अप्रैल 05 में छींटे और बौछारें में प्रकाशित रचनाएँ

ये देश मलाईदार!



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सदियों पहले भारत, सोने की चिड़िया कहलाता था. जब वास्को डि गामा, भारत के लिए समुद्री रास्ता ढूंढ कर वापस पुर्तगाल पहुँचा था तो पुर्तगाल में महीनों तक राष्ट्रीय जश्न मनाया गया था- सिर्फ इसलिए कि अमीर-सोने की चिड़िया – भारत - से व्यापार-व्यवसाय का एक नया, आसान रास्ता खुला जिससे पुर्तगालियों का जीवन स्तर ऊँचा उठ जाएगा.

तब से, लगता है, यह जश्न जारी है. पुर्तगालियों के बाद अंग्रेजों ने जश्न मनाए और उसके बाद से मलाईदार विभाग वाले नेता-अफ़सरों द्वारा जश्न मनाए जाने का दौर निरंतर जारी है.

सोने की यह चिड़िया आज लुट-पिट कर भंगार हो चुकी है, परंतु उसमें से भी मलाई चाटने का होड़ जारी है.
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व्यंज़ल
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सभी को चाहिए अनुभाग मलाईदार
कुर्सी टूटी फूटी हो पर हो मलाईदार

अब तो जीवन के बदल गए सब फंडे
कपड़ा चाहे फटा हो खाइए मलाईदार

अपना खाना भले हज़म नहीं होता हो
दूसरी थाली सब को लगती मलाईदार

जारी है सात पुश्तों के मोक्ष का प्रयास
कभी तो मिलेगा कोई विभाग मलाईदार

जब संत बना रवि तो चीज़ें हुईं उलटी
भूखे को भगाते अब स्वागत मलाईदार

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एक माइक्रॉन मुस्कान:
एक बच्चा अपनी माँ को सफ़ाई देता हुआ- “उस लड़के को पलटकर पत्थर मारने के सिवा मेरे पास कोई रास्ता नहीं था माँ, क्योंकि वह भाग रहा था और मुझे अच्छी तरह पता था कि तुम्हें बताने से कोई फ़ायदा नहीं होता क्योंकि तुम्हारा निशाना तो एकदम कच्चा है...”

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कानून को कौन मानता है?



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अगर आपके पास पॉवर है, पैसा है, पोज़ीशन है तो आप बेवकूफ़ कहलाएँगे जो क़ानून को मानेंगे. क़ानून तो आम-आदमी के लिए ही होता है. ग़रीब, दरिद्र, दलित के लिए ही होता है क़ानून. झारखंड किस्से में कार्यपालिका – न्यायपालिका आपस में उलझ ही पड़ी थीं क़ानून के पालन में, और अब ये नया क़िस्सा.

ऐसे किस्से कई हैं. ऐसे ही कुछ प्रकरणों में जब मध्यप्रदेश के ट्रिब्यूनल (प्रशासकीय प्रकरणों के लिए उच्चन्यायालय की एक शाखा) ने तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की सरकार के विरुद्ध दनादन निर्णय दिए गए, तो सरकार ने ट्रिब्यूनल को ही समाप्त कर दिया था.

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व्यंज़ल
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फिर किस लिए ये क़ानून हैं
शायद मेरे लिए ही क़ानून हैं

बने हैं सरे राह मंदिर मस्जिद
जहां चलने के भी क़ानून हैं

खुदा के बन्दों ने छीनी वाणी
बोलने न बोलने के क़ानून हैं

मंज़िल की आस फ़ज़ूल है यहाँ
हर कदम क़ानून ही क़ानून हैं

कैद में है रवि, दोषी स्वतंत्र हैं
कैसा ये देश है कैसे क़ानून हैं
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एक घिसा-पिटा चुटकुला: (हँसना ज़रूरी है)
शिकायत करती हुई प्रेयसी: “तुम बड़े वो हो... जब तुम मेरे सपने में ऐसी हरकतें कर सकते हो तो हक़ीक़त में न जाने क्या करोगे...”
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हिंदी समाचार साप्ताहिक आउटलुक के इस दफ़ा के होली विशेषांक में हास्य-व्यंग्य पर दी गई सामग्री घोर अपठनीय रही. दरअसल, जब आप साहित्य के हास्य-व्यंग्य-सुपर-स्टारों से जबरिया (निवेदन कर) लिखवाएँगे तो यही होगा. विषय-सामग्री, अंदाज़े-बयाँ सब कुछ चुकी हुई, टाइप्ड और पुरानी.

हाँ, पृष्ठ 56-57 पर चुटकुलों का संकलन ज़रूर नया अंदाज लिए हुए था. नेताओं पर मरफ़ी के कुछ नियम यहां भी दिए गए थे जो जोरदार रहे. कुछ नियमों का मुलाहिजा आप भी फ़रमाएँ-
• नेता वह आदमी है जो देश के लिए देश की जनता की जान की बाजी लगा दे.
• नेता ऐसी जगह पुल बनवाने का वादा करता है जहाँ नदी या नहर न हो.
• नेता वह है जो पहले तो क़ानून बनवाता है फिर बाद में क़ानून की नज़रों में धूल झोंकता है.
• 90 प्रतिशत नेता गंदे होते हैं जो शेष 10 प्रतिशत को गंदा कर देते हैं.
• चुनावों में हमेशा दो बुरे नेता में से किसी एक का चुनाव करना होता है.
• नेता वह व्यक्ति है जो कुरसी के लिए देशभक्त भी बन सकता है.
• नेता अपने वादों का पक्का होता है. जो वादा वह आज के चुनावों में कर रहा होता है, वही पाँच साल बाद और उसके और पाँच साल बाद के चुनावों में भी करता है.
• नेता की आत्मा कुरसी में होती है.

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धो डाला




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यह भी ख़ूब रही. एक अध्ययन के अनुसार, वैश्विक प्रदूषण के लिए जिम्मेदार फ़ैक्टरों में हमारे-आपके सिर की रूसी भी शामिल है, और यह जिम्मेदारी आंकड़ों के लिहाज से कम कतई नहीं है. वातावरण को प्रदूषित बनाने वाले कणों में हमारे सिर के रूसी की मात्रा आश्चर्यजनक रूप से 25 प्रतिशत तक हो सकती है.
अभी तक तो हम अपने आसपास के केरोसीन चालित ऑटो-टैम्पो, कारख़ानों तथा टूटी-फ़ूटी धूलभरी सड़कों को ही वातावरण के प्रदूषण के लिए मुख्य रूप से जिम्मेवार मानते चले आए थे. लगता है अब हमें अपनी सोच बदलनी पड़ेगी. धरना-आंदोलनों का स्वरूप बदलना होगा. सामाजिक जागरूकता के नए अभियान चलाने होंगे. रूसी को ख़त्म करने के व्यक्तिगत फ़ायदों के साथ वैश्विक फ़ायदों के बारे में लोगों को बताना होगा. रूसी को धो डालने के लिए एक नई क्रांति की शुरूआत करनी होगी.

पर इसके विरोधी भी शीघ्र प्रकट हो जाएँगे जो इस बात को सिरे से नकार देंगे कि हमारे-आपके सिर की रूसी भी भला वातावरण-प्रदूषण के लिए जिम्मेवार हो सकती है. वे इसे बहुराष्ट्रीय-एंटी-डैण्ड्रफ़ शैम्पुओं-तेलों के उत्पादक कंपनियों द्वारा प्रायोजित अध्ययन करार देंगे और उनके प्रतिष्ठानों पर तमाम तरीकों से हमले की तैयारियाँ करेंगे.
इस मामले में, मेरे जैसे गंजे होते जा रहे लोगों के लिए यह खब़र थोड़ा सुकून दायक हो सकती है. सिर के बालों की रूसी की वजह से हो रहे वैश्विक प्रदूषणों के लिए कम से कम हमें तो जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकेगा.
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पूरा का पूरा मिलावटी...



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क्या आपको पता है कि भारत में जो पेट्रोल या डीज़ल आप अपने वाहनों में डलवा रहे हैं वह पूरा का पूरा मिलावटी है? आउटलुक के ताज़ा अंक में यह खुलासा किया गया है कि पूरे भारत भर में पेट्रोल / डीज़ल में किरोसीन, नेफ़्था तथा डीज़ल आल्टरनेटिव की 40 से 45 प्रतिशत तक मिलावट की जाती है. और इस तरह, भारत और इसकी नादान जनता को प्रतिवर्ष 40,000 करोड़ रुपयों का चूना लगाया जाता है. तमाम जानकारियाँ होने के बावजूद इसे रोकने के लिए कुछ खास नहीं किया जा रहा है. इस रपट की सत्यता में कोई गुंजाइश नहीं है चूंकि इसका भुक्तभोगी मैं स्वयं हूँ.

