टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

January 2006

ये देश मलाईदार!



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सदियों पहले भारत, सोने की चिड़िया कहलाता था. जब वास्को डि गामा, भारत के लिए समुद्री रास्ता ढूंढ कर वापस पुर्तगाल पहुँचा था तो पुर्तगाल में महीनों तक राष्ट्रीय जश्न मनाया गया था- सिर्फ इसलिए कि अमीर-सोने की चिड़िया – भारत - से व्यापार-व्यवसाय का एक नया, आसान रास्ता खुला जिससे पुर्तगालियों का जीवन स्तर ऊँचा उठ जाएगा.

तब से, लगता है, यह जश्न जारी है. पुर्तगालियों के बाद अंग्रेजों ने जश्न मनाए और उसके बाद से मलाईदार विभाग वाले नेता-अफ़सरों द्वारा जश्न मनाए जाने का दौर निरंतर जारी है.

सोने की यह चिड़िया आज लुट-पिट कर भंगार हो चुकी है, परंतु उसमें से भी मलाई चाटने का होड़ जारी है.
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व्यंज़ल
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सभी को चाहिए अनुभाग मलाईदार
कुर्सी टूटी फूटी हो पर हो मलाईदार

अब तो जीवन के बदल गए सब फंडे
कपड़ा चाहे फटा हो खाइए मलाईदार

अपना खाना भले हज़म नहीं होता हो
दूसरी थाली सब को लगती मलाईदार

जारी है सात पुश्तों के मोक्ष का प्रयास
कभी तो मिलेगा कोई विभाग मलाईदार

जब संत बना रवि तो चीज़ें हुईं उलटी
भूखे को भगाते अब स्वागत मलाईदार

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एक माइक्रॉन मुस्कान:
एक बच्चा अपनी माँ को सफ़ाई देता हुआ- “उस लड़के को पलटकर पत्थर मारने के सिवा मेरे पास कोई रास्ता नहीं था माँ, क्योंकि वह भाग रहा था और मुझे अच्छी तरह पता था कि तुम्हें बताने से कोई फ़ायदा नहीं होता क्योंकि तुम्हारा निशाना तो एकदम कच्चा है...”

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कानून को कौन मानता है?



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अगर आपके पास पॉवर है, पैसा है, पोज़ीशन है तो आप बेवकूफ़ कहलाएँगे जो क़ानून को मानेंगे. क़ानून तो आम-आदमी के लिए ही होता है. ग़रीब, दरिद्र, दलित के लिए ही होता है क़ानून. झारखंड किस्से में कार्यपालिका – न्यायपालिका आपस में उलझ ही पड़ी थीं क़ानून के पालन में, और अब ये नया क़िस्सा.

ऐसे किस्से कई हैं. ऐसे ही कुछ प्रकरणों में जब मध्यप्रदेश के ट्रिब्यूनल (प्रशासकीय प्रकरणों के लिए उच्चन्यायालय की एक शाखा) ने तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की सरकार के विरुद्ध दनादन निर्णय दिए गए, तो सरकार ने ट्रिब्यूनल को ही समाप्त कर दिया था.

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व्यंज़ल
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फिर किस लिए ये क़ानून हैं
शायद मेरे लिए ही क़ानून हैं

बने हैं सरे राह मंदिर मस्जिद
जहां चलने के भी क़ानून हैं

खुदा के बन्दों ने छीनी वाणी
बोलने न बोलने के क़ानून हैं

मंज़िल की आस फ़ज़ूल है यहाँ
हर कदम क़ानून ही क़ानून हैं

कैद में है रवि, दोषी स्वतंत्र हैं
कैसा ये देश है कैसे क़ानून हैं
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एक घिसा-पिटा चुटकुला: (हँसना ज़रूरी है)
शिकायत करती हुई प्रेयसी: “तुम बड़े वो हो... जब तुम मेरे सपने में ऐसी हरकतें कर सकते हो तो हक़ीक़त में न जाने क्या करोगे...”
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हिंदी समाचार साप्ताहिक आउटलुक के इस दफ़ा के होली विशेषांक में हास्य-व्यंग्य पर दी गई सामग्री घोर अपठनीय रही. दरअसल, जब आप साहित्य के हास्य-व्यंग्य-सुपर-स्टारों से जबरिया (निवेदन कर) लिखवाएँगे तो यही होगा. विषय-सामग्री, अंदाज़े-बयाँ सब कुछ चुकी हुई, टाइप्ड और पुरानी.

हाँ, पृष्ठ 56-57 पर चुटकुलों का संकलन ज़रूर नया अंदाज लिए हुए था. नेताओं पर मरफ़ी के कुछ नियम यहां भी दिए गए थे जो जोरदार रहे. कुछ नियमों का मुलाहिजा आप भी फ़रमाएँ-
• नेता वह आदमी है जो देश के लिए देश की जनता की जान की बाजी लगा दे.
• नेता ऐसी जगह पुल बनवाने का वादा करता है जहाँ नदी या नहर न हो.
• नेता वह है जो पहले तो क़ानून बनवाता है फिर बाद में क़ानून की नज़रों में धूल झोंकता है.
• 90 प्रतिशत नेता गंदे होते हैं जो शेष 10 प्रतिशत को गंदा कर देते हैं.
• चुनावों में हमेशा दो बुरे नेता में से किसी एक का चुनाव करना होता है.
• नेता वह व्यक्ति है जो कुरसी के लिए देशभक्त भी बन सकता है.
• नेता अपने वादों का पक्का होता है. जो वादा वह आज के चुनावों में कर रहा होता है, वही पाँच साल बाद और उसके और पाँच साल बाद के चुनावों में भी करता है.
• नेता की आत्मा कुरसी में होती है.

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धो डाला




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यह भी ख़ूब रही. एक अध्ययन के अनुसार, वैश्विक प्रदूषण के लिए जिम्मेदार फ़ैक्टरों में हमारे-आपके सिर की रूसी भी शामिल है, और यह जिम्मेदारी आंकड़ों के लिहाज से कम कतई नहीं है. वातावरण को प्रदूषित बनाने वाले कणों में हमारे सिर के रूसी की मात्रा आश्चर्यजनक रूप से 25 प्रतिशत तक हो सकती है.
अभी तक तो हम अपने आसपास के केरोसीन चालित ऑटो-टैम्पो, कारख़ानों तथा टूटी-फ़ूटी धूलभरी सड़कों को ही वातावरण के प्रदूषण के लिए मुख्य रूप से जिम्मेवार मानते चले आए थे. लगता है अब हमें अपनी सोच बदलनी पड़ेगी. धरना-आंदोलनों का स्वरूप बदलना होगा. सामाजिक जागरूकता के नए अभियान चलाने होंगे. रूसी को ख़त्म करने के व्यक्तिगत फ़ायदों के साथ वैश्विक फ़ायदों के बारे में लोगों को बताना होगा. रूसी को धो डालने के लिए एक नई क्रांति की शुरूआत करनी होगी.

पर इसके विरोधी भी शीघ्र प्रकट हो जाएँगे जो इस बात को सिरे से नकार देंगे कि हमारे-आपके सिर की रूसी भी भला वातावरण-प्रदूषण के लिए जिम्मेवार हो सकती है. वे इसे बहुराष्ट्रीय-एंटी-डैण्ड्रफ़ शैम्पुओं-तेलों के उत्पादक कंपनियों द्वारा प्रायोजित अध्ययन करार देंगे और उनके प्रतिष्ठानों पर तमाम तरीकों से हमले की तैयारियाँ करेंगे.
इस मामले में, मेरे जैसे गंजे होते जा रहे लोगों के लिए यह खब़र थोड़ा सुकून दायक हो सकती है. सिर के बालों की रूसी की वजह से हो रहे वैश्विक प्रदूषणों के लिए कम से कम हमें तो जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकेगा.
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पूरा का पूरा मिलावटी...



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क्या आपको पता है कि भारत में जो पेट्रोल या डीज़ल आप अपने वाहनों में डलवा रहे हैं वह पूरा का पूरा मिलावटी है? आउटलुक के ताज़ा अंक में यह खुलासा किया गया है कि पूरे भारत भर में पेट्रोल / डीज़ल में किरोसीन, नेफ़्था तथा डीज़ल आल्टरनेटिव की 40 से 45 प्रतिशत तक मिलावट की जाती है. और इस तरह, भारत और इसकी नादान जनता को प्रतिवर्ष 40,000 करोड़ रुपयों का चूना लगाया जाता है. तमाम जानकारियाँ होने के बावजूद इसे रोकने के लिए कुछ खास नहीं किया जा रहा है. इस रपट की सत्यता में कोई गुंजाइश नहीं है चूंकि इसका भुक्तभोगी मैं स्वयं हूँ.

कुछ समय पूर्व मैंने होंडा एक्टिवा स्कूटर खरीदा थी. फ़ोर स्ट्रोक इंजन युक्त यह स्कूटर मेरे शहर की गड्ढों भरी सड़कों में भी कुछ कम झटका देता है. परंतु पिछले दिनों, खरीदने के तीन महीने पश्चात् ही अचानक मेरा स्कूटर चलते-चलते ही बंद हो गया. जाँच से पता चला कि इंजन का पिस्टन जाम हो गया है. और इस जाम का कारण था मिलावटी पेट्रोल. इस तरह मेरा नया होंडा स्कूटर मिलावट की भेंट चढ़ गया.

ये मिलावटें पता नहीं और क्या क्या भेंटें लेती रहेंगीं?

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व्यंज़ल
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नहीं कयास कहाँ कहाँ हैं मिलावटें
मुस्कराहटों में मिलती हैं मिलावटें

उनकी हकीकतों का हो क्या गुमाँ
चाल में उनने भर ली हैं मिलावटें

कोई और शख़्स था वो मेरा दोस्त
ढूंढे से भी नहीं मिलती हैं मिलावटें

अपना भ्रम अब टूटे तो किस तरह
असल की पहचान बनी हैं मिलावटें


आसान हो गया है रवि का जीवन
अब अपनाई उसने भी हैं मिलावटें

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तमाम देश में दाग...



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भारत के सरकारी तंत्र में फैले भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए एक एजेंसी केंद्रीय सतर्कता आयोग भी है. आयोग की वेब साइट पर दागी अफ़सरों की एक सूची उनके सम्बन्धित विभागों द्वारा कार्यवाही किए जाने के इंतजार में दिसम्बर 04 से टंगी हुई, धूल खा रही है. यह सूची खासी बड़ी है, जिसमें 70 अफ़सरों के विरूद्ध कार्यवाही की अनुशंसा की गई है. यह तो वह सूची है जिसके विरुद्ध सबूत मिलने के पश्चात् कार्यवाही की अनुशंसा की गई है, अत: जाहिर है उस सूची की लम्बाई का अंदाजा लगाया जा सकता है जहाँ सबूतों-साक्ष्यों के लिए जाँच की जा रही होगी.

सच है, दाग धुलने में आसान नहीं होते और कुछ दाग ऐसे होते हैं जो धोए ही नहीं जा सकते...
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व्यंज़ल
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बढ़ती जा रही हैं मुश्किलों पे मुश्किल
इस दौर में बेदाग बने रहना मुश्किल

तमाम परिभाषाएँ बदल गईं इन दिनों
दाग को अब दाग कहना है मुश्किल

गर्व अभिमान की ही तो बातें हैं दाग
जाने क्यों कबीर को हुई थी मुश्किल

दागों को मिटा सकते हैं बड़े दागों से
दाग मिटाना अब कोई नहीं मुश्किल

रवि ने जब लगाए खुद अपने पे दाग
जीना सरल हुआ उसका बड़ा मुश्किल

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कम होती दिलों की दूरियाँ...


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भारत-पाकिस्तान बस सेवा के बहाल होने से एक बार फिर कश्मीर समस्या के हल होने की उम्मीद जगी है और बौखलाए हुए आतंकवादी के कुछ ताज़ा-तेज हमलों के बीच अवाम में फिर से अमन शांति बहाल होने की उम्मीद की जा सकती है.

इस मौक़े पर एक प्रसिद्ध गीत के कुछ भाव याद आ रहे हैं-

काश मेरी दुनिया यूँ होती
कोई देश, राज्य न होता
कोई सीमाएँ नहीं होतीं
कोई धर्म नहीं होता
सर्वत्र प्यार होता
काश मेरी दुनिया यूँ होती...

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बहरहाल, मेरे मुहल्ले का राजू पनवाड़ी चीज़ों को दूसरी दृष्टि से देखता है. उधारी मांगने वालों से पीछा छुड़ाने के लिए उसने अभी-अभी ही यह सूचना चिपकाई है-



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बेशर्मी का तेज बहाव...


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देवास जिले के धाराजी में नर्मदा घाट पर प्रतिवर्ष मेला लगता है जहाँ तांत्रिक अपने मरीजों के साथ आते हैं और उनके भूत भगाने के कर्मकांड करते हैं. इस दफ़ा कुछ हादसा यूँ हुआ कि अचानक ही, अविश्वसनीय तरीके से नर्मदा नदी भरी गरमी में उफनने लगी और देखते देखते वहाँ बाढ़ आ गई. नतीजतन भूत भगाने वाले तांत्रिक भूतों से पहले तो भागे ही, मरीज और श्रद्धालु भी जान बचाने के लिए भागे. भगदड़ में कई घायल हुए और बाढ़ में बहकर सौ से अधिक लोग लापता हो गए, जिनकी डूब कर मरने की आशंका व्यक्त की जा रही है. लाशों के मिलने का सिलसिला जारी है...

और अब, प्रशासनिक अधिकारी अपनी जिम्मेदारी बचाने के लिए भागम-भाग कर रहे हैं. मेलों में भीड़ और आपदा प्रबंधनों की बातें कही जाती है, परंतु कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किए जाते, जिसके कारण ऐसी मौतें होती रहती हैं. कुछ समय पहले ही महाराष्ट्र में एक मेले के दौरान भीड़ में भगदड़ मचने से मौतें हुईं थीं. दरअसल, हर कहीं चलताऊ एटिट्यूड के कारण ऐसी समस्याएँ आती हैं. यहाँ भी प्रशासन का दावा है कि उसने नर्मदा बिजली परियोजना के अधिकारियों को उस क्षेत्र में मेला लगने की सूचना दी थी और बाँध से पानी कम छोड़ने को कहा था. वहीं दूसरी ओर नर्मदा बिजली परियोजना के अधिकारी ऐसी किसी बात से इनकार करते हैं कि उन्हें इसकी पूर्व सूचना दी गई. फलस्वरूप अतिरिक्त पन बिजली उत्पादन के कारण बाँध से अधिक मात्रा में पानी छोड़ा गया और मेला क्षेत्र में बाढ़ आ गई.

बेशर्मी के तेज़ बहाव का जिम्मेदार कौन है? निश्चित ही प्रशासन का बेशर्मी-चलताऊ एटिट्यूड.
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व्यंज़ल
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अंतत: बन ही गया वो बेशरम
नाम कमाने लगा है वो बेशरम

सिंहासन पर बैठ कर त्याग के
सब को प्रवचन देता वो बेशरम

पाँच वर्षों में ढेरों तब्दीलियों के
सब्ज बाग़ दिखाता वो बेशरम

अरसे से टूटा नहीं अमन चैन
किस खयाल में है वो बेशरम

फटे कपड़े पहन रखे हैं रवि ने
नए फैशन में बना वो बेशरम

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कम्प्यूटर – आईटी प्रोफ़ेशनल्स के लिए मरफ़ी के नियम:


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• यदि आपका कोड पहली मर्तबा में ही बिना बग के सही चलता प्रतीत होता है तो इसका मतलब यह है कि आपने कोड में कहीं कुछ अनदेखा किया है.
• जब भी आप कोई प्रोग्राम कोड लिखने जाते हैं, तो पता चलता है कि पहले तो कुछ और किया जाना जरूरी है.
• डाटा खराब होने की दर उनके मूल्यों के सीधे अनुपात में होती है.
• अनुप्रयोग नाम जितना आकर्षक होगा, उतना ही बेकार उसका उपयोग होगा.
• आप किसी सॉफ़्टवेयर को तब तक अच्छा नहीं कह सकते जब तक कि आप उसे आसानी से अपने कम्प्यूटर पर संस्थापित न कर लें तथा उसे उतनी ही आसानी से अपने कम्प्यूटर से अ-संस्थापित न कर लें.
• गुप्त स्रोत कोड ज्यादा विश्वसनीय होते हैं.
• सभी शब्द संसाधक जो एक जैसे काम करते हैं, एक जैसे नहीं होते हैं.
• मुस्कुराएँ... क्योंकि आने वाले कल को चिप्स (कम्प्यूटर) सस्ते होंगे.
• यदि आपका प्रोग्राम सही चल रहा है तो घबराएँ नहीं. यह प्रोग्राम इस अवस्था से शीघ्र ही बाहर आ जाएगा.
• किसी भी दिए गए हार्ड डिस्क में उपलब्ध समस्त जगहों को बेकार के प्रोग्राम शीघ्र ही घेर लेते हैं.
• जो प्रोग्राम आपके पास है, वह निश्चित ही पुराना, अप्रचलित है.
• जो हार्डवेयर आपके पास है, वह निश्चित ही पुराना, अप्रचलित है.
• जब भी कोई प्रोग्राम क्रैश होता है, तो वह सर्वाधिक गंभीर नुकसान पहुँचाता है.
• ऑपरेटिंग सिस्टम का कर्नेल न्यूनतम जगह घेरता है, परंतु अधिकतम समस्या पैदा करता है.
• किसी भी दिए गए प्रोसेसर की प्रोसेसिंग में धीमी गति असहनीय होती है.
• जब तक एक उपयोक्ता किसी कम्प्यूटर प्रोग्राम को सीख पाता है, तब तक प्राय: वह प्रोग्राम पुराना, अप्रचलित हो जाता है.
• जब तक एक प्रोग्रामर किसी कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा को सीख पाता है, तब तक प्राय: वह वह प्रोग्रामिंग भाषा पुरानी, अप्रचलित हो जाती है.
• किसी भी समय, जब कोई सॉफ़्टवेयर प्रदर्शित किया जाता है तो उसके क्रैश होने की संभावना ऑडियंस की संख्या के सीधे अनुपात में होती है.
• इससे पहले कि आपका निर्णायक प्रोग्राम मिल जाए, आपको अपने कम्प्यूटर में ढेर सारे प्रोग्राम संस्थापित करने होते हैं.
• किसी सॉफ़्टवेयर की मदद फ़ाइल का आकार उस सॉफ़्टवेयर की जटिलता के सीधे अनुपात में होती है.
• हर नर्ड (कम्प्यूटर गुरु) अपने भीतर की ख्वाहिश के मुताबिक बग मुक्त प्रोग्राम लिख तो लेता है, परंतु वह प्रोग्राम नहीं चलता.
• प्राय: सभी प्रोग्राम संस्थापित करने में आसान होते हैं बनिस्बत अ-संस्थापित करने के.
• कोई बग तब तक प्रकट नहीं होता जब तक कि वह प्रोग्राम जारी नहीं हो जाता.
• जब आप किसी प्रोग्राम को अ-संस्थापित कर लेते हैं तो उसकी आवश्यकता एक घंटे के भीतर ही महसूस होने लगती है.
• जो प्रोग्राम आपके पास हैं, ये वो नहीं हैं जो आप चाहते हैं.
• जो प्रोग्राम आपके पास हैं, ये वो नहीं हैं जो आपके लिए आवश्यक हैं.
• जो प्रोग्राम आपको आवश्यक हैं, ये वो नहीं हैं जिन्हें आप पा सकते हैं.
• जो प्रोग्राम आप प्राप्त करना चाहते हैं, उनकी क़ीमत आपके हिसाब से बहुत ज्यादा है.
• सर्वाधिक अवांछनीय चीज़ें ही सर्वाधिक निश्चित होती हैं – मृत्यु, टैक्स तथा सिस्टम क्रैश.
• जो हार्ड डिस्क क्रैश होता है, उसमें ही महत्वपूर्ण डाटा होता है.
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व्यंग्य
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हार्दिक बधाई!


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इस बार भी त्यौहार पर आपको इधर उधर से, इनसे-उनसे ढेरों बधाइयाँ प्राप्त हुई होंगी और आपने भी ढेरों बधाइयाँ ढेरों लोगों को दी होंगी. मगर क्या आपने बधाइयों के लेन-देन के तह तक पहुँचने की कभी कोशिश की है? आपने यह जानने की कोशिश की है कि आपको बधाइयाँ दी हैं तो किन लोगों ने और क्यों दी हैं, और आपने भी जो खुले दिल से ढेरों बधाइयाँ बाँटीं हैं, किन-किन को, कैसे-कैसों को, किस-तरह और आख़िर क्यों दी हैं? संभवत: सबसे पहले, समय पर, आवश्यक और अनिवार्य रूप से बधाई आपको उन लोगों से मिली होंगी जिन्हें आपसे कुछ लेना होगा. अब वह चाहे दीवाली की बख्शीश हो, कोई उपकार हो या आपका पुराना उधार. आपको पहले पहल जिनसे बधाई मिली होगी, उनमें आपके ऑफ़िस का चापलूस कामचोर कर्मचारी, आपको उधार किराना सप्लाई करने वाला दुकानदार इत्यादि तो शामिल होंगे ही, आपके वे मित्र भी शामिल हो सकते हैं जिनसे अरसा पहले आपने कभी कुछ उधार लिया हुआ होगा. और उधार में शामिल हो सकते हैं सभी कुछ – किताबें, मर्तबान से लेकर बुलवर्कर तक. और, इनकी पहले पहल, आप तक पहुँचने वाली बधाइयाँ शर्तिया आपको उनका उधार चुकाने या बख्शीश थमाने या अगले साल भर तक उनकी कामचोरी को बर्दाश्त करने की याद दिलाई ही होंगी. इसी तरह, अनिवार्यत: कुछ पहले पहल बधाइयाँ आपको अपने मातहतों से मजबूरीवश प्राप्त हुई होंगी जो चाहते तो हैं आपका बेड़ा गर्क करना परंतु जुबान से तमाम ब्रम्हाण्ड की शुभकामनाएँ देते हैं.

