार हिट्स का आंकड़ा छू लिया।
मेरे ब्लाग को सभी का प्रोत्साहन मिला ऐसे में गैंग, गुट जैसी बातें यूं भी बेमानी लगती हैं। टिप्पणी अच्छी लगती है मगर उसका न होना सफर को बंद करने का कारण नहीं बनेगा कभी।

ब्लोग की अपनी एक जगह है जिसे कोई हटा नहीं सकता ।

खुबसूरत और उपयोगी

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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