एक क्लिक का सवाल है बाबा!

जब से नारद जी ने प्रत्येक चिट्ठों पर क्लिक नुमा तिलक लगाना प्रारंभ किया है तब से मैं कुछ व्यथित सा हूँ और तब से ही अपनी व्यथा कथा लिखने की सोच रहा था. नारद अब पहले जैसा साफ-सुथरा नहीं रहा. अब तो वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो गया है, पक्षपाती हो गया है. तरह तरह के चिट्ठों पर अजीब अजीब आकारों में तिलक लगाता है. किसी पर उसकी कृपा दृष्टि ज्यादा पड़ती है तो किसी पर कम. अब जब-जब भी मैं नारद के पन्नों पर जाता हूँ, अपने चिट्ठे के माथे कोई तिलक नहीं पाता हूँ या यदा कदा अपवाद स्वरूप छोटा सा तिलक कुछ इस तरह पाता हूँ -

तो फिर बड़ी देर तक सोचता रहता हूँ कि मेरे चिट्ठे के माथे पर इतने कम क्लिकों का इतना महीन, न्यून, नगण्य सा तिलक क्यूँ? जबकि बगल में, ऊपर-नीचे चिट्ठों में तिलक का आकार - संख्या में दहाई और सैकड़ा से भी ऊपर जा रहा होता है. और, अकसर मैं, ‘मेरे चिट्ठे के माथे का तिलक - तेरे चिट्ठे के माथे के तिलक से छोटा क्यूं' के चक्कर में उलझ जाया करता हूँ.

अपने तिलक का रूपाकार बड़ा करने के लिए कभी सोचता हूँ कि फ़ुरसत में सुंदर, सहज, सरल भाषा में कुछ बढ़िया आख्यान लिखूं. फिर कभी सोचता हूँ कि अपने लेखन-मोहल्ले में कोई सदा-सर्वदा विवादास्पद मुद्दा उछालूं और बड़े तिलक का आनंद लूं. कभी सोचता हूँ हास्य-व्यंग्य में जोर आजमाइश करूं तो कभी कविता, हाइकू, ग़ज़ल, व्यंज़ल, कुंडलियाँ-मुंडलियाँ चालू करूं. कभी कोई तकनीकी बातें लिखने की सोचता हूँ तो कभी सर्वकालिक लोकप्रिय विषय - क्रिकेट, राजनीति और लालू पर. परंतु मैं सिर्फ सोचते रह जाता हूँ और मेरा राइटर्स ब्लॉक चालू हो जाता है - भइए, लिख तो लेगा - लिख ले दिन भर मेहनत कर - रात्रि जागरण कर. परंतु नारद पर तेरे चिट्ठे को क्लिक कौन करेगा? अंततः जब उसे अंतरजाल के महासागर में अस्तित्वहीन होना ही है - तो उसे अपने मन के अंदर ही अस्तित्व विहीन रूप में ही रहने दे. और फिर मेरा उत्साह ठंडा हो जाता है.

अभी तक तो मैं निस्पृह भाव से अपने चिट्ठे पर लिखता रहता था. इस बात की परवाह किए बगैर कि कोई इसे कहीं क्लिक करता भी है या नहीं. क्योंकि वह दिखता ही नहीं था. भले ही, अंदर ही अंदर अपने टैम्प्लेट में मैंने दर्जन भर स्टेट काउंटर लगा रखे हैं, और अंदर का हाल मुझे मालूम है, मगर प्रकट तौर पर तो मैं सबको यही दर्शाता रहता था कि भइए, हमारे चिट्ठा पोस्टों को तो बहुतेइच पढ़ते हैं. मगर अब नारद के तिलक ने तो ऐसा लगता है कि मुझे, मेरे चिट्ठे को सरे बाजार वस्त्रहीन कर दिया है. चिट्ठा पोस्ट करने के घंटे भर बाद भी वही स्थिति रहती है, चौबीस घंटे बाद भी और चौबीस दिन बाद भी. तिलक के आकार में परिवर्तन नहीं होना होता है तो नहीं ही होता है. विधवा के सूनी मांग की तरह मेरे चिट्ठे का तिलक अस्तित्वहीन ही बना रहता है. और कभी कभार, यदा कदा क्लिकों की कोई संख्या दिखाई दे भी जाती है, जैसे कि हो सकता है कि अभी आपको दिखाई दे रही हो, तो संभवतः वह मेरे द्वारा ही किए गए क्लिकों की संख्या होती है - मैं ही स्वयं दुबारा-तिबारा-चौबारा, अनगिनत बार जांचता रहता हूं कि लिंक वाकई काम कर रही है भी या नहीं!

