September 2004

दाल में मेंढक?
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दोस्तों, अपनी पिछली कुछ पोस्टिंग में मैने स्कूलों में मध्याह्न भोजन की व्यवस्था पर कुछ लेखनी चलाई थी (माफ़ कीजिएगा, कम्प्यूटर के कुंजी-पट की कुछ कुंजियाँ दबाईँ थी). उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हैं. एक मज़ेदार घटना फ़िर हुई है. ज़रा नज़र दौड़ाएँ:



अब दाल में कुछ काला कहने के बजाए हमें दाल में कुछ मेंढक, छिपकली या कॉक्रोच कहना ज्यादा मुनासिब होगा. इस सिलसिले को आगे भी जारी रखेंगे. बस उपयुक्त खबरों का इंतजार रहेगा.

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ग़ज़ल
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अर्थ तो क्या पूरे वाक्यांश बदल गए
जाने और भी क्या क्या बदल गए

गाते रहे हैं परिवर्तनों की चौपाइयाँ
बदला भी क्या ख़यालात बदल गए

मल्टीप्लेक्सों के बीच जूझती झुग्गियाँ
नए दौर के तो सवालात बदल गए

देखे तो थे सपने बहुत हसीन मगर
क्या करें अब तो हालात बदल गए

कब तक फूंकेगा बेसुरी बांसुरी रवि
तेरे साथ के सभी साथी बदल गए

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रोड शो २
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दोस्तों, यह जो चित्र आप देख रहे हैं वह भारत के एक प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग - आगरा मुम्बई (एबी रोड) मार्ग पर हुए चक्का जाम का है. चक्का जाम में वाहनों की २० किलोमीटर लंबी कतार में ट्रक, जीप,कार, बस और अन्य वाहन फंसे हुए दिखाई दे रहे हैं. यह जाम पिछले ४८ घंटों से लगा हुआ था और इन पंक्तियों के लिखने तक जारी था...



पर मज़ेदार बात यह है कि यह जाम किसी प्राकृतिक विपदा या घटिया निर्माण के चलते किसी पुल टूटने इत्यादि के कारण नहीं लगा. यह जाम बहुत ही मजेदार तरीके से, हमारे इंडियन चलताऊ एटीट्यूड के कारण लगा. दरअसल किसी प्रकरण के सिलसिले में न्यायालय ने आदेश दिया कि महाराष्ट्र से आने वाले सभी ट्रकों को तुलवाया जाए ताकि ट्रकों में ओवरलोडिंग कानूनन रोकी जा सके. सामान्य भारतीय ट्रकें जो १५-२० टन के लिए डिज़ाइन होती हैं, उनमें २५-३० टन सामान लादना आम बात है. अब चाहे पर्यावरण को लगे चूना या खस्ताहाल सड़कें और हों बदहाल इससे क्या? बहरहाल, सरकारी बाबुओं ने आनन फानन उस आदेश पर अमल किया कि कोई भी मालवाहक वाहन बिना तुलवाई किए बार्डर पार न हो सके. पर अदूरदर्शिता देखिए कि नाके पर सिर्फ एक ही तौल काँटा लगा है, वह भी बिजली से चलता है, जिसके आने जाने का ठिकाना मध्य प्रदेश में नहीं है. उसमें एक ट्रक को तौलने में कम से कम पाँच मिनट लगते हैं. उस मार्ग पर वाहनों का दबाव इतना है कि प्रति दूसरे मिनट एक मालवाहक वाहन गुजरता है. अब बताइए, जाम लगेगा कि नहीं? और यह जाम कभी खत्म होगा? नतीजतन भारतीय जनता जो इसमें दुर्भाग्य से फंस गई मूर्ख बनी इस जाम को भुगतती रही, और हम आप इन खबरों को पढ़ कर द्रवित होते रहे और अपनी सड़ी गली व्यवस्था को कोसते रहे.

इस तरह की विपदाओं को, दोस्तों, हमें कोई नया नाम देना होगा. क्या ख़याल है आपका?