कुछ समय पूर्व मैंने होंडा एक्टिवा स्कूटर खरीदा थी. फ़ोर स्ट्रोक इंजन युक्त यह स्कूटर मेरे शहर की गड्ढों भरी सड़कों में भी कुछ कम झटका देता है. परंतु पिछले दिनों, खरीदने के तीन महीने पश्चात् ही अचानक मेरा स्कूटर चलते-चलते ही बंद हो गया. जाँच से पता चला कि इंजन का पिस्टन जाम हो गया है. और इस जाम का कारण था मिलावटी पेट्रोल. इस तरह मेरा नया होंडा स्कूटर मिलावट की भेंट चढ़ गया.

ये मिलावटें पता नहीं और क्या क्या भेंटें लेती रहेंगीं?

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व्यंज़ल
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नहीं कयास कहाँ कहाँ हैं मिलावटें
मुस्कराहटों में मिलती हैं मिलावटें

उनकी हकीकतों का हो क्या गुमाँ
चाल में उनने भर ली हैं मिलावटें

कोई और शख़्स था वो मेरा दोस्त
ढूंढे से भी नहीं मिलती हैं मिलावटें

अपना भ्रम अब टूटे तो किस तरह
असल की पहचान बनी हैं मिलावटें


आसान हो गया है रवि का जीवन
अब अपनाई उसने भी हैं मिलावटें

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तमाम देश में दाग...



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भारत के सरकारी तंत्र में फैले भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए एक एजेंसी केंद्रीय सतर्कता आयोग भी है. आयोग की वेब साइट पर दागी अफ़सरों की एक सूची उनके सम्बन्धित विभागों द्वारा कार्यवाही किए जाने के इंतजार में दिसम्बर 04 से टंगी हुई, धूल खा रही है. यह सूची खासी बड़ी है, जिसमें 70 अफ़सरों के विरूद्ध कार्यवाही की अनुशंसा की गई है. यह तो वह सूची है जिसके विरुद्ध सबूत मिलने के पश्चात् कार्यवाही की अनुशंसा की गई है, अत: जाहिर है उस सूची की लम्बाई का अंदाजा लगाया जा सकता है जहाँ सबूतों-साक्ष्यों के लिए जाँच की जा रही होगी.

सच है, दाग धुलने में आसान नहीं होते और कुछ दाग ऐसे होते हैं जो धोए ही नहीं जा सकते...
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व्यंज़ल
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बढ़ती जा रही हैं मुश्किलों पे मुश्किल
इस दौर में बेदाग बने रहना मुश्किल

तमाम परिभाषाएँ बदल गईं इन दिनों
दाग को अब दाग कहना है मुश्किल

गर्व अभिमान की ही तो बातें हैं दाग
जाने क्यों कबीर को हुई थी मुश्किल

दागों को मिटा सकते हैं बड़े दागों से
दाग मिटाना अब कोई नहीं मुश्किल

रवि ने जब लगाए खुद अपने पे दाग
जीना सरल हुआ उसका बड़ा मुश्किल

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कम होती दिलों की दूरियाँ...


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भारत-पाकिस्तान बस सेवा के बहाल होने से एक बार फिर कश्मीर समस्या के हल होने की उम्मीद जगी है और बौखलाए हुए आतंकवादी के कुछ ताज़ा-तेज हमलों के बीच अवाम में फिर से अमन शांति बहाल होने की उम्मीद की जा सकती है.

इस मौक़े पर एक प्रसिद्ध गीत के कुछ भाव याद आ रहे हैं-

काश मेरी दुनिया यूँ होती
कोई देश, राज्य न होता
कोई सीमाएँ नहीं होतीं
कोई धर्म नहीं होता
सर्वत्र प्यार होता
काश मेरी दुनिया यूँ होती...

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बहरहाल, मेरे मुहल्ले का राजू पनवाड़ी चीज़ों को दूसरी दृष्टि से देखता है. उधारी मांगने वालों से पीछा छुड़ाने के लिए उसने अभी-अभी ही यह सूचना चिपकाई है-



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बेशर्मी का तेज बहाव...


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देवास जिले के धाराजी में नर्मदा घाट पर प्रतिवर्ष मेला लगता है जहाँ तांत्रिक अपने मरीजों के साथ आते हैं और उनके भूत भगाने के कर्मकांड करते हैं. इस दफ़ा कुछ हादसा यूँ हुआ कि अचानक ही, अविश्वसनीय तरीके से नर्मदा नदी भरी गरमी में उफनने लगी और देखते देखते वहाँ बाढ़ आ गई. नतीजतन भूत भगाने वाले तांत्रिक भूतों से पहले तो भागे ही, मरीज और श्रद्धालु भी जान बचाने के लिए भागे. भगदड़ में कई घायल हुए और बाढ़ में बहकर सौ से अधिक लोग लापता हो गए, जिनकी डूब कर मरने की आशंका व्यक्त की जा रही है. लाशों के मिलने का सिलसिला जारी है...

और अब, प्रशासनिक अधिकारी अपनी जिम्मेदारी बचाने के लिए भागम-भाग कर रहे हैं. मेलों में भीड़ और आपदा प्रबंधनों की बातें कही जाती है, परंतु कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किए जाते, जिसके कारण ऐसी मौतें होती रहती हैं. कुछ समय पहले ही महाराष्ट्र में एक मेले के दौरान भीड़ में भगदड़ मचने से मौतें हुईं थीं. दरअसल, हर कहीं चलताऊ एटिट्यूड के कारण ऐसी समस्याएँ आती हैं. यहाँ भी प्रशासन का दावा है कि उसने नर्मदा बिजली परियोजना के अधिकारियों को उस क्षेत्र में मेला लगने की सूचना दी थी और बाँध से पानी कम छोड़ने को कहा था. वहीं दूसरी ओर नर्मदा बिजली परियोजना के अधिकारी ऐसी किसी बात से इनकार करते हैं कि उन्हें इसकी पूर्व सूचना दी गई. फलस्वरूप अतिरिक्त पन बिजली उत्पादन के कारण बाँध से अधिक मात्रा में पानी छोड़ा गया और मेला क्षेत्र में बाढ़ आ गई.

बेशर्मी के तेज़ बहाव का जिम्मेदार कौन है? निश्चित ही प्रशासन का बेशर्मी-चलताऊ एटिट्यूड.
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व्यंज़ल
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अंतत: बन ही गया वो बेशरम
नाम कमाने लगा है वो बेशरम

सिंहासन पर बैठ कर त्याग के
सब को प्रवचन देता वो बेशरम

पाँच वर्षों में ढेरों तब्दीलियों के
सब्ज बाग़ दिखाता वो बेशरम

अरसे से टूटा नहीं अमन चैन
किस खयाल में है वो बेशरम

फटे कपड़े पहन रखे हैं रवि ने
नए फैशन में बना वो बेशरम

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कम्प्यूटर – आईटी प्रोफ़ेशनल्स के लिए मरफ़ी के नियम:


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• यदि आपका कोड पहली मर्तबा में ही बिना बग के सही चलता प्रतीत होता है तो इसका मतलब यह है कि आपने कोड में कहीं कुछ अनदेखा किया है.
• जब भी आप कोई प्रोग्राम कोड लिखने जाते हैं, तो पता चलता है कि पहले तो कुछ और किया जाना जरूरी है.
• डाटा खराब होने की दर उनके मूल्यों के सीधे अनुपात में होती है.
• अनुप्रयोग नाम जितना आकर्षक होगा, उतना ही बेकार उसका उपयोग होगा.
• आप किसी सॉफ़्टवेयर को तब तक अच्छा नहीं कह सकते जब तक कि आप उसे आसानी से अपने कम्प्यूटर पर संस्थापित न कर लें तथा उसे उतनी ही आसानी से अपने कम्प्यूटर से अ-संस्थापित न कर लें.
• गुप्त स्रोत कोड ज्यादा विश्वसनीय होते हैं.
• सभी शब्द संसाधक जो एक जैसे काम करते हैं, एक जैसे नहीं होते हैं.
• मुस्कुराएँ... क्योंकि आने वाले कल को चिप्स (कम्प्यूटर) सस्ते होंगे.
• यदि आपका प्रोग्राम सही चल रहा है तो घबराएँ नहीं. यह प्रोग्राम इस अवस्था से शीघ्र ही बाहर आ जाएगा.
• किसी भी दिए गए हार्ड डिस्क में उपलब्ध समस्त जगहों को बेकार के प्रोग्राम शीघ्र ही घेर लेते हैं.
• जो प्रोग्राम आपके पास है, वह निश्चित ही पुराना, अप्रचलित है.
• जो हार्डवेयर आपके पास है, वह निश्चित ही पुराना, अप्रचलित है.
• जब भी कोई प्रोग्राम क्रैश होता है, तो वह सर्वाधिक गंभीर नुकसान पहुँचाता है.
• ऑपरेटिंग सिस्टम का कर्नेल न्यूनतम जगह घेरता है, परंतु अधिकतम समस्या पैदा करता है.
• किसी भी दिए गए प्रोसेसर की प्रोसेसिंग में धीमी गति असहनीय होती है.
• जब तक एक उपयोक्ता किसी कम्प्यूटर प्रोग्राम को सीख पाता है, तब तक प्राय: वह प्रोग्राम पुराना, अप्रचलित हो जाता है.
• जब तक एक प्रोग्रामर किसी कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा को सीख पाता है, तब तक प्राय: वह वह प्रोग्रामिंग भाषा पुरानी, अप्रचलित हो जाती है.
• किसी भी समय, जब कोई सॉफ़्टवेयर प्रदर्शित किया जाता है तो उसके क्रैश होने की संभावना ऑडियंस की संख्या के सीधे अनुपात में होती है.
• इससे पहले कि आपका निर्णायक प्रोग्राम मिल जाए, आपको अपने कम्प्यूटर में ढेर सारे प्रोग्राम संस्थापित करने होते हैं.
• किसी सॉफ़्टवेयर की मदद फ़ाइल का आकार उस सॉफ़्टवेयर की जटिलता के सीधे अनुपात में होती है.
• हर नर्ड (कम्प्यूटर गुरु) अपने भीतर की ख्वाहिश के मुताबिक बग मुक्त प्रोग्राम लिख तो लेता है, परंतु वह प्रोग्राम नहीं चलता.
• प्राय: सभी प्रोग्राम संस्थापित करने में आसान होते हैं बनिस्बत अ-संस्थापित करने के.
• कोई बग तब तक प्रकट नहीं होता जब तक कि वह प्रोग्राम जारी नहीं हो जाता.
• जब आप किसी प्रोग्राम को अ-संस्थापित कर लेते हैं तो उसकी आवश्यकता एक घंटे के भीतर ही महसूस होने लगती है.
• जो प्रोग्राम आपके पास हैं, ये वो नहीं हैं जो आप चाहते हैं.
• जो प्रोग्राम आपके पास हैं, ये वो नहीं हैं जो आपके लिए आवश्यक हैं.
• जो प्रोग्राम आपको आवश्यक हैं, ये वो नहीं हैं जिन्हें आप पा सकते हैं.
• जो प्रोग्राम आप प्राप्त करना चाहते हैं, उनकी क़ीमत आपके हिसाब से बहुत ज्यादा है.
• सर्वाधिक अवांछनीय चीज़ें ही सर्वाधिक निश्चित होती हैं – मृत्यु, टैक्स तथा सिस्टम क्रैश.
• जो हार्ड डिस्क क्रैश होता है, उसमें ही महत्वपूर्ण डाटा होता है.
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व्यंग्य
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हार्दिक बधाई!


