टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

November 2004

रेडहैट लिनक्स हिंदी समेत 5 भारतीय भाषाओं में जारी
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रेडहैट का फेदोरा कोर 3, हिंदी समेत 5 भारतीय भाषाओं, यथा- बंगाली, पंजाबी, गुजराती तथा तमिल में जारी किया जा चुका है तथा यह संपूर्ण सर्वर ऑपरेटिंग सिस्टम अपने साथ ढेरों अन्य अनुप्रयोगों सहित मुफ़्त डाउनलोड हेतु अब यहाँ सेः http://fedora.redhat.com/download/mirrors.html उपलब्ध है. फेदोरा कोर 3 में प्रारंभिक संस्थापना स्क्रीन से लेकर प्रायः सभी प्रकार के अनुप्रयोगों तक पूर्णतः आपको भारतीय भाषा का वातावरण प्राप्त होगा. इसमें केडीई 3.2 , एक्सएफसीई 4.2 के लगभग सभी मॉड्यूल्स तथा साथ ही गनोम 2.8 सहित कुछ अन्य अनुप्रयोग जैसे कि गेम इंसटैंट मैसेंजर के प्रायः अधिकतर हिंदी अनुवादों का कार्य हमारी टीम ने किया है. यूँ इससे पूर्व रंगोली नाम से भारतीय भाषाओं का एक जीवंत लिनक्स सीडी का बीटा संस्करण भी जारी किया जा चुका है जिसमें ऊपर दी गई भाषाओं के अलावा मराठी, कन्नड़, मलयालम इत्यादि भाषाओं के आंशिक समर्थन भी हैं. उड़िया तथा तेलुगु भाषा में भी कार्य जोरों से जारी है. शायद लिनक्स में भारतीय भाषाओं की सक्रियता को देखते हुए माइक्रोसोफ्ट की भी नींद उड़ी है और वह भी अगले साल हिंदी में विंडोज़ एक्स पी का कम कीमत का स्टार्टर वर्जन निकालने जा रहा है, तथा उसने यह भी घोषणा की है कि अन्य 14 भारतीय भाषाओं में भी शीघ्र ही उसका संस्करण निकलेगा. डेबियन लिनक्स का संस्थापक भी अब हिंदी में अनुवादित किया जा चुका है और प्रारंभिक जाँच पड़ताल के बाद डेबियन में हिंदी समर्थन जारी होने की संभावना है. मेनड्रेक लिनक्स संस्थापक तो पहले से ही हिंदी में उपलब्ध है ही.
अब वह दिन आ गया है जब भारतीय कंप्यूटरों के संपूर्ण डेस्कटॉप वातावरण भारतीय भाषाओं में ही रहेंगे.
स्क्रीन शॉट देखें:
हिंदी में

मराठी में

बंगाली में

ਪੰਜਾਬੀ ਮੇੰ

ગુજરાતી મેં


ये तो उम्र का तक़ाज़ा है भाई…



बचपन में मैं इंद्रजाल कॉमिक्स पढ़ने में मज़ा लेता था. जैसे ही किशोरावस्था में कदम पड़े, रानू, गुलशन नंदा और मिल्ज़ बून की रोमांटिक किताबें मज़ा देने लगीं. पता नहीं कब इयॉन फ्लेमिंग, जेम्स हेडली चेईज़, इरविंग वैलेस (सेकेण्ड वूमेन तो अभी भी याद है), फ्रेडरिक फोरसाइथ और अपने शुद्ध देसी सुरेन्द्र मोहन पाठक तक कैसे पहुँच गया. इस बीच हंस, सारिका, प्रेमचंद, हरिशंकर परसाई, कुरआन शरीफ़, बाइबल, पुराण और पता नहीं क्या क्या बाँच डाले. और, प्रायः हर अलग अलग समय में इन चीज़ों को पढ़ने में बड़ा मज़ा आया. पर अब न कॉमिक्स, न रोमांटिक उपन्यास और न चेइज़ पढ़ा जाता है. अब तो कोई आई टी तकनॉलाज़ी से संबंधित कोई चीज आकृष्ट करती है या फ़िर ऊपर दी गई जैसी ग़ज़लें (माणिक वर्मा की लिखी ग़ज़ल (कविता?) जो नई दुनिया के दीपावली विशेषांक 2004 में छपी है.)

ग़ज़ल
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माणिक वर्मा की ग़ज़लः
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जो सच बोले उसे सूली चढ़ा दो
ये तख्ती हर कचहरी में लगा दो

हमें दुनिया का नक्शा मत बताओ
हमारा घर कहाँ है ये बता दो

करो तुम कत्ल जब भी आस्था का
बजाकर शंख चीखों को दबा दो

यक़ीनन कल जलेगा घर में चूल्हा
ये वादा करके बच्चों को सुला दो

दीवाली आपके बच्चे भी देखें
ये माचिल लो हमारा घर जला दो

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ये भारतीय क़ानून हैं....