अब आप मुझे यह तत्वज्ञान देने मत बैठ जाइएगा कि बंधु! सिर्फ नारद ही एक जरिया नहीं है तेरे चिट्ठे पर आने का - गूगल है, फ़ीड रीडर्स हैं, बुकमार्क्स हैं, और अब तो कैफ़े हिन्दी भी है और याहू! भी है. परंतु भइए, वे सब सार्वजनिक नहीं हैं ना! यही तो कष्ट है. अंदर से, और दूसरे रस्ते से भले ही हजार लोग आएँ, परंतु नारद का तिलक तो दूसराईच कहानी कह रहा होता है. और, लोग वही मानते हैं जो प्रकट में दिखाई देता है. और जो मेरे लिए दिखाई दे रहा है वह तो मेरे अपने लिए हास्यास्पद है. और मुझे कर्मण्येवाधिकारस्ते... में यकीन नहीं. मैंने कर्म किया है तो फल चाहिए - चिट्ठा लिखा है तो क्लिक चाहिए.

मुझे लगता है कि नारद जी को मुझे अपनी व्यथा सुनानी ही पड़ेगी. प्रभो! मुझे मेरी इस हास्यास्पद स्थिति से उबारो, हे! नारद, आप तो सर्व-व्यापी, सर्वज्ञानी हैं. आपको मेरे बारे में, मेरे चिट्ठे के बारे में सब-कुछ पता है. परंतु आपने तो इन अत्यंत गोपनीय बातों को सरे राह प्रकट कर दिया है - सर्व-सुलभ कर दिया है. सरेआम मुझे बेइज़्ज़त कर दिया है. मुझे कहीं का मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा है. थोड़ी सी इज़्ज़त मुझे भी बख्श दो नारद मुनि! कुछ ऐसा उपाय करो कि आपका काम भी हो जाए और सरे बाजार मेरी पूछ-परख भी बनी रहे. मेरे चिट्ठे के इस तिलक को अदृश्य कर दो महाराज! और यदि दूसरे सफल-असफल भक्तों को अपने या दूसरों के तिलक के आकार-प्रकार की जानकारी चाहिए हो तो वह दिखाई तो दे, मगर माउस-ओवर से - जैसा कि देसी-पंडित पर होता है, तब भी मुझे बहुत राहत मिलेगी. अब जिस बंदे को देखना है कि उसके चिट्ठे पर तिलक का आकार कितना है, वही तो माउस ओवर करेगा और उसे ही दिखेगा. फिर दलाल-स्ट्रीट के इंडेक्स के शेयरों के भाव की तरह तमाम चिट्ठों का रेडी-रिकोनर क्लिक-दर तो नहीं दिखाई देगा. जब तक माउसओवर कर्ता एक से दूसरे चिट्ठे के माथे के तिलक का आकार देखने जाएगा, तब तक पिछले चिट्ठे का शेयर मूल्य उसके दिमाग से उतर जाएगा - और इस तरह सरे आम तुलनात्मक बेइज्जती तो नहीं होगी. उम्मीद है आप भक्त की इस छोटी सी समस्या को सुनेंगे और मेरे चिट्ठे को मुँह दिखाने लायक बनाए रखेंगे.

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व्यंज़ल

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नारद ने खड़ी कर दी ये कैसी अजीब सी परेशानी

मैं हैरान हूँ कि मुझे ही क्यों हो रही है ऐसी हैरानी


अभी तक तो मैं लिखता रहा, बस लिखता रहा था

जाने क्यों बन गई मेरी निगाहें क्लिकों की दीवानी


श्रोताओं की तलाश जारी है, भले ही ये मालूम हो

हर कोई कहने ही आया है यहाँ अपनी राम कहानी


जाने कहाँ से लग गया है चिट्ठा लेखन का व्यसन

चाह कर भी अब छूटती नहीं ये बेकार की नादानी


अंदाज का बस यहाँ थोड़ा सा खेल ही तो है रवि

बातें सब एक सी होती हैं चाहे नयी हों या पुरानी

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एक टिप्पणी भेजें

रवि जी, बहुत बढ़िया लिखा है आपने। हास्य व्यंग्य के माध्यम से आपने अपनी बात भी कह दी। और इसे पढ़ने के लिए मैं नारद में आपके लिंक पर तिलक लगाकर ही आया हूँ।

रवि जी , बढिया लेख!!

