जन गण मन... जय हे...

न्यायिक अति-सक्रियता

*-*-*
कुछ समय से देश में जनहित याचिकाओं की बाढ़ सी आई हुई है. न्यायिक सक्रियता, न्यायिक अति-सक्रियता में बदल गई सी लगती है. न्यायालय भी अख़बारों की खबरों का संज्ञान लेकर उस पर अपने निर्णय देने लगे हैं. कुछ उत्साही लालों को ऊटपटाँग जनहित याचिकाएँ लगाने पर न्यायालयों की फटकारें भी मिलीं हैं और जुर्माना भी भरने पड़े हैं. अब बात राष्ट्रगान पर आकर ठहर गई है.

सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका लगाई गई है कि राष्ट्रगान ‘जन गण मन...’ में सिंध का नाम फ़ालतू है चूंकि वह पाकिस्तान में है इस लिए उसे हटाया जाए. (आश्चर्य है कि किसी होशियार को 57 साल बाद यह बात समझ में आई) सिंध की बजाए कश्मीर होना चाहिए, अत: इस सम्बन्ध में समुचित आदेश पारित किए जाने चाहिएँ. क्या बढ़िया याचिका है. न्यायालय ने भी उसे स्वीकार कर लिया है. यह और बढ़िया है. जनाब ग़ालिब, (ईश्वर आपकी आत्मा को शांति प्रदान करें) अब आपके किसी शेर में किसी को कोई नुक्ता फ़ालतू लगेगा, तो समझ लो कि वह न्यायालय में जनहित याचिका लगाने ही वाला है...

राष्ट्रगान में सिंध क्या जमीन के एक टुकड़े का नाम भर है? तो बजाए इसके कि सिंध शब्द को राष्ट्रगान से हटाया जाए, हमारे सिंधी भाइयों के लिए जो विभाजन की पीड़ा लिए यहाँ की धरती को आत्मसात कर रह रहे हैं, पहले कोई फ़लस्तीन, ख़ालिस्तान या सिंधीस्तान जैसा कुछ बनाया जाए. या आप उन्हें भी इस राष्ट्र से मिटाना चाहते हैं कि वो पाकिस्तान से आए थे? रही बात ‘जन गण मन...’ में काँट-छाँट की, तो टैगोर (ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे) इस बात से ज्यादा प्रसन्न होंगे कि बजाए उसमें काँट छाँट के या विवाद पैदा करने के, भाई लोग कोई और गीत राष्ट्रगान हेतु चुन लें...

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ग़ज़ल
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कहाँ कहाँ नहीं दी याचिका
ज़रूरी क्योंकर है याचिका

निकाल दो भले ही देश से
नहीं देनी है मुझे याचिका

एतबार था तो फिर क्यों
पछता रहे हो दे याचिका

जुर्म है मुल्क में जन्मना
इसीलिए जरूरी है याचिका

आसाँ जिंदगी के लिए रवि
लिए फिरता है वो याचिका

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टिप्पणियाँ

  1. जनहित? मजाक मत कीजिए। वैसे किसी की रचना से, चाहे वह जैसी हो, छेड़छाड़ नहीं किया जाना चाहिए। भले राष्ट्रगान बदल दो…क्योंकि यह तो राज्य या सत्ता के बनाए होते हैं…

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