सोमवार, 4 सितंबर 2006

वंदे मातरम्

(सत्तर के दशक में हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार अमृत राय द्वारा लिखा गया यह करारा व्यंग्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है. वंदेमातरम् गीत को लेकर तमाम विरोधाभास और विरोध चल उठे हैं - आपके लिए रचनाकार की विशेष की प्रस्तुति.)

वंदे मातरम्
- अमृत राय

अहा हा मां, तू कैसी सुजला है! जिधर देखो, पानी ही पानी. आज घाघरा में बाढ़ आई है तो कल सोन में. कभी गंगा हरहराती है तो कभी यमुना, कभी गोमती तो कभी सरयू- और फिर उत्तर-दक्षिण की भावात्मक एकता से परिचालित कृष्णा और गोदावरी भी क्योँ किसी से पीछे रहें. और ब्रह्मपुत्र तो जैसे ब्रह्मपुत्र ही है, उसमें क्या किसी से कम आवेग है! फलतः प्रलय का ऐसा सुंदर दृश्य उपस्थित होता है जिसके बारे में शायद किसी उर्दू शायर ने कहा है- ये देखने की चीज है, इसे बार-बार देख.

>>> आगे पढ़ें

.

.

0 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें

एक टिप्पणी भेजें

आपकी अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.
कृपया ध्यान दें - स्पैम (वायरस, ट्रोजन व रद्दी साइटों इत्यादि की कड़ियों युक्त)टिप्पणियों की समस्या के कारण टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहां पर प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

----

नया! छींटे और बौछारें का आनंद अपने स्मार्टफ़ोन पर बेहतर तरीके से लें. गूगल प्ले स्टोर से छींटे और बौछारें एंड्रायड ऐप्प image इंस्टाल करें. ---