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ग़ज़ल
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व्यवस्था को कोई नया नाम देना होगा
बहुत हो चुका अब कुछ काम देना होगा

संभल सकते हो तो संभल जाओ यारों
नहीं तो फिर बहुत बड़ा दाम देना होगा

दिन के उजालों में क्या करते रहे थे
अब इसका हिसाब हर शाम देना होगा

इस मुल्क में कब किसी शिशु का नाम
रॉबर्ट न रहीम और न राम देना होगा

हरियाली तो आएगी रवि पर शर्त ये है
हिस्से का एक टुकड़ा घाम देना होगा

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घाम = धूप (छत्तीसगढ़ी)

कहानी करोड़ी मल की
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नीचे दी गई छवि की कड़ी को क्लिक करने पर आपको दिखाई देगी भ्रष्टाचार से कमाई गई करोड़ों रूपयों के नोटों की गड्डियाँ:



ये गड्डियाँ हाल ही में एक्साइज़ विभाग के एक अफ़सर के पास से नक़द बरामद की गई है. उस अफ़सर को हिरासत में लेते ही ज़ाहिर है, सीने में तक़लीफ़ हुई और वह जेल के बजाए अस्पताल में आराम फ़रमा रहे हैं.

ऐसे करोड़ी मल की कहानियाँ भारत देश में कई हैं. पूर्व में एक पूर्व केंद्रीय मंत्री के घर से सात करोड़ रूपए नक़द मिले थे. सीबीआई के उस वक्त के निर्देशक जोगिंदर सिंह का कहना था कि उन्होंने अपनी जिंदगी में उससे ज्यादा रूपए कभी नहीं देखे. वे महानुभाव आज भी राजनीति में सक्रिय हैं और कहीं मंत्री संत्री भी हैं! ऐसी कई कहानियाँ तो अभी भी कई होंगी और ढंकी छुपी होंगी.

करोड़ी मलों की ऐसी कहानियाँ भारत के अलावा शायद ही कहीं और सुनने को मिलें.
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ग़ज़ल
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दीनो-ईमान बिक रहा कौड़ियों में
नंगे खेल रहे हैं रूपए करोड़ों में

फ़ोड़ डाली हैं सबने आँखें अपनी
सियासत बची है अगड़ों पिछड़ों में

किस किस के चेहरे पहचानोगे
अब सब तो बिकता है दुकानों में

कोई और दौर था या कहानी थी
सत्यता गिनी जा रही सामानों में

लकीर पीटने से तो बेहतर है रवि
जा तू भी शामिल हो जा दीवानों में

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सड़कों पर सर्कस
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भारतीय सड़कें आज़ीवन ख़स्ताहाल रहने को अभिशप्त तो हैं हीं, कहीं उनका नामोनिशाँ काग़जों पर ही रहता है तो कहीं गड्ढों और खड्ढों पर. तारीफ ये है कि इन पर भी हम आराम से अपनी यात्रा पूरी करते हैं. और कोई चूं नहीं करता. जरा इस छवि पर ग़ौर फ़रमाएँ:



यह कोई सर्कस का कमाल या गिनीज़ बुक में अपना नाम दर्ज कराने का प्रयास नहीं है. वरन् यह है भारतीय दारूण ट्रैफिक का जीवंद दृश्य. एक ही जीप में २५ से ३० यात्री सवार! (सामान्य स्वीकृत डिज़ाइन ९-१० यात्रियों के लिए है). कारण अनेकों हैं, पर मुख्य हैं यातायात विभाग में फैला आकंठ भ्रष्टाचार. उचित संख्या में परमिट जारी नही किए जाते, चेकिंग के नाम पर अवैध वसूली आम बात है (किसी पिछली पोस्टिंग में इस बात का जिक्र है). जहाँ एक ओर दिल्ली मुम्बई में पर्यावरण के मद्देनज़र आटो - टैक्सियों में सीएनजी की अनिवार्यता है, वहीं छोटे शहरों में अधिसंख्य आटो टैम्पो केरोसीन से चलते हैं जो अस्वास्थ्यकर धुँआ छोड़ते हैं. यह है एक और एक्सट्रीम उदाहरण...