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क़ानून के किस्से बड़े निराले हैं. कहा जाता है कि क़ानून अंधा होता है. यह भी कहा जाता है कि बड़े और पैसे वालों के लिए क़ानून नाम की कोई चीज़ नहीं होती. कुछ लोगों के अपने क़ानून होते हैं. कहीं क़ानून तो होता है, परंतु क़ानून के पालन हार ही उसे तोड़ते फ़िरते हैं. आज जीवन के हर क्षेत्र के लिए इतने क़ायदे क़ानून हो गए हैं कि हममें से हर कोई हर पग पर क़ानून तोड़ता चलता है. जब कोई नेता शासक बनता है तो विरोधियों को अंदर कर देता है और कहता है क़ानून अपना काम करेगा. जब वह विरोधी पार्टी में होता है तो चिल्लाता है कि क़ानून को शासकों ने बंधक बना लिया है और मनमाना क़ानून लगा रहे हैं. बहुत से क़ानून हैं जिसे हम आप रोज तोड़ते हैं पर खुदा का शुक्र है कि हम में से अधिकतर नेता नहीं हैं. अन्यथा या तो क़ानून के काम के कारण या तो अंदर होते या क़ानून को काम देने के नाते अपने विरोधियों को अंदर कर रहे होते.

बहरहाल, चर्चा भारत के एक विचित्र क़ानून की हो रही है. इसके लिए एक घटना सुनिए.
एक भारतीय व्यक्ति अपने विदेशी मेहमान की मेहमान नवाज़ी के लिए फ़ाइव स्टार होटल ले गया. ज़ाहिर है उन्होंने ख़ाने के साथ बियर का ऑर्डर दिया. बेयरा बियर की एक बोतल और सिर्फ एक गिलास लेकर आया. यह सोच कर कि बेयरे से अनजाने में यह गलती हो गई होगी, और इसे अन्यथा न लेते हुए भारतीय ने अपनी बियर पानी के गिलास में डाली. पर बेयरा दौड़ते हुए आया और बोला - साहब जी, आप हमारे होटल का भट्ठा मत बिठाइयेगा. आज ड्राइ डे है और उस दिन क़ानूनन किसी भारतीय को शराब नहीं परोसी जा सकती. किसी विरोधी पार्टी को पता चल गई तो इस बात पर हम अंदर हो जाएंगे और हमारा लाइसेंस रद्द हो जाएगा. हम आप से माफ़ी चाहते हैं. भारत में विशेष अवसरों पर ड्राई डे होता है. यानी उस दिन शराब बिक्री पर प्रतिबंध होता है. पर यह प्रतिबंध सिर्फ भारतीयों के लिए होता है. विदेशियों के लिए नहीं. हो सकता है कि आपको इस कहानी में कुछ अतिशयोक्ति दिखाई दे, परंतु यह भी सच है कि ड्राई डे के दिन औसत से ज्यादा शराब बिकती है. क़ानूनन शराब नहीं बेची जा सकती अतः एक दो पैग शराब आपको होटलों या बार में नहीं मिलेगी. परंतु टाउट्स आपको अद्धा पौवा और बोतल हर जगह, थोड़े से ज्यादा पैसे में बेचते मिलेंगे. फिर शराब बंदी के दिन लोगों को जरा ज्यादा ही तलब लगती है. चुनावों के ऐन दो दिन पहले से ड्राइ डे डिक्लेयर हो जाता है परंतु हम सब को पता है कि जब तक जम कर बोतलों की सप्लाई नहीं होती है, चुनाव का अंतिम चरण पूरा नहीं होता है. एक और क़ानून है जिसमें आप 21 (महिला के लिए 18) साल के होने पर शादी तो कर सकते हैं, परंतु दारू पीने के लिए आपको 25 साल का होना पड़ेगा, नहीं तो पुलिस क़ानून के तहत आपको जेल में बंद कर सकती है. पीने वाले को भी और पिलाने वाले को भी.

ऐसा ही एक भारतीय क़ानून है जिसमें किसी विशेष अवसर पर जैसे कि गांधी जयंती इत्यादि पर मांस विक्रय पर प्रतिबंध रहता है. बेचारे मछुआरे और कसाई जो ले दे कर अपना पेट पालते हैं उन्हें उस दिन अपना कारोबार जबर्दस्ती बंद रखना पड़ता है. शायद देश के क़ानून बनाने वालों को अब तक यह जानकारी नहीं है कि दूध और घी भी रासायनिक रूप से एनिमल प्रोटीन और फैट (पशु मांस) ही हैं...

ये भारतीय क़ानून हैं....
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ग़ज़ल
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बनते बिगड़ते नित्य नए क़ानून हैं
कुछ के लिए नहीं कहीं क़ानून हैं

चले कैसे कोई इस पथ पर अविराम
पग पग पर कई कई तो क़ानून हैं

सियासती लोग खुश हैं तो दरअसल
बनाए उन्होंने अपने लिए क़ानून हैं

धन बल पर निकलती हैं व्याख्याएँ
शायद इसीलिए अंधे सभी क़ानून हैं

जमाने में आ के रो नहीं सका रवि
सच बात न कहने के जो क़ानून हैं

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इंडीब्लॉग अवॉर्ड 2004
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भारतीय तथा भारत से जुड़े अंग्रेजी भाषा में तथा भारतीय भाषाओं में लिखे जाने वाले ब्लॉगों के लिए इस साल के इंडीब्लॉग अवॉर्ड के लिए तैयारियाँ ज़ोरों से चल रही हैं. (धन्यवाद इंडीब्लॉगी, आपके तारीफ़े काबिल प्रयास के लिए :). तो दोस्तों आप भी कमर कस कर मैदान में कूद पड़िए. आखिर आपके ब्लॉग में भी तो कोई न कोई अवॉर्ड पाने की खासियत मौजूद है ही और वैसे भी आपका ब्लॉग किसी से कम है क्या? ऊपर से इंडीब्लॉग में दर्जन भर से ज्यादा वर्ग/श्रेणियाँ हैं जिन में अवॉर्ड दिया जाना है. अतः आपके ब्लॉग को कोई न कोई अवॉर्ड मिलने की पूरी संभावना है. न भी मिले तो क्या, ओलंपिक की तरह इसमें भी शामिल होना ज्यादा महत्वपूर्ण है, बजाय इनाम प्राप्त करने के.
अवॉर्ड में शामिल होने के अलावा आप यह भी कर सकते हैं:

