शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2005

ग़ज़लों का ओवरडोज़


दोस्तों, एक सप्ताह के लिए बंदा ऑफलाइन होने जा रहा है. अब जबकि सुबह की कॉफ़ी को तो भले ही छोड़ा जा सकता है, इंटरनेट को नहीं, तब सप्ताह भर के लिए ऑफलाइन होना मज़ाक सा लगता है. परंतु छत्तीसगढ़ / बस्तर के बीहड़ों में जाना है, जहाँ इंटरनेट के पग अभी पहुँच नहीं पाए हैं. लिहाजा मेरी कुछ पुरानी ग़ज़लें जिनमें से कुछ यदा कदा प्रकाशित भी हो चुकी हैं और लंबे समय से जियोसिटीज़ में भी थीं, यहाँ ब्लॉग पर डाल रहा हूँ. सप्ताह भर आराम से पढ़िए और मुझे गरियाइए कि क्या फूहड़ ग़ज़लें लिखी हैं… हे..हे...हे...

ग़ज़ल 01
पानी की कीमत किसी पसीने से पूछना
बयार क्यों बहती नहीं उल्टी मत पूछना

जोड़ घटाना गुणा भाग के गणितीय सूत्र
राजनीति में ऐसे चले आए क्या पूछना

सत्ता- कुर्सी के खेल में नियम- कायदे
वो भला आदमी चले- चला था पूछना

नया क्या आत्मघाती का बेरोजगार होना
जेहन में आता है फिर क्यों ये पूछना

रवि, खुदा ने तो तुझे बनाया था बेजात
फिर क्यों सभी जात तेरी चाहते हैं पूछना

ग़ज़ल -02
जरा से झोंके को तूफान कहते हो
टूटता छप्पर है आसमान कहते हो

उठो पहचानो मृग मरीचिका को
मुट्ठी भर रेत को रेगिस्तान कहते हो

अब तो बदलनी पड़ेंगी परिभाषाएं
सोचो तुम किनको इंसान कहते हो

नैनों का जल अभी सूखा नहीं है
पहचानो उन्हें जिन्हें महान कहते हो

सूचियाँ सब सार्वजनिक तो करो
जानते हो किनको भगवान कहते हो

जमाने को मालूम है बदमाशियाँ
कैसे अपने को नादान कहते हो

कभी झांके हो अपने भीतर रवि
औरों को फिर क्यों शैतान कहते हो

ग़ज़ल -03
जीने की खबर है
रने की खबर है

अपने दोस्तों के
जलने की खबर है

उनके नासूरों के
भरने की खबर है

डरावने लोगों के
डरने की खबर है

दो प्रेमियों के
लड़ने की खबर है

किसी कंगाल के
खाने की खबर है

दर्द को रवि के
सहने की खबर है
ग़ज़ल -04
खुदा को ही दुआएं दे रहा हूं मैं
जले चराग़ बुझाए दे रहा हूं मैं

चाहत में मन्जिल-ए-इश्क की
खुद ही को मिटाए दे रहा हूं मैं

राह-ए-मोहब्बत में मरकर
वफा सबको सिखाए दे रहा हूं मैं

मोहब्बत डरने वालों का नहीं
जान लो यह बताए दे रहा हूं मैं

लम्हे भर को उन्हें भूले नहीं
खुद को ऐसे भुलाए दे रहा हूं मैं

जरा सी बात थी उनके मिलने की
और अफसाना बनाए दे रहा हूं मैं

इतना तो तेरी खातिर है रवि
अपना दिल जलाए दे रहा हूं मैं
ग़ज़ल -05
यूं तो दुनिया में कुछ कम गम नहीं
हमें तो गम है कि कोई गम नहीं

