गुरुवार, 24 फ़रवरी 2005

तिरंगा- तेरा मान या अपमान?

तिरंगे का अपमान?
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भारतीय खिलाड़ियों, या कहें कि भारत की जनता का ये दुर्भाग्य है कि तिरंगे के मान-अपमान के बारे में किसी लकीर-के-फकीर सरकारी बाबू या सोच-विहीन राजनेता (जिनके ऊपर इसे तय करने का भार है) तय करते हैं कि सही क्या है. वह तो भला हो न्यायालय का, अन्यथा तीन-चार साल पहले तो आप तिरंगे को अपने घर पर भी नहीं टाँग सकते थे. आम जनता को तिरंगे का दर्शन साल में सिर्फ दो दिन यानी 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही हो पाता था, वह भी किसी जर्जर, टूटते-फूटते, वर्षों से रँगाई-पुताई को मोहताज शासकीय कार्यालयों के ऊपर! और फिर कहा जाता है कि तिरंगे का अपमान न हो. तिरंगे का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है भला?
खेल मंत्री सुनील दत्त के प्रयासों के बावजूद खिलाड़ियों के द्वारा तिरंगे के उपयोग को उसके अपमान का कारण मान कर किसी सरकारी बाबू/सोच-विहीन राजनेता द्वारा फिर से मना कर दिया गया है. अगर हमारे खिलाड़ी अपने अमरीकी खिलाड़ी बंधु की तरह जो हर कहीं, गर्व से स्टार और स्ट्राइप लगाए फिरते हैं, अगर तिरंगा लगा लेते हैं तो यह भारत देश का और तिरंगे झंडे का अपमान होगा! इससे घटिया विचारधारा तो कुछ और हो ही नहीं सकती.
दरअसल, यह निर्णय समस्त भारतीय जनता का अपमान तो है ही, और बड़ा दुर्भाग्य कि वह अपने राष्ट्रीय झंडे के प्रतीक, तिरंगे को गर्व से कहीं प्रदर्शित भी नहीं कर सकता.

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व्यंज़ल
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नकारेगा भी कोई ये विचार घटिया
बरसों से बिछी पड़ी है टूटी खटिया

जमाने में बहुत हैं मख़मली मसनद
हमें माकूल वही अपनी फटी चटिया

जमाना हँसता है तो इससे हमें क्या
समंदर को चले उठाए अपनी पटिया

हम सा अमीर कोई नहीं जमाने में
हमने दरवाजे पे लगा ली है टटिया
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1 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. ठीक है लेकिन पैजामें को सर में तो नहीं डाल सकते न!

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