** आप चाहें तो अवॉर्ड के लिए जूरी मेम्बर बन सकते हैं
** आप चाहें तो कोई पुरस्कार प्रायोजित कर सकते हैं
** आप चाहें तो अपना स्वयं का या किसी अन्य ब्लॉग के लिए केनवासिंग कर सकते हैं – इसके लिए जूरी सदस्यों को ई-मेल करना होगा.
** आप अन्य इंडियन ब्लॉगर्स को इसके बारे में बता सकते हैं

अधिक जानकारी के लिए इंडीब्लॉग का वेब पृष्ठ देखें
तो आइए इंडीब्लॉग एवॉर्ड 2004 को सफल बनाएँ

भारत में अमीर-ग़रीब सब बराबर



विश्व प्रसिद्ध कार्टूनकार आर. के. लक्ष्मण का एक कार्टून 22 नवंबर के अंक में छपा है.

वे अपने पैने व्यंग्य की कूची चलाते हुए स्पष्ट करते हैं कि भारत में क्या अमीर क्या ग़रीब सब

बराबर हैं. सभी भुगतने के लिए अभिशप्त हैं. ग़रीब रोटी कपड़ा मकान की समस्या से त्रस्त

है तो अमीर पावर कट, लोड शेडिंग, गड्ढे और धूल युक्त सड़कों, ट्रैफिक जाम, पानी की

कमी, स्कैम इत्यादि समस्याओं से त्रस्त है.

समाजवादी / साम्यवादी लोगों को खुश होना चाहिए कि कम से कम भुगतने के मामले में तो

भारत में सभी बराबर हैं. अमीरी-ग़रीबी का फ़र्क़ वास्तव में यहाँ मिट गया है.

पर, अगर कोई फ़र्क़ कहीं नज़र आता है तो वह राजा और रंक (बक़ौल अमिताभ बच्चन) के

बीच है. और यह फ़र्क़ दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है.
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ग़ज़ल
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आदमी है आदमी के पीछे बराबर
सोचता नहीं होना है हिसाब बराबर

चाँदी का चम्मच ले के आया पर
चार दिन की जिंदगी सबकी बराबर

रत्न जटित ताबूत है तो क्या हुआ
भीतर कीड़े और दुर्गंध सभी बराबर

सच है कि अपने आवरणों के अंदर
कहीं कोई फ़र्क़ नहीं है बाल बराबर

काल को तुम भूल गए रवि शायद
कल दुर्ग था आज मैदान बराबर

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या भगदड़ में भारत?



नई दिल्ली के रेल्वे स्टेशन पर पिछले दिनों जन साधारण एक्सप्रेस ट्रेन में चढ़ने उतरने के

दौरान मची भगदड़ में आधा दर्जन व्यक्तियों की मौत हो गई तथा कई गंभीर रूप से घायल हो

गए. जाहिर है, ऐसे भगदड़ में मरने तथा घायल होने वालों में अधिकतर महिलाएँ एवं बच्चे

ही थे.
भारत में भगदड़ कोई नई बात नहीं है. हर जगह भगदड़ मची रहती है. चाहे वह रेल्वे स्टेशन

हो, हवाई अड्डा हो या फिर मरीन ड्राइव. जहाँ भीड़ है, और सुविधाओं का अभाव हो वहाँ

भगदड़ तो मचेगी ही.
फिर नई दिल्ली, जो भारत देश की राजधानी है, वहाँ के रेल्वे स्टेशन पर भगदड़ मचना इस

बात की गवाही देता है कि यहाँ की जनता किस हाल में गुज़र बसर करने को अभिशप्त है. नई

दिल्ली रेल्वे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर आपको कहीं भी सूचना पट्ट देखने को नहीं मिलेंगी जो

बताएँगी कि कौन सी ट्रेन किस समय पर और कब उस पर आएगी और जाएगी. सुविधाओं का

घोर अभाव है. भीड़ नियंत्रित करने का कोई प्लान ही नहीं है. ऐसे में भगदड़ तो मचना ही

है.
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ग़ज़ल
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क्या मिलना है भगदड़ में
जीना मरना है भगदड़ में

मित्रों ने हैं कुचले हमको
अच्छा बहाना है भगदड़ में

लूटो या खुद लुट जाओ
यही होना है भगदड़ में

जीवन का नया वर्णन है
फँसते जाना है भगदड़ में

तंग हो के रवि भी सोचे
शामिल होना है भगदड़ में
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एअरपोर्ट का अपहरण
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बैंगलोर में एक अंतर्राष्ट्रीय एअरपोर्ट बनाए जाने की योजना पिछले दस साल (जी हाँ,

पिछले दस साल !) से चल रही है, और अभी भी मामला विभिन्न सरकारों और

सरकारी विभागों की स्वीकृति की प्रतीक्षा में उलझा पड़ा है. तारीफ़ की बात तो यह है कि

कर्नाटक की पिछली काँग्रेस सरकार ने इस परियोजना को स्वीकृति दे दी थी, परंतु नई

सरकार जो काँग्रेस की ही है (क्या बात करते हैं, मंत्री तो बदल गए हैं न भाई), इस

परियोजना की स्वीकृति पर पुनर्विचार कर रही है !
इस परियोजना की शीघ्र स्वीकृति के लिए इन्फ़ोसिस के नारायण मूर्ति भी लगे रहे हैं.