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इस बार भी त्यौहार पर आपको इधर उधर से, इनसे-उनसे ढेरों बधाइयाँ प्राप्त हुई होंगी और आपने भी ढेरों बधाइयाँ ढेरों लोगों को दी होंगी. मगर क्या आपने बधाइयों के लेन-देन के तह तक पहुँचने की कभी कोशिश की है? आपने यह जानने की कोशिश की है कि आपको बधाइयाँ दी हैं तो किन लोगों ने और क्यों दी हैं, और आपने भी जो खुले दिल से ढेरों बधाइयाँ बाँटीं हैं, किन-किन को, कैसे-कैसों को, किस-तरह और आख़िर क्यों दी हैं? संभवत: सबसे पहले, समय पर, आवश्यक और अनिवार्य रूप से बधाई आपको उन लोगों से मिली होंगी जिन्हें आपसे कुछ लेना होगा. अब वह चाहे दीवाली की बख्शीश हो, कोई उपकार हो या आपका पुराना उधार. आपको पहले पहल जिनसे बधाई मिली होगी, उनमें आपके ऑफ़िस का चापलूस कामचोर कर्मचारी, आपको उधार किराना सप्लाई करने वाला दुकानदार इत्यादि तो शामिल होंगे ही, आपके वे मित्र भी शामिल हो सकते हैं जिनसे अरसा पहले आपने कभी कुछ उधार लिया हुआ होगा. और उधार में शामिल हो सकते हैं सभी कुछ – किताबें, मर्तबान से लेकर बुलवर्कर तक. और, इनकी पहले पहल, आप तक पहुँचने वाली बधाइयाँ शर्तिया आपको उनका उधार चुकाने या बख्शीश थमाने या अगले साल भर तक उनकी कामचोरी को बर्दाश्त करने की याद दिलाई ही होंगी. इसी तरह, अनिवार्यत: कुछ पहले पहल बधाइयाँ आपको अपने मातहतों से मजबूरीवश प्राप्त हुई होंगी जो चाहते तो हैं आपका बेड़ा गर्क करना परंतु जुबान से तमाम ब्रम्हाण्ड की शुभकामनाएँ देते हैं.

कुछ उन लोगों ने भी इस दफ़ा आपको बधाई दी होगी जिन्होंने जिन्दगी में इससे पहले कभी आपको बधाई दी नहीं होगी और जिनका आइन्दा ऐसा कोई इरादा भी नहीं होगा. ये वो लोग होंगे जिनका काम आपसे हाल ही में पड़ा होगा या पड़ने वाला होगा और जिनका काम आपके कारण पार लगा होगा या लगने वाला होगा. ऊपर से तारीफ की बात यह होगी की ऐसी बधाइयाँ आपको अन्यों या अन्य किसी भी प्रकार की बधाई से ज्यादा आत्मीय ढंग से मिली होंगी. कुछेक बधाइयाँ आपको जवाब में इसलिए मिली होंगी चूंकि आपने पहले ही उन्हें बधाई जो दे दी है. कुछ बधाइयाँ, आपसे बधाइयाँ प्राप्त करने की प्रत्याशा में भी आपको मिली होंगी और कुछ बधाइयाँ अकारण आपको मिली होंगी – जैसे कि किसी समूह में आप बैठे हों तो किसी अन्य का परिचित शिष्टाचारवश अकारण सभी को बधाई देता ही है या आपके घर के किसी सदस्य के नाम आए बधाई कार्ड में भी शिष्टाचारवश, अकारण, आपका भी नाम उसमें घसीटा हुआ होता है.

कुछ सस्ती तो कुछ मंहगी बधाइयाँ भी आपको मिली होंगी. जो आपके खास होंगे, या इसका उलटा – आप जिनके खास होंगे उनसे आपको खासे मंहगे बधाई (कार्ड) मिले होंगे. खासकर उनसे जो अपना खास-पना खासी मोटी इबारत में बताना चाहते हैं. कुछ बधाइयाँ आपको ऐसी भी मिली होंगी, जो थोक के भाव में खरीदे या छपाए गए बधाई कार्डों में से अपरिचितों – परिचितों को भेज चुकने के बाद भी बच जाते हैं और फिर आपका नाम भी शामिल हो जाता है – चलो इनको भी भेज देते हैं, कार्ड क्यों खराब हों – की तर्ज पर.

कुछ एक्सक्लूसिव क़िस्म की बधाइयाँ आपको अपने पसंदीदा टीवी चैनलों या पत्र-पत्रिकाओं से मिली होंगी जिन्हें आप देखते-पढ़ते हैं, क्योंकि ये सिर्फ और सिर्फ अपने ही दर्शकों-पाठकों-अभिकर्ताओं को बधाई देते हैं. कुछ आम माफ़ी की तरह की आम बधाइयाँ आपको नेताओं-अभिनेताओं-मंत्रियों से मिली होंगी जो हर संभव तरीक़े से अपने प्रचार प्रसार के लिए अपनी आम बधाई आप तक पहुँचाने के लिए कटिबद्ध रहते हैं – हर मौक़े पर.

यूं, आपके हिस्से की हार्दिक बधाई आप तक विभिन्न रास्तों से पहुँची होगी. इंटरनेट के ई-कार्ड से लेकर ईमेल तक तथा पत्र-पोस्टकार्ड से लेकर फैक्स-फोन तक. परन्तु बधाई कार्ड से बधाई देने-लेने का तरीका आजकल इतना आम हो गया है कि बहुत संभव है कि न सिर्फ आपके पड़ोसियों ने बधाई कार्ड द्वारा आपको बधाई दी हो, बल्कि घर के सदस्यों ने भी यही रास्ता अपनाया हो आपको बधाई देने का.

आपको मिलने वाली बधाइयों का लेखा-जोखा तो आपने कर लिया, परन्तु जो हार्दिक बधाइयाँ आपने औरों को दी हैं, उनके बारे में क्या रेकॉर्ड हैं आपके पास?

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आसमां से आया कोहनूर हीरा...