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ग़ज़ल
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ये वो रास्ता तो नहीं था
उठा था गया तो नहीं था

हँसी देख गुमा होता है
कोई ख्वाब तो नहीं था

प्रतिदिन परीक्षा फिर कोई
अंतिम जवाब तो नहीं था

खोने का गम क्यों हो
कुछ पाया तो नहीं था

सुधरे कैसे रवि जब कोई
कुछ करता तो नहीं था

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विचित्र कथा
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दोस्तों, यह कथा बड़ी विचित्र, परंतु सत्य है. भारतीय सेना से कुछ जवान कारगिल युद्ध के दौरान लापता हो गए थे जिन्हें सेना ने भगौड़ा घोषित कर दिया था. उनमें से एक मोहम्मद आरिफ़ भी था. उसकी नई नई शादी हुई गुड़िया से हुई थी. चूंकि आरिफ़ भगौड़ा घोषित हो गया और उसका कोई अता पता नहीं था, गुड़िया की शादी तौफ़ीक से कर दी गई. इस बीच खबर मिली कि आरिफ़ पाकिस्तान में युद्ध बंदी है. वह शीघ्र ही रिहा हो गया, तथा सेना ने भी अपनी ग़लती सुधार ली.
मगर, कहानी में ट्विस्ट यहाँ से शुरू होती हैः धर्माचार्यों, गांववासियों, पंचायत तथा अभिभावकों ने तय किया कि चूंकि आरिफ़ ने कभी भी गुड़िया को तलाक़ नहीं दिया था, अतः उसकी तौफ़ीक से हुई शादी शरीयत के अनुसार अवैध है लिहाजा उसे तौफ़ीक को छोड़कर आरिफ़ के पास वापस आना होगा.
इधर, आरिफ़ की शर्त है कि वह गुड़िया से मुहब्बत तो करता है, मगर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे जो तौफ़ीक का है, उससे नहीं. गुड़िया को उसके अपने बच्चे को कहीं और छोड़ कर उसके पास आना होगा.
एक बच्चे, और एक माँ के दिल के लिए, या ख़ुदा, तूने ऐसी शरीयत क्यों बनाई? या तेरे बन्दे तेरी वाणी का अर्थ ग़लत निकाल रहे हैं?

ग़ज़ल
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अब सूरज को भी दीप दिखानी होगी
शायद कल कोई सुबह सुहानी होगी

क़लम सियाही और वही पुराने काग़ज
तब तो दुहराई गई वही कहानी होगी

सियासती खेल ने तोड़े हैं सब नियम
धावकों तुम्हें चाल नई सिखानी होगी

धर्म की शरण में कुछ और ही मिला
ता-उम्र हमें अपनी जख़्म छुपानी होगी

एक मर्तबा ही गया रवि ग़रीबों में
सोचता है उसकी नज़्म रूहानी होगी

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पुलिसः भाग २
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मैंने अपनी पिछली पोस्टिंग में पुलिस के बारे में लिखा था. उस कड़ी को आगे बढ़ाते हैं. एक और अख़बार की क़तरन पर जरा नज़र डालिएः



Nirbhay_Gujjar
Originally uploaded by raviratlami.
पुलिस स्टोरी२



इंसपेक्टर जनरल रिज़वान अहमद ने डायरेक्टर जनरल को रपट दी है कि २३ पुलिस मैन डकैत निर्भय गुज्जर के पे-रोल पर हैं. और व्यवस्था कुछ नहीं कर पा रही. यही वज़ह है कि निर्भय डकैतियाँ और फ़िरौती करता तो घूम ही रहा है, वह खुले आम मीडिया (टीवी चैनल सम्मिलित) को अपना इंटरव्यू देता फिर रहा है कि वह राजनीति में धमाके के साथ प्रवेश करने वाला है!
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एक माइक्रॉन मुस्कान
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महाराष्ट्र और बिहार में चुनावी सरगर्मियाँ तेज़ हो गईं हैं. मेरा पुत्र जो कक्षा नवीं का छात्र है, उसने मुझसे पूछा कि आपको अगर चुनाव में लड़ना हो, तो आप कौन सा चुनाव चिह्न लेंगे? उसे स्कूल में इस विषय पर बोलना था, और वह कुछ विचारों पर काम कर रहा था. मेरे दिमाग में तत्काल बिज़ली सी कौंधी. अगर मैं चुनाव में लड़ता तो कौन सा चुनाव चिह्न लेता?

