आसपास की कहानियाँ ||  छींटें और बौछारें ||  तकनीकी ||  विविध ||  व्यंग्य ||  हिन्दी || 2000+ तकनीकी और हास्य-व्यंग्य रचनाएँ -

एक नया बयान


.
साहित्य, संस्कृति तथा सामाजिक सरोकारों के लिए एक नया बयान

नामचीन लेखक - मोहनदास नैमिशराय, जिन्हें वर्ष 2006 के लिए हिन्दी साहित्य के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए चुना गया है, के संपादन में हिन्दी साहित्य, संस्कृति तथा सामाजिक सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध एक नई पत्रिका - ‘बयान' का प्रकाशन प्रारंभ किया गया है.

‘बयान' का प्रवेशांक (अगस्त 2006) दुबला पतला मरियल सा, पचास पृष्ठों का है जो कि आम हिन्दी पत्रिकाओं की दयनीय स्थिति बयान करता फिरता है. अमूनन, पत्रिकाओं के प्रवेशांक अपने सामान्य अंकों से ज्यादा ग्लैमरस होते हैं, परंतु ‘बयान' के प्रवेशांक में ऐसी कोई बात नजर नहीं आती.

वैसे, अपने प्रवेशांक में ‘बयान' ने सामाजिक सरोकारों से अपनी सम्बद्धता दर्शा दी है. ‘नई शताब्दी में औरत और उसकी अस्मिता' शीर्षक से चुनिंदा आलेख हैं जो नारी पीड़ा और नारी उत्पीड़न के तमाम कारणों को बयान करते हैं. देश के विभिन्न भागों की देह मंडियों के बारे में बहुत से आलेख हैं. परंतु ये आलेख खोजपरक होने के बजाए महज विषय व पृष्ठों की खानापूर्ति करते ज्यादा नजर आते हैं.

‘बयान' में प्रकाशित दो अदद कहानियाँ व चंद कविताएँ व ग़ज़लें अच्छे चयन की उम्मीद जगाते हैं. भरत डोगरा का आलेख - "जिस देश का बचपन भूखा है" पाठक को सोचने व कुछ करने को उद्वेलित करता है.

.

.

प्रवेशांक के संपादकीय में मोहनदास नैमिशराय आगाह करते हैं - ‘हमें तिरंगा और संविधान की अस्मिता को भी बचाकर रखना है.'

और, उनका कहा कितना समीचीन है. वंदेमातरम् को गाएँ या नहीं इस पर देश में धार्मिक राजनीतिक विभाजन हो चला है, और संविधान की मूल आत्मा को तो पता नहीं कितनी बार छुद्र राजनीतिक स्वार्थों के चलते तोड़ मरोड़ दिया गया है!

‘बयान' की कीमत बहुत वाजिब है - मात्र दस रुपए. सौ रुपयों में इसका वार्षिक ग्राहक बना जा सकता है. जो काग़ज़ इस्तेमाल किया गया है, वह उच्चकोटि का है. मुद्रण व लेआउट आकर्षक, त्रुटि रहित है. कुछ आलेखों के साथ दिए गए श्वेत श्याम चित्र जरूर अनाकर्षक व अनावश्यक प्रतीत होते हैं. उम्मीद है, इन खामियों को आने वाले अंकों में दूर कर लिया जाएगा.

उम्मीद है, ‘बयान' अपने उद्देश्यों में सफल होगा और मरती डूबती हिन्दी पत्रिकाओं की भीड़ में अपना वजूद और पहचान बनाए रखने में कामयाब होगा. ‘बयान' को हार्दिक शुभकामनाएँ.

बयान
प्रवेशांक, अगस्त 2006, मूल्य 10/-
संपादक व प्रकाशक - मोहनदास नैमिशराय
पता - बी.जी. 5 ए/30-बी, पश्चिम विहार, नई दिल्ली.

**-**

टिप्पणियाँ

विशाल लाइब्रेरी में से पढ़ें >

अधिक दिखाएं

---------------

छींटे और बौछारें का आनंद अपने स्मार्टफ़ोन पर बेहतर तरीके से लें. गूगल प्ले स्टोर से छींटे और बौछारें एंड्रायड ऐप्प image इंस्टाल करें.

इंटरनेट पर हिंदी साहित्य का खजाना:

इंटरनेट की पहली यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित व लोकप्रिय ईपत्रिका में पढ़ें 10,000 से भी अधिक साहित्यिक रचनाएँ

हिन्दी कम्प्यूटिंग के लिए काम की ढेरों कड़ियाँ - यहाँ क्लिक करें!

.  Subscribe in a reader

इस ब्लॉग की नई पोस्टें अपने ईमेल में प्राप्त करने हेतु अपना ईमेल पता नीचे भरें:

FeedBurner द्वारा प्रेषित

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

***

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद करें