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आज सुबह अचानक मौसम बदला और थोड़ी बूंदा बांदी हुई तो पेड़ पौधे भी मदमस्त होकर झूमने लगे. एक पौधे को तो यह बूंदा-बांदी इतनी अधिक भाई की उसने अपने रंगीन पत्तों में बूंदों की इन कणों को सहेज-समेट कर रख लिया. एक पत्ते पर जल की बूंदें एकत्र होकर ऐसा आभास पैदा कर रही थीं, मानो आसमां से दैदीप्यमान, अनमोल, कोहनूर हीरा उसके हाथों में आ टपक पड़ा हो.
(पूरे आकार में चित्र यहाँ मौज़ूद है)

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आशा ही जीवन है



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कहानी
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“तुम्हारे रतलाम के डॉक्टर डॉक्टर हैं या घसियारे?” एमवाय हॉस्पिटल इन्दौर के हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. अनिल भराणी ने मरीज को पहली ही नज़र में देखते हुए गुस्से से कहा. इकोकॉर्डियोग्राफ़ी तथा कलर डॉपलर स्टडी के ऊपरांत डॉ. भराणी का गुस्सा और उबाल पर था - “ये बेचारा हृदय की जन्मजात् बीमारी की वज़ह से नीला पड़ चुका है और वहाँ के डाक्टर इसे केजुअली लेते रहे. कंजनाइटल डिसीज़ में जितनी जल्दी इलाज हो, खासकर हृदय के मामले में, उतना ही अच्छा होता है.”. उसने मरीज की ओर उंगली उठाकर मरीज के परिजनों पर अपना गुस्सा जारी रखा – “अब तो इसकी उम्र पैंतीस वर्ष हो चुकी है, सर्जिकल करेक्शन का केस था, अब समस्या तो काफी गंभीर हो चुकी है. मगर फिर भी मैं इसे अपोलो हॉस्पिटल चेन्नई रेफर कर देता हूँ. लेट्स होप फॉर सम मिरेकल.”

मरीज और उसके घर वालों को यह तो पता था कि वह सामान्य लोगों से थोड़ा कमजोर है, परन्तु अब तक उसे खांसी सर्दी के अलावा कभी कोई स्वास्थ्य संबंधी परेशानी नहीं हुई थी. डॉक्टरों ने भी कभी कोई ऐसी वैसी बात नहीं बताई थी. वह तो जाने कैसा मलेरिया का आक्रमण पिछले दिनों हो गया था जिसके कारण इलाज के बावजूद मरीज चलने फिरने में भी नाकाम हो रहा था, और तब इलाज कर रहे डॉक्टर को कुछ शक हुआ और फिर उसने इन्दौर के हृदयरोग विशेषज्ञ को दिखाने की सलाह दी थी.

अपोलो हॉस्पिटल चेन्नई में मरीज के हृदय का एंजियोग्राम किया गया. पता चला कि उसका हृदय छाती में बाएँ बाजू के बजाए दाएँ तरफ स्थित है, और इस वजह से ढेरों अन्य कॉम्प्लीकेशन्स भी भीतर मौजूद हैं. उसके – हृदय में बड़ा सा छेद है, उसकी धमनी और शिराएँ आपस में बदली हुई हैं, पल्मनरी वॉल्व केल्सिफ़ाइड है, ऑरोटा कहीं और से निकल रहा है, कोरोनरी आर्टरी (शिरा जो हृदय को धड़कने के लिए खून पहुँचाती है) एक ही है (सामान्य केस में दो होती हैं), पल्मोनरी हायपरटेंशन है... इत्यादि.

दरअसल, इतने सारे कॉम्प्लीकेशन्स के कारण मरीज के हृदय तथा शरीर में खून का बहाव ग्रोइंग एज में तो जैसे तैसे कम्पनसेट हो रहा था, परंतु उम्र बढ़ने के साथ गंभीर समस्याएँ पैदा कर रहा था.

अपोलो हॉस्पिटल के हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. के. सुब्रमण्यम ने पहले तो मरीज के हृदय की सर्जरी के लिए सुझाव दिया, परंतु हृदय-शल्य चिकित्सक डॉ. एम. आर. गिरिनाथ से कंसल्ट करने के उपरांत अपनी मेडिकल एडवाइस में मरीज के लिए यह लिखा-



“चूंकि मरीज के हृदय की करेक्टिव सर्जरी में सर्जरी के दौरान तथा उसके उपराँत मृत्यु की संभावना अत्यधिक है, अत: मरीज को दवाइयों पर निर्भर रहने की सलाह दी जाती है.”

और उन्होंने जो दवाई लिखी वह थी – 0.25 मिलीग्राम अल्प्राजोलॉम – एक अत्यधिक ए़डिक्टिव, नशीली दवाई जो डिप्रेसन, अवसाद को तथाकथित रूप से खत्म करती है – और जिसका हृदय रोग के इलाज से कोई लेना देना नहीं है.

डॉ. गिरीनाथ ने मरीज को आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) के हृदय-शल्य चिकित्सक डॉक्टर के. एस. अय्यर को रेफर कर दिया चूँकि वे कंजनाइटल कार्डियाक डिसीज़ के करेक्टिव सर्जरी के विशेषज्ञ थे.

एम्स में एक बार फिर से मरीज का एन्जियोग्राम किया गया. जहाँ प्राइवेट अपोलो हस्पताल में 16 हजार रूपए में तीन दिन में एन्जियोग्राम किया जाकर उसकी रपट मिल गई थी, सरकारी एम्स में एन्जियोग्राम के लिए तीन महीने बाद का समय दिया गया, एन्जियोग्राम के तीन महीने पहले तय समय के आठ दिन पश्चात् एन्जियोग्राम किया गया और उसके भी सात दिन बाद रपट दी गई. एन्जियोग्राम के लिए सरकारी कंशेसन युक्त फीस के 7 हजार रुपए लिए गए, परंतु दो बार की दिल्ली की सैर और 20 दिन वहाँ रूकने के फलस्वरूप 20 हजार और खर्च हो गए.

एन्जियोग्राम की स्टडी – एम्स के हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. के. के. तलवार तथा डॉ. कोठारी द्वारा किया गया और हृदय-शल्य चिकित्सक डॉ. के. एस. अय्यर से कंसल्ट के उपरांत उन्होंने वही कहानी दोहरा दी – ऐसे केसेस में सर्जरी ही एकमात्र विकल्प है, परंतु चूंकि सर्जरी में खतरा बहुत है अत: मरीज को दवाइयों पर जिंदा रहना होगा. इस बार डॉक्टर कोठारी ने दवाई लिखी - फेसोविट – एक आयरन टॉनिक.

मरीज के पास दिन गिनने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. दिन – ब – दिन उसकी स्थिति खराब हो रही थी, और तब जब उसे महसूस हो रहा था कि मौत नित्य प्रति, आहिस्ता – आहिस्ता उसके करीब आ रही है. रोज रात्रि को वह सोचता सुबह होगी या नहीं और सुबह सोचता कि दिन कैसे शीघ्र बीते.

पर, मरीज ने आशा नहीं छोड़ी. जीवन के प्रति अपनी आशा को उसने बरकरार रखा. स्टीफ़न हॉकिंस जैसे उदाहरण उसके सामने थे. इस बीच मरीज ने मुम्बई, पुट्टपर्ती इत्यादि के कई उच्च सुविधायुक्त हृदयरोग संस्थानों की दौड़ लगाई. किसी ने सलाह दी कि वेल्लोर का हृदयरोग संस्थान भी अच्छा है – वहाँ दिखाओ. मरीज वहाँ दिखाने तो नहीं गया, हाँ, अपनी रपट की एक प्रति उसने वेल्लोर के हृदयरोग संस्थान में भेज दी.

इस बीच मरीज के तमाम चाहने वाले मिलते. वे अपने-अपने तरीके से टोने-टोटके, जादू टोना, आयुर्वेद, होम्योपैथ, नेचुरोपैथी, लौकी (घिया) पैथी, रेकी, सहजयोग इत्यादि तमाम तरह के इलाज बताते. मरीज जैसे तैसे इन सबसे बचता रहा. उसे पता था, टूटी हड्डी का सही इलाज उसके जुड़ने पर ही है.

अचानक एक दिन उसके पास मद्रास मेडिकल मिशन के हृदय-शल्य चिकित्सक डॉ. के.एम.चेरियन का पत्र आया. उसमें लिखा था कि वेल्लोर के हृदय-रोग संस्थान से अग्रेषित पत्र उनके पास आया है, और मरीज की मेडिकल जाँच रपट के आधार पर सर्जरी के द्वारा कुछ सुधार की संभावनाएँ हैं.

मगर, चूँकि कई मानी हुई संस्थाओं के शीर्ष स्तर के हृदय-रोग विशेषज्ञों और हृदय-शल्य चिकित्सकों द्वारा मरीज के शल्य चिकित्सा में अत्यधिक खतरे की बात पहले ही की गई थी, अत: मरीज का समूचा परिवार किसी भी प्रकार की सर्जरी के विरोध में था.

परंतु मरीज के जीवन के लिए यह चिट्ठी आशा की किरण थी. उसे पता था कि तिल तिल मौत का इंतजार करने की बजाए ऑपरेशन टेबल पर मृत्यु ज्यादा सहज, आसान और पीड़ा रहित होगी. फिर, उसे आशा की एक छीण सी किरण भी तो दिखाई दे ही रही थी. उसने उस किरण के सहारे अपनी जीवन यात्रा तय करने का निश्चय किया.

