March 2005

प्रकृति की होली (2)
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रंगों के त्यौहार होली पर मालवा अंचल – इन्दौर के आसपास का इलाक़ा जरा ज्यादा ही रंगीन हो जाता है. होली के पाँच दिन बाद रंगपंचमी का त्यौहार मनाया जाता है जिसमें फिर से एक बार रंगों से एक दूसरे को डुबोया जाता है. कहीं कहीं ‘गेर’ निकलती है जो एक प्रकार का बैंड-बाजों-नाच-गानों युक्त जुलूस होता है जिसमें नगर निगम के फ़ायर फ़ाइटरों में रंगीन पानी भर कर जुलूस के तमाम रास्ते भर लोगों पर रंग डाला जाता है. जुलूस में हर धर्म के, हर राजनीतिक पार्टी के लोग शामिल होते हैं, प्राय: महापौर (मेयर) ही जुलूस का नेतृत्व करता है.

प्रकृति भी इस समय जम कर होली मनाती है. मेरे घर आँगन के एक गमले में खिले ये पुष्प भी होली और रंग पंचमी की शुभकामनाएँ देते प्रतीत होते हैं....



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होली... बुराइयों की या अच्छाइयों की?

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कल रात पूरे देश में होलिका दहन का त्यौहार मनाया गया. बुराइयों को जलाने, खत्म करने के प्रतीक स्वरूप यह त्यौहार मनाया जाता है.

हमारे मुहल्ले में भी होलिका दहन का कार्यक्रम कुछ उत्साही बच्चों-बूढ़ों के सहयोग से साल-दर-साल मनाया जाता है. इस दफ़ा जो लकड़ियाँ एकत्र की गई थीं, वे किसी सूरत जलने दहकने का नाम नहीं ले रही थीं. किसी ने चुटकी ली कि बुराइयाँ आसानी से जलती खत्म नहीं होती हैं. अंतत: होलिका पर ढेर सारा घासलेट उंडेला गया तब वह धू-धू कर जली. मगर, ऐसा लगा कि बुराइयों को जलाने नष्ट करने के प्रतीक स्वरूप इस त्यौहार के जरिए हम अपनी बची खुची अच्छाइयों को भी नष्ट करने पर तुले हुए हैं.

हर साल होलिका के फलस्वरुप टनों लकड़ियाँ बिना किसी प्रयोजन के जला दी जाती हैं. धुआँ, प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग तो सेकेण्डरी इफ़ेक्ट हैं. रास्तों – चौराहों पर खुले आम बड़े बड़े लट्ठे जला दिए जाते हैं जो सप्ताहों तक सुलगते रहते हैं, जिससे आम जनता को खासी परेशानी होती है. होलिका दहन पर इस साल भी सारा शहर धुँआमय हो गया था. स्थिति यह थी कि सांस लेने में दिक्कतें आ रही थी.

आस्था पर बुराइयाँ जड़ जमाती जा रही हैं, और हम अपनी अच्छाइयों का होलिका दहन करते जा रहे हैं... साल-दर-साल...

सर्वाधिक भ्रष्ट?


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अब तक आदमी या तो ईमानदार होता था या भ्रष्ट होता था. परंतु आज के दौर में भ्रष्टता की भी कैटेगरी भाई लोगों ने बना ली है. यूपी के पूर्व प्रमुख सचिव अखंड प्रताप सिंह, जो अपने ही साथी अफ़सर बंधुओं के द्वारा “उत्तर प्रदेश का सर्वाधिक भ्रष्ट अफसर” के शानदार खिताब से नवाज़े जा चुके थे, अंतत: सीबीआई की नज़रों में आ ही गए.

सवाल यह है कि सर्वाधिक भ्रष्ट का अर्थ क्या है? क्या इसके लिए कोई पोल - कोई वोटिंग हुई थी? सर्वाधिक भ्रष्ट के लिए कोई पैजेंट हुआ था? इस खिताब को पाने के क्या मापदंड थे? अगर यह अफसर सर्वाधिक भ्रष्ट था, तो उससे कम भ्रष्ट और न्यूनतम भ्रष्ट अफसर भी वहाँ होंगे. क्या सर्वाधिक भ्रष्ट उसे माना गया जो किसी काम के तय रेट से दस गुना या बीस गुना ज्यादा रिश्वत लेता था, या रिश्वत लेते समय वह अपने ख़ून के रिश्तों की भी परवाह नहीं करता था? या, किसी दिए गए वित्तीय कालखंड में उसने सबसे ज्यादा पैसे बनाए? अगर यह मापदंड जारी कर दिया जाता तो और दूसरे स्टेट के अफसरों का भी भला हो जाता.

जब मैं सरकारी सेवा में था, तो एक सीनियर इंजीनियर शर्माजी के बारे में लोग कहा करते थे कि बहुत भ्रष्ट है साला. कहा जाता था कि वे सीआर (गोपनीय चरित्रावली, सरकारी विभागों में ‘चरित्र’ गोपनीय ही होता है!) लिखने के भी पैसे लेते थे. उनके बारे में एक किस्सा प्रचलित था. एक बार उसका एक मातहत 3 अप्रैल को किसी अन्य विभाग में ट्रांसफर हो गया. उस मातहत ने सोचा कि 3 दिन का क्या सीआर और कैसे पैसे. परंतु शर्माजी ने पैसे के अभाव में 3 दिन के लिए एडवर्स रिमार्क लिख दिए. इसके विपरीत एक अन्य शर्माजी खासे ईमानदार माने जाते थे. उनका मोटो था पैसे के पीछे भागो नहीं, और अगर आता है तो छोड़ो नहीं.

अर्थ यह कि ईमानदारी कहीं गुम हो चुकी है. अब तो हमें भ्रष्ट, कम भ्रष्ट, ज्यादा भ्रष्ट या सर्वाधिक भ्रष्ट बन के रहना होगा.

ताजमहल पर मालिकाना हक?


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एक ख़बर के अनुसार, ताजमहल के निर्माण के 250 वर्षों के पश्चात्, आगरा के शिया और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड में उस के मालिकाना हक को लेकर तलवारें खिंच गईं हैं. हर एक की दलील यह है कि ताजमहल वस्तुत: उनके पंथ के व्यक्तियों की कब्र है, अत: मालिकाना हक उन्हीं का है. बोर्डों ने अपने-अपने दावे सरकार को सौंप दिए हैं. चर्चे हैं कि ताजमहल की मोटी वार्षिक आय पर निगाहें हैं. शहंशाह शाहजहाँ ने जिस प्रेम की अभिव्यक्ति की ख़ातिर इस खूबसूरत स्मारक का निर्माण करवाया था, उन्हें सपने में भी यह भान नहीं रहा होगा कि ताजमहल, ताज कॉरीडोर और मालिकाना हक जैसे छुद्र, विवादों में फँसता रहेगा.

अब अगर ऐसे दावे करने का हक किसी का बनता है, तो शीघ्र ही लाल क़िला और कुतुब मीनार पर भी दावे-प्रतिदावे करने वाले चले आएँगे. ये स्मारक विश्वधरोहर हैं, और इनपर किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा मालिकाना हक जताया जाना हास्यास्पद है. दरअसल, ताजमहल जैसे स्मारकों पर तो विश्व की प्रत्येक जनता का मालिकाना हक है.
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व्यंज़ल
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खुद पर नहीं अपना मालिकाना हक है
जताने चले जग में मालिकाना हक है

लोग कहते हैं ये मुल्क है तेरा अपना
बेघर तेरा बेहतरीन मालिकाना हक है

यहाँ खूब झगड़ लिए राम रहीम ईसा
वहाँ नहीं किसी का मालिकाना हक है

दिलों में दूरियाँ तब से और बढ़ गईँ
जब से प्रकट किया मालिकाना हक है

ले फिरे है अपनी रूह बाज़ारों में रवि
मोटे असामी का ही मालिकाना हक है
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प्रकृति की होली
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फ़ाल्गुन के महीने में प्रकृति भी अपनी रंग-बिरंगी छटाएँ बिखेरती है. जहाँ देखें वहीं फूलों की बहार. टेसू तो हर ओर ऐसे दीखते हैं, जैसे जंगल में अग्निदेवता साक्षात् उतर आए हों. प्रकृति आपके तन-मन में रंगीनियाँ भरने को आतुर प्रतीत होती है.

पुष्पों के नियमित-अनियमित-सिमिट्रिकल रूप और रंग विन्यास दर्शकों के तन-मन को झंकृत-चमत्कृत तो करते ही हैं, अपनी भीनी-भीनी खुशबुओं की छटा से वे हमें मदमस्त भी करते हैं.

इस पुष्प को देखिए और मदमस्त होइए:



यह चित्र अपने पूरे आकार में यहाँ मौज़ूद है जिसे डाउनलोड कर आप अपना डेस्कटॉप वालपेपर बना सकते हैं.

व्यंग्य
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एवरीथिंग ऑफ़िशियल अबाउट क्रिकेट
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इससे पहले मैं क्रिकेट देखता सुनता नहीं था. खेलना तो खैर, दूर की बात है. परंतु जब सुना कि मियाँ मुशर्रफ़ क्रिकेट देखने भारत आ रहे हैं तो लगा कि क्रिकेट में कुछ तो होगा कि लोग दीवाने बने फिरते है. तो इस बार देखा. सुना था कि क्रिकेट इज़ ए फनी गेम. येप, इट इज़, जेंटलमेन. सचमुच दूसरे किसी भी खेल में मज़े का अंश उतना नहीं रहता जितना क्रिकेट में होता है. हॉकी, फ़ुटबाल से लेकर जिम्नास्टिक, एथलेटिक्स – किसी भी खेल को लीजिए, उसमें खेल का मज़ा होता है. परन्तु क्रिकेट में तो मज़ा ही मज़ा होता है. मजे का खेल होता है.

क्रिकेट के बारे में मैंने पिछले कुछ दिनों में तमाम अध्ययन किए, काफ़ी कुछ देखा, सुना और बहसें कीं. राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, स्थानीय क्रिकेट पत्र-पत्रिकाओं तथा क्रिकेट विशेषांकों का अध्ययन किया, इंटरनेट की क्रिकेट से सम्बन्धित तमाम साइटों की खाक छान डाली, टीवी पर लाइव मैचेस देखे, और साथ ही साथ रेडियो पर आँखों देखा हाल भी सुना. यही नहीं, मैंने अपने मुहल्ले में गली क्रिकेट भी खेली. प्रत्येक मैच के प्रारम्भ होने से पहले, मैच के दौरान और मैच के बाद मैच के बारे में विशेषज्ञों द्वारा किए गए विश्लेषणों का गहन चिंतन-मनन और विश्लेषण किया. क्रिकेट मैच की तरह ये भी खासे मज़ेदार रहे. इस प्रकार मेरे पास क्रिकेट के बारे में ढेर सारी, अच्छी खासी ज़ानकारी एकत्र हो गई जिनमें मेरे अपने क्रिकेट के अनुभव भी शामिल हैं.

क्रिकेट के अपने अनुभवों का गहराई से विश्लेषण करने पर मैंने पाया कि मेरे पास भी क्रिकेट के बारे में बोलने बताने को काफी कुछ है. मैं इससे आपको वंचित नहीं करना चाहता, और चाहता हूँ कि आप भी मौक़े का कैच पकड़ें और जानें समथिंग ऑफ़ीशियल अबाउट क्रिकेट-

क्रिकेट एकमात्र ऐसा खेल है, जो किसी जमाने में बहुत पहले सिर्फ मैदानों में खेला जाता था. अब गली मोहल्लों – भीड़ भरी सड़कों से लेकर रेडियो, टीवी-प्रसारणों, पत्र-पत्रिकाओं के स्तम्भों-विशेषांकों, राजनीति और सट्टे – यानी यत्र-तत्र-सर्वत्र खेला जाने लगा है. अब तो क्रिकेट - खेल से भी आगे जाकर क्रिकेट डिप्लोमेसी तक पहुँच गया है, जहाँ एक देश के संबंध क्रिकेट के कारण एक दूसरे से बनते बिगड़ते रहते हैं. परंतु क्रिकेट को लेकर ये बातें विश्व के कुछ दर्जन-भर राष्ट्रों में ही लागू है, जिनमें भारत-पाकिस्तान प्रमुख हैं.

इस खेल में सिर्फ हार या सिर्फ जीत ही महत्वपूर्ण होती है, खेल नहीं. अगर किसी देश की टीम हार जाती है तो उस टीम के विरूद्ध उनके देश में धरना प्रदर्शन तो होते ही हैं, गाहे बगाहे धोखेबाज़ी, भ्रष्टाचार और मैच फ़िक्सिंग के आरोप भी लगाए जाते हैं. जाँच की मांग की जाती है. टीम का जो सदस्य हार का जिम्मेदार माना जाता है, उसका घर से निकलना दूभर हो जाता है, लोग उसके घर में पत्थरों की बौछारें तक करने लगते हैं. मैदानों में तो पत्थरबाजी आम बात है ही. अगर टीम जीत जाती है तो उसे इनामों से लाद दिया जाता है, प्रशंसा के पुल बाँध दिए जाते हैं. परंतु हर दूसरे मैच में हार-जीत की यह स्थिति टॉगल होती रहती है. यह एकमात्र ऐसा खेल है, जिसके खेलने वालों की संख्या सैकड़ों में है, लाखों इसे देखते हैं और इसके विशेषज्ञ करोड़ों में (यानी, लगभग हर कोई) हैं. कोई भी अपनी विशेषज्ञता पूर्ण राय दे सकता है कि टॉस का फैसला या पहले खेलने का फैसला कुछ दूसरा लिया गया होता तो मैच का परिणाम कुछ दूसरा होता. यानी खिलाड़ी की कैपेबिलिटी, टीम की कैपेबिलिटी ज्यादा मायने नहीं रखती. क्रिकेट में मायने रखता है – टॉस, अम्पायर, विकेट, मौसम और सट्टा.

क्रिकेट के बारे में कहा जाता है कि मैच की आखिरी गेंद फेंकी जाने तक भी मैच के भविष्य के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. सत्य को डिफ़ाइन करने का इससे उचित वाक्य हो ही नहीं सकता. भले ही एक गेंद बची हो और मैच जीतने के लिए डेढ़ सौ रन बनाने हों, तब भी कयास लगाए जाते हैं, पूर्वानुमान लगाए जाते हैं और विश्लेषण किया जाता है कि अगर पानी गिर गया या अँधेरा हो गया तो मैच रूक जाएगा और यह टीम रन औसत के आधार पर जीत सकती है. यूं टीम में प्रत्येक पक्ष में ग्यारह खिलाड़ी होते हैं, परंतु कभी कभी अम्पायर और रेफरी भी किसी टीम की तरफ से खेलने लग गए प्रतीत होते हैं. क्रिकेट में कहा जाता है कि जिस टीम ने टॉस जीत लिया, समझो आधा मैच जीत लिया. पर अमूनन वह बाकी का आधा मैच हार ही जाता है.

क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसे पाँच-पाँच दिनों तक या दिन-दिन भर खेलने के बजाए उसे देखने में ज्यादा आनंद आता है. हाथों में चिप्स का पैकेट हो और टीवी पर क्रिकेट का मैच तो फिर काउच पोटैटो के आनंद के क्या कहने. परंतु उससे भी ज्यादा मज़ा मैच की चर्चा, उस पर विचार, उसके विश्लेषणों और आँकड़ों पर अनवरत बहसों में आता है कि कौन सी टीम कैसा खेली, किस खिलाड़ी ने कितने-कैसे चव्वे मारे, किसने कितने कैच टपकाए इत्यादि – इत्यादि.

तो, ये था मेरा ‘समथिंग’. आपके पास भी तो क्रिकेट की जमापूँजी होगी इस बारे में. तो फिर शीघ्र बताइए ताकि उन्हें भी ‘एवरीथिंग ऑफ़िशियल अबाउट क्रिकेट’ में शामिल किया जा सके.

(संपादित अंश नईदुनिया अधबीच में 8 जुलाई 1996 को पूर्व-प्रकाशित)

लघुकथा
(विश्व की पहली ब्लॉगज़ीन निरंतर में पूर्व प्रकाशित)
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प्रशिक्षु : दृश्य एक
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डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के उपरांत एक साल के प्रशिक्षु कार्य के लिए मन में उमंग लिए हुए उसने एक वृहदाकार, प्रसिद्ध, निजी अस्पताल में अपनी सेवा देना चाहा. पहले ही दिन उसकी रात्रिकालीन ड्यूटी के दौरान नगर के एक प्रतिष्ठित, सम्पन्न परिवार के मुखिया को आकस्मिकता में अस्पताल लाया गया. मरीज को दिल का भयंकर दौरा पड़ा था और मरीज के अस्पताल पहुँचने से पहले ही यमदूत अपना काम कर गए थे. उसने मरीज की नब्ज देखी जो महसूस नहीं हुई, दिल की धड़कनें सुनीं जो गायब थीं और घोषित कर दिया कि मरीज को अस्पताल में मृत अवस्था में लाया गया. मरीज के सम्पन्न परिवार जनों को यह खासा नागवार ग़ुजरा और उन्होंने हल्ला मचाया कि मरीज का इलाज उचित प्रकार नहीं हुआ और एक प्रशिक्षु के हाथों ग़लत इलाज से मरीज को बचाया नहीं जा सका.

अगले दिन अस्पताल के मालिक-सह-प्रबंधक ने उस प्रशिक्षु को फायर कर दिया.
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प्रशिक्षु: दृश्य दो
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डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के उपरांत एक साल के प्रशिक्षु कार्य के लिए मन में उमंग लिए हुए उसने एक वृहदाकार, प्रसिद्ध, निजी अस्पताल में अपनी सेवा देना चाहा. पहले ही दिन उसकी रात्रिकालीन ड्यूटी के दौरान नगर के एक प्रतिष्ठित, सम्पन्न परिवार के मुखिया को अस्पताल लाया गया. मरीज को दिल का भयंकर दौरा पड़ा था और मरीज के अस्पताल पहुँचने से पहले ही यमदूत अपना काम कर गए थे. उसने मरीज की नब्ज देखी जो महसूस नहीं हुई, दिल की धड़कनें सुनीं जो नहीं थी. उसका दिमाग तेज़ी से दौड़ा. मरीज का परिवार शहर का सम्पन्नतम परिवारों में से था. उसने तुरंत इमर्जेंसी घोषित की, मरीज के मुँह में ऑक्सीजन मॉस्क लगाया, दो-चार एक्सपर्ट्स को जगाकर बुलाया, मंहगे से मंहगे इंजेक्शन ठोंके, ईसीजी, ईईजी, स्कैन करवाया, इलेक्ट्रिक शॉक दिलवाया और अंतत: बारह घंटों के अथक परिश्रम के पश्चात् घोषित कर दिया कि भगवान की यही मर्जी थी.

मरीज के सम्पन्न परिवार जन सुकून में थे कि डाक्टर ने हर संभव बढ़िया इलाज किया, अमरीका से आयातित 75 हजार रुपए का जीवन-दायिनी इंजेक्शन भी लगाया, पर क्या करें भगवान की यही मर्जी थी.

अगले दिन अस्पताल के मालिक-सह-प्रबंधक ने मरीज के बिल की मोटी रकम पर प्रसन्नतापूर्वक निगाह डालते हुए उसे शाबासी दी- वेल डन माइ बॉय, यू विड डेफ़िनिटली गो प्लेसेस.
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कीमत पहचान की
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उत्तरप्रदेश के मंत्री आजम खान जब एक समारोह में बिना लाव लश्कर और पहचान पत्र के पहुँचे तो पुलिस के जवानों ने जो सुरक्षा के लिए वहाँ तैनात थे, उन्हें पहचाना नहीं और उनकी जाँच करने लगे. मंत्री महोदय को यह खासा नागवार गुज़रा और नतीजे में नौ पुलिस कर्मियों को निलंबन की सज़ा भुगतनी पड़ी.

ठीक इसके विपरीत, एक घटना मुझे याद आ रही है. मेरा एक मित्र पुलिस विभाग में वायरलेस में कार्यरत था. उसका एसपी नया-नया ट्रांसफर होकर आया था और अपने मातहत विभागों का निरीक्षण करता रहता था. एक दिन वह एसपी सिविल ड्रेस में वायरलेस विभाग में जा पहुँचा जहाँ मेरा मित्र मोर्स कोड की कुंजियों की ठकठकाहट के साथ गोपनीय संदेशों का आदान प्रदान कर रहा था. ऐसे में ही उस एसपी ने मित्र से कुछ पूछताछ करनी चाही. मित्र जो उसे पहचानता नहीं था, उस पर चिल्लाया और बोला – बास्टर्ड यू गेट आउट फ्रॉम हियर. डोंट यू सी आई एम बिज़ी इन इम्पॉर्टेंट इन्फ़ॉर्मेशन्स? और फिर अपने काम में जुट गया.

वह ऑफ़ीसर तत्काल बाहर चला गया. उसे अपनी ग़लती का न सिर्फ अहसास हुआ, बल्कि उसने मित्र को अपनी ड्यूटी में प्रतिबद्धता रखने के लिए शाबासी तो दी ही, साथ ही उससे माफ़ी भी मांगी.

फ़र्क़ साफ़ है. पहचान की क़ीमत. किसी को गुस्सा आता है, किसी को ग़लती का अहसास होता है. वैसे भी, भारत के किसी मंत्री को न पहचानना और ऊपर से उससे पहचान पत्र पूछना – यह तो बहुत ही गंभीर क़िस्म का अपराध है.

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व्यंज़ल
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बदल गई परिभाषाएँ बदल गए पहचान
मूरख मनुज तू क्यों बना रहा अनजान

जिसका नाम न हो न हो कोई पहचान
इस जग में बिरादर कतई नहीं धनवान

ले आओ मुद्रा या कहीं से जान पहचान
होगा काम तभी तो बगैर किसी अहसान

अंटी में रुपया नहीं न किसी से पहचान
यूँ तो मिलना ही है सभी जगह दरबान

नंगों में रवि ने भी ख़ूब बनाई पहचान
सिर में टोपी डाल के भूले है अपमान

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अनुगूंज: बचपन के यादों की गूँज...
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मेरी पहली खरीदारी
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उस समय मैं दूसरी कक्षा में पढ़ता था. माँ कोई सब्जी बना रही थी और घर में खड़ी लाल मिर्च खत्म हो गई थी. सब्जी में बघार लगाने के लिए मिर्च जरूरी थी. माँ दूसरे कामों में भी उलझी हुई थी, अत: यह कार्य उसने अपने लाड़ले को डरते डरते सौंपा. हाथ में चार आने का सिक्का दिया और कहा बेटा गली के आगे जो दूकान है वहाँ से चार आने की खड़ी मिर्ची ले आ. ले आएगा ना?

मैं उत्तेजित हुआ, हिरणों की तरह कुलाँचे लगाता दुकान तक पहुँच गया. मेरी निकर जरा ढीली हो रही थी, उसे संभालता हुआ दुकानदार को, जो एक दूसरे ग्राहक से उलझा हुआ था कम से कम दस बार एक ही सांस में बोल गया कि मुझे चार आने की मिर्ची चाहिए.

उस ग्राहक से निपटकर, आखिरकार दुकानदार ने अख़बार के एक टुकड़े में करारे लाल मिर्च को तौलकर पतले से धागे से पुड़िया बांधा और मुझे थमाया. जिस तेजी से मैं आया था, उसी तेजी से कूदता फांदता, एक हाथ में मिर्ची की पुड़िया और एक हाथ में निकर संभाले वापस घर लौटा और सगर्व पुड़िया माँ के हाथ में थमाया. दौड़ते भागते आने के कारण पुड़िया खुल गई थी और उसका धागा लटक रहा था.

माँ को थोड़ा शक हुआ. उसने पुड़िया हाथ में लेते हुए मुझसे पूछा कि मैं कितने पैसे की मिर्ची लाया था, चूँकि पुड़िया में उसे सिर्फ दो मिर्च ही मिली. मैंने कहा – मैं तो पूरे चार आने की मिर्ची लाया हूँ.

इससे पहले कि माँ कुछ और पूछती, वह मुझे लेकर बाहर आई. घर के दरवाजे से आगे गली में लाल मिर्च कतार में गिरे हुए बिखरे पड़े थे. जाहिर है, अपनी पहली खरीदारी की खुशी में मुझे यह भी भान नहीं था कि पुड़िया खुल गई है और मेरी हर कुलाँच में दो-चार मिर्च नीचे गिर रहे हैं.
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हिन्दी में ऑफ़िस सूट: ओपन-ऑफ़िस हिन्दी

(ऑन लाइन हिन्दी समाचार पत्रिका प्रभासाक्षी में दि. 13 मार्च 05 को पूर्व प्रकाशित )

माइक्रोसॉफ़्ट के ऑफ़िस सूट के हिन्दी संस्करण के पिछले साल जारी होने के साथ ही कम्प्यूटर अनुप्रयोगों के स्थानीय भाषाओं में स्थानीयकरण की होड़ मच गई है. जहाँ व्यवसायिक उत्पाद तो इस दौड़ में शामिल हो ही चुके हैं, मुक्त सॉफ़्टवेयर/ओपनसोर्स भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं. बहुत से स्तरों पर, बहुत से स्थानों पर बहुत से लोग भिड़े हुए हैं – लगे हुए हैं स्थानीय भाषाओं में कम्प्यूटर और उनके अनुप्रयोगों को लाने हेतु ताकि कम्प्यूटरों के उपयोग को स्थानीय लोगों तक पहुँचने-पहुँचाने में अँग्रेज़ी की अनिवार्यता को खत्म किया जा सके. माइक्रोसॉफ़्ट का तमिल और हिन्दी भाषा में ऑपरेटिंग सिस्टम तो है ही, ऑफिस सूट भी इन भाषाओं में है. ओपन सोर्स का लिनक्स इस मामले में थोड़ा सा धनवान है जहाँ इसके पास छ: भाषाओं में ऑपरेटिंग सिस्टम – हिन्दी, तमिल, गुजराती, पंजाबी, मराठी और बंगाली में है तथा ऑफ़िस सूट हिन्दी और तमिल में है. और ढेरों अन्य भारतीय भाषाओं में काम जोरों से जारी है – व्यवसायिक प्लेटफ़ॉर्म में भी और ओपनसोर्स में भी.

ओपनसोर्स प्लेटफ़ॉर्म में उपयोग तथा वितरण हेतु मुफ़्त उपलब्ध ओपनऑफ़िस.ऑर्ग का ऑफ़िस सूट तमिल में तो कुछ समय से उपलब्ध था ही, हिन्दी में भी उपलब्ध हो गया है. इसके हिन्दी अनुवाद का कार्य सीडैक की बैंगलोर टोली ने किया है. हिन्दी ओपनऑफ़िस को यहाँ से डाउनलोड किया जा सकता है:: http://trinetra.ncb.ernet.in/bharateeyaoo/ यहाँ से ओपन ऑफ़िस का तमिल, मराठी, गुजराती और कन्नड़ संस्करण भी डाउनलोड किया जा सकता है. और, तारीफ की बात यह है कि ओपनऑफ़िस ऑफ़िस सूट विंडोज़ तथा लिनक्स दोनों में ही बख़ूबी काम करता है. इस सूट में ऑफ़िस राइटर, स्प्रेडशीट, प्रेजेंटर, ड्राइंग, एचटीएमएल संपादक इत्यादि सब कुछ हैं, जो कि आपको व्यवसायिक उत्पाद माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस सूट में आपको मिलते हैं. यही नहीं, ओपनऑफ़िस के द्वारा आप माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस दस्तावेज़ों पर भी आसानी से काम कर सकते हैं. वैसे तो ओपनऑफ़िस हिन्दी में आप तमाम तरह के हिन्दी फ़ॉन्ट जैसे कि कृतिदेव से लेकर सुषा और नई-दुनिया तथा यूनिकोड सभी में काम कर सकते हैं, परंतु ओपनऑफ़िस हिन्दी स्प्रेडशीट में अगर आप हिन्दी यूनिकोड में काम करते हैं तो हिन्दी में इंडेक्सिंग / छंटाई इत्यादि भी आपके लिए बहुत आसान होगा. साथ ही इसका शब्दों का ऑटोकम्प्लीशन जो कि जैसे जैसे आप टाइप करते जाते हैं, यह स्वयं सीखते हुए चलता है, अत्यंत उपयोगी है जो आपकी उंगलियों को काफ़ी राहत पहुँचाता है.

संस्थापना से लेकर मेन्यू – सभी हिन्दी में:
जब आप ओपनऑफ़िस हिन्दी को अपने कम्प्यूटर में संस्थापित करते हैं तो यह देखकर बड़ी प्रसन्नता होती है कि आपका स्वागत प्रारंभिक संस्थापना मेन्यू में भी हिन्दी से होता है, चूँकि इसके इंस्टालर को भी हिन्दी में अनूदित किया जा चुका है. अन्य सभी संस्थापना निर्देश, सिर्फ लाइसेंस एग्रीमेंट को छोड़कर, हिन्दी में ही हैं.
संस्थापना के पश्चात् जब आप ओपनऑफ़िस हिन्दी प्रारंभ करते हैं तो आप पाते हैं कि प्राय: इसके सभी मेन्यू हिन्दी भाषा में ही हैं. कहीं-कहीं कुछ अनुवाद की ग़लतियाँ मिलती हैं, जिन्हें उम्मीद है कि इसके अगले संस्करणों में सुधार लिया जाएगा. इसमें ख़ूबी यह भी है कि कुंजीपट शॉर्टकट को हिन्दी अक्षरों से ही जोड़ा गया है जिससे कि हिन्दी वातावरण में कार्य करते समय शॉर्टकट कुंजियों के लिए अंग्रेजी वातावरण में जाने की आवश्यकता नहीं होती. हालाकि, तब फिर पुराना ट्रेडिशनल फ़ाइल सहेजने का शॉर्टकट कंट्रोल एस की बजाए कोई नया, हिन्दी का शॉर्टकट याद रखना होगा. कुंजीपट शॉर्टकट के लिए अलग-अलग माहौल में अलग-अलग व्यवस्थाएँ की गई हैं जिसके कारण हिन्दी में भिन्न-भिन्न माहौल में कार्य करने में हो सकता है कि हमें थोड़ी परेशानी आए. उदाहरण के लिए माइक्रोसॉफ़्ट ने कापी/कट/पेस्ट के लिए अँग्रेज़ी के पारंपरिक शॉर्टकट को बनाए रखा है. हिन्दी लिनक्स में अँग्रेज़ी के शॉर्टकट को ही रखा गया है जबकि ओपनऑफ़िस में सारे के सारे शॉर्टकट हिन्दी अक्षरों के हैं. नतीजतन कुछ शॉर्टकट काम नहीं करते तो कुछ असमंजस पैदा करते हैं. मगर, संपूर्ण अनुवाद तथा हिन्दी भाषा में संपूर्ण कम्प्यूटर माहौल के लिए यह प्रयास सराहनीय तो है ही, कालांतर में सभी अनुप्रयोगों/ऑपरेटिंग सिस्टम को इसे अपनाना ही होगा.

ओपनऑफ़िस की हिन्दी अलग?

ओपनऑफ़िस हिन्दी में माइक्रोसॉफ़्ट तथा लिनक्स के हिन्दी से बिलकुल अलग प्रयोग किया गया है. ओपनऑफ़िस में भाषा का सीधा, अनौपचारिक प्रयोग किया गया है जैसे कि काटो, चिपकाओ, खोलो इत्यादि. जबकि माइक्रोसॉफ़्ट तथा लिनक्स में औपचारिक, आदर सूचक तरीका इस्तेमाल किया गया है जैसे कि काटें, चिपकाएँ, खोलें इत्यादि, जो कि समृद्ध हिन्दी के लिए ज्यादा उपयुक्त है. संभवत: यह ऐसा इसलिए हुआ है कि हमारे पास हिन्दी फ़ॉन्ट की तरह कम्प्यूटर टर्मिनॉलॉज़ी तथा मेन्यू इत्यादि के लिए अभी भी कोई मानक शब्दावली नहीं है. जिसके कारण हर कोई अपनी सहूलियत के अनुसार हिन्दी के शब्दों का प्रयोग कर रहा है. इससे हिन्दी का भला होने के बजाए नुकसान होने की संभावना प्रबल है. उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में इस क्षेत्र में विशेष ध्यान दिया जाएगा.
अभी फिलहाल, ओपनऑफ़िस के जीयूआई तथा इसके बहुत सारे टिप्स और त्रुटि संदेश हिन्दी में उपलब्ध हैं. ओपनऑफ़िस में मदद अभी भी अँग्रेज़ी में ही है. मदद फ़ाइलों को हिन्दी में लाने में कुछ समय लग सकता है, चूँकि इनका अनुवाद करने में खासा वक्त और बहुत से कार्यघंटों की आवश्यकता होती है. ओपनऑफ़िस पर हिन्दी फ़ॉन्ट और इंटरफ़ेस चाहे वह विंडोज़ में हो या लिनक्स में, बहुत सुघड़ प्रतीत होता है और हिन्दी माहौल में ओपनऑफ़िस राइटर में हिन्दी का यह आलेख लिखने में आनन्द की अनुभूति होती है. हालाकि अभी इसमें माइक्रोसॉफ़्ट हिन्दी ऑफ़िस की तरह वर्तनी जाँचक तो नहीं है, जिसकी सख्त आवश्यकता है, और कहीं-कहीं मेन्यू और संदेशों में संस्कृत के कठिन शब्दों का उपयोग हताशा पैदा करता है.
कुल मिलाकर, अगर आपको अपनी हिन्दी भाषा में एक ऐसा आधुनिक ऑफ़िस अनुप्रयोग मुफ़्त में इस्तेमाल करने के लिए मिले जिससे आप कम्प्यूटर पर अपने दैनंदिनी के ढेरों काम निपटा सकते हैं, तो फिर छोटे मोटे गुणदोषों को तो माफ किया ही जा सकता है.

गंगा तेरा पानी ज़हरीला...
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मेरे जैसे करोड़ों धर्म-भीरुओं ने गंगा मैया के जल में अपने पापों और दुष्कर्मों को धोने की मंशा में शवों, अस्थियों, फूल-पत्रों, मूर्तियों, सिक्कों और न जाने क्या-क्या सदियों से विसर्जित किए हैं. फ़ैक्टरियों/शहरों के गटरों के विसर्जनों को गंगा में बहाए जाने की बात तो जुदा ही है. नतीजतन गंगा मैया के आँचल का पानी जहरीला तो होना ही था... हमारे इन कर्मों से हमारे पाप धुले नहीं वरन् बढ़े ही हैं. पर क्या हमें कभी इसका भान होगा भी?
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व्यंज़ल
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क्या कुछ नहीं ज़हरीली हो गई
अब ये गंगा भी ज़हरीली हो गई

आखिर कैसे हो क़ौम का इलाज
अब औषध भी ज़हरीली हो गई

अमृत अब से बुझती नहीं प्यास
अपनी लतें ही ज़हरीली हो गई

अंतत: शस्त्रागार बन गई दुनिया
दोस्ती की बातें ज़हरीली हो गई

प्रेमशास्त्र पढ़ जवाँ हुआ था रवि
मेरी चाल कैसे ज़हरीली हो गई
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संविधान के साथ धोखाधड़ी...
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झारखंड में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किए जाने से नाराज अर्जुन मुंडा की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए राज्यपाल के फैसले को संविधान के साथ धोखाधड़ी करार दिया है.

इसके साथ ही नेताओं में विधायिका – न्यायपालिका में कौन बड़ा – किसका अधिकार कहां तक का सवाल एक बार फिर खड़ा हो गया है. जहाँ बीजेपी स्वागत कर रही है (चूँकि यहाँ उसके फायदे की बात हो रही है) वहीं तमाम अन्य दल तिलमिलाए हुए हैं कि न्यायालय ओवरएक्टिविज्म दिखा रही है. परंतु न्यायालय को न्याय की परिभाषा फिर से बताने और यह बताने के लिए कि संविधान के साथ धोखाधड़ी राज्यपाल जैसे संविधान प्रमुखों द्वारा किया जा रहा है, किस ने मजबूर किया है? आज की स्तरहीन राजनीति ने, जहाँ सत्ता और कुर्सी की खातिर संविधान तो क्या, लोग अपने आप से भी धोखाधड़ी कर रहे हैं.

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व्यंज़ल
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ये मेरी मासूमियत है धोखाधड़ी नहीं
खुद की सेवा है कोई धोखाधड़ी नहीं

तमाम उम्र रहे हैं तंगहाल तो क्या
तसल्ली तो है किया धोखाधड़ी नहीं

गुजर गया दौर ईमान की बातों का
जीना असंभव जहाँ धोखाधड़ी नहीं

कोई फर्क बचा नहीं पहचानोगे कैसे
क्या छल और क्या धोखाधड़ी नहीं

अमीरों में नाम लिखवाने चला रवि
तारीफ़ है कि आती धोखाधड़ी नहीं
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शीर्षक ही काफ़ी है...

इस खबर का शीर्षक ही पूर्ण है पूरी कहानी कहने को, फिर क्या खबर और क्या खबरों की खबर... हे.. हे... हे.... हाय.. हाय... ऊँ.. ऊँ... (बहुत ज्यादा हँसने के बाद रोना आता ही है :)

व्यंग्य

इम्पोर्टेड रुपया?

इधर मैंने वह खबर पढ़ी, उधर मेरे दिमाग का हाजमा खराब हुआ. नतीजतन मेरी रातों की नींदें डिस्टर्ब हो गईं और अनिद्रा, अर्द्धनिद्रा में मुझे हॉरिबल, हॉटिंग सपने दिखाई पड़ने लगे. सपनों का यह सिलसिला जारी है. इससे पहले कि इन भयंकर सपनों को भुगतकर मैं और भी ज्यादा डिस्टर्ब हो जाऊँ, आपको भी थोड़ा डिस्टर्ब करूं अपने सपने सुनाकर.

रॉबर्ट के हाथ में भी वही अख़बार था. वही सुर्खियाँ थीं. वह भी वही अख़बार पढ़ रहा था. खबर पढ़ कर उसकी भी आंखें फटी रह गईं. वह भी घबरा गया. अलबत्ता उसके घबराने की वजह मुझसे जुदा थी. वह भागा. भागकर अपने बॉस लॉयन के पास पहुँचा. पसीने से सराबोर, हाँफते हुए उसने लॉयन से फरियाद की – “बॉस अब अपना क्या होगा? सरकार ने देश में नए नोट नहीं छपवा सकने के कारण विदेशों से नए नोट छपवाकर मंगवाने का फैसला कर लिया है. इस तरह तो हमारा धंधा चौपट हो जाएगा. मार्केट में हमारे फ्रेश नक़ली नोट जो असली कटे-फटे, सड़े-गले वोटों की तुलना में ज्यादा आथेंटिक दिखते हैं उसका तो डिब्बा ही गोल हो जाएगा. हम तो कहीं के न रहेंगे”

लॉयन हँसा. उसके चेहरे पर हमेशा मौजूद रहने वाली कुटिलता और बढ़ गई थी. वह बोला – “बेवकूफ़ ! सरकार ने बहुत दिनों बाद यह एक अच्छा काम किया है. अभी तक हमारे पास सब कुछ इम्पोर्टेड था. रुपए को छोड़कर. अब वह कमी भी पूरी हो जाएगी. मोना डार्लिंग वाह ! मजा आ गया. अब तो रुपया भी इम्पोर्टेड आ गया और इस देश में कभी इम्पोर्टेड चीज़ों का शौक कभी खत्म हुआ है? अब तो लॉयन के बिजनेस एम्पायर के लिए एक और स्कोप मिल गया है.”

रुपए के इम्पोर्टेड होने न होने का मेरा कन्फ्यूजन नींद के अगले स्पैल में तुरंत दूर हो गया. बाजार में विदेशों से छपकर आए नए नोटों की भारी डिमांड हो गई. लिहाजा उसकी भारी कालाबाजारी शुरू हो गई. इम्पोर्टेड नए नोटों का बंडल ऑन में बिकने लगा. किसी जमाने में सिनेमा टिकटों की कालाबाजारी जैसी होती थी वैसी इन इम्पोर्टेड रुपयों की होने लगी. एक का नोट दस में, दस का पच्चीस में और सौ का हजार में बिकने लगा. जाहिर है इस कारण इन इम्पोर्टेड, बढ़िया, कुरकुरे नोटों की क्रय शक्ति, देश में छपे गंदे, कटे फटे, फूहड़ नोटों की तुलना में बढ़ गई. लोगों का अपने पास इम्पोर्टेड नए नोट रखना स्टेटस सिंबल बन गया. हाई क्लास बार, क्लब, रिसॉर्ट इत्यादि में प्रवेश के लिए नए नियम बन गए. अब इन स्थानों में उन्हीं लोगों को प्रवेश मिलता था जो इम्पोर्टेड रुपया लेकर आ सकते थे. देश में एक नया विभाजन हो गया. मेजॉरिटी और माइनारिटी की. मेजॉरिटी पूअर क्लास जिनके पास पुराने नोट थे और माइनारिटी, रिच क्लास जो अपने नए इम्पोर्टेड नोटों पर इतराते थे.

बात इम्पोर्टेड रुपयों की थी, सो लोगों का जमीर भी जाग गया था. ये नए, विदेश से छपकर आए नोट नई तकनॉलाजी के थे जो नॉन टियरेबल, डस्ट-रस्ट-स्टेन प्रूफ होने तथा गारंटीड एवरफ्रेश होने के बावजूद, कैपेबल ऑफ वेरी रफ हैंडलिंग होने के बावजूद लोगों के दुलारे बने रहे. लोग इन नए रुपयों को अपनी जान से भी ज्यादा संभालकर रखने लगे. कोई आदमी उसे मोड़कर अंटी में नहीं रखता था. कोई औरत उसे अपनी चोली में ठूंसती नहीं थी. कोई उस पर कुछ लिखता नहीं था. इस मामले में सभी सेल्फ डिसिप्लिन्ड हो गए थे. बैंकों में नियम बन गए थे कि इन इम्पोर्टेड रुपयों को पंच नहीं किया जाएगा, केयरलेस हैंडलिंग नहीं की जाएगी. थूक-पानी लगाकर सर्र-सर्र गिना नहीं जाएगा ताकि इनका ओरिजिनल कुरकुरापन-नयापन बना रहे – इत्यादि, इत्यादि. कुछ बैंकों ने इन इम्पोर्टेड रुपयों की गड्डियों के लिए पाउच, पैकेट निर्धारित कर दिए तो कुछ बैंकों ने विशेषज्ञों को एंगेज कर लिया इन नोटों की गड्डियों के लिए एवरफ्रेश पैकिंग ईजाद करने के लिए.

चूंकि नोट छापने के लिए ग्लोबल टेंडर जारी किए गए थे और जैसा कि होता ही है, ऑर्डर अमरीका, जापान और जर्मनी की कुछ एमएनसीज़ ने मैनेज कर लिए थे. इम्पोर्टेड नोट इन्हीं देशों की कम्पनियों से आते थे. जापान में छपी नोटों की डिमांड जरा ज्यादा ही थी. यूं तो सभी नोटों का डिज़ाइन एवं ड्राइंग एकसार ही था, परंतु फिर भी प्रिंटेड इन जापान देखकर लोग ज्यादा रोमांचित होते थे, और उन नोटों में लोगों को कुछ अतिरिक्त विशेषताएँ नजर आने लगती थीं. ऐसे नोटों को प्राप्त करने और उसे खर्चने का आनन्द अलग ही आता था. रिश्वत, भेंट इत्यादि के लिए तो जाहिर है इन्हीं नए नोटों का ही प्रयोग होने लगा था.

पर, सपने तो सिर्फ सपने ही होते हैं. सपने कोई हकीकत थोड़े ही हो जाते हैं. क्या हुआ जो सपने के क्लाइमेक्स में मैंने देखा कि देश में छपे हुए रुपए का चलन अंतत: बन्द हो गया है. कोई उसे रद्दी के मोल भी नहीं लेता. देश के कर्णधारों, प्लानरों ने उसे अघोषित रुप से इल्लीगल करार जो दे दिया है.

(दैनिक भास्कर में दि. 1 मार्च 1997 को पूर्व प्रकाशित)

ये देश लंबित है…
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2 लाख फ़ाइलें निपटारे के लिए वर्षों से लंबित... और वह भी मंत्रालय में जहाँ शासकीय निर्णय होते हैं... देश, प्रांत और समाज के विकास के लिए. फिर अन्य सरकारी विभागों की बात तो छोड़ ही दें.

दरअसल सारा सरकारी कार्यालयीन तंत्र ही जंग खाया हुआ है. मैंने भी 20 वर्ष सरकारी सेवा में गुजारे हैं. सरकारी ऑफ़िसों की स्थिति सचमुच शोचनीय है और कोई भी बदलना नहीं चाहता. धूल-खाती, सड़ती हुई फ़ाइलों के बंडलों के बीच बैठने वाले सरकारी अफसर और बाबू कार्यालयीन समय में देर से आते हैं और समय से पूर्व चले जाते हैं. कोई काग़ज़, मसलन किसी का जेनुइन आवेदन किसी कार्यालय में पहुँचता है, तो वहाँ का आवक बाबू उस पर ठप्पा लगाकर, क्रमांक व दिनांक डालकर आवक फ़ाइल में लगा देता है. उसके पश्चात् उस फ़ाइल का अंतहीन सफर शुरू हो जाता है. अगर उस फ़ाइल में संबंधित अफसर को कोई काम नहीं करना है, तो उसपर कोई टीप लिख देगा, कोई जानकारी मांग लेगा या उसे अपने ऊपर-नीचे किसी अन्य अफसर के पास निर्णय के लिए भेज देगा. यानी अपनी कोर्ट में बाल नहीं रखेगा ताकि जिम्मेवारी न ठहराई जा सके. फ़ाइलों को लंबित रखने का सारा काम बड़े ही जेनुइन तरीके से होता है. और अगर कोई बंदा किसी फ़ाइल को जल्दी से निपटाने की फ़िराक में रहता है तो सबको उसमें कुछ निहित स्वार्थ नज़र आने लगते हैं. वैसे भी आमतौर पर वही फ़ाइलें चलती हैं जिनमें वज़न होता है. शेष को तो लंबित रहना होता है. इस देश की तरह...

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व्यंज़ल
*-*-*
क्यों हो गया मेरा देश लंबित है
सोच कर ये मन होता कंपित है

मेरी आशाओं का महल क्योंकर
अर्ध शती में हो गया खंडित है

मेहनतकशों का मुकाम नहीं और
अकर्मण्य होता महिमा मंडित है

मनीषियों के दिन लद गए कबसे
यहाँ पूजा जाता पोंगा पंडित है

मुफ़्त में आँसू बहा कर रवि यूँ
क्यों तू करता खुद को दंडित है
*-*-*

क्योंकि ये सरकार मेरी है...

*-*-*

मुलायम सिंह ने अपने भाई, जो कि यूपी के पीडबल्यूडी मंत्री भी हैं, के निजी कालेज के लिए 34.5 करोड़ रुपयों का अनुदान स्वीकृत किया है. क्यों न करें? आखिर समाजवादी सरकार उनकी अपनी है और वे अपने भाई, भतीजे और अपने समाज का भला नहीं करेंगे तो क्या राह चलता दूसरा आदमी करेगा? समाजवादी/साम्यवादी पार्टियों-नेताओं का छद्म समाजवाद/साम्यवाद का इससे बढ़िया उदाहरण और नहीं हो सकता. हिन्दुत्ववादी-सेकुलरवादी पार्टियों के छद्म विचारधाराओं के बारे में भी भारतीय बुद्धिजीवियों को पता है कि ये सिर्फ अपना वोट बैंक बनाने-बचाने के लिए वोटरों के सामने रोना रोते रहते हैं.

यह स्थिति भारत में हर कहीं है. प्राइवेट स्कूलों कालेजों की संख्या अधिकतर नेताओं के परिवारों की हैं. पेट्रोल पंपों के छद्म मालिक नेता हैं. इसीलिए तो सरकार बनाने, सरकार में शामिल होने के लिए तमाम तरह की मारा मारी चलती रहती है और, शहाबुद्दीन की तरह कुछ नेता तो खुले आम यहाँ तक कहते हैं कि हम अपनी सरकार बनाने के लिए किसी भी हद तक, किसी भी एक्स्ट्रीम तक जाएंगे. देश सेवा के लिए आज कोई सरकार में शामिल नहीं होता. सरकार का रूप परिवर्तन हो गया है. आज की सरकार स्व-सेवा के लिए है.

*-*-*
व्यंज़ल
-/*/*/-
कुछ करुँ या न करुँ कि सरकार मेरी है
मैं देता नहीं जवाब कि सरकार मेरी है

अपने बन्धुओं में ही किया है वितरण
है खरा समाजवाद कि सरकार मेरी है

मांगता रहा हूँ वोट छांट बीन तो क्या
मैं पूर्ण सेकुलरवादी कि सरकार मेरी है

रहे मेरी ही सरकार या मेरे कुनबों की
मैंने किए हैं जतन कि सरकार मेरी है

मुल्क की सोचेगा तो रवि कैसे कहेगा
मैं ही तो हूँ सरकार कि सरकार मेरी है
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अँग्रेज़ी में हिन्दी कि हिन्दी में अँग्रेज़ी?
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शनिवार को टाइम्स ऑफ इन्डिया तथा इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय पृष्ठों पर दो विरोधाभासी चीज़ें एक साथ दिखाई दिए. परंतु ये कोई राजनीतिक नज़रिया या टीका टिप्पणी नहीं थे.

भले ही भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा राष्ट्र हो जिसकी जनता अँग्रेज़ी भाषा बोलती है, परंतु इस अँग्रेज़ी में हिन्दी भी घुलती मिलती दिखाई देने लगी है. हिन्दी में अँग्रेज़ी तो खैर, एक इमल्शन की तरह घुल मिल गई है, और प्राय: आम बोलचाल तथा अब तो गंभीर लेखन में भी, अँग्रेजी के शब्दों का बख़ूबी इस्तेमाल हो रहा है. मैंने अपनी ग़ज़लों में कई मर्तबा अँग्रेज़ी के शब्दों का बख़ूबी प्रयोग किया है.

ट्रू ह्मूमन ग्लोबलाइज़ेशन - विश्वमानववाद का इससे सटीक उदाहरण और क्या हो सकता है भला.

राही, कोई नई राह बना जिससे कि तेरे पीछे आने वाले राही तुझे याद करें...
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जावेद अख़्तर, जिन्हें इस साल के फ़िल्मफ़ेयर के पाँचों नॉमिनेशन उनके गीतों के लिए मिले थे, ग़जलों के बारे में बेबाकी से कहते हैं कि – इतनी खूबसूरत ट्रेडिशन का धीरे-धीरे लोगों को इल्म कम होता जा रहा है. ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने में इसकी दो पंक्तियों में – इशारों में, कॉम्पेक्ट तरीके से कही जाने वाली बातों का खासा योगदान रहा है, जो ग़ज़लकारों को मेहनत से लिखने के लिए मज़बूर करती हैं. इसके साथ ही इसके रदीफ, क़ाफिए और मकता-मतला जैसी पारंपरिक और नियमबद्ध चीज़ें भी ग़ज़ल लिखने के दौरान कठिनाइयाँ पैदा करती हैं.

मगर, फिर भी लोग ग़ज़लें लिख रहे हैं और क्या खूब लिख रहे हैं. भले ही पाठक, श्रोता और प्रशंसक नदारद हों – ग़ज़लें आ रही हैं... हिन्दी में भी और उर्दू में भी. और, मेरा तो यह मानना है कि पारंपरिक और नियमबद्ध रचना के पीछे पड़ने की जरूरत ही नहीं है. रचना ऐसी रचिए जिसमें पठनीयता हो, सरलता हो, प्रवाह हो और जिसे रच-पढ़ कर मज़ा आए. बस. कट्टरपंथी आलोचक तो हर दौर में अपनी बात कहते ही रहेंगे और उनसे हमें घबराना नहीं चाहिए, जैसा कि जावेद अपनी बात को समाप्त करते हुए कहते हैं- तुलसी दास ने जब राम चरित मानस लिखी तो उसकी बिरादरी ने निकाल बाहर किया कि किस घटिया जुबान (दोहा-छंद तो बाद की बात है!) में रामायण जैसी पवित्र किताब लिखी. वैसा ही सुलूक शाह अब्दुल क़ादिर के साथ हुआ था जब उन्होंने कुरान का उर्दू में तर्जुमा किया था.
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ग़ज़ल
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अवाम को आईना आखिर देखना होगा
हर शख्स को अब ग़ज़ल कहना होगा

यही दौर है यारो उठाओ अपने आयुध
वरना ता-उम्र विवशता में रहना होगा

बड़ी उम्मीदों से आए थे इस शहर में
लगता है अब कहीं और चलना होगा

जमाने ने काट दिए हैं तमाम दरख़्त
कंटीली बेलों के साए में छुपना होगा

इश्क में तुझे क्या पता नहीं था रवि
फूल मिलें या कांटे सब सहना होगा
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हास्य व्यंग्य
नई शब्दावली नए शब्द
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इंटरनेट और इन्फ़ॉर्मेशन तकनॉलाजी ने नित्य नए नए शब्दों और वाक्याँशों को जन्म दिया है. उदाहरण के लिए ब्लॉग, जिसे हम हिन्दी में चिट्ठा कहते हैं. परंतु इससे इतर हमारे भारत में कुछ समय से नए नए शब्दों का गठन सप्रयास-अनायास हुआ है, और आपकी सामाजिक शब्दावली के भंडार में ऐसे नए-नए शब्दों का समावेश हुआ होगा. आइए, आपकी पुनश्चर्या के लिए एक बार फिर से इन नए शब्दों और उनके अर्थों पर चर्चा करते हैं. कुछ खास नए शब्द ये हैं, जिन्हें जानना समझना हर भारतीय के लिए आवश्यक है. क़यास लगाए जा रहे हैं कि इन शब्दों को प्रत्येक भारतीय जनता को समझने-समाझने के लिए सरकार कोई अध्यादेश लाने की भी तैयारी कर रही है!
गरीब रैला: इस नए शब्द का जन्म स्थान पटना है. इसका अर्थ गरीबों के लिए पटना तक की मुफ़्त यात्रा, बस-ट्रक मालिकों तथा रेलवे के लिए जबरिया मुफ़्त-बिना टिकट यात्रा तथा राजनीतिज्ञों के लिए एक-दूसरे को अपना बाहुबल दिखाना है. महा रैला इसका अपभ्रंश है.
हल्ला बोल : परिवर्तन इसी का नाम है. लखनऊ कहाँ एक समय तहजीब को लखनवी अंदाज से पहचाना जाता था और अब नेताओं की कृपा से हल्ला बोल के जनक के रूप में पहचाना जाने लगा है. यह त्रि-अर्थी शब्द है. इस शब्द का अर्थ राजपक्ष के दृष्टिकोण से क़ानून व्यवस्था में विपक्ष द्वारा विध्न है तो विपक्ष की नज़र से साम-दाम... वाली कहावत में से दंड का प्रयोग सिर्फ कुर्सी हथियाने के लिए है. मज़ेदार बात यह है कि आम जनता के लिए इसका अर्थ है मज़ेदार नज़ारे.
महाबंद: कल भी, आज भी, कल भी और संभवत: परसों भी. जी हाँ, बंद, बंद, और सिर्फ बंद. किसी को विरोध करना हो, किसी की मर्जी का कुछ नहीं हुआ, कहीं कोई गड्ढे में गिरकर मरा – कारण कोई सा भी हो – भारत के गाँव मुहल्ले से लेकर शहर, प्रांत और देश में हर तरफ बंद और सिर्फ बंद. कई दिनों तक बंद. यह है महा बंद और कुछ बचा है क्या बंद के सिवा भारत में? इसकी उत्पत्ति असम में हुई, बिहार में फैली और इतनी फैली कि अब तो भारत का विपक्ष तो क्या सत्तापक्ष भी महाबंद का आयोजन करने में आनंद लेने लगा है.
न्यायिक सक्रियता : मीडिया ने इस शब्द को जन्म दिया, परंतु फिर भी इसकी उत्पत्ति के जिम्मेदार नेता ही रहे हैं. इसका अर्थ हो सकता है – भ्रष्ट नेताओं-अफसरों के सिरों पर लटकती तलवार. भारत में यूँ तो न्याय अपना काम अपने हिसाब से तो करता ही है (लॉ विल टेक इट्स ओन कोर्स) जहाँ एक-एक मुकदमा बीस-बीस साल तक चलता है, परंतु कुछ खास नेताओं, अफसरों पर न्याय ने पीआईएल के जरिए अपने काम में सक्रियता दिखाई तो भीषण अक्रियता के बीच में लोगों को न्यायिक सक्रियता नज़र आने लगी.
सामाजिक न्याय : इस शब्द का अर्थ सही मायने में कन्फ़्यूजिंग है. पिछड़ों पर सदियों से जो सामाजिक अन्याय हो रहा था उसकी भरपाई के लिए सामाजिक न्याय का नारा (जी हाँ, सिर्फ नारा) नेताओं द्वारा दिया गया. यह नारा कइयों को सामाजिक अन्याय सा लगता है. वैसे, कुल मिलाकर इसका अर्थ चुनिंदा नेताओं तथा चुनिंदा राजनीतिक पार्टियों के लिए कुर्सी प्राप्त करने का महामंत्र है जिसे वे हमेशा जपते रहते हैं.
कल्याण निकाय : इसका शाब्दिक अर्थ आपको भ्रमित करेगा. इसकी उत्पत्ति भी बिहार में कुछ समय पूर्व हुई थी. बिहार में कुछ भ्रष्ट अफसरों को गिरफ़्तार किया गया था तो इन अफसरों की आर्थिक जरूरतों को संबल देने के लिए तथा इनके तथाकथित कल्याण के लिए अन्य साथी अफसरों से चंदा लेकर बनाया जाने वाला निकाय है यह. अब यह दीगर बात है कि जिनके लिए कल्याण निकाय बनाया जा रहा है वे कई लोगों का कल्याण करने की कूवत तो पहले ही रखते हैं, कईयों का कल्याण वे पहले ही कर चुके होंगे.
तबादला उद्योग : भारत देश का यह सबसे बड़ा सरकारी उद्योग है. इस उद्योग में रॉ-मटीरियल, पूंजी, इनपुट कुछ नहीं लगता मगर प्रॉफ़िट बहुत है. इसमें किसी भी उद्योग से ज्यादा पैसा, ज्यादा प्रॉफ़िट होने की संभावना रहती है. न हींग लगे न फ़िटकरी... जैसी कहावतों के लिए यह अप्रतिम उदाहरण है. परंतु प्रॉफ़िट किसे होता है यह शोध का विषय है.

यह शब्द सूची अधूरी है, चूंकि इस मामले में मेरा ज्ञान अधूरा है. आपसे विनती है कि इस शब्द सूची को पूर्ण करने में मेरी मदद करें. वैसे, क्या आपको यह नहीं लगता कि इस तरह के नए नए शब्द आते रहेंगे और इस तरह यह सूची कभी भी पूरी नहीं की जा सकेगी?
(टीप: संपादित अंश दैनिक भास्कर, 2 जुलाई 1997 में पूर्व-प्रकाशित)

डरावनी सरकार!

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दैनिक भास्कर के 28 फरवरी के अंक में प्रीतीश नंदी ग्राफ़िक डिटेल में लिखते हैं कि सरकार और उसके नुमाइंदे आम जनता को डराने और तंग करने के अलावा और कुछ खास नहीं करते. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आमतौर पर यह बात सही है. मुझे एक हृदयविदारक घटना याद आती है. पिछली छुट्टियों में रेल सफर के दौरान गांव के एक गरीब परिवार की दास्तान सुनने को मिली. वह अपना गांव छोड़कर रोजी-रोटी की तलाश में शहर को जा रहा था. उस गरीब से रास्ते में कुछ पुलिस वालों ने पैसे उगाह लिए. इस लिए नहीं कि उसके पास टिकट नहीं था. वह भला आदमी तो सही टिकट के साथ यात्रा कर रहा था. उसे इस लिए तंग किया गया चूंकि सरकारी क़ायदे के अनुसार उसे अपना गांव छोड़ने के लिए गांव के सरपंच से लिखवा कर लाना था (क्योंकि शासन ने गांवों से पलायन रोकने के लिए यह क़ानून बनाया है) जो वह नहीं लाया है!

सच है, सरकार डराती और तंग करती है. भले ही वह गांव का ग़रीब हो या प्रीतीश नंदी जैसा शख्स.
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व्यंज़ल
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लोगों को डराती और तंग करती है सरकार
लूली लंगड़ी क़ौम किस तरह से दे ललकार

जनता की सरकार है या सरकार की जनता
सरकार के लिए भी कोई सरकार है दरकार

यह नमूना नहीं था आजादी के दीवानों का
क्या नक़्शे नए होंगे, नए होंगे कभी परकार

मेरा ये मुल्क दौड़ के वहाँ जा पहुँचा है जहाँ
निर्दोषों को करनी होती है दुष्टों की जयकार

एक अकेला तू चला था ईमान के रस्ते रवि
मिलना तो था सारे जमाने का तुझे बदकार
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