मरने को तो मरते हैं सभी मगर
जिंदगी जीने का किसी में दम नहीं

साथ देने का वादा तो सबने किए
यहां तो हम सफर खुद हम नहीं

रोया किए हैं ता उम्र तेरी याद में
आलम है अब आंख भी नम नहीं

फिर से मिलने की किसी मोड़ पर
मांगी थी दुआ खुदा से कुछ कम नहीं

समझे थे पैगम्बर-ए-वफा तुझे
सोचा ये था कि हमें कोई भ्रम नहीं

मिलेगा मुकद्दर में सुकून रवि
ये सोच के किया था कोई श्रम नहीं
ग़ज़ल -06
निकलो गर सफर पे लोग मिलते जाएंगे
पोंछ लो ये चंद आँसू वरना ढरक जाएंगे

माना अंधेरों में साए भी नहीं देते साथ
आखिरी मोड़ तक उनके अहसास जाएंगे

अश्कों का जाम बना पिया है जिन्होंने
वे दीवाने तेरे पास दर्दे दिल ले के जाएंगे

जब भी गिरो बढ़ाओ सहारे के लिए हाथ
लोग तो खुद डूब कर तुझे बचा जाएंगे


सहर होने पर भी खोलो न आँख अपनी
उनके बिखरे ख्वाब संवर ही जाएंगे

मंजिल इन्हीं राहों पर ही मिलेगी रवि
बाकी है जोश बहुत फिर कैसे घर जाएंगे
ग़ज़ल -07
अनाजों के ढेर में बैठा भूखा हूँ मैं
भरा है पेट मगर बैठा भूखा हूँ मैं

जनाजों के मेले में भीड़ है मगर
बेगुनाह लाशों का बैठा भूखा हूँ मैं

इस जंग में हुईं हैं सभी हदें पार
कुर्सियाँ पकड़ा बैठा भूखा हूँ मैं

सड़कें, नहरें, बांध और न जाने क्या
थालियाँ सजाए बैठा भूखा हूँ मैं

गरीबों के गले से निवाले निकाल
अमीर शहर में बैठा भूखा हूँ मैं

ये है तेरे मुल्क की हालत रवि
सबकुछ खा के बैठा भूखा हूँ मैं
ग़ज़ल 08

मेरे शहर के सड़कों के गड्ढों की कहानियाँ हैं
बेजान बिजली के खम्भे भी कहते कहानियाँ हैं ।

वहाँ कोई पूल टूटा, तो यहाँ कोई ट्रेन टकराई
नए किस्सों में क्यों भूलते पिछली कहानियाँ हैं ।

धारावी के झोंपड़े, वरली सी- फेस के बंगले
कहीं रसभरी, तो कहीं करूणामयी कहानियाँ हैं ।

भीड़ का ये मंजर ख़तम होता नहीं दिखता
करोड़ों के देश में अकेलेपन की कहानियाँ हैं ।

तेरे चेहरे पे आज मुस्कान चौड़ी क्यों है रवि
क्या तू ने सुन ली कोई दर्द भरी कहानियाँ हैं ।
ग़ज़ल 09