कुछ उन लोगों ने भी इस दफ़ा आपको बधाई दी होगी जिन्होंने जिन्दगी में इससे पहले कभी आपको बधाई दी नहीं होगी और जिनका आइन्दा ऐसा कोई इरादा भी नहीं होगा. ये वो लोग होंगे जिनका काम आपसे हाल ही में पड़ा होगा या पड़ने वाला होगा और जिनका काम आपके कारण पार लगा होगा या लगने वाला होगा. ऊपर से तारीफ की बात यह होगी की ऐसी बधाइयाँ आपको अन्यों या अन्य किसी भी प्रकार की बधाई से ज्यादा आत्मीय ढंग से मिली होंगी. कुछेक बधाइयाँ आपको जवाब में इसलिए मिली होंगी चूंकि आपने पहले ही उन्हें बधाई जो दे दी है. कुछ बधाइयाँ, आपसे बधाइयाँ प्राप्त करने की प्रत्याशा में भी आपको मिली होंगी और कुछ बधाइयाँ अकारण आपको मिली होंगी – जैसे कि किसी समूह में आप बैठे हों तो किसी अन्य का परिचित शिष्टाचारवश अकारण सभी को बधाई देता ही है या आपके घर के किसी सदस्य के नाम आए बधाई कार्ड में भी शिष्टाचारवश, अकारण, आपका भी नाम उसमें घसीटा हुआ होता है.

कुछ सस्ती तो कुछ मंहगी बधाइयाँ भी आपको मिली होंगी. जो आपके खास होंगे, या इसका उलटा – आप जिनके खास होंगे उनसे आपको खासे मंहगे बधाई (कार्ड) मिले होंगे. खासकर उनसे जो अपना खास-पना खासी मोटी इबारत में बताना चाहते हैं. कुछ बधाइयाँ आपको ऐसी भी मिली होंगी, जो थोक के भाव में खरीदे या छपाए गए बधाई कार्डों में से अपरिचितों – परिचितों को भेज चुकने के बाद भी बच जाते हैं और फिर आपका नाम भी शामिल हो जाता है – चलो इनको भी भेज देते हैं, कार्ड क्यों खराब हों – की तर्ज पर.

कुछ एक्सक्लूसिव क़िस्म की बधाइयाँ आपको अपने पसंदीदा टीवी चैनलों या पत्र-पत्रिकाओं से मिली होंगी जिन्हें आप देखते-पढ़ते हैं, क्योंकि ये सिर्फ और सिर्फ अपने ही दर्शकों-पाठकों-अभिकर्ताओं को बधाई देते हैं. कुछ आम माफ़ी की तरह की आम बधाइयाँ आपको नेताओं-अभिनेताओं-मंत्रियों से मिली होंगी जो हर संभव तरीक़े से अपने प्रचार प्रसार के लिए अपनी आम बधाई आप तक पहुँचाने के लिए कटिबद्ध रहते हैं – हर मौक़े पर.

यूं, आपके हिस्से की हार्दिक बधाई आप तक विभिन्न रास्तों से पहुँची होगी. इंटरनेट के ई-कार्ड से लेकर ईमेल तक तथा पत्र-पोस्टकार्ड से लेकर फैक्स-फोन तक. परन्तु बधाई कार्ड से बधाई देने-लेने का तरीका आजकल इतना आम हो गया है कि बहुत संभव है कि न सिर्फ आपके पड़ोसियों ने बधाई कार्ड द्वारा आपको बधाई दी हो, बल्कि घर के सदस्यों ने भी यही रास्ता अपनाया हो आपको बधाई देने का.

आपको मिलने वाली बधाइयों का लेखा-जोखा तो आपने कर लिया, परन्तु जो हार्दिक बधाइयाँ आपने औरों को दी हैं, उनके बारे में क्या रेकॉर्ड हैं आपके पास?

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आसमां से आया कोहनूर हीरा...



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आज सुबह अचानक मौसम बदला और थोड़ी बूंदा बांदी हुई तो पेड़ पौधे भी मदमस्त होकर झूमने लगे. एक पौधे को तो यह बूंदा-बांदी इतनी अधिक भाई की उसने अपने रंगीन पत्तों में बूंदों की इन कणों को सहेज-समेट कर रख लिया. एक पत्ते पर जल की बूंदें एकत्र होकर ऐसा आभास पैदा कर रही थीं, मानो आसमां से दैदीप्यमान, अनमोल, कोहनूर हीरा उसके हाथों में आ टपक पड़ा हो.
(पूरे आकार में चित्र यहाँ मौज़ूद है)

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आशा ही जीवन है



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कहानी
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“तुम्हारे रतलाम के डॉक्टर डॉक्टर हैं या घसियारे?” एमवाय हॉस्पिटल इन्दौर के हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. अनिल भराणी ने मरीज को पहली ही नज़र में देखते हुए गुस्से से कहा. इकोकॉर्डियोग्राफ़ी तथा कलर डॉपलर स्टडी के ऊपरांत डॉ. भराणी का गुस्सा और उबाल पर था - “ये बेचारा हृदय की जन्मजात् बीमारी की वज़ह से नीला पड़ चुका है और वहाँ के डाक्टर इसे केजुअली लेते रहे. कंजनाइटल डिसीज़ में जितनी जल्दी इलाज हो, खासकर हृदय के मामले में, उतना ही अच्छा होता है.”. उसने मरीज की ओर उंगली उठाकर मरीज के परिजनों पर अपना गुस्सा जारी रखा – “अब तो इसकी उम्र पैंतीस वर्ष हो चुकी है, सर्जिकल करेक्शन का केस था, अब समस्या तो काफी गंभीर हो चुकी है. मगर फिर भी मैं इसे अपोलो हॉस्पिटल चेन्नई रेफर कर देता हूँ. लेट्स होप फॉर सम मिरेकल.”

मरीज और उसके घर वालों को यह तो पता था कि वह सामान्य लोगों से थोड़ा कमजोर है, परन्तु अब तक उसे खांसी सर्दी के अलावा कभी कोई स्वास्थ्य संबंधी परेशानी नहीं हुई थी. डॉक्टरों ने भी कभी कोई ऐसी वैसी बात नहीं बताई थी. वह तो जाने कैसा मलेरिया का आक्रमण पिछले दिनों हो गया था जिसके कारण इलाज के बावजूद मरीज चलने फिरने में भी नाकाम हो रहा था, और तब इलाज कर रहे डॉक्टर को कुछ शक हुआ और फिर उसने इन्दौर के हृदयरोग विशेषज्ञ को दिखाने की सलाह दी थी.

अपोलो हॉस्पिटल चेन्नई में मरीज के हृदय का एंजियोग्राम किया गया. पता चला कि उसका हृदय छाती में बाएँ बाजू के बजाए दाएँ तरफ स्थित है, और इस वजह से ढेरों अन्य कॉम्प्लीकेशन्स भी भीतर मौजूद हैं. उसके – हृदय में बड़ा सा छेद है, उसकी धमनी और शिराएँ आपस में बदली हुई हैं, पल्मनरी वॉल्व केल्सिफ़ाइड है, ऑरोटा कहीं और से निकल रहा है, कोरोनरी आर्टरी (शिरा जो हृदय को धड़कने के लिए खून पहुँचाती है) एक ही है (सामान्य केस में दो होती हैं), पल्मोनरी हायपरटेंशन है... इत्यादि.

दरअसल, इतने सारे कॉम्प्लीकेशन्स के कारण मरीज के हृदय तथा शरीर में खून का बहाव ग्रोइंग एज में तो जैसे तैसे कम्पनसेट हो रहा था, परंतु उम्र बढ़ने के साथ गंभीर समस्याएँ पैदा कर रहा था.

अपोलो हॉस्पिटल के हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. के. सुब्रमण्यम ने पहले तो मरीज के हृदय की सर्जरी के लिए सुझाव दिया, परंतु हृदय-शल्य चिकित्सक डॉ. एम. आर. गिरिनाथ से कंसल्ट करने के उपरांत अपनी मेडिकल एडवाइस में मरीज के लिए यह लिखा-



“चूंकि मरीज के हृदय की करेक्टिव सर्जरी में सर्जरी के दौरान तथा उसके उपराँत मृत्यु की संभावना अत्यधिक है, अत: मरीज को दवाइयों पर निर्भर रहने की सलाह दी जाती है.”

और उन्होंने जो दवाई लिखी वह थी – 0.25 मिलीग्राम अल्प्राजोलॉम – एक अत्यधिक ए़डिक्टिव, नशीली दवाई जो डिप्रेसन, अवसाद को तथाकथित रूप से खत्म करती है – और जिसका हृदय रोग के इलाज से कोई लेना देना नहीं है.

डॉ. गिरीनाथ ने मरीज को आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) के हृदय-शल्य चिकित्सक डॉक्टर के. एस. अय्यर को रेफर कर दिया चूँकि वे कंजनाइटल कार्डियाक डिसीज़ के करेक्टिव सर्जरी के विशेषज्ञ थे.

एम्स में एक बार फिर से मरीज का एन्जियोग्राम किया गया. जहाँ प्राइवेट अपोलो हस्पताल में 16 हजार रूपए में तीन दिन में एन्जियोग्राम किया जाकर उसकी रपट मिल गई थी, सरकारी एम्स में एन्जियोग्राम के लिए तीन महीने बाद का समय दिया गया, एन्जियोग्राम के तीन महीने पहले तय समय के आठ दिन पश्चात् एन्जियोग्राम किया गया और उसके भी सात दिन बाद रपट दी गई. एन्जियोग्राम के लिए सरकारी कंशेसन युक्त फीस के 7 हजार रुपए लिए गए, परंतु दो बार की दिल्ली की सैर और 20 दिन वहाँ रूकने के फलस्वरूप 20 हजार और खर्च हो गए.

एन्जियोग्राम की स्टडी – एम्स के हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. के. के. तलवार तथा डॉ. कोठारी द्वारा किया गया और हृदय-शल्य चिकित्सक डॉ. के. एस. अय्यर से कंसल्ट के उपरांत उन्होंने वही कहानी दोहरा दी – ऐसे केसेस में सर्जरी ही एकमात्र विकल्प है, परंतु चूंकि सर्जरी में खतरा बहुत है अत: मरीज को दवाइयों पर जिंदा रहना होगा. इस बार डॉक्टर कोठारी ने दवाई लिखी - फेसोविट – एक आयरन टॉनिक.

मरीज के पास दिन गिनने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. दिन – ब – दिन उसकी स्थिति खराब हो रही थी, और तब जब उसे महसूस हो रहा था कि मौत नित्य प्रति, आहिस्ता – आहिस्ता उसके करीब आ रही है. रोज रात्रि को वह सोचता सुबह होगी या नहीं और सुबह सोचता कि दिन कैसे शीघ्र बीते.

पर, मरीज ने आशा नहीं छोड़ी. जीवन के प्रति अपनी आशा को उसने बरकरार रखा. स्टीफ़न हॉकिंस जैसे उदाहरण उसके सामने थे. इस बीच मरीज ने मुम्बई, पुट्टपर्ती इत्यादि के कई उच्च सुविधायुक्त हृदयरोग संस्थानों की दौड़ लगाई. किसी ने सलाह दी कि वेल्लोर का हृदयरोग संस्थान भी अच्छा है – वहाँ दिखाओ. मरीज वहाँ दिखाने तो नहीं गया, हाँ, अपनी रपट की एक प्रति उसने वेल्लोर के हृदयरोग संस्थान में भेज दी.

इस बीच मरीज के तमाम चाहने वाले मिलते. वे अपने-अपने तरीके से टोने-टोटके, जादू टोना, आयुर्वेद, होम्योपैथ, नेचुरोपैथी, लौकी (घिया) पैथी, रेकी, सहजयोग इत्यादि तमाम तरह के इलाज बताते. मरीज जैसे तैसे इन सबसे बचता रहा. उसे पता था, टूटी हड्डी का सही इलाज उसके जुड़ने पर ही है.

अचानक एक दिन उसके पास मद्रास मेडिकल मिशन के हृदय-शल्य चिकित्सक डॉ. के.एम.चेरियन का पत्र आया. उसमें लिखा था कि वेल्लोर के हृदय-रोग संस्थान से अग्रेषित पत्र उनके पास आया है, और मरीज की मेडिकल जाँच रपट के आधार पर सर्जरी के द्वारा कुछ सुधार की संभावनाएँ हैं.

मगर, चूँकि कई मानी हुई संस्थाओं के शीर्ष स्तर के हृदय-रोग विशेषज्ञों और हृदय-शल्य चिकित्सकों द्वारा मरीज के शल्य चिकित्सा में अत्यधिक खतरे की बात पहले ही की गई थी, अत: मरीज का समूचा परिवार किसी भी प्रकार की सर्जरी के विरोध में था.

परंतु मरीज के जीवन के लिए यह चिट्ठी आशा की किरण थी. उसे पता था कि तिल तिल मौत का इंतजार करने की बजाए ऑपरेशन टेबल पर मृत्यु ज्यादा सहज, आसान और पीड़ा रहित होगी. फिर, उसे आशा की एक छीण सी किरण भी तो दिखाई दे ही रही थी. उसने उस किरण के सहारे अपनी जीवन यात्रा तय करने का निश्चय किया.

अंतत: मरीज के हृदय की छह घंटों की कॉम्प्लीकेटेड शल्य क्रिया सम्पन्न हुई, जिसमें उसके हृदय के छेदों (एएसडी तथा वीएसडी) को बन्द किया गया, आरोटिक होमोग्राफ्ट के द्वारा हृदय तथा फेफड़ों के बीच एक कन्ड्यूइट लगाया गया. डॉ. चेरियन द्वारा की गई यह शल्य क्रिया तो सफल रही, परंतु इस दौरान हुए हार्ट ब्लॉक के कारण बाद में उसके हृदय में स्थायी पेस मेकर भी लगाया गया जो आज भी प्रति-पल बिजली के झटके देकर मरीज के हृदय को स्पंदन प्रदान करता है. चालीस दिनों (बीस दिनों तक आईसीसीयू की अवधि सम्मिलित) तक हृदयरोग संस्थान में भर्ती रहने के दौरान उतार चढ़ाव के कई क्षण ऐसे आए जिसमें मरीज की नैया कभी भी आर या पार हो सकती थी.

ऑपरेशन के पश्चात् एक दिन मरीज की हालत बहुत नाज़ुक थी. उसका हृदय धड़कने के बजाए सिर्फ वाइब्रेट कर रहा था, वह भी 200-300 प्रतिमिनट. दवाइयाँ भी असर नहीं कर रही थीं. बात डॉ. चेरियन तक पहुँचाई गई.

डॉ. चेरियन तत्काल मरीज के पास पहुँचे. मरीज से डॉ. चेरियन ने पूछा – “हाऊ आर यू?” मरीज के तमाम शरीर पर आधुनिक मशीनों, मॉनीटरों और दवाइयों-सीरमों के तार और इंजेक्शनों के पाइप लगे हुए थे.
“वेरी बैड” - मरीज ने ऑक्सीजन मॉस्क के भीतर से अपनी टूटती साँसों के बीच, इशारों में कहा.

डॉ. चेरियन ने मरीज के पैरों को ओढ़ाई गई चादर एक तरफ खींच फेंकी और मरीज के पैरों को अपने हाथों में लेकर सहलाया. मानों वे मरीज में जीवनी शक्ति भर रहे हों, उसमें जीवन के लिए एक नई आशा का संचार पैदा कर रहे हों. चेन्नई के माने हुए हृदय शल्य चिकित्सक, पद्मश्री डॉ. के. एम. चेरियन की यह एक और नायाब चिकित्सा थी.

दूसरे दिन से ही मरीज में चमत्कारी सुधार आया. दसवें दिन उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई.

शल्य चिकित्सा के दस साल बाद आज भी उस मरीज की जीवन के प्रति आशा भरपूर है. उसे पता है कि आशा में ही जीवन है.

(कहानी के सारे पात्र व घटनाएँ वास्तविक हैं. मरीज, इन पंक्तियों का लेखक है :)

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ग़ज़ल
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आशा में जीवन है
आशा ही जीवन है

गर्द गुबार में भी
आशा से जीवन है

धर्मान्धों का कैसा
आशा का जीवन है

हालात चाहे न हों
आशा ही जीवन है

जी रहा रवि अभी
आशा का जीवन है
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हिंग्लिश?



गनीमत है कि अब मास कम्यूनिकेशन मीडिया को अक्ल आने लगी है. तभी तो वे अँग्रेज़ी को हिन्दी में चने के भाव में बेच रहे हैं –



और हिन्दी, अब अंग्रेज़ी से चार कदम आगे चलने की सोचने लगी है –




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आम आदमी की टिप्पणी...




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ऊपर के दो ख़बरों पर लक्ष्मण के आम आदमी की टिप्पणी:
“मुम्बई में डांस बारों के बन्द होने के प्रतिफल जरा जल्दी ही आने लगे हैं...”

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इंटरनेट के फ़िशिंग जाल में फँसने से बचें!



( प्रभासाक्षी में पूर्व प्रकाशित )

किसी ने सच कहा है कि 20वीं शती के मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में थोड़ा सा विस्तार होगा और परिवर्तित रूप में ये आवश्यकताएँ होंगीं - रोटी, कपड़ा, मकान और इंटरनेट. कम से कम यह तो कहा ही जा सकता है कि 20 वीं शती में धोखाधड़ी करने वालों के लिए इंटरनेट एक मूलभूत आवश्यकता होगी. और क्यों न हो, इंटरनेट के उपयोक्ता आधार में नित्य प्रति खासी बढ़ोत्तरी हो रही है जो इंटरनेट को अपने व्यावसायिक सौदों के लिए अपना रहे हैं. इसके साथ ही व्यावसायिक धोखाधड़ी, जालसाजी और घोटालों के द्वारा मासूम उपयोक्ताओं के ठगे जाने के खतरे भी उसी रफ़्तार से बढ़ रहे हैं. इंटरनेट और कम्प्यूटरों पर सुरक्षा प्रदान करने वाली कंपनी साइमनटेक द्वारा अप्रैल 05 में जारी इंटरनेट-सुरक्षा-खतरा-रपट पर अगर विश्वास करें तो हमें चौंकाने वाले आंकड़े दिखाई देते हैं. रपट के अनुसार मई 2003 से लेकर मई 2004 तक अकेले अमरीका में ही फिशिंग जालसाजी के जरिए 120 करोड़ डॉलर रुपयों का चूना लगाया गया. भारत में यह रकम अगर कम है, तो सिर्फ इसलिए कि यहाँ इंटरनेट बैंकिंग उपयोग अभी शैशवावस्था में है, और जैसे ही इसमें तेज़ी आएगी, प्रतिशत के हिसाब से आंकड़े ज्यादा ही रहेंगे. यही नहीं, पिछले साल दिसम्बर 04 के अंत तक स्थिति यह हो गई थी कि सिर्फ साइमनटेक द्वारा ही प्रति-सप्ताह 3.3 करोड़ फिशिंग जालसाजी के प्रयासों को रोका जा रहा था. जबकि मैदान में सुरक्षा के लिए ऐसी और भी कई कंपनियाँ हैं. मोबाइल और सेलफ़ोनों में इंटरनेट की सुविधा आ जाने से ऐसे जालसाजी प्रकरणों में जबरदस्त वृद्धि की आशंका है.

आपके ईमेल बक्से में प्रतिदिन कई अनचाहे ईमेल जाने कहाँ-कहाँ से पहुँच जाते हैं जो आपके लिए तमाम तरह के प्रस्ताव लेकर आते हैं. इनमें से कई ऐसे होते हैं जो आपको विशाल धनराशि प्राप्त करने का लालच देते हैं यदि आप उनके सुझाए रास्ते पर चलें. इनमें से प्राय: सभी विपणन के उनके तरीके होते हैं और इनमें से कुछ एक आपको सीधे ही जालसाजी के जरिए फाँसने के प्रयास होते हैं. आजकल इंटरनेट उपयोक्ताओं के पास ऐसे ईमेल की बाढ़ आई हुई है जिसमें किसी महिला या पुरुष द्वारा ईमेल प्राप्तकर्ता से लाखों करोड़ों डालर / यूरो को इधर से उधर करने में मदद माँगी जाती है, जो कि उनके अनुसार बड़ा आसान सा काम होता है और इस सेवा के बदले बहुत बड़ी धनराशि देने का वादा किया जाता है. बहुतों को यह पता होता है कि यह जालसाजी है और केवल फाँसने के जाल हैं, परंतु फिर भी कुछ मासूम उपयोक्ता ऐसे जालों में फँस ही जाते हैं, जिन्हें ऐसी जालसाजी के बारे में पहले से पता नहीं होता है, और इस तरह से वे न सिर्फ अपनी गाढ़ी कमाई से हाथ धो बैठते हैं, बल्कि अपनी मानसिक शांति भी गंवा बैठते हैं.
परंतु आप तब क्या करेंगे जब आपको कोई ईमेल मिलेगा जो बिलकुल आपके क्रेडिट कार्ड बैंकर से आया, असली प्रतीत होगा जो जिसमें किसी अत्यंत आवश्यक बहाने से आपके क्रेडिट कार्ड क्रमांक तथा ऐसे ही अन्य जानकारियों को मांगा गया होगा? अगर आप अपने आपको बुद्धिमान समझते हैं तो ऐसे ईमेल को तुरंत मिटा देंगे या फ़िर फोन इत्यादि से सम्पर्क कर वस्तुस्थिति जान लेंगे, परंतु यदि आप जल्दी में इस बात को पहचान नहीं पाए, और गलती से अपने क्रेडिट कार्ड के क्रमांक तथा अन्य जानकारियाँ दे देते हैं, तो पता चलता है कि इंटरनेट के फ़िशिंग जाल के जरिए आपको फाँस लिया गया है और इसके कुछ घंटों पश्चात् ही आपके क्रेडिट कार्ड से भुगतान ले लिया गया है. अगर आपके साथ ऐसा हो चुका हैं, तो आप ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं हैं. लाखों क्रेडिट कार्ड धारकों को ऐसे फ़िंशिग जालसाजी के जरिए निशाना बनाया जा चुका है. और अगर आपके साथ ऐसा नहीं हुआ है तो आप अपने आप को भाग्य शाली समझें और आगे के लिए होशियार रहें.

