टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

February 2005

परालौकिक अनुभव की गूँज

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बात बहुत पुरानी है. तब नई नई नौकरी लगी थी. अम्बिकापुर जैसे पहाड़ी जिले के सामरी तहसील के मुख्यालय कुसमी में मेरे जैसे कोई दो दर्जन से अधिक बैचलर्स भिन्न भिन्न विभागों में कार्यरत थे. हममें से अधिकतर के कई छोटे छोटे ग्रुप थे, और हम काम के बाकी बचे समय में प्राय: मौज मस्ती करते रहते थे जिनमें शुमार होता था जंगल की सैर, तालाबों की तैर और अकसर ताश की रमी का खेल. क्योंकि तब न तो केबल था न टीवी और न ही कम्प्यूटर्स. हमारे ग्रुप में एक डाक्टर खेस, जो वहाँ के प्रायमरी हेल्थ सेंटर में पदस्थ थे, बड़े मस्तमौला थे और वे हर प्रकार का नशा करते थे. गाँजा, चरस, सिगरेट, तम्बाखू, शराब, हँड़िया (वहाँ की देशी शराब जो चावल को सड़ाकर और जंगली जड़ी बूटी मिलाकर तैयार की जाती है, जो पीने में थोड़ी सी खट्टी लगती है, परंतु सीधे सिर पर चढ़ती है) इत्यादि सब कुछ, और प्राय: एक साथ दो-तीन चीज़ों का नशा. सही मायनों में वे एडिक्ट थे. और अगर पहाड़ी क्षेत्र के नाते उन्हें कभी कोई नशे की चीज़ नहीं मिलती थी, तो वे अस्पताल में उपलब्ध जिंजर (कंसन्ट्रेटेड इथाइल अल्कोहल जो दवाई के काम आता है) को टॉलू सोल्यूशन (खांसी की दवाई) के साथ मिलाकर पीते थे.

एक दिन हमारे ग्रुप के लोगों ने, जिसमें जाहिर है, डाक्टर खेस (जो कि क्रिश्चियन थे, अंग्रेजी में स्पेलिंग Xess) भी शामिल थे, ठंडी रात में एक पहाड़ी को कॉन्कर करने का प्रोग्राम बनाया जो कि मेरे ऑफ़िस के ठीक पीछे था. जम कर सर्दी पड़ती थी वहाँ. और हवा भी इतनी ठंडी चलती रहती थी कि मई-जून के गर्मी के दिनों में भी वहाँ के नेटिव लोग मोटे-मोटे लबादा (जिसे वे बोरकी कहते थे) ओढ़े रहते थे. बहरहाल हम सब रात दस बजे रवाना हुए. पहाड़ी के ऊपर तक पहुँचते पहुँचते एक बजने को हो रहा था. ठंड को काटने के लिए सबने भूत-प्रेतों की कहानियाँ सुनानी शुरू कर दी थीं, और साथ लाए सिगरेट-शराब का दौर तो साथ साथ चल ही रहा था. किसी ने कहानी सुनाया था कि वहाँ की किंवदंती के अनुसार जिस पहाड़ी पर हम चढ़ रहे थे, वहाँ के शीर्ष पर एक प्रेत रहता है जिसने कई जानें भी ले ली हैं. पहाड़ी के दूसरे सिरे पर अस्पताल का मुर्दाघर था जहाँ डाक्टर खेस प्राय: पोस्टमॉर्टम करते थे. उन्होंने भी मुर्दाघर के मुर्दों के साथ के अपने अनुभव की कई झूठी सच्ची, परंतु जीवंत कहानी सुनाई. पहाड़ी के सिरे तक पहुँचते-पहुँचते डाक्टर खेस द्वारा दी गई सिगरेट के कई कशों के बावजूद मेरे जिस्म में सिहरन दौड़ रही थी और मेरे मन में अजीब से अनुभव जागृत हो रहे थे. मुझे लगा कि जैसे मुझे ठंड जरा ज्यादा ही लग रही है.
अचानक ही मेरे हाँथ पाँव काँपने लगे और मेरे मुँह के भीतर से अनियंत्रित लार बहने लगी. दिमाग ने काम करना बन्द कर दिया और मैं गिर पड़ा. मेरे साथी दौड़ते हुए मेरे पास चले आए. एक ने मुझे उठाने की कोशिश की परंतु वह असफल रहा. मेरे हाथ पैर शिथिल हो गए थे. एकाध मिनट के लिए मुझे लगा कि यह दौरा क्षणिक था और कहीं कुछ नहीं हुआ है. परंतु फिर दूसरे ही पल फिर अजीब अहसास होने लगा और लगने लगा कि मैं मरने वाला हूँ. मुझे कोई शक्ति, शायद पहाड़ी का भूत मुझे अपने पास बुला रहा है. मेरा दिमाग प्रत्येक क्षण-दो क्षण में रह रह कर अजीब चीजें सोच रहा था. मैंने बदहवासी में बड़बड़ाना चालू कर दिया कि अब मैं मरने वाला हूँ और मेरी लाश यहीं कहीँ दफन कर दी जाए. मैं अंधेरे में दोस्तों से कागज़ कलम की माँग करने लगा ताकि मैं अपना वसीयत कर सकूँ और यह भी लिख सकूँ कि मेरे मृत्यु में किसी का कोई हाथ नहीं है, अन्यथा मेरे ये साथी बिला वजह परेशान होते. इस बीच मैं कब बेहोश हुआ, पता ही नहीं चला.

जब मुझे होश आया तो मैंने पाया कि मैं भूतों से घिरा हुआ हूँ. कोई मेरे पैर में मालिश कर रहा था तो कोई सिर पर. मैंने चिल्लाने की बेतरह कोशिश की, परंतु मेरे मुँह से आवाज़ ही नहीं निकली. डर के कारण मेरी घिग्घी बंध गई थी.

मुझे कुछ आवाज़ें सुनाई दी. एक भूत कह रहा था- इसे कुछ नहीं हुआ है यार. लगता है भूल से इसे मैंने अपनी गाँजा वाली सिगरेट दे दी थी. थोड़ा सा नशा चढ़ गया है इसे. पंद्रह-बीस मिनट में ठीक हो जाएगा. मुझे उस भूत की आवाज थोड़ी पहचानी सी लगी. वह डॉक्टर खेस की आवाज़ थी.
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राजेश रंजन, जो अभी रेडहैट पर हिन्दी का कार्यभार देख रहे हैं, ने एक लिंक भेजा है. वागर्थ में हमारे हिन्दी चिट्ठों की जमकर चर्चा हुई है. आप भी देखें:
http://vagarth.com/feb05/internet/index.htm