जमाने, तेरी खातिर हम बरबाद हो गए
क्यों लोग कहते हैं कि मिसाल हो गए ।

इस दौर में तो अब मुहब्बत से पहले
नून, तेल और लकड़ी के सवाल हो गए ।

अब दोस्तों ने शुरू किया कत्ले आम
सभी बन गए बुत, हवा दीवार हो गए ।

पता नहीं कि यह आखिर कैसे हो गया
सपने थे तूफ़ान के पर बयार हो गए ।

वीरान बस्ती में था सिर्फ हमारा जलवा
जमाने तेरे सितम से हम बेकार हो गए ।

हुआ है मेरे शहर में एक अजीब हादसा
कुछ खा के, बाक़ी भूख से बीमार हो गए ।

अरमाँ मत रख बेवकूफ क्या पता नहीं
राजपथ के कुत्ते अब सब सियार हो गए ।

इतना आसाँ नहीं जमाने को बदलना
रवि तुझसे पागल कई हजार हो गए ।
ग़ज़ल 10

मच्छरों ने हमको काटकर चूसा है इस तरह
आदमकद आइना भी अब जरा छोटा चाहिए ।

घर हो या दालान मच्छर भरे हैं हर तरफ
इनसे बचने सोने का कमरा छोटा चाहिए ।

डीडीटी, मलहम, अगरबत्ती, और आलआउट
अब तो मसहरी का हर छेद छोटा चाहिए ।

एक चादर सरोपा बदन ढंकने नाकाफी है
इस आफत से बचने क़द भी छोटा चाहिए ।

सुहानी यादों का वक्त हो या ग़म पीने का
मच्छरों से बचने अब शाम छोटा चाहिए ।
ग़ज़ल 11

तेरी मुहब्बत में कोई लहर नहीं है
चलो कोई बात मगर नहीं है ।

ये रास्ता तो थर्राता था आहटों से

चीखों का कोई खास असर नहीं है ।

किए तो थे वादे इफ़रात क्या करें
इनमें से कोई याद अगर नहीं है ।

तेरे बगैर जीने को सोचा नहीं था
जमाने से तेरी कोई खबर नहीं है ।

तुझे भूलने की कोशिशों में सफल
याद ऐसी कोई शाम-सहर नहीं है ।

तूने खाई होंगी कसमें ढेरों मगर
कोशिशों में खास क़सर नहीं है ।

वो तो वादा निभाकर भी दिखाते
अफसोस कोई पास ज़हर नहीं है ।

दीवानों की भीड़ में पहचानें जिसे
रवि वैसा कोई नाम नज़र नहीं है ।
ग़ज़ल 12

हमसे आप इस तरह क्यूँ शरमाने लगे
नज़र मिला के फिर क्यूँ शरमाने लगे ।

किसी ने कोई बात न की महफिल में
लो वो खुद की बात पे शरमाने लगे ।

ज़रूरत नहीं शै को किसी सबब की
वो आप ही आप ऐसे शरमाने लगे ।

या खुदा क्या होगा मेरे तसव्वुर का
वो ख्वाब में भी आके शरमाने लगे ।

आज क्यूँ ये दुनिया बदली सी है
जाने क्या हुआ कि वो शरमाने लगे ।

कोई तो समझाए रवि को कि क्यों
कल की बात पे आज शरमाने लगे ।
ग़ज़ल 13

रिश्ते अब बेमाने हो रहे
जख्म भी प्यारे हो रहे ।

तुझसे मिले लम्हा न हुआ
और हम तुम्हारे हो रहे ।

दिले गुबार निकालें तो कैसे
अश्क भी अब न्यारे हो रहे ।

क्या हुआ दिल टूटा अपना
वो भी तो अब बंजारे हो रहे ।

किससे कहें हाले दिल यहाँ
अपने तो बेगाने हो रहे ।

तसव्वुर में बैठे हैं आँखे मूंदे
भरी दुनिया में नजारे हो रहे ।

मुहब्बत तो डूबना है रवि
फिर वो कैसे किनारे हो रहे ।
ग़ज़ल 14

जरा सी बात थी जो पूरी दास्ताँ बन गई
नज़र क्या मिली मुहब्बत का सामाँ बन गई ।

उनके खुदा का हाल तो पता नहीं हमको
यहाँ मुहब्बत अपना धर्म और ईमाँ बन गई ।

वो क्या आए मेरे दर पे एक पल के लिए
मेरा ग़रीब खाना खुशियों का जहाँ बन गई ।

पता नहीं कि ऐसा हुआ आखिर किसलिए
सारा जहाँ यकायक मेरी मेहरबाँ बन गई ।

न कोई ग़मी हुई न कोई हादिसा ही हुआ
जाने क्यों खामोशी अपनी जुबाँ बन गई ।

सबके खयाल से भले ही वो बहार थी
मेरे दर पे आके तो वो तूफाँ बन गई ।

रहने ही दो फ़जूल है ये दावा आपका
अपनी चाहत तो अब आस्माँ बन गई ।

अब हम ये खुशियाँ ले के कहाँ जाएंगे
कफ़स ही जब अपना आशियाँ बन गई ।

पहले वो पूछते थे कि वो कौन हैं तेरे
जिंदगी जान के रवि वो नादाँ बन गई ।
ग़ज़ल 15
जिक्र बेवफ़ाई का जब किया जाएगा
उसके साथ तेरा नाम लिया जाएगा ।

हाल अच्छा अपना कहें तो किस तरह
जुबां खुलेगी जब जाम पिया जाएगा ।

आलम है कि यहाँ कोई हम सफर नहीं
बात बनेगी जब कहीं दिल दिया जाएगा ।

कहते हैं वो हमसे मिलने की फुर्सत नहीं
तसल्ली है जनाजे पे मिल लिया जाएगा ।

बात की थोड़ी सी और वो रूस्वा हो गए
बनेगी बात कैसे जो न किया जाएगा ।

अभी तो बैठे हैं खयालों में खोए हुए
देखेंगे जो महफिल में याद किया जाएगा ।

उनकी वसीयत थी जनाजे पे न रोए कोई
नई बात नहीं दिल थाम लिया जाएगा ।

मंज़िल की ये दौड़ तो खत्म होने से रही
चलो अब कहीं आराम किया जाएगा ।

उसे खबर है कि उनके इन्तेज़ार में रवि
अपनी जिंदगी यूँ बरबाद किया जाएगा ।
ग़ज़ल 16
इस जमाने की बहार को क्या कहिए
गुल हैं काँटों से लगें तो क्या कहिए ।

गुमाँ था बहुत तेरी यारी पे अबतक
अब दुश्मनी सी लगे तो क्या कहिए ।

समंदर के किनारे है आशियाँ अपना
गर प्यास न बुझे तो क्या कहिए ।

दुपहर की धूप में निकला है दीवाना
उजाला न मिले उसे तो क्या कहिए ।

कहते हैं जिंदगी बड़ी आसाँ है रवि
लोग मानें न मानें तो क्या कहिए ।
ग़ज़ल 17

इक दर्द सा है क्यूँ दिल में कोई बताए तो हमको
सभी मेहरबाँ हो रहे क्यूँ, कोई सताए तो हमको ।

मांगी है दुआ तेरे ही लिए ईश और अल्लाह से
दे रहे सभी बद्दुआ यहाँ दे कोई दुआएँ तो हमको ।

जब भी चाहा तबस्सुम को अश्क निकल जाते हैं
एक अश्क की खातिर ही कोई हँसाए तो हमको ।

सब कहते हैं बहुत कठिन है राह उस मंजिल की
राहबर बनकर राह अरे, कोई दिखाए तो हमको ।

निकल चुकी है जान कासिद के इन्तेजार में
कुछ खबर उनकी सुना कोई जिलाए तो हमको ।

हर चीज है मुमकिन कहने को लोग कहते हैं
इक दिन मेरे महबूब से कोई मिलाए तो हमको ।

वो वफा करें डर से लुटी नींद अपनी है रवि
झूठी तसल्ली दे के सही कोई सुलाए तो हमको ।
ग़ज़ल 18
महफिल में सुनाई दास्ताँ सबने अपनी
हम पे गुजरी ऐसी कि सुनाई न गई ।

उनके पूछने का अंदाज था कुछ ऐसा
कोई सूरत वो बात बताई न गई ।

उनका दोष नहीं न उनने की बेवफाई
हम ही रूठे थे ऐसे कि मनाई न गई ।

दीवानगी में अपने दिल जलाए बैठे
होश आया पर आग बुझाई न गई ।

तन्हाई का खौफ इस कदर है रवि
वो आ गए पर मेरी तन्हाई न गई ।
ग़ज़ल 19

जाने किस बात पे हमें रोना आया
बेदर्द जमाने क्यों हमें रोना आया ।

कोई तो दे हमें ज़हर का प्याला
जाम पी के तो हमें रोना आया ।

इन चरागों को बुझा दो यारों
रौशनी देख के हमें रोना आया ।

बस करो छेड़ो न चर्चा फिर
जिन बातों पे हमें रोना आया ।

के कहकहे लगाए सबने रवि
सुनके जो बात हमें रोना आया ।
ग़ज़ल 20
इस कदर कर कोशिश ख़िजा-ए-गुल खिलाने
बने मुस्कान गुलिस्ताँ की के तेरा मुरझाना ।

माना खार भी लेते हैं साँस इस चमन में
इक फूल की खुशबू से है दामन भर जाना ।

इन अश्कों के टपकने से मिलता है सुकून
दो बूंद देगा सागर-ए-सुकून तुझे अंजाना ।

उन्हें याद दिलाने से क्या होगा हासिल
याद रहें वो क्या फिर याद आना न आना ।

करले तू अपनी जुबाँ को इस कदर प्यासा
ज़हर भी तू अमृत समझ पचा जाना ।

न कर इंतजार आखिरी साँस का रवि
हर साँस आखिरी है और दिल है बेगाना ।
ग़ज़ल 21
कुछ नहीं तो वायदों की बौछार लाऊँगा
इस चुनाव में जीता तो त्यौहार लाऊँगा ।

अभी तो याचक बना हूँ तेरे दर पर
कुर्सी पे बैठ तेरे लिए इन्तेजार लाऊँगा ।

परोसा है सभी को आश्वासनों के प्याले
होगी जेब गर्म तभी ऐतबार लाऊँगा ।

अभी तो होगा वो तुम चाहते हो जो
बाद में फिर मैं झूठा इक़रार लाऊँगा ।

लगते हो आज तुम मेरे अपने से
कल को पहचानने से इनकार लाऊँगा ।

जब बीतेंगे पांच बरस खामोशी से रवि
चीखता हुआ फिर सच्चा इसरार लाऊँगा ।
ग़ज़ल 22


भूले हुए है खुशी को खुशी की तलाश में
हो गए ख़ुद बेवफा वफा की तलाश में ।


बे-दिल दुनियाँ में एक इन्साँ न मिला
हम भटका किए थे खुदा की तलाश में ।


समंदर की लहरों से भी न मिटी प्यास
गोता लगाया व्यर्थ शबनम की तलाश में ।

थे बेखबर जल रहा था अपना आशियाना
भटका किए दरबदर रौशनी की तलाश में ।

लोग तिनकों के सहारे लांघते हैं दरिया
हमसे डूबी कश्ती सहारे की तलाश में ।

अब तक थे शिकार गलतफ़हमी के रवि
मिली थी मौत जिंदगी की तलाश में ।
ग़ज़ल 23
इक दर्द सा है क्यूँ दिल में कोई बताए तो हमको
सभी मेहरबाँ हो रहे क्यूँ, कोई सताए तो हमको ।

मांगी है दुआ तेरे ही लिए ईश और अल्लाह से
दे रहे सभी बद्दुआ यहाँ दे कोई दुआएँ तो हमको ।

जब भी चाहा तबस्सुम को अश्क निकल जाते हैं
एक अश्क की खातिर ही कोई हँसाए तो हमको ।

सब कहते हैं बहुत कठिन है राह उस मंजिल की
राहबर बनकर राह अरे, कोई दिखाए तो हमको ।

निकल चुकी है जान कासिद के इन्तेजार में
कुछ खबर उनकी सुना कोई जिलाए तो हमको ।

हर चीज है मुमकिन कहने को लोग कहते हैं
इक दिन मेरे महबूब से कोई मिलाए तो हमको ।

वो वफा करें डर से लुटी नींद अपनी है रवि
झूठी तसल्ली दे के सही कोई सुलाए तो हमको ।

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