सोमवार, 9 अक्तूबर 2006

अपना भारत नं 1...

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भारत के खाते में एक और तमगा


नं1 की स्थिति में रहने पर हम सबको आनंद आता है. श्रेष्ठ और सर्वश्रेष्ठ की चाहत सबको होती है. दुनिया इसी धुरी पर चलती है नहीं तो कब का विराम हो जाता.

अपना प्यारा देश भारत भी कई मामलों में विश्व में नं1 है. हर्ष का विषय है कि एक बार फिर यह नं1 की स्थिति पर है. इस खुशी के मौके पर आप सबको बधाइयाँ व आने वाले वर्षों में यह स्थान बरकरार रहे इसके लिए शुभकामनाएँ. आखिर हम आप सभी के सद्प्रयासों से यह स्थान हासिल हुआ है. अतः बधाईयों व शुभकामनाओं के असली हकदार तो हमीं हैं.

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आज का व्यंज़ल चिट्ठाचर्चा में पूर्वप्रकाशित

कैसा है तेरे भीतर का आदमी झांक जरा
फल यहीं है, प्रयास को पहले आंक जरा

रोते रहे हैं भीड़ में अकेले पड़ जाने का
मुखौटा छोड़, दोस्ती का रिश्ता टांक जरा


फिर देखना कि दुनिया कैसी बदलती है
चख के देख अनुराग का कोई फांक जरा

दौड़ कर चले आने को लोग बैठे हैं तैयार
दिल से बस एक बार लगा दे हांक जरा


जनता समझेगी तेरे विचारों को भी रवि
अपने अबूझे चरित्र को पहले ढांक जरा

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2 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. लेने वाला खुश. देने वाला खुश. भारत नं. 1 बन के खुश. फिर टेंशन फ्री व्यंजल का मजा लो ना यार.

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  2. जनता समझेगी तेरे विचारों को भी रवि
    अपने अबूझे चरित्र को पहले ढांक जरा


    -सारे व्यंजल एक जगह कर लें, Index के साथ किसी ब्लाग पर. सभी बेहतरीन हैं.

    उत्तर देंहटाएं

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