ब्लॉगिंग एथिक्स बनाम कार्पेल टनल सिंड्रोम

आप पूछेंगे कि दोनों में क्या समानता है?

पहले पूरा आलेख तो पढ़िए जनाब. समानता है भी या नहीं आपको खुद-बख़ुद पता चल जाएगा.

तो आइए, पहले बात करें कार्पेल टनल सिंड्रोम की. मेरे एक बार निवेदन करने पर ही फुरसतिया जी ने मेरी फ़रमाइश पूरी कर दी. उन्होंने दो-दो बार फ़रमाइशें दे कर मुझे शर्मिंदा कर दिया कि मैं कार्पेल टनेल सिंड्रोम के बारे में लिखूं. अब भले ही मैं कार्पेल टनल सिंड्रोम के बारे में ज्यादा बोलने बताने का अधिकारी नहीं हूं, मैं स्वयं मरीज हूँ - चिकित्सक नहीं, मगर उनका आग्रह तो मानना पड़ेगा.

मगर, फिर, कार्पेल टनल सिंड्रोम के बारे में बात करने से पहले चर्चा कर ली जाए ब्लॉगों की - खासकर हिन्दी ब्लॉगों की. पिछला हफ़्ता हिन्दी ब्लॉगों के लिए कई महत्वपूर्ण मुकाम लेकर आया. एनडीटीवी पर हिन्दी चिट्ठों के बारे में नियमित क्लिप दिए जाने हेतु कुछ चिट्ठाकारों की बात अभी हुई ही थी कि याहू हिन्दी ने अपने पृष्ठ पर नारद के सौजन्य से हिन्दी चिट्ठों को जोड़ लिया. बीबीसी से भी प्रस्ताव आया है और इधर जीतू भाई बता रहे हैं कि उनकी सीक्रेट बातचीत गूगल से भी चल रही है. एमएसएन पिछड़ क्यों रहा है यह मेरी मोटी बुद्धि में समझ में नहीं आया. मैं उन्हें खुला निमंत्रण देता हूँ - भई, मुझसे भी तो कोई बात करो. इस बीच, कुछ और साथियों ने अपने फ़ुरसतिया जी से उनके फ़ुरसत के लम्हों में हिन्दी देसी पंडित को पुनर्जीवित करने की बात भी कही है. और, उससे थोड़ा ही पहले हिन्दी चिट्ठों के हस्तचालित-सुंदर-सुव्यवस्थित-एग्रीगेटर पर बवाल मच ही चुका था. समानांतर में हिन्दी चिट्ठों के इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कारों के लिए लड़ाइयों का दौर उधर चल ही रहा है. इधर डिजिट पत्रिका ने 150 से अधिक पृष्ठों का ब्लॉगिंग फास्ट ट्रैक निकाला है जिसमें देसी पंडित समेत हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेटर हिन्दी ब्लॉग डाट कॉम की खास चर्चा हुई है.

अब जब हर ओर से हिन्दी चिट्ठा जगत में आपाधापी मच गई है तो मैं पीछे क्यों रहूँ - मुझे याहू में भी दिखना है, मुझे बीबीसी के मुखपृष्ठ पर भी अवतरित होना है, गूगल की पेज रेंकिंग पर भी मेरी निगाह है, गूगल के सीक्रेट काम काज में भी मुझे आना ही होगा, एनडीटीवी के क्लिप में भी नजर आना है तो मुझे अतिरिक्त मेहनत तो करनी पड़ेगी ही. अपने चिट्ठास्थल को चिट्ठों से पाटना होगा नहीं तो मैं पिछड़ जाऊंगा. जाहिर है, मुझे कार्पेल टनल सिंड्रोम होना तो लाजिमी है.

कार्पेल टनल सिंड्रोम एक ऐसी बीमारी है जिसमें अत्यधिक टाइप करने पर रिपिटिव स्ट्रेस इंज्यूरी के चलते उंगलियाँ अत्यधिक अतिसंवेदनशील हो जाती हैं और उनमें भयंकर दर्द होने लगता है. परंतु यहाँ उस तरह के इंज्यूरी की बात नहीं हो रही. चिट्ठाकारों और टिप्पणीकारों में एक अलग तरह का, कार्पेल टनल सिंड्रोम होता है. बात उसकी हो रही है.

मुझ समेत हिन्दी चिट्ठाकार इस समय अलग तरह के, चिट्ठाकारी-कार्पेल टनल सिंड्रोम की महामारी से ग्रसित हो गए हैं. इस बीमारी के लक्षण कुछ-कुछ यूँ है -

  • कम्प्यूटर का कुंजीपट देखते ही उंगलियाँ चिट्ठापोस्ट, टिप्पणी पोस्ट करने के लिए मचलती रहती हैं. और जब तक चार लाइनें टाइप नहीं हो जाती उंगलियों का दर्द, उंगलियों की अतिसंवेदनशीलता, उंगलियों की खुजली खत्म नहीं होती.
  • उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते दिमाग पर चिट्ठा पोस्ट का भूत सवार रहता है. यह सिंड्रोम हाथ की उंगलियों के साथ-साथ दिमाग की चूलों को भी संवेदनशील बना देता है. जब तक वह चार टिप्पणियां और दो चिट्ठापोस्ट नहीं कर लेता, दिमाग में चिड़चिड़ापन बना रहता है. और यदि किसी वजह से ये चीज़ें नहीं हो पाईं या कम हो पाईं, तो कुछ का कुछ टाइप हो जाता है, और पोस्ट हो जाता है.
  • चिट्ठे के साज संवार, ब्लॉग स्टेट्स की जाँच और लिंक जोड़ने घटाने आदि के चलते माउस हैंडलिंग व माउस क्लिक के कारण कलाइयों में आरएसआई (रिपिटिटिव स्ट्रेस इंज्यूरी) हो जाती है. मगर उसका दर्द तभी काफूर होता है जब कोई मनमाफ़िक हैक चल जाता है और चिट्ठे के रंगरूप का कायाकल्प हो जाता है. अब ये बात दीगर है कि चिट्ठे के रंगरुप से अनभिज्ञ पाठक को अब भी चिट्ठा पढ़ने में समस्या आ रही होती है और विज्ञापनों के बीच फंसे सामग्री में पठन सामग्री को नहीं ढूंढ पाने की शिकायत करता हुआ वो अंततः खोजबीन कर पुनःपुनः वही पढ़ता है जिसमें सचमुच पढ़ने लायक कुछ होता है. पढ़ने के बाद फिर शिकायत करता है.
  • इस बीमारी के एक अन्य किस्म के स्ट्रेन में चिट्ठाकार अपने चिट्ठापोस्ट में कुछ नया, कुछ ताज़ा, कुछ भड़काऊ, कुछ उकसाऊ किस्म का लिखता है क्योंकि उसके सीधे साधे लिखे को कोई तवज्जो नहीं देता होता है. फिर तो एक और अन्य किस्म के रिवर्स कार्पेल टनल सिंड्रोम के स्ट्रेन से पीड़ित तमाम दूसरे चिट्ठाकार अपनी मारक टिप्पणियों से अपना इलाज करते हैं. प्रकट में तो प्रतीत होता है कि वे चिट्ठाकार के चिट्ठापोस्ट के चीथड़े उड़ा रहे हैं, परंतु वे दरअसल अपना स्वयं का झाड़-फूंक टाइप इलाज कर रहे होते हैं.
  • इसी तरह के एक अन्य किस्म के स्ट्रेन में चिट्ठाकार अत्यंत विचलित दिखाई देता है - रेस्टलेस लैग सिंड्रोम की तरह उसका चिट्ठाकार मन रेस्टलेस रहता है और उसकी लालची उंगलियाँ अपने चिट्ठा स्थल के लिए कभी वर्डप्रेस तो कभी ब्लॉगर तो कभी इबिबो के अकाउंट पर दौड़ती भागती रहती हैं. एडसेंस, चिटिका, अमेजन के दिवास्वप्न में वह अकसर दिखाई देता है.
  • चिट्ठाकारों में कार्पेल टनल सिंड्रोम के जो वायरस फैले हैं वे जुकाम के अनगिनत वायरस की तरह अलग अलग हैं, और हर एक का अपना लक्षण और इलाज है - बल्कि जैसा कि कहा जाता है जुकाम के हजारों इलाज हैं फिर भी उसका कोई इलाज नहीं है - वैसा ही इस सिंड्रोम के साथ है. चिट्ठाकार एक पोस्ट लिख लेता है तो सोचता है कि उसने झंडे गाड़ दिए, तमाम दुनिया उसे अब शाबासी देगी. परंतु यदि कोई भूले से भी जरा सी उलटी टिप्पणी पेल देता है तो वह बागी हो जाता है और तमाम पटेलों, चौधरियों, मुखियाओं की बड़ी ही खराब स्वाद वाली भाषा और उतने ही खराब अंदाज में खुलेआम जूतम पैजार को उतारू हो जाता है. सिंड्रोम की यह मारक किस्म बर्ड फ़्लू जैसे डेडली वायरस के म्यूटेशन के फलस्वरूप पैदा हुए वायरस से होती है और आमतौर पर नए-नवेले चिट्ठाकारों को ग्रसित करती है. पुराने चिट्ठाकार इस सिंड्रोम की किस्म से इम्यून हो चुके होते हैं क्यों कि इससे पहले वे कइयों की उतारने के चक्कर में कइयों दफ़ा अपनी उतरवा चुके होते हैं.
  • तो ये थे मोटे मोटे लक्षण. यूं तो और भी बहुत से बारीक लक्षण हैं, परंतु चूंकि वे आम नहीं हैं, इसीलिए उनकी चर्चा करना महज जगह भरने जैसी बात होगी. जैसे ही हमें बड़े लक्षण मिलेंगे उनकी चर्चा की जाएगी.

अब आइए, कुछ बात करते हैं ब्लागिंग एथिक्स की. चिटठों में नैतिकता की. डिजिट पत्रिका के फ़ास्ट ट्रैक में दर्जनों पन्ने ब्लॉगिंग एथिक्स पर बे-फ़जूल रंगा गया है. मरफ़ी महोदय के अनुसार - ब्लॉगिंग और एथिक्स - एक प्रश्नवाचक चिह्न है, और सदैव बना रहेगा. फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन तो ब्लॉग की सबसे बड़ी खासियत, पूंजी और न जाने क्या-क्या है. भारत सरकार समूचे ब्लॉगर पर प्रतिबंध लगाकर अपनी भद पिटवा चुकी है - प्रॉक्सी सर्वर के जरिए आपका चिट्ठा ब्रह्मास्त्र की तरह हर कहीं मार करने चला जाएगा अतः निश्चिंत हो, नैतिकता-अनैतिकता के बंधन से परे लिखते रहिए. नहीं मानते, चलिए, तो फिर आपके लिए कुछ एथिक्स की बातें कुछ चिट्ठा नैतिकता की बातें लिख ही देते हैं ताकि आप ध्यान रखें और बख़ूबी ध्यान रखें.

  • आपका चिट्ठा आपका नहीं है. आपके चिट्ठे की सामग्री आपकी नहीं है. वह पाठक का, पाठक के लिए है. अतः आप अपने चिट्ठे में ऐसा लिखें, इतना लिखें कि यदि पाठक आपसे हजार मील दूर बैठकर अपने कम्प्यूटर पर नहीं पढ़ता होता तो शर्तिया आपको एक घूंसा तो मार ही देता. प्रतिक्रिया स्वरूप कम्प्यूटर मॉनीटर कुंजीपट इत्यादि तोड़ने की खबरें अगर आती हैं तो इंडीब्लॉगीज़ से भी बड़ा पुरस्कार मिला समझें.
  • अपने चिट्ठे की भाषा नया, नायाब, बे-स्वाद, असंसदीय शब्दों युक्त रखेंगे तो आपके चिट्ठे के शिघ्रातिशीघ्र सफ़ल होने की पूरी संभावनाएँ होंगी. पारंपरिक लेखों को कौन बेवकूफ़ पाठक पढ़ता है. ऐसा लिखें कि चार टिप्पणियों में प्रत्युत्तर रूप में गालियाँ अवश्य मिलें. इससे चर्चे होंगे, खूब चर्चे होंगे और बहुत संभव है कि आपका चिट्ठा, याहू के नए हिन्दी अवतार के प्रथम पृष्ठ पर ब्लॉग ऑफ़ द डे से नवाजा जाए.
  • हू-इज़, व्हेयर इज़, आईपी एड्रेस लॉगिंग की चिंता किए बगैर (वैसे भी कितनों को पता होता है और पता भी होता है तो कितने चिंता करते हैं) अनाम, छद्मनाम और विविध नामों से चिट्ठा लिखें और आपके चिट्ठे के पाठक टिप्पणीकार न हों तो इन्हीं छद्मनामों से अपने इन्हीं चिट्ठों में अदला-बदली में टिपियाएँ ताकि लोगों को लगे कि चिट्ठा तो बहुत पढ़ा जा रहा है. और, जब लोगों को लगने लगता है, तो भीड़ तो बढ़नी ही है.
  • अंग्रेज़ी में सामग्री की चोरी कर चिट्ठा लिखना और लिखकर सफल होना आम बात है. इससे भी ज्यादा आम बात है चार जगह से सामग्री इकट्ठी कर उसे कांट छांट कर दो शब्द इधर घुसाया, दो कामा इधर से निकाला इत्यादि कार्य कर अपना बढ़िया मौलिक सामग्री तैयार कर चिट्ठे में परोसना और सफल होना. परंतु हिन्दी चिट्ठा जगत में यह संभव नहीं है. हिन्दी के महज चार सौ चिट्ठे हैं जबकि अंग्रेजी के चालीस करोड़. हिन्दी में सुबह चोरी करो तो दोपहर आने से पहले हल्ला हो जाता है कि चोरी हो गई. ऐसे में दूसरा तरीका कारगर हो सकता है. कम से कम एक दर्जन हिन्दी चिट्ठों को बेतरतीब चुनकर उनकी सामग्री को बेतरतीब जोड़-जाड़ कर एक चिट्ठापोस्ट तैयार करें. शर्तिया यह मौलिक होगा. यह नकल-चिपकाया माल गद्य भले ही न लगे, परंतु धांसू पद्य जरूर होगा. हो सकता है ऐसे किसी पद्य के लिए आपको हिन्दी युग्म का पुरस्कार मिल जाए. न मिले तो भी कोई वांदा नहीं. गूगल है ही गूगल का एडसेंस तो है ही - ढेरों चिट्ठों से मारी हुई सामग्री युक्त आपका पेज गूगल पेज रैंक पर पहले स्थान पर आएगा और आज नहीं तो दस साल बाद डालरों में कमाई होगी ही. नकल-चिपकाने वाली विधि से आपको बना-बनाया माल भी तैयार मिलता है- रंग लगे न फ़िटकरी और हींग का स्वाद बढ़िया आए - ओह, माफ़ कीजिए, यहाँ भी कटपेस्ट हो गया.
  • अपनी गलतियों को कभी नहीं स्वीकारें, बल्कि ज्यादा दमदार तरीके से हर संभव तरीके से सामने वाले को गलत ठहराएँ. अपनी बात रखने को आधा दर्जन टिप्पणी व दो-तीन चिट्ठापोस्ट अवश्य लिखें. सामने वाला भले न माने, दर्जनों अन्य पाठक अवश्य मान जाएंगे.

मुझे आज के अपने कार्पेल टनल सिंड्रोम की समस्या से राहत मिल गई है. अब आपकी बारी है अपने-अपने सिंड्रोमों से राहत पाने की. टिपियाएँ, प्रति-चिट्ठापोस्ट करें, फ़ोरम में चर्चियाएँ. वैसे, आपको अपने पुराने मॉनीटर से निजात पाने का सबसे बढ़िया मुहूर्त भी अभी ही है.

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rakesh sharma

आपने बहोत ठीक् लिखा है. क्या आप मुझे "हस्तचालित-सुंदर-सुव्यवस्थित-एग्रीगेटर " का पत बत सकते हैं

रवि जी ये सिंड्रोम, IAD के ही किसी वायरस के म्यूटेशन से डेवलप हुआ लगता है। पहले मुझे IAD था फिर ये हो गया। अब लगे हाथ इसका कोई इलाज भी बता देते।

यकीन नहीं आता तो ये देखिए रात के साढ़े ३ बजे ये टिप्पणी ठोक रहा हूँ।

आपने ने तो निकाल लिया अपना सिंड्रोम अब मैं सोच रहा हूँ कल क्या लिख कर निकालूँ।

आपने मर्ज का निदान और इलाज दोनों बखूबी बताया है। आशा है कि हमारे चिट्ठाकार इससे बहुत लाभान्वित होंगे।

संजय बेंगाणी

इस लेख के लिए इतना ही लिख सकता हूँ, उत्तम.

लेख के लिए धन्यवाद ।

रवि भाई, आपका धन्यवाद कि आपने इस सिंड्रोम के बारे में बताया! जब कभी
इसके कारणॊं की जांच होगी कि हिंदी ब्लाग जगत में इस सिंड्रोम के कीटाणु
किसने फैलाये तो दोषी आप करार दिये जायेंगे! :)

यह टिप्पणी अभी हो नहीं रही थी इसलिये मेल किया! (फ़ुरसतिया)

rachana

रवि भाई, कुछ दिनों पहले ही मैने कहा था उफ ये कहाँ आ गए हम! आपकी इस पोस्ट ने निश्चित कर दिया कि भविष्य और भी बुरा होगा. या फिर नये लोगों को डराने के लिये ये कहा गया है? ताकि वे चुपचाप सप्ताह मे दो पोस्ट लिखें और बडी-बडी बातें न सोचें एडसेंस वगैरह की!!

राकेश,
पता है-
http://www.cafehindi.com/

एक 'असली' कार्पल टनल सिंड्रॉम से पीड़ित बंदे का सहानुभूति भरा नमस्कार।

कैसे हमदर्द हो तुम कैसी मसीहाई है
दिल पे नश्तर भी लगाते हो तो मरहम की तरह

बहरहाल, देसीपंडित फिर शुरू हो चुका है। जी हाँ, इसी ख़ास हफ़्ते में :)।

बहुत सही मशविरे हैं आपके लेख में . रोग की पहचान,उसका निदान और इलाज़ तो पीड़ित चिट्ठाकार को स्वयं ही करना होगा .

जाके पैर ना फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई- इसी पीर को आपका लेख बखूबी व्यक्त करता है चिंतक, मनोवैज्ञानिक उपचारक रतलामी जी को प्रणाम

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
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