आप तो फिर भी २-३ तिलक पा गये, और भी कई हैं जिनके ललाट अभी तक चंदन का इंतजार कर रहे हैं

वाह! क्या नारा है_
चिट्ठा लिखा है तो क्लिक चाहिए

बहुत अच्छा व्यंग्य (या व्यथा :) )

हम तो जब भी आपकी फोटो नारद पर दिखती है, झट से तीलक कर देते है.

-संजय बेंगाणी

आप तो जानते ही हैं अब तो सांख्यिकीय परिणामों का ज़माना है - सरकारी दफ्तरों के आंकड़े हो, या चुनावों के, य टीवी में टी आर पी। यदि आंकड़े ही सत्यता के प्रमाण हैं, तो... ?

पहले क्लिक का सवाल, फिर टिप्पणी... क्यों व्यथित है रवि भाई, अरे देखिये मानोशी जी की व्यथा और उससे भी सुन्दर उस पर टिप्पणियां , संजय जी, उन्मुक्त जी की व्याख्या और उस पर जीतू जी क सार्वभौमिक उपदेश!

चलिये तिलक तो हो ही गया था, ये अक्षत भी!

श्रोताओं की तलाश जारी है, भले ही ये मालूम हो

हर कोई कहने ही आया है यहाँ अपनी राम कहानी

सही है रवि भाई लगे रहो...

बहुत ही बढ़िया लिखा है ....बधाई

मेरी भी यही व्यथा है। जानकर प्रसन्नता हुई कि किसी जगह तो आपके पास पहुंचे।

Raviji,

vyangya bahut achha likha hai. :)

lekin aap to us sthan tak pahunch chuke hai, janha Tippaniya aur Hits mahatvaheen ho jati hai.

aap to hamare jaise no-sikhiyo ke liye aadarsh hai...

Roman me likhne ke liye mafi chahta hu.

http://manoshichatterjee.blogspot.com/2007/02/blog-post_14.html

आदरणीय, अपनी पीड़ा को बढ़िया तरीके से व्यक्त किया आपने।

आपने तो मेरी व्यथा कह डाली, नारदमुनि से मैंने खुद कहा था कि क्या वो सप्ताह के अंत में हिट्स की संख्या दिखा सकते हैं वो तो लाइव संख्या दिखाने लगे। अब फीड से पढ़ने वाले तो मुझे भी काफी हैं पर असली इज्जत तो नारद से ही मिलती है न।

मेरी व्यथा पर सहमति दर्शाने हेतु आप सभी का धन्यवाद. दरअसल मैंने इस लेख के माध्यम से स्थापितों से लेकर नए खिलाड़ियों सभी की समस्या को एक समान रूप से देख कर लिखा है. :)

आपने लिखा तो मुझे इस नये खेल का पता चला वरना मैं तो नारद का फीड ही लेता हूँ सीधा। और यह भी जानकर आश्चर्य हुआ कि आपको दुःख इस बात का है कि लोगों को पता चल गया कि कितने लोग आपको पढ़ते हैं। इससे भी बड़ा दुःख आपके, और सभी को, होना चाहिये की इस तरह से भेड़ मानसिकता को विकास मिलेगा और नये चिठ्ठों को पहचानने में बाधा। हिन्दी चिठ्ठों के मार्केट में एक एन्ट्री बैरियर हो गया यूँ समझ लीजीये। पहले हर नया पाठक अपने रूचि के अनुसार चिठ्ठा पढ़ता था, अब वो पढ़ेगा जो दूसरे पढ़ते दिखाई देगें। अमीर (हिट संख्या के संबंध में) और अमीर होते जाऐंगे और गरीब और गरीब। मेरे अनुसार यह बहुत गंभीर समस्या है।

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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