धन्यवाद राजेश.
रवि

तिरंगे का अपमान?
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भारतीय खिलाड़ियों, या कहें कि भारत की जनता का ये दुर्भाग्य है कि तिरंगे के मान-अपमान के बारे में किसी लकीर-के-फकीर सरकारी बाबू या सोच-विहीन राजनेता (जिनके ऊपर इसे तय करने का भार है) तय करते हैं कि सही क्या है. वह तो भला हो न्यायालय का, अन्यथा तीन-चार साल पहले तो आप तिरंगे को अपने घर पर भी नहीं टाँग सकते थे. आम जनता को तिरंगे का दर्शन साल में सिर्फ दो दिन यानी 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही हो पाता था, वह भी किसी जर्जर, टूटते-फूटते, वर्षों से रँगाई-पुताई को मोहताज शासकीय कार्यालयों के ऊपर! और फिर कहा जाता है कि तिरंगे का अपमान न हो. तिरंगे का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है भला?
खेल मंत्री सुनील दत्त के प्रयासों के बावजूद खिलाड़ियों के द्वारा तिरंगे के उपयोग को उसके अपमान का कारण मान कर किसी सरकारी बाबू/सोच-विहीन राजनेता द्वारा फिर से मना कर दिया गया है. अगर हमारे खिलाड़ी अपने अमरीकी खिलाड़ी बंधु की तरह जो हर कहीं, गर्व से स्टार और स्ट्राइप लगाए फिरते हैं, अगर तिरंगा लगा लेते हैं तो यह भारत देश का और तिरंगे झंडे का अपमान होगा! इससे घटिया विचारधारा तो कुछ और हो ही नहीं सकती.
दरअसल, यह निर्णय समस्त भारतीय जनता का अपमान तो है ही, और बड़ा दुर्भाग्य कि वह अपने राष्ट्रीय झंडे के प्रतीक, तिरंगे को गर्व से कहीं प्रदर्शित भी नहीं कर सकता.

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व्यंज़ल
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नकारेगा भी कोई ये विचार घटिया
बरसों से बिछी पड़ी है टूटी खटिया

जमाने में बहुत हैं मख़मली मसनद
हमें माकूल वही अपनी फटी चटिया

जमाना हँसता है तो इससे हमें क्या
समंदर को चले उठाए अपनी पटिया

हम सा अमीर कोई नहीं जमाने में
हमने दरवाजे पे लगा ली है टटिया
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इंडीब्लॉग़ीज पुरस्कार गरीब, मेधावी विद्यार्थियों को पहुँचा…
धन्यवाद अमित और अतुल, आपके इंडीब्लॉग़ीज पुरस्कार की राशि से रतलाम के पास ग्राम सेजावता के शासकीय हाई स्कूल में कक्षा दसवीं के गरीब, परंतु मेधावी विद्यार्थियों को दिनांक 22 फरवरी को पुरस्कार प्रदान किया गया. दसवीं की प्री-बोर्ड परीक्षा में विषयवार अधिकतम अंक लाने वाले प्रत्येक विद्यार्थियों को रू.175/- मूल्य के नोट बुक्स तथा एक हीरो फाउन्टेन पेन रु. 25/- मूल्य के प्रदान किए गए. कुल सात पुरस्कार प्राचार्य श्री सुरेशचन्द्र करमरकर के हाथों से प्रदान किए गए जिसके विवरण निम्न हैं-
कुमारी मंगल कुंवर- हिन्दी भाषा, कु. ममता- अंग्रेजी, धनंजय- संस्कृत, कु. सुमित्रा- गणित, संतोष कुमार- विज्ञान, राजपाल- सामाजिक विज्ञान, कु. सुमित्रा- कुल सर्वाधिक अंक.
इनबच्चों के चित्र देखने के लिए यहाँ क्लिक करें.ये बच्चे फटे-पुराने टाट पट्टियों में जमीन में बैठकर, टूटे फूटे भवनों में पढ़ाई करते हैं. और ऐसी घोर ग़रीबी में भी अपनी पढ़ाइयाँ जारी रख अच्छे अंक लाते हैं. आइए, इनके प्रयासों के लिए इन्हें दिल से बधाई दें.

आइए, शर्म से जरा सिर झुकाएँ...
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हमारे भारत में एक ईनामी डाकू ददुआ सरेआम एक गांव में एक मंदिर बनवाता है, आसपास ऐलान करता है कि अमुक दिन मंदिर में भगवान की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होगी. वह गांव वालों समेत सबको निमंत्रण भेजता है और इस आयोजन में पहले से ऐलान कर खुद भी भेष बदलकर पूजा अर्चना में शामिल होता है. और यह सब जानते हुए भी, वोटों की गणित के पीछे विधायक-सांसद (जिनमें उ.प्र. के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह का सांसद भतीजा भी शामिल है) भी उस आयोजन में शामिल होते हैं जिसमें दो लाख (जी हाँ, दो लाख) लोगों की उपस्थिति होती है.

और, हमारे असहाय भगवान अपनी प्राण प्रतिष्ठा का यह नाटक बुत बन कर देखते रहे. अगर भगवान में जान होती, तो वे भी शर्म से डूब मरते.

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व्यंज़ल
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राजा नए हुए हैं गूजर हो या ददुआ
मानव या तो मरा पड़ा या है बंधुवा

जाति-धर्म के समीकरणों में उलझा
मेरे देश का नेता हो गया है भड़ुआ

उस एक पागल की सच्ची बातों को
पीना तो होगा लगे भले ही कड़ुआ

अवाम का तो होना था ये हाल, पर
ये क़ौम किस लिए हो गई है रंडुवा

एक अकेला रवि भी क्या कर लेगा
इसीलिए वो भी खाता बैठा है लड़ुवा

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आइए, झगड़ा करें

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लीजिए, यह भी ग़ज़ब है. झगड़ों के भी अपने फ़ायदे हैं. अध्ययनों के अनुसार, जो दम्पति आपस में झगड़ा करते रहते हैं, वे औरों की तुलना में ज्यादा फ़िट रहते हैं, उन्हें तनाव के फलस्वरूप होने वाले हृदय रोगों की संभावना कम होती है, इत्यादि इत्यादि.
लगता है अब हमें झगड़ने के लिए और झगड़ते रहने के लिए कारणों की तलाश करते रहना पड़ेगा. अब पति को अपने अख़बार के अध्ययन के बीच पत्नी के द्वारा किए गए किसी प्रकार के व्यवधान को सहने के बजाए उस पर झगड़ा किया जाना ही उचित होगा और पत्नी द्वारा यह देखे जाने के बाद कि पढ़ा गया अख़बार ठीक ढंग से मोड़ कर उचित प्रकार नहीं रखा गया है, कुढ़ कर चुप रहने या ताने मारने के बजाए, इस बात पर जमकर झगड़ा करना- पति-पत्नी दोनों की सेहत के लिए उचित रहेगा.

तो, दोस्तों, झगड़े को अब नई निगाह से देखो और झगड़ते रहो.
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व्यंजल (हास्य ग़ज़ल=हज़ल के तर्ज पर)
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प्रिये, है ये प्रेम, नहीं है झगड़ा
आओ यूँ सुलझाएँ अपना रगड़ा

जिंदगानी के चंद चार क्षणों में
ऊपर नीचे होते रहना है पलड़ा

करम धरम तो दिखेंगे सबको
चाहे जित्ता डालो उस पे कपड़ा

जब खत्म होगी तो सुखद होगी
यूँ पीड़ा को रखा हुआ है पकड़ा

जिया है जिंदगी को बहुत रवि
मौत कितनी है ये असली पचड़ा
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अपने ब्लॉग चित्रों के लिए एक और मुफ़्त सेवा

फ्लिक्र (और ऐसे ही अन्य कई सेवाओं) के द्वारा अपने ब्लॉग के चित्रों पर काँट-छाँट-तोड़-मरोड़ किए जाने से परेशान यह बंदा कई दिनों से इंटरनेट की किसी मुफ़्त अच्छी सेवा की तलाश में था. अभी-अभी पता चला कि स्ट्रीमलोड न सिर्फ चित्र, बल्कि अन्य मीडिया जैसे कि वीडियो/ऑडियो स्ट्रीमिंग की भी मुफ़्त सुविधा (100 मे.बा. तक) प्रदान कर रही है, और वह भी बिना तोड़े-मरोड़े. अब देखना यह है कि यह भरोसेमंद और तेज सेवा है या नहीं. मेरे पिछले ब्लॉग में चिड़िया के घोंसले का चित्र स्ट्रीमलोड से ही है. अगर आपको सही दिख रहा है तो मुझे बताएँ और आप भी उपयोग करें.