अंतत: मरीज के हृदय की छह घंटों की कॉम्प्लीकेटेड शल्य क्रिया सम्पन्न हुई, जिसमें उसके हृदय के छेदों (एएसडी तथा वीएसडी) को बन्द किया गया, आरोटिक होमोग्राफ्ट के द्वारा हृदय तथा फेफड़ों के बीच एक कन्ड्यूइट लगाया गया. डॉ. चेरियन द्वारा की गई यह शल्य क्रिया तो सफल रही, परंतु इस दौरान हुए हार्ट ब्लॉक के कारण बाद में उसके हृदय में स्थायी पेस मेकर भी लगाया गया जो आज भी प्रति-पल बिजली के झटके देकर मरीज के हृदय को स्पंदन प्रदान करता है. चालीस दिनों (बीस दिनों तक आईसीसीयू की अवधि सम्मिलित) तक हृदयरोग संस्थान में भर्ती रहने के दौरान उतार चढ़ाव के कई क्षण ऐसे आए जिसमें मरीज की नैया कभी भी आर या पार हो सकती थी.

ऑपरेशन के पश्चात् एक दिन मरीज की हालत बहुत नाज़ुक थी. उसका हृदय धड़कने के बजाए सिर्फ वाइब्रेट कर रहा था, वह भी 200-300 प्रतिमिनट. दवाइयाँ भी असर नहीं कर रही थीं. बात डॉ. चेरियन तक पहुँचाई गई.

डॉ. चेरियन तत्काल मरीज के पास पहुँचे. मरीज से डॉ. चेरियन ने पूछा – “हाऊ आर यू?” मरीज के तमाम शरीर पर आधुनिक मशीनों, मॉनीटरों और दवाइयों-सीरमों के तार और इंजेक्शनों के पाइप लगे हुए थे.
“वेरी बैड” - मरीज ने ऑक्सीजन मॉस्क के भीतर से अपनी टूटती साँसों के बीच, इशारों में कहा.

डॉ. चेरियन ने मरीज के पैरों को ओढ़ाई गई चादर एक तरफ खींच फेंकी और मरीज के पैरों को अपने हाथों में लेकर सहलाया. मानों वे मरीज में जीवनी शक्ति भर रहे हों, उसमें जीवन के लिए एक नई आशा का संचार पैदा कर रहे हों. चेन्नई के माने हुए हृदय शल्य चिकित्सक, पद्मश्री डॉ. के. एम. चेरियन की यह एक और नायाब चिकित्सा थी.

दूसरे दिन से ही मरीज में चमत्कारी सुधार आया. दसवें दिन उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई.

शल्य चिकित्सा के दस साल बाद आज भी उस मरीज की जीवन के प्रति आशा भरपूर है. उसे पता है कि आशा में ही जीवन है.

(कहानी के सारे पात्र व घटनाएँ वास्तविक हैं. मरीज, इन पंक्तियों का लेखक है :)

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ग़ज़ल
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आशा में जीवन है
आशा ही जीवन है

गर्द गुबार में भी
आशा से जीवन है

धर्मान्धों का कैसा
आशा का जीवन है

हालात चाहे न हों
आशा ही जीवन है

जी रहा रवि अभी
आशा का जीवन है
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हिंग्लिश?



गनीमत है कि अब मास कम्यूनिकेशन मीडिया को अक्ल आने लगी है. तभी तो वे अँग्रेज़ी को हिन्दी में चने के भाव में बेच रहे हैं –



और हिन्दी, अब अंग्रेज़ी से चार कदम आगे चलने की सोचने लगी है –




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आम आदमी की टिप्पणी...




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ऊपर के दो ख़बरों पर लक्ष्मण के आम आदमी की टिप्पणी:
“मुम्बई में डांस बारों के बन्द होने के प्रतिफल जरा जल्दी ही आने लगे हैं...”

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इंटरनेट के फ़िशिंग जाल में फँसने से बचें!



( प्रभासाक्षी में पूर्व प्रकाशित )

किसी ने सच कहा है कि 20वीं शती के मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में थोड़ा सा विस्तार होगा और परिवर्तित रूप में ये आवश्यकताएँ होंगीं - रोटी, कपड़ा, मकान और इंटरनेट. कम से कम यह तो कहा ही जा सकता है कि 20 वीं शती में धोखाधड़ी करने वालों के लिए इंटरनेट एक मूलभूत आवश्यकता होगी. और क्यों न हो, इंटरनेट के उपयोक्ता आधार में नित्य प्रति खासी बढ़ोत्तरी हो रही है जो इंटरनेट को अपने व्यावसायिक सौदों के लिए अपना रहे हैं. इसके साथ ही व्यावसायिक धोखाधड़ी, जालसाजी और घोटालों के द्वारा मासूम उपयोक्ताओं के ठगे जाने के खतरे भी उसी रफ़्तार से बढ़ रहे हैं. इंटरनेट और कम्प्यूटरों पर सुरक्षा प्रदान करने वाली कंपनी साइमनटेक द्वारा अप्रैल 05 में जारी इंटरनेट-सुरक्षा-खतरा-रपट पर अगर विश्वास करें तो हमें चौंकाने वाले आंकड़े दिखाई देते हैं. रपट के अनुसार मई 2003 से लेकर मई 2004 तक अकेले अमरीका में ही फिशिंग जालसाजी के जरिए 120 करोड़ डॉलर रुपयों का चूना लगाया गया. भारत में यह रकम अगर कम है, तो सिर्फ इसलिए कि यहाँ इंटरनेट बैंकिंग उपयोग अभी शैशवावस्था में है, और जैसे ही इसमें तेज़ी आएगी, प्रतिशत के हिसाब से आंकड़े ज्यादा ही रहेंगे. यही नहीं, पिछले साल दिसम्बर 04 के अंत तक स्थिति यह हो गई थी कि सिर्फ साइमनटेक द्वारा ही प्रति-सप्ताह 3.3 करोड़ फिशिंग जालसाजी के प्रयासों को रोका जा रहा था. जबकि मैदान में सुरक्षा के लिए ऐसी और भी कई कंपनियाँ हैं. मोबाइल और सेलफ़ोनों में इंटरनेट की सुविधा आ जाने से ऐसे जालसाजी प्रकरणों में जबरदस्त वृद्धि की आशंका है.

आपके ईमेल बक्से में प्रतिदिन कई अनचाहे ईमेल जाने कहाँ-कहाँ से पहुँच जाते हैं जो आपके लिए तमाम तरह के प्रस्ताव लेकर आते हैं. इनमें से कई ऐसे होते हैं जो आपको विशाल धनराशि प्राप्त करने का लालच देते हैं यदि आप उनके सुझाए रास्ते पर चलें. इनमें से प्राय: सभी विपणन के उनके तरीके होते हैं और इनमें से कुछ एक आपको सीधे ही जालसाजी के जरिए फाँसने के प्रयास होते हैं. आजकल इंटरनेट उपयोक्ताओं के पास ऐसे ईमेल की बाढ़ आई हुई है जिसमें किसी महिला या पुरुष द्वारा ईमेल प्राप्तकर्ता से लाखों करोड़ों डालर / यूरो को इधर से उधर करने में मदद माँगी जाती है, जो कि उनके अनुसार बड़ा आसान सा काम होता है और इस सेवा के बदले बहुत बड़ी धनराशि देने का वादा किया जाता है. बहुतों को यह पता होता है कि यह जालसाजी है और केवल फाँसने के जाल हैं, परंतु फिर भी कुछ मासूम उपयोक्ता ऐसे जालों में फँस ही जाते हैं, जिन्हें ऐसी जालसाजी के बारे में पहले से पता नहीं होता है, और इस तरह से वे न सिर्फ अपनी गाढ़ी कमाई से हाथ धो बैठते हैं, बल्कि अपनी मानसिक शांति भी गंवा बैठते हैं.
परंतु आप तब क्या करेंगे जब आपको कोई ईमेल मिलेगा जो बिलकुल आपके क्रेडिट कार्ड बैंकर से आया, असली प्रतीत होगा जो जिसमें किसी अत्यंत आवश्यक बहाने से आपके क्रेडिट कार्ड क्रमांक तथा ऐसे ही अन्य जानकारियों को मांगा गया होगा? अगर आप अपने आपको बुद्धिमान समझते हैं तो ऐसे ईमेल को तुरंत मिटा देंगे या फ़िर फोन इत्यादि से सम्पर्क कर वस्तुस्थिति जान लेंगे, परंतु यदि आप जल्दी में इस बात को पहचान नहीं पाए, और गलती से अपने क्रेडिट कार्ड के क्रमांक तथा अन्य जानकारियाँ दे देते हैं, तो पता चलता है कि इंटरनेट के फ़िशिंग जाल के जरिए आपको फाँस लिया गया है और इसके कुछ घंटों पश्चात् ही आपके क्रेडिट कार्ड से भुगतान ले लिया गया है. अगर आपके साथ ऐसा हो चुका हैं, तो आप ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं हैं. लाखों क्रेडिट कार्ड धारकों को ऐसे फ़िंशिग जालसाजी के जरिए निशाना बनाया जा चुका है. और अगर आपके साथ ऐसा नहीं हुआ है तो आप अपने आप को भाग्य शाली समझें और आगे के लिए होशियार रहें.

