टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

वंदे मातरम्

(सत्तर के दशक में हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार अमृत राय द्वारा लिखा गया यह करारा व्यंग्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है. वंदेमातरम् गीत को लेकर तमाम विरोधाभास और विरोध चल उठे हैं - आपके लिए रचनाकार की विशेष की प्रस्तुति.)

वंदे मातरम्
- अमृत राय

अहा हा मां, तू कैसी सुजला है! जिधर देखो, पानी ही पानी. आज घाघरा में बाढ़ आई है तो कल सोन में. कभी गंगा हरहराती है तो कभी यमुना, कभी गोमती तो कभी सरयू- और फिर उत्तर-दक्षिण की भावात्मक एकता से परिचालित कृष्णा और गोदावरी भी क्योँ किसी से पीछे रहें. और ब्रह्मपुत्र तो जैसे ब्रह्मपुत्र ही है, उसमें क्या किसी से कम आवेग है! फलतः प्रलय का ऐसा सुंदर दृश्य उपस्थित होता है जिसके बारे में शायद किसी उर्दू शायर ने कहा है- ये देखने की चीज है, इसे बार-बार देख.

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