कंकरीट के जंगल और पॉलिथीन के घोंसले

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पिछले दिनों हमारे घर के सामने हमारे छोटे से बग़ीचे में, सीढ़ियों के नीचे से जाती हुई बेल की शाखाओं पर सुंदर, नन्हे चिड़िया के एक जोड़े ने अपना घोंसला बनाया. चिड़ी और चिड़ा दिन रात मेहनत करते, तिनका-तिनका जोड़ते और देखते ही देखते उनका घोंसला बन कर तैयार हो गया. पर यह क्या? जब घोंसला बनकर तैयार हुआ तो पता चला कि उसमें घासफूस, पत्ते और प्राकृतिक तिनके तो कम, पॉलिथीन के रेशे, काग़ज और पॉलिथीन थैलों के टुकड़े और न जाने क्या-क्या सिंथेटिक वस्तुएँ थीं. जिस घोंसले को अपने प्राकृतिक रूप में सुंदर, प्यारा और निर्मल दिखाई देना चाहिए था, वह इन पॉलीथीन और काग़ज़ के टुकड़ों के कारण बदसूरत और घिनौना हो गया था.

मनुष्य के ग़लत कार्यों का खामियाजा बेचारे नन्हे पशु पक्षी भुगत रहे हैं. उन्हें पेड़ पौधों के जंगल नसीब नहीं हो रहे हैं लिहाज़ा वे कंकरीट के जंगल में शौकिया तौर पर उगाए गए किसी पौधे की किसी शाखा के एक टुकड़े में पॉलीथीन का घोंसला बनाने को अभिशप्त हैं.

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दोस्तों, एक सप्ताह के लिए बंदा ऑफलाइन होने जा रहा है. अब जबकि सुबह की कॉफ़ी को तो भले ही छोड़ा जा सकता है, इंटरनेट को नहीं, तब सप्ताह भर के लिए ऑफलाइन होना मज़ाक सा लगता है. परंतु छत्तीसगढ़ / बस्तर के बीहड़ों में जाना है, जहाँ इंटरनेट के पग अभी पहुँच नहीं पाए हैं. लिहाजा मेरी कुछ पुरानी ग़ज़लें जिनमें से कुछ यदा कदा प्रकाशित भी हो चुकी हैं और लंबे समय से जियोसिटीज़ में भी थीं, यहाँ ब्लॉग पर डाल रहा हूँ. सप्ताह भर आराम से पढ़िए और मुझे गरियाइए कि क्या फूहड़ ग़ज़लें लिखी हैं… हे..हे...हे...

ग़ज़ल 01
पानी की कीमत किसी पसीने से पूछना
बयार क्यों बहती नहीं उल्टी मत पूछना

जोड़ घटाना गुणा भाग के गणितीय सूत्र
राजनीति में ऐसे चले आए क्या पूछना

सत्ता- कुर्सी के खेल में नियम- कायदे
वो भला आदमी चले- चला था पूछना

नया क्या आत्मघाती का बेरोजगार होना
जेहन में आता है फिर क्यों ये पूछना

रवि, खुदा ने तो तुझे बनाया था बेजात
फिर क्यों सभी जात तेरी चाहते हैं पूछना

ग़ज़ल -02
जरा से झोंके को तूफान कहते हो
टूटता छप्पर है आसमान कहते हो

उठो पहचानो मृग मरीचिका को
मुट्ठी भर रेत को रेगिस्तान कहते हो

अब तो बदलनी पड़ेंगी परिभाषाएं
सोचो तुम किनको इंसान कहते हो

नैनों का जल अभी सूखा नहीं है
पहचानो उन्हें जिन्हें महान कहते हो

सूचियाँ सब सार्वजनिक तो करो
जानते हो किनको भगवान कहते हो

जमाने को मालूम है बदमाशियाँ
कैसे अपने को नादान कहते हो

कभी झांके हो अपने भीतर रवि
औरों को फिर क्यों शैतान कहते हो

ग़ज़ल -03
जीने की खबर है
रने की खबर है

अपने दोस्तों के
जलने की खबर है

उनके नासूरों के
भरने की खबर है

डरावने लोगों के
डरने की खबर है

दो प्रेमियों के
लड़ने की खबर है

किसी कंगाल के
खाने की खबर है

दर्द को रवि के
सहने की खबर है
ग़ज़ल -04
खुदा को ही दुआएं दे रहा हूं मैं
जले चराग़ बुझाए दे रहा हूं मैं

चाहत में मन्जिल-ए-इश्क की
खुद ही को मिटाए दे रहा हूं मैं

राह-ए-मोहब्बत में मरकर
वफा सबको सिखाए दे रहा हूं मैं

मोहब्बत डरने वालों का नहीं
जान लो यह बताए दे रहा हूं मैं

लम्हे भर को उन्हें भूले नहीं
खुद को ऐसे भुलाए दे रहा हूं मैं

जरा सी बात थी उनके मिलने की
और अफसाना बनाए दे रहा हूं मैं

इतना तो तेरी खातिर है रवि
अपना दिल जलाए दे रहा हूं मैं
ग़ज़ल -05
यूं तो दुनिया में कुछ कम गम नहीं
हमें तो गम है कि कोई गम नहीं

मरने को तो मरते हैं सभी मगर
जिंदगी जीने का किसी में दम नहीं

साथ देने का वादा तो सबने किए
यहां तो हम सफर खुद हम नहीं

रोया किए हैं ता उम्र तेरी याद में
आलम है अब आंख भी नम नहीं

फिर से मिलने की किसी मोड़ पर
मांगी थी दुआ खुदा से कुछ कम नहीं

समझे थे पैगम्बर-ए-वफा तुझे
सोचा ये था कि हमें कोई भ्रम नहीं

मिलेगा मुकद्दर में सुकून रवि
ये सोच के किया था कोई श्रम नहीं
ग़ज़ल -06
निकलो गर सफर पे लोग मिलते जाएंगे
पोंछ लो ये चंद आँसू वरना ढरक जाएंगे

माना अंधेरों में साए भी नहीं देते साथ
आखिरी मोड़ तक उनके अहसास जाएंगे

अश्कों का जाम बना पिया है जिन्होंने
वे दीवाने तेरे पास दर्दे दिल ले के जाएंगे

जब भी गिरो बढ़ाओ सहारे के लिए हाथ
लोग तो खुद डूब कर तुझे बचा जाएंगे


सहर होने पर भी खोलो न आँख अपनी
उनके बिखरे ख्वाब संवर ही जाएंगे

मंजिल इन्हीं राहों पर ही मिलेगी रवि
बाकी है जोश बहुत फिर कैसे घर जाएंगे
ग़ज़ल -07
अनाजों के ढेर में बैठा भूखा हूँ मैं
भरा है पेट मगर बैठा भूखा हूँ मैं

जनाजों के मेले में भीड़ है मगर
बेगुनाह लाशों का बैठा भूखा हूँ मैं

इस जंग में हुईं हैं सभी हदें पार
कुर्सियाँ पकड़ा बैठा भूखा हूँ मैं

सड़कें, नहरें, बांध और न जाने क्या
थालियाँ सजाए बैठा भूखा हूँ मैं

गरीबों के गले से निवाले निकाल
अमीर शहर में बैठा भूखा हूँ मैं

ये है तेरे मुल्क की हालत रवि
सबकुछ खा के बैठा भूखा हूँ मैं
ग़ज़ल 08

मेरे शहर के सड़कों के गड्ढों की कहानियाँ हैं
बेजान बिजली के खम्भे भी कहते कहानियाँ हैं ।

वहाँ कोई पूल टूटा, तो यहाँ कोई ट्रेन टकराई
नए किस्सों में क्यों भूलते पिछली कहानियाँ हैं ।

धारावी के झोंपड़े, वरली सी- फेस के बंगले
कहीं रसभरी, तो कहीं करूणामयी कहानियाँ हैं ।

भीड़ का ये मंजर ख़तम होता नहीं दिखता
करोड़ों के देश में अकेलेपन की कहानियाँ हैं ।

तेरे चेहरे पे आज मुस्कान चौड़ी क्यों है रवि
क्या तू ने सुन ली कोई दर्द भरी कहानियाँ हैं ।
ग़ज़ल 09

जमाने, तेरी खातिर हम बरबाद हो गए
क्यों लोग कहते हैं कि मिसाल हो गए ।

इस दौर में तो अब मुहब्बत से पहले
नून, तेल और लकड़ी के सवाल हो गए ।

अब दोस्तों ने शुरू किया कत्ले आम
सभी बन गए बुत, हवा दीवार हो गए ।

पता नहीं कि यह आखिर कैसे हो गया
सपने थे तूफ़ान के पर बयार हो गए ।

वीरान बस्ती में था सिर्फ हमारा जलवा
जमाने तेरे सितम से हम बेकार हो गए ।

हुआ है मेरे शहर में एक अजीब हादसा
कुछ खा के, बाक़ी भूख से बीमार हो गए ।

अरमाँ मत रख बेवकूफ क्या पता नहीं
राजपथ के कुत्ते अब सब सियार हो गए ।

इतना आसाँ नहीं जमाने को बदलना
रवि तुझसे पागल कई हजार हो गए ।
ग़ज़ल 10

मच्छरों ने हमको काटकर चूसा है इस तरह
आदमकद आइना भी अब जरा छोटा चाहिए ।

घर हो या दालान मच्छर भरे हैं हर तरफ
इनसे बचने सोने का कमरा छोटा चाहिए ।

डीडीटी, मलहम, अगरबत्ती, और आलआउट
अब तो मसहरी का हर छेद छोटा चाहिए ।

एक चादर सरोपा बदन ढंकने नाकाफी है
इस आफत से बचने क़द भी छोटा चाहिए ।

सुहानी यादों का वक्त हो या ग़म पीने का
मच्छरों से बचने अब शाम छोटा चाहिए ।
ग़ज़ल 11

तेरी मुहब्बत में कोई लहर नहीं है
चलो कोई बात मगर नहीं है ।

ये रास्ता तो थर्राता था आहटों से

चीखों का कोई खास असर नहीं है ।

किए तो थे वादे इफ़रात क्या करें
इनमें से कोई याद अगर नहीं है ।

तेरे बगैर जीने को सोचा नहीं था
जमाने से तेरी कोई खबर नहीं है ।

तुझे भूलने की कोशिशों में सफल
याद ऐसी कोई शाम-सहर नहीं है ।

तूने खाई होंगी कसमें ढेरों मगर
कोशिशों में खास क़सर नहीं है ।

वो तो वादा निभाकर भी दिखाते
अफसोस कोई पास ज़हर नहीं है ।

दीवानों की भीड़ में पहचानें जिसे
रवि वैसा कोई नाम नज़र नहीं है ।
ग़ज़ल 12

हमसे आप इस तरह क्यूँ शरमाने लगे
नज़र मिला के फिर क्यूँ शरमाने लगे ।

किसी ने कोई बात न की महफिल में
लो वो खुद की बात पे शरमाने लगे ।

ज़रूरत नहीं शै को किसी सबब की
वो आप ही आप ऐसे शरमाने लगे ।

या खुदा क्या होगा मेरे तसव्वुर का
वो ख्वाब में भी आके शरमाने लगे ।

आज क्यूँ ये दुनिया बदली सी है
जाने क्या हुआ कि वो शरमाने लगे ।

कोई तो समझाए रवि को कि क्यों
कल की बात पे आज शरमाने लगे ।
ग़ज़ल 13

रिश्ते अब बेमाने हो रहे
जख्म भी प्यारे हो रहे ।

तुझसे मिले लम्हा न हुआ
और हम तुम्हारे हो रहे ।

दिले गुबार निकालें तो कैसे
अश्क भी अब न्यारे हो रहे ।

क्या हुआ दिल टूटा अपना
वो भी तो अब बंजारे हो रहे ।

किससे कहें हाले दिल यहाँ
अपने तो बेगाने हो रहे ।

तसव्वुर में बैठे हैं आँखे मूंदे
भरी दुनिया में नजारे हो रहे ।

मुहब्बत तो डूबना है रवि
फिर वो कैसे किनारे हो रहे ।
ग़ज़ल 14

जरा सी बात थी जो पूरी दास्ताँ बन गई
नज़र क्या मिली मुहब्बत का सामाँ बन गई ।

उनके खुदा का हाल तो पता नहीं हमको
यहाँ मुहब्बत अपना धर्म और ईमाँ बन गई ।

वो क्या आए मेरे दर पे एक पल के लिए
मेरा ग़रीब खाना खुशियों का जहाँ बन गई ।

पता नहीं कि ऐसा हुआ आखिर किसलिए
सारा जहाँ यकायक मेरी मेहरबाँ बन गई ।

न कोई ग़मी हुई न कोई हादिसा ही हुआ
जाने क्यों खामोशी अपनी जुबाँ बन गई ।

सबके खयाल से भले ही वो बहार थी
मेरे दर पे आके तो वो तूफाँ बन गई ।

रहने ही दो फ़जूल है ये दावा आपका
अपनी चाहत तो अब आस्माँ बन गई ।

अब हम ये खुशियाँ ले के कहाँ जाएंगे
कफ़स ही जब अपना आशियाँ बन गई ।

पहले वो पूछते थे कि वो कौन हैं तेरे
जिंदगी जान के रवि वो नादाँ बन गई ।
ग़ज़ल 15
जिक्र बेवफ़ाई का जब किया जाएगा
उसके साथ तेरा नाम लिया जाएगा ।

हाल अच्छा अपना कहें तो किस तरह
जुबां खुलेगी जब जाम पिया जाएगा ।

आलम है कि यहाँ कोई हम सफर नहीं
बात बनेगी जब कहीं दिल दिया जाएगा ।

कहते हैं वो हमसे मिलने की फुर्सत नहीं
तसल्ली है जनाजे पे मिल लिया जाएगा ।

बात की थोड़ी सी और वो रूस्वा हो गए
बनेगी बात कैसे जो न किया जाएगा ।

अभी तो बैठे हैं खयालों में खोए हुए
देखेंगे जो महफिल में याद किया जाएगा ।

उनकी वसीयत थी जनाजे पे न रोए कोई
नई बात नहीं दिल थाम लिया जाएगा ।

मंज़िल की ये दौड़ तो खत्म होने से रही
चलो अब कहीं आराम किया जाएगा ।

उसे खबर है कि उनके इन्तेज़ार में रवि
अपनी जिंदगी यूँ बरबाद किया जाएगा ।
ग़ज़ल 16
इस जमाने की बहार को क्या कहिए
गुल हैं काँटों से लगें तो क्या कहिए ।

गुमाँ था बहुत तेरी यारी पे अबतक
अब दुश्मनी सी लगे तो क्या कहिए ।

समंदर के किनारे है आशियाँ अपना
गर प्यास न बुझे तो क्या कहिए ।

दुपहर की धूप में निकला है दीवाना
उजाला न मिले उसे तो क्या कहिए ।

कहते हैं जिंदगी बड़ी आसाँ है रवि
लोग मानें न मानें तो क्या कहिए ।
ग़ज़ल 17

इक दर्द सा है क्यूँ दिल में कोई बताए तो हमको
सभी मेहरबाँ हो रहे क्यूँ, कोई सताए तो हमको ।

मांगी है दुआ तेरे ही लिए ईश और अल्लाह से
दे रहे सभी बद्दुआ यहाँ दे कोई दुआएँ तो हमको ।

जब भी चाहा तबस्सुम को अश्क निकल जाते हैं
एक अश्क की खातिर ही कोई हँसाए तो हमको ।

सब कहते हैं बहुत कठिन है राह उस मंजिल की
राहबर बनकर राह अरे, कोई दिखाए तो हमको ।

निकल चुकी है जान कासिद के इन्तेजार में
कुछ खबर उनकी सुना कोई जिलाए तो हमको ।

हर चीज है मुमकिन कहने को लोग कहते हैं
इक दिन मेरे महबूब से कोई मिलाए तो हमको ।

वो वफा करें डर से लुटी नींद अपनी है रवि
झूठी तसल्ली दे के सही कोई सुलाए तो हमको ।
ग़ज़ल 18
महफिल में सुनाई दास्ताँ सबने अपनी
हम पे गुजरी ऐसी कि सुनाई न गई ।

उनके पूछने का अंदाज था कुछ ऐसा
कोई सूरत वो बात बताई न गई ।

उनका दोष नहीं न उनने की बेवफाई
हम ही रूठे थे ऐसे कि मनाई न गई ।

दीवानगी में अपने दिल जलाए बैठे
होश आया पर आग बुझाई न गई ।

तन्हाई का खौफ इस कदर है रवि
वो आ गए पर मेरी तन्हाई न गई ।
ग़ज़ल 19

जाने किस बात पे हमें रोना आया
बेदर्द जमाने क्यों हमें रोना आया ।

कोई तो दे हमें ज़हर का प्याला
जाम पी के तो हमें रोना आया ।

इन चरागों को बुझा दो यारों
रौशनी देख के हमें रोना आया ।

बस करो छेड़ो न चर्चा फिर
जिन बातों पे हमें रोना आया ।

के कहकहे लगाए सबने रवि
सुनके जो बात हमें रोना आया ।
ग़ज़ल 20
इस कदर कर कोशिश ख़िजा-ए-गुल खिलाने
बने मुस्कान गुलिस्ताँ की के तेरा मुरझाना ।

माना खार भी लेते हैं साँस इस चमन में
इक फूल की खुशबू से है दामन भर जाना ।

इन अश्कों के टपकने से मिलता है सुकून
दो बूंद देगा सागर-ए-सुकून तुझे अंजाना ।

उन्हें याद दिलाने से क्या होगा हासिल
याद रहें वो क्या फिर याद आना न आना ।

करले तू अपनी जुबाँ को इस कदर प्यासा
ज़हर भी तू अमृत समझ पचा जाना ।

न कर इंतजार आखिरी साँस का रवि
हर साँस आखिरी है और दिल है बेगाना ।
ग़ज़ल 21
कुछ नहीं तो वायदों की बौछार लाऊँगा
इस चुनाव में जीता तो त्यौहार लाऊँगा ।

अभी तो याचक बना हूँ तेरे दर पर
कुर्सी पे बैठ तेरे लिए इन्तेजार लाऊँगा ।

परोसा है सभी को आश्वासनों के प्याले
होगी जेब गर्म तभी ऐतबार लाऊँगा ।

अभी तो होगा वो तुम चाहते हो जो
बाद में फिर मैं झूठा इक़रार लाऊँगा ।

लगते हो आज तुम मेरे अपने से
कल को पहचानने से इनकार लाऊँगा ।

जब बीतेंगे पांच बरस खामोशी से रवि
चीखता हुआ फिर सच्चा इसरार लाऊँगा ।
ग़ज़ल 22


भूले हुए है खुशी को खुशी की तलाश में
हो गए ख़ुद बेवफा वफा की तलाश में ।


बे-दिल दुनियाँ में एक इन्साँ न मिला
हम भटका किए थे खुदा की तलाश में ।


समंदर की लहरों से भी न मिटी प्यास
गोता लगाया व्यर्थ शबनम की तलाश में ।

थे बेखबर जल रहा था अपना आशियाना
भटका किए दरबदर रौशनी की तलाश में ।

लोग तिनकों के सहारे लांघते हैं दरिया
हमसे डूबी कश्ती सहारे की तलाश में ।

अब तक थे शिकार गलतफ़हमी के रवि
मिली थी मौत जिंदगी की तलाश में ।
ग़ज़ल 23
इक दर्द सा है क्यूँ दिल में कोई बताए तो हमको
सभी मेहरबाँ हो रहे क्यूँ, कोई सताए तो हमको ।

मांगी है दुआ तेरे ही लिए ईश और अल्लाह से
दे रहे सभी बद्दुआ यहाँ दे कोई दुआएँ तो हमको ।

जब भी चाहा तबस्सुम को अश्क निकल जाते हैं
एक अश्क की खातिर ही कोई हँसाए तो हमको ।

सब कहते हैं बहुत कठिन है राह उस मंजिल की
राहबर बनकर राह अरे, कोई दिखाए तो हमको ।

निकल चुकी है जान कासिद के इन्तेजार में
कुछ खबर उनकी सुना कोई जिलाए तो हमको ।

हर चीज है मुमकिन कहने को लोग कहते हैं
इक दिन मेरे महबूब से कोई मिलाए तो हमको ।

वो वफा करें डर से लुटी नींद अपनी है रवि
झूठी तसल्ली दे के सही कोई सुलाए तो हमको ।

सुदर्शनी विचार?
*-*-*

**--**

सरकार द्वारा पिछली दफा जारी भारत के जनसंख्या आंकड़ों पर हर कोई अपनी अपने अपने चश्मे से दृष्टि डाल रहा है, और जनसंख्या विस्फोट की असली समस्या पर कोई दृष्टि डालने को तैयार ही नहीं है. आग में घी डाल रहे हैं रा स्व संघ प्रमुख सुदर्शन जो यह कहते हैं कि प्रत्येक हिन्दू को कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए. उनकी धर्म सम्बन्धी गणनाओं के अनुसार हिन्दुओं के भारत में अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा है, चूंकि मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं. (जबकि वैज्ञानिक गणनाओं के अनुसार, वर्तमान दर पर ऐसा होने में हजारों साल लगेंगे)

अगर हिन्दू के अल्पसंख्यक होने का खतरा है तो फिर चार क्या हमें तो चौबीस बच्चे पैदा करने चाहिए. हमें जीवन भर बच्चे ही पैदा करते रहने चाहिए. हर साल एक. फिर देखो हम तो दुनिया में दो चार साल में ही बहु संख्यक हो जाएंगे. भारत में तो हैं ही, पूरी दुनिया में बहुसंख्यक हो जाएँगे. मुसलमान ही क्या, वर्तमान वैश्विक ईसाई समुदाय को भी हम अल्प संख्यक बना देंगे. पूरा विश्व हिन्दू मय हो जाएगा. कितना मजा आएगा तब. भले ही हम कीड़े मकोड़े की तरह जीवन जी रहे हों, बच्चे पैदा करते ही जाएँगे. वाह क्या हिटलरी विचार-धारा है. सलाम! लाल सलाम!!

*-*-*
व्यंज़ल
-+-+-
उनने कमज़ोर कर ली हैं अपनी नज़र
कहते हैं न रखेंगे दूसरों की कोई खबर

उनने चल दी हैं अपनी शातिराना चालें
देखें कि क़ौम पर क्या होता है असर

उनने ऐलान किया है समाजवाद का
हम तो बेताब हैं किस घड़ी किस पहर

मंजिलें तो तय कर लीं बहुत दूर की
रास्ते किस ओर को जाएंगे जरा ठहर

लोग इतने नादान नहीं हो सकते रवि
नतीज़े से पहले रख ले जरा सी सबर

-+-+-

इंजीनियर्स कैसे करते हैं...

हाल ही में मैंने क्लिफ़र्ड साहनी की लिखी किताब “वर्ल्ड’स बेस्ट प्रोफ़ेशनल जोक्स” पढ़ी. अमूनन चुटकुलों की किताबों में या कहीं और जगह (रीडर्स डाइजेस्ट को छोड़कर) मौलिक चुटकुले कम ही मिल पाते हैं. घूम फिर कर वही पुराने, घिसे-पिटे चुटकुले दोहराए जाते हैं. परंतु पुस्तक महल, दिल्ली से प्रकाशित महज़ साठ रूपयों की इस किताब में बहुत से लतीफ़े मुझे नए-नए से लगे. इन्हीं में एक पुराना लतीफ़ा (पृष्ठ 75, संस्करण 2004) फिर पढ़ने में आया. पर है यह बहुत मज़ेदार. आप भी पढ़िए:
• इंजीनियर्स प्रिज़ीशियन से करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स इंपल्स में करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स जब करते हैं, शॉक्ड हो जाते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स लार्ज कैपेसिटी में करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स अधिक फ्रिक्वेंसी और कम रेज़िस्टेंस में करते हैं
• इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स हाई फ्रिक्वेंसी और ज्यादा पॉवर में करते हैं
• मेकेनिकल इंजीनियर्स स्ट्रेस और स्ट्रेन में करते हैं
• मेकेनिकल इंजीनियर्स लेस इनर्जी तथा ग्रेटर एफिशिएंसी में करते हैं
• केमिकल इंजीनियर्स फ्लूइड स्टेट में करते हैं
• पेट्रोलियम इंजीनियर्स लुब्रिकेशन के साथ करते हैं
• एरोनॉटिकल इंजीनियर्स थॉरोली तथा लाट ऑफ सिमुलेशन के साथ करते हैं
• ड्रिलिंग इंजीनियर्स स्मूथ पेनीट्रेशन के साथ करते हैं
• सॉफ़्टवेयर इंजीनियर्स टेस्टिंग एवं फ़िक्सिंग के साथ करते हैं और हर बार फेल या क्रैश होने पर नए वर्जन्स के साथ करते हैं
• सिविल इंजीनियर्स स्पेशल, आर्किटेक्चरल वे में करते हैं और आर्किटेक्चरल इंजीनियर्स मोर सिविलाइज्ड वे में करते हैं

अब आपकी इंजीनियरिंग ब्रान्च इसमें छूट गई हो, तो उसे भी अपनी टिप्पणी के द्वारा यहाँ जोड़ देवें.
धन्यवाद.

110 अरब रुपयों की सालाना रिश्वत
***/***

*-*-*
भारत में 110 अरब रुपयों की सालाना रिश्वत पुलिस, यातायात पुलिस और अन्य सरकारी कर्मचारियों को दी जाती है. यह धनराशि केंद्र तथा राज्य सरकारों को करों और अन्य शुल्कों के रूप में सालाना प्राप्त होने वाली राशि से 30 अरब रुपए ज्यादा है. प्राय: हर मार्ग पर ट्रकों / वाहनों से वसूली करती दिखाई देती पुलिस इन आंकड़ों की पुष्टि करती है. हाल ही में पुलिस का मुख्य काम यह हो गया था कि वह मुम्बई जैसे महानगर से लेकर मेवासा गांव तक वह यह सुनिश्चित करे कि दो पहिया वाहन चालक हेलमेट पहन कर ही वाहन चलाएँ. हेलमेट निर्माताओं ने भी रिश्वत का सहारा अपने उत्पादों को बेचने के लिए ले लिया लगता है. पुलिस के अनुसार हेलमेट पहन कर आप संपूर्ण सुरक्षित हो जाएँगे- भीड़ भरी, अनियंत्रित ट्रैफिक सहित, गड्ढों से परिपूर्ण सड़कों में. धन्य है!

*-*-*
व्यंज़ल (हास्य ग़ज़ल, हज़ल के तर्ज पर)
/*/*/
जीवन के शर्त में शामिल है रिश्वत
मयस्सर है कफन जो होगी रिश्वत

क़िस्सों में भी नहीं प्यार की बातें
भाई-भाई के रिश्तों में घुसी रिश्वत

ऐसे दौर की कामना नहीं थी हमें
अपने आप को देना पड़े है रिश्वत

बदल चुके हैं इबादतों के अर्थ भी
कोई फ़र्क़ नहीं रस्म हो या रिश्वत

हवालात की हवा खाना ही थी रवि
तूने लिया जो नहीं था कोई रिश्वत

*-*-*

व्यंग्य
पते की बात
आपका पता आपके लिए जितना महत्वपूर्ण है उससे कहीं ज्यादा औरों के लिए है, ख़ासकर तब जब आपके पते में 10 जनपथ, 7 रेसकोर्स रोड या ए.बी. रोड जैसे मार्ग या फिर नरीमन पाइंट, एक्सप्रेस टावर, प्रेस कॉम्प्लेक्स या चेतक सेंटर जैसे पहचान चिह्न हों. आपका पता महज एक पता हो सकता है या फिर आपका संपूर्ण अता-पता बताने वाला साधन भी हो सकता है. आपका पता आपके रहन-सहन, स्टेटस-सिंबल और दुनिया भर के, ढेर सारे अन्य कई ढंके छिपे चीजों के बारे में विस्तार से प्रकाश डालने वाला साधन भी हो सकता है. मसलन, कनाट प्लेस का चपरासी और नरीमन पाइंट का गार्ड भी हो सकता है कि अपनी ड्यूटी करने को मर्सिडीज़ बैंज में आएँ और उधर साइबेरिया का लैंडलॉर्ड भी जरा-जरा सी सुविधाओं को तरसे.

किसी का पता बहुत छोटा होता है तो किसी का बहुत लंबा. छोटे पते तो तत्काल याद हो जाते हैं परंतु बड़े-बड़े पते याद रखना मुश्किल होता है. परंतु आदमी अगर बड़ा है तो उसका मीलों लंबा पता भी लोग जाने कैसे याद रख लेते हैं. एक गाँव का गरीब रमई अपने पते में अपने नाम के आगे गांव, ब्लॉक, तहसील, जिला, प्रांत इत्यादि सभी कुछ लिख डालने के बाद भी अपनी चिट्ठी के मिल पाने की उम्मीद जरा कम ही रखता है. कारण, ऐसे पते को कोई याद ही नहीं रखना चाहता. वैसे उस रमई के पास हर पाँचवे साल में कुछ भिखारियों की फ़ौज जरूर पहुँच जाती है जो उससे हाथ जोड़कर, गिड़गिड़ा कर और कुछ लोग अपने जाति धर्म का वास्ता देकर वोट माँगने चले आते हैं.

वैसे कुछ ख़ास किस्म के पते को लोग खुशी-खुशी याद रखने की कोशिश करते हैं, जैसे कि ख़ूबसूरत लैलाओं के कई-कई पते आज के आधुनिक मजनूँ जुबानी याद रखते हैं, और जिस मजनूं के पते की ऐसी सूची ज्यादा लंबी होती है वह उतना ही ज्यादा सफल माना जाता है. इसके विपरीत कुछ पतों को लोग याद ही नहीं रखना चाहते, वरन् यह भी चाहते हैं कि दुनिया से ऐसे पतों का नामोनिशान मिटा दिया जाना चाहिए. उदाहरण के लिए टैक्स ऑफ़िसों का पता कोई भी किसी सूरत याद नहीं रखना चाहेगा और सपने में भी उसे भूलने की कोशिश करेगा. कुछ पते लोगों को मज़बूरी में, जबरन, जबर्दस्ती याद रखने पड़ते हैं, जैसे कि लेखकों को कई-कई संपादकों के पते हमेशा याद रखने होते हैं, ताकि उनकी स्वीकृत-अस्वीकृत, प्रकाशित-अप्रकाशित रचनाओं को उचित-अनुचित स्थान मिल सके.

जहाँ एक ओर चंद लोगों के कई-कई पते हो सकते हैं, वहीं बहुसंख्य अन्यों के साथ ये हो सकता है कि वे ता-उम्र एक अदद पता पाने की तलाश में जिंदगी गुज़ार दें. पते की बात यह भी है कि जहाँ एक ओर चुनावी चक्कर में, दिल्ली में रहने वाले नेतागण सुदूर आसाम या कन्याकुमारी का पता लिखवा रखते हैं, तो बड़े-बड़े माफिया डॉन के पते उनके द्वारा खुले आम अपहरण, मारकाट करवाने के बावजूद पुलिस रेकॉर्ड में उपलब्ध नहीं रहते. ऐसे माफिया-डान-और-नेता अपने पते में मीटिंगें-पार्टियाँ करते रहने के बाद भी पुलिस रेकॉर्ड में पते से फरार बताए जाते हैं. चुनावों के समय नेता मतदाताओं के पते तलाशते फिरते हैं तो चुनावों के बाद इसके उलट मतदाता अपने नेता का पता तलाशता फिरता है. इसी प्रकार, जिंदगी भर हसीनाओं के पतों के पीछे भागने वाला सदाबहार आशिक अपने अंतिम समय में मुक्ति और शांति की तलाश में मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों और गुरुद्वारों के पते तलाशते फिरते हैं.

आज के युग में लोगों के पते में भी परिवर्तन हो रहा है. अब अगर आपके पास आए किसी के पत्र में उसके पूरे पते की जगह ऐसा लिखा मिले: रवि@याहू.कॉम तो अचरज से अपनी उँगली मत दबाइए. यह उस व्यक्ति का आज के आधुनिक ब्रह्मांड का एकमात्र सच्चा और सही पता, ईमेल पता है, जिसके द्वारा आप भले ही उसके पास नहीं पहुँच पाएँ, आपकी भेजी लानतों के उस तक पहुँचने की पूरी गारंटी है, और इस बात की भी पूरी गारंटी है कि उस पते पर आपका भेजा हुआ संदेश डाक में कहीं भी खो नहीं सकता. हाँ, यह हो सकता है कि पाने वाले ने आपकी चिट्ठियों को खोलने से पहले ही रद्दी की टोकरी में डालने की पूर्व व्यवस्था कर रखी हो. ईमेल पर भेजी गई आपकी चिट्ठियाँ तत्काल और तत्क्षण सामने वाले को मिल जाती हैं. इधर आपने चिट्ठी भेजी नहीं उधर चिट्ठी मिली नहीं और इधर जवाब आया नहीं. यह नहीं कि एक बार चिट्ठी भेज दिया तो फिर इंतजार करते रहिए हफ़्ते-दस दिन अपने जवाब का. इसीलिए ईमेल उपयोक्ता बंधु अब डाक-घरों की चिट्ठियों को स्नेल-मेल कहने लगे हैं. यानी रेंगने वाले कीड़े की गति से चलने वाली डाक.

अमूनन व्यक्ति को अपनी चीज़ें प्यारी लगती हैं, परंतु पते के मामले में प्राय: उलटा होता है. यहाँ उसे दूसरों की पत्नियों की तरह दूसरों के पते प्यारे लगते हैं. उदाहरण के लिए लैलाओं को मजनुओं के पते, व्यापारियों को ग्राहकों के पते, नेताओं को अपने मतदाताओं के पते प्यारे लगते हैं. औरतों को अपने मायके का पता प्यारा लगता है तो विवाहित पुरुषों को अपनी सालियों के पते. रतलाम के रहने वाले रवि को इंदौर का पता ललचाता है तो इंदौर वाला मुंबई की ओर दौड़ लगाता है. मुंबई वाला शंघाई, न्यूयॉर्क और सिडनी की ओर दौड़ लगाने की फ़िराक़ में रहते हैं.

इससे पूर्व कि बेपते की बेतुकी, इन फ़िजूल बातों को पढ़ते-पढ़ते आपके सब्र का अता पता भी गायब हो और आप मेरे पते तलाशते फिरें, इन पतों को अभी अधूरा ही छोड़ता हूँ.
(नवभारत, 25 जुलाई 1999 में पूर्व-प्रकाशित)

बेमौसम बहार
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आज सुबह-सुबह जब नियमित-अनियमित बिजली कटौती नहीं हुई तो सुखद आश्चर्य हुआ. परंतु फिर ध्यान आया कि भई, यह व्यवस्था तो सिर्फ आज के लिए है चूंकि शहर में आज मुख्यमंत्री, पूर्वप्रधानमंत्री-लोकसभा-नेताप्रतिपक्ष पधार रहे हैं. इनके स्वागत के लिए शहर में पिछले सप्ताह भर से तैयारियाँ चल रही थीं. अविरल बिजली प्रवाह के अलावा इन नेताओं के क्षणिक प्रवास से शहर को और भी बहुत सी सौगातें मिलीं. मुलाहिजा फ़रमाएँ:

• जिन क्षेत्रों-सड़कों से इन नेताओं को गुजरना है, उन की साफ़ सफाई की गई, सड़कों के गड्ढे भरे गए, स्पीड ब्रेकर्स हटाए गए तथा नए सिरे से डामरीकरण किया गया. कुछ सड़कों को चौड़ा भी किया गया. उन सड़कों के आसपास के अतिक्रमण हटाए गए तथा सड़कों पर रेहड़ी लगाने वाले, वाहन पार्क करने वालों को भगा दिया गया. पहली मर्तबा लगा कि शहर में सड़क नाम की कुछ चीज़ें हैं.
• शहर के पेयजल प्रदाय के लिए नगर निगम ने करोड़ों की लागत से एक ओवरहेड टंकी बनाई थी. परंतु उद्घाटन के अभाव में वह पिछले पाँच वर्षों से अनुपयोगी पडा हुआ था, तथा उसमें दरारें पड़ गई थीं, उसमें टूटफूट हो गई थी. मुख्यमंत्री के हाथों आज उसका उद्घाटन होना है, अत: आनन फानन उसमें सुधार कर उद्घाटन लायक बनाया गया है. देखते हैं कि पानी दे भी पाता है या नहीं.
• शहर में नगर निगम ने करोड़ों खर्च कर सिविक सेंटर नामक बहुउद्देशीय आवासी-व्यवसायिक परिसर का निर्माण पिछले पाँच वर्ष पूर्व कर लिया था. परंतु शासकीय विभागों की आपसी खींचातानी के कारण उस का किसी प्रकार का उपयोग नहीं हो पा रहा है. तैयार शुदा नए-नए बिल्डिंगों के दरवाजे-खिड़कियाँ टूट रहे हैं... खबर है कि मुख्यमंत्री इस बाबत कोई घोषणा करेंगे.
• चूंकि प्राय: सारा पुलिस महकमा मंत्रियों की व्यवस्था में लगा था, अत: राहगीरों-वाहन चालकों को जगह-जगह पुलिस-चेकिंग-वसूली से दो-एक दिन की मुक्ति मिली.
• ट्रैफ़िक लाइटें सुधर गईं, प्रशासन चुस्त दुरूस्त हो गया, गलियों में झाड़ू भी बढ़िया लग गए.
• इन नेताओं के आने से धूप में लाली ज्यादा प्रतीत हो रही है, चिड़ियाँ ज्यादा चहचहाती प्रतीत हो रही हैं और माहौल भी जरा खुशनुमा सा लग रहा है. आप आए शहर में बहार आई... (मुझे ऐसा लग रहा है, औरों को नहीं तो इसमें मेरा क्या कसूर?)
मैं उम्मीद करुंगा कि मेरे शहर में हर हफ़्ते दो हफ़्ते में कोई न कोई ऐसा बड़ा नेता आए. पर, सिर्फ उम्मीदों से काम नहीं चलेगा. तो चलिए इसके लिए, पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन, प्रार्थना-इबादत इत्यादि करते हैं. आपसे अनुरोध है कि आप भी मेरी प्रार्थना में शामिल हों. मेरा आपसे वादा है कि आपके शहर के लिए भी मैं प्रार्थना करुंगा.
*-*-*
व्यंज़ल (हास्य ग़ज़ल, हज़ल के तर्ज पर)
*-*-*
आती हैं अब बेमौसम बहारें
कुछ की रखेल हो गई बहारें

अब तक पड़ा नहीं साबिका
कैसे जानेंगे जो आएंगी बहारें

सियासतों से लुट गई क़ौमें
बनानी होगी अब अपनी बहारें

जीने के जद्दोजहद में यारों
कैसा बसंत और कैसी बहारें

इस क़द्र नावाक़िफ़ रहा रवि
आकर गुजर चुकी कई बहारें

*+*+*

रे मूर्ख, अश्लील कौन?

एक तरफ तो एक सरकारी एजेंसी बीएसएनएल पूरे भारत में इंटरनेट के लिए बहुत ही सस्ती दरों पर ब्राडबैंड ला रही है, वहीं दूसरी तरफ एक दूसरी सरकारी एजेंसी बहुत ही बेवकूफाना तरीके से ऐसे क़ानून ला रही है, जिससे आम आदमी इंटरनेट का उपयोग करने से भी डरेगा. और ऐसा हुआ भी है. उत्तर-प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से साइबर कैफ़े में छापा मारकर उपयोक्ता – मालिक दोनों को ही गिरफ़्तार किया गया कि वे अश्लील साइट देख-दिखा रहे थे. अवनीश बजाज का उदाहरण ताज़ातरीन है ही.

परंतु जिन्होंने ये क़ानून बनाया है उन्हें इंटरनेट तकनॉलाज़ी, स्पॉम, ब्राउज़र हाइजेकर्स, वॉर्म/वायरस, पॉप-अप विंडोज़ तथा मिलते-जुलते नाम वाले स्पूफ़्ड पॉर्न साइटों के बारे में जानकारी है भी या नहीं? मुझे नहीं लगता. मेरे ई-मेल पर प्रतिदिन दर्जनों-सैकड़ों की संख्या में स्पॉम आते हैं जिनमें अधिकतर वायग्रा या पॉर्न साइटों के होते हैं. और ऐसा तो प्राय: हर ईमेल उपयोक्ता के साथ होता है. बेचारे गरीब बिल गेट्स को प्रतिदिन दस लाख ईमेल प्राप्त होते हैं. आप क्या सोचते हैं उनमें क्या होता होगा? उनमें अधिकतर ऐसे ही ईमेल होते हैं. अगर बे-ध्यानी में इनमें से किसी पर क्लिक हो गया तो ये साइटें खुल ही जाती हैं. इसी प्रकार वेब पता टाइप करते समय ब्लॉगस्पॉट की जगह गलती से आपने ब्लॉगपोस्ट टाइप किया तो यह सीधे पॉर्न साइट को खोलता है, क्योंकि चालाक भाई लोगों ने अपनी पॉर्न साइटों के रजिस्ट्रेशन ऐसे ही मिलते जुलते नामों से भी करवा रखे हैं. फिर वॉर्म/वायरस और पॉपअप विंडो का क्या करें जो पता नहीं कहाँ-कहाँ से नमूदार हो जाते हैं. इंटरनेट पर तमाम तरह से सर्च करना होता है, और इस बीच ये साइटें कहीं न कहीं से टपक ही पड़ती हैं.

अब तो आपको कोई भी पुलिसिया आपको आपके कम्प्यूटर का उपयोग इन कामों के लिए करता रंगे हाथों पकड़ ही लेगा. वह कहेगा कि भाई, आपने अपने ईमेल में इतने पॉर्न साइटों के आमंत्रण और वायग्रा के इतनी सारी दुकानों के अते-पते मंगा रखे हैं इसका अर्थ है कि आप अश्लील हैं, चलिए जेल की हवा खाइए.

हे! ईश्वर. तू भी मूर्खों से बहुत डरता होगा. है ना?
*-*-*
व्यंज़ल (हास्य ग़ज़ल, हज़ल की तर्ज पर)
*-*-*
किस बिना पर रहना होगा
मूर्खों की तरह रहना होगा

मूर्खों के राज में कैसे यारों
दानिशमंदों का रहना होगा

मूर्खों की जमात का फौजी
कहता है यहीं रहना होगा

बन जा खुद या दूसरों को
मूर्ख बना कर रहना होगा

मूर्खों के दौर में सोचे रवि
किस तरह कैसे रहना होगा

//**//

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