उनके प्रयासों से इसमें थोड़ी गति भी आई, परंतु और भी कई अन्य परियोजनाओं की

तरह यह भी हाईजैक हो गया राजनीतिबाजों, अफसरशाहों और लालफ़ीताशाहों के द्वारा.

परियोजनाओं पर विचार और पुनर्विचार करते-करते ये अपहृत हो जाते हैं और भारत का

इन्फ्रास्ट्रक्चर जहाँ का तहाँ पड़ा रह जाता है- ठस. भूले भटके कभी कोई परियोजना पूरी

होती भी है तो वह भ्रष्टाचार के चलते लड़खड़ाती / दम तोड़ती ही चलती है...

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ग़ज़ल
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मूल्यों में गंभीर क्षरण हो गया
मुल्क का भी अपहरण हो गया

भ्रष्ट राह में चलने न चलने का
सवाल ये जीवन मरण हो गया

बचे हैं सिर्फ सांपनाथ नागनाथ
पूछते हो ये क्या वरण हो गया

हँसा है शायद दीवाना या फिर
भूल से तो नहीं करण हो गया

रवि बताए क्यों कि ढोंगियों का
वो एक अच्छा आवरण हो गया
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आइए, थोड़ी पूजा-अर्चना करें
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पहले मिग 21 और अब मिराज विमानों के दुर्घटना ग्रस्त होने की अधिक संख्या को देखते

हुए एअरफोर्स द्वारा पूजा-अर्चना और विशेष अनुष्ठान करवाया जा रहा है, ताकि ऐसी वारदातों

को, प्रभु की कृपा से रोका जा सके.

वाह भाई क्या बात है. फ़्लाइट इंजीनियर प्रभु से प्रार्थना करता होगा कि हे प्रभु, आज मैंने

अपनी व्यस्तता के कारण मिराज का आवश्यक मेंटेनेंस नहीं किया है, अतः कृपा करना,

आज दुर्घटना नहीं होने देना. खरीदी विभाग का चीफ़ प्रार्थना करता होगा कि हे दयालु प्रभु

तूने अब तक विभिन्न खरीदी में कमीशन पाने में साथ दिया है, अब डुप्लीकेट पार्ट्स के साथ

विमानों को बढ़िया उड़ने में मदद करना.

मैं अपना एक अनुभव बताता हूँ. कुछ समय पूर्व की बात है जब 11 किलो-वोल्ट के कुछ

सर्किट ब्रेकर्स के कॉन्टेक्ट्स बुशिंग के साथ ही ज्यादा संख्या में, अकारण ही जलने लगे थे.

सब तरह की जाँच के बाद भी कुछ पता नहीं चल पा रहा था कि कॉन्टेक्ट्स क्यों भीषण गर्म

होकर जलने लगे हैं. बारीकी से छानबीन की गई तो पाया गया कि एक खास बैच के

कॉन्टेक्ट्स में ये समस्या है. तह में उतरा गया तो पाया गया कि लोहे के पार्ट्स के ऊपर

कॉपर का मुलम्मा पहना कर कॉन्टेक्ट्स की सप्लाई की गई थी, जिस वजह से वे परीक्षण में

तो असल प्रतीत होते थे, परंतु हाई रेजिस्टेंस के कारण अतिउच्च करेंट पर तीव्रता से गर्म

होकर जल जाते थे. और, क्या आप जानते हैं, उस वक्त नया कॉन्टेक्ट लगाते वक्त क्या

किया जाता था ? पूजा की जाती थी, नारियल फोड़ा जाता था कि ईश्वर, मदद करना.

ब्रेकर को बढ़िया चलने देना, जलाना नहीं....

आइए, हम भी इबादत करें कि हे प्रभु, हमारे मिग-मिराज के साथ-साथ मासूम पायलटों

की भी रक्षा करना, आखिर भ्रष्टाचार की अधिकता वाले देशों की सूची में उच्च स्थान पर रहने

वाले भारत की रक्षा तो आप कर ही रहे हैं...

***
ग़ज़ल
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गले में फाँस हो इबादत कीजिए
मन में पाप हो इबादत कीजिए

बहुत बेरहम हो गई ये दुनिया
रस्ते चलते हो इबादत कीजिए

गड्ढे जाम ट्रैफ़िक पुलिसिया
बच निकले हो इबादत कीजिए

पल भर जीना जहाँ मुश्किल
गुज़ारे दिन हो इबादत कीजिए

कुछ करने से बेहतर है रवि
कार्य सफल हो इबादत कीजिए

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मेड फॉर इंडिया, रीयली?
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नोकिया ने अपने आर एंड डी टीम में अरबों डालर निवेश कर भारतीय परिवेश के लिए

अलग प्रकार का सेलफ़ोन ईज़ाद किया है. यह सेलफ़ोन टॉर्च लाइट युक्त है ताकि भारतीय

घनघोर अंधियारा में खासा काम आ सके. इसमें धूल सुरक्षा भी है ताकि भारत के सर्वत्र

अत्यंत धूल भरे इलाकों में यह सुरक्षित रह कर काम कर सके. इसमें ना फिसल ग्रिप

भी है, ताकि चोर उचक्कों की छीना झपटी से सुरक्षा मिल सके. भाई वाह ! क्या

बात है. पर कुछ और ऐसी ही ईज़ादें भारतीयों के लिए हो जाए तो मज़ा आ जाए.
मेरी कुछ इच्छाएँ (विश लिस्ट) हैं –

1 ऐसे वाहन ईज़ाद किए जाएँ जो गड्ढों युक्त, भीड़ भरे, जाम लगे भारतीय सड़कों पर

भी फर्राटा से दौड़ सकें, तथा घासलेट, कुकिंग गैस, नेफ्था, साल्वेंट इत्यादि (वैसे

भी ये पेट्रोल/डीज़ल/सीएनजी में तो धड़ल्ले से मिलाए ही जाते हैं) से भी चल सकें.