इस तरह के प्रकरण आश्चर्य जनक रूप से बढ़ रहे हैं. स्थिति यह है कि किसी भी दिए गए समय में एन्टीफ़िशिंग.ऑर्ग संस्था जो ऐसे फ़िशिंग जालसाजी का भंडाफोड़ करने में लगी हुई है, 20 से अधिक ऐसे बड़े प्रकरणों की में जाँच में लगी हुई होती है जो सैकड़ों विशालकाय व्यवसायिक संस्थाओं तथा लाखों मासूम इंटरनेट उपयोक्ताओं को फ़ांसने में लगे हुए होते हैं. यदि आपके मेल-बक्से में ऐसा कोई फ़िशिंग प्रस्ताव अब तक नहीं आया है तो आप अपने आपको भाग्यशाली समझें. परंतु यह स्थिति बहुत देर तक टिकने वाली नहीं है. एक न एक दिन यह दीवार टूटेगी ही, और इससे पहले कि आप उनके जाल में फंस जाएँ, अपने आपको ऐसे मामलों में सुशिक्षित बना कर सुरक्षित बना लें.

फ़िशिंग के लिए वे अपना जाल कैसे फेंकते हैं :

हालाकि फ़िशिंग स्कैम के कई तौर तरीके हैं, परंतु प्राय: दो तरीके आमतौर पर अपनाए जाते हैं. एक तो नाइजीरियन क़िस्म की जालसाजी होती है जिसमें एक बड़ी विशाल धनराशि में से कुछ हिस्सा प्राप्त करने के बदले उसे ठिकाने लगाने में मदद मांगी जाती है. इसी क़िस्म में ही कुछ लोगों को यह लालच देकर फाँसने की कोशिश की जाती है कि उनके ईमेल पता को टिकट नम्बर देकर एक लॉटरी का बड़ा ड्रा निकाला गया और, जाहिर है उन्हें कोई बड़ा पुरस्कार मिला है. अपने दावे सही ठहराने के लिए जालसाज बड़े ही ठोस और सही प्रतीत होते कारण तो देते ही हैं, ताना बाना भी ऐसा बुनते हैं जिससे कि वे असली प्रतीत होते हैं. उदाहरण के लिए लॉटरी के प्रायोजक के रूप में वे विश्व के सबसे बड़े धनवान बिल गेट्स का नाम लेना नहीं चूकते तथा वे यह भी बताना नहीं चूकते कि यह लॉटरी इंटरनेट को लोकप्रिय बनाने तथा और भी अधिक विस्तारित करने की योजना के तहत निकाली जा रही है. चूंकि मिलने वाली यह राशि बहुत अधिक, अकल्पनीय प्रतीत होती है, अत: अबोध लोग इनमें फंस जाते हैं. एक बार अगर आप इनके जाल में फंस गए, तो वे आपसे प्रोसेसिंग फ़ीस, आयकर इत्यादि खर्चों के रूप में लाखों रूपए हड़प लेते हैं, और आपको कुछ भी नहीं मिलता. ऐसे प्रकरणों की पुलिस रपट प्राय: नहीं हो पाती तथा चूँकि यह अंतर्राष्ट्रीय जालसाजी होती है, अत: भिन्न -भिन्न देशों के भिन्न-भिन्न क़ानूनों के कारण प्राय: अपराधियों को पकड़ पाना मुश्किल ही होता है.

दूसरे तरह की जालसाजी को पकड़ पाना तो और भी जटिल है. आपके ईमेल पता पर ऑनलाइन व्यावसायिक खातों जैसे कि पे-पाल, ई-बे या सिटीबैंक जैसी क्रेडिट कार्ड संस्थाओं जिसके आप सदस्य होते हैं, उनके जैसे एचटीएमएल वेब पृष्ठ का स्वरूप बनाकर आपको ईमेल किया जाता है कि किन्हीं आवश्यक कारणों से आपको अपने खाते का क्रमांक, पासवर्ड इत्यादि नए सिरे से प्रामाणित करना होगा. आपको अंदाज़ा नहीं होता कि आप जिसे असली ऑनलाइन व्यावसायिक संस्था से आया ईमेल समझ रहे हैं, वह वास्तव में नक़ली है और आपकी पहचान चोरी करने के लिए हूबहू असली जैसी बनाई गई है. जैसे ही आप उनके द्वारा चाही गई जानकारी देते हैं, वे आपका माल लेकर चंपत हो जाते हैं, अपनी वेब साइट को बन्द कर इंटरनेट से गायब हो जाते हैं. आइए देखें कि आखिर ये जालसाज अपना काम कैसे अंजाम देते हैं?

फ़िशिंग कैसे करते हैं ये जालसाज?

फ़िशिंग (इसे कार्डिंग या ब्रांड स्पूफ़िंग भी कहा जाता है) जालसाज सफल व्यावसायिक ऑनलाइन सेवा संस्थाओं/बैंकिंग/क्रेडिटकार्ड/ई-शॉप इत्यादि को लक्ष्य बनाते हैं जिनके कि विशाल उपयोक्ता आधार होते हैं. जैसे कि सिटी बैंक, पे-पाल या ई-बे. इसके पश्चात् वे असुरक्षित रूप से चल रहे वेब सर्वरों पर कब्जा जमाते हैं जो आमतौर पर एशिया या पश्चिम यूरोपीय देशों में स्थापित होते हैं. अब वे एचटीएमएल में अपना ईमेल संदेश बनाते हैं जो जालसाजों का बहुत सा काम करता है. वे अपने एचटीएमएल संदेश को असली लगने के लिए उसमें असली व्यावसायिक संस्था की प्राय: हर चीज का इस्तेमाल करते हैं, उनके लोगो, चिह्न, कड़ियाँ, वेब-पते, रंग विन्यास, फ़ॉन्ट इत्यादि सब कुछ. यह ईमेल उपयोक्ता को यह स्पष्ट करता है कि कुछ अति आवश्यक कारणों यथा शासकीय आवश्यकता, सर्वर असफलता, मेंटेनेंस कार्य या सुरक्षा जाँच इत्यादि की वजह से उन्हें अपने खातों के बारे में दिए गए फ़ॉर्म में विवरण भरना आवश्यक होगा. यह फ़ॉर्म आपके विवरणों को सीधे जालसाजों तक पहुँचा देगा. अपने एचटीएमएल संदेशों को वे पहले से वॉर्म/ट्रोजन क़िस्म के वायरसों या अन्य तरह से एकत्र किए लाखों ईमेल पतों पर एक साथ ही भेजते हैं. हालांकि आजकल उपयोक्ता समझदार हो रहे हैं और ऐसे ईमेल को स्पैम रूप में ट्रैप करने के साधन भी इस्तेमाल में लिए जा रहे हैं, मगर फिर भी कुछ उपयोक्ता इनके जाल में फंस ही जाते हैं, और जालसाज अपना फायदा निकाल ही लेते हैं. इससे उपयोक्ता को तो वित्तीय नुकसान तो होता ही है, ज्यादा बड़ा नुकसान तो वित्तीय/व्यावसायिक संस्थाओं को होता है जिनकी इंटरनेट-सुरक्षा की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ जाती है. यही कारण है कि कोई भी बड़ी संस्था इस तरह की जालसाजी के फलस्वरूप हुए नुकसान को खुले रूप में स्वीकारने में कतराती है और इस सम्बन्ध में अपने आंकड़े भी सार्वजनिक नहीं करती.

जालसाजी को कैसे पहचानें

ये जालसाज बड़े ही चालाक होते हैं. ये दूसरे के कंधे पर बंदूकें चलाते हैं. आमतौर पर ये अपने ऑनलाइन क्रियाकलाप दूसरों के कम्प्यूटरों से चलाते हैं, जिनमें सुरक्षा खामियों के चलते वे अपना कब्जा जमा लेते हैं. अपना काम वे औसतन 5-7 दिनों में कर लेते हैं, फिर वे उस कम्प्यूटर से अपना माल-असबाब-निशान इत्यादि सब कुछ मिटा कर दफा हो जाते हैं. इन्हीं वजहों से इन्हें पकड़ पाना असंभव भले न हो परंतु खासा मुश्किल होता है. जिस दूसरे कम्प्यूटर से ये अपना क्रियाकलाप चलाते हैं, बेचारे उसके मालिक को तो हवा ही नहीं रहती कि उसके कम्प्यूटर से क्या गुल खिलाया जा चुका है. किसी फ़िशिंग हमले के प्रथम घटना के प्रकाश में आने के 24 से 48 घंटे के भीतर ही हालाकि उस कम्प्यूटर का पता लगाया जा सकता है जहाँ से फिशिंग गतिविधियाँ चलीं, मगर फिर उसका कोई फ़ायदा इस लिए नहीं होता चूंकि अपराधी तो अपना बोरिया बिस्तरा कहीं और के लिए पहले ही बाँध चुका होता है. जालसाजी के द्वारा कमाए गए पैसे को जालसाज पहले किसी अस्थाई खाते पर रखता है फिर उसे किसी सुरक्षित स्थान पर इलेक्ट्राँनिकी तरीके से ट्रांसफर कर देता है जिसका पता लगाना और भी मुश्किल हो जाता है.

वैसे, अगर थोड़ी सावधानी बरती जाए तो फिशिंग जाल में फंसने से पहले ही उनका पता लगाया जा सकता है. किसी ईमेल संदेश को सूक्ष्मता से देखें तो इसे ओरिजन यानी मूल स्थान का पता लग सकता है. हालाकि ईमेल प्रेषक के पते भी नकली हो सकते हैं, यानी असली दिखते पते परंतु उन्हें चुरा लिया गया हो. आपके इंटरनेट व्यवसाय/क्रेडिट कार्ड इत्यादि के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए जब ईमेल संदेश इस प्रकार से आएँ तो आप समझ लीजिए कि दाल में कुछ काला है - “कंपनी अपनी सुरक्षा में बढ़ोत्तरी कर रही है जिससे कि संभावित जालसाजियों को रोका जा सके अत: इस कारण आपको अपनी खाता से सम्बन्धित जानकारी इस लिंक पर दिए फ़ॉर्म पर भरनी होगी ताकि आपका खाता फिर से सक्रिय किया जा सके” या फिर ऐसा कुछ “ बैंक अपने रेकॉर्ड अपडेट कर रहा है तथा उसे सही रेकॉर्ड के लिए आपके एटीएम कार्ड संख्या की आवश्यकता ईमेल के जरिए जाँच के लिए है.” या कुछ ऐसे संदेश – “आपके ई-बे खाता पर निम्न आईपी पता के जरिए पहुँचने का प्रयास किया गया. बहुत संभव है कि यह प्रयास आपके द्वारा यात्रा में रहने के दौरान किया गया हो, परंतु फिर भी इसकी सुरक्षा जांच के लिए नीचे दी गई कड़ी को क्लिक कर दिए गए फ़ॉर्म को कृपया भरें”. ऐसे संदेश सीधे सीधे ही यह बताते हैं कि कहीं कुछ गड़बड़ है. कोई भी जेनुइन सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर आपसे आपके क्रेडिट कार्ड या पासवर्ड की जानकारी आपसे नहीं माँगेगा. यह या तो उसके पास उसकी ऊंगली के इशारे पर उपलब्ध रहता है, या फिर उसे न तो पता होता है, न इसका पता कर उसका कोई उपयोग कर सकता है. किसी समस्या आने पर वह इसे सिर्फ रीसेट कर आपको नया पासवर्ड दे सकता है.

नीचे दिए गए कुछ आसान से उपायों को अपना कर आप भी ऐसे फिशिंग हमले से अपने आपको बचा सकते हैं:

फ़िशिंग जालसाजी से कैसे बचें:

• अपने ईमेल क्लाएँट में एचटीएमएल संदेश स्वचालित लोड करना रोकें. इससे न सिर्फ आप फिशिंग हमलों से बचेंगे, बल्कि वायरसों से भी बचे रहेंगे. सभी नए ईमेल क्लाएँट में जैसे कि आउटलुक 2003 तथा के-मेल इत्यादि में यह सुविधाएँ हैं. आप अपने टूल/प्रेफरेंसेस मेन्यू के जरिए ईमेल संदेश पढ़ने/लिखने के लिए एचटीएमएल को अक्षम कर सकते हैं.

• आपको हजारों दफ़ा, हजार बार, हर फ़ोरम में बताया जाता रहा है और यह बात फिर से यहाँ बताई जा रही है कि किसी भी अज्ञात व्यक्ति से प्राप्त ईमेल संलग्नकों को कतई नहीं खोलें. इनमें न सिर्फ वायरस हो सकते हैं, आपके कम्प्यूटर से चलने वाले बॉट हो सकते हैं जिससे दूसरे कम्प्यूटरों को आपके कम्प्यूटर के जरिए निशाना बनाया जा सकता है.

• आपके द्वारा प्राप्त एचटीएमएल ईमेल संदेशों में ओके बटनों या किसी लिंक को तब तक क्लिक न करें जब तक कि उसके बारे में पता न कर लें कि उसका ओरिजिन कहाँ है. अगर आप उसके ऊपर माउस संकेतक को मंडराएँगे तो उसका पता स्टेटस बार में दिखेगा. उस पते से उसके असली होने का प्रमाण मिल सकता है.

• अपने ब्राउज़र में उच्च सुरक्षा स्तर उपयोग करें.

• संभव हो तो एक फ़ॉयरवाल तथा एंटीवायरस इस्तेमाल करें. व्यक्तिगत उपयोग के लिए मुफ़्त, अच्छा फ़ॉयरवाल जोन अलार्म (http://www.zonelabs.com ) तथा एंटीवायरस एन्टीवीर ( http://www.free-av.com ) है जिसका उपयोग कुछ हद तक इन जालसाजियों को रोकने में किया जा सकता है.

• यदि आपको कोई संभावित जालसाजी का प्रस्ताव प्राप्त होता है तो उसे आप यहाँ बता सकते हैं- http://www.anti-phishing.com , यह संस्था फिशिंग तथा ईमेल जालसाजों को ठिकाने लगाने में प्रयासरत है.

• कुछ पुराने ब्राउज़रों जैसे कि इंटरनेट के कुछ पुराने संस्करण में यह सुविधा है कि जब आप यह प्रविष्ट करते हैं - http://www.abc.com@http://www.xyz.com तब यह अपनी पता पट्टी में तो दिखाता है http://www.abc.com परंतु आपको यह इस ठिकाने http://www.xyz.com. पर ले जाता है. जालसाज इसी तरह की कमियों या विशेषताओं का उपयोग अपना काम अंजाम देने के लिए करते हैं . इंटरनेट एक्सप्लोरर पर किसी खुले हुए पृष्ठ का असली यूआरएल जानने के लिए उस खुले पृष्ठ के किसी रिक्त जगह पर दायाँ क्लिक करें, तथा कॉन्टेक्स्ट मेन्यू में से प्रापर्टीज़ चुनें. ऐसे में कुछ ज्यादा सुरक्षित ब्राउज़रों मसलन मॉज़िल्ला फ़ॉयरफ़ॉक्स का प्रयोग उचित होगा.

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सुपरपॉवर इंडिया!


सत्ताईस अप्रैल के इंडियन एक्सप्रेस में संपादकीय पृष्ठों पर यह लेख छपा है कि भारत कभी सुपरपॉवर नहीं बन सकता चूँकि यहाँ अमरीका जैसी वित्तीय स्वतंत्रताएँ नहीं हैं तथा वात्स्यायन और खजुराहो के देश भारत में सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर सरकार और समाज के तथाकथित ठेकेदार प्रतिबंध लगाते रहे हैं. इन प्रतिबन्धों के चलते यह कहना कि भारत सन् 2015 में या 2020 में विश्व की महाशक्ति बनकर उभरेगा बेमानी है.

परंतु क्या आप उस लेख में कही गई बातों से सहमत हो सकते हैं? शायद नहीं. मैं तो कतई सहमत नहीं हूँ. भारत कई मामलों में महाशक्ति बन कर उभर चुका है. कई मामलों में उसके मुकाबले में कोई भी देश दूर-दूर तक कहीं नज़र नहीं आता है. आइए देखें कि भारत किन-किन मामलों में महाशक्ति है...

जनसंख्या विस्फोट में भारत के मुकाबले में है कोई राष्ट्र? कुल जनसंख्या के मामले में हम भले ही अभी दूसरे नंबर पर हैं, परंतु जनसंख्या बढ़ाने के मामले में हम विश्व में पहले नंबर के महाशक्ति हैं. इसके बावजूद सुदर्शनी विचारों के लोगों को इस वृद्धि में कुछ कमी दिखाई पड़ती है, जो अपने भीतर के नासूरों को दूर करने के बजाय सामने वाले के घावों को ठीक करने पर बल देते हैं, और जनसंख्या में और वृद्धि की बात करते हैं. यही हाल रहा तो भारत, आशा के विपरीत जरा ज्यादा ही जल्दी से कुल जनसंख्या के मामले में विश्व का पहला नंबर का महारथी बन जाएगा.

भ्रष्टाचार के मामले में भारत एक महाशक्ति कब का बन चुका है. बोफ़ोर्स से लेकर बाढ़ राहत तक और मंत्री से लेकर संत्री तक सभी ओर भ्रष्टाचार की समान गूँज सुनाई देती है. एक रपट के अनुसार भारत के कुल जीडीपी से कहीं ज्यादा रुपया भ्रष्टाचार / घूसखोरी के जरिए आर-पार किया जाता है, और उसमें अधिकतर हिस्सा सरकारी रुपयों (टैक्स चोरी) का होता है.

रेल हादसों के बारे में क्या खयाल है आपका? भारत में विश्व के किसी भी देश से ज्यादा ट्रेनें, ज्यादा लंबी दूरी तक दौड़कर, ज्यादा सवारियाँ ढोती हैं. इस मामले में वह महाशक्ति तो है ही, परंतु भीषण रेल हादसों के मामले में भी यह महाशक्ति है. साल में दो-दो, तीन-तीन भीषण हादसे होते हैं, पूरी ट्रेन को सवारी सहित आग की भेंट चढ़ाई जाती है, ट्रेनों में लूटपाट-डकैती होती है, सह-यात्रियों को जहरीले पदार्थ खिलाकर लूट लिया जाता है... इत्यादि, इत्यादि... इन मामलों में भारत महाशक्ति तो है ही.