इस तरह के प्रकरण आश्चर्य जनक रूप से बढ़ रहे हैं. स्थिति यह है कि किसी भी दिए गए समय में एन्टीफ़िशिंग.ऑर्ग संस्था जो ऐसे फ़िशिंग जालसाजी का भंडाफोड़ करने में लगी हुई है, 20 से अधिक ऐसे बड़े प्रकरणों की में जाँच में लगी हुई होती है जो सैकड़ों विशालकाय व्यवसायिक संस्थाओं तथा लाखों मासूम इंटरनेट उपयोक्ताओं को फ़ांसने में लगे हुए होते हैं. यदि आपके मेल-बक्से में ऐसा कोई फ़िशिंग प्रस्ताव अब तक नहीं आया है तो आप अपने आपको भाग्यशाली समझें. परंतु यह स्थिति बहुत देर तक टिकने वाली नहीं है. एक न एक दिन यह दीवार टूटेगी ही, और इससे पहले कि आप उनके जाल में फंस जाएँ, अपने आपको ऐसे मामलों में सुशिक्षित बना कर सुरक्षित बना लें.

फ़िशिंग के लिए वे अपना जाल कैसे फेंकते हैं :

हालाकि फ़िशिंग स्कैम के कई तौर तरीके हैं, परंतु प्राय: दो तरीके आमतौर पर अपनाए जाते हैं. एक तो नाइजीरियन क़िस्म की जालसाजी होती है जिसमें एक बड़ी विशाल धनराशि में से कुछ हिस्सा प्राप्त करने के बदले उसे ठिकाने लगाने में मदद मांगी जाती है. इसी क़िस्म में ही कुछ लोगों को यह लालच देकर फाँसने की कोशिश की जाती है कि उनके ईमेल पता को टिकट नम्बर देकर एक लॉटरी का बड़ा ड्रा निकाला गया और, जाहिर है उन्हें कोई बड़ा पुरस्कार मिला है. अपने दावे सही ठहराने के लिए जालसाज बड़े ही ठोस और सही प्रतीत होते कारण तो देते ही हैं, ताना बाना भी ऐसा बुनते हैं जिससे कि वे असली प्रतीत होते हैं. उदाहरण के लिए लॉटरी के प्रायोजक के रूप में वे विश्व के सबसे बड़े धनवान बिल गेट्स का नाम लेना नहीं चूकते तथा वे यह भी बताना नहीं चूकते कि यह लॉटरी इंटरनेट को लोकप्रिय बनाने तथा और भी अधिक विस्तारित करने की योजना के तहत निकाली जा रही है. चूंकि मिलने वाली यह राशि बहुत अधिक, अकल्पनीय प्रतीत होती है, अत: अबोध लोग इनमें फंस जाते हैं. एक बार अगर आप इनके जाल में फंस गए, तो वे आपसे प्रोसेसिंग फ़ीस, आयकर इत्यादि खर्चों के रूप में लाखों रूपए हड़प लेते हैं, और आपको कुछ भी नहीं मिलता. ऐसे प्रकरणों की पुलिस रपट प्राय: नहीं हो पाती तथा चूँकि यह अंतर्राष्ट्रीय जालसाजी होती है, अत: भिन्न -भिन्न देशों के भिन्न-भिन्न क़ानूनों के कारण प्राय: अपराधियों को पकड़ पाना मुश्किल ही होता है.

दूसरे तरह की जालसाजी को पकड़ पाना तो और भी जटिल है. आपके ईमेल पता पर ऑनलाइन व्यावसायिक खातों जैसे कि पे-पाल, ई-बे या सिटीबैंक जैसी क्रेडिट कार्ड संस्थाओं जिसके आप सदस्य होते हैं, उनके जैसे एचटीएमएल वेब पृष्ठ का स्वरूप बनाकर आपको ईमेल किया जाता है कि किन्हीं आवश्यक कारणों से आपको अपने खाते का क्रमांक, पासवर्ड इत्यादि नए सिरे से प्रामाणित करना होगा. आपको अंदाज़ा नहीं होता कि आप जिसे असली ऑनलाइन व्यावसायिक संस्था से आया ईमेल समझ रहे हैं, वह वास्तव में नक़ली है और आपकी पहचान चोरी करने के लिए हूबहू असली जैसी बनाई गई है. जैसे ही आप उनके द्वारा चाही गई जानकारी देते हैं, वे आपका माल लेकर चंपत हो जाते हैं, अपनी वेब साइट को बन्द कर इंटरनेट से गायब हो जाते हैं. आइए देखें कि आखिर ये जालसाज अपना काम कैसे अंजाम देते हैं?

फ़िशिंग कैसे करते हैं ये जालसाज?

फ़िशिंग (इसे कार्डिंग या ब्रांड स्पूफ़िंग भी कहा जाता है) जालसाज सफल व्यावसायिक ऑनलाइन सेवा संस्थाओं/बैंकिंग/क्रेडिटकार्ड/ई-शॉप इत्यादि को लक्ष्य बनाते हैं जिनके कि विशाल उपयोक्ता आधार होते हैं. जैसे कि सिटी बैंक, पे-पाल या ई-बे. इसके पश्चात् वे असुरक्षित रूप से चल रहे वेब सर्वरों पर कब्जा जमाते हैं जो आमतौर पर एशिया या पश्चिम यूरोपीय देशों में स्थापित होते हैं. अब वे एचटीएमएल में अपना ईमेल संदेश बनाते हैं जो जालसाजों का बहुत सा काम करता है. वे अपने एचटीएमएल संदेश को असली लगने के लिए उसमें असली व्यावसायिक संस्था की प्राय: हर चीज का इस्तेमाल करते हैं, उनके लोगो, चिह्न, कड़ियाँ, वेब-पते, रंग विन्यास, फ़ॉन्ट इत्यादि सब कुछ. यह ईमेल उपयोक्ता को यह स्पष्ट करता है कि कुछ अति आवश्यक कारणों यथा शासकीय आवश्यकता, सर्वर असफलता, मेंटेनेंस कार्य या सुरक्षा जाँच इत्यादि की वजह से उन्हें अपने खातों के बारे में दिए गए फ़ॉर्म में विवरण भरना आवश्यक होगा. यह फ़ॉर्म आपके विवरणों को सीधे जालसाजों तक पहुँचा देगा. अपने एचटीएमएल संदेशों को वे पहले से वॉर्म/ट्रोजन क़िस्म के वायरसों या अन्य तरह से एकत्र किए लाखों ईमेल पतों पर एक साथ ही भेजते हैं. हालांकि आजकल उपयोक्ता समझदार हो रहे हैं और ऐसे ईमेल को स्पैम रूप में ट्रैप करने के साधन भी इस्तेमाल में लिए जा रहे हैं, मगर फिर भी कुछ उपयोक्ता इनके जाल में फंस ही जाते हैं, और जालसाज अपना फायदा निकाल ही लेते हैं. इससे उपयोक्ता को तो वित्तीय नुकसान तो होता ही है, ज्यादा बड़ा नुकसान तो वित्तीय/व्यावसायिक संस्थाओं को होता है जिनकी इंटरनेट-सुरक्षा की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ जाती है. यही कारण है कि कोई भी बड़ी संस्था इस तरह की जालसाजी के फलस्वरूप हुए नुकसान को खुले रूप में स्वीकारने में कतराती है और इस सम्बन्ध में अपने आंकड़े भी सार्वजनिक नहीं करती.

जालसाजी को कैसे पहचानें

ये जालसाज बड़े ही चालाक होते हैं. ये दूसरे के कंधे पर बंदूकें चलाते हैं. आमतौर पर ये अपने ऑनलाइन क्रियाकलाप दूसरों के कम्प्यूटरों से चलाते हैं, जिनमें सुरक्षा खामियों के चलते वे अपना कब्जा जमा लेते हैं. अपना काम वे औसतन 5-7 दिनों में कर लेते हैं, फिर वे उस कम्प्यूटर से अपना माल-असबाब-निशान इत्यादि सब कुछ मिटा कर दफा हो जाते हैं. इन्हीं वजहों से इन्हें पकड़ पाना असंभव भले न हो परंतु खासा मुश्किल होता है. जिस दूसरे कम्प्यूटर से ये अपना क्रियाकलाप चलाते हैं, बेचारे उसके मालिक को तो हवा ही नहीं रहती कि उसके कम्प्यूटर से क्या गुल खिलाया जा चुका है. किसी फ़िशिंग हमले के प्रथम घटना के प्रकाश में आने के 24 से 48 घंटे के भीतर ही हालाकि उस कम्प्यूटर का पता लगाया जा सकता है जहाँ से फिशिंग गतिविधियाँ चलीं, मगर फिर उसका कोई फ़ायदा इस लिए नहीं होता चूंकि अपराधी तो अपना बोरिया बिस्तरा कहीं और के लिए पहले ही बाँध चुका होता है. जालसाजी के द्वारा कमाए गए पैसे को जालसाज पहले किसी अस्थाई खाते पर रखता है फिर उसे किसी सुरक्षित स्थान पर इलेक्ट्राँनिकी तरीके से ट्रांसफर कर देता है जिसका पता लगाना और भी मुश्किल हो जाता है.

वैसे, अगर थोड़ी सावधानी बरती जाए तो फिशिंग जाल में फंसने से पहले ही उनका पता लगाया जा सकता है. किसी ईमेल संदेश को सूक्ष्मता से देखें तो इसे ओरिजन यानी मूल स्थान का पता लग सकता है. हालाकि ईमेल प्रेषक के पते भी नकली हो सकते हैं, यानी असली दिखते पते परंतु उन्हें चुरा लिया गया हो. आपके इंटरनेट व्यवसाय/क्रेडिट कार्ड इत्यादि के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए जब ईमेल संदेश इस प्रकार से आएँ तो आप समझ लीजिए कि दाल में कुछ काला है - “कंपनी अपनी सुरक्षा में बढ़ोत्तरी कर रही है जिससे कि संभावित जालसाजियों को रोका जा सके अत: इस कारण आपको अपनी खाता से सम्बन्धित जानकारी इस लिंक पर दिए फ़ॉर्म पर भरनी होगी ताकि आपका खाता फिर से सक्रिय किया जा सके” या फिर ऐसा कुछ “ बैंक अपने रेकॉर्ड अपडेट कर रहा है तथा उसे सही रेकॉर्ड के लिए आपके एटीएम कार्ड संख्या की आवश्यकता ईमेल के जरिए जाँच के लिए है.” या कुछ ऐसे संदेश – “आपके ई-बे खाता पर निम्न आईपी पता के जरिए पहुँचने का प्रयास किया गया. बहुत संभव है कि यह प्रयास आपके द्वारा यात्रा में रहने के दौरान किया गया हो, परंतु फिर भी इसकी सुरक्षा जांच के लिए नीचे दी गई कड़ी को क्लिक कर दिए गए फ़ॉर्म को कृपया भरें”. ऐसे संदेश सीधे सीधे ही यह बताते हैं कि कहीं कुछ गड़बड़ है. कोई भी जेनुइन सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर आपसे आपके क्रेडिट कार्ड या पासवर्ड की जानकारी आपसे नहीं माँगेगा. यह या तो उसके पास उसकी ऊंगली के इशारे पर उपलब्ध रहता है, या फिर उसे न तो पता होता है, न इसका पता कर उसका कोई उपयोग कर सकता है. किसी समस्या आने पर वह इसे सिर्फ रीसेट कर आपको नया पासवर्ड दे सकता है.

नीचे दिए गए कुछ आसान से उपायों को अपना कर आप भी ऐसे फिशिंग हमले से अपने आपको बचा सकते हैं:

फ़िशिंग जालसाजी से कैसे बचें:

• अपने ईमेल क्लाएँट में एचटीएमएल संदेश स्वचालित लोड करना रोकें. इससे न सिर्फ आप फिशिंग हमलों से बचेंगे, बल्कि वायरसों से भी बचे रहेंगे. सभी नए ईमेल क्लाएँट में जैसे कि आउटलुक 2003 तथा के-मेल इत्यादि में यह सुविधाएँ हैं. आप अपने टूल/प्रेफरेंसेस मेन्यू के जरिए ईमेल संदेश पढ़ने/लिखने के लिए एचटीएमएल को अक्षम कर सकते हैं.

• आपको हजारों दफ़ा, हजार बार, हर फ़ोरम में बताया जाता रहा है और यह बात फिर से यहाँ बताई जा रही है कि किसी भी अज्ञात व्यक्ति से प्राप्त ईमेल संलग्नकों को कतई नहीं खोलें. इनमें न सिर्फ वायरस हो सकते हैं, आपके कम्प्यूटर से चलने वाले बॉट हो सकते हैं जिससे दूसरे कम्प्यूटरों को आपके कम्प्यूटर के जरिए निशाना बनाया जा सकता है.

• आपके द्वारा प्राप्त एचटीएमएल ईमेल संदेशों में ओके बटनों या किसी लिंक को तब तक क्लिक न करें जब तक कि उसके बारे में पता न कर लें कि उसका ओरिजिन कहाँ है. अगर आप उसके ऊपर माउस संकेतक को मंडराएँगे तो उसका पता स्टेटस बार में दिखेगा. उस पते से उसके असली होने का प्रमाण मिल सकता है.

• अपने ब्राउज़र में उच्च सुरक्षा स्तर उपयोग करें.

• संभव हो तो एक फ़ॉयरवाल तथा एंटीवायरस इस्तेमाल करें. व्यक्तिगत उपयोग के लिए मुफ़्त, अच्छा फ़ॉयरवाल जोन अलार्म (http://www.zonelabs.com ) तथा एंटीवायरस एन्टीवीर ( http://www.free-av.com ) है जिसका उपयोग कुछ हद तक इन जालसाजियों को रोकने में किया जा सकता है.

• यदि आपको कोई संभावित जालसाजी का प्रस्ताव प्राप्त होता है तो उसे आप यहाँ बता सकते हैं- http://www.anti-phishing.com , यह संस्था फिशिंग तथा ईमेल जालसाजों को ठिकाने लगाने में प्रयासरत है.

• कुछ पुराने ब्राउज़रों जैसे कि इंटरनेट के कुछ पुराने संस्करण में यह सुविधा है कि जब आप यह प्रविष्ट करते हैं - http://www.abc.com@http://www.xyz.com तब यह अपनी पता पट्टी में तो दिखाता है http://www.abc.com परंतु आपको यह इस ठिकाने http://www.xyz.com. पर ले जाता है. जालसाज इसी तरह की कमियों या विशेषताओं का उपयोग अपना काम अंजाम देने के लिए करते हैं . इंटरनेट एक्सप्लोरर पर किसी खुले हुए पृष्ठ का असली यूआरएल जानने के लिए उस खुले पृष्ठ के किसी रिक्त जगह पर दायाँ क्लिक करें, तथा कॉन्टेक्स्ट मेन्यू में से प्रापर्टीज़ चुनें. ऐसे में कुछ ज्यादा सुरक्षित ब्राउज़रों मसलन मॉज़िल्ला फ़ॉयरफ़ॉक्स का प्रयोग उचित होगा.

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सुपरपॉवर इंडिया!


सत्ताईस अप्रैल के इंडियन एक्सप्रेस में संपादकीय पृष्ठों पर यह लेख छपा है कि भारत कभी सुपरपॉवर नहीं बन सकता चूँकि यहाँ अमरीका जैसी वित्तीय स्वतंत्रताएँ नहीं हैं तथा वात्स्यायन और खजुराहो के देश भारत में सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर सरकार और समाज के तथाकथित ठेकेदार प्रतिबंध लगाते रहे हैं. इन प्रतिबन्धों के चलते यह कहना कि भारत सन् 2015 में या 2020 में विश्व की महाशक्ति बनकर उभरेगा बेमानी है.

परंतु क्या आप उस लेख में कही गई बातों से सहमत हो सकते हैं? शायद नहीं. मैं तो कतई सहमत नहीं हूँ. भारत कई मामलों में महाशक्ति बन कर उभर चुका है. कई मामलों में उसके मुकाबले में कोई भी देश दूर-दूर तक कहीं नज़र नहीं आता है. आइए देखें कि भारत किन-किन मामलों में महाशक्ति है...

जनसंख्या विस्फोट में भारत के मुकाबले में है कोई राष्ट्र? कुल जनसंख्या के मामले में हम भले ही अभी दूसरे नंबर पर हैं, परंतु जनसंख्या बढ़ाने के मामले में हम विश्व में पहले नंबर के महाशक्ति हैं. इसके बावजूद सुदर्शनी विचारों के लोगों को इस वृद्धि में कुछ कमी दिखाई पड़ती है, जो अपने भीतर के नासूरों को दूर करने के बजाय सामने वाले के घावों को ठीक करने पर बल देते हैं, और जनसंख्या में और वृद्धि की बात करते हैं. यही हाल रहा तो भारत, आशा के विपरीत जरा ज्यादा ही जल्दी से कुल जनसंख्या के मामले में विश्व का पहला नंबर का महारथी बन जाएगा.

भ्रष्टाचार के मामले में भारत एक महाशक्ति कब का बन चुका है. बोफ़ोर्स से लेकर बाढ़ राहत तक और मंत्री से लेकर संत्री तक सभी ओर भ्रष्टाचार की समान गूँज सुनाई देती है. एक रपट के अनुसार भारत के कुल जीडीपी से कहीं ज्यादा रुपया भ्रष्टाचार / घूसखोरी के जरिए आर-पार किया जाता है, और उसमें अधिकतर हिस्सा सरकारी रुपयों (टैक्स चोरी) का होता है.

रेल हादसों के बारे में क्या खयाल है आपका? भारत में विश्व के किसी भी देश से ज्यादा ट्रेनें, ज्यादा लंबी दूरी तक दौड़कर, ज्यादा सवारियाँ ढोती हैं. इस मामले में वह महाशक्ति तो है ही, परंतु भीषण रेल हादसों के मामले में भी यह महाशक्ति है. साल में दो-दो, तीन-तीन भीषण हादसे होते हैं, पूरी ट्रेन को सवारी सहित आग की भेंट चढ़ाई जाती है, ट्रेनों में लूटपाट-डकैती होती है, सह-यात्रियों को जहरीले पदार्थ खिलाकर लूट लिया जाता है... इत्यादि, इत्यादि... इन मामलों में भारत महाशक्ति तो है ही.

मुक़दमेबाज़ी, और देर से न्याय मिलने में भी भारत महारथी है. देश में 3 करोड़ मुक़दमे लंबित हैं, और फ़ैसलों को आने में दशकों लग जाते हैं. देश का हर दसवां व्यक्ति मुक़दमेबाज़ी में उलझा हुआ है, और उसे न्याय मिलने की उम्मीद दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती. वहीं दूसरी ओर भारतीय महारथियों द्वारा जेलों में जश्न मनाया जाता है, जेल से चुनाव लड़े जाते हैं और जेलों में रहकर सरकारें चलाई जाती हैं....

ये तो मात्र कुछ उदाहरण हैं. ऐसे ही कई मामलों में भारत न जाने कब जमाने से महारथी-महाशक्तिशाली बन चुका है. क्या यह खुशी की बात नहीं है?

व्यंज़ल
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अपने नासूरों से ज्यादा औरों के घाव चुभ रहे हैं
रोम-रोम में पसरे किस दर्द की बात कर रहे हैं

किस तरह हजम होगी ये उलटी-पुलटी कहानियाँ
खोखली हो चुकी हैं जड़ें और महाशक्ति बन रहे हैं

क्या कोई प्रायश्चित्त कभी वापस ढूंढ कर लाएगी
लोग सदियों से सोन चिरैया की बात कर रहे हैं

मंजिल मिलने का भरोसा हो तो कैसे, पता नहीं
अनियंत्रित भीड़ में लोग स्थिर हैं या चल रहे हैं

खाली-पीली बहस करते लोगों में शामिल है रवि
और सोचते हैं कि वो कोई बड़ा काम कर रहे हैं

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व्यंग्य
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सर क्यों दांत फाड़ रहा है?


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पिछले दिनों एक गुमनाम व्यंग्य लेखक की गुमनाम सी किताब हाथ लग गई जिसका शीर्षक ऊपर दिया गया है. यूँ तो वह किताब साधारण सी है, जिसमें तीसेक व्यंग्य आलेखों का संग्रह है, और प्राय: सभी आलेख सामान्य स्तर के हैं, परंतु एक विशेष आलेख – ‘लाभ शुभ के चौघड़िए में’ ने न सिर्फ ध्यान आकृष्ट किया, बल्कि मेरी उस पीड़ा को भी फिर से याद करने को मज़बूर किया जिससे मैं एक परीक्षार्थी के नाते हर परीक्षा में गुज़र चुका हूँ. वैसे तो वे आलेख में एक परीक्षक की पीड़ा को दिखा रहे हैं, परंतु वास्तविक अर्थों में ये परीक्षार्थी की पीड़ाएँ हैं. उस आलेख के कुछ चुनिंदा अंश आपके लिए यहाँ प्रस्तुत हैं. पढ़ें और अपनी पीड़ाओं को याद करें.
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लाभ शुभ के चौघड़िए में


लेखक- धर्मपाल महेन्द्र जैन
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ओ मेरी पुत्री की माताश्री, तुम्हें मालूम है न विश्वविद्यालय वालों ने मेरे पौरूष को चुनौती दे रखी है. इतने वर्षों के सेवाकाल में बनाए रिश्ते अब सार्थक हो रहे हैं. परीक्षा की कॉपियों के बंडल घर में भरे पड़े हैं. द्रुत गति से बिल्टियाँ और पार्सलें आ रही हैं. मेरी लाल पेंसिल हॉली-डे एक्सप्रेस सी दौड़ रही है. ज्यादा से ज्यादा कॉपियाँ निबटा रही हैं.