2 ऐसी घड़ियाँ बनाई जाएँ जो इंडियन स्टैंडर्ड टाइम का लिहाज रखें. यानी की किसी

समारोह के उद्घाटन पर नियत समय पर या किसी नेता के लंबे उबाऊ भाषण पर वह रूक

जाए जब तक कि उद्धाटन न हो जाए और भाषण समाप्त न हो जाए ताकि लोगों को यह

आभास न हो कि वे लेट हो रहे हैं.

3 ऐसी वेंडिंग मशीनें बनाकर हर दस कदम पर लगाई जाएँ जहाँ प्रतिदिन आम भारतीय

घर से निकलने से पूर्व विभिन्न सरकारी विभागों को दिया जाने वाला घूस का पैसा जमा

कर उस दिन के लिए टिकट निकाल सके जिसे वह जगह जगह दिखा कर (कि उसने

आज का अपना हिस्सा जमा कर दिया है,) अपना कार्य निपटा सके.....

4 यूँ तो सूची खासी लंबी है, परन्तु सूची क्र. 2 की वस्तु अभी बनाई नहीं गई है,

अतः फिर कभी...

दोस्तों, अगर आपको भी कुछ सूझ रहा हो तो लिख दीजिए अपनी इच्छा सूची भी अपनी

टिप्पणी के रूप में..

चोला राम का दिल रावण रावण
यही है रवि हाहाकारी असलियत




भाग 1 में मैंने बोहरा समाज के धर्मगुरु का परिवार मुम्बई के कामा हाउस को 1 अरब से अधिक रुपयों में खरीदे जाने के बारे में लिखा था. वह तो भला हो कुछ समाचार पत्रों का जिसमें इस विवादास्पद सौदे का हल्ला मचा और वह रद्द हो गया. भाग 2 तो और भी कलंकित है. काँची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य को हत्या के अपराध में मुख्य अभियुक्त क्रमांक 1 के रूप में विगत दिनों गिरफ्तार किया गया. मामला पीठ के पाँच हजार करोड़ रूपयों से अधिक की सम्पत्ति का है, जिसके दुरुपयोग के बारे में मृतक बरसों से शंकराचार्य पर उंगली उठाते रहे थे.

मैं फिर से एक बार कहना चाहूँगा कि ये धार्मिक गुरु चाहे जिस पंथ, रीति और धर्म के हों, वे खतरनाक परजीवी हैं जो समग्र विश्व को चूसकर उसके विकास में बाधा डालते रहे हैं. उम्मीद करते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ इनकी असलियत को पहचान लेंगीं.

ग़ज़ल
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खुद की नहीं पहचानी असलियत
तलाश में हैं औरों की असलियत

यहीं तो है उस लोक की हकीकत
जनता कब पहचानेगी असलियत

मत मारो उस दीवाने को पत्थर
पहले देख लो अपनी असलियत

ईश्वर तो मौज़ूद है तेरे कर्मों में
रे मूरख पहचान तेरी असलियत

चोला राम का दिल रावण रावण
यही है रवि हाहाकारी असलियत

उल्टा पुल्टा इंडिया
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जग सुरैया ने टाइम्स ऑफ इंडिया (नवंबर ७, २००४) में इंडिया के बारे में काफी कुछ लिखा है. जग सुरैया पत्रकारिता से ताउम्र जुड़े रहे हैं और उन्होंने विश्व के तमाम देशों की यात्राएँ भी की हैं. अपने अनुभवों को वे बेबाकी से लिखते रहे हैं. उस लेख का छोटा सा हिस्सा प्रस्तुत हैः

इंडिया उल्टा पुल्टा देश है. यहाँ की हर चीज उल्टी पुल्टी है. विश्व के अन्य प्रजातंत्रों में प्रजा शासकों को चुनती है ताकि प्रजा खुशहाल हो सके. इंडिया में प्रजा शासकों को चुनती है ताकि शासक, प्रजा के खर्चे से खुशहाल हो सकें. अन्य जगह पानी, बिजली, स्कूलों और हस्पतालों की व्यवस्था हर एक की सुगम पँहुच में हो इस पर ध्यान दिया जाता है. इंडिया में इन यूटिलिटीज़ को गोली मारो, अपना हिस्सा पार करो का नारा चलता है. अन्य जगहों पर सिस्टम इस लिए चलता है चूंकि वहाँ सिस्टम मौज़ूद है और हर व्यक्ति उससे बंधा है- चाहे लाइन में लगना हो, रास्ते पर चलना हो, टैक्स जमा करना हो... पर अरबों की जनसंख्या वाले देश इंडिया में तो सिस्टम है ही नहीं फालों क्या करें, वह भी तब जब इंडिया का हर बंदा अपने कर्मों से बंधा है!