मुक़दमेबाज़ी, और देर से न्याय मिलने में भी भारत महारथी है. देश में 3 करोड़ मुक़दमे लंबित हैं, और फ़ैसलों को आने में दशकों लग जाते हैं. देश का हर दसवां व्यक्ति मुक़दमेबाज़ी में उलझा हुआ है, और उसे न्याय मिलने की उम्मीद दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती. वहीं दूसरी ओर भारतीय महारथियों द्वारा जेलों में जश्न मनाया जाता है, जेल से चुनाव लड़े जाते हैं और जेलों में रहकर सरकारें चलाई जाती हैं....

ये तो मात्र कुछ उदाहरण हैं. ऐसे ही कई मामलों में भारत न जाने कब जमाने से महारथी-महाशक्तिशाली बन चुका है. क्या यह खुशी की बात नहीं है?

व्यंज़ल
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अपने नासूरों से ज्यादा औरों के घाव चुभ रहे हैं
रोम-रोम में पसरे किस दर्द की बात कर रहे हैं

किस तरह हजम होगी ये उलटी-पुलटी कहानियाँ
खोखली हो चुकी हैं जड़ें और महाशक्ति बन रहे हैं

क्या कोई प्रायश्चित्त कभी वापस ढूंढ कर लाएगी
लोग सदियों से सोन चिरैया की बात कर रहे हैं

मंजिल मिलने का भरोसा हो तो कैसे, पता नहीं
अनियंत्रित भीड़ में लोग स्थिर हैं या चल रहे हैं

खाली-पीली बहस करते लोगों में शामिल है रवि
और सोचते हैं कि वो कोई बड़ा काम कर रहे हैं

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व्यंग्य
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सर क्यों दांत फाड़ रहा है?


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पिछले दिनों एक गुमनाम व्यंग्य लेखक की गुमनाम सी किताब हाथ लग गई जिसका शीर्षक ऊपर दिया गया है. यूँ तो वह किताब साधारण सी है, जिसमें तीसेक व्यंग्य आलेखों का संग्रह है, और प्राय: सभी आलेख सामान्य स्तर के हैं, परंतु एक विशेष आलेख – ‘लाभ शुभ के चौघड़िए में’ ने न सिर्फ ध्यान आकृष्ट किया, बल्कि मेरी उस पीड़ा को भी फिर से याद करने को मज़बूर किया जिससे मैं एक परीक्षार्थी के नाते हर परीक्षा में गुज़र चुका हूँ. वैसे तो वे आलेख में एक परीक्षक की पीड़ा को दिखा रहे हैं, परंतु वास्तविक अर्थों में ये परीक्षार्थी की पीड़ाएँ हैं. उस आलेख के कुछ चुनिंदा अंश आपके लिए यहाँ प्रस्तुत हैं. पढ़ें और अपनी पीड़ाओं को याद करें.
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लाभ शुभ के चौघड़िए में


लेखक- धर्मपाल महेन्द्र जैन
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ओ मेरी पुत्री की माताश्री, तुम्हें मालूम है न विश्वविद्यालय वालों ने मेरे पौरूष को चुनौती दे रखी है. इतने वर्षों के सेवाकाल में बनाए रिश्ते अब सार्थक हो रहे हैं. परीक्षा की कॉपियों के बंडल घर में भरे पड़े हैं. द्रुत गति से बिल्टियाँ और पार्सलें आ रही हैं. मेरी लाल पेंसिल हॉली-डे एक्सप्रेस सी दौड़ रही है. ज्यादा से ज्यादा कॉपियाँ निबटा रही हैं.

देश में तीन मिनट में सैकड़ों बच्चे जन्म ले लेते हैं और इतने समय में मैं सिर्फ एक कॉपी जांच पाता हूँ. वह तो अच्छा है कि मैं अनुभवी हूँ, न मेमोरंडम पढ़ता हूँ न ही हिदायतें ही समझने की जरूरत है मुझे. बस हस्त लेखन देखता हूँ, पन्ने गिनता हूँ और पूरक पुस्तिका के वज़न का अंदाजा लगा नंबर देता चला जाता हूँ. प्रभु कृपा है मुझ पर, जहाँ गड़बड़ी होती है वहीं दृष्टि थम जाती है. अन्यथा दूसरे परीक्षक दिन में बीस कॉपी जाँच पाते हैं और तीस रूपए की दाड़की में सीजन का एक दिन बर्बाद कर देते हैं. बैंड वालों को देखो, इस सीजन में उनका साधारण कलाकार हजार रुपए रोज धड़ रहा है, क्या हम पीएच. डी. वालों की जमात इससे भी गई बीती है? हमारी उत्पादकता बोर्ड वालों ने वैसे ही घटा रखी है. वे वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछते हैं जिसमें विद्यार्थी को सही वस्तु लिखना पड़ती है और परीक्षकों को निष्ठा से जाँचना पड़ता है.

सबेरे से कुल्ला तक नहीं किया है मैंने. हालांकि बीड़ी और उसके रासायनिक दबाव से निबट आय हूँ, फिर भी कड़क मीठी चाय पीने की इच्छा को दबाकर मैं विद्यार्थियों का भाग्य लिख रहा हूँ. उनकी प्राप्तियों का टोटल मिला रहा हूँ. सबको किनारे से लगा कर उन्हें आत्महत्या करने से बचा रहा हूँ. ऐसे कितनों को ही जीवनदान दे रहा हूँ.

जानती हो प्रिये, तुम हमारे प्राचार्य, श्रद्धेय बा साब एक गोला प्रसाद गटक कर कॉपियाँ जांचते हैं. कभी तरंग में अंडे ही अंडे टिकाते हैं तो कभी पूरे के पूरे अंक न्यौछावर कर देते हैं- इस पार या उस पार की शैली में. इसी लिए उनका रिजल्ट हमेशा औसत रहा है. उन्होंने यांत्रिक ढंग से कॉपियाँ जाँचीं हैं. यश और अर्थ दोनों अंटी किए हैं उन्होंने. उन्हें श्रेष्ठ परीक्षक का पदक मिला है और मुख्य परीक्षक की पदोन्नति भी. मेरी चिर जीवन संगिनी, कॉपी दौड़ में कड़ा मुकाबला है और इस बार मुझे यह बाजी जीतनी ही है.

इस वर्ष प्रश्नपत्र धड़ल्ले से आउट हुए हैं. साथ ही संवाद एजेंसियाँ भी सजग हो गई हैं. परीक्षा भवनों से थैले भर-भर कर प्रश्न बैंक की सामग्री जब्त हुई है और पुलिस के मारे नकल-अस्त्र का ससमय प्रयोग करने से विद्यार्थीगण वंचित रह गए हैं. कुछ बदनाम विश्वविद्यालयों ने कोड नम्बर पद्धति अपना ली है और वे इस लम्बी चौड़ी प्रक्रिया को गोपनीय बनाए रखने में लगे हैं. इस कारण हमारी रिस्क बढ़ गई है, और भाव बढ़ गए हैं. पर, काम करवाने वाले चाहिएँ – जेब में दम हो तो भला इस देश में कोई काम रुकता है? देखो, बाहर देखो गुरु पत्नी – किसी की आहट सुनाई दे रही है. कोई मुमुक्षु परिचित की चिट्ठी लेकर हमारे द्वार आ रहा है. उसे दिशा बताओ. डाक दूत आ रहा हो तो उससे संदेश ग्रहण करो...

इस कॉपी महायज्ञ में योगदान के लिए मैंने अपने प्रिय और कबाड़ी शिष्यों को न्योता है. वे नहा-धोकर तथा खा-पीकर मुझ विप्र के घर आएंगे. अंकों का पुनर्योग करने, विश्वविद्यालयों और बोर्डों के पत्रक भरने, बंडल बांधने और इन बंडलों को डाक अथवा रेल विभाग में धकेल देने का पुनीत कार्य वे रुचि पूर्वक कर देंगे. कुछ आत्मीय जनों की कॉपियों के मुख्यपृष्ठ के अतिरिक्त सभी पृष्ठ बदलने और योग्यता सूची के दांव पेंच जमाना उन्हीं के बलबूते की बात है. कुछ अंक बढ़ाने में न अपना बिगड़ता है न देश का बिगड़ता है. यदि विद्यार्थी खटकर्मी होगा तो हर कहीं नौकरी पा लेगा और प्रशासन में धन लगाने का कार्य तेज कर देगा. अंक बढ़ाने की इस प्रक्रिया में तो मैं निमित्त मात्र हूँ, इसी लिए निमित्त ग्रहण करूंगा और इस कन्या के उज्जवल भविष्य के लिए आधार बनूंगा. हे हृदयेश्वरी देखो अपनी बेटी रो रही है – उसे दिलासा दिलाओ कि जब तुम बड़ी होकर इम्तिहान दोगी, तो तुम्हारे पिताश्री के परीक्षक रहते योग्यता सूची में तुम्हारा नाम सबसे ऊपर ही रहेगा.

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