देश में तीन मिनट में सैकड़ों बच्चे जन्म ले लेते हैं और इतने समय में मैं सिर्फ एक कॉपी जांच पाता हूँ. वह तो अच्छा है कि मैं अनुभवी हूँ, न मेमोरंडम पढ़ता हूँ न ही हिदायतें ही समझने की जरूरत है मुझे. बस हस्त लेखन देखता हूँ, पन्ने गिनता हूँ और पूरक पुस्तिका के वज़न का अंदाजा लगा नंबर देता चला जाता हूँ. प्रभु कृपा है मुझ पर, जहाँ गड़बड़ी होती है वहीं दृष्टि थम जाती है. अन्यथा दूसरे परीक्षक दिन में बीस कॉपी जाँच पाते हैं और तीस रूपए की दाड़की में सीजन का एक दिन बर्बाद कर देते हैं. बैंड वालों को देखो, इस सीजन में उनका साधारण कलाकार हजार रुपए रोज धड़ रहा है, क्या हम पीएच. डी. वालों की जमात इससे भी गई बीती है? हमारी उत्पादकता बोर्ड वालों ने वैसे ही घटा रखी है. वे वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछते हैं जिसमें विद्यार्थी को सही वस्तु लिखना पड़ती है और परीक्षकों को निष्ठा से जाँचना पड़ता है.

सबेरे से कुल्ला तक नहीं किया है मैंने. हालांकि बीड़ी और उसके रासायनिक दबाव से निबट आय हूँ, फिर भी कड़क मीठी चाय पीने की इच्छा को दबाकर मैं विद्यार्थियों का भाग्य लिख रहा हूँ. उनकी प्राप्तियों का टोटल मिला रहा हूँ. सबको किनारे से लगा कर उन्हें आत्महत्या करने से बचा रहा हूँ. ऐसे कितनों को ही जीवनदान दे रहा हूँ.

जानती हो प्रिये, तुम हमारे प्राचार्य, श्रद्धेय बा साब एक गोला प्रसाद गटक कर कॉपियाँ जांचते हैं. कभी तरंग में अंडे ही अंडे टिकाते हैं तो कभी पूरे के पूरे अंक न्यौछावर कर देते हैं- इस पार या उस पार की शैली में. इसी लिए उनका रिजल्ट हमेशा औसत रहा है. उन्होंने यांत्रिक ढंग से कॉपियाँ जाँचीं हैं. यश और अर्थ दोनों अंटी किए हैं उन्होंने. उन्हें श्रेष्ठ परीक्षक का पदक मिला है और मुख्य परीक्षक की पदोन्नति भी. मेरी चिर जीवन संगिनी, कॉपी दौड़ में कड़ा मुकाबला है और इस बार मुझे यह बाजी जीतनी ही है.

इस वर्ष प्रश्नपत्र धड़ल्ले से आउट हुए हैं. साथ ही संवाद एजेंसियाँ भी सजग हो गई हैं. परीक्षा भवनों से थैले भर-भर कर प्रश्न बैंक की सामग्री जब्त हुई है और पुलिस के मारे नकल-अस्त्र का ससमय प्रयोग करने से विद्यार्थीगण वंचित रह गए हैं. कुछ बदनाम विश्वविद्यालयों ने कोड नम्बर पद्धति अपना ली है और वे इस लम्बी चौड़ी प्रक्रिया को गोपनीय बनाए रखने में लगे हैं. इस कारण हमारी रिस्क बढ़ गई है, और भाव बढ़ गए हैं. पर, काम करवाने वाले चाहिएँ – जेब में दम हो तो भला इस देश में कोई काम रुकता है? देखो, बाहर देखो गुरु पत्नी – किसी की आहट सुनाई दे रही है. कोई मुमुक्षु परिचित की चिट्ठी लेकर हमारे द्वार आ रहा है. उसे दिशा बताओ. डाक दूत आ रहा हो तो उससे संदेश ग्रहण करो...

इस कॉपी महायज्ञ में योगदान के लिए मैंने अपने प्रिय और कबाड़ी शिष्यों को न्योता है. वे नहा-धोकर तथा खा-पीकर मुझ विप्र के घर आएंगे. अंकों का पुनर्योग करने, विश्वविद्यालयों और बोर्डों के पत्रक भरने, बंडल बांधने और इन बंडलों को डाक अथवा रेल विभाग में धकेल देने का पुनीत कार्य वे रुचि पूर्वक कर देंगे. कुछ आत्मीय जनों की कॉपियों के मुख्यपृष्ठ के अतिरिक्त सभी पृष्ठ बदलने और योग्यता सूची के दांव पेंच जमाना उन्हीं के बलबूते की बात है. कुछ अंक बढ़ाने में न अपना बिगड़ता है न देश का बिगड़ता है. यदि विद्यार्थी खटकर्मी होगा तो हर कहीं नौकरी पा लेगा और प्रशासन में धन लगाने का कार्य तेज कर देगा. अंक बढ़ाने की इस प्रक्रिया में तो मैं निमित्त मात्र हूँ, इसी लिए निमित्त ग्रहण करूंगा और इस कन्या के उज्जवल भविष्य के लिए आधार बनूंगा. हे हृदयेश्वरी देखो अपनी बेटी रो रही है – उसे दिलासा दिलाओ कि जब तुम बड़ी होकर इम्तिहान दोगी, तो तुम्हारे पिताश्री के परीक्षक रहते योग्यता सूची में तुम्हारा नाम सबसे ऊपर ही रहेगा.

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व्यंग्य
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दलों में विभाजन : एक शाश्वत सत्य



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इस बात से कुछ लोग बहुत खुश हुए होंगे और कुछ लोग बहुत दुःखी कि कांग्रेस पार्टी एक बार फिर विभाजित हो गई. जनता दल कितनी असंख्य बार विभाजित हुई है, किसी को गिनती नहीं पता. पर, मेरी तरह, बहुत से ऐसे लोग भी होंगे जिन्हें इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा होगा और न ही उन्हें चिंता होगी कि किस दल में कितनी बार कितने अंतराल से किस तरह विभाजन होता रहता है. जो लोग दुःखी हो रहे हैं उन्हें शायद यह मालूम नहीं है कि विभाजन एक शाश्वत सत्य है – यथार्थ है. या फिर वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि विभाजन तो एक प्राकृतिक क्रिया है – प्रकृति का स्वभाव है. हालांकि राजनीतिक दलों में विभाजन की यह प्रकृति या प्राकृतिक क्रिया कभी-कभार ही लागू होता है और जो विभाजन होते हैं, उनके पीछे बड़े-बड़े और भारी भरकम कारक और कारण होते हैं. और जो लोग खुश हो रहे होंगे, वे भी शायद यह अहसास नहीं कर रहे होंगे कि विभाजन की पीड़ा से वे भी पहले गुजर चुके हैं और शायद भविष्य में यह पीड़ा उन्हें फिर भोगना पड़े.

प्रकृति में कोई कली खिलती है, कोई अंकुरण होता है तो कोशिकाओं के विभाजन से. हमारी पृथ्वी भी एक महाविस्फ़ोट – बिगबैंग से हुए विभाजन से बनी है. इसी प्रकार जब भी किसी दल में विभाजन होता है, एक नए दल का उदय होता है. फिर विभाजित हुए दोनों दल यह सिद्ध करने का भरपूर प्रयास करते हैं कि उनका दल ही असली, ओरिजिनल दल है. कभी कभार किसी छोटे दल में तब विभाजन होता है जब कोई बड़ा और भारी भरकम दल अपने गुरुत्व बल से छोटे दल का कुछ हिस्सा अपने में समाहित कर लेता है.

दलों में विभाजन को रोकने के लिए कानून भी बनाए गए हैं. परंतु किसी प्राकृतिक क्रिया को कभी रोका जा सका है भला? इतने कानूनों के बाद भी दलों में सुविधानुसार विभाजन होते रहते हैं – सांसद विधायक पाला बदलते रहते हैं इससे यह सिद्ध होता है कि प्रकृति किसी बंधन को स्वीकार नहीं करती. और कायदे कानूनों को तो कदापि नहीं.

विभाजन को रोकने के लिए जो कानून लागू हुए, उसके पहले विभाजन कभी भी कहीं भी हो जाता था, वह समय-काल और चक्र के बंधन के परे होता था. पार्टी का एक सदस्य भी विभाजन कर सकता था, और सांसद या विधायक रहते हुए भी अपनी मूल पार्टी को ठेंगा दिखा कर नई पार्टी खड़ी कर सकता था. अब उसे मज़बूरी वश अपनी संसद/विधानसभा सदस्यता मजबूरी में, कानूनन छोड़नी पड़ती है. मगर, दलों में विभाजन बदस्तूर जारी है.

किसी भी दल में विभाजन के पहले और बाद में बड़े दिलचस्प नजारे पेश होते हैं. कानून की परिधि से बाहर रहने के लिए गोटियाँ बिछाई जाती हैं. विभाजन को कानून सम्मत बताने के लिए व्यूह रचना की जाती है. राष्ट्रीयता, और देश सेवा के बड़े बड़े दावे किये जाते हैं. हालाकि जब जब भी कोई विभाजन होता है, बेवक़ूफ़ से बेवक़ूफ़ व्यक्ति को भी यह स्पष्ट समझ में आ जाता है कि ताज़ा तरीन विभाजन क्यों और किसलिए हुआ है. अख़बारों में छपे हेड लाइन की तरह उनका उद्देश्य स्पष्ट और जग जाहिर होता है परंतु वे फिर भी हर कोई को अपनी अलग कहानी बताते फिरते हैं, और जनता की सेवा को अपना मुख्य उद्देश्य बताते हैं.

विभाजन के कारण कल तक एक साथ सिर से सिर मिलाकर रहने वाले देखते ही देखते जानी दुश्मन हो जाते हैं और, किसी और दल के, कल तक के जानी दुश्मन, विभाजन के बाद – एक घर और एक परिवार के आदमी हो जाते हैं. कभी-कभी विभाजन के समय जो आकांक्षाएँ-इच्छाएँ रहती हैं, वे बाद में भी जब पूरी नहीं हो पाती हैं तो उन विभाजित दलों में पुनः विलयन हो जाता है. यह विभाजन विलयन का दौर तब ज्यादा होता है जब मौसम अनुकूल होता है – यानी जब कोई चुनाव आसपास होता है – या फिर किसी समय किसी सरकार की स्थिति, बहुमत के अभाव के कारण डाँवाँडोल होती रहती है.

वहीं कई दल आंतरिक रूप से विभाजित रहते हैं. यह आंतरिक विभाजन यूँ तो बाहर से दिखाई नहीँ देता, परंतु उसकी विभाजित शाखाएँ आंतरिक रूप से एक दूसरे से भीषण होड़ करती रहती हैं. यह आंतरिक विभाजन ज्यादा आम है. इस तरह का विभाजन हर दल में हर स्तर पर हर समय मौजूद रहता है. आंतरिक विभाजन का उद्देश्य ऊंची कुर्सी पर बैठे व्यक्तियों को नीचे की कुर्सी पर बैठे व्यक्तियों द्वारा हटा कर उन ऊंची कुर्सियों पर कब्जा जमाना होता है.

अब जब यह तथ्य सिद्ध हो गया है कि दलों में विभाजन यथार्थ है, इसे नकारा नहीं जा सकता, तो निश्चित ही विभाजन के उपरांत बना ताज़ा, नया दल भी आगे विभाजित होगा. तो, आइए करते हैं इंतजार उस दिन का.

(संपादित रूप फ्री प्रेस में दि. 14-7-94 को पूर्व प्रकाशित)

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लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम को उसके तमाम अनुप्रयोगों सहित हिन्दी भाषा में लाने के प्रयासों की यात्रा की रोमांचक कहानी:



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हिन्दी कम्प्यूटर की पृष्ठभूमि:
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मैं पिछले बीसेक सालों से हिन्दी साहित्य लेखन से जुड़ा हुआ हूँ. हालांकि मैंने कोई धुआँधार नहीं लिखा है, न ही जाने-पहचाने लेखकों की श्रेणी में मेरा नाम है, मगर लेखन की यह यात्रा लगभग अनवरत जारी है. किसी भी रचना को प्रिंट मीडिया में प्रकाशित करवाने के लिए आपको पहले अच्छी हस्त-लिपि में लिख कर या टाइप करवा कर भेजना होता है. मैं इस कार्य को आसान बनाने के तरीकों को हमेशा ढूंढता रहता था. जब मैं अस्सी दशक के उत्तरार्ध में पीसी एटी पर डॉस आधारित हिन्दी शब्द संसाधक ‘अक्षर’ पर कार्य करने में सक्षम हुआ तो मैंने उस वक्त सोचा था कि यह तो किसी भी हिन्दी लेखक के लिए अंतिम, निर्णायक उपहार है. लिखना, लिखे को संपादित करना और जब चाहे उसकी प्रति छाप कर निकाल लेना – कितना आसान हो गया था. उसके बाद सीडॅक का जिस्ट आया, जिसमें भारत की कई भाषाओं में कम्प्यूटर पर काम किया जा सकता था. परंतु उसके उपयोग हेतु एक अलग से हार्डवेयर कार्ड लगाना होता था जो बहुत मंहगा था, और मेरे जैसे आम उपयोक्ताओं की पहुँच से बाहर था. शीघ्र ही विंडोज का पदार्पण हुआ और उसके साथ ही विंडोज आधारित तमाम तरह के अनुप्रयोगों में हिन्दी में काम करने के लिए ढेरों शार्टकट्स उपलब्ध हो गए और मेरे सहित तमाम लोग प्रसन्नतापूर्वक कम्प्यूटरों में हिन्दी में काम करने लगे.

इसी अवधि में मैंने विंडोज पर हिन्दी में काम करने के लिए उपलब्ध प्राय: सभी प्रकार के औज़ारों को आजमाया. मैंने मुफ़्त उपलब्ध शुषा फ़ॉन्ट को आजमाया, परंतु उसमें हिन्दी के एक अक्षर को लिखने के लिए जरूरत से ज्यादा (दो या तीन) कुंजियाँ दबानी पड़ती हैं. मैंने लीप आजमाया, परंतु हिन्दी की पोर्टेबिलिटी लीप तक ही सीमित थी और विंडोज के दूसरे अनुप्रयोगों में इसके लिखे को काट-चिपका कर उपयोग नहीं हो सकता था. ऊपर से, लीप से लिखे गए दस्तावेज़ों को अगर आप किसी दूसरे के पास भेजते थे, तो वह तभी उसे पढ़ पाता था, जब उसके पास भी लीप संस्थापित हो. इसी वजह से यह लोकप्रिय नहीं हो पाया. इन्हीं वज़हों से मैंने कभी भी श्रीलिपि का भी उपयोग नहीं किया. कम्प्यूटर पर हिन्दी लेखन के लिए मैं कृतिदेव फ़ॉन्ट पर निर्भर था, जो मूलत: अंग्रेजी (ऑस्की) फ़ॉन्ट ही है, परंतु उसका रूप हिन्दी के अक्षरों जैसा बना दिया गया था. कृतिदेव अब भी डीटीपी के लिए अत्यंत लोकप्रिय फ़ॉन्ट है, परंतु अन्य दस्तावेज़ों में इसका उपयोग सीमित है.
यह समय डॉट कॉम की दुनिया के फैलाव का था और हर कोई इंटरनेट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में लगा हुआ था. हिन्दी अखबार नई दुनिया ने अपने अख़बार को इंटरनेट पर लाकर इसकी शुरूआत कर दी थी. धीरे से प्राय: सभी मुख्य हिन्दी अख़बार इंटरनेट पर उतर आए. परंतु इन अख़बारों में उपयोग किए जा रहे फ़ॉन्ट अलग-अलग , एक दूसरे से भिन्न हैं. एक अख़बार का लिखा उसी अख़बार के फ़ॉन्ट से ही पढ़ा जा सकता है. डायनॉमिक फ़ॉन्ट से कुछ समस्याओं को दूर करने की कोशिशें की गईं, मगर वे सिर्फ इंटरनेट एक्सप्लोरर तक सीमित रहीं. अन्य ब्राउज़रों में यह काम नहीं आया. इससे परिस्थितियाँ पेचीदा होती गईं, चूँकि एक आम कम्प्यूटर उपयोक्ता से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वह किसी खास साइट को पढ़ने के लिए खास तरह के फ़ॉन्ट को पहले डाउनलोड करे फिर संस्थापित भी करे. इन्हीं कारणों से मैंने इंटरनेट पर अपने हिन्दी साहित्य को प्रकाशित करने के लिए अपनी व्यक्तिगत साइट पीडीएफ़ फ़ॉर्मेट में बनाकर प्रकाशित की ताकि पाठकों को फ़ॉन्ट की समस्या से मुक्ति मिले. परंतु इसमें भी झमेला यह था कि जब तक उपयोक्ता के कम्प्यूटर पर एक्रोबेट रीडर (या पीडीएफ़ प्रदर्शक) संस्थापित नहीं हो, वह इसे भी नहीं पढ़ पाता था. ऊपर से पीडीएफ़ फ़ाइलें बहुत बड़ी होती हैं, और इन्हें पढ़ने के लिए पहले इसे कम्प्यूटर पर डाउनलोड करना होता है. अत: इंटरनेट पर समय अधिक लगता है.

इस तरह से हिन्दी के लिए बेहतर समर्थन की मेरी खोज जारी ही रही. ऐसे ही किसी अच्छे दिन जब मैं इंटरनेट पर हिन्दी साइटों की खोज कर रहा था, तो इंटरनेट पर सैर के दौरान अचानक इंडलिनक्स से टकरा गया. उसमें यह दिया गया था कि कैसे, यूनिकोड हिन्दी फ़ॉन्ट के जरिए न सिर्फ हिन्दी फ़ॉन्ट की समस्या का समाधान हो सकता है, बल्कि हिन्दी भाषा में लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम का सपना भी साकार हो सकता है. वे स्वयंसेवी अनुवादकों की तलाश में थे. इंडलिनक्स डॉट ऑर्ग की संस्थापना व्यंकटेश (वेंकी) हरिहरण तथा प्रकाश आडवाणी द्वारा की गई थी और उसमें जी. करूणाकर को-ऑर्डिनेटर सह तकनीकी विशेषज्ञ के रूप में कार्य कर रहे थे. इंडलिनक्स कोई व्यवसायिक संस्था नहीं थी, बल्कि स्वयंसेवी व्यक्तियों के सहयोग से ओपन सोर्स माहौल में कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध थी. मुझे लगा कि यूनिकोड हिन्दी द्वारा आज नहीं तो कल, हिन्दी फ़ॉन्ट की समस्याओं का समाधान संभव है. यूनिकोड हिन्दी को विंडोज का समर्थन भी था और बाद में गूगल में भी यूनिकोड हिन्दी समर्थन उपलब्ध हो गया. मैं तुरंत ही इंडलिनक्स में एक स्वयंसेवी सदस्य – हिन्दी अनुवादक के रूप में शामिल हो गया.

शुरूआती समस्याएँ:
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जब मैं इंडलिनक्स में स्वयंसेवी अनुवादक के रूप में शामिल हुआ तो उस वक्त लिनक्स में सिर्फ ग्नोम डेस्कटॉप पर यूनिकोड हिन्दी समर्थन उपलब्ध था. लगभग 4-5हजार वाक्यांशों का अनुवाद मुख्यत: भोपाल के अनुराग सीठा तथा स्वयं जी. करूणाकर द्वारा किया गया था, जो उस वक्त तकनीकी समस्याओं, यथा उचित फ़ॉन्ट रेंडरिंग इत्यादि से भी जूझ रहे थे. हमें कुल 20 हजार वाक्याँशों का अनुवाद करना था, और कम से कम उसका 80 प्रतिशत अनुवाद तो आवश्यक था ही ताकि हिन्दी भाषा का समर्थन ग्नोम लिनक्स पर हासिल हो सके. उन दिनों मैं म.प्र.विद्युत मण्डल में अभियंता के रूप में कार्यरत था. कार्य और घर परिवार के बाद बचे खाली समय में मैं अनुवाद का कार्य करता और इस प्रकार प्रत्येक माह लगभग एक हजार वाक्याँशों का अनुवाद कर रहा था. उस समय तक मैं हिन्दी में कृतिदेव फ़ॉन्ट का अभ्यस्त हो चुका था, और यूनिकोड हिन्दी फ़ॉन्ट का इनस्क्रिप्ट कुंजी पट, कृतिदेव के कुंजी पट से बिलकुल अलग था. उस वक्त हिन्दी कुंजीपट को मैप कर बदलने के औजार भी नहीं थे. अत: यूनिकोड में हिन्दी अनुवादों के लिए मुझे एक नए हिन्दी कुंजीपट – इनस्क्रिप्ट को शून्य से सीखना पड़ा, जो कि कृतिदेव से पूरी तरह भिन्न था, और जिसे मैं इस्तेमाल करता था. छ: महीने तो मुझे अपने दिमाग से कृतिदेव हिन्दी को निकालने में लगे और लगभग इतना ही समय इनस्क्रिप्ट हिन्दी में महारत हासिल करने में लग गए.

शुरूआती चरणों में हमारे पास कोई हिन्दी आईटी टर्मिनलॉजी नहीं थी. ऑन-लाइन / पीसी आधारित शब्दकोश भी नहीं थे, जिसके कारण हमारा कार्य अधिक उबाऊ, थका देने वाला हुआ करता था. अनुवादों में संगति की समस्याएँ थीं. उदाहरण के लिए, अंग्रेज़ी के Save शब्द के लिए संचित करें, सुरक्षित करें, बचाएँ, सहेजें इत्यादि का उपयोग अलग-अलग अनुवादकों ने अपने हिसाब से कर रखे थे. फ़ाइल के लिए फाईल, सूचिका, संचिका और कहीं कहीं रेती का उपयोग किया गया था. इस दौरान हिन्दी भाषा के प्रति लगाव रखने वाले लोग इंडलिनक्स में बड़े उत्साह से स्वयंसेवी अनुवादकों के रूप में आते, दर्जन दो दर्जन वाक्यों-वाक्याँशों का अनुवाद करते, अपने किए गए कार्य का हल्ला मचाते और जब उन्हें पता चलता कि अनुवाद - असीमित, उबाऊ, थकाऊ, ग्लैमरविहीन, मुद्राहीन, थैंकलेस कार्य है, तो वे उसी तेज़ी से ग़ायब हो जाते जिस तेज़ी और उत्साह से वे आते थे. कुल मिलाकर हिन्दी ऑपरेटिंग सिस्टम का सपना साकार करने के लिए मेरे अलावा जी. करूणाकर ही लगातार और निष्ठापूर्वक कार्य कर रहे थे. हमारे हाथों में मात्र कुछ हजार वाक्यांशों के अनुवाद थे, जिस वजह से हम किसी को हिन्दी में ऑपरेटिंग सिस्टम कार्य करता हुआ नहीं दिखा सकते थे. फिर, जो माल हमारे पास था, वह बहुत ही कच्चा था, निहायत असुंदर था और काम के लायक नहीं था. इंडलिनक्स कछुए की रफ़्तार से चल रहा था, सिर्फ एक व्यक्ति- जी. करुणाकर के समर्पित कार्यों से जो तकनीकी पहलुओं को तो देख ही रहे थे, मेरे जैसे स्वयंसेवी अनुवादकों को (हिन्दी के इतर अन्य भारतीय भाषाओं के भी) अनुवाद कार्य के लिए आवश्यक तकनीक सिखाने-पढ़ाने का कार्य भी करते थे और इस बीच समय मिलने पर अनुवाद कार्य भी करते थे.

अंतत: पहिया घूम ही गया:
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सन् 2003 में इंडलिनक्स की गतिविधियों में कुछ तेजी आई. इसी वर्ष मैंने नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति प्रमुखत: अपनी अस्वस्थता की वजह से ली और बच्चों को घर पर कम्प्यूटर पढ़ाने लगा. मैंने अनुवाद का मासिक दर लगभग 2000 वाक्याँश कर दिया था. अंतत: हमारे पास ग्नोम 2.2/2.4 के 60-70% वाक्यांश अनूदित हो चुके थे. करूणाकर ने फरवरी 03 में लिनक्स का प्रथम हिन्दी संस्थापक इंडलिनक्स संस्करण मिलन 0.37 जारी कर दिया था. इस संस्करण की लोगों में अच्छी प्रतिक्रिया रही. लोगों ने इसे अपने मौजूदा अंग्रेजी लिनक्स के ऊपर संस्थापित कर पहली मर्तबा हिन्दी में ऑपरेटिंग सिस्टम के माहौल को देखा. इंडलिनक्स के प्रयासों की हर तरफ सराहना तो हो ही रही थी, अब लोगों ने इसकी तरफ ध्यान देना भी शुरू किया. इस दौरान, सराय के रविकान्त ने एक महत्वपूर्ण योगदान हिन्दी लिनक्स को दिया. उन्होंने सराय, दिल्ली में एक हिन्दी लिनक्स वर्कशॉप का आयोजन किया जिसमें साहित्य, संस्कृति और मीडिया कर्मी सभी ने मिल बैठ कर हिन्दी अनुवाद में अशुद्धियों को दूर करने का गंभीर प्रयास किया, जिसके नतीजे बहुत ही अच्छे रहे. बाद में सराय से ही हिन्दी अनुवादों के लिए साठ हजार रुपयों की एक परियोजना भी स्वीकृत की गई जिसके फलस्वरूप मैं सारा समय अनुवाद कार्य में जुट गया.

रविकान्त, सराय की पहल के नतीजे तेज़ी से आने लगे. दिसम्बर 03 आते आते केडीई 3.2 में पूर्ण हिन्दी समर्थन प्राप्त हो चुका था अत: मैंने उसका अनुवाद हाथ में लिया. अप्रैल आते आते केडीई 3.2 के जीयूआई शाखाओं का 90+% अनुवाद कार्य मैंने पूरा कर लिया था. इस अनुवाद को चूंकि सराय द्वारा प्रायोजित किया गया था, अत: रविकान्त की पहल पर इसकी समीक्षा वर्कशॉप फिर से आयोजित की गई. इस वर्कशॉप में पहले से अधिक लोग शामिल हुए और सबने वास्तविक कार्य माहौल में हिन्दी अनुवादों को देखा और सुधार के सुझाव दिए. इसके नतीज़े और भी ज्यादा अच्छे रहे. अनुवाद के 50 हजार वाक्याँश तथा समीक्षा उपरांत 20 हजार वाक्यांशों के सुधार कार्य के उपरांत केडीई डेस्कटॉप इतना अच्छा लगने लगा कि बहुतों ने अपने कम्प्यूटर का अंग्रेजी माहौल हटाकर हिन्दी में कर लिए जिसमें होमी भाभा साइंस सेंटर मुम्बई के डॉ. नागार्जुन भी शामिल हैं. इसकी प्रशंसा पूर्वक घोषणा उन्होंने भारतीय भाषा सम्मेलन में मुम्बई में की थी.

एक बार फिर, सराय ने एक अतिरिक्त परियोजना स्वीकृत की जिसके तहत केडीई 3.3/3.4 के हेड शाखाओं के कुल 1.1 लाख वाक्यांशों के 90% हिन्दी अनुवाद का कार्य मेरे द्वारा पूरा किया गया. इस बीच एक्सएफ़सीई 4.2, गेम, डेबियन संस्थापक, पीसीक्वेस्ट 2005 संस्थापक इत्यादि के अनुवाद कार्यों का कार्य भी किया गया.

नतीजतन, अब हमारे पास रेडहेट फेदोरा तथा एन्टरप्राइज़ संस्करण, मेनड्रेक, डेबियन, पीसीक्वेस्ट लिनक्स 2005 इत्यादि प्राय: सभी लिनक्स वितरणों में हिन्दी पूर्ण समर्थित है. इंडलिनक्स का बहुभाषी, रंगोली जीवंत सीडी भी जारी किया जा चुका है जिसमें हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के वातावरण में लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम है. लिनक्स के आकाश पर हिन्दी अब दमक रहा है.

अंतत: अब मैं बिना किसी फ़ॉन्ट समस्या के, विभिन्न अनुप्रयोगों में हिन्दी में तो काम कर ही सकता हूँ, मेरे हिन्दी के कार्य विश्व के किसी भी कोने में इंटरनेट पर यूनिकोड सक्षम ब्राउजर द्वारा देखे जा सकते हैं, तथा यूनिकोड सक्षम अनुप्रयोग द्वारा उपयोग में लिए जा सकते हैं. अब मेरा यूनिकोड हिन्दी आधारित व्यक्तिगत ब्लॉग (http://www.hindini.com/ravi ) तो चल ही रहा है, यूनिकोड हिन्दी आधारित सैकड़ों अन्य हिन्दी साइटें भी अस्तित्व में आई हैं. धन्यवाद यूनिकोड, और धन्यवाद इंडलिनक्स.

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अशुभ विवाह…





अक्षय तृतीया (आज है) पर पूरे भारत भर में लाखों की संख्या में बाल विवाह होते हैं. आप देख सकते हैं कि शाजापुर जिले में जहाँ देश भर में सबसे ज्यादा बाल विवाह होते हैं, वहाँ कुल विवाह में से बाल विवाह के प्रतिशत का हिस्सा अस्सी प्रतिशत से अधिक है. सरकार ने इसे रोकने के लिए क़ानून भी बनाए हैं, और दंड का प्रावधान भी है. परंतु यह देखा गया है कि इन मामलों में आज तक किसी को कोई सज़ा नहीं हुई. यहाँ तक कि खुले आम विधायक, सांसद और मंत्री गण ऐसे आयोजनों में खुले आम शिरकत करते फिरते हैं.

दरअसल इसे रोकने के लिए कोई क़ानून काम नहीं करेगा. इसके लिए ज़रूरत है हमें शिक्षित होने की. हमारे अपने अज्ञान और अंध विश्वास के चोले को निकाल फेंकने की. और, यह बात दूर दूर तक दिखाई नहीं देती.

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व्यंज़ल
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वो तो नासमझ हैं जो गड्ढों को चल दिए
आप क्यों उनकी उँगली पकड़ के चल दिए

क़दम अभी ठीक से संभले नहीं हैं ज़मीं पर
और कमाल है कि वो घर बसाने चल दिए

पता न था कि रास्ता खुद को बनाना है
वो मुझको सब्ज़ बाग दिखा के चल दिए

कोई मुझे उठा के ले जाएगा कंधों पर
मैं सोचता बैठा रहा और सब चल दिए

क्या अपनी अज्ञानता का भान है रवि
फिर किसलिए सबको सिखाने चल दिए

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आख़िर किसे चाहिए सरकार?



जब हमारी सरकारें इस तरह काम करती हैं-


या फिर इस तरह:


तो फिर किसे चाहिए कोई सरकार?

आपको चाहिए कोई सरकार? मुझे तो नहीं चाहिए ऐसी सरकारें.
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आख़िर किसे चाहिए सरकार? भाग 2



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बिहार की जनता ने यह दिखा दिया था कि उसे किसी क़िस्म की कोई सरकार नहीं चाहिए. और ऐसी सरकारें तो कतई नहीं जो जातिवाद, धर्मवाद के नाम पर आम जनता को बांटने का घृणित प्रयास करती हैं. उन्हें ऐसी सरकारें भी नहीं चाहिए जिनमें शामिल लोग जनता के विकास के बजाए अपना विकास करने में लगे रहते हैं. बावजूद इसके एक लूली लंगड़ी सरकार बनाने की जोड़-तोड़ जारी रही और अंततः बिहार विधानसभा, जो अभी गठित भी नहीं हुई थी, उसे भंग कर दिया गया.

अगर आने वाले छः महीनों में फिर से चुनाव होते भी हैं तो स्थिति में क्या कोई परिवर्तन होने वाला है? शायद नहीं. जनता एक बार फिर वहां किसी भी तरह के सरकार को फिर से, सिरे से नकारेगी. आख़िर किसे चाहिए ऐसी सरकारें?
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व्यंज़ल
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लूली लंगड़ी की दरकार किसे है
चाहिए ऐसी सरकार किसे है

काम नहीं हैं मुआफ़ी के क़ाबिल
फिर मिलेगी ये हरबार किसे है

जंगलों को जलाए हैं जिन्होंने
उनमें चाहिए घरबार किसे है

भीड़ तो साथ रखते हैं खरीद
अब आवश्यक दरबार किसे है

बन गया है ज़हीन रवि भी
निशाना कहीं परहार किसे है
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फ़ाइलों का अपहरण



जेडडीनेट.कॉम ने ख़बर दी है कि माइक्रोसॉफ़्ट के इंटरनेट एक्सप्लोरर वेब ब्राउज़र की ज्ञात सुरक्षा खामियों के चलते ऑनलाइन अपहर्ता आपकी फ़ाइलों का अपहरण कर सकते हैं और आपसे फिरौती वसूल कर सकते हैं:

http://ct.zdnet.com.com/clicks?c=191786-16960161&brand=zdnet&ds=5

कसम से, ये अपहर्ता अगर मेरी प्यारी ग़ज़लों और व्यंज़लों की फ़ाइलों का अपहरण कर लें तो मुझे तो हर हाल में फिरौती देकर उन्हें छुड़ानी होगी. 

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10 वीँ अनुगूंज: एक पाती चिड़िया के एक जोड़े के नाम




प्रिय चूंचूं और चींचीं,

पता नहीं इस वक्त तुम दोनों कहाँ उड़ रहे होगे, जिंदगी की किस जद्दोजहद से जूझ रहे होगे. परंतु तुम दोनों ने मुझे जीवन का वह गुर सिखाया है जो किसी को भी किसी किताब में, किसी पाठशाला में और कहीं अन्यत्र नहीं मिलेगा. इस चिट्ठी के जरिए मैं तुम दोनों को धन्यवाद देना चाहता हूँ, तुम्हारा आभार प्रकट करना चाहता हूँ और कृतज्ञता व्यक्त करना चाहता हूँ कि जिंदगी के कुछ अनजाने-अनछुए पहलुओं को जानने समझने में तुमने मेरी बख़ूबी मदद की है.



मुझे याद आ रही है बीते हुए साल की जब तुम दोनों ने घनघोर मेहनत की थी. जब तुमने मिलकर तिनका-तिनका बटोरा था और मेरे अँगने में एक छोटा सा घोंसला बनाया था. शहर के कंकरीट के जंगल में प्राकृतिक तिनके तुम्हें कुछ ज्यादा नहीं मिले थे तो तुमने प्लास्टिक के रेशे, पॉलिथीन की पन्नियाँ और काग़ज़ के टुकड़ों की सहायता से अपने घोंसले का निर्माण किया था. तुम्हें वृक्ष की मजबूत टहनी नहीं मिली थी तो अपने घोंसले को तुमने कंकरीट की सीढ़ियों के नीचे से जा रहे तार के सहारे मजबूरी में बनाया था. तुम लोगों ने सिर्फ चोंच की सहायता से ऐसा प्यारा, सुंदर और उपयोगी घोंसला बनाया था कि मैं सोचता हूँ कि अगर तुम्हारे पास हमारी तरह सहूलियतें होती तो क्या कमाल करते. तुम्हारा घोंसला मजबूत तो था ही, अंदर से बिलकुल चिकना, साफ सुथरा-मलमल जैसा मुलायम था. तुमने उसका प्रवेश द्वार अलौकिक रूप से पूरी तरह से गोलाकार बनाया था, और सुरक्षा के लिहाज से परिपूर्ण था. घोंसले के मुहाने पर तुमने छतरी जैसा कुछ निर्माण भी किया था जिससे कि पानी और धूल कचरे से बच्चों को सुरक्षा मिल सके.

मैं भूला नहीं हूँ जब चींची ने बादामी रंग के चार छोटे-छोटे अंडे घोंसले में दिए थे तो किस तरह बारी बारी से तुम दोनों अंडों को सेते थे. अपने चोंच घोंसले से बाहर निकाल कर घंटों उसी मुद्रा में बैठे रहते थे. फिर जब उन चार अंडों में से चार छोटे छोटे, तुम्हारे बच्चे बाहर निकले तो तुम दोनों उसी मेहनत से, दूर-दूर से दाना-दाना ढूंढ कर लाते, अपने बच्चों के भूख के कारण फाड़े गए गुलाबी चोंच में भरते. और अपने हिस्से का दाना भी उन्हें चुगाते.

मुझे याद है जब तुमने घोंसले बनाने शुरू किए थे तो तुम दोनों कितने प्यारे और मोटे तगड़े थे. चींची, तुम्हारा पंख कितना चमकीला भूरा था और चूंचू, काले होने के बावजूद तुम्हारे पंखों से, चमकीली धूप में सतरंगी छटा बिखरती थी. घोंसला बनाने की मेहनत से और बच्चों को अपने हिस्से का खाना देने की वजह से तुम दोनों ही अपने उस मूल आकार के आधे हो गए थे और पतले हो गए थे. मेहनत से तुम्हारे पंख मटमैले हो गए थे. कांक्रीट के जंगल में तुम्हें कीट-पतंगे और दाना-तिनका मिलना कितना मुहाल होता था. तुम दूर-दूर से एक-एक दाना ढूंढ-ढूंढ कर लाते और अपने बच्चों को खिलाते और इस तरह खुद भूखे रह जाते. तुम्हें पता था कि समस्याओं के इस जमाने में तुम अपने हिस्से का भोजन देकर ही तुम अपने बच्चों को बड़ा कर सकोगे.

कुछ दिनों में ही तुम्हारे बच्चे बड़े हो गए और उनमें पंख निकल आए. अंतत: एक दिन तुमने उन्हें दाना देना बन्द कर दिया. उन्हें मजबूर कर दिया कि दाने की तलाश में वे घोंसले से बाहर निकलें. एक दिन एक-एक कर वे चारों बाहर निकले और अपने पंख फैलाकर, गिरते-पड़ते उड़ने लगे. शीघ्र ही वे अपने लिए दाना चुनने लगे. तुम्हारी मेहनत सफल रही थी. कुछ दिनों तक तुम्हारे चारों बच्चे तुम्हारे चारों ओर मंडराते रहते थे. तुम दोनों अभी भी कुछ-कुछ दाना-तिनका अपने बच्चों के मुँह में रखते थे. शीघ्र ही तुम्हारे बच्चे इस लायक हो गए कि वे अपने भरोसे दाना चुन लें. बाद में एक-एक कर चारों बच्चे तुम्हें छोड़कर चल दिए. तुम दोनों ने भी उस घोंसले को छोड़ दिया. शायद उसकी जरूरत अब तुम्हें नहीं रह गई थी. या शायद यह जगह तुम्हारे जीवन के लिए कुछ ज्यादा ही कठिन हो गई थी.

प्रिय चूंचूं और चींचीं, तुम्हारे लिए मैंने अपने आँगन में कुछ वृक्ष लगाए हैं, कुछ पौधे रोपे हैं. उन्हें मैं नित्यप्रति, प्राणपण से सींचता हूँ. उम्मीद करता हूँ कि वे शीध्र बड़े हो जाएंगे और तुम्हारे घोंसले के, तुम्हारे जीवन के आधार बनेंगे. तुम्हारे लिए, तुम्हारे बच्चों के लिए ये आशियाने बनेंगे. तो, तुम वापस मेरे अँगने में लौटोगे ना?

तुम्हारे दर्शन के इन्तज़ार में,


रवि

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पूरे देश को चाहिए आईएसओ 9002 प्रमाणपत्र



पिछले दिनों भोपाल यात्रा के दौरान हबीबगंज रेल्वे स्टेशन पर उतरना हुआ. यह भारत का एकमात्र ऐसा रेल्वे स्टेशन है जिसने आईएसओ 9002 प्रमाणपत्र हासिल किया था.

मैंने देखा कि समूचा रेल्वे स्टेशन साफ सुथरा था. जगह-जगह कचरा-पेटियाँ लगी हुई थीं. हर दस कदम पर साफ-सुथरी कचरा पेटियाँ आग्रह कर रही थीं कि मेरा उपयोग कीजिए. नतीजतन स्टेशन साफ सुथरा ही लग रहा था. यही नहीं, सफाई कर्मचारी जो अन्य स्टेशनों में नजर नहीं आते हैं, अमूमन साफ स्टेशन को और भी साफ कर रहे थे. कुछ कचरा पेटियाँ प्लास्टिक की थीं, तो कुछ स्टेनलेस स्टील की थीं. जगह-जगह फ़्लाई कैचर लगे थे, जो मक्खियों-मच्छरों की संख्या को नियंत्रित कर रहे थे. नीचे पटरियाँ भी साफ़ सुथरी थीं और उनमें कीटनाशक पाउडर छिड़का हुआ था. आमतौर पर भारतीय प्लेटफ़ॉर्म में आने वाली बदबू वहाँ नहीं आ रही थी.

प्लेटफ़ॉर्म और सीढ़ियाँ ख़ासे चौड़े थे, जिससे भीड़ बढ़ने की समस्या ही नहीं थी. अन्य स्टेशनों की तुलना में सीढ़ियाँ तीन गुना ज्यादा चौड़ी थीं. स्टेशन भवन का फ्रन्टल लुक डिज़ाइनर था, जो बढ़िया लीपा-पोता गया था. स्टेशन पर लगे एलसीडी डिस्प्ले से हर तरह की जानकारियाँ प्राप्त हो रही थीं...

आमतौर पर अन्य सभी भारतीय रेल्वे स्टेशनों में इसके विपरीत नज़ारे देखने को मिलते हैं. हर तरफ भीड़, गंदगी, बदबू का नज़ारा ही देखने को मिलता है. मुझे पिछले वर्ष की गई हरिद्वार की यात्रा याद है. हरिद्वार में प्राय गाहे बगाहे भीड़ जुटती रहती है – चाहे वह पूर्णिमा हो या कुंभ मेला. वहाँ का रेल्वे स्टेशन और सीढ़ियाँ अत्यंत तंग हैं लिहाजा हमें भीड़ के साथ साथ कचरे और बदबू का सामना करना पड़ा था. ट्रेन के इंतजार में वहाँ खड़ा रहना भी मुश्किल हो रहा था. नाक में रूमाल रखने के बावजूद मारे बदबू के उल्टियों का सेंशेसन हो रहा था. पूरे स्टेशन पर मख्खियाँ भिनभिना रहीं थीं सो अलग.

काश भारत का हर रेल्वे स्टेशन हबीबगंज की तरह होता. और काश पूरे भारत के हर नगर, हर शहर, हर गाँव के पास आईएसओ 9002 प्रमाणपत्र होता.

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टूटती हुई भाषाई सीमाएँ..



यह है नई दिल्ली से प्रकाशित एक अख़बार, हैलो ईस्ट का मास्ट हेड:



और यह है आज के अंक का दैनिक भास्कर का मास्ट हेड:



हैलो ईस्ट तो फिर भी एक छोटा सा, नॉन एक्जिस्टेंट अख़बार है. परंतु दैनिक भास्कर तो टाइम्स ऑफ इंडिया के बाद, भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाला अख़बार है और हिन्दी भाषा के अख़बारों में सबसे ज्यादा बिकने और पढ़ा जाने वाला अख़बार है.

अगर इस अख़बार ने अपने मास्ट हेड पर हिन्दी के साथ साथ अंग्रेज़ी का प्रयोग किया है, तो इसका अर्थ साफ़ है कि विश्व में भाषाई सीमाएँ (लैंग्वेज बैरियर) टूट रही हैं. दैनिक भास्कर का यह कदम पूरा केलकुलेटेड मूव है और यह भाषाई पवित्रता के पैरोकारों की तीव्र आलोचना तो भले ही झेलेगा, परंतु उनसे कहीं अधिक-अकल्पनीय संख्या के अपने लिबरल पाठकों का एसेप्टेंस भी प्राप्त करेगा.

मैंने तो अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी है.

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सारा देश आरक्षित !



अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में मुसलिम विद्यार्थियों के लिए 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित किए जाने पर तमाम बुद्धिजीवियों को तमाम तकलीफ़ें हुईं. छुद्र राजनीति से प्रेरित इस कदम से अपना भारत देश और भी गर्त में जाएगा (पर इसकी चिंता किसे है? अभी तो कुछ वोट पक्के हुए ना!). इस मसले पर पंजाब केसरी के संपादक अश्विनी कुमार अपने विशेष संपादकीय में लिखते हैं: (संपादकीय के कुछ अंश)

आरक्षण, धर्मनिरपेक्षता और हमारे मूल्य!
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- अश्विनी कुमार (प्र. संपादक, पंजाब केसरी)
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ये जो नेता दलितों के नाम पर चुनावी रोटियाँ सेंकते रहे हैं, इनकी शक्लें देखें, क्या ये किसी दृष्टिकोण से दलित उद्धारक लगते हैं? इन्हें तो सिर्फ दलितों के नाम पर वोट की राजनीति करने की समझ है.

कौन कहता है संत शिरोमणि रविदास को दलित?
कौन कह सकता है सधना को प्रताड़ित?
किसकी हिम्मत है जो माता शबरी को शोषित कहे?
कौन समझ सकता है, सैन नाई की दिव्यता?

सारा सनातन समाज इनके सामने नतमस्तक है.
इनकी आध्यात्मिकता का कोई जवाब नहीं.
लेकिन आरक्षण के कोढ़ ने अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय को 50 प्रतिशत आरक्षण करने की मंशा को प्रेरित किया.

शुक्र है एक धर्मनिरपेक्ष विश्वविद्यालय ने इसकी घोषणा की.

अगर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय 50 प्रतिशत हिन्दू विद्यार्थियों के आरक्षण की घोषणा कहीं कर देता तो सारे धर्मनिरपेक्ष बन्दर विक्षिप्तों की तरह नाचना शुरू कर देते.


अलीगढ़ विश्वविद्यालय में कल को यह आरक्षण 100 प्रतिशत भी हो जाएगा.

हमारी ओढ़ी हुई धर्मनिरपेक्षता हमें बर्बाद कर देगी. मैं भारतवर्ष के महान संविधान विद् सर दुर्गादास बसु के उद्गार धर्मनिरपेक्षता पर अक्षरशः हिन्दी अनुवाद के रूप में दे रहा हूँ.

श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान के 42 वें संशोधन की मार्फत ‘सेकुलर’ शब्द जोड़कर क्या साधना चाहा जरा उनकी जुबानी सुनें. शायद कल को माननीय उच्चतम न्यायालय भी इस शब्द को पारिभाषित कर दे.

श्री दुर्गादास बसु कहते हैं, “संक्षेप में सरकार का उद्देश्य इस संशोधन से ऐसा सिद्ध बाह्य रूप से करना था कि जो कुछ भी संविधान में पहले से है उसे और स्पष्ट किया जाए. जहाँ तक धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न है, यह पूर्ण रूप से उसकी आत्मा अनुच्छेद 25 से अनुच्छेद 30 में निहित है. लेकिन ऐसा संशोधन करके मंशा यही है मानो बहुसंख्यक हिन्दू समाज अल्पसंख्यक मुसलिम समाज पर बड़ा कहर ढा रहा है, उनके अधिकार क्षेत्र का हनन कर रहा है, और उनके समानता के अधिकार पर अंकुश लगा रहा है. यह पूर्णतः राजनीतिक उद्देश्य से उत्प्रेरित कृत्य था जिसका एक ही उद्देश्य था कि एक सूत्र में बंटे मुसलिम समाज को वोटें कैसे प्राप्त हों? चूंकि हिन्दुओं की वोटों में एकजुटता कभी नहीं हो सकती, इसी का फायदा इंदिरा गांधी ने उठाने की कोशिश की.”

आरक्षण और ओढ़ी हुई धर्मनिरपेक्षता एक कुष्ठ और दूसरा गलित कुष्ठ रोग है.

भगवान मेरे देश की रक्षा करे.

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10 वीं अनुगूँज: चिट्ठियाँ लिखने के दिन, लगता है सचमुच लद गए.


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जब मैंने 10 वीं अनुगूँज के लिए विषय दिया था तो उत्साहित था कि लोग-बाग जी भर के चिट्टियाँ लिखेंगे, चिट्ठियाँ लिखकर अपने पुराने दिनों की यादों को ताज़ा करेंगे या भविष्य का जायजा लेंगे, और चिट्ठियाँ लिखने की अपनी भूलती-बिसरती कला को एक बार फिर याद कर उसे परिष्कृत परिमार्जित करने की कोशिश करेंगे.

परंतु, साहबान, मैं गलत था, मेरा यह खयाल गलत था. मेरा यह विचार सिरे से ख़ारिज कर दिया गया. दरअसल, दुनिया अब तेज़ी से प्रगति पथ पर है और चिट्ठी लिखने पढ़ने का माद्दा लोगों के पास से ख़त्म होता जा रहा है.

इससे लगता है कि चिट्ठियाँ लिखने के दिन सचमुच लद गए. भले ही उसे हमें अपने कम्प्यूटर पर लिखने कहा जाए, चिट्ठियाँ लिखना हम भूलते जा रहे हैं. यही वजह है कि हिन्दी के पचास से ऊपर चिट्ठाकारों में से बमुश्किल आधा दर्जन चिट्ठियाँ ही पोस्ट हुईं. एक लिहाज से यह आयोजन असफल हो गया है. और इस असफल, दसवें आयोजन की बात यहीं, इसी पंक्ति पर क्यों न ख़त्म कर दी जाए?

पर, रुकिये, एक दूसरी निगाह डालें तो दिखता है कि कुछ ऐसी अच्छी चिट्ठियाँ भी पोस्ट हुई हैं, जिनके बारे में अगर हम बात करेंगे तो पाएंगे कि उनमें से एक-एक चिट्ठी सैकड़ों चिट्ठियों के बराबर वज़न रखती हैं. और इनमें से हर एक चिट्ठी 10 वीं अनुगूँज जैसे कई-कई आयोजनों को सफल बनाने का माद्दा रखती हैं.

तो, फिर, आइए इस आयोजन के लिए मिली तमाम चिट्ठियों को एक-एक कर पढ़ें-
अनुगूँज को पहले-पहल चिट्ठी भाई प्रेम पीयूषने भेजी. चिट्ठी क्या है, पूरा का पूरा सिन्दूरिया आम है. एक-एक पंक्ति पढ़ते जाएँ, सिन्दूरिया के स्वाद का अंदाज़ा लगाते जाएँ. काश, चिट्ठी के साथ पार्सल भी मिल पाता सिन्दूरिया आमों भरा. वैसे, अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके ऑगन का सिन्दूरिया कितना मीठा होगा. और, दीवार के पार उनकी डालों को, बच्चों के लिए आम टपकाते देख कर अगर, भाई प्रेम खुश हो रहे हैं, तो फिर निश्चित जानिये ये आम संसार के सबसे मीठे आम हैं. अन्यथा तो लोग अपने आँगन के आम को आजकल इसलिए काट देते हैं कि कहीं उनकी दीवारें क्रेक न हो जाए.

आमों का स्वाद तो काफी मीठा है ही, सुरजापूरी का स्वाद से यह स्वाद कुछ विशिष्ठ भी है । चार साल हो गये इस प्रसंग के । आसपास के पेङों में आम आये न आये इस सिन्दुरिया का आँचल खाली न जाता है । आजकल लदा पङा है यह आमों से , पिताजी भारी हो रहे डालों को बासों के दर्जन भर सहारे से टिकाये हैं । अब तो इसे काटने का याद पङते ही देह सिहर जाता है । बहुत पहले जब वह छोटा ही था, ठीक उसके जङ के पास घर की नियमित चाहरदीवारी भी खङी करनी पङी थी। मगर पंचफुटिया चाहरदीवारी से परे, आजकल सङक पर वह बच्चों के लिए कच्चे ही सही मगर वह कुछ आम टपकाता ही रहता है ।



चिट्ठियों के बीच ही, जीतू भाई ने भाई महावीर शर्मा की कविता “ससुराल से पाती आई है” का जिक्र किया. यह सारगर्भित, मजेदार, हास्य-व्यंग्य भरी कविता आपको हँसी के रोलरकोस्टर में बिठाकर यह बताती है कि प्रियतम की “ससुराल से पाती” “ससुराल की पाती” कैसे बन जाती है.

इस चिट्ठी की कुछ पंक्तियाँ मुलाहजा फ़रमाएँ:

ससुराल से पाती आई है !
पाती में बातें बहुत सी हैं, लज्जा आती है कहने में
जा कर बस लाना ही होगा, अब खैर नहीं चुप रहने में
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ससुराल के स्टेशन पर आ , मैं गाड़ी से नीचे आया
जब आंख उठा कर देखा तो टी.टी.आई सम्मुख पाया
मांगा उसने जब टिकट तो मैं बोला भैय्या मजबूरी है
कट गई जेब अब माफ करो , मुझ को एक काम ज़रूरी है
पर डाल हथकड़ी हाथों में , ससुराल की राह दिखाई है ।
ससुराल की पाती आई है ।।


उम्मीद है कि इस चिट्ठी से सीख लेकर, अब, हम, चाहे जितनी अर्जेंसी हो, चाहे जैसी भी प्यार भरी चिट्ठी तत्काल बुलावे का आए, अपनी यात्रा सोच समझ कर, जेबकतरों से सावधान रहकर करेंगे, नहीं तो हमारे ससुराल का पता बदलते देर नहीं लगेगी.
अगर आपके आँसू कुछ समय से सूख चुके हैं, भावनाओं का कोई प्रवाह कुछ समय से आपको द्रवित नहीं कर पाया है, जीवन के कठोर राहों ने आपके भीतर की भावनाओं को भी कठोर बना दिया है, या सीधे शब्दों में ही, अगर आप पिछले कुछ समय से रो नहीं पाए हैं, और रोना चाहते हैं तो इन सबका इलाज अपनी पाती में लेकर आए हैं भाई महावीर. वे खुद भी रोते हैं, और आपको भी मजबूर करते हैं कि आप उनके साथ जार-जार रोएँ. पर, जो आँसू आपकी आँखों से निकलेंगे, वे खुशी और सांत्वना के आँसू होंगे. मैं इन पंक्तियों को पढ़ कर घंटों रोया हूँ – क्या आप मेरा साथ नहीं देंगे?

‘ डैडी, जिस प्रकार आपने लन्दन के वातावरण में भी मुझे इस योग्य बना दिया कि आपके हिन्दी में लिखे पत्र पढ़ सकती हूं और समझ भी सकती हूं। उसी प्रकार मैं आपके नाती को हिन्दी भाषा सिखा रही हूं जिससे बड़ा हो कर अपने नाना जी के पत्र पढ़ सके। आपके सारे पत्र मेरे लिये अमूल्य निधि हैं।मेरी वसीयत के अनुसार आपके पत्रों का संग्रह उत्तराधिकारी को वैयक्तिक संपत्ति के रूप में मिलेगा!‘
सुन कर मेरे आंसुओं का वेग रुक ना पाया! मेरी पत्नी ने टेलीफोन का चोंगा हाथ से ले लिया…!


आइए, अब अपने आँसू पोंछें और अगली चिट्ठी पढ़ें. बहन प्रत्यक्षा चिट्ठी लिखने की कोशिश करती हैं, और वादा करती हैं कि भविष्य में वे लंबे ख़त लिखेंगी. हमें उनके ख़त का इंतजार है. परंतु अपनी अभी की कोशिश में वे हम सबको उद्वेलित करती प्रतीत होती हैं कि सोचने और लिखने की प्रक्रिया को कभी विराम न दें:

अब अगर कोई बात मुकम्मल सी न लगे तो दोष मेरा नहीं..
तो लीजिये ये पाती है उन बंधुओं के नाम जो विचरण कर रहे हैं साईबर के शून्य में………..सब दिग्गज महारथी अपने अपने क्षेत्र में
और उससे बढ कर ये लेखन की जो कला है, चुटीली और तेज़ धार,..पढकर चेहरे पर मुस्कुराह्ट कौंध जाये, उसमें महिर...

पर मेरे हाथ में ये दोधारी तलवार नहीं..शब्द कँटीले ,चुटीले नहीं.
न मैं किसी वर्जना ,विद्रोह की बात लिख सकती हूँ.......

तो प्यारे बँधुओं..मैं लिखूँ क्या....? 'मैं सकुशल हूँ..आप भी कुशल होंगे " की तर्ज़ पर पर ही कुछ लिख डालूँ...........पर आप ही कहेंगे किस बाबा आदम के जीर्ण शीर्ण पिटारी से निकाला गया जर्जर दस्तावेज़ है........
चलिये ह्टाइये....अभी तो अंतरजाल की गलियों में कोई रिप वैन विंकल की सी जिज्ञासा से टहल रही हूँ.......शब्दों के अर्थ नये सिरे से खोज़ रही हूँ...लिखना फिर से सीख रही हूँ...... हम भी धार तेज़ करने की कोशिश में लगे हैं..जब सफल होंगे तब एक खत और ज़रूर लिखेंगे..तब तक बाय



प्रत्यक्षा की दूसरी चिट्ठी आने में कुछ देरी है. तब तक के लिए किसी और की चिट्ठी पढ़ी जाए. अगली चिट्ठी भाई आशीष ने लिखी है प्रधान मंत्री के नाम. प्रधान मंत्री के नाम खुली और सार्वजनिक चिट्ठी यूँ तो उन्होंने लिखी है, परंतु ये बातें संभवत: देश का हर-एक नागरिक उनसे कहना चाहता है. फ़र्क़ यह है कि हममें इन कठोर बातों को प्रत्यक्ष कहने का साहस पैदा नहीं हो पाता. उम्मीद है कि इस चिट्ठी को भारत के कर्ता-धर्ता पढ़ेंगे और देश की भलाई के बारे में कुछ काम करेंगे. आशीष अपने पत्र में भारत के आम आदमी की दशा-दुर्दशा का जिक्र करते हुए प्रधान मंत्री से गुज़ारिश करते हैं:

आशा है आप और आपके मंत्री कुछ ऐसा करेंगे जिससे कि इस देश के आम आदमी का भला हो। आम आदमी से मेरा तात्पर्य है वो आदमी जो रोजी रोटी की तलाश में पसीना बहाता है जैसे कि हमारे किसान, मजदूर, सफाई कर्मी, रिक्शे वाले भाई, गरीब पुलिस वाले हवलदार इत्यादि जिनकी वजह से ये देश चल रहा है। ये लोग जो कि देश के प्राण हैं क्योंकि ये देख के लिये अनाज पैदा करते हैं, देश को साफ रखते हैं, आलीशान मकान और भव्य इमारतें बनाते हैं, कानून व्यवस्था बनाये रखते हैं, अधकचरे मकानों में रहते हैं, जिनके बच्चे शायद ही स्कूल जाते हैं और जो स्कूल जाते हैं वो अपने मां बाप के व्यवसाय को शायद ही अच्छी नजर से देखते हों, जिनके बच्चे कुपोषित हैं, जिनको बिजली, पानी और स्वास्थ्य सेवा की दरकार है पर मिलती नहीं है।


अगली पाती फ़ुरसतिया जी की है. पहले तो वे चिट्ठी नाम की कहानी आपको पढ़वाते हैं, और फिर इस नाचीज़ को संबोधित करते हुए अपनी पाती में समस्त चिट्ठाकारों की वो धुनाई करते हैं कि बस क्या कहें. वैसे, उनकी यह चिट्ठी चिट्ठाकारों को ही नहीं, बल्कि इससे इतर, जगत के तमाम लोगों को, अपने अंतर्मन के भीतर झांकने और अपनी वास्तविकता का अहसास करवाती फिरती है. जब भीम को अपनी ताक़त का घमंड हुआ था तो हनुमान ने सिर्फ अपनी पूंछ से भीम को यह दिखा दिया था कि कहीं भी, कोई भी पूरा ताक़तवर नहीं हो सकता, और, ताक़त जैसी बातें रिलेटिव बातें हैं. भाई फ़ुरसतिया की चिट्ठी से मेरा भी वहम फ़ुर्र हो गया और मैं धरातल पर आ गिरा. आप भी अपनी ज़मीन जाँच लें:


अच्छा, बीच -बीच में यह अहसास भी अपना नामुराद सर उठाता है कि हम कुछ खास लिखते हैं। 'समथिंग डिफरेंट' टाइप का। हम यथासंभव इस अहसास को कुचल देते हैं पर कभी-कभी ये दिल है कि मानता नहीं। तब अंतिम हथियार के रूप में मैं किसी अंग्रेजीलेखक की लिखी हुई पंक्तियां दोहराता हूँ:-

"दुनिया में आधा नुकसान उन लोगों के कारण होता है जो यह समझते हैं कि वे बहुत खास लोग हैं।"



यह लंबी चिट्ठी अपने भीतर कईयों चिट्ठियों को समाए हुए है. यह वे खुद स्वीकारते भी हैं. दरअसल, अपने इस एक ही पत्र के माध्यम से बहुतों को, अलग-अलग तरीके से, अलग-अलग पत्र लिखते हैं:

हर आदमी खास 'टेलर मेड'होता है। उससे निपटने का तरीका भी उसी के अनुरूप होता है। यह हम जितनी जल्दी जान जाते हैं उतना खुशनुमा मामलाहोता है।

बहरहाल ,अब इतना लंबा पत्र लिख गया कि कुछ और समझ नहीं समझ आ रहा है। थोड़ा कहा ,बहुत समझना। यह पत्र मैंने रविरतलामी के लिये लिखना शुरु किया था । पता नहीं कैसे दूसरे साथी अनायास आते चले गये। अपने एक दोस्त से बहुत
समय बाद मिलने पर मैंने उससे कहा कि मैं तुमको अक्सर याद करता हूँ। उसने जवाब दिया -याद करते हो तो कोई अहसान तो नहीं करते। याद करना तुम्हारी मजबूरी है.



फ़ुरसतिया जी का पत्र इस शेर के बग़ैर अधूरा ही रहता, जो मुझे ख़ासा पसंद आया:

धोबी के साथ गदहे भी चल दिये मटककर,
धोबिन बिचारी रोती,पत्थर पे सर पटककर।



चलिए, बहुत पटक लिए सर, अब आगे की चिट्ठी पढ़ते हैं. जीतू भाई को अपनी बीवी के लिए ड्राइवर, कुली, कैशियर बनते बनते उन्हें अपना ब्लॉग लिखने को समय नहीं मिल पा रहा, तो फिर वे चिट्ठी क्या ख़ाक लिखते. फिर भी, वे इतना तो उपकार कर गए कि अपनी प्रेम कहानी में इस्तेमाल की गई आख़िरी चिट्ठी हम सबके पढ़ने के लिए पोस्ट कर गए. इस वादे के साथ कि शिब्बू के ख़त के किस्से को वे शीघ्र ही बताएँगे. हमें उसका इंतजार है, पर तब तक उनकी आख़िरी, कवितामयी प्रेमपाती को क्यों न पढ़ लें:

तेरी खुशबू मे बसे खत मै जलाता कैसे
प्यार मे डूबे हुए खत मै जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे ख़त मै जलाता कैसे
जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाये रखा

जिनको एक उम्र कलेजे से लगाये रखा
दीन जिनको जिन्हे ईमान बनाये रखा
तेरी खुशबू मे बसे ख़त मै जलाता कैसे…..


इस बीच अनुगूँज को अगली चिट्ठी मिली भाई अतुल की. पढ़ने पर लगा कि क्या यह चिट्ठी है? पर, फिर लगा कि भाई, अगर अगले ने चिट्ठी भेजी है तो यह चिट्ठी ही है. और क्या मज़ेदार चिट्ठी है. चिट्ठी पढ़कर आपको हँसते-हँसते अगर पेचिश न हो जाए तो आप मेरा नाम बदल देना. अतुल भाई, आपकी ऐसी चिट्ठियों का इंतजार रहेगा. इधर लोग-बाग़ हँसना भूल गए हैं ना, इसीलिए. चिट्ठी को दुबारा पढ़कर थोड़ा और हँसा जाए:

हम बारातियो के साथ वह भी बाराती बनके बाहर आ गया था| वह बेवकूफ कैदी बाहर आकर शादी के पँडाल में जलेबी जीमने लगा और उसे हलवाई की ड्यूटी कर रहे दरोगा जी ने ताड़ लिया| वहाँ जेल में कैदियो के परेड शुरू होने पर एक कैदी कम निकलने से चिहाड़ मच गई थी| थोड़ी ही देर में स्थिति नियंत्रण में आ गयी| हलाँकि इस हाई वोल्टेज ड्रामे को देखकर कुछ बारातियो को पेचिश लग गई| अब वह सब तो फारिग होने फूट लिए उधर चौहान साहब देर होने की वजह से लाल पीले होने लगे|


अब, अगर आपकी हँसी रुक गई हो तो अगला ख़त पढें? पर इस बार इस बात की क्या गारंटी है कि अगला पत्र पढ़कर आप न हँसें? भाई तरूण पत्र तो लिखते हैं प्रीटी वूमन को परंतु वे हमारे-अपने जैसे स्मार्ट लोगों की स्मार्ट सोच का फ़ालूदा बनाते दिखाई देते हैं. इस पत्र में हास्य है, व्यंग्य है, अपनी तथाकथित स्मार्ट सोच पर करारी चोट भी है. अब आप हँसें, या रोएँ, फ़ैसला आपका है:

यहाँ एक बात मेरी समझ मे नही आयी कि हम सब लोग तो यहाँ ‘विदेशी’ हैं फिर क्‍यों एक दूसरे को देशी कहते हैं। ऐसे ही दिन गुजरने लगे। एक दिन फिर मै न्‍यूयार्क गया, इंडिया मे अपने शहर मे छोटी-छोटी गलियां हुआ करती थीं यहाँ ‘बिग-ग’लियां थीं। टाईम स्‍कवायर मे रात के वक्‍त ऐसा लगा जैसे सैकड़ों ‘चिराग २०००’ वोल्‍ट के जल रहे हों। वक्‍त गुजरने के साथ-साथ मेरा स्‍टेटस भी एन आर आइ का हो गया लेकिन मै अपने को ‘इ-एनआरआइ’ कहलाना पंसद करता था। एन आर आइ होते ही मै अमेरिका की बड़ी-बड़ी बातें करने लगा और इंडिया मुझे एक बेकार सा देश लगने लगा।



ये क्या? अगला पत्र मेरा अपना ही लिखा हुआ? इस पत्र की नुक्ता-चीनी करना अशोभनीय और अवांछित होगा, इसीलिए, चलिए, इसे बिना किसी टिप्पणी के, यूँ ही पढ़ लेते हैं:

मुझे याद आ रही है बीते हुए साल की जब तुम दोनों ने घनघोर मेहनत की थी. जब तुमने मिलकर तिनका-तिनका बटोरा था और मेरे अँगने में एक छोटा सा घोंसला बनाया था. शहर के कंकरीट के जंगल में प्राकृतिक तिनके तुम्हें कुछ ज्यादा नहीं मिले थे तो तुमने प्लास्टिक के रेशे, पॉलिथीन की पन्नियाँ और काग़ज़ के टुकड़ों की सहायता से अपने घोंसले का निर्माण किया था. तुम्हें वृक्ष की मजबूत टहनी नहीं मिली थी तो अपने घोंसले को तुमने कंकरीट की सीढ़ियों के नीचे से जा रहे तार के सहारे मजबूरी में बनाया था. तुम लोगों ने सिर्फ चोंच की सहायता से ऐसा प्यारा, सुंदर और उपयोगी घोंसला बनाया था कि मैं सोचता हूँ कि अगर तुम्हारे पास हमारी तरह सहूलियतें होती तो क्या कमाल करते.



अब मेरे हाथ में यह आख़िरी पत्र बचा है. भाई रमण का यह सारगर्भित, सोचने को मजबूर करता पत्र. यह एक प्रकार से पाती का मरसिया है, जो वे अपने पत्र के माध्यम से पढ़ रहे हैं. हम सब बड़े दुःख के साथ चिट्ठी को मरता हुआ देख रहे हैं. आइए, हम भी भाई रमण की इन पंक्तियों के साथ चिट्ठी की मौत का मातम मनाएँ:

मेरी प्यारी पाती,
मुझे बहुत दुख है कि तुम अब इस दुनिया में नहीं रही। खैर जहाँ भी हो, सुखी रहो। इस दुनिया में फिर आने की तो उम्मीद छोड़ दो क्योंकि इस दुनिया में तुम्हारा स्थान ईमेल ने ले लिया है। सालों हो गए तुम्हें गुज़रे हुए। वास्तव में तुम्हारी याद तो बहुत आती है। तुम्हारे रहते ही तुम्हारी पूछ बहुत कम हो गई थी, जैसा हर किसी के साथ बुढ़ापे में होता है। लोग खबर एक दूसरे तक पहुँचाने के लिए पहले ही टेलीफोन का इस्तेमाल करने लग गए थे।



ॐ शांति शांतिः अथ श्री 10 वीं अनुगूँज आयोजनम सम्पन्नम् भवतः

सभी चिट्ठाकार मित्रों को साधुवाद.

पुनश्च: अगर किसी मित्र की चिट्ठी भूलवश पढ़ने-पढ़ाने में छूट गई हो, तो कृपया
मुझे क्षमा करते हुए तत्काल सूचित करें ताकि उसे भी पढ़-पढ़ा
लिया जाए.
*-*-*

**************.


सरकारी कंपनियों का निज़ीकरण: एक बहस


*-*-*
सेंटौर होटल के निजीकरण के परिप्रेक्ष्य में सीपीएम के दीपांकर मुखर्जी और बीजेपी के अरूण शौरी आज आमने सामने हैं और अखबारों के माध्यम से एक दूसरे पर पृष्ठ भर भर के आरोप प्रत्यारोप कर रहे हैं. यह जो वाद विवाद चल रहा है उसके पीछे न जाते हुए आइए चर्चा करें बाल्को की जिसे सरकार ने सबसे पहले निजी हाथों में स्टारलाइट कंपनी को बेचा था. उस समय भी भारी बवाल मचा था. सब तरफ हल्ला मचा था और केंद्र की बीजेपी सरकार के विरूद्ध छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी मुख्य मंत्री अजीत जोगी आमने सामने थे. बाद में कोर्ट ने जब मामला साफ किया था तो सबका मुंह बन्द हुआ था.



बाल्को की चिमनी: वर्तमान में एशिया की सबसे बड़ी चिमनी

एक बार जब निजी करण हो गया, तो इस काम में मुखर विरोध करने वाले अजीत जोगी बाल्को के एक्सटेंशन प्लान को धड़ाधड़ स्वीकृति देते देखे गए.

जो सरकारी बाल्को, मरियल चाल चलता हुआ, पिछले कई दशकों से एक ही रफ़्तार में, एक जैसा प्रॉडक्शन दे रहा था, निजी हाथों में आते ही सरपट दौड़ने लगा. इसकी कैपेसिटी एक्सटेंशन की योजना न सिर्फ रेकॉर्ड समय में पूरी हुई, बल्कि तीन साल के भीतर ही उसने अपनी आवश्यकता के लिए अपना स्वयं का, 750 मेगा वाट का विद्युत संयंत्र भी टर्न की आधार पर तैयार कर लिया. और अब यह अपनी दुगनी क्षमता से उत्पादन करने को तत्पर है. अल्यूमिनियम उत्पादन के नाम से यह विश्व में तीसरी बड़ी कंपनी बनने जा रही है. आज इसके ताप विद्युत संयंत्र की चिमनी पूरे एशिया में सबसे ऊँची है.

बाल्को न सिर्फ औद्यौगीकरण कर रही है, वरन् अब वह आसपास के क्षेत्रों में सामाजिक शिक्षा इत्यादि कार्यों को भी अपने हाथों में ले रही है.

क्या आप यहाँ महसूस करेंगे – निजी और सरकारी फ़र्क़ का? क्या सरकार को क़ानून व्यवस्था को ताक पर रख कर कम्पनियाँ और होटलें चलाना चाहिए?

शायद नहीं. सरकार को बस सरकार ही बने रहने दें तो अच्छा.

*-*-*

व्यंज़ल
*-*-*
सरकार को सरकार ही रहने दो तो अच्छा
भक्ति को निराकार ही रहने दो तो अच्छा

अब हमें चलना होगा और कितने कदम
यकीं को निराधार ही रहने दो तो अच्छा

कारणों में फंस सा गया है आज मगर
प्रेम को बेआधार ही रहने दो तो अच्छा

क्या लेना है किसी के हिसाब किताब से
हम को वफ़ादार ही रहने दो तो अच्छा

बहुतेरे प्रदूषण फैला दिए हैं रवि तुमने
मुल्क को हवादार ही रहने दो तो अच्छा

*-*-*

पीसी पेस्ट कंट्रोल



(प्रभासाक्षी में पूर्व प्रकाशित)

अगर आप सोचते हैं कि आपने विश्व के कुछ सबसे बढ़िया एन्टीवायरस प्रोग्राम तथा फ़ॉयरवाल को अपने कम्प्यूटर में संस्थापित कर लिया है और इस तरह से आपका कम्प्यूटर सुरक्षित हो गया है, तो यह आपका बहुत बड़ा भ्रम है. आपका कम्प्यूटर इन प्रोग्रामों के द्वारा वायरस तथा रेट्स (अवैधानिक रिमोट एडमिनिस्ट्रेशन टूल्स) का तो अच्छे तरीके से मुकाबला कर सकता है, परंतु नाना प्रकार के पेस्टवेयर प्रोग्रमों का नहीं, जो आपके कम्प्यूटर और डाटा के लिए खतरा बने हुए होते हैं. इस बात की पूरी संभावना है कि आपका कम्प्यूटर ऐसे ज्ञात-अज्ञात कई प्रकार के पेस्टवेयर प्रोग्रामों से ग्रसित हो. और मज़ेदार बात यह भी हो सकती है कि आपने इनमें से कुछ प्रोग्रामों को स्वयं अपनी इच्छा से अपने कम्प्यूटर पर संस्थापित किया हुआ होगा, वे पृष्ठभूमि में चल रहे होंगे और आपको भान भी नहीं होगा कि आपकी जानकारी के बगैर ये क्या क्या गुल खिला रहे हैं. हालाकि पेस्टवेयर जैसे प्रोग्रामों से आपको ज्यादा नुकसान नहीं होता जैसा कि वायरसों के कारण हो सकता है, मगर नुकसान तो नुकसान ही है. कम या ज्यादा – बर्दाश्त क्यों किया जाना चाहिए? और, वैसे भी आपके कम्प्यूटर के स्वास्थ्य के लिहाज से पेस्टवेयर कतई सही नहीं हैं. खासतौर पर खतरे की बात तब है, जब आपका कम्प्यूटर ज्यादातर समय इंटरनेट से जुड़ा रहता है.
यहाँ हम आपके लिए एक संक्षिप्त मार्ग दर्शिका प्रस्तुत करते हैं, जो आपको यह बताएगा कि ये पेस्टवेयर हैं क्या बला, ये आपके कम्प्यूटर को क्या नुकसान पहुँचा सकते हैं तथा आप इनसे कैसे छुटकारा पा सकते हैं.
पेस्टवेयर- एक विश्वव्यापी महामारी:
आपको यह विश्वास करना होगा कि जो कम्प्यूटर इंटरनेट से जुड़े होते हैं उनमें से 90% से अधिक ज्ञात – अज्ञात रूपों के एकाधिक प्रकार के पेस्टवेयर से संक्रमित रहते ही हैं. उनमें से प्राय: बहुत से उपयोक्ता की सहमति से ही संस्थापित होते हैं और मासूम उपयोक्ता को यह हवा ही नहीं रहती कि उसने कोई पेस्टवेयर संस्थापित कर लिया है. अधिकांश पेस्टवेयर आपको मुफ़्त की वस्तुएँ और सुविधाएँ देने का वादा करते हैं जैसे कि मुफ़्त संगीत, या आपके ब्राउजर की गति बढ़ाने का दावा, या आपके माउस पाइंटर / संकेतक को नया रूप आकार देने का या कुछ अच्छे स्माइली इमोटिकान्स प्रदाय करने का इत्यादि. और आप बड़े मजे में इन्हें अपने कम्प्यूटर पर संस्थापित करते हैं. परंतु वे इन छोटी, नगण्य सी सुविधाओं के बदले वे आपको ये परोसते हैं – विज्ञापनों के पॉप अप विंडोज़, ब्राउज़र हाइजैकर और न जाने क्या क्या. वे आपकी इंटरनेट गतिविधियों की जासूसी भी कर सकते हैं! पेस्टवेयर के कई नाम हैं – कुछ इन्हें मालवेयर कहते हैं, तो कुछ उन्हें स्कमवेयर कहते हैं. कुछ अवांछित व्यवसायिक सॉफ़्टवेयरों को पैरासाइट भी कहा जाता है. कुछ प्रचलित, प्राय बहुतायत से उपयोग में लिए जाने वाले पेस्टवेयर प्रोग्रामों को एडवेयर भी कहा जाता है, और वास्तव में तो पेस्टवेयर की बहुतायत किस्मों में एडवेयर ही आते हैं. एडवेयर को माइक्रोसॉफ्ट ने भी अब गंभीरता से लिया है और उसका पहला, इस्तेमाल के लिए मुफ़्त एंटी एडवेयर प्रोग्राम भी जारी हो चुका है.
जब आप इंटरनेट पर सर्फ करते हैं, तो आपको कुछ ऐसे अवांछित संदेश प्राप्त होते होंगे -:
• क्या आप अपने सिस्टम की गुणवत्ता बढ़ाना चाहते हैं?
• क्या आप अपने सिस्टम की सुरक्षा बढ़ाना चाहते हैं?
• क्या आप मौसम की जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं?
• क्या आप इंटरनेट पर अपनी पहचान छुपाना चाहते हैं?
• स्माइली मुफ़्त डाउनलोड करें, माउस संकेतक, स्क्रीन सेवर मुफ़्त डाउनलोड करना चाहते हैं?
• अपने ब्राउज़र की फंक्शनलिटी/गति/सर्च गति बढ़ाना चाहते हैं? ... तो नीचे दिए ठीक बटन पर क्लिक करें…” इत्यादि…
अब यदि ये प्रस्ताव आपको लुभावने लगते हैं और इनमें से किसी एक के जाल में फंस कर ठीक बटन को दबा देते हैं तो बहुत संभव है कि आपका कम्प्यूटर पेस्टवेयर से संक्रमित हो जाए. अब आप बताइए कि आपने किसी जेनुइन सॉफ़्टवेयर को ऐसे किसी तरह के लुभावने प्रलोभनों को देते हुए पाया है? हालाकि पेस्टवेयर आपके कम्प्यूटरों को ज्यादा नुकसान नहीं पहुँचाते, परंतु कुछ अवांछित समस्या तो वे पैदा करते ही हैं जैसे कि – बार-बार, दर्जनों पॉप अप विंडो खोलते हैं जिससे आपकी एकाग्रता भंग होती है और आपकी प्रॉडक्टिविटी कम होती है. ये आपके बैंडविड्थ, सिस्टम रिसोर्सेज़, मेमोरी उपयोग तथा सीपीयू सायकल को गैर जरूरी तरीके से हजम करते हैं. पेस्टपेट्रोल, एक संस्था जो पेस्टवेयर को खत्म करने के लिए गंभीरता से प्रतिबद्ध है – के अनुसार, वर्तमान में 13000 से भी ज्यादा पेस्टवेयर हैं. क्या आप इस सूची को स्वयं देखना चाहते हैं? अपनी आंखें खोलने के लिए, कि अब तक आपने कौन-कौन से पेस्टवेयर अपने कम्प्यूटर पर संस्थापित कर रखे हैं, इस कड़ी पर जाएँ - http://pestpatrol.com/search/searchpestinfo.asp आपको इतनी भारी-भरकम सूची देख कर आश्चर्य होगा. ऐसी ही एक और सूची यहाँ पर भी है -: http://doxdesk.com/parasite जिसे आप देख सकते हैं. यहाँ यह भी हो सकता है कि आपकी आवश्यकता और चुनाव अलग हो सकते हैं और आप इनकी सम्पूर्ण सूची से सहमत न हों. परंतु यह तो तय है कि इनमें सूचीबद्ध प्रोग्राम किसी न किसी प्रकार से पेस्टवेयर की तरह कार्य करते ही हैं. और उन्हें उनके इन्हीं क्रियाकलापों की वजह से पेस्टवेयर के रूप में पारिभाषित किया गया है. पेस्टवेयर आपके कम्प्यूटर में निम्न प्रकार से तबाही मचा सकते हैं –
पेस्टवेयर से होने वाले नुकसान:
पेस्टवेयरों को इस तरह बनाया जाता है जिससे कि इसके जाल में फँसे हर किसी से जानकारियाँ प्राप्त की जा कर उसका व्यावसायिक लाभ लिया जा सके. ये आपको निम्न प्रकार से नुकसान तो पहुँचा सकते ही हैं. और यह सूची कोई अंतिम भी नहीं है:
• आपके ब्राउजिंग व्यवहार को रेकॉर्ड कर सकते हैं तथा उसके आधार पर आपके ऑनलाइन होते ही लक्षित विज्ञापनों तथा प्रस्तावों से परेशान कर सकते हैं.
• आपके कुंजीपट स्ट्रोक्स को की-लॉगर्स से रेकॉर्ड कर सकते हैं तथा इसे पूर्वपारिभाषित लक्ष्य तक एक लॉग फ़ाइल के रूप में भेज सकते हैं. की-लॉगर्स के जरिए आपके अत्यंत सुरक्षित ऑनलाइन बैंकिंग व्यवहार में भी खाता क्रमांक तथा पासवर्ड चोरी कर सकते हैं.
• आपके डेस्कटॉप का स्क्रीनशॉट नियमित अंतराल पर ले सकता है तथा उसे ईमेल संलग्नक या एफटीपी अपलोड के जरिए रिमोट स्थान पर भेज सकता है..
• यदि आप ऑनलाइन खरीदार हैं तो आपके पासवर्ड / क्रेडिट कार्ड नंबरों को कैप्चर करने के लिए जासूसी कर सकता है.
• आपके कम्प्यूटर में कुकीज़ प्लान्ट करके आपके कम्प्यूटिंग व्यबहार को जान सकता है तथा आपकी पहचान इंगित कर सकता है.
• आपके कम्प्यूटर पर नुकसानदायक प्रोग्राम / स्क्रिप्ट चला सकता है.
• आपके ब्राउज़र को हाइजैक कर उसका होम पेज बदल सकता है.
हालांकि वहाँ कुछ ऐसे पेस्टवेयर भी हैं जो आपको आपके नित्य के कम्प्यूटिंग आवश्यकताओं के दौरान आपकी सहायता करते हैं और वे आपके लिए अति आवश्यक भी होते हैं. परंतु ऐसे पेस्टवेयरों की पहचान आपको स्वयं करना होगी, न कि किसी तीसरी पार्टी – जैसे कि किसी एन्टी पेस्टवेयर यूटिलिटी द्वारा.
पेस्टवेयर काम कैसे करते हैं
यूँ तो प्रत्येक पेस्टवेयर के काम करने का अंदाज अलग होता है. परंतु फिर भी, कुछ आम प्रचलित तरीकों में वे सबसे पहले आपके बारे में आरंभिक जानकारी प्राप्त करते हैं जैसे कि आपका लोकेशन इत्यादि. चूंकि प्राय: पर्सनल कम्प्यूटरों में आजकल आमतौर पर डायनामिक आईपी पता होता है, जो हर बार ऑनलाइन होने पर बदलता रहता है, अत: आपकी पहचान सुनिश्चित करने के लिए वे आपके कम्प्यूटर में कुकीज़ प्लांट करते हैं. कुकीज़ तो याहू! और गूगल जैसे माने हुए, आवश्यक वेब संस्थाएँ भी प्लांट करती हैं, मगर वे इसका उपयोग आपकी इंटरनेट सुविधाएँ बढ़ाने के लिए करती हैं, न कि आपकी जासूसी करने के लिए. जब आप किसी वेब साइट पर जाकर कुछ फ़ॉर्म भरते हैं, या कहीं किसी पाठ इनपुट बक्से में कुछ ढूंढने के लिए कोई वाक्यांश भरते हैं, तो आपके कम्प्यूटर पर कुकीज को इम्प्लांट किया जाता है ताकि यह इतिहास के रूप में दर्ज हो जाए और अगली बार जब आप ऐसा ही कोई कार्य करना चाहें तो वह आपकी सेवा में तत्काल उपस्थित हो जाए. अधिकांश पेस्टवेयर ऐसे फ्रीवेयर प्रोग्रामों के साथ आते हैं जो यह दावा करते हैं कि वे आपके कम्प्यूटर और कम्प्यूटिंग माहौल को आसान बना देंगे. क्या आप विश्वास करेंगे कि काजा मीडिया डेस्कटॉप जो कि संगीत प्रेमियों के लिए पसंदीदा, मुफ़्त का प्रोग्राम है, और जिसे इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 21.4 करोड़ से अधिक बार इंटरनेट से डाउनलोड किया जा चुका है, और जो काफ़ी समय से इंटरनेट डाउनलोड सूची में पहले स्थान पर रहा, वह एक तरह का पेस्टवेयर प्रोग्राम है? काजा आपको बैनर विज्ञापन दिखाता है तथा इसके जरिए किसी तीसरे प्रोग्राम को भी आपकी अनुमति के बिना कम्प्यूटर पर संस्थापित किया जा सकता है. अब, ऐसी स्थिति में कहीं कोई गुंजाइश नहीं बचती है कि यह न माना जाए कि 90% से अधिक कम्प्यूटर पेस्टवेयरों से संक्रमित हैं. और बहुत बार ये संक्रमण हमने अपनी मर्जी से कराए हुए होते हैं – हर प्रकार की सुरक्षा और फ़ॉयरवाल को दरकिनार कर. पेस्टवेयर एक्टिवएक्स कंट्रोल / जावा कोड के जरिए भी आपके ब्राउजर, ईमेल संलग्नकों के द्वारा आपके कम्प्यूटर को संक्रमित कर सकते हैं. और अकसर इनमें किसी तरह का अन-इंस्टालर नहीं होता है जिससे इन्हें अपने कम्प्यूटरों से हटाया जाना मुश्किल होता है.
एक बार संस्थापित हो जाने के उपरांत, पेस्टवेयर पृष्ठभूमि में कार्य करना प्रारंभ कर देता है. उदाहरण के लिए, यदि आप प्रभासाक्षी की वेब साइट में सर्च बक्से में कुछ लिखकर किसी वस्तु के लिए ढूंढेंगे तो, प्रभासाक्षी द्वारा जेनरेटेड सर्च संदेशों के अलावा भी आप कई पॉप-अप संदेश देखेंगे, जो पेस्टवेयरों के जरिए जेनरेट किए जाते हैं. यहाँ, पेस्टवेयर आपके इनपुट स्ट्रिंग को कैप्चर कर अपने सर्वर पर भेजता है, वहाँ इसे एनॉलाइज किया जाता है, तथा उससे मिलते जुलते विज्ञापनों को आपको परोसा जाता है. और, इसीलिए, कभी कभी आपको भारत में रहते हुए भी अमेरिका – कनाडा में प्लाट या दवाई खरीदने के प्रलोभन – प्रस्ताव आते रहते हैं.
निदान:
कुछ मामलों में खासे जटिल तथा पेचीदे होने के बावजूद कम्प्यूटर के पेस्टवेयर संक्रमण का पूरी तरह इलाज किया जा सकता है. संक्रमण को हटाने के लिए एंटीवायरस जैसे औज़ार भी हैं, जिनकी सूची उनके इंटरनेट कड़ी सहित नीचे दी गई है. चूँकि उपचार से ज्यादा अच्छा रोकथाम ही है, अत: पेस्टवेयरों अपने कम्प्यूटर में घुसने नहीं देना ही सबसे बढ़िया निदान है. आपके लिए कुछ सुझाव ये हैं जिनसे आप अपने कम्प्यूटर को पेस्टवेयर के संक्रमणों से कुछ हद तक बचा सकते हैं.
• ईमेल संलग्नकों से सावधान रहें. वायरस तथा वॉर्म के अतिरिक्त उनमें पेस्टवेयर भी हो सकते हैं. अपने मेल क्लाएंट में प्रीव्यू अक्षम करें, ताकि उन्हें स्वचालित चलने से रोका जा सके.
• वेब सर्फिंग के दौरान उच्च सुरक्षा विन्यास का प्रयोग करें. एक्टिव एक्स को अक्षम करें, और यदि यह संभव न हो तो प्राम्प्ट का विकल्प चुनें ताकि हर बार आप चुन सकें और आपकी जानकारी में रहे कि कौन सा एक्टिवएक्स कंट्रोल किस साइट से चल रहा है. हमेशा हस्ताक्षरित एक्टिवएक्स कंट्रोल उपयोग करें. अ-हस्ताक्षरित एक्टिवएक्स के लिए चेतावनी संदेश दिखाए जाते हैं.
• फ़ॉयरवाल का इस्तेमाल करें और इसे उचित प्रकार कॉन्फ़िगर करें ताकि कोई सुरक्षा खामी (होल) न रहे
• वेब पर सावधानी से कार्य करें. कुछ ऐसे पॉप अप संवाद बक्से ऐसे भी प्रकट होते हैं जिनमें रद्द, बन्द या केंसल बटन तो लिखा होता है, परंतु वे वस्तुत: ठीक यानी की ओके बटन होते हैं. ऐसे में, जब आप इस बटन को क्लिक करेंगे तो यह विंडो बन्द तो हो जाएगा, परंतु चूँकि वास्तव में वह ठीक (ओके) बटन होता है, अत: वह अब आपके कम्प्यूटर में पृष्ठभूमि में कुछ अवांछित गतिविधियाँ प्रारंभ करेगा. अत: सुरक्षा के लिहाज से ऐसे पॉपअप विंडो को उसके दाएँ ऊपरी किनारे के X बटन को क्लिक कर बन्द करें. या इसके टास्कबार में दायाँ क्लिक कर, बन्द को चुन कर इसे बन्द करें.
• कुछ पीअर-टू-पीअर मल्टीमीडिया फ़ाइल साझा सॉफ़्टवेयर कई सुरक्षा खामियां पैदा करते हैं तथा उपयोक्ता के कम्प्यूटर पर पेस्टवेयर को संस्थापित करने की सुविधा देते हैं. इनका प्रयोग सावधानी से करें.
• फ्रीवेयर का उपयोग भी सावधानी से करें. इनको ज्ञात-अज्ञात पेस्टवेयर सूची से मिलाकर देखें और जानें कि ये आपके लिए क्या खतरा पैदा कर सकते हैं.
पेस्टवेयर को मिटाने का परिपूर्ण उपचार
एक बार कोई पेस्टवेयर आपके कम्प्यूटर पर संस्थापित हो जाता है तो उसे मिटाना सचमुच का कठिन कार्य हो जाता है. कुछ पेस्टवेयर, जैसे कि हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं, आपकी जानकारी के बगैर संस्थापित होते हैं, ऐसे में उनकी पहचान करना निहायत ही कठिन होता है. कुकीज तथा एडवेयर जैसे प्रोग्राम स्वचालित संस्थापित होते हैं. जब तक आप सुनिश्चित नहीं हैं, पेस्टवेयर को वायरस की तरह ही मानना चाहिए.
पेस्टवेयरों को एंटीवायरस किस्म के सॉफ्टवेयर से पहचाना नहीं जा सकता. इनके क्रिया कलाप भी आपके कम्प्यूटर के डाटा इत्यादि को नुकसान पहुँचाने वाले नहीं होते. अत: वे बिना किसी की निगाह में आए, कम्प्यूटरों में अपना काम करते बने रहते हैं. इसीलिए पेस्टवेयर को ढूंढने के लिए तथा उन्हें कम्प्यूटर से निकाल बाहर करने के लिए एंटीवायरस से भिन्न किस्म के, एंटीपेस्टवेयर प्रोग्रामों की आवश्यकता होगी. ये प्रोग्राम आपके कम्प्यूटर को स्कैन कर तमाम तरह के संस्थापित पेस्टवेयर का पता लगाते हैं और आपके सामने उन्हें हटाने का विकल्प रखते हैं. यदि आप कोई एन्टी पेस्टवेयर प्रोग्राम इस्तेमाल कर रहे हैं तो इसकी पेस्टवेयर परिभाषा फ़ाइल को भी नियमित अंतराल से अद्यतन करते रहें.
नीचे कुछ प्रसिद्ध एंटी-पेस्टवेयर प्रोग्रामों की सूची दी गई है, जिनका उपयोग आप अपने कम्प्यूटर से पेस्टवेयरों को मिटाने के लिए कर सकते हैं. कृपया ध्यान दें कि एंटीवायरस औज़ारों की तरह इनमें से कोई भी एक अकेला पूरी तरह सक्षम नहीं है कि वह हर प्रकार के पेस्टवेयरों का पता लगाकर उसे निकाल बाहर कर सके. आपको ऐसे दो-एक एंटीपेस्टवेयर प्रोग्रामों की सहायता लेनी होगी. साथ ही, नए नए पेस्टवेयर उनकी परिभाषा फ़ाइल में सम्मिलित नहीं होंगे जिसकी वजह से वे नए पेस्टवेयर का पता लगाने में अक्षम होंगे. फिर भी, पेस्टवेयरों को अपने कम्प्यूटर से निकाल बाहर करने के लिए इनमें से कुछ का उपयोग तो आप कर ही सकते हैं. और खुशी इस बात की है कि इनमें से बहुत से फ्रीवेयर हैं:
1. एडअवेयर http://www.lavasoftusa.com
2. एंटी-ट्रोजन http://www.anti-trojan.net
3. पेस्ट-पेट्रोल http://www.pestpatrol.com
4. स्पाई बॉट सर्च & डिस्ट्रॉय http://www.security.kolla.de
5. स्पाई-स्वीपर http://www.webroot.com
6. एक्स-क्लीनर http://www.xblock.com
7. स्पाई-रिमूवर http://www.itcompany.com
8. स्टिंगर http://vil.nai.com/vil/stinger
9. यू-डबल्यू-श्रेडर http://www.spychecker.com
10. माइक्रोसॉफ़्ट एंटी एडवेयर http://www.microsoft.com/
आप इसके लिए कुछ वेब आधारित सेवा का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. आपको सिर्फ यह करना होगा कि इंटरनेट पर कनेक्ट होइए और ऐसे वेब साइट पर जाइए जो आपके कम्पयूटर को पेस्टवेयर के लिए ऑन लाइन स्कैन करने की सुविधा देते हैं. ये सुविधाएँ तेज भले ही न हों, परंतु अद्यतन होती हैं और आपके कम्प्यूटर से पेस्टवेयर को निकालने में सक्षम होती हैं. एक ऐसी ही साइट है: http://doxdesk.com/ . परंतु चेतावनी फिर दी जा रही है – ऐसी सेवाओं का उपयोग सावधानी से करें.
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फ़र्क़ पड़ता है भाई!


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चिट्ठाकार भाई अतुल तथा अमित की मदद से, सेजावता गाँव के एक स्कूल में कुछ समय पूर्व, दसवीं कक्षा के होशियार बच्चों को दिया गया पुरस्कार शायद रंग लाया है. और, यह रंग इतना गहरा है कि स्कूल के प्राचार्य सहित तमाम ग्रामवासी खुशी से फूले नहीं समा रहे हैं...

मध्य प्रदेश का दसवीं हाईस्कूल का परीक्षाफल कल घोषित हुआ. परिणाम आशाजनक नहीं रहे. मात्र 37 प्रतिशत बच्चे ही पास हुए. मगर सेजावता ग्राम के शासकीय स्कूल के दसवीं कक्षा के बच्चों की खुशी का प्रतिशत कहीं ज्यादा हैं. वहाँ का परिणाम 83 प्रतिशत रहा.

प्राचार्य का कहना है कि पुरस्कार वितरण के पश्चात् विद्यार्थी (और पालक भी) पढ़ाई में ज्यादा गंभीर हो गए थे, और अच्छे परिणाम के पीछे एक कारक यह भी था. उन्होंने इस हेतु चिट्ठाकारों का एक बार फिर आभार माना है.

वैसे तो ये पुरस्कार कोई बहुत बड़े नहीं थे, मगर प्रोत्साहन के रूप इससे बहुत फ़र्क़ पड़ा. सच है, प्रशंसा के दो बोल भी बहुत होते हैं...

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चांपा के बड़े


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मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़ में) का चांपा दो बातों के लिए प्रसिद्ध है- एक तो जून महीने की झुलसती गर्मी और कोसा के बने वस्त्रों के निर्माण और विपणन के लिए. परंतु इसमें अब तीसरी बात भी जुड़ गई लगती है.


अगर उचित कीमत में उचित वस्तु मिले तो उसके खरीदार जंगल तो क्या साइबेरिया में भी पैदा हो सकते हैं. मॅकडॉनल्ड और केएफ़सी अगर न्यूजर्सी से लेकर न्यू डेल्ही तक समान रूप से अगर बिकते हैं, और उनके काउन्टरों पर खरीदारों की भीड़ की भीड़ जमा रहती है तो इसके पीछे यही राज है.


और यही राज है, चांपा रेल्वे स्टेशन पर बिकने वाले बड़े (वड़े) के बड़े तादाद में बिकने का. हावड़ा मुम्बई रेल लाइन पर इस छोटे से स्टेशन आम तौर पर ट्रेनें पाँच मिनट से ज्यादा के लिए नहीं रुकतीं. परंतु इन पाँच मिनटों के दौरान पचासों बड़े बेचने वाले यात्रियों को पाँच रूपए के पाँच बड़े के भाव से हजारों बड़े बेच देते हैं. यहाँ आप पाएँगे कि हर दूसरा यात्री चाव से उन बड़ों को खा रहा है. उस रूट पर प्राय: यात्रा करने वाले लोग इंतजार करते हैं कि कब चांपा स्टेशन आए और बड़े खाने को मिलें. पचासों बड़े बेचने वाले होने के बावजूद, चूँकि ट्रेन ज्यादा देर रुकती नहीं है, जैसे ही कोई ट्रेन स्टेशन पर रुकती है, बड़े खरीदने के लिए वहाँ कांव-कांव मच जाती है. पर, थोड़ी ही देर में लगभग हर यात्री के हाथ में, अखबारी काग़ज़ में लिपटा बड़े का पुड़िया होता है.


लाल सुर्ख़ मिर्च की, लहसुन के साथ सिलबट्टे पर पीसी गई तीख़ी, नमकीन चटनी के साथ बड़ों को खाकर यात्री किसी ट्रांस में पहुँच जाते हैं. कुछ सफ़ाई पसंद और वायरस-बैक्टीरिया से डरने वाले लोग जो यह पुड़िया लेने में संकोच कर चुके होते हैं, अपने साथी यात्री को मजे में बड़े खाते और अलौकिक आनंद के सागर में गोते लगाते देख, बाद में पछताते हैं. पर, अगली दफ़ा जब वे इस स्टेशन से गुजरते हैं तो फिर वे यह आनंद लेना किसी हाल में नहीं भूलते.

दरअसल, ये बड़े आमतौर पर स्टेशनों में बेचे जाने वाले खाद्य पदार्थों के विपरीत उच्च गुणवत्ता युक्त तो होते ही हैं, इनका स्वाद अलग और लाजवाब होता है. और कीमत तो ख़ैर वाजिब है ही. शायद, अदा की गई क़ीमत से ज्यादा की वस्तु ग्राहक को प्राप्त होती है.

लिहाज़ा, हर कोई उन्हें खरीदता है, खाता है और तारीफ़ करता है जिससे दूसरे भी खरीदते खाते हैं.


सफल मार्केटिंग का इससे बड़ा है कोई फंडा?


पुनश्च: आमतौर पर गांव और स्टेशनों के नाम बड़े ऊटपटाँग होते हैं. जैसे कि लेमरू और लाभरिया भेरू. इन्हें ऊटपटाँग बनाने में इतिहास का भी योगदान होता है, जैसे कि रतलाम का बढ़िया, सुंदर नाम रत्नपुरी था जो जाने कैसे, इतना रद्दी हो गया, दिल्ली को अंग्रेज देल्ही बना गए और केलकटा, कलकत्ता और कलिकाता होता हुआ कोलकाता हो गया है. पर नीचे का चित्र देखें. क्या सुंदर नाम है इस स्टेशन का! (यह चांपा के पास ही है)

-*-*-

आपकी मंगलमय रेल यात्रा के लिए शुभकामनाएँ :)





एक सौ पच्चीस साल पुरानी रेल पटरियों पर दौड़ती रेलगाड़ियों का हश्र इससे जुदा हो सकता है भला? वह भी तब जब रखरखाव और आधुनिकी करण को राजनीति के पॉपुलिज्म की भेंट चढ़ा दिया गया हो.


आप सस्ती, कुल्हड़मय, छाछ-खद्दर युक्त रेल यात्रा तो करें, पर साथ ही ऐसी घटनाओं के लिए हरदम, हमेशा अपने आप को तैयार रखें. आपकी रेल यात्रा मंगलमय हो.

*-*-*
व्यंज़ल
*-*-*
ऐसी ही तो चलेगी भई लालू की रेल
कुल्हड़ के लिए भी मचेगी पेलम पेल

स्टेशन पर कुत्तों, गायों, उठाईगीरों के
डिब्बों के भीतर चोर उचक्कों के खेल

ये कहते हैं लोग कि मंत्रियों के लिए
रेल मंत्रालय है मलाई रबड़ी और भेल

ये नई राजनीति इसके कायदे हैं नए
अपराधी को सम्मान मासूमों को जेल

इसमें सोचना क्या है बैठा रह तू रवि
अगर ट्रेन में गया निकल जाएगा तेल

*-*-*

सब कुछ बोगस है!



*-*-*


**//**
अगर मतदाता बोगस हैं, तो नेता और सरकार कैसे बोगस नहीं होंगे? बोगस मतदाता बोगस नेताओं को चुनेंगे तो जो सरकार बनेगी वो बोगस ही होगी न? लगता है सत्तावन साल में बचा-खुचा सब कुछ बोगस हो गया है...

*-*-*
व्यंज़ल
//**//
क्या नहीं कुछ बोगस है
दिल मन सब बोगस है

धूप-बत्ती अजान प्रार्थना
पर सच में सब बोगस है

चलें कहीं कोई और ठौर
बचा यहाँ सब बोगस है

इस दौर में प्रेम की बातें
लगे कहीं कुछ बोगस है

सोचता बैठा रवि कब से
बन गया खुद बोगस है

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11 वीं अनुगूँज: आख़िर ये माजरा क्या है?




*-*-*
मुम्बई में बीएमसी ने गर्दभ और मनुज को बराबरी का दर्जा दे दिया है. साफ सफाई के कामों में गर्दभ की मजदूरी के लिए मनुज की मजदूरी के बराबर ही भुगतान किया जाएगा.



वैसे भी, मनुष्य तो गधा बनता रहता है, पर शुक्र है, और शायद गधे के लिए राहत की बात भी कि, गधा कभी मनुष्य नहीं बनता.

वैसे, गधा ही क्या, मौक़ा पड़ने पर मनुष्य कुत्ता भी बन जाता है, सूअर भी, सांप (आस्तीन का) भी और नाली का कीड़ा भी.


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व्यंज़ल
*-/-/-*

फ़र्क़ गुम गर्दभ मनुज में ये माजरा क्या है
नेताओं के बोलों में सत ये माजरा क्या है

जाति और धर्म के सियासी क्रीड़ा स्थल में
बन गए सब तमाशबीन ये माजरा क्या है

ख्वाब में फिर-फिर चला आता है वो गांधी
पूछता है मेरे भारत में ये माजरा क्या है

कोई और बढ़िया रहा होगा दौर जीवन का
नए आकलन समीकरण ये माजरा क्या है

नई टोपी नया खद्दर का कुरता पहने रवि
दोस्तों से निगाहें चुराए ये माजरा क्या है

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सुर मिलाएँ ऑपेरा के साथ


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मैं इंटरनेट एक्सप्लोरर को एक अरसे से भूल चुका था (वैसे वेब के कई पन्ने ऐसे अभी भी हैं जो इंटरनेट एक्सप्लोरर के अलावा किसी भी अन्य ब्राउज़र में खुलते ही नहीं) . मोज़िल्ला और नेटस्केप मौसेरे भाई थे जो मुझे कभी नहीं सुहाए. फ़ॉयरफ़ॉक्स में दम दिखा था तो पिछले सालेक भर से न सिर्फ उसका ही दीवाना बना रहा, बल्कि औरों को भी प्रेरित करता रहा कि भाई, इसी का इस्तेमाल करो, ताकि इंटरनेट पर कुछ सुविधा और सुरक्षा से काम कर सको. ऊपर से यह विंडोज़ और लिनक्स में समान रूप से तो चलता ही था, इसके बुकमार्क इत्यादि भी आसानी से आयात-निर्यात हो सकते थे. इसमें अंतर्निर्मित आरएसएस फ़ीड जैसी सुविधाएँ भी थीं, और ढेरों प्लगइन्स भी.

पर फिर कुछ-कुछ दिक्कतें फ़ॉयरफ़ॉक्स में भी आने लगीं. बहुत पहले कभी ऑपेरा को आज़माया था, परंतु विश्व का सबसे तेज़ ब्राउज़र का दावा करने वाले से कभी बात बनी नहीं थी. सोचा इसका नया संस्करण 8 फिर से आजमाया जाए. और सचमुच, इसके संस्करण 8 ने तो कमाल कर दिया है.

ऑपेरा 8 के एडवेयर (उत्पाद जिसे मुफ़्त इस्तेमाल के लिए जारी किया जाता है, परंतु बदले में विज्ञापन दिखाया जाता है, और उत्पाद के लिए भुगतान किया जाकर विज्ञापनों से छुटकारा पाया जा सकता है) होने के बावजूद यह इंटरनेट एक्सप्लोरर और फ़ॉयरफ़ॉक्स की तुलना में कई गुना ज्यादा तेज़ तो चलता ही है, आपको इसका दीवाना बनाने के लिए इसमें कई अंतर्निर्मित ख़ूबियाँ तो हैं हीं, दर्जनों प्लगइन्स भी हैं.

उदाहरण के लिए, ऑपेरा ब्राऊज़र में जब आप किसी वेब पृष्ठ पर जाते हैं, तो अगर उस पृष्ठ का कोई फ़ीड (आरएसएस या ऍटम) उसे मिलता है, तो वह उसका प्रतीक एड्रेस बार में प्रदर्शित करता है. जैसे ही आप उस प्रतीक को क्लिक करते हैं, ऑपेरा आपके लिए उस फीड को स्वचालित सब्सक्राइब कर अलग फ़ीड बुकमार्क में रख लेता है. इसके व्यू को आप तीन तरीकों से सेट कर सकते हैं – कोई चित्र नहीं, कैश चित्र, तथा चित्र युक्त. पहला विकल्प आपको ब्राउज़िंग के लिए धुआंधार तेज रफ़्तार देता है. कैश चित्र भी तेज ही होता है चूँकि यह इंटरनेट से चित्रों को डाउनलोड नहीं करता है, वरन आपके हार्ड डिस्क में मौजूद चित्रों को ही दिखाता है. आप चित्रों को लोड करने का व्यवहार भी इसमें बदल सकते हैं. उदाहरण के लिए, फ़ॉयरफ़ॉक्स में होता यह है कि जितनी बार आप किसी पृष्ठ में जाएँगे, उतनी ही बार वह उस पृष्ठ की छवियों को इंटरनेट से डाउनलोड करता है. इससे इसकी गति में भयानक कमी आती है. ऑपेरा में आप यह सेट कर सकते हैं कि चित्रों को कितनी देर बाद फिर से डाउनलोड किया जाए या फिर दुबारा डाउनलोड किया जाए ही नहीं. कुल मिलाकर ऑपेरा का सारा ध्यान और सारी सुविधाएँ आपको इंटरनेट का सबसे तेज अनुभव देने के लिए है.

तो फिर देर किस बात की ? डाउनलोड करिए ऑपेरा 8 अभी ही. ज्यादा खुशी की बात है कि यह लिनक्स के लिए भी उपलब्ध है.

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