***
ग़ज़ल
***

यहाँ तो हर बात उल्टे पुल्टे हैं
जीने के हालात उल्टे पुल्टे हैं

मेरा ईश तेरा खुदा उसका ईशु
कैसे ये ख़यालात उल्टे पुल्टे हैं

बावरे नहीं हैं अवाम दरअसल
शहर के नियमात उल्टे पुल्टे हैं

जेल में होती है पप्पुओं की जश्न
मुल्क के हवालात उल्टे पुल्टे हैं

चैन और नींद से महरूम रवि
उसके तो दिनरात उल्टे पुल्टे हैं

****

जालघर के अँग्रेज़ी -हिंदी शब्दकोश



पढ़ने लिखने के लिए कंप्यूटरों पर हमारी निर्भरता बढ़ती ही जा रही है.

निकट भविष्य में अधिसंख्य जन, प्रायः अधिसंख्य कार्यों हेतु, अधिसंख्य समय
कंप्यूटरों का ही उपयोग करने लगेंगे. अच्छे लेखन के लिए तथा लिखे हुए को अच्छे ढंग

से समझने के लिए प्रायः शब्दकोशों की आवश्यकता होती है. अब चूंकि हम अपने कार्य
कंप्यूटर पर ही करने लगे हैं, तो फिर मोटे-मोटे शब्दकोशों के पन्ने पलटने आवश्यकता

कतई नहीं है. अब आपके कंप्यूटर पर ही ढेरों, विभिन्न भाषाओं के शब्दकोश और समांतर
कोश उपलब्ध हैं. कंप्यूटर पर उपलब्ध संस्थापन योग्य तथा ऑनलाइन शब्दकोशों के द्वारा

शब्दों को ढूंढा जाना न सिर्फ आसान होता है, वरन कई प्रकार के सहायक अनुप्रयोगों
यथा ‘काट तथा चिपका’ इत्यादि का उपयोग कर अपने कार्य को और भी आसान बनाया जा सकता

है. हिंदी भाषा के लिए कुछ समय पूर्व तक जालघर में तथा कंप्यूटर पर संस्थापन योग्य
अँग्रेज़ी-हिंदी-अँग्रेज़ी शब्दकोश इक्का-दुक्का ही उपलब्ध थे. परंतु अब स्थितियाँ

तेजी से बदली हैं और आज हमारे पास बहुत से विकल्प उपलब्ध हैं, और प्रायः हर
प्लेटफॉर्म चाहे विंडोज़9x / विंडोज़-एक्सपी हो या लिनक्स, के लिए अँग्रेज़ी-हिंदी

शब्दकोश उपलब्ध हैं. आइए कुछ ऐसे ही हिंदी के मुक्त शब्दकोश कंप्यूटर प्रोग्रामों
तथा ऑनलाइन औज़ारों के बारे में चर्चा करते हैं और देखते हैं कि अपने लिए क्या

उपयुक्त है.

उपयोग के लिए अँग्रेज़ी हिंदी शब्दकोश निम्न रूपों में उपलब्ध हैं:

1 कंप्यूटर में संस्थापन योग्य प्रोग्रामः



जहाँ कुछ व्यावसायिक अँग्रेज़ी - हिंदी शब्दकोश प्रोग्राम विंडोज़ प्लेटफॉर्म में
संस्थापन कर उपयोग में लिए जाने हेतु उपलब्ध हैं. वहीं कुछ ऐसे ही मुक्त प्रोग्राम

भी उपलब्ध हैं. व्यवसायिक प्रोग्राम जहाँ अनेक गुणों से युक्त हैं तथा उच्चारण,
व्याकरण, वाक्य विन्यास इत्यादि भी बताते हैं, मुक्त प्रोग्राम सीधे, सपाट होने के

बावजूद अच्छे और उपयुक्त हैं. विंडोज़ प्लेटफॉर्म के लिए एक मुक्त प्रोग्राम


फ्रीलेंग डिक्शनरी
के नाम से उपलब्ध है तथा इसी प्रोग्राम का कुछ

अतिरिक्त

हिंदी-अँग्रेज़ी शब्दों का डाटाबेस
भी मुक्त उपयोग हेतु उपलब्ध है. इस
प्रोग्राम में हिंदी अर्थ रोमन लिपि में ही दिए गए हैं. इस प्रोग्राम में यह भी

सुविधा है कि आप अपने शब्दकोश के डाटाबेस में सुविधानुसार परिवर्तन / परिवर्धन कर
सकते हैं. आम उपयोग के प्रायः सभी शब्द तो इसमें मिल जाते हैं, परंतु फिर भी यह

शब्दकोश अभी उतना उन्नत नहीं है.

2 डाउनलोड योग्य शब्दकोश फ़ाइलें:

जालघर में अँग्रेज़ी-हिंदी-अँग्रेज़ी तथा अन्य भाषाओं की शब्दकोश फ़ाइलें डाउनलोड कर

मुक्त उपयोग में लेने हेतु भिन्न रूपों में उपलब्ध हैं. इन फ़ाइलों की खासियत यह है
कि आप इन्हें किसी भी प्लेटफॉर्म में उपयोग कर सकते हैं. उदाहरण के लिए एचटीएमएल,

टेक्स्ट तथा पीडीएफ़ शब्दकोश फ़ाइलों को आप क्रमशः किसी भी ब्राउजर, पाठ संपादक या
पीडीएफ़ फ़ाइल प्रदर्शक के द्वारा विंडोज़ / लिनक्स के किसी भी संस्करण में उपयोग

में ले सकते हैं. इन फ़ाइलों में शब्दकोश प्रोग्रामों की तरह शब्दों को ढूंढने की
ठीक-ठीक सुविधा तो नहीं मिल पाती है, परंतु फिर भी शब्द अकारादि क्रम में होने के

कारण उन्हें ढूंढने में ज्यादा कठिनाई भी नहीं होती. हाँ इतना अवश्य होता है कि ये
फ़ाइलें काफ़ी बड़ी होती हैं (300-400 पृष्ठों से अधिक) अतः इन्हें लोड होने में

आरंभिक समय अधिक लग सकता है. कुछ अच्छे अँग्रेज़ी हिंदी शब्दकोश फ़ाइलों के विवरण
निम्न हैं जिन्हें उनके साथ दिए लिंक को क्लिक कर डाउनलोड किया जा सकता हैः


हिंदी-अँग्रेजी का एक सरल सा शब्दकोश


पीडीएफ़ फ़ॉर्मेट
में उपलब्ध है जिसे



यहाँ
से भी डाउनलोड किया जा सकता है. पीडीएफ़ फ़ॉर्मेट में आपको यह
सुविधा मिलती है कि आपको हिंदी भाषा के फ़ॉन्ट इत्यादि की समस्याओं से जूझना नहीं

पड़ता. यही शब्दकोश


पोस्टस्क्रिप्ट फ़ॉर्मेट
में तथा


आईट्रान्स
रूप में भी उपलब्ध है जिन्हें सुविधानुसार डाउनलोड कर उपयोग

किया जा सकता है.

अन्य कई फ़ाइल फ़ॉर्मेट
में भी यही शब्दकोश आपकी सुविधा के लिये उपलब्ध

किया गया है. यह एक उन्नत शब्दकोश है जो शब्दों से संपन्न है. एक अन्य हिंदी
अंग्रेज़ी शब्दकोश


शब्दांजलि
के नाम से जारी किया गया है जिसमें भी शब्दों का अच्छा खासा
संग्रह है. यह शब्दकोश



ऑनलाइन
उपयोग हेतु भी उपलब्ध है. परंतु इसे देखने या इसका उपयोग करने
हेतु आपको अपने कंप्यूटर पर इस्की प्लगइन तथा आवश्यक फ़ॉन्ट संस्थापित करना होगा,

जिनके लिंक शब्दांजलि के जालघर पर उपलब्ध हैं. बनस्थली के मूल अँग्रेज़ी हिंदी
शब्दकोश का

यूनिकोड हिंदी

एचटीएमएल में परिवर्तित शब्दकोश

 इंडिकट्रांस के जालघर पर भी उपलब्ध है. अगर आप यूनिकोड हिंदी में
कार्य करते हैं तो यह शब्दकोश आपके लिए खासा सहायक होगा. यह शब्दकोश अँग्रेज़ी के

सही उच्चारणों को भी बताता है. एक अन्य शब्दकोश


अँग्रेज़ी-हिंदी-उर्दू
शब्दसूची के नाम से उपलब्ध है जिसमें उर्दू

शब्दों को भी समाहित किया गया है.

3 ऑनलाइन शब्दकोशः

कंप्यूटर में संस्थापन योग्य / फ़ाइल शब्दकोशों में यह सुविधा मिलती है कि इंटरनेट

से कनेक्ट हुए बिना ही उनका उपयोग किया जा सकता है. परंतु अगर आपके पास इंटरनेट
कनेक्टिविटी की अच्छी सुविधा है, तो ऑनलाइन शब्दकोशों का उपयोग अधिक उपयुक्त होगा.

ऑनलाइन शब्दकोश नित्य नए-नए शब्दों का समावेश तो करते ही हैं, आपको नई सुविधाएँ,
नए, सरल तरीके भी प्रदान करते हैं. अँग्रेज़ी-हिंदी-अँग्रेज़ी के कई अच्छे ऑनलाइन

शब्दकोश आपके उपयोग के लिए उपलब्ध हैं. जिसमें कुछ प्रमुख हैं

वर्डएनीव्हेयर

जहाँ आप एक साथ कई भाषाओं के शब्दकोशों का लाभ ले सकते हैं. इसका इंटरफेस

आसान है. बस वांछित शब्द को इसके इनपुट बक्से में भरिए, भाषाएँ नियत करिए और ‘गो’

बटन पर क्लिक करिए. थोड़े से अंतराल में वांछित शब्द का अर्थ प्रकट हो जाएगा. अभी
यह हिंदी को रोमन में प्रदर्शित करता है. संभवतः हिंदी के फ़ॉन्ट इत्यादि समस्या से

बचने तथा प्लेटफ़ॉर्म उपयुक्तता के लिए. एक अन्य ऑनलाइन शब्दकोश


डिजिटल डिक्शनरीज़ ऑफ़ साउथ एशिया
के नाम से है, जो आपको शब्दों को

भिन्न प्रकार से ढूंढने में भी सहायता प्रदान करता है. यहाँ आप शब्दों को उसके
प्रारंभिक अंतिम या मिश्रित अक्षरों द्वारा ढूंढ सकते हैं. इस साइट पर यूनिकोड (तथा

उसके बगैर भी) पर काम करने की सुविधा है. एक ऑनलाइन अँग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोश


यूनिवर्सल वर्ड हिंदी लेक्सिकन
आईआईटी मुम्बई के द्वारा उपलब्ध कराया

गया है जिसे कि मूलतः मशीन आधारित हिंदी से अँग्रेज़ी मे अनुवाद हेतु तैयार किया
गया है. इसे हिंदी भाषा के विश्वकोष के रूप में


हिंदी शब्दतंत्र

 के नाम से विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है. वर्तमान में इसके

शब्दकोश में 91 हजार से भी ज्यादा अंग्रेज़ी शब्दों के हिंदी में अर्थ दिए गए हैं.
व्यवसायिक रूप में जारी अक्षरमाला अँग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोश का मुक्त


ऑनलाइन संस्करण

 भी उपलब्ध है.


शब्दकोश डाट कॉम
के नाम से एक विशुद्ध अँग्रेज़ी-हिंदी ऑनलाइन शब्दकोश

भी अपने सरल इंटरफेस सहित जालघर में आपके मुक्त उपयोग हेतु उपलब्ध है.

अब, आपका प्रश्न होगा कि भई, गाली गलौज, अप्रिय भाषा का भी कोई शब्दकोश है? तो, जी

हाँ, जालघर पर वह भी उपलब्ध है. विश्व की तमाम अन्य भाषाओं सहित अपनी खालिस हिंदी (रोमन

लिपि) में भी, वैकल्पिक शब्दकोश (
आल्टरनेटिव डिक्शनरीज़
) के रूप में. तो, अबकी, यदि आपको किसी का कहा

सुना समझ नहीं पड़े, तो सीधे रूख करिएगा इन शब्दकोशों की ओर.

 


बधाईयाँ. अंततः प्रिंट मीडिया में भी अपने हिंदी ब्लॉग (ब्लांग? जैसा कि छपा है, पर

उम्मीद है यह प्रूफ़ की गलती है - क्यों गौरी पालीवाल जी?) की चर्चा हो रही है.कादम्बिनी

के नवंबर 04 अंक में नुक्ता-चीनी, अभिव्यक्ति तथा प्रतीक-पुनीत के हिंदी ब्लॉग की चर्चा रही. आइए,

उम्मीद करें कि एक दिन हमारे हिंदी ब्लॉग प्रिंट मीडिया से ज़्यादा पढ़े जाएँगे.

निम्न ग़ज़ल उसी पत्रिका की समस्या 'मुस्कराओ' की पूर्ति है.

*****
ग़ज़ल
***

बात तो तब है जब दर्द में मुस्कराओ
चाहे चीत्कारो भीतर बाहर मुस्कराओ

नायाब दोस्तों की ये फ़ितरत है नई
भोंक के खंजर वो कहते हैं मुस्कराओ

सियासती चालों ने मजबूर किया है
बिसूरती हालातों में तुम मुस्कराओ

गुजरनी है ज़िंदगी जब आँसुओं में
हिचकियों के बीच तनिक मुस्कराओ

सीख लो जमाने से कुछ आदतें रवि
पर-पीड़ा में तुम भी तो मुस्कराओ

अँधेरा ही अँधेरा
*******

भारत के प्रायः सभी राज्य बिजली की घोर कमी से जूझ रहे हैं तथा पापुलर वोट बैंक के चलते किसानों को मुफ़्त बिजली देने के चक्कर में कई बिजली बोर्ड दीवालिया हो चुकने के कगार पर हैं. बिजली में

राजनीतिक व्यवधानों के बीच एक खबर यह है कि भिंड के जिला अस्पताल के बिजली बिल के बकाया भुगतान नहीं होने के कारण वहाँ की बिजली काट दी गई. बिजली के अभाव में उचित उपचार नहीं मिलने

के कारण वहाँ चार लोगों की मौत हो गई.
एक दूसरी खबर मज़ेदार है. ग्यारह हजार वोल्ट की बिजली के ट्रांसफार्मर को बिजली के खंभे पर लगाने के कई कायदे क़ानून हैं जिसमें सुरक्षा से लेकर विद्युत अभियांत्रिकी तक की बातें सम्मिलित हैं. परंतु

इन्हें धता बताते हुए एक गांव में ऐसे ही एक ट्रांसफार्मर को बैलगाड़ी के ऊपर रख कर चालू कर लिया गया है (बिजली कर्मचारियों के पास समय और उपकरणों का अभाव है) और बैलगाड़ी पर रखा यह

ट्रांसफार्मर बेखटके पिछले डेढ़ माह से कार्य कर रहा है. ठीक ही कहा गया है – आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है- बैलगाड़ी पर रख कर 11 हजार वोल्ट के ट्रांसफार्मर को चार्ज कर काम में लेने का
कार्य नायाब है और इस हेतु बिजली कर्मचारियों को इनाम दिया जाना चाहिए (किसी को क्या फ़र्क़ पड़ता है कि बेचारे गाँव वासी दुर्घटना की आशंकाओं के बीच जीने को मजबूर हैं).

***
ग़ज़ल
***

आखिर किधर से आया अँधियारा है
पास में बच रहा सिर्फ अँधियारा है

अब तो बन गई है आदत अपनी
कटते नहीं दिन बिना अँधियारा है

मालूम है मेरी मासूमियत फिर क्यों
पूछते हैं किसने फैलाया अँधियारा है

अब ये कैसा समय आया है दोस्तों
जलाओ दीप तो फैलता अँधियारा है

औरों का तो मालूम नहीं लेकिन
रवि का दोस्त बस एक अँधियारा है
*+*+*

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