मेरा चुनाव चिह्न होता डंकी (गधा नहीं). वज़हें ख़ूब सारी हैं-
।। डंकी कुछ पढ़ा लिखा नहीं होता. हमारे मंत्रियों, संसद/विधान सभा सदस्यों के लिए भी पढ़ा लिखा होना अनिवार्य नहीं है.
।। वोटरों को जाति, धर्म, पैसा इत्यादि के आधार पर डंकी बनाया जाता रहा है
।। समग्र देश के विकास के लिए राजनीति में कोई काम नहीं करता. सब अपनी कंस्टीट्यूएन्सी, अपनी सीट बचाए रखने के हिसाब से काम करते हैं. डंकी भी अपना पेट भरने की ख़ातिर ही काम करता है अन्यथा नहीं.

दोस्तों, नीचे की कुछ अख़बारी क़तरनों पर जरा गौर फ़रमाइयेगाः



ज़ाहिर है, भारतीय पुलिस की छवि अगर लोगों के मन में अच्छी नहीं उतर पाती है तो इसके लिए जिम्मेदार वे तो हैं ही, बहुत कुछ यहाँ की व्यवस्था भी जिम्मेदार है. यहाँ की पुलिस के कार्य घंटे और कार्य वातावरण अत्यंत अमानवीय है. वे सबसे कम तनख्वाह पाते हैं और सबसे कठिन ड्यूटी बजाते हैं. कार्य हेतु प्रायः उन्हें कोई सुविधा नहीं मिलती. एक सिपाही बिना किसी सपोर्ट के 8 घंटे से लेकर 16-18 घंटे तक ड्यूटी बजाता है, नतीजतन उसे सबसे सुरक्षित और आसान रास्ता नज़र आता है वह होता है भ्रष्टाचार का. वह पास के चाय की दुकान से मुफ़्त की चाय और नाश्ते का हकदार हो जाता है. उसके बगैर उसका काम चलना मुश्किल होता है. यह तो मानवीय पहलू है, परंतु जब यह अनिवार्य आवश्यकता से आगे जा कर पैसे की भूख में परिवर्तित हो जाता है तो वह भारत देश का नासूर बन जाता है.

एक सर्वेक्षण के मुताबिक वैसे भी, भारतीय पुलिस से आम जनता डरती हैं. उसे वह अपना संरक्षक के बजाय भक्षक समझती है. वजह? ऊपर की अख़बारी क़तरनें हमें कुछ संकेत तो देती ही हैं...

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ग़ज़ल
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मुल्क के संरक्षक ही भक्षक हो गए
आस्तीं के साँप सारे तक्षक हो गए

कहते हैं बह चुकी है बहुत सी गंगा
जब से विद्यार्थी सभी शिक्षक हो गए

गुमां नहीं था बदलेगी इतनी दुनिया
यहाँ तो जल्लाद सारे रक्षक हो गए

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कुत्ते मैं तेरा ख़ून पी जाऊँगा...
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यह कोई फ़िल्मी डायलॉग नहीं है जो धर्मेंद्र अजीत को स्क्रीन पर देता है. यह तो आज के राजनीतिज्ञों की डिफ़ॉल्ट भाषा बनती जा रही है.



कुछ नमूने आपके लिए प्रस्तुत हैं-

।। मनमोहन सिंह शिखंडी हैं - यशवंत सिन्हा

।। अमर सिंह दलाल है - लालू यादव

।। लालू मसख़रा है - अमर सिंह

।। बीजेपी अजगर है और उसके साझा दल मेंढक और चूहे - लालू यादव

।। अटल बिहारी धृतराष्ट्र है - काँग्रेस का एक नेता

।। आडवाणी अंतर्राष्ट्रीय भगोड़ा है - लालू यादव

इनकी भाषाओं पर अब हम हँसें, रोएँ, अपना सिर नोचें या फ़िर अपन भी इनकी गाली मंडली में शामिल हो जाएँ?

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ग़ज़ल
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राजनीति अब शिखंडी हो गई
सियासती सोच घमंडी हो गई

सोचा था कि बदलेंगे हालात
ये क़ौम और पाखंडी हो गई

भरोसा और नाज हो किस पे
व्यवहार सब द्विखंडी हो गई

अब पुरूषार्थ का क्या हो रवि
राजशाही सारी शिखंडी हो गई

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कोई ताक़त इन्हें देश को बर्बाद करने से नहीं रोक सकती...

दोस्तों, यह है आज के अख़बार की ताज़ा सुर्खी-



सचमुच, जब भारत देश के फ़ौलाद मंत्री जिनका ख़्वाब बिहार में लालू को उखाड़ कर अपना राज जमाना है, यह कहते हैं तो हमें उनपर विश्वास करना ही होगा.(मनमोहन ने मंडल के लिए मंत्रियों का एक समूह भी गठित किया है जो इस बारे में एक कार्य योजना तैयार कर रहा है)

पर, क्या आपको अंदाज़ा है कि आने वाले दिनों की सुर्खियाँ क्या हो सकती हैं?
प्रस्तुत है कुछ कपोल कल्पनाएँ:

।। १५ अगस्त सन् २०१०: कोई ताक़त सेना (आरक्षण से अब तक अछूता है, जाने क्यों?) में आरक्षण व्यवस्था को नहीं रोक सकती.

।। २६ जनवरी सन् २०१५: कोई ताक़त मंत्री पदों में (आरक्षण से अब तक अछूता है, जाने क्यों?) में आरक्षण व्यवस्था को नहीं रोक सकती.

।। २ अक्टूबर सन् २०२०: कोई ताक़त आपकी आय (Income) (आरक्षण से अब तक अछूता है, जाने क्यों?) में आरक्षण व्यवस्था को नहीं रोक सकती.(पिछड़ों को अगड़ों की तुलना में समान कार्य पर ज्यादा आय अर्जित करने की पात्रता होगी. यह जुदा बात होगी कि पिछड़ों का पिछड़ापन से कोई लेना देना नहीं होगा, वरन् यह आधार वोट बैंक होगा)

।। ३० जनवरी सन् २०२५: कोई ताक़त मर्द-औरत में प्यार (आरक्षण से अब तक अछूता है, जाने क्यों?) में आरक्षण व्यवस्था को नहीं रोक सकती.(पिछड़ों को अगड़ों के औरत-मर्दों से जब मर्जी प्यार करने की छूट होगी. आख़िर वे सदियों से अगड़ों के अत्याचार के शिकार होते रहे हैं. परंतु, यहाँ भी यह जुदा बात होगी कि पिछड़ों का पिछड़ापन से कोई लेना देना नहीं होगा, वरन् यह आधार ख़ालिस वोट बैंक होगा)

।। २ फ़रवरी सन्२०३०: सभी कम्प्यूटर प्रोग्रामों तथा कोड में आरक्षण लागू...

शायद मेरी कल्पना ज़रा ज्यादा ही छलांग लगा गई, पर आप इनके पीछे छुपे व्यंग्य को देखें. शब्दों पर न जाएँ.
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ग़ज़ल
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कोई बात कहता मंडल है
किसी के पास कमंडल है

ये देश तो दोस्तों देखिए
बन गया रद्दी का बंडल है

ख़वाहिशें हैं दूर जाने की
और अपना पथ कुंडल है

ये साँसें कैसे चलेंगी रवि
हवा हीन जो नभ-मंडल है

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कवि कुटिलेश की गड़बड़ दोहावली
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दोस्तों, पिछले दिनों एक किताब पढ़नें में आई. किताब बहुत पुरानी थी, सन् १९५३ की, कीमत एक रूपया! शायद उस समय एक रूपए की भी कीमत रही होगी. बहरहाल, किताब का शीर्षक है - गड़बड़ दोहावली.


शीर्षक देखकर ही ज़ेहन में आया कि कुछ गड़बड़ जरूर होना चाहिए. अंदाज़ा सही था. किताब एक ही बैठक में आद्योपांत पढ़ डाली. गड़बड़ दोहावली कमाल की है. और कमाल के हैं लेखक कवि कुटिलेश. भई, नाम भी कमाल का. कहीं कहीं दोहे अति साधारण भी हैं, पर कुटिलेश के पैने व्यंग्य आमतौर पर पाठक को मज़ा तो देते ही हैं, सोचने को भी मज़बूर करते हैं. आज मैं उसी दोहावली के कुछ दोहे आपके लिए प्रस्तुत करता हूँ-

दस के चाहे सौ करो, सौ के चाहे तीस ।
टोटल होना चाहिए, मगर चार सौ बीस ।।

जीवन है दिन चार का, खुल के खेलो खेल ।
बहुत हुआ हो जाएगी, थोड़े दिन को जेल ।।

भैया या संसार में, भांति भांति के लोग ।
भांति भांति के डाक्टर, भांति भांति के रोग ।।

मँहगाई चूल्हे पड़े, जायँ भाड़ में रेट ।
सदा ठाठ से पीजिए, बीड़ी या सिगरेट ।।

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, का के लागूँ पाँय ।
क्यों ना दो कप चाय ही, दीजै इन्हें पिलाय ।।

कल्हि करै सो आजकर, आजकरै, सो अब्ब ।
अब्ब गये, क्या करेगा, डूब जायगा सब्ब ।।

आँखों के संसार में, बड़ी निराली नीति ।
ज्यों ज्यों इन्हें लड़ाइये, त्यों त्यों बाढ़ै प्रीति ।।

साईं सब संसार में, पैसे का ब्यौहार ।
पैसे की तिथियाँ सभी, पैसे के त्यौहार ।।

कलि में कौड़ी मोल सब, सत्य वचन अनमोल ।
सदा मजे में रहेगा, झूठ बोल, कम तोल ।।

गधे मरे घोड़े मरे, मरि मरि गए श्रृगाल ।
महँगाई कब मरेगी, जिन्दा रहा सवाल ।।

रोटी भले न खाइये, पान लीजिए चबाय ।
भेद न भूखे पेट का, कोऊ सकिहै पाय ।।

सब को धोखा दीजिये, सब से लड़ो जरूर ।
हो जाओगे किसी दिन, शहर बीच मशहूर ।।

और अंत में, कवि कुटिलेश के सूफ़ियाना ख़यालात...

जगत पिता के पूत है, हम तुम औ सब कोय ।
इन बातों में क्या धरा, चेहरा रखिये धोय ।।

कहिए, आपको पसंद आई कवि कुटिलेश की कुटिलताएँ?
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लिनक्स वायरसः एक दुःस्वप्न
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विंडोज़ के लिए घटिया, रद्दी, वाहियात वायरस लिख-लिख कर जब उबकाई सी होने लगी तो ज़ेहन में बिजली सी कौंधी. चलो लिनक्स के लिए वायरस लिखा जाए. आखिर अब यह विंडोज़ के बाद दूसरे नंबर पर तो है ही अतः लोगों को ज्यादा न सही थोड़ा-मोड़ा नुकसान तो पहुँचाएगा ही सही. फटाफट एक ट्रोज़न हॉर्स लिखा जो रिमोट लिनक्स तंत्र में जा कर वहाँ के सीडी रॉम ड्राइव ट्रे को अंदर बाहर कर सकता था.

अब बारी आई उसके परीक्षण की. पर, अरे यह क्या? ट्रोज़न हॉर्स चलने के बजाए हर बार नए नए त्रुटि संदेