टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

December 2006


हिन्दी भाषा के दस्तावेज़ों के लिए एक बढ़िया ऑनलाइन पीडीएफ़ परिवर्तक


जमजार - वैसे तो एक ऐसा ऑनलाइन दस्तावेज़ परिवर्तक है जिसके जरिए आप कई किस्म के दस्तावेज़ों को कई अन्य किस्म के दस्तावेज़ों में मुफ़्त में परिवर्तन कर सकते हैं, परंतु यह हिन्दी भाषा के वर्ड फ़ाइलों को बखूबी पीडीएफ़ फ़ॉर्मेट में बदलता है.

यह 100 मेबा तक की फ़ाइलों को परिवर्तित कर सकता है, तथा सारा कार्य वेब इंटरफ़ेस के जरिए होता है. आपको एक आसान इंटरफ़ेस के जरिए फ़ाइल अपलोड करना होता है तथा दिए गए ईमेल पते पर सूचना मिलने के उपरांत आपको दी गई कड़ी से फ़ाइल डाउनलोड करना होता है.

हां, हिन्दी भाषा की फ़ाइलों के नाम अंग्रेज़ी में ही हों, हिन्दी में फ़ाइल नाम यह स्वीकार नहीं करता है.

संबंधित आलेख : यूनिकोड हिन्दी वर्ड फ़ाइलों को पीडीएफ़ में कैसे परिवर्तित करें

मॅड्रिवा लिनक्स पर लिखे आलेख पर पाराशर जी ( parasharas at gmail.com ) की प्रतिक्रिया थी:

रवि भाई,
मैंड्रीवा लाईनक्स के बारे में इतना शानदार आपने लिखा तो हमने भी पूरी ४
सीडी का डाऊनलोड कर लिया और उस (लाईनक्स) से ही यह मेल भेज रहा हूं।
ज्यादा तो नहीं करीब १००० मिनत लगे त इस लिए लिखा कि इनस्क्रिप्'पर यह
नहीं आ रहा नियंत्रक शिफ्त की सैंतिंग की तरह कोई विधि बताएं और
मैंड्रीवी शृंखला को एक ही लिंक पर डाल दें खास कर हिंदी में कार्य करना
लोकलहोस्त पीएचपीमाई एडमिन व खास तौर से इसके मोजिला फायरफॉक्स को अपडेत
२.०.१ या आगे अपडेत या इंस्éल करना फिलहाल मशक्कत कर रहे हैं ये भी पता
नहीं चला कि विंडो से जो फोंस लिये थे वे फायरफॉक्स में नहीं आ पाए विंडो
से एक फोंत पर्सनल कर मेल तो लिख ही दी है।

आपका अपना
पाराशर


जो वर्तनी आई हैं वह इंडिक एक्सśंशन की देन हैं माफ करियेगा बस शुरू है
आपके जवाब व हल की प्रतीक्षा.

मॅड्रिवा की इस समस्या का विस्तृत समाधान इस आलेख में है:

लिनक्स में फ़ॉन्ट कैसे संस्थापित करें

उबुन्टु (जीवंत, बूटयोग्य सीडी) के नए संस्करण में भी यही समस्या है, और इसका विस्तृत समाधान यहाँ पर है:

उबुन्टु 6.0 में हिन्दी कैसे संस्थापित करें

लिनक्स तंत्रों में हिन्दी कुंजीपट (इनस्क्रिप्ट) कैसे इनेबल करें इस पर आलेख यहाँ पर है:

लिनक्स में भारतीय भाषाओं में काम कैसे करें

इनमें से कुछ आलेख हिन्दी में इसी चिट्ठे पर हैं, भविष्य में समय निकाल कर उन्हें अवश्य ही सुनियोजित स्वरूप में कड़ी-बद्ध करने का प्रयास करूंगा.

वैसे, मॅड्रिवा समेत, किसी भी लिनक्स तंत्र में फ़ॉन्ट संस्थापना आसान है, जिसे निम्नानुसार कमांड अनुक्रम के जरिए किया जा सकता है:

1 रूट उपयोक्ता में बदलें.

# su (यह सुपरयूजर में बदलने के लिए कमांड है, आपसे रूट उपयोक्ता का पासवर्ड पूछा जाएगा, रूट पासवर्ड भरें)

2 डिरेक्ट्री /usr/share/fonts/TTF में फ़ॉन्ट कॉपी करें

# cp [font-path] /usr/share/fonts/TTF (यहाँ, [font-path] को फ़ॉन्ट की वास्तविक डिरेक्ट्री पथ से बदलें. उदाहरण के लिए, gargi.ttf फ़ॉन्ट, डिरेक्ट्री /home/ravi/fonts में है, तब कमांड होगा - # cp /home/ravi/fonts/gargi.ttf /usr/share/fonts/TTF)

3 कमांड chkfontpath चलाएँ

# chkfontpath (इस कमांड के जरिए नए जोड़े गए फ़ॉन्ट, आपके लिनक्स सिस्टम की जानकारी में आ सकेंगे व उनका इस्तेमाल हो सकेगा)


Tag ,,,


कौन बोल रिया है?

भारत के गांव गांव में मोबाइल पहुँच रहा है. नुक्कड़ की चाय की दुकान पर काम करने वाला छोरा और मुहल्ले का धोबी और खेत में काम करने वाला निरक्षर मजदूर सबके हाथ में मोबाइल दिखने लगा है. मोबाइल पर अभिजात्य वर्ग का अधिकार नहीं रहा. मोबाइल पर काल करना खर्चीला भी नहीं रहा. आपके मोबाइल में काल टाइम नहीं है, कोई बात नहीं. सामने वाले को दो-तीन मिस काल दे मारिये, वह मजबूरन काल बैक कर आपसे पूछेगा - भइये, क्या बात है?

मोबाइल पर कभी आप कोई महत्वपूर्ण बात कर रहे होते हैं तभी पता चलता है कि उसकी बैटरी खत्म हो गई, और आस-पास बैटरी चार्ज करने का कोई साधन नहीं होता. कभी किसी मित्र को स्थानीय मोबाइल का नंबर लगाते हैं तो पता चलता है कि वह नंबर तो आज दो हजार किलोमीटर दूर है - और आपको एसटीडी चार्ज लग गया और आपके मित्र को रोमिंग चार्ज (या इसके उलट भी हो सकता है). और आपकी मित्रता इस एसटीडी-रोमिंग चार्ज के चक्कर में खतरे में पड़ती दीखती है. कभी किसी मित्र को मोबाइल लगाते हैं तो उधर से मित्र के बजाए भाभी जी का स्वर सुनाई देता है - "हाँ, भाई साहब, आज ये मोबाइल मेरे पास है - बाजार में कुछ काम था ना..."

आपका कोई पुराना मित्र, जिसके दर्शन महीनों से नहीं हुए होते हैं, अचानक-अकारण आपसे बे-वक्त मिलने आ पहुँचता है. यूँ ही आपके दर्शन करने. उसके हाथ में नया, चमचमाता हुआ, लेटेस्ट वर्जन का मोबाइल फ़ोन होता है. आपको देर से ही सही, समझ में आ जाता है कि दरअसल, आपके मित्र को नहीं, आपके मित्र के नए, कीमती, नए-फ़ीचर युक्त मोबाइल को आपसे मिलने की आवश्यकता थी.

आपके हाथ में नया मोबाइल देख कर आपका मित्र पूछता है- वाह! क्या नया मॉडल है. एमपी3 है क्या? फिर मॉडल के फ़ीचर्स देखने के बहाने आपके एसएमएस और एमएमएस संदेशों को पढ़ने लग जाता है. फिर कहता है - वाह! गुरू! क्या बढ़िया मसाला भरा है. एक दो हमको भी भेज देना. आप शर्माते-सकुचाते से हें हें हें करने लगते हैं.

आज रविवार को सुबह-सुबह मोबाइल बजा. निगोड़े मोबाइल ने रविवार की सुबह बरबाद कर दी. एक यही तो दिन मिलता है जहाँ आप देर तक अलसाए से सो सकते हैं. परंतु मोबाइल को पता पड़ गया कि आप अलसा रहे हैं. वह जाने कहीं से कनेक्शन मिला लाया. उसकी बैटरी भी डाउन नहीं थी.

डिस्प्ले पर जो नंबर आ रहा था वह मेमोरी में नहीं था. मुझे लगा कि मेरे चिट्ठे के किसी पाठक ने जाने कहीं से मेरा मोबाइल नंबर हथिया लिया होगा और मुझे बधाई, शुभकामनाएँ देने के लिए रविवार सुबह का यह उचित समय चुना होगा.

"हैलो?" मेरे स्वर में आश्चर्य मिश्रित उत्सुकता थी.

"कौन बोल रिया है" उधर से आवाज आई.

मेरा माथा ठनका. ये तो कोई रांग नंबर वाला मामला लगता है. आवाज यूँ प्रतीत हो रही थी जैसे कि सामने से गब्बर सिंह बोल रहा हो.

मेरे अंदर का वीरू जाग गया.

"आपने क्या नंबर लगाया है? आपको किससे बात करनी है?" मैंने प्रत्युत्तर दिया. मेरे लहज़े में वीरू का जवाबी फ़ायर था.

"सामजी भाई से बात कराओ" उधर से वही गब्बरिया आदेश आया.

"अरे यार आपने रांग नंबर लगाया है - ये नंबर किसी सामजी भाई का नहीं है"

मेरे भीतर का वीरू गरज रहा था. सामान्य टेलिफ़ोन में यह सुविधा तो होती है कि आप रिसीवर पटक कर अपना गुस्सा कम कर सकते हैं. मोबाइल पटकने से तो अपना खुद का नुकसान ज्यादा हो सकता है. मैंने मोबाइल के काल एण्ड बटन को जोर से दबाया और देर तक भुनभुनाता रहा.

मेरे भीतर के वीरू का गुस्सा पूरी तरह ठंडा होता इससे पहले ही मोबाइल फिर से बजा. उसे बजना ही था. वही पहले वाला नंबर डिस्प्ले पर था.

"हैलो, यार आपने गलत नंबर लगाया है, आपको जिससे बात करनी है उसका नंबर यह नहीं है..." सामने वाले के बोलने से पहले ही मैं मोबाइल पर भड़का.

"कौन बोल रिया है - अपना नाम तो बताओ?" सामने से वही गब्बरिया आवाज आई. प्रकटतः वह सुनिश्चित नहीं कर पा रहा था कि जो नंबर वह लगा रहा था गलत कैसे लग रहा था.

"अरे यार तुम्हें मेरे नाम से क्या मतलब? ये तुमने रांग नंबर लगाया है. जिससे तुम्हें बात करनी है उसका मोबाइल फोन ये नहीं है" मोबाइल पर मैं जोर से चिल्लाया और मैंने काल फिर से काट दिया.

"कैसे बेहूदे गंवार लोग होते हैं.... मोबाइल तो ले लेते हैं परंतु मैनर्स ही नहीं है. एक तो रांग नंबर लगाते हैं फिर भौंक कर बातें करते हैं..." मैं जरा जोर से भुनभुनाया.

रेखा बड़ी देर से मेरी प्रतिक्रिया देख रही थी. "अरे भई, सामने वाला गंवार है तो तुम क्यों उससे उसी भाषा में पेश आ रहे हो? कम से कम तुम तो शांति से, प्रेम से बता सकते हो!" अंतत: उससे रहा नहीं गया.

वह सही कह रही थी. आह! अचानक मुझे अहसास हुआ, कि मैं भी तो उससे उसी गंवरिया लहजे में बात करने लग गया था. मेरे मोबाइल मैनर्स की भी तो वाट लग गई थी. लगता है पहले मुझे अपने मोबाइल मैनर्स को ठीक करना पड़ेगा. ये साली मोबाइल कंपनियों मोबाइलें तो बेचती हैं मगर यूजर्स मैनुअल में दो पन्ने मोबाइल मैनर्स के लिए नहीं रखतीं! मैं फिर भुनभुनाया.

**-**

इसी तेवर का व्यंग्य लेख: आइए, मोबाइल हो जाएँ...

टैग ,,,


इंटरनेट के फ़िशिंग हमलों से कैसे बचें?

पिछले हफ़्ते मुम्बई पुलिस ने कुछ नाइजीरियाई नागरिकों को इंटरनेट पर चार-सौ-बीसी और धोखाधड़ी करने के आरोप में पकड़ा. उन पर आरोप था कि उन्होंने आईसीआईसीआई बैंक की एक नकली साइट तैयार कर बैंक व ग्राहकों को करोड़ों रुपयों का चूना लगाया. उन्होंने बैंक के ग्राहकों को नकली ईमेल भेजकर कहा था कि कुछ कारणों से वे अपने पास-वर्ड और उपयोक्ता नाम अपडेट करें. ईमेल में कड़ी उस नकली साइट की थी जो हूबहू आईसीआईसीआई बैंक की असली साइट जैसा दिखता था. ग्राहक झांसे में आकर अपनी गोपनीय जानकारियाँ वहाँ डाल देते थे. अपराधियों ने यह जानकारी हासिल कर असली बैंक खातों से करोड़ों रुपए निकाल लिए और इंटरनेट बैंकिंग के ग्राहकों व सेवा प्रदाताओं को करोड़ों रुपयों का चूना लगाया. इस तरह की धोखा-धड़ी, जिसमें नकली साइट बना कर उपभोक्ताओं को ठगा जाता है, फिशिंग कहलाता है.

अपना शिकार फांसने के लिए अपराधी नकली साइटें इस तरह बनाते हैं कि वे पूरी असली लगें. एक सामान्य उपयोक्ता के लिए नकली और असली साइट में भेद करना मुश्किल होता है. इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर इंटरनेट ब्राउज़रों के नए संस्करणों में एंटी फ़िशिंग (फ़िशिंग के संभावित हमलों से बचाने के लिए चेतावनी) वार्निंग विशेषताएँ अंतर्निर्मित शामिल की जा रही हैं. ऑपेरा 9.01, फ़ॉयरफ़ॉक्स 2 तथा इंटरनेट एक्सप्लोरर 7 संस्करणों में आपको इस तरह की सुविधा मिलती है. जब आप इस सुविधा को सक्रिय करते हैं तो ये ब्राउज़र विविध भरोसेमंद स्रोतों से प्राप्त डाटाबेस को जाँच कर यह तय करते हैं कि जिस साइट की कड़ी को खोलने के लिए आपने क्लिक किया है वह सही है या नहीं. अगर कड़ी उनके पास उपलब्ध धोखाधड़ी की साइटों वाले डाटाबेस से मिलान करती है तो वे आपको चेतावनी संदेश देते हैं कि जिस साइट पर आप भ्रमण करना चाहते हैं वह धोखाधड़ी के उद्देश्य से तैयार की गई है, अतः वहाँ न जाएँ.

संभावित फ़िशिंग हमलों से बचने के लिए ऐसे संदेशों को गंभीरता से लें व उन्हें अनदेखा न करें.

ऑपेरा 9.01 सुरक्षा सेटिंग

ऑपेरा 9.01 चेतावनी संदेश

फ़ॉयरफ़ॉक्स 2 चेतावनी संदेश

इंटरनेट एक्सप्लोरर 7 चेतावनी संदेश

एक और चेतावनी संदेश

संबंधित आलेख:

इस चिट्ठे पर अन्य चिट्ठों के साथ, प्रभासाक्षी पर

स्क्रीन चित्र: साभार एफ़-सीक्योर एंटीवायरस ब्लॉग

.

तू कितना कमाता है रे ललुआ?

**-**

मुझे तो आज तक आय से अधिक संपत्ति का फंडा समझ में ही नहीं आया. मेरी मां मुझसे पूछा करती थी, जब पहले पहल नौकरी लगी थी - तू कितना कमाता है रे ललुआ. मां के लिए उसका बच्चा हमेशा ललुआ ही रहता है. मैं शर्माता था कि मेरी आय मेरे हिसाब से, मेरी औकात से कम है, और मैं उसमें कुछ भत्ते इत्यादि को भी जोड़कर बता देता था. शायद यह था आय से अधिक संपत्ति.

परंतु किसी के पास आय से अधिक संपत्ति कैसे जमा हो सकती है भला. जितनी जिसकी आय होती है, उतनी ही या उससे कम ही तो वह जमा कर पाएगा ना? सरल सा गणित है, मान लो कि आपकी आय एक्स है. अब उस एक्स आय में से आपने वाय खर्च कर दिया तो जो संपत्ति आपके पास जमा होगी तो वो तो एक्स ऋण वाय होगी ना? आप लाख कृपण हों, अपनी आय में से कुछ भी खर्च नहीं करते हैं, तब, मान लिया कि खर्च, यानी कि वाय, शून्य है. ऐसी स्थिति में भी जो संपत्ति आपके पास जमा होगी वह एक्स माइनस जीरो यानी की एक्स - आपकी पूरी आय ही तो होगी, उससे अधिक नहीं. इससे यह सीधे-सीधे सिद्ध होता है कि आय से अधिक संपत्ति तो हो ही नहीं सकती. अगर ऐसा होने लगा तो नया गणित पैदा हो जाएगा, गणित के नए नियम बन जाएंगे, अपने तो सारे फंडे फेल हो जाएंगे. न्यायाधीश इतने बेवकूफ़ तो थे नहीं जो इतना सीधा सरल गणित नहीं समझते. इसीलिए उन्होंने गणित के हिसाब से सही निर्णय दिया है - आय से अधिक संपत्ति कैसे होगी? हो ही नहीं सकती. सीबीआई के अफ़सरों का गणित के साथ-साथ आई क्यू भी कमजोर है लगता है जो वे ऐसे गलत गणित वाले अभियोग लगाते रहते हैं. जबरन पॉलिटिकल एजेंडा लेकर अभियोग लगाते फिरते हैं.

मैंने तो देखा, सुना और भुगता है - आय से अधिक खर्च को. आय इधर आई नहीं और खर्च हुई नहीं. कई दफ़ा तो आय के आने से पहले ही खर्च हो चुका होता है - उधार और लोन लेकर. ऊपर से, हर कहीं मुफ़्त में मिल रहे क्रेडिट कार्ड ने आय और संपत्ति का गणित भयंकर रूप से गड़बड़ा दिया है. आय है नहीं, आने वाले समय में आय का कोई जरिया दिखता नहीं, मगर जेब में रखा क्रेडिट कार्ड मचलता रहता है - किसी मशीन में स्वाइप होने को - खर्च हो जाने को.

आप कहेंगे - राजनीतिज्ञों की, नेताओं की आय का अलग फंडा होता है, और उनमें गणितीय नियम लागू नहीं होते. ठीक है, मान लिया, परंतु आय और खर्च का फंडा तो वहां भी होता है. जितना खर्च चुनाव में जीतने के लिए किया गया होता है - यानी की ‘इनवेस्टमेंट मनी' उसे तो ब्याज सहित वसूलना होता है कि नहीं? और क्या जीवन में एक ही बार चुनाव लड़ना होता है? अगले चुनाव में लड़ने के लिए खर्चा कहाँ से आएगा? अतः अगला व पिछला हिसाब बराबर करने के लिए आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक, और अधिक स्रोतों से आय प्राप्त की जाती है. इसे आय से अधिक संपत्ति कैसे कहेंगे? ऊपर से, माना कि कुछ ऊपरिया आय अभी दिख गई नजर में, मगर भैये, अगले चुनाव के लिए खर्चे में तो वह पहले ही डला हुआ है - फिर आय से अधिक संपत्ति कैसे हुई?

इसी तरह, क्या कोई ग्यारंटी है कि अगले चुनाव में जीत ही जाएंगे? आजकल जनता भी होशियार हो गई है. बदल-बदलकर मुँह का जायका ठीक करने की तर्ज पर नेताओं को भी आजमाने लगी है. तब आज के राजशाही ठाठ-बाठ भला दस पंद्रह हजार के पेंशन में बना रह पाएगा भला? तो, यदि हार गए, तो आने वाले वर्षों में जब तक फिर से किसी लाभ के पद का जुगाड़ नहीं हो जाता, उस राजशाही ठाठ-बाठ को बनाए रखने के लिए पैसा कहाँ से आएगा? यह खर्चा भी तो आय के ब्यौरे में पहले से ही डला हुआ है. आय ठीक से हुई नहीं और आप यह सिद्ध करने पर तुले हुए हैं कि आय से अधिक संपत्ति है!

**-**

व्यंज़ल

आय कम खर्च ज्यादा है

फिर भी पीने का इरादा है


इस दौर में पहचानें कैसे

कौन राजा कौन प्यादा है


यहाँ चेहरे सबके एक हैं

ओढा सभी ने लबादा है


अब न करेंगे कोई इरादा

बचा एक यही इरादा है


मुसकराहटों में अब रवि

विद्रूपता जरा ज्यादा है

**-**

संबंधित आलेख - लालू आरती

तथा लालू आरती2

.

.

मरफ़ी के तकनॉलाज़ी नियम

बिजली से चलने वाले किसी भी उपकरण को यह कभी भी न पता चलने दें कि आप बहुत जल्दी में हैं.

(मरफ़ी के कुछ अन्य, मज़ेदार नियम यहाँ पढ़ें)

  • गलत निष्कर्ष पर पूरे विश्वास के साथ पहुँचने की व्यवस्थित विधि का नाम ही ‘तर्क' है.
  • जब किसी सिस्टम को पूरी तरह से पारिभाषित कर लिया जाता है तभी कोई मूर्ख आलोचक उसमें कुछ ऐसा खोज निकालता है जिसके कारण वह सिस्टम या तो पूरा बेकार हो जाता है या इतना विस्तृत हो जाता है कि उसकी पहचान ही बदल जाती है.
  • तकनॉलाज़ी पर उन प्रबंधकों का अधिकार है जो इसे समझते नहीं.
  • यदि बिल्डिंग बनाने वाले, प्रोग्राम लिखने वाले प्रोग्रामरों की तरह कार्य करते होते तो विश्व के पहले बिल्डर का पहला ही काम संपूर्ण समाज को नेस्तनाबूद कर चुका होता.
  • किसी संस्थान के फ्रंट ऑफ़िस की सजावट उसकी संपन्नता के व्युत्क्रमानुपाती होती है.
  • किसी कम्प्यूटर के कार्य का विस्तार उसके बिजली के तार के विस्तार जितनी ही होती है.
  • विशेषज्ञ वो होता है जो क्षुद्र से क्षुद्र चीजों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी रखता है. सही विशेषज्ञ वह होता है जो कुछनहीं के बारे में सबकुछ जानता है.
  • किसी आदमी को बताओ कि ब्रह्माण्ड में 300 खरब तारे हैं तो वो आपकी बात पर विश्वास कर लेगा. उसे बताओ कि किसी कुर्सी पर अभी अभी पेंट लगाया गया है और वह गीला है तो वह इसकी तसदीक के लिए छूकर अवश्य देखेगा.
  • विश्व की महानतम खोजों के पीछे मानवीय भूलों का ही हाथ रहा है.
  • कोई भी चीज नियत कार्यक्रम या निश्चित बजट में नहीं बन सकती.
  • मीटिंग में मिनट्स को रखा जाता है और घंटों को गंवाया जाता है.
  • प्रबंधन का पहला मिथक है - कि उसका का अस्तित्व है.
  • कोई यूनिट तब तक असफल नहीं होती जब तक कि उसका अंतिम निरीक्षण नहीं कर लिया जाता.
  • नए सिस्टम नई समस्याएँ पैदा करते हैं.
  • गलतियाँ करना मनुष्य का स्वभाव है, परंतु ढेरों, सुधारी नहीं जा सकने वाली गलतियों के लिए कम्प्यूटर की आवश्यकता होती है.
  • कोई भी उन्नत तकनीक जादू सदृश्य ही होती है जब तक कि वह समझ न ली जाए.
  • एक कम्प्यूटर मात्र दो सेकंड में उतनी सारी गलतियाँ कर सकता है जितना 20 आदमी मिलकर 20 वर्षों में करते हैं.
  • किसी व्यक्ति को कोई भी बात इससे ज्यादा प्रोत्साहित नहीं कर सकती - कि उसके बॉस ने किसी दिन घंटा भर ईमानदारी से काम किया.
  • कुछ व्यक्ति नियमबद्ध होते हैं - भले ही उन्हें यह नहीं पता होता कि नियम क्या हैं व किसने लिखे हैं.
  • फेब्रिकेटर के लिए मुश्किलें बढ़ाना तथा सर्विस इंजीनियर के काम को असंभव बनाना ही डिज़ाइन इंजीनियर का पहला काम होता है.
  • भीड़ में से विशेषज्ञ का पता लगाना मुश्किल नहीं. वह किसी कार्य को पूरा होने में सर्वाधिक समय व पैसा लगने की भविष्यवाणी करता दिखाई देता है.
  • कहने भर से कोई काम तो हो जाता है, मगर फिर उसके बाद और बहुत सा कहा जाता है जो होता नहीं
  • किसी भी नवीनतम सर्किट डिजाइन में एक भाग वो होता है जो कालातीत हो चुका होता है, दो भाग बाजार में उपलब्ध नहीं होता तथा तीन भाग विकास के चरणों में होते हैं.
  • कोई जटिल सिस्टम अंततः जब काम करने लगता है तो पता चलता है कि इसे तो एक कार्यशील सरल सिस्टम से ही बनाया गया है.
  • कम्प्यूटर अविश्वसनीय हैं, परंतु मनुष्य और ज्यादा अविश्वसनीय हैं. जो सिस्टम मनुष्य की विश्वसनीयता पर निर्भर है, वह अविश्वसनीय ही होगा.
  • यदि आप कुछ समझ नहीं पाते हैं तो वह आपकी अंतर्बुद्धि से प्रकट हो जाता है.
  • खरीदार संस्था का सचिव यदि आपसे जरा ज्यादा ही सहृदयता से पेश आता है तो यह समझें कि खरीद आदेश आपके प्रतिद्वंद्वी कंपनी ने पहले ही हड़प लिया है.
  • किसी कंस्ट्रक्शन को डिजाइन करते समय, शनिवार 4.30 बजे के बाद उसके आयामों का सही योग नहीं निकाला जा सकता. सही योग सोमवार सुबह 9 बजे स्वतः सुस्पष्ट हो जाता है.
  • जो खाली है उसे ही भरें. जो भरा है उसे ही खाली करें. और जहाँ खुजली है, वहीं पर ही खुजाएँ.
  • दुनिया में सब संभव है, रिवॉल्विंग दरवाजे से होकर स्कीइंग को छोड़कर.
  • कठिन परिश्रम से नहीं, बल्कि चतुराई से काम करें तथा आपनी वर्तनि के प्रति सवधान रहे.
  • यदि यह गूगल में नहीं मिलता, तो फिर इसका अस्तित्व ही नहीं है.
  • यदि कोई प्रयोग सफल हो जाता है तो फिर कहीं कुछ गलत अवश्य है.
  • यदि सबकुछ असफल हो जाता है तो फिर निर्देश पढ़ें.
  • जो भी ऊपर जाता है, वह नीचे आता ही है - फिर भले ही वह सेंसेक्स क्यों न हो.
    उप प्रमेयर : परंतु हमेशा नहीं.
  • हाथों से छूटा औजार हमेशा कोने में वहां जा पहुँचता है जहाँ आसानी से नहीं पहुँचा जा सकता.
  • किसी भी सरल सिद्धान्त की व्याख्या अत्यंत कठिन तरीके से ही संभव है.
  • जब कोई सिस्टम इतना सरल बनाया जाता है कि कोई मूर्ख भी उसका इस्तेमाल कर सके, तो फिर उसका इस्तेमाल सिर्फ मूर्ख ही करते हैं.
  • तकनीकी दक्षता का स्तर, प्रबंधन के स्तर के उलटे अनुपात में होता है.
  • एक अत्यंत मुश्किल कार्य पूर्ण होने के ठीक पहले, एक अति महत्वहीन छोटे से विवरण की अनुपलब्धता के कारण रुक जाता है.
  • कोई भी काम भले ही पूरा हो जाता हो, परंतु उसे सही ढंग से पूरा करने के लिए कभी भी समय नहीं होता.
  • जैसे-जैसे अंतिम समय सीमा करीब आती है, वैसे-वैसे बचे हुए काम की मात्रा बढ़ती जाती है.
  • यदि कोई उपकरण खराब हो जाता है और उसकी वजह से काम अटकने लगता है, तो वह उपकरण तब ठीक होता है जब,
    1. उसकी आवश्यकता अब नहीं होती है
  • कोई दूसरा आवश्यक कार्य किया जा रहा होता है तब.
  • बिजली से चलने वाले किसी भी उपकरण को यह कभी भी न पता चलने दें कि आप बहुत जल्दी में हैं.

  • यदि कोई उपकरण खराब नहीं हुआ है तो उसमें और सुधार न करें. आप उसे ऐसा खराब कर देंगे जो फिर कभी सुधारा नहीं जा सकेगा.
  • पटरी को देखकर आप यह अंदाजा नहीं लगा सकते कि ट्रेन किस तरफ से आएगी
    यदि आप पूरी तरह से भ्रमित (कनफ़्यूजन में) नहीं हुए हैं तो इसका मतलब है कि आपको पूरी बात मालूम ही नहीं है.
  • मानक पुरजे नहीं होते हैं

  • हाथों से छूटा औजार किसी चलते उपकरण के ऊपर ही गिरता है.
  • नवीनतम तकनॉलाज़ी पर कभी भरोसा न करें. भरोसा तभी करें जब वह पुरानी हो जाए.
  • बोल्ट जो अत्यंत अपहुँच स्थान पर होता है, वही सबसे ज्यादा कसा हुआ मिलता है.
  • तकनॉलाज़ी और विज्ञान में सबसे ज्यादा बोला जाने वाला वाक्यांश है - "उफ़ - ओह!"

  • तकनीशियन के मुँह से दूसरा सबसे बेकार शब्द आप सुनते हैं - "ओफ़!". पहला सबसे बेकार शब्द होता है "ओफ़! शि..ट"
  • किसी भी दिए गए सॉफ़्टवेयर को जब आप इस्तेमाल करने में दक्षता हासिल कर लेते हैं तो पता चलता है कि उसका नया संस्करण जारी हो गया है.

  • उप प्रमेय 1 - नए संस्करण में जो सुविधा आपको चाहिए होती है वह अभी भी नहीं होती
  • उप प्रमेय 2 - नए संस्करण में जिस सुविधा का इस्तेमाल आप बारंबार करते रहे होते हैं उसे या तो निकाल दिया जाता है या उसमें ऐसा सुधार कर दिया जाता है जो आपके किसी काम का नहीं होता.

  • आज के इनफ़ॉर्मेशन ओवरलोड के जमाने में सबसे आवश्यक तकनीकी दक्षता यह है कि हम जो सीखते हैं उससे ज्यादा भूलने लगें.
  • जटिल चीजों को सरलता से बनाया जा सकता है, सरल चीजें बनने में जटिल होती हैं

  • बन्दर के हाथ में आई-पॉड कोई काम का नहीं होता.

  • सुरक्षा का नियम: यदि आप किसी लाख रुपए के उपकरण को बचाने के लिए पाँच रुपए का फ़्यूज लगाते हैं तो आपके पाँच रुपए के फ़्यूज को जलने से बचाने के लिए आपका पाँच लाख का उपकरण पहले जल जाता है.

  • हर एक के बॉस के लिए हर कहीं लागू होने वाला नियम: बहते हुए गंदे नाले में कचरे के ढेर का सबसे बड़ा हिस्सा ही सबसे ऊपर आता है.
  • किसी समुद्री यात्रा में जहाज के पोरबंदर को छोड़ने के बाद ही कोई महत्वपूर्ण पुरजा खराब होता है, जो भंडार में नहीं होता है.

  • रखरखाव विभाग उपभोक्ता की शिकायतों को तब तक नजर अंदाज करते रहते हैं जब तक कि उपभोक्ता कोई नया खरीद आदेश न दे दे.

  • निरीक्षण की प्रत्याशा के महत्व के अनुसार ही किसी मशीन के खराब हो जाने की संभावना होती है.

  • यदि कोई नया सिस्टम सिद्धान्त में काम करेगा तो अभ्यास में नहीं और अभ्यास में काम करता है तो सिद्धान्त में नहीं.

  • आपकी खोज चाहे जितनी भी पूर्ण व बुद्धिमानी भरी हो, कहीं न कहीं कोई मौजूद होता है जो आपसे ज्यादा जानता है.

  • आसानी से सुधारी जा सकने वाली चीज़ें कभी खराब ही नहीं होतीं.

  • काटा गया कोई भी तार आवश्यक लंबाई में छोटा ही निकलता है.
  • जब आप अंतत: नई तकनॉलाज़ी को अपना लेते हैं, तब पता चलता है कि हर कहीं उसका सपोर्ट व इस्तेमाल बंद हो चुका है.
  • किसी परियोजना का प्रस्तावित आकार, उस परियोजना के अंतिम रुप में पूर्ण होने के आकार के व्युत्क्रमानुपाती होता है.
    कोई विचार जितना ही बुद्धिमानी भरा होगा, उतने ही कम उसे स्वीकारने वाले मिलेंगे.

  • जितना ज्यादा ज्ञान आप प्राप्त करते जाएंगे, आप उतना ही कम सुनिश्चित होते जाएंगे.
  • यदि आप सोचते हैं कि आप विज्ञान (या कम्प्यूटर या औरत) को समझते हैं, तो निश्चित रूप से आप विशेषज्ञ नहीं हैं.
  • सिर्फ तकनीशियन ही ऐसे हैं जो तकनॉलाज़ी पर किसी सूरत भरोसा नहीं करते.

  • सभी असंभव असफलताएँ जाँच स्थल पर ही होती हैं.
  • उप प्रमेय - सभी असंभव असफलताएँ ग्राहक यहाँ होती हैं.

  • किसी को आप जितना बेमुद्दत चाहते हैं कि वह इंस्टैंट मैसेंजर में उपलब्ध हो, उसके ऑफ़ लाइन होने की संभावना उतनी ही ज्यादा होती है.
  • किसी उपकरण (या तकनीशियन) का उपयोग और कार्यकुशलता उसे दिए गए गालियों के सीधे अनुपात में होती है.
  • कोई बढ़िया, खराब न होने वाला पुर्जा असुरक्षित समझा जाकर कीमती, बारंबार सर्विस की आवश्यकता वाले पुर्ज़े से हमेशा बदल दिया जाता है.

  • खराब हो चुका पाँच रुपए कीमत का पुर्जा बदला नहीं जा सकता, परंतु उसे किसी सब-एसेम्बली से बढ़िया, कार्य-कुशल तरीके से बदला जा सकता है जिसकी कीमत मूल उपकरण से ज्यादा होती है.
  • किसी खराब पुरज़े की कीमत व उपलब्धता सम्पूर्ण सिस्टम की कीमत के व्युत्क्रमानुपाती होती है. पाँच रुपए का पुरज़ा पाँच लाख की मशीन को अनुपयोगी बना देता है.
  • पाँच लाख की मशीन का पाँच रुपए कीमत का खराब पुरज़ा बाजार में या तो उपलब्ध नहीं होता, उसका निर्माण बरसों पहले से बन्द हो चुका होता है और अंतत: अपने कई गुने कीमत से मेड टू आर्डर से बनवाया जाता है तो पता चलता है कि उस मशीन की जगह नई मशीन ने ले ली है.
  • सभी मेकेनिकल / इलेक्ट्रिकल उपकरण अपनी गारंटी अवधि अच्छी तरह से जानते हैं - वे इस अवधि के बाद ही फेल होते हैं.

  • तकनीशियन ने पहले कभी भी आपके जैसा मशीन नहीं देखा हुआ होता है.

  • तकनीशियन आपके मशीन को उसके जाने के तुरंत बाद या फिर बहुत हुआ तो, अगले दिन खराब होने के लिए ही ठीक करता है.
.

.
  • मरफ़ी के कुछ अन्य नियम यहाँ पढ़ें -

1 मरफ़ी के प्यारे नियम 2 मरफ़ी के भारतीय घरेलू महिलाओं के नियम 3 ये मरफ़ी कौन है?

भीड़ भड़क्का अधिभार

दुनिया एक भीड़ में तबदील होती जा रही है. वैसे, भीड़ में रहने के यूँ तो बहुत मजे हैं, परंतु बहुत से तमाम खतरे भी हैं. अब एक नया खतरा सिर पर आ गया है. अगर आप भारत में हवाई यात्रा करते हैं तो आपको प्रति टिकट एक सौ पचास रुपए अतिरिक्त भुगतान करना होता है. यह एक सौ पचास रुपए अतिरिक्त किसलिए? यह एक सौ पचास रुपए कंजेशन सरचार्ज होता है यानी कि भीड़ भड़क्का अधिभार!

अभी तो सिर्फ हवाई यात्रा में यह अधिभार लगाया गया है. भविष्य में इस तरह के अधिभार के अन्य क्षेत्रों में घुसपैठ के पूरे आसार हैं. लंदन के कुछ भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में वाहन ले जाने व पार्क करने के लिए शुल्क वसूला जाता रहा है. इसी तर्ज पर अब अपने यहाँ भी अतिरिक्त अधिभारित शुल्क लगा करेगा. जिस ट्रेन में आप यात्रा करना चाहते हैं, उसमें भीड़ और वेटिंग लिस्ट के अनुसार अधिभार लग सकता है. जो सीधी सपाट गड्ढे रहित सड़क आपके घर को जाती है, और इस कारण अगर उसमें भीड़-भाड़ रहती है तो आपको सरचार्ज देना पड़ सकता है. रोज रोज के अधिभार से बचने के लिए फिर हो सकता है कि आप घर ही नहीं जाएँ. वैसे, यह एक बढ़िया सा बहाना हो सकता है पत्नियों को बताने के लिए - डार्लिंग आज सड़क में ज्यादा ही भीड़ थी अतः आज ज्यादा ही अधिभार वसूला जा रहा था, और उस बेवजह खर्च को बचाने के लिए मैंने दफ़्तर में ही समय गुजारना उचित समझा.

आपका बच्चा स्कूल जाता है. किसी अच्छे स्कूल में ज्यादा भीड़ रहती है. ज्यादा भीड़ वाले स्कूल में ज्यादा भीड़ भड़क्का अधिभार देना होगा. बच्चे के भविष्य का सवाल है. अधिभार कम हो या ज्यादा, दिल कुछ भी बोले, चेहरे पर मुसकराहट लाकर अधिभार देना होगा.

आप चार दोस्त मिल कर नुक्कड़ पर चाय पी रहे होते हैं और इतने में नगर निगम का कर्मचारी रसीद कट्टे लेकर आ जाता है. वह भीड़ भड़क्का अधिभार आपसे वसूलना चाहता है. आप मना करते हैं. हील हुज्जत होती है. मज़े लेने वालों का मजमा लगने लगता है. भीड़ पहले से ज्यादा हो जाती है. आपने भीड़ भड़क्का अधिभार देने से मना किया. सरकारी कामकाज को सही ढंग से होने से रोका. आप पर मुकदमा दर्ज होता है. मुकदमों की भीड़ युक्त न्यायालय में आपका एक और मुकदमा दर्ज होता है- पहले से भीड़ भरे नुक्कड़ में आप चार दोस्तों ने चाय पीते हुए गपियाते हुए और ज्यादा भीड़ जो किया और ऊपर से भीड़ भड़क्का अधिभार देने से मना किया... मुकदमे का निर्णय अठारह बीस साल बाद तब आएगा जब आप सबकुछ भूल भालकर किसी लाफ़्टर चैलेंज में हँस रहे होंगे या फिर संसद की किसी कुर्सी की शान बढ़ा रहे होंगे.

(मेरे हिसाब से) मेरे इस चिट्ठास्थल पर इस चिट्ठे को पढ़ने वालों की भयानक भीड़ बढ़ रही है. सोचता हूँ कोई अधिभार मैं भी लगा ही दूं. क्या खयाल है आपका?

**-**

व्यंज़ल

**-**

जीवन के हर हिस्से पर लग गए अधिभार

कोई बताओ कैसे अवरुद्ध होगा ये अतिसार


हमने तो भरी नहीं थी किसी बात की हामी

उन्होंने ही ले लिए जबरन सारे अधिकार


कुछ तो थे हालात और कुछ हमारे करम

जोहते रहे तमाम उम्र चाहत और अभिसार


दोष देता है जमाना हमारी नादानियों का, पर

समर और स्नेह में खूब जायज़ हैं अतिचार


दूसरों की करतूतों पर अब न हँसा करेंगे रवि

इस संसार पर हम भी तो हैं एक अतिभार

**-**

.

.

कुछ प्रोग्रामिंग गीत मूल फंटूश से अनुवादित:

# लोकल वेरिएबल

मैं पल दो पल का शायर हूं

पल दो पल मेरी कहानी है

पल दो पल मेरी हस्ती है

पल दो पल मेरी जवानी है...


# ग्लोबल वेरिएबल


मैं हर इक पल का शायर हूँ

हर इक पल मेरी कहानी है

हर इक पल मेरी हस्ती है

हर इक पल मेरी जवानी है...


# नल पाइंटर

मेरा जीवन

कोरा काग़ज़

कोरा ही रह गया

# डैंगलिंग पाइंटर्स

मौत भी आती नहीं

जान भी जाती नहीं


# गोटू

अजीब दास्तान है ये

कहाँ शुरू कहाँ खतम

ये मंजिलें हैं कौन सी

ना वो समझ सके न हम


# दो रीकर्सिव फंक्शन जो एक दूसरे को काल कर रहे हैं

मुझे कुछ कहना है

मुझे भी कुछ कहना है

पहले तुम पहले तुम

# डिबगर

जब कोई बात बिगड़ जाए

जब कोई मुश्किल पड़ जाए

तुम देना साथ मेरे हम नवाज़


# सी++ से वीबी

ये हसीं वादियाँ

ये खुला आसमां

आ गए हम कहाँ

# बग जिसे ढूंढा नहीं जा सका

ऐ अजनबी

तू भी कहीं

आवाज दे कहीं से


# अप्रत्याशित बग (विशेषकर ग्राहक को प्रेजेन्टेशन देते समय)

ये क्या हुआ

कैसे हुआ

कब हुआ

क्यों हुआ


# फिर, तब ग्राहक -


जब हुआ तब हुआ ओ छोड़ो ये ना सोचो...


# लोड बैलेंसिंग


साथी हाथ बढ़ाना

एक अकेला थक जाएगा

मिल कर बोझ उठाना


# मॉडम - कनेक्शन बिजी मिलने पर


सुनो कहो

कहा सुना

कुछ हुआ क्या

अभी तो नहीं...

# विंडोज के ओपनसोर्स होने की बातें


परदे में रहने दो पर्दा ना उठाओ

पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा

अल्ला मेरी तौबा अल्ला मेरी तौबा

कुछ कम्प्यूटरी फ़िल्में
*************

# ESC : नौ दो ग्यारह
# F1 : गाइड
# अनडू : आ अब लौट चलें
# एमएसडॉस : बुड्ढा मिल गया
# सॉफ़्टवेयर हार्डवेयर : एक दूजे के लिए
#कंट्रोल+ऑल्ट+डिलीट : आखिरी रास्ता

# हार्ड डिस्क सीडी रॉम : घर वाली बाहर वाली

# रॅम : कोरा काग़ज़

# सी++ & सी : बड़े मियाँ छोटे मियाँ

# पॉयथन : नागिन

# रूबी : नगीना

**-**

.

.

.

कम्प्यूटर पर हिन्दी - दशा व दिशा?

हिन्दी कम्प्यूटिंग पर एक रपट मैंने व करुणाकर (संयोजक इंडलिनक्स) ने सालेक भर पहले तैयार किया था. पीडीएफ़ फ़ाइल फ़ॉर्मेट में यह रपट गूगल पृष्ठों के सहयोग से आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है. हिन्दी कम्प्यूटिंग के कुछ अनदेखे अनजाने पहलुओं की ओर इंगित करती यह रपट जानकारी पूर्ण है.

यह रपट, जाहिर है, अंग्रेज़ी में है अन्यथा वह इस चिट्ठे पर कब का अवतरित हो जाता. मूलत: इसे अंतर्राष्ट्रीय प्रेक्षकों को ध्यान में रखकर बनाया गया था. यदि कोई बंधु इसका हिन्दी में अनुवाद कर कहीं प्रकाशित करना या अन्य रूप में इस्तेमाल करना चाहें जैसे कि इसे अद्यतन करना, तो इसकी वर्ड फ़ाइल मैं उन्हें भेज सकता हूँ.

हिन्दी कम्प्यूटिंग पर यह जानकारी परक रपट (पीडीएफ़ फ़ाइल से) यहाँ पढ़ें.

**/**

.

.

.
विंडोज़ मशीन पर लिनक्स भी संस्थापित कैसे करें?

उन्मुक्त के चिट्ठे पर जब लिनक्स की खूबी के बारे में चर्चा हुई और जब ईशिक्षक पर चिट्ठा तैयार करने का फ्लैश ट्यूटोरियल देखने को मिला तो विचार आया कि लिनक्स संस्थापित करने के लिए भी एक फ़्लैश ट्यूटोरियल क्यों न तैयार किया जाए?

ऐसा ही एक फ़्लैश ट्यूटोरियल यहाँ पर है जिसे आप अपने विंडोज़ पीसी के अतिरिक्त पार्टीशन पर मॅड्रिवा लिनक्स 2007 संस्थापित करने हेतु काम में ले सकते हैं. मॅड्रिवा लिनक्स छोटे कार्यालय, घरेलू तथा साइबर कैफ़े इत्यादि के लिए बहुत ही अच्छा है चूंकि इसमें मल्टीमीडिया तथा विंडोज पार्टीशन को देखने का समर्थन अंतर्निर्मित है, जबकि फेदोरा या रेडहैट में इसे अलग से संस्थापित करना होता है.

मॅड्रिवा लिनक्स की संस्थापक डीवीडी आप लिनक्स फ़ॉर यू पत्रिका के नवंबर 2006 अंक के साथ प्राप्त कर सकते हैं. यदि आपके शहर में यह अनुपलब्ध हो तो किट्स एंड स्पेयर्स से मंगा सकते हैं. और यदि आपके पास डाउनलोड की सुविधा है तो फिर क्या बात है - मॅड्रिवा सीडी या डीवीडी इमेज डाउनलोड करें आज ही और संस्थापित करें अपने कम्प्यूटर पर मॅड्रिवा लिनक्स 2007 - अत्यंत अधित सुविधाजनक लिनक्स! अंग्रेज़ी का यह आलेख भी आपके लिए सहायक होगा यदि आप अपने कम्प्यूटर पर एक से अधिक ऑपरेटिंग सिस्टम संस्थापित करना चाहते हैं.

लिनक्स मॅड्रिवा 2007 संस्थापित करने के लिए फ़्लैश आधारित ट्यूटोरियल देखने हेतु यहाँ क्लिक करें

.

.

.


ईमेल के जरिए भेजें विशाल, 1 गी.बा. तक की फ़ाइलें!


यूँ तो बहुत सारे औजार व ईमेल / मैसेन्जर प्लगइन्स हैं जिनके जरिए आप (जैसे कि जीमेल के) डिफ़ॉल्ट 10 मेगा बाइट से अधिक आकार की फ़ाइल ईमेल के जरिए भेज सकते हैं, परंतु पांडो विशिष्ट है. यह मुफ़्त है, कार्यकुशल है और नए किस्म का है. यह वेब ईमेल/ ईमेल क्लाएंट तथा मैसेन्जर के प्लगइन के रूप में कार्य करता है तथा बढ़िया कार्य करता है. इसके जरिए आप एक ही बार में 1 गीगा बाइट की एक विशाल फ़ाइल या सैकड़ों फ़ाइलों को ईमेल के जरिए उन खातों को भेज सकते हैं, जो इतनी आकार की फ़ाइलों को स्वीकार करते हैं (जैसे कि जीमेल या आपकी कंपनी का असीमित आकार स्वीकारने वाला ईमेल खाता).

पांडो को काम करते हुए कुछ स्क्रीनशॉट नीचे देखें. पांडो का कार्य बहुत सरल है, व स्वयं व्याख्या करने वाला है. आपको *.pando एक्सटेंशन को खोलने के लिए (पांडो आपके ईमेल संलग्नक को इसी नाम से भेजता है) आपके कंप्यूटर पर पांडो संस्थापित (पांडो सिर्फ 3.5 मेबा का डाउनलोड है) होना आवश्यक है अतः आप जिस ईमेल प्राप्त कर्ता को पांडो के जरिए बड़ी फ़ाइल भेज रहे हैं, उसके पास भी पांडो संस्थापित होना आवश्यक है. अभी यह सिर्फ इंटरनेट एक्सप्लोरर पर कार्य करता है.
.

.

.

चलिए, बयार उलटी बहने तो लगी...

यूँ तो इस तरह की एकाध घटना पहले भी घट चुकी है, परंतु आज यकायक दो संयोग एक साथ हुए.

सुबह-सुबह एक पत्रकार मित्र ने फोन कर बधाई दी कि दिल्ली से निकलने वाले हिन्दी अखबार वीर अर्जुन पर छपा मेरा आलेख उन्हें अच्छा लगा. वीर अर्जुन यहाँ वितरित नहीं होता है, परंतु उन्हें नमून प्रतियां डाक से मिलती हैं. 22 नवम्बर 2006 का अख़बार आज उन्हें मिला था. अख़बार के अंतिम पृष्ठ पर मेरा आलेख छपा था.

मैंने उन्हें बताया कि मैंने वीर अर्जुन को कोई आलेख वालेख नहीं भेजा था और हो सकता है कि आलेख किसी ‘दूसरे' रवि का होगा. तब उन्होंने बताया कि यह आलेख माइक्रोसॉफ़्ट के बहुभाषी कुंजीपट के बारे में है.

अरे! यह आलेख तो मैंने प्रभासाक्षी के लिए लिखा था व उसे अपने चिट्ठे पर प्रकाशित किया था. हो सकता है कि वीर अर्जुन ने उनमें से किसी एक से लिया हो. बहुत संभावना है कि प्रभासाक्षी से लिया हो, चूंकि अपने यूनिकोडित चिट्ठे को वीर अर्जुन का कोई वीर पढ़ता हो, यह तो मुझे नहीं लगता.

दूसरी घटना यह हुई कि मेरे याहू खाते पर नवराही जी का पत्र आया जिसमें उन्होंने नेट पर प्रकाशित रेखा के चित्रों को पंचनाद नामक साहित्यिक पत्रिका में उपयोग हेतु अनुमति मांगी है.

बहरहाल, बयार के उलटी बहने की शुरूआत हो गई लगती है - फुरसतिया जी ने कहा था, लिखें तो छपवाएँ भी, परंतु ये स्वतः छपने लगेंगी यह आशा तो कम ही थी...

चलते चलते कुलप्रीत (अरे वही शून्य वाले) ने बताया कि मोबाइल में हिन्दी लाने वाले टी-9 टी-6 का नया संस्करण निकला है जिसका डेमो यहां पर है

मैंने डेमो देखा और मुँह से बेसाख्ता निकला वाह!

पूरा विवरण शून्य में देखें.

.

.

.

मानव विकास सूचकांक: मृतप्राय भारतीय राजनीति की मुकम्मल तस्वीर...

द संडे इंडियन के 20 - 26 नवंबर के अंक में अरिंदम चौधरी का संपादकीय पठनीय है. अपने संपादकीय में अरिंदम ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा वर्ष 2006 के लिए जारी मानव विकास सूचकांक में भारत की अत्यंत दयनीय स्थिति का वर्णन किया है. भारत की उन्हीं स्थितियों-परिस्थितियों के बारे में इस चिट्ठे पर तो नियमित, व्यंग्यात्मक चर्चा होती ही रहती है जिसके बारे में अरिंदम ने मानव विकास सूचकांक का हवाला देते हुए किया है.

प्रस्तुत है उस संपादकीय के कुछ महत्वपूर्ण अंश:

"...यह रिपोर्ट मूलतः औसत आयु, वयस्क साक्षरता दर, प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में पढ़ने वालों की संख्या और सकल घरेलू उत्पाद के संदर्भ में जीवन स्तर को दर्शाती है और संयुक्त राष्ट्र के ज्यादातर सदस्य देशों के बारे में उपलब्ध आँकड़ों पर आधारित होती है. किसी भी फिक्रमंद भारतीय के लिए इस रिपोर्ट पर एक निगाह डालना बहुत पीड़ादायक होगा, क्योंकि एक सरसरी निगाह में भी विश्व में भारत की दर्दनाक स्थिति साफ नजर आती है...."

"...इस वास्तविकता का आभास होता है कि विश्व की बारहवीं सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था (सकल घरेलू उत्पाद के संदर्भ में) और चौथी सबसे बड़ी (जरा सोचिए) क्रय क्षमता वाला भारत विश्व की उभरती हुई आर्थिक और सैन्य ताकत है, जैसी बड़ी-बड़ी बातें बकवास से ज्यादा कुछ नहीं है. सच्चाई यह है कि हमने जो कुछ भी हासिल किया है उसके दम पर हम यूएनडीपी के ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में 126 वें स्थान पर खड़े हैं.

मुझे इससे शर्मिंदगी नहीं महसूस हुई. लेकिन मुझे घृणा तब हुई जब मैंने देखा कि हमारी हालत नामीबिया, गैबन और मोरक्को से भी गई गुजरी है. ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में इनका दर्जा क्रमशः 125, 124 और 123 वां है. संभवतः हमारे रीढ़विहीन राजनीतिक नेतृत्व को इसी बात में गर्व महसूस होता है कि हम पाकिस्तान और सहारा मरुस्थल से सटे अफ्रीकी देशों से बेहतर स्थिति में हैं...."

"...लेकिन मेरे लिए आघात आना बाकी था. मानव गरीबी के सूचकांक में 102 विकासशील देशों में भारत का स्थान 55 वां है. सहारा मरूस्थल से सटे सबसे गरीब अफ्रीकी देशों में से एक सूडान 54 वें स्थान पर है. जबकि सूडान को विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संगठन कर्ज के बोझ से दबे सबसे गरीब देशों की सूची में रखते हैं. ....... सहारा मरूस्थल से सटा और भारी कर्ज में डूबा एक और गरीब देश रवांडा वयस्क साक्षरता दर के संदर्भ में भारत से बेहतर है. हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं (यदि यह गर्व करने जैसी बात हो) कि भारत में मौजूद पाँच वर्ष तक के सामान्य से कम वज़न के बच्चों का प्रतिशत इथोपिया के बराबर है. डिपार्टमेंट फ़ॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (डीएफआईडी) के मुताबिक अफ्रीका के सबसे गरीब देशों में से एक इथोपिया है, और पृथ्वी पर सबसे गरीब आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा यहीं रहता है. संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक कुल 177 सदस्य देशों में इसका दर्जा 170 वां है. यहाँ की तीन करोड़ से अधिक आबादी प्रतिदिन आधा डालर से कम पर गुजारा करती है और साठ लाख से एक करोड़ तीस लाख आबादी हर साल भुखमरी से जूझती है...."

"...यह वह देश है जहाँ के प्रमुख दैनिक अखबारों में हमें हर दिन केंद्रीय मंत्रियों या किसी न किसी राज्य के मुख्यमंत्री के मुस्कराते हुए पूरे पन्ने के विज्ञापन देखने को मिलते हैं... जिनमें उनकी उपलब्धियों का ब्यौरा छपा होता है... मेरा अनुमान है कि ये राजनेता ज्यादातर मानदंडों पर भारत के, सहारा मरूस्थल से सटे गरीब देशों से नीचे रहने पर मुस्करा रहे होते हैं..."

सही फरमाया अरिंदम आपने. जब भी कहीं कोई नेता मुस्कराता है, दूर कहीं, सैकड़ों गरीब रोते - मरते हैं.

व्यंज़ल

------

(चिट्ठाचर्चा में पूर्व प्रकाशित)

**-**

मैं अगर कभी मुसकाया होऊंगा

अज्ञानता में ऐसा किया होऊंगा


जमाने को पता नहीं है ये बात

मजबूरन ये उम्र जिया होऊंगा


हंसी की क्षणिक रेखा के लिए

जाने कितना तो रोया होऊंगा


वो हासिल हैं ये तो दुरुस्त है

क्या क्या नहीं मैं खोया होऊंगा


कोई तो मुझे बताए कि रवि

मैं यहाँ क्योंकर आया होऊंगा

**-**

.

.

अन्य रचनाएँ

[random][simplepost]

व्यंग्य

[व्यंग्य][random][column1]

विविध

[विविध][random][column1]

हिन्दी

[हिन्दी][random][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][random][column1]

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

[random][column1]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget