January 2005

त्रिनेत्र
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अगर यह खबर सच है, कुछेक साल पहले के हर्बल पेट्रोल की तरह गलत खबर नहीं है, तो फिर निश्चित रूप से यह हमारे बहुत काम का है. जिनकी आँखें नहीं हैं, उनके लिए तो ख़ैर यह खोज वरदान है ही, मेरे जैसे लोग जिनकी दो-दो अच्छी-भली आँखें हैं, उनके लिए भी यह वरदान से कम नहीं है.

मैं भी चाहूँगा कि त्रिनेत्र धारी भगवान शिव की तरह मेरे भी तीन नेत्र हों. परंतु वे माथे पर, बीचों-बीच नहीं हों. मैं चाहूँगा कि मेरा तीसरा नेत्र मेरे सिर के पीछे की तरफ हो, जिससे कि मैं अपने पीठ पीछे बातें करने वालों को देख सकूँ. पीठ-पीछे वार करने वालों से बच सकूँ. और यह देख सकूँ कि मेरे पीठ पीछे क्या-क्या होते रहता है.

कभी मैं यह भी चाहूँगा कि मेरा तीसरा नेत्र पैरों में ठेठ अँगूठे के पास हो. ताकि मैं देख सकूँ कि देश दुनिया में टेबल के नीचे लेन-देन का व्यापार किस तरह चलते रहता है.

मैं यह भी चाहूँगा कि भोले भंडारी की तरह मेरे तीसरे नेत्र में वह शक्ति प्राप्त हो जिससे समाज की बुराइयों का अंत देखते ही हो जाए, और मेरा वह तीसरा नेत्र हमेशा खुला रहे...
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व्यंज़ल (हास्य ग़ज़ल यानी हज़ल के तर्ज पर)
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समाज को बुरा हमने बनाया दोस्तों
आईना दूसरों को ही दिखाया दोस्तों

जाना था मंजिल-ए-राह में मुद्दतों से
खुद बैठे सबको साथ बिठाया दोस्तों

अपने ही जिले से होकर जिला-बदर
हमने है बहुत नाम कमाया दोस्तों

कल की खबर नहीं किसी को यहाँ
शतरंजी चालें क्यों है जमाया दोस्तों


हममें तो न दिल है न ही जान रवि
अपनी लाश तो कबसे जलाया दोस्तों

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इस दफ़ा के इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कारों के विजेता अमित और अतुल ने अपने-अपने पुरस्कार की राशि को चैरिटी के नाम समर्पित करने की घोषणा की है. उन्होंने पुरस्कार राशि से समाज के गरीब बच्चों के लिए नोटबुक्स खरीद कर वितरित करने का आग्रह मुझसे किया है.
मैंने पास ही के एक गांव में वहाँ के हाई स्कूल के प्रिंसिपल श्री करमरकर से इस सम्बन्ध में बात की. उनका कहना है कि गांव के प्राय: सभी बच्चे गरीब हैं. अभी दसवीं कक्षा के बच्चों की प्री-बोर्ड परीक्षा चल रही है. स्कूल में घोषणा कर दी गई है कि जो बच्चे प्री-बोर्ड परीक्षा में प्रथम दस स्थान प्राप्त करेंगे उनमें से प्रत्येक को 100-100 रुपए मूल्य के नोटबुक्स पुरस्कार स्वरूप दिए जाएँगे. जाहिर है ये पुरस्कार अमित और अतुल के सहयोग से दिए जाएँगे. परीक्षा परिणाम फरवरी मध्य में आने की संभावना है. तदुपरांत गरीब परंतु सुपात्र बच्चों को ये नोटबुक्स प्रदान किए जाएँगे. उन बच्चों के विवरण आपको तब पढ़ने को मिलेंगे.

धन्यवाद अमित और अतुल. और धन्यवाद इंडीब्लॉ... ओह.. देबाशीष. (आख़िर भाई लोगों ने आपकी आइडेंटिटी ओपन करवा ही ली :))

याचक

भरी दुपहरी में, ज्येष्ठ के महीने में, जब रोहिणी नक्षत्र में सूर्य अपनी पूरी तपन वातावरण में प्रेषित कर रहा था, एक याचक नंगे पाँव द्वार-द्वार जाकर भिक्षा मांग रहा था.

कुछ ने उस याचक की याचनामयी आवाज़ों को गर्मी के भय से अनसुना कर दिया और अपने द्वारों के पट नहीं खोले. कुछ ने उसे लाखों लानतें भी भेजीं, क्योंकि उसने अपनी द्रवित आवाज़ों से लोगों के आराम में खलल पैदा कर दिया था.

कुछ को उसकी याचनामयी आवाज और उसकी बीमार, कृशकाय काया असर कर गई और उसे कुछ-कुछ कहीं से मिल भी गया. एक को उसका दोपहर की तपती धूप में नंगे पाँव याचनारत रहना जरा ज्यादा ही द्रवित कर गया और उसने अपना फटा पुराना जूता जो कचरे के डब्बे में डालने के लिए अलग रख दिया था, निकाला और याचक को दे दिया, ताकि उसके पाँव को तपती धरती से थोड़ी राहत तो मिले.

याचक ने हजारों धन्यवाद देते हुए उस जूते को कृतज्ञता से तत्काल पहन लिया, परन्तु दो द्वारों के आगे जाने के उपरांत उसने उन जूतों को अपने पैर से उतारा और अपने थैले में रख लिया.

वह दानवीर जिसने अपना जूता दिया था, अपने सत्कर्म से गदगद उस याचक को थोड़ा सा आगे जाकर भी देख रहा था कि उसका पुराना जूता भी किस प्रकार एक अच्छे प्रयोजन के लिए काम आ रहा है. परन्तु जब उसने याचक को जूता उतार कर अपने थैले में रखते देखा तो वह पश्चाताप से बुदबुदाया – साला अब उसे कबाड़ी में जाकर बेच देगा.

उधर याचक के मन में विचार दूसरे थे. वह गंभीर था, और सोच रहा था कि अगर वह जूते पहन कर याचना करेगा तो फिर लोगों के मन में दया और करूणा कैसे उपजेगी?

(रविवारीय नव भारत में पूर्व प्रकाशित)

आम आदमी को पद्म विभूषण

इस दफ़ा 26 जनवरी 2005 को पद्म पुरस्कारों में आम आदमी भी पुरस्कृत हुआ है. आर. के. लक्ष्मण को पद्म विभूषण का पुरस्कार प्रदान किया गया है. इसके लिए उन्हें ढेरों बधाईयाँ. आम आदमी की पीड़ा को अपनी कूँची से गढ़कर, अपने पैने व्यंग्य चित्रों से तो वे पिछले अर्द्ध शती से लोगों को बताते आ ही रहे हैं, समाज की विकृतियों, राजनीतिक विदूषकों और उनकी विचारधारा की विषमताओं पर भी वे तीख़े ब्रश चलाते हैं. वे धरती के सर्वकालिक महान कार्टूनकार हैं, जो समाज को आईना दिखाते आ रहे हैं. इस अवसर पर यह ग़ज़ल उन्हें समर्पित है:

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ग़ज़ल
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मुद्दतों से वो आईना दिखाते रहे
हम खुद से खुद को छुपाते रहे

दूसरों की रोशनियाँ देख देख के
आशियाना अपना ही जलाते रहे

कहाँ तो चल दिया सारा जमाना
हम खिचड़ी अपनी बैठे पकाते रहे

यूँ दर्द तो है दिल में बहुत मगर
दुनिया को गुदगुदाते हँसाते रहे

कभी तो उठेगी हूक दिल में रवि
यही सोच कर ग़ज़लें सुनाते रहे

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सानिया वायरस का हमला...


अन्ना कुर्निकोवा वायरस के बाद टेनिस जगत में अब सानिया मिर्ज़ा वायरस का हमला हो चुका है. आस्ट्रेलियन ओपन में तीसरे दौर तक पहुँचने और सेरेना विलियम्स को तगड़ी टक्कर देने के बाद इस ख़ूबसूरत बाला का इन्फ़ेक्शन महामारी की तरह प्रिंट और दृश्य-श्रव्य माध्यम में फैल गया है. जहाँ सहारा समय ने पूरे पेज का सानिया पिनअप गर्ल फोटो प्रकाशित किया है तो वहीं सानिया दिन में 8-10 घंटे का इंटरव्यू दे रही है और पत्रकारों की कतारें हैं कि कम ही नहीं हो रहीं. टाइम्स ऑफ इंडिया के एडीटोरियल बहस में भी सानिया अवतरित हो गई. कई सालों बाद क्रिकेट को किसी एक व्यक्ति ने आखिरकार फ़ीका कर ही दिया.



इस ब्लॉग में भी इनफ़ैक्शन हो गया और ग़ज़लों में शब्द गुम हो गए. आशा करें कि यह इनफ़ैक्शन फैले. इसीलिए आइए, हम दुआ करें कि सानिया आगे और कामयाब हो, ताकि उससे प्रेरणा ले कुछ सानियाएँ और अवतरित हों और हम भारतीय, क्रिकेट से आगे की भी कुछ सोचें...

महोदय, हम सचमुच गंदे लोग हैं.

गुरचरण दास ने अजमेर यात्रा के अपने अनुभवों को बताते हुए पिछले सप्ताह टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि वहाँ के संगमरमर से बने सुंदर, ऐतिहासिक बड़ा दारा के चहुँओर कचरों का अंबार लगा हुआ था क्योंकि आसपास कचरा पेटी का अकाल था. लोग दीवारों की आड़ में सरेआम थूक मूत रहे थे क्योंकि आसपास कहीं कोई टॉयलेट नहीं था. बड़ा दारा एक पर्यटन स्थल भी है जहाँ हजारों की संख्या में सैलानी नित्य आते हैं.

भाई गुरचरण दास, यह स्थिति तो मेरे रतलाम में भी है. और रतलाम क्या भारत के प्राय: सभी नगरों, शहरों और गांवों में है. 2 लाख की जनसंख्या वाले पूरे रतलाम शहर में एक भी, फिर-से, एक भी सार्वजनिक मूत्रालय नहीं है. अगर आप शहर में किसी काम से निकले हों और आपको जोर की पेशाब आने लगे तो आपके सामने, अपने सामने की किसी झाड़ या दीवार का आड़ लेकर मूतने के सिवा और क्या रास्ता हो सकता है? पान खाकर पीक थूकने के लिए तो खैर भारत में कहीं कोई समस्या ही नहीं है- कहीं भी थूक सकते हैं- सड़कों पर चलते चलते भी और बिल्डिंगों की सीढ़ियों पर भी... कहीं अगर कचरा पेटी या थूकदान होता भी है तो आदत से लाचार लोग उसका उपयोग करने में झिझकते हैं, शर्माते हैं, अपने को हीन समझते हैं.

गुरचरण दास उदाहरण देते हुए आगे लिखते हैं कि सिंगापुर जो पहले किसी भी भारतीय शहर से भी ज्यादा गंदा था, आज विश्व का सबसे साफ-सुथरा शहर बन गया है. सिंगापुर को स्वच्छ बनाने में ली कुआन यू का योगदान वे गिनाते हैं. पर क्या भारत के लिए, या भारत के किसी एकाध शहर या गांव के लिए ही सही, कभी कोई ली कुआन यू पैदा हो सकेगा ?
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ग़ज़ल
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मनुज आजन्म गंदा न था
साथ में लाया फंदा न था

सियासतों में मज़हबों का
ये धंधा खासा मंदा न था

लोग अकारण ही चुक गए
फेरा गया अभी रंदा न था

महफ़िल से लोग चल दिए
किसी ने मांगा चंदा न था

रवि मरा बैमौत कहते हैं
पागल दीवाना बंदा न था
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कितना अंतर है, प्रिय, तुझमें और मुझमें...
प्रिये, मैं और तुम आज कंघे से कंघा मिलाकर बिना किसी जेंडर बायस के हर क्षेत्र में हम साथ साथ हैं और हमारे बीच की भिन्नता प्रायः खत्म हो रही है. परंतु सदियों से चले आ रहे इवाल्यूशन सिद्धांतों पर थोड़ा गौर करें, तो पाते हैं कि अंतर तो है बहुत... और यदि इसे जानें - समझें - स्वीकारें तो हमारा और हमारे समाज का थोड़ा होगा भला...
विभिन्न शोघों से यह सिद्ध हो चुका है कि आदतन*...
• पुरूष टीवी के अलग अलग चैनल बदल कर खुश होते हैं. महिलाएँ एक ही चैनल शांतिपूर्वक देखना पसंद करती हैं
• पुरूष शराब जैसी तीख़ी चीजें पसंद करते हैं, युद्ध करने में उन्हें आनंद आता है (इसी लिए डबल्यूडबल्यूएफ़ बहुत चलता है). इसके विपरीत महिलाएँ मीठे पदार्थ पसंद करती हैं एवं खरीदारी में उन्हें आनंद आता है.
• महिलाएँ जानती हैं कि वे कितने समझदार हैं, जबकि पुरूष सिर्फ सोचते हैं कि वे बहुत समझदार हैं.
• पुरूषों के मस्तिष्क की सुप्तावस्था में 70 प्रतिशत विद्युतीय गतिविधियाँ बन्द रहती हैं. जबकि महिलाओं के मामले में सिर्फ 10 प्रतिशित विद्युतीय गतिविधियाँ बन्द रहती हैं.
• महिलाओं में दाएँ बाएँ ऊपर नीचे देखने की क्षमता पुरूषों की तुलना में ज्यादा होती है. महिलाओं में कुछ मामलों में तो यह 180 अंश के कोण तक होती है. पुरूष सिर्फ सीधे दूरबीन की तरह देख पाते हैं. यही वजह है कि पुरूष महिलाओं को घूरते प्रतीत होते हैं, जबकि महिलाएँ देखती भी हैं तो पता नहीं चलता कि देख भी रही हैं या नहीं.
• महिलाओं की दृष्टि अंधेरे में भी देश पाने में सक्षम होती है. पुरूष अधिक दूर की चीजें देख पाने में सक्षम होते हैं.
• कम समय में ही महिलाएँ किसी नए स्थान पर भी कमरे में मौजूद स्त्री पुरूषों के आपसी संबंधों के बारे में अपनी छठी इन्द्रिय से भांप लेती हैं.
• पुरूष लाख कोशिश कर लें, उन्हें महिलाओं के सामने झूठ बोलने में कठिनाई होती है, तथा वे आदतन, बिना किसी कारण के अक्सर झूठ बोलते हैं.
• महिलाओं की सुनने की क्षमता पुरूषों से अधिक होती है. वे एक ही समय में फोन भी सुन सकती हैं, किसी को कुछ बता भी सकती हैं, और अपने हाथों से कढ़ाई का काम भी जारी रख सकती हैं. वाकई मल्टीटास्किंग, मल्टीथ्रेडिंग मशीन हैं महिलाएँ. जबकि पुरुष फोन उठाते ही यह चाहता है कि सभी खामोश हो जाएँ. पुरुष का दिमाग सिंगल टास्किंग के लिए बना है.
• चेतावनी: महिलाओं में यह क्षमता होती है कि वे सामने वाले व्यक्ति के अंतर्मन की बातें बगैर कहे सुने जान लेती हैं
• पुरुष पशुओं की भाषा समझने में चतुर होते हैं
• पुरुषों का मस्तिष्क किसी वस्तु के बारे में सुनकर विवरण जानने में सक्षम नहीं होता है.
• महिलाएँ अपनी समस्याओं से छुटकारा लगातार बोलकर करती हैं तो पुरूष समस्या आने पर गूढ़ चिंतन में डूब कर चुप रहना पसंद करते हैं.
• महिलाएँ वस्तुओं का चुनाव करते समय पुरुषों की सलाह नहीं चाहती हैं, वे बस उसकी सहमति चाहती हैं.
• महिलाओं को दिनभर में सम्प्रेषण के लिए बोलने के लिए करीब 20,000 शब्द चाहिए जबकि पुरुषों को केवल 7,000 शब्द. दिन के अन्त में महिलाएँ अपने कोटे के शब्दों को बोलकर पूरा करने पर ही संतुष्ट हो पाती हैं. इस समय उन्हें चर्चा या राय नहीं चाहिए होता है. वे बस चाहती हैं कि उन्हें बोलने दिया जाए. किसी घटना को वे ग्राफिक डिटेल में बताती हैं जबकि पुरूष एकाध वाक्य में घटना का विवरण बता देते हैं.
• क्रोध आने पर महिलाएँ बस बोलने लगती हैं और पुरूष भविष्य की चिंता किए बगैर आक्रमण कर देते हैं. परिणाम स्वरुप 90 प्रतिशत अपराधी पुरुष होते हैं.
• पुरुष अपनी दृष्टि से गोलाकार आकार, उभार व उत्तेजक चित्रों से प्रभावित होते हैं, जबकि महिलाओं को मीठे शब्द, प्रशंसा आदि प्रभावित करती हैं.
• महिलाओं में प्रेम के आवेग प्राकृतिक पुनरुत्पादन के आधार पर चक्रीय रुप से आते हैं, जबकि पुरुषों में स्थायी होते हैं.
• महिलाओं में प्रेम के आवेगों को पहचानने की क्षमता होती है, वे प्रेम के उतार चढ़ाव को पहचान लेती हैं. उनमें यौन व प्रेम मस्तिष्क से सम्बन्धित होता है, जबकि पुरुषों में शरीर से.
• महिला व पुरुषों में यदि समान स्वभाव हो तो ऐसे सम्बन्ध नीरस हो सकते हैं, जबकि विपरीत स्वभाव सम्बन्धों को एडवेंचरस, रोचक तथा स्थाई बनाता है.
• हमारी सारी भावनाएँ – प्रेम, दुःख, प्रसन्नता इत्यादि सभी हमारे स्नायु तंत्र के बायोकेमिकल व्यवहार पर आधारित होते हैं, जिन्हें केमिकल/औषधियों द्वारा बदला जा सकता है.
देखा ना प्रिये... कितना अंतर है... यही नहीं इनके अलावा और भी ढेरों भिन्नताएं हैं मुझमें और तुझमें .... तो अबकी, टीवी के सामने बैठकर, तुम्हारी गपशप को सुना-अनसुना, हॉ-हूं करता हुआ मैं अगर चैनल सर्फिंग करूं और तुम्हारी सास बहू की सोप ऑपेरा और मेरी फैशन टीवी में व्यवधान आए तो उचित यही है यह समझ लेना कि हम बने ही ऐसे हैं... भिन्नताएं लिए हुए.

• संदर्भः एलन और बारबरा पीस की पुस्तक ‘व्हाई मेन लाई एण्ड वूमन क्राई’
• हिन्दी में निचोड़: राजेन्द्र कुमार पाण्डेय
• कुछ अंश मासिक पत्रिका वनिता में पूर्व-प्रकाशित

आधुनिक युग का वास्तविक धर्मग्रंथः व्हाई मेन लाई एण्ड वूमन क्राई

अगर किसी पुस्तक को खरीद कर, नहीं तो मांग कर, नहीं तो चुरा कर (बाई-बोरो-आर-स्टील) पढ़ना आवश्यक है, तो वह एलन और बारबरा पीस की पुस्तक “व्हाई मेन लाई एण्ड वूमन क्राई” (पुरूष क्यों झूठ बोलते हैं, और स्त्रियॉ क्यों रोती हैं) है.
इस युग की बाइबल, गीता और कुरान अगर किसी पुस्तक को कहा जाएगा तो वह इसी पुस्तक को कहा जाएगा. इस पुस्तक को आवश्यक रूप से पढ़ा जाने हेतु पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए. यह पुस्तक, चाहे आप स्त्री हों या पुरूष, आपकी आंखें हमेशा के लिए खोल देने के लिए, आपकी सोच को हमेशा के लिए बदल देने में पूर्णरूपेण सक्षम है. आइए देखें कि इस पुस्तक में आखिर है क्या?
दरअसल यह पुस्तक लेखक द्वय की अत्यंत प्रसिद्ध पूर्व पुस्तक “व्हाई मेन डोंट लिसन एण्ड वूमन कान्ट रीड मेप्स” (पुरूष सुन क्यों नहीं सकते और स्त्रियॉ नक्शे क्यों नहीं पढ़ सकतीं), जिसकी अब तक विश्व की 33 भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है और जिसकी 60 लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं, का ही विस्तार है. अपनी पूर्व पुस्तक में लेखक द्वय ने विभिन्न खोजों, अध्ययनों एवं विकास-वाद के सिद्धान्तों के आधार पर यह स्थापित करने की कोशिश की थी कि स्त्री और पुरूष न सिर्फ शारीरिक रूप से, वरन् मानसिक रुप से भी वे एक दूसरे से अत्यंत भिन्न होते हैं. और उनके बीच समस्या इन्हीं भिन्नताओं को न जानने और न समझने से ही होती हैं. उदाहरण के लिए – पुरूष का दिन भर का बोलने का कोटा 8000 शब्द प्रतिदिन है, तो यही कोटा स्त्रियों के लिए 20000 शब्द प्रतिदिन है, और जब पुरूष तनाव में होता है, तो शांति चाहता है, जबकि स्त्री अपना तनाव बोल कर हल्का करती है. जाहिर है, स्त्रियों को बोलने में आनंद आता है और अधिसंख्य पुरूष स्त्रियों के ज्यादा बोलने से चिढ़ते हैं जबकि वास्तविकता में यह बात भोजन पानी की तरह एक शारीरिक आवश्यकता है.
लेखकों ने पिछले दशक भर से, 30 से अधिक देशों की यात्राएं कर, सैकड़ों सेमिनार आयोजित कर एवं सैकड़ों प्रामाणिक पुस्तकों एवं खोजों का अध्ययन कर स्त्री और पुरूष के आचार व्यवहार में अंतर के इसी तरह के मजेदार परंतु जानने योग्य बातों को संकलित कर इस पुस्तक में पिरोया है. यही नहीं, सभी जानकारियॉ प्रामाणिक और मजेदार उदाहरण सहित दी गई हैं.
यूं तो इस पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर ज्ञान की बातें आपको मिलेंगी, परंतु कुछ पृष्ठों पर आश्चर्यपरक तथ्यों को चुटीले अंदाज में प्रस्तुत किया गया है. लेखक द्वय हालाकि अंग्रेज हैं, परंतु उन्होंने सम्पूर्ण वैश्विक समाज का अध्ययन कर उनके नतीजों को शामिल किया है. एक मजेदार उदाहरण वे देते हैं – अपने विश्व व्यापी भ्रमण के दौरान अफ्रीका के सुदूर इलाके के एक गांव में उन्होंने पाया कि दस बारह लंगोट धारी आदिवासी, एक झोपड़े में सरकार द्वारा शिक्षा के प्रसार हेतु लगाए गए सेटेलाइट टीवी के सामने बैठे हैं, और उनमें से प्रत्येक, बारी-बारी से रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में लेकर चैनल बदलने (चैनल सर्फिंग) का आनंद ले रहे हैं. पुरूषों की यह आदत, जो स्त्रियों को खासा नागवार गुजरती है, जन्मजात होती है और न्यूयॉर्क से लेकर नई दिल्ली और बस्तर तक एकसार होती है.
इस पुस्तक से आप और भी जान पाएंगे कि-
• स्त्रियॉ क्यों टोकती हैं, और टोका-टोकी कभी काम क्यों नहीं आती.
• पुरूष रास्ता भटकने पर पूछने में क्यों शर्माते हैं.
• पुरूष पादते क्यों हैं, और वे इस शर्मदायक कष्ट से छुटकारा कैसे पा सकते है.
• पुरूष चुटकुले क्यों पसंद करते हैं – गमगीन माहौल में भी.
• स्त्रियॉ रोती क्यों हैं.
• स्त्रियॉ ज्यादा, और विस्तार से क्यों बोलती हैं.
• पुरुषों के तोंद क्यों निकलते हैं.
• पुरूष झूठ क्यों बोलते हैं.
• पुरूषों की ऑखें गोलाइयॉ देखने उबल क्यों पड़ती हैं.
• पार्टी में पुरूष धूसर सूट में ढंके और स्त्रियॉ रंगीन परिधानों में प्रकट क्यों होती हैं.
• इत्यादि

“इत्यादि” इसलिए कि, जैसा कि पहले ही कहा है, आपको इस पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर ज्ञान का अकूत भंडार मिलेगा.

दुर्भाग्य से यह पुस्तक अभी अंग्रेजी में उपलब्ध है. अतः हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं के लिए थोड़ा इंतजार करना होगा. अंग्रेजी में पाठन संभव न हो तो एक बेहतर सुझाव यह होगा कि इस पुस्तक को अपने किसी मित्र या परिचित को, जिसकी अंग्रेजी अच्छी हो, भेंट करें और आग्रह करें कि वे इसे अपने लिए और आपके लिए भी इसे पढें और आपको बताएं. आइए जल्दी करें, अपनी अज्ञानता को दूर करने में कहीं देर न हो जाए.

पुस्तकः व्हाई मेन लाई एण्ड वूमन क्राई (अंग्रेजी में)
लेखकः एलन + बारबरा पीस
प्रकाशकः मंजुल पब्लिशर्स, भोपाल. (भारत में)

अलालों के लिए अच्छी (?) ख़बर
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हमारे जैसे अलालों के लिए ये अच्छी (?) ख़बर है. हम अलाल दुनिया की छाती में मूंग दलने के लिए औरों की अपेक्षा जरा ज्यादा समय तक जीवित रहेंगे. पर इसके साथ खतरा यह भी है कि दुनिया की धूल-गर्द, हिंसा-आतंकवाद, ग़रीबी-भुखमरी, प्राकृतिक आपदा-महामारी को भी हम अलालों को ज्यादा समय तक झेलना होगा. अगर आपमें इनको झेलने का दम है, तो फिर, ईश्वर के पास जल्दी जाने के लिए काहे को ताबड़तोड़ काम किए जा रहे हैं? काम धाम छोड़कर आइए, आराम फ़रमाइए और हमारी अलाल मंडली में आप भी शामिल हो जाइए और दीर्घ जीवन पाइए....

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ग़ज़ल
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यूँ तो बड़ा अलाल तू
करे है खूब सवाल तू

जाति-धर्म के किसलिए
मचाए बहुत बवाल तू

बैठा आँखें मींचे फिर
करे है क्यूँ मलाल तू

किसी अंधेरी राह का
बन के देख मशाल तू

सफल क्यों न हो रवि
सत्ता का बड़ा दलाल तू

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हिन्दी ई-मेल के लिए एक उत्तम औज़ार: जी-मेल

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यूं तो हिन्दी में ई-मेल के लिए आजकल दर्जनों साधन उपलब्ध हैं, परंतु प्राय: उन सबमें कुछ न कुछ खामियाँ हैं. ई-मेल के लिए प्रमुख रूप से दो क़िस्मों के औज़ार हमारे काम आते हैं, एक तो ई-मेल क्लाएंट तथा दूसरा वेब आधारित ई-मेल सेवा. हिन्दी में ई-मेल के लिए इन्हें आगे और दो क़िस्मों में बांटा जा सकता है. ऑस्की फ़ॉन्ट आधारित तथा यूनिकोड हिन्दी आधारित. दो-एक साल पहले तक ऑस्की फ़ॉन्ट आधारित सेवाएँ ही हमारे लिए एक मात्र विकल्प के रूप में मौज़ूद थी, जिनमें हम शुषा से लेकर वेबदुनिया तक के भिन्न भिन्न फ़ॉन्ट का उपयोग कर खुश हो लेते थे कि हम हिन्दी में ई-मेल कर ले रहे हैं. परंतु इन ई-मेल के हेडर, विषय पंक्ति इत्यादि के लिए अंग्रेजी अनिवार्य होता है. यह भी अनिवार्य होता है कि जिसको ई-मेल प्रेषित किया जा रहा है, उसके कम्प्यूटर में वह फ़ॉन्ट संस्थापित हो. भूले भटके कभी आपको किसी दूसरे कम्प्यूटर पर कहीँ और से हिन्दी में ई-मेल करने या उसे देखने की नौबत आती है या हिन्दी ई-मेल को किसी अन्य को, आगे अग्रेषित करना होता है, तो फिर वही फ़ॉन्ट संबंधी समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं. इसके अलावा हिन्दी शब्दों के आधार पर अपने आवश्यक ई-मेल को ढूंढने और सहेजने में भी समस्याएँ आती हैं, चूंकि वास्तव में आप अंग्रेजी के अक्षरों के जरिए हिन्दी में काम कर रहे होते हैं. इस तरह की समस्याएँ ई-मेल क्लाएंट जैसे कि आउटलुक एक्सप्रेस तथा वेब आधारित ई-मेल सेवा जैसे कि वेब- दुनिया या रेडिफ़ मेल दोनों में ही समान रूप से आती हैं. इस बीच भिन्न उपयोक्ताओं के भिन्न डिफ़ॉल्ट विन्यास के कारण यदि भाषा एनकोडिंग परिभाषा बदल जाती है, तो फिर लिखे गए पाठ को पढ़ पाना मुश्किल हो जाता है. याहू जैसे लोकप्रिय ई-मेल सेवा में भी यह समस्या आती रहती है.

इन समस्याओं का समाधान यूनिकोड हिन्दी आधारित ई-मेल के जरिए संभव है. परन्तु यहाँ आपको दूसरी तरह की समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है. आपके पास यदि पुराना ऑपरेटिंग सिस्टम है, तो वह यूनिकोड को समर्थन नहीं करेगा और आप यूनिकोड हिन्दी में कार्य करने में असमर्थ होंगे. यदि आपका ऑपरेटिंग सिस्टम यूनिकोड का समर्थन करता भी है तो आपका ई-मेल क्लाएँट और आपका ब्राउज़र भी यूनिकोड हिन्दी समर्थन प्रदान करने वाला होना चाहिए. कुछ हालातों में, जैसे कि विंडोज98 में ऑपरेटिंग सिस्टम स्तर पर यूनिकोड हिन्दी समर्थन उपलब्ध नहीं है, परंतु इस पर इंटरनेट एक्सप्लोरर 6 का संपूर्ण पैकेज संस्थापित कर इसे यूनिकोड हिन्दी के आंशिक उपयोग लायक बनाया जा सकता है. विंडोज 2000 तथा इसके बाद के संस्करणों में तथा वर्ष 2002 के बाद के जारी लिनक्स के प्राय: सभी लोकप्रिय संस्करणों में डिफ़ॉल्ट रूप से हिन्दी यूनिकोड के समर्थन की सुविधा उपयोक्ताओं को ऑपरेटिंस सिस्टम स्तर पर ही उपलब्ध होती है. और इनमें ई-मेल क्लाएंट तथा ब्राउज़र भी शामिल होते हैं. आजकल जावा आधारित कुछ ऐसे औज़ार भी जारी किए जा चुके हैं जिन्हें चलाने के लिए आपके कम्प्यूटर पर किसी प्रकार के यूनिकोड समर्थन की आवश्यकता नहीं है, परंतु जावा-वर्चुअल मशीन संस्थापित होना आवश्यक है.
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हिन्दी में ई-मेल आदान-प्रदान के अनुभवों में यह पाया गया है कि हाल फिलहाल, वेब आधारित जी-मेल सेवा जो कि आपको आपके ई-मेल क्लाएंट पर एसएसएल 3 सुरक्षित पॉप3 और एसएमटीपी मेल सेवा भी प्रदान करती है, सर्वोत्तम है. प्रमुखत: वेब आधारित जी-मेल आउटलुक एक्सप्रेस 6 पर भी उतनी ही आसानी से काम करता है जितना कि लिनक्स के के-मेल पर. ई-मेल क्लाइंट को जी-मेल समर्थित बनाने के लिए बस आपको ई-मेल क्लाएंट के पॉप/एसएमटीपी सर्वर को क्रमश: pop.gmail.com तथा smtp.gmail.com पर सेट करना होगा और एसएसएल सुरक्षा सहित पोर्ट क्रमश: 465 तथा 995 पारिभाषित करना होगा. अगर ये सेटिंग आपको कठिन प्रतीत होते हैं तो इसके लिए विस्तृत दिशानिर्देश तो हैं ही, एक संस्थापना योग्य फ़ाइल भी है जिसे चलाकर इन विन्यास को (सिर्फ आउटलुक एक्सप्रेस के लिए) आप स्वचालित रूप से सेट कर सकते हैं.
जी-मेल की अन्य सुविधाएँ ये हैं जो इसे किसी भी अन्य ई-मेल सेवा से बेहतर बनाते हैं:
1. प्रमुखत: वेब आधारित यह ई-मेल सेवा आपको पॉप3 तथा एसएमटीपी सुविधा भी देती है. यानी आप किसी ब्राउज़र से भी ई-मेल कर सकते हैं तथा ई-मेल क्लाएंट जैसे कि आउटलुक एक्सप्रेस या के-मेल से भी. जी-मेल आम उपयोग के लिए मुफ़्त है. हालाकि अभी यह कुछ सीमित उपयोक्ताओं के लिए ही जारी किया गया है.
2. इसमें आपको 2 जीबी भंडारण सुविधा मिलती है, साथ ही 10 एमबी फ़ाइल अटेचमेंट की सुविधा भी.
3. यूनिकोड हिन्दी ई-मेल के विषय फ़ील्ड भी हिन्दी में दिए जा सकते हैं तथा ई-मेल के आदान-प्रदान में याहू की तरह भाषा एनकोडिंग खंडित नहीं होता और ई-मेल बरकरार रहता है.
4. इसमें ऑस्की आधारित हिन्दी जैसे कि शुषा या वेब-दुनिया फ़ॉन्ट में भी काम कर सकते हैं.
5. सुरक्षा के लिए जी-मेल एसएसएल का उपयोग करता है जिसे आप जीपीजी के जरिए और बढ़ा सकते हैं. इसमें अंतर्निर्मित स्पॉम फ़िल्टर भी है जो आपको अवांछित मेल से दूर रखता है.
6. ई-मेल के भीतर ही गूगल खोज की सुविधा मिलती है, जो जाहिर है गूगल खोज की तरह त्वरित और समुचित होता है.
7. इसमें एक बिलकुल नई विचारधारा युक्त ई-मेल को फ्लैग करने की सुविधा दी गई है जिससे ई-मेल को मिटाया न जाकर हमेशा के लिए अपने डाक-डिब्बे में रखे रह कर बढ़िया उपयोग में लिया जा सकता है.
8. यह एटॅम तथा आरएसएस फ़ीड्स का भी समर्थन करता है जो आपके ई-मेल में इंटरनेट के ताज़ातरीन खबरों तथा अन्य आंकड़ों को स्वचालित एकत्र करता है.
9. जी-मेल के जरिए किसी भी कम्प्यूटर से कहीं से भी हिन्दी यूनिकोड में काम किया जा सकता है. उदाहरण के लिए ब्राउजर आधारित छहारी जैसे ऑनलाइन यूनिकोड संपादक के जरिए काट/चिपका कर हिन्दी यूनिकोड में काम किया जा सकता है.
10. अभी जी-मेल का बीटा संस्करण जारी किया गया है, जो नित्य प्रति निखार पर है. संभव है इसके पूर्ण संस्करण में हमें और भी अच्छे फ़ीचर मिलें.

जी-मेल की एक खामी है कि यह जावास्क्रिप्ट पर चलता है अत: इसके लिए आपके मशीन में जावा संस्थापित होना आवश्यक तो है ही आपका ब्राउज़र जावा स्क्रिप्ट चलाने लायक होना भी आवश्यक है. उदाहरण के लिए वेब आधारित ई-मेल के लिए लिनक्स सिस्टम में मोजिला और फ़ायरफॉक्स से तो आप इसे चला सकते हैं, परंतु कॉन्करर ब्राउजर से नहीं, जिसमें जावा का कुछ सीमित समर्थन है. परंतु यह ब्राउज़र की खामी है न कि जी-मेल की. विंडोज़ सिस्टम में ऐसी कोई समस्या नहीं है चूँकि प्राय: सभी नए ब्राउजर जावास्क्रिप्ट का समर्थन करते हैं. जावास्क्रिप्ट पर आधारित होने के कारण उपयोक्ता को जी-मेल के नए संस्करणों को अलग से डाउनलोड करने की आवश्यकता नहीं होती. जब भी आप जी-मेल का उपयोग करते हैं, यह नवीनतम संस्करण ही रहता है. तथा एक बार प्रारंभ में स्क्रिप्ट के चलने में थोड़ा समय लेने के पश्चात् बाद के उपयोग में यह अत्यंत तीव्र होता है चूँकि फिर यह सिर्फ पाठ को ही डाउनलोड करता है, जो मात्र कुछ बाइटों के होते हैं.

जी-मेल हालाकि आम उपयोग के लिए मुफ़्त जारी किया गया है, परंतु इसकी सदस्यता को आमजनों के लिए अभी खोला नहीं गया है. इस हेतु आपको किसी मौज़ूदा जी-मेल उपयोक्ता द्वारा आमंत्रित किया जाना आवश्यक है. हालाकि इंटरनेट पर ऐसे कई साइट हैं जहाँ से आपको जी-मेल के एकाउन्ट मुफ़्त में मिल जाएँगे.

कुल मिलाकर जी-मेल सेवा हिन्दी ई-मेल के लिए एक धाँसू औज़ार है, जो यह तय है कि अभी और भी निखरेगा.

अगर आप हिन्दी में ई-मेल के लिए जी-मेल का उपयोग करने के इच्छुक हैं, तो कुछेक जी-मेल आमंत्रण पहले-आएँ-पहले पाएँ के आधार पर मेरे पास उपलब्ध हैं. इसके लिए मुझे मेल करें raviratlami at gmail dot com पर.

(हिन्दी पोर्टल प्रभासाक्षी में मंगलवार दि. 18 जनवरी 2005 को पूर्व प्रकाशित)

सारा मुल्क फरार है...


*-*-*
बिहार के पाँच विधायक अर्से से फरार थे, जो, जाहिर है, चुनावी बेला पर नमूदार हो गए. इससे पूर्व केंद्रीय मंत्री शिबूसोरेन को कोर्ट का समन जारी हुआ था तो वे मंत्री पद छोड़ कुछ दिनों तक फरार हो गए थे. इस बीच वे मीडिया को साक्षात्कार देते रहे. जब समन बीत गया तो वे प्रकट हो फिर मंत्री बन गए. यूं तो सारा देश फरार हो गया है. सोने की चिड़िया भारत, हिन्दुस्तान बचा है क्या? उसे हमने कहीं फरार करवा दिया है और जो हमारे पास बचा है वह प्लास्टिक, पॉलिथीन का इंडिया है...

*-*-*
ग़ज़ल
//**//
समग्र मुल्क फरार है
जिस्म है जाँ फरार है

अवाम बैठी मुँह खोले
और हाकिम फरार है

क़ैदी है जेल में लेकिन
वहाँ सिपाही फरार है

देखो दुनिया दीवानी
जिए वही जो फरार है

सोचे है रवि बहुत पर
उसका कर्म फरार है

--**--

व्यंग्य:
चाय चलेगी?
अगर आपको किसी तरह की कोई खास बीमारी न हो, किसी तरह की कोई कसम आपने न खा रखी हो और आपके चिकित्सक ने अलग से आपको मना नहीं किया हो तो कोई अगर आपसे यह पूछे कि चाय चलेगी? तो भले ही आपका जवाब ना में हो, उस वक्त आपके चेहरे की चमक से सामने वाले को यह अंदाजा हो ही जाता है कि चाय की ज़रूरत आपको कितनी है. चाय तो चाय है. अगर आप दारू-शारू नहीं पीते हैं और चलो साथ में चाय भी नहीं पीते हैं, तब भी आप कहलाते हैं- टी-टोटलर. यानी चाय आपके साथ है, भले ही आप चाय के साथ नहीं हैं.

सुबह उठते ही चाय, फिर अख़बार के आ जाने के बाद ख़बरों के साथ चाय, फिर सुबह के नाश्ते के साथ चाय, फिर दफ्तर या दुकान पहुंचने पर काम की शुरूआत के लिए चाय, दोपहर की अतिआवश्यक चाय, दोपहर के भोजन के बाद जरूरी चाय, शाम की चाय और इस बीच टपक पड़े मेहमानों के स्वागत सत्कार के लिए चाय. यानी अपने जीवन के एक बड़े हिस्से की एक बड़ी जरूरत है चाय और सिर्फ चाय.

चाय आज के वक्त का जीवन जल है. जरा याद कीजिए जब पिछली मर्तबा आप किसी काम से किसी कार्यालय में पधारे थे तो दफ्तर के भीतर और दफ्तर के बाहर चाय की दुकान का नजारा कैसा था?

जहाँ दफ्तर एक ओर नीरव, निर्जीव, प्राणहीन और बोरियत से परिपूर्ण नजर आया था, वहीं दफ्तर के पास वाली चाय की दुकान जीवनी शक्ति से परिपूर्ण, सजीव, प्राणवान, ऊर्जावान और रंगीनियत से भरी नजर आई थी. आखिर क्यों? सिर्फ इसलिए कि चाय में वह ताकत है जो प्राणहीन चीजों में भी प्राण वायु का संचार कर दे. यही कारण है कि दफ्तरों में फ़ाइलों के बोझ से मृतप्राय: बाबुओं का मन चाय की दुकान पर आकर हर्षोल्लास से जीवित हो उठता है. जरा यह भी याद कीजिए कि किसी दफ्तर के किसी बाबू की उबासियाँ कैसे छूमंतर हो गई थीं जब आपने उसे चाय के लिए आमंत्रित किया था.

चाय का चक्कर अजीब है. चाय पिला कर जहाँ एक ओर आप सामने वाले से अपनी आत्मीयता प्रकट कर सकते हैं, तो घूस रूपी सिर्फ एक कप चाय से आप अपना कोई बड़ा काम भी करवा सकते हैं. नमक का कर्ज अदा करने की बात पुरानी हो चुकी है. अब तो चाय का कर्ज चढ़ता और उतरता है. आपसे कई दफा लोगों ने अपनी सेवाओं के बदले चाय-पानी का खर्चा चाहा होगा. कभी आपका आत्मीय आपको चाय के लिए पूछना भूल गया होगा तो भले ही आप चाय नहीं पीते हों, आपका चाय पीने का मूड उस वक्त बिलकुल न रहा हो, फिर भी आप कहेंगे साले ने चाय के लिए भी नहीं पूछा.

समय के हिसाब से चाय के अपने मजे हैं. सुबह की चाय का अपरिमित, अतीव, असीम आनन्द अवर्णनीय और अकल्पनीय तो है ही, किसी खोमचे वाले की चाय का फुर्सत में बैठ कर पीने का अपना आनन्द है. चौक पर सड़क पर खड़े रह कर फालतू की चर्चा में चाय पान का अलग आनन्द है. अखबारों में सिर घुसाकर सुड़की गई चाय का अलग आनन्द है, तो बीवी और टीवी के साथ टी के आनन्द की बात ही क्या है. चाय चाहे मीठी हो या कड़वी, काली हो या ख़ालिस दूध की, अपने हिसाब से सबको अच्छी लगती है, खासकर तब जब इसकी तलब तेज लगती है. इसीलिए तो ट्रेनों में बिकने वाली सफेदा की चाय भी भाई लोग उसमें मजा ढूंढकर पी ही लेते हैं. दरअसल चाय तो हमेशा अच्छी ही होती है, बस कभी वह थोड़ी अच्छी, ज्यादा अच्छी या कभी सबसे अच्छी हो जाती है.

और अगर आप चाय के विज्ञापनों पर भरोसा करें तो चाय के बड़े-अच्छे फ़ायदे भी हैं. किसी ब्रांड विशेष की चाय पीकर आदमी कड़क दिल वाला जवान हो जाता है जिसकी मूँछों की ताव से ही शेर डर के मारे भाग जाता है तो कोई और ब्रांड की चाय की खुशबू से आदमी मृत्युशैय्या से वापस आ जाता है. कोई खास ब्रांड की चाय पीकर वाह! बोल उठता है, तो कोई उसकी खुशबू मीलों दूर से सूँघ कर खिंचा चला आता है. हो सकता है चाय के आपके अनुभव भी ऐसे ही रोमांचकारी हों. मेरा अपना अनुभव है कि सुबह का प्रेशर चाय के बगैर बनता ही नहीं. अकसर लोग सुबह उठने के लिए चाय पीते हैं पर कई ऐसे भी हैं जो चाय का एक प्याला हलक में उतार कर सोने जाते हैं.

चाय की इतनी चर्चा करने के बाद तो भाई, अब तो चाय चलेगी?

(दैनिक समाचार पत्र चेतना में 3 अगस्त 99 को पूर्व प्रकाशित)

यही है भा की सही तस्वीर...

*-*-*
आर. के. लक्ष्मण, टाइम्स ऑफ इंडिया के ताज़ा अंक में कहते हैं:


“सुनामी पीड़ितों, भूकंप पीड़ितों को तो तमाम तरह से सहायता मिल जाती है, परंतु हमारे जैसे लोगों की जो राजनीतिक गलतियों और सड़ते शासन तंत्र के पीड़ित हैं, कोई सहायता नहीं करता. आखिर क्यों ?”

शहरों के प्रत्येक हाई राइस बिल्डिंग या शापिंग माल के पीछे ऐसे सैकड़ों झोंपड़ पट्टे तो मिलेंगे ही, गांवों में तो अधिसंख्य झोपड़ियाँ ही मिंलेंगी जहाँ आवश्यक सुविधाओं का घोर अभाव है. ऐसे में लोगों को अपने नित्यकर्म से निपटने का एक मात्र सहारा रेल पटरियों का किनारा ही तो बच पाती हैं...

सच है, इनके लिए जिम्मेदार हमारी राजनीतिक गलतियाँ और सड़ते हुए शासन तंत्र के अलावा और कौन हो सकता है?

..**..
ग़ज़ल
..**..

माफ़ी के काबिल नहीं हैं ये गलतियाँ
तब भी हो रहीं गलतियों पे गलतियाँ

मौज की दृश्यावली लगती तो है पर
पीढ़ियों को सहनी होगी ये गलतियाँ

जब भी पकड़ा गया फरमाया उसने
भूल से ही हो रहीं थीं ये गलतियाँ

अब तो दौर ये आया नया है यारो
सच का जामा पहने हैं ये गलतियाँ

कभी अपनी भी गिन लो रवि तुमने
दूसरों की तो खूब गिनी ये गलतियाँ

में प्यार की गूंज

*-*-*
अनुगूँज के इस दफा के आयोजन के लिए आज से करीब अठारह वर्ष पहले, अपनी प्रेयसी [वर्तमान में भाग्य (दुर् या सौ ¿¿) से पत्नी] को लिखे गए प्रेम पत्र के एक हिस्से की एक झलक आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है:


आज, ऐसे शब्द, काफ़ी कुछ सोचता हूँ तो, लिखने की तो बात ही क्या, ज़ेहन में ही नहीं आ पाते.. मैं थोड़ा रोमांटिक होने लगता हूँ तो बीवी को बच्चे, घर-परिवार दिखने लगते हैं और कभी वह मूड में होती है तो मुझे मेरा टर्मिनल और डेड लाइन... वाह क्या खूबसूरत दिन थे वे भी...

धन्यवाद अनुगूँज, तूने पुराने दिनों के खूबसूरत लम्हों को एक बार फिर याद दिला दिया...

कृत्रिम खुशी ¿

/*/*/
आउटलुक पत्रिका के ताज़ा अंक में एक सर्वेक्षण प्रकाशित किया गया है जिसमें बताया गया है कि आम भारतीयों में से 75% खुश हैं. आश्चर्य. घोर आश्चर्य.

लगता है सर्वेक्षण के ये नतीजे भी पिछले लोकसभा चुनावों के एक्ज़िट पोल के नतीज़ों की तरह सिरे से ग़लत हैं.

कारण, मैं कतई खुश नहीं हूँ. कतई नहीं. मैं खुश भी कैसे हो सकता हूँ ? मैं तो इस ग्रह का महादुःखी प्राणी हूँ, और मेरे जैसों का प्रतिशत कम कतई नहीं हो सकता. मेरे दुःखी, महादुःखी होने के कारण कई हैं. कुछ आपके सामने पेश करता हूँ:

• मेरे शहर में दिन में छ: घंटे (जी हाँ, दिन में, काम के समय) घोषित बिजली कटौती होती है और अघोषित दो-तीन घंटे अतिरिक्त. अंधेरे में काम करिए और खुश रहिए... पूरे भारत में (कुछ क्षेत्र को छोड़कर) यही हाल है. मैं खुश नहीं हो सकता.
• मेरे देश में मुम्बई-पूना हाइवे जैसा सिर्फ एकमात्र सड़क है. जबकि बाकी जगह सड़कें गड्ढों, भारी ट्रैफ़िक और सिंगल लेन के कारण बेहाल हैं. मैं रतलाम से इंदौर के बीच की 100 कि.मी. की दूरी (तथा कथित राष्ट्रीय राजमार्ग से) छ: घंटे में भी पूरी नहीं कर पाता हूँ. मैं खुश नहीं हो सकता...
• आउटलुक पत्रिका के उसी अंक में भीतर के पृष्ठों पर लिखा गया है कि भारत की 40 प्रतिशत जनता घोर गरीबी में जूझ रही है, जिसके पास दो वक्त की रोटी का जुगाड़ बमुश्किल हो पाता है. फिर 75 प्रतिशत लोग जिनमें, जाहिर है, भूखे भी शामिल हैं, अगर खुश हैं, तो आश्चर्य है. पर मैं भूखा खुश नहीं हो सकता.
• जापान चालीसवें दशक में युद्ध से नेस्तनाबूद हो चुका था. भारत के हालात तो बेहतर ही थे. अब साठ साल बाद इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने में जापान तरक्की कर बुलेट ट्रेनें दौड़ाता है, (जबकि वहाँ नेचुरल रिसोर्सेस की खासी कमी है) जहाँ पिछले चालीस सालों में कोई ट्रेनें आपस में नहीं भिड़ीं. भारत में पुरानी, सिंगल पटरी पर मरियल चाल से दौड़ती ट्रेनें भी आपस में भिड़ती रहती हैं. ऐसी ट्रेनों में डरते-डरते यात्रा करते हुए मैं खुश नहीं हो सकता.
• ऐसे उदाहरण सैकड़ों हैं जिनका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. मैं खुश नहीं हो सकता.
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ग़ज़ल
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सितम की इंतिहा में भी खुश हैं
दर्द तो है दिल में मगर खुश हैं

कर आए हैं बोफ़ोर्स सी नई डील
इसीलिए आज वो बहुत खुश हैं

यारी न दुश्मनी पर जाने क्यों
दर्द मेरा देख के वो अब खुश हैं

वो तो ख़ालिस दर्द की चीखें थीं
गुमान ये था हो रहे सब खुश हैं

भूखी बस्ती में उत्सव कर रवि
चिल्लाए है वो कि हम खुश हैं

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माध्यम: पुराने तथा नए हिन्दी कुंजीपट के बीच एक सेतु

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यूनिकोड हिन्दी इंटरनेट के लिए तयशुदा भाषा एनकोडिंग बन चुका है, और देर सबेर प्रत्येक हिन्दी उपयोक्ता को यूनिकोड अपनाना ही होगा. कम्प्यूटर पर हिन्दी में काम करते हुए मुझे 15 साल से अधिक हो रहे हैं, जब डॉस आधारित अक्षर ही हमारा हिन्दी का एकमात्र सहारा हुआ करता था. तब से तो गंगा बहुत बह चुकी है!

परन्तु यूनिकोड हिन्दी अभी भी बहुत सारे अनुप्रयोगों, खासकर कुछ लोकप्रिय डीटीपी तथा अन्य पुराने सभी अनुप्रयोगों में समर्थित नहीं है. ऐसी स्थिति में यूनिकोड हिन्दी को अपनाया ही नहीं जा सकता चूंकि ये यूनिकोड हिन्दी को ???? के रूप में छापते हैं. जब तक इन अनुप्रयोगों के हिन्दी यूनिकोड समर्थित नए संस्करण जारी नहीं किए जाते तब तक हमारे सामने एक ही विकल्प बचता है- पुराने हिन्दी फ़ॉन्ट का प्रयोग. कृतिदेव हिन्दी फ़ॉन्ट डीटीपी प्रयोगों के लिए न सिर्फ अच्छा है, वरन् इसके हजारों रूप हैं जो इसे समृद्ध बनाते हैं. स्थानीय स्तर पर इसका प्रयोग आने वाले कुछ सालों तक तो जारी ही रहेगा.

समस्या तब आती है, जब आप यूनिकोड हिन्दी तथा कृतिदेव दोनों ही प्रयोग करते हैं. कृतिदेव का हिन्दी कुंजी पट अलग है तथा यूनिकोड हिन्दी का प्रमुख कुंजीपट ‘इनस्क्रिप्ट’ बिलकुल अलग. इस समस्या को ‘माध्यम’ हिन्दी शब्द संसाधक के द्वारा सुलझाने का एक बेहतरीन प्रयास इसके डेवलपर बालेन्दु शर्मा दधीच द्वारा किया गया है. इसके द्वारा उपयोक्ता को पुराने तथा नए दोनों ही प्रकार के अनुप्रयोगों में कृतिदेव पर हिन्दी इनस्क्रिप्ट कुंजीपट के द्वारा सुविधाजनक कार्य करने की सहूलियत मिलती है. माध्यम में पुराना कृतिदेव कुंजी पट भी है, तथा नए उपयोक्ताओं के लिए इसमें अंतर्निर्मित हिन्दी फ़ॉन्ट भी. काट तथा चिपका कर इसमें टाइप किए गए हिन्दी वाक्यों को विंडोज़ के किसी भी नए/पुराने अनुप्रयोगों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

फिलहाल माध्यम में यूनिकोड समर्थन नहीं है, परंतु यदि इसमें यह समर्थन बालेन्दु शामिल करते हैं तो फिर यह एक परिपूर्ण, आधुनिक हिन्दी शब्द संसाधक बन सकता है. साथ ही इसमें शुषा तथा फ़ॉनेटिक कुंजी पट भी शामिल कर दिए जाएँ तो सोने में सुहागा. अभी इसका इंटरफ़ेस अंग्रेज़ी में ही है, और बहुत संभव है कुछ समय पश्चात् हम इसे हिन्दी में ही देखें. ‘माध्यम’ आम उपयोग के लिए मुफ़्त सॉफ़्टवेयर के रूप में जारी किया गया है जिसे आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं. बालेन्दु अगर इसका सोर्स भी परिवर्धन/परिवर्तन तथा उपयोग के लिए मुफ़्त जारी करते हैं, तो उपयोक्ताओं को इसे अपने इस्तेमाल लायक बनाने में आसानी होगी और यह शीघ्र लोकप्रिय हो सकेगा.

ना फिसल पकड़

-*-*-
भारतीय भाषाओं के दिन निश्चित ही वापस गए हैं. पहले पहल नोकिया के मोबाइल में हिन्दी आया और अब सेमसंग ने अपने नए मोबाइल में तीन अन्य भारतीय भाषाओं क्रमश: हिन्दी, मराठी तथा तमिल को भी शामिल किया है. अगर हम अपने मोबाइल से अपनी मातृभाषा में बात करते हैं, तो इसका मेन्यू और मैसेंजिंग सेवाएँ अँग्रेज़ी में क्योंकर अनिवार्य होना चाहिए?

इसी तरह भारतीय स्टेट बैंक के एटीएम में भी हिन्दी और पंजाबी (उत्तर भारत में) के विकल्प उपलब्ध हैं, और उपयोग में बड़े ही आसान हैं. इनमें भी नई भाषाएँ जुड़ती जा रही हैं.

मगर, कुछ सीधे अनुवाद, जैसे कि नोकिया का ‘ना फिसल पकड़’ जो कि ‘एन्टी स्लिप ग्रिप’ का अनुवाद है, बड़ा ही ऊटपटाँग सा है. इसके बजाए हिन्दी की खूबसूरती को बरकरार रखते हुए अनुवाद किए जाने चाहिएँ, यथा- ‘पकड़ ऐसी जो छूटे नहीं’ अन्यथा लोग हिन्दी (या अन्य कोई भी भारतीय भाषा) को हिकारत और अनुपयोगी नजरों से ही देखते रहेंगे. फिर भी, शुरूआत तो हुई ही है, और इसके सुधरने में ज्यादा कुछ लगेगा नहीं...

न्यायिक अति-सक्रियता

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कुछ समय से देश में जनहित याचिकाओं की बाढ़ सी आई हुई है. न्यायिक सक्रियता, न्यायिक अति-सक्रियता में बदल गई सी लगती है. न्यायालय भी अख़बारों की खबरों का संज्ञान लेकर उस पर अपने निर्णय देने लगे हैं. कुछ उत्साही लालों को ऊटपटाँग जनहित याचिकाएँ लगाने पर न्यायालयों की फटकारें भी मिलीं हैं और जुर्माना भी भरने पड़े हैं. अब बात राष्ट्रगान पर आकर ठहर गई है.

सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका लगाई गई है कि राष्ट्रगान ‘जन गण मन...’ में सिंध का नाम फ़ालतू है चूंकि वह पाकिस्तान में है इस लिए उसे हटाया जाए. (आश्चर्य है कि किसी होशियार को 57 साल बाद यह बात समझ में आई) सिंध की बजाए कश्मीर होना चाहिए, अत: इस सम्बन्ध में समुचित आदेश पारित किए जाने चाहिएँ. क्या बढ़िया याचिका है. न्यायालय ने भी उसे स्वीकार कर लिया है. यह और बढ़िया है. जनाब ग़ालिब, (ईश्वर आपकी आत्मा को शांति प्रदान करें) अब आपके किसी शेर में किसी को कोई नुक्ता फ़ालतू लगेगा, तो समझ लो कि वह न्यायालय में जनहित याचिका लगाने ही वाला है...

राष्ट्रगान में सिंध क्या जमीन के एक टुकड़े का नाम भर है? तो बजाए इसके कि सिंध शब्द को राष्ट्रगान से हटाया जाए, हमारे सिंधी भाइयों के लिए जो विभाजन की पीड़ा लिए यहाँ की धरती को आत्मसात कर रह रहे हैं, पहले कोई फ़लस्तीन, ख़ालिस्तान या सिंधीस्तान जैसा कुछ बनाया जाए. या आप उन्हें भी इस राष्ट्र से मिटाना चाहते हैं कि वो पाकिस्तान से आए थे? रही बात ‘जन गण मन...’ में काँट-छाँट की, तो टैगोर (ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे) इस बात से ज्यादा प्रसन्न होंगे कि बजाए उसमें काँट छाँट के या विवाद पैदा करने के, भाई लोग कोई और गीत राष्ट्रगान हेतु चुन लें...

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ग़ज़ल
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कहाँ कहाँ नहीं दी याचिका
ज़रूरी क्योंकर है याचिका

निकाल दो भले ही देश से
नहीं देनी है मुझे याचिका

एतबार था तो फिर क्यों
पछता रहे हो दे याचिका

जुर्म है मुल्क में जन्मना
इसीलिए जरूरी है याचिका

आसाँ जिंदगी के लिए रवि
लिए फिरता है वो याचिका

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लघुकथा
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“दुल्हन दिखने में कैसी थी?” अजीज मित्र, प्रतीक के विवाह पार्टी से देर रात मेरे लौटने पर पत्नी ने मुझसे पूछा. वह अस्वस्थता की वजह से साथ नहीं जा पाई थी और पार्टी के बारे में जानने को उत्सुक प्रतीत हो रही थी.
“सुन्दर ही रही होगी” मैंने उबासी लेते हुए कहा.
“रही होगी – मतलब?”
“यार हम लोग अपने नए प्रोजेक्ट की चर्चा कर रहे थे, सो ध्यान नहीं दिया”
“तुम भी कमाल करते हो. शादी की पार्टी में जाकर दूल्हा दुल्हन को देखने के बजाए प्रोजेक्ट डिस्कस कर आते हो.” उसने मेरा कोट हाथ में लेते हुए थोड़ी नाराजगी से कहा.
“वो तो हरीश मिल गया था, उसे हर हाल में प्रोजेक्ट परसों तक डिलीवर करना है. परेशान हो रहा था बेचारा”
“अरे तुमने तो गिफ़्ट का ये लिफ़ाफ़ा भेंट किया ही नहीं” उसने कोट की जेब में से शुभकामना वाला लिफ़ाफ़ा निकाला जिसमें शगुन के रुपए रखे थे.
“नहीं तो, मैंने तो बाकायदा शादी की बधाई के साथ लिफ़ाफ़ा दूल्हे के हाथ में थमाया था” मैं सोच में पड़ गया कि मैंने लिफ़ाफ़ा थमाया भी था या नहीं.
“तो फिर वह कोई और लिफ़ाफ़ा होगा. याद करो अपने दोस्त को तुम क्या भेंट कर आए”
“ओह माई गॉड, लगता है मैंने डैडी की चिट्ठी वाला लिफ़ाफ़ा थमा दिया जो आज सुबह ही आया था” मेरे डैडी जो कम्प्यूटर और कीबोर्ड को अविश्वसनीय नज़रों से दूर से ही देखते हैं, अभी भी नियमित रूप से अपने लंबे पत्र लिफ़ाफ़ों में भेजते हैं, जिनमें जीवन के फ़लसफ़े लिखे होते हैं.
“तुम भी यार हद करते हो. जरा देख तो लेते कि क्या दे रहे हो.”
“चलो, अब क्या करें. सुबह जाकर माफ़ी मांग कर ये लिफ़ाफ़ा दे आऊँगा.”
अगले दिन प्रतीक के पास गया, उससे माफ़ी मांगी और सही लिफ़ाफ़ा उसके नजर किया. उसने लिफ़ाफ़ा लेने से इनकार कर दिया, और साथ ही मेरी चिट्ठी लौटाने से भी.
उसने कहा- “जानते हो, मेरी शादी का सबसे क़ीमती तोहफ़ा क्या है? तुम्हारे डैडी की यह चिट्ठी.”
*/*/*
*एक सत्य घटना पर आधारित. जाहिर है, नाम व पात्र बदल दिए गए हैं.

असफल राज्य

पटना के बेऊर जेल में बंद पप्पू यादव के लिए बिहार से बाहर कोई ऐसा जेल ढूंढा जा रहा है, जहाँ पर वह जश्न नहीं मना सके, दरबार नहीं लगा सके और मोबाइल फोन से मंत्रियों से बात नहीं कर सके. सीबीआई द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को ऐसे 6 जेलों की सूची भी दी जा चुकी है. जेल में ही रहकर वे लोक सभा का चुनाव तो जीत ही चुके हैं

एक पूर्णत: असफल हो चुके राज्य का इससे बेहतरीन उदाहरण और क्या हो सकता है?

कल को किसी कक्कू करीमी को जेल में रखने के लिए भारत से बाहर किसी अन्य देश में, मज़बूत-सुरक्षित जेल की तलाश होगी. इसके लिए हमें अभी से खोजबीन प्रारंभ कर देनी चाहिए अन्यथा ऐन मौके पर समस्या उत्पन्न हो सकती है. धन्य है सरकार!

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ग़ज़ल
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कहीं गुम हो गई सरकार
जेलों में लग रहे दरबार

लगी है लाइन में जनता
पपुआ की करती जयकार

मुजरिम हो गए हैं नरेश
और हैं फरियादी बदकार

मुल्क के महीपति होंगे
सरगनाओं के भी सरदार

रवि तुझे कुछ करने को
अब तो है खासा दरकार

*-*-*

दिखावटी प्रार्थना
///*///

पिछले दिनों बीजेपी के बड़े, नामी-गिरामी नेता, जिनमें आडवाणी तथा संघ और जागरण मंच के गोविंदाचार्य भी शामिल थे, कामाक्षी मंदिर में एकत्र हुए और शंकराचार्य की जल्द रिहाई के लिए पूजा अर्चना की.

हे भगवान! यह कैसा घोर कलियुग आ गया है. जो शंकराचार्य उठते बैठते भगवत् भजन में लगे रहते थे और जिनके साथ हमेशा भगवत् रूपी दंडिका साथ रहती है, उनकी रिहाई के लिए उसके भक्त जन माँ कामाक्षी से प्रार्थना कर रहे हैं. कैसा उल्टा पुल्टा कार्य हो रहा है ईश्वर. प्रलय आने में, लगता है देर नहीं है.

अगर माँ कामाक्षी अपनी पूजा अर्चना से प्रसन्न होतीं तो शंकराचार्य कभी भी जेल के सींखचों के पीछे नहीं होते. बीजेपी को भी यह बात मालूम है. परंतु वोटों के गणित में वे अपने समीकरण लगाने में लगे हैं. जनता भी जानती है, परंतु आप कब तक भोली, मासूम जनता को मूर्ख बना सकते हैं? जब पेट में दाना नहीं होगा तो राम का मंदिर कैसे याद आएगा.

हे माँ कामाक्षी, तू सबकी प्रार्थनाओं में छिपी भावनाओं को बखूबी जानती है. मेरी तुझसे प्रार्थना है कि इस सुंदर धरा को पंडित-मौलवी जैसे पैरासाइटों से तथा जनता को मूर्ख बनाने वाले राजनेताओं से शीघ्र छुटकारा दिला.

*-*-*
ग़ज़ल
--..--
सच कब की खो चुकी है प्रार्थनाएँ
जनता देखे है आपकी आराधनाएँ

अब बन्द भी कर दो आँसू बहाना
बहुत देख चुके नक़ली सम्वेदनाएँ

हर किसी ने राह है अपनी बनाई
कुछ असर है नहीं डालती वर्जनाएँ

मिलना है सबको इस मिट्टी में
आओ बैठें खिली धूप में गुनगुनाएँ

ये भूलता क्यों है रवि जिंदगी के
दिन हैं चार क्या वह भी गिनाएँ

दोस्तों,
इंडीब्लॉगी2004 पुरस्कारों के लिए मुझ नाचीज़ को भी जूरी बनाया गया था. मैंने भी अपने तईं कुछ पुरस्कार नामजद किए हैं...पर मैं यह कबूल करता हूँ कि मैंने हजारों सक्षम ब्लॉगों में से सिर्फ कुछ सौ पचास को ही देखे हैं, और हो सकता है कि इन नामों में वास्तविक उपयुक्त ब्लॉग न आ पाए हों... अत: सभी ब्लॉगों / ब्लॉगरों से दिली क्षमायाचना सहित...

(a) इस साल का इंडीब्लॉग
प्राय: सभी विषयों में दिव्यदृष्टि पूर्वक लगातार लिखने के लिए...

(b) सर्वोत्तम ह्मूमिनिटीज़ इंडीब्लॉग
क्योंकि वह उतना भी सुस्त नहीं है जितने कि हम उसके जानकारी परक ब्लॉग पढ़ने में...

(c) सर्वोत्तम खेल इंडीब्लॉग
सभी आम भारतीयों की तरह मैं भी कोई खेल नहीं खेलता. भाई ओलंपिक रेकॉर्ड भी तो यही कहते हैं... (सिवाय गली क्रिकेट के, जिसे मैं किसी कोण से खेल नहीं मानता :).

अत:, रे मूर्ख इस बारे में कोई नामजदगी न कर...

(d) सर्वोत्तम विज्ञान/तकनॉलाजी इंडीब्लॉग
हे भगवान!ये तो इतना लिखते हैं कि अपने जीवनकाल में कोई पढ़ भी पाएगा! और वह भी

सही, जानकारी परक...

(e) सर्वोत्तम इंडीब्लॉग डिरेक्ट्री/सेवा

यह तो आसान सा सवाल था...

(f) सर्वोत्तम टैग लाइन के साथ इंडीब्लॉग
हे.. हे... इससे मुझे पता चला कि मुझे भी अपनी खिसकती पेंट सही करना ज़रूरी है

:)

(g) सर्वोत्तम टॉपिकल इंडीब्लॉग
इसके लिए तो खासा सिर खुजाना पड़ रहा है..

(h) सर्वोत्तम डिज़ाइन्ड इंडीब्लॉग
बाप रे! कितने अच्छे अच्छे डिज़ाइन हैं. कोई तकनॉलाज़ी का मास्टर है तो कोई कलाकृतियों

का. और मैं फिर से कबूल करता हूँ कि मैंने हजारों ब्लॉगों में से बमुश्किल सौ-पचास ही देखे

होंगे, अत: वास्तविक सर्वोत्तम डिज़ाइन्ड इंडीब्लॉग जो कहीं न कहीं मेरी नज़र में नहीं आ

पाया होगा, उससे क्षमा याचना सहित...



(i) सर्वोत्तम नया इंडीब्लॉग
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(j) सर्वोत्तम फोटो इंडीब्लॉग
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(k) सर्वोत्तम लाइफटाइम एचीवर इंडीब्लॉग

हिन्दी और देवनागरी के लिए हिन्दी का पहला ब्लॉग, अपने समस्त रिसोर्सेस सहित अब भी

देवनागरी के नए उपयोक्ताओं के लिए आवश्यक सैर गाह है..

(l) सर्वोत्तम इंडीब्लॉग हिन्दी

ब्लॉग के रूप में बेहतरीन, अतिपठनीय, रोचक किताब, जिसके प्रकाशक पहले ही तैयार

बैठे हैं.. :)

पर दोस्तो, यह तो सिर्फ नामज़दगी है, जो कि मेरे जैसे दर्जन भर अन्य जूरी मेम्बरान ने

अपने तईं भिन्न-भिन्न दिए हैं. अब तो परिणाम का इंतजार कीजिए जो कि इन नामदगियों

के द्वारा किए जाने हैं.

सुनामी: कतरनें बोलती हैं…
*-*-*

हमें इसका ही इंतजार था. अन्यथा भारतीय मूल के टेड मूर्ति; जो प्रशांत महासागर के 26 देशों के लिए सुनामी भविष्यवाणी करने वाले तंत्र को स्थापित करने वाले महत्वपूर्ण वैज्ञानिक रहे हैं; ने भारतीय सरकार को कई दफा चेताया, बताया, अनुरोध किया, परंतु भारतीय इतिहास में सुनामी कभी आया ही नहीं था, लिहाजा सरकार को उस पर फालतू पैसे फेंकने की क्या जरूरत थी? अब अंतत: भारत के राष्ट्रपति ने सुनामी के गुज़र जाने के एक सप्ताह बाद घोषणा की है कि भारत में भी सुनामी भविष्यवाणी तंत्र लगाया जाएगा.

भारतीय सरकारी तंत्र के चलताऊ एटिट्यूड के बारे में ये क़तरनें जो कहती हैं क्या वे नाकाफ़ी हैं?


*-*-*
ग़ज़ल
*+*
न लगाओ कोई इल्जाम इन लहरों को
गिन रखे हैं खूब तुमने भी लहरों को

बातें प्रतिरोध की करते हो खूब मगर
सर से यूँ गुजर जाने देते हो लहरों को

कुछ भी असम्भव नहीं अगर ठानो तो
बहुतों ने बाँध के रख दिए हैं लहरों को

तुझमें जिंदगी है मस्ती भी मौज भी
आओ तैर के ये बात बताएँ लहरों को

अठखेलियों में है कितनी पहेलियाँ रवि
क्या कोई समझ भी पाया है लहरों को

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