टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

हसन जमाल का तहलका


शेष के संपादक हसन जमाल ने ऐसा आखिर क्या कह दिया था कि उसकी गूंज तहलका तक में सुनाई पड़ गई. इससे पहले अनूप ने अक्षरग्राम पर तथा मसिजीवी ने अपने चिट्ठे पर भी इसकी चर्चा की है. हसन जमाल ने नया ज्ञानोदय के फरवरी 07 के अंक में मनीषा कुलश्रेष्ठ के इंटरनेट पर आलेख के सम्बन्ध में अपने पत्र में कुछ मुद्दों को उठाया था. हसन जमाल के उस पत्र के जवाब में अप्रैल 07 के अंक में कटघरे में हसन जमाल शीर्षक से तीन पत्र प्रकाशित हुए, जिनमें हसन जमाल के विचारों को सिरे से खारिज कर दिया गया. संभवतः ऐसे और भी पत्र नया ज्ञानोदय को मिले होंगे, परंतु स्थान की सीमितता स्थानाभाव के कारण इन तीन पत्रों को ही प्रकाशित किया गया. हसन जमाल के प्रकाशित पत्र की स्कैन की गई छवि निम्न है -

(चित्र को बड़े आकार में देखने के लिए इस पर क्लिक करें)


प्रत्युत्तर में मैंने नया ज्ञानोदय को एक पत्र प्रेषित किया था जो कि निम्न है -

हसन जमाल की अंतर्जालीय कूप मंडूकता

मनीषा कुलश्रेष्ठ के आलेख - ‘इंटरनेट और हिन्दी साहित्य' पर हसन जमाल की प्रतिक्रिया (नया ज्ञानोदय, फ़रवरी 2007, पृ. 108) उनकी अंतर्जालीय कूप मंडूकता को गहरे में बिम्बित करती है.

जिस तरह के तर्क हसन जमाल ने दिए हैं वे बेहद हास्यास्पद, बचकाना और इंटरनेट के प्रति उनकी नासमझी और अज्ञानता को ही दर्शाते हैं.

शायद उन्हें यह नहीं पता कि प्रोजेक्ट गुटेन बर्ग क्या है? शेष पत्रिका में कभी छपा उनका संपादकीय इस्लाम नहीं, मुसलमान ख़तरे में (http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_11.html ) छपे किताब के शक्ल में न्यूयॉर्क में या बस्तर के किसी अनजाने गांव में कोई ढूंढ सकता है? शायद नहीं, परंतु यह रचनाकार में इंटरनेट पर मौजूद है, सालों साल वहाँ रहेगा और मात्र दो क्लिक के जरिए (सिर्फ हसन जमाल लिख कर ढूंढ देखिए जनाब!) संपूर्ण विश्व में, कहीँ भी, किसी भी कम्प्यूटर पर और अब तो मोबाइल उपकरणों पर तत्क्षण अवतरित हो जाता है. उन्हें यह भी नहीं पता कि रवींद्र कालिया के बेहद लोकप्रिय आत्मकथ्य - गालिब छुटी शराब को पढ़ने के लिए किसी पाठक को उस पुस्तक को खोजकर, ढूंढकर, खरीदकर नहीं पढ़ना पड़ेगा. अब पाठक इंटरनेट पर निरंतर (http://www.nirantar.org ) के जरिए मुफ़्त में, विश्व के किसी भी कोने में पढ़ सकता है. और यह बात असगर वजाहत और संजय विद्रोही के कहानी संग्रह क्रमशः मैं हिन्दू हूँ तथा कभी यूँ भी तो हो के साथ भी लागू होती है जो रचनाकार में प्रकाशित हुए हैं - और ये तो मात्र उदाहरण हैं! संभावनाएँ अनंत हैं!

उन्हें शायद यह भी नहीं पता कि इंटरनेट पर उपलब्ध साहित्य या सामग्री को कहीं पर भी छाप कर पढ़ा जा सकता है - इंटरनेट तो माध्यम है सामग्री की उपलब्धता का, सर्व सुलभता का. और अब तो वाचक जैसे अनुप्रयोगों के जरिए अंधे पाठक भी आपकी हिन्दी रचना को कम्प्यूटरों के जरिए सुन कर आनंद ले सकते हैं. इंटरनेट मात्र चैटिंग और चीटिंग का साधन नहीं है - जैसा कि जमाल का मानना है. अगर इंटरनेट ऐसा होता तो यह इतना लोकप्रिय माध्यम कदापि नहीं होता.

साथ ही, मनीषा ने भी इंटरनेट के हिन्दी ब्लॉगों के बारे में भी सरसरी और उथली बातें कहीं हैं. अंग्रेज़ी के ब्लॉगों में उनकी प्रचुरता, अधिकता और विविधता के कारण समग्रता में उनकी बातें भले ही ठीक होंगी, परंतु हाल फिलहाल जितने भी हिन्दी के ज्ञात-अज्ञात ब्लॉग हैं, उनमें भले ही भाषागत शुद्धता का अभाव दिखाई दे जाए, मगर स्तरहीनता तो कतई नहीं दीखती. उनकी बात अंग्रेज़ी ब्लॉगों के अर्थ में तो भले ही ठीक बैठती होगी, हिन्दी ब्लॉगों के संदर्भ में, माफ़ कीजिएगा, मनीषा, आपके विचार पूरे ग़लत हैं. इंटरनेट पर हिन्दी अभी शैशवावस्था में है और जैसे जैसे यह लोकप्रियता के पायदान चढ़ेगा, हिन्दी में गलीज सामग्री भरने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, परंतु अभी तो ऐसी स्थिति नहीं के बराबर ही है!

हसन जमाल के पत्र के प्रत्युत्तर में नया ज्ञानोदय में उपर्युक्त पत्र (जिसका कुछ हिस्सा संपादित कर दिया गया) सहित दो और अन्य पत्र प्रकाशित हुए हैं जिनकी स्कैन की गई छवि निम्न है -

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एक टिप्पणी भेजें

स्थान की 'सीमितता' ये भी कोई बात हुई :)
कहीं आप Limitation = सीमितता तो नही बताना चाह रहे।
'स्थानाभाव' या 'सीमित स्थान' पर आपका क्या खयाल है :)।

मिश्र जी,
धन्यवाद. स्थानाभाव सही है. काट कर दुरूस्त कर दिया है. :)

क्या करें, न हमारी हिन्दी सही है न अंग्रेज़ी!

मार्गदर्शन देते रहें.

रवि भैया बहुत उचित जवाब दिया है आपने अपने पत्र में।

लेख के लिए धन्यवाद । हसन जमाल जी से मैं यही कहना चाहूँगी कि ऐसी आँखों का मैं क्या करूँगी जिनको बचाने के लिए मैं पढ़लिख न सकूँ । तो भैया, हम तो कम्प्यूटर, इम्टरनेट का उपयोग करते रहेंगे, आँखें फूटें तो फूटें । सावधान करने के लिए धन्यवाद । वैसे भारत में बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो समाचार पत्र भी नहीं खरीद सकते । बहुत से ऐसे हैं जो पढ़ना ही नहीं जानते । सो समाचार पत्र भी बंद कर देने चाहिए । हसन जी सस्ती रोटी बेचने का काम आरम्भ कर सकते हैं ।
वैसे क्या यह सच है कि इस नाम के कोई बुद्धिजीवी हैं ?
घुघूती बासूती

वैसे तो जमाल साहब जैसे इंसान को समझाना भैंस के आगे बीन बजाना है लेकिन फिर भी आपने अच्छा जवाब दिया। अब भी उन्हें समझ न आए तो भगवान ही मालिक है।

घुघूती जी की टिप्पणी बहुत सही रही:

"वैसे भारत में बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो समाचार पत्र भी नहीं खरीद सकते । बहुत से ऐसे हैं जो पढ़ना ही नहीं जानते । सो समाचार पत्र भी बंद कर देने चाहिए । हसन जी सस्ती रोटी बेचने का काम आरम्भ कर सकते हैं ।"

subhash_bhadauriasb@yahoo.com

लुत्फे मय तुझे क्या कहूँ ज़ाहिद
हाय कमबख्त तू ने कभी पी ही नहीं.
ज़ाहिद हसन जमाल साहब का भी कुछ कुछ यही हाल है.लेकिन उनकी तकलीफ कुछ अलग है.अब संपादकों का जादू टूट रहा है.अपने गिरोह के रचनाकारों की रचना प्रकाशित करना,फिर घिघियाना कुछ सदस्य बनाओ पत्रिका को जीवित रखो और लोगों की आदत मुफ्त में पढ़ने की.लायब्रेरी के जमाने लद गये साहब.एक और बात नेट के लिए दिमाग और धन की आवश्यकता होती है.ये लोग मटके की जगह फ्रिज, पैदल की जगह वाहन, नंग धड़ंग खुले में पड़े रहने की जगह पंखे का इस्तेमाल करेंगे पर इन्टर नेट का रोना रोयेंगे.खास बात तो यह है रवीजी इन सब संपादकों का जनाज़ा इनटरनेट ने बड़े धूम से निकाल दिया है यह उसी का रोना है अब रचनाकार स्वतंत्र है अपने बलॉग के माध्यम से वह खुद प्रकाशक है. उसे धड़ल्ले से पाठक मिल ही नहीं रहे अपनी प्रतिक्रिया भी तुरंत दे रहे हैं.जिस में शक्ति होगी वे टिकेंगें बाकी बह जायेंगे.लोगों की गरीबी की आड़ में अपनी खिचड़ी पकाना अब ढकोसला मात्र है.हसन जमाल का खेल भी वही है.
डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद.
subhash_bhadauria@yahoo.com

हसन जमाल साहब वाली अच्छी रही! सब पूछ रहे है, 'आज आप इतने प्रसन्नचित्त क्यों है?'

अब क्या बताऊं कि चुटकले सुन कर आ रहा हूँ!

ख़ूब जवाब दिया है रवि भाई! रवि (सूरज) भाई, बस यूंहीं हमें उष्मा और उर्जा देते रहिए और जमाल वाली जमात को प्रकाश!

हसन जमाल जायें %ं&* में, पर भैया इंटरनेट चाटता बहुत है - अपना समय व ऊर्जा. इंटरनेट डिसिप्लिन को भी गम्भीरता से सोचना पड़ेगा. वर्ना उस आदिमानव जैसा हाल होगा हमारा, जिसकी जीआईएफ फाइल यहां देखें:

http://gyandutt.googlepages.com/google.gif

मनीषा जी का लेख जिस पर यह सब 'जंजाल' शुरु हुआ , कहां मिल सकता है ?

अनूप जी,
मनीषा का लेख ढूंढ ढांढ कर यहीँ प्रकाशित करने की कोशिश करता हूँ :)

कल कालिया जी से बात हो रही थी । उन्हें मनीषा कुलश्रेष्ठ - हसन जमाल प्रकरण की ब्लॉग जगत में चर्चा के बारे में बताया । रवि जी आपके पत्र का भी ज़िक्र किया । प्रिंट पत्रिका और ब्लॉग पत्रिका में परस्पर प्रभावी अनूगूँज का जो आलम दिखता है ,उम्मीद है इससे बहुत कुछ फायदा ही होगा :-)
शायद लोगों के दिमाग से बहुत से मकडजाल हटें ।

मेरे लेख पर ब्लॉग्स पर इतना जंजाल हुआ,मुझे आज विस्तार में पता चला। रवि जी ब्लॉग्स को लेकर मेरी जानकारी कम हो सकती है, पर मैं ब्लॉग्स के पक्ष में ही खडी हूं। तब और अब ब्लॉग्स की दुनिया में भी बडा फर्क आया है। अभी फिर नए अंक में हसन जमाल जी ने अपनी बात कही है। मगर मैं चुप रहूंगी, पूरा चिट्ठाजगत मेरे साथ है। मनीषा कुलश्रेष्ठ

मनीषा जी,
मैं नया ज्ञानोदय की उपलब्धता का इंतजार कर रहा था ताकि उसे देख कर फिर आपको जवाब लिखूं.

हसन जमाल जी ने नया ज्ञानोदय के मई 2008 अंक में जो कहा है,वो बहुत बुरे टेस्ट का है. इससे उनकी व्यक्तिगत खुन्नस व अज्ञानता ही झलकती है. कोई भी व्यक्ति परम ज्ञानी नहीं हो सकता. हर विषय पर संपूर्ण ज्ञान नहीं रख सकता. मैं तो कहूंगा कि हसन जमाल जी ने इंटरनेट का इ भी नहीं पढ़ा है. तो, जब तक उस विषय पर जानकारी न हो, कुछ कहने से परहेज करना चाहिए. जिस दिन हसन जी इसे जान लेंगे अपने कहे पर निश्चित रूप से उन्हें पछतावा होगा.

नया ज्ञानोदय का आपका स्तंभ बहुत अच्छा है व पाठकों को इस नए प्रभावी माध्यम की नई नई जानकारियाँ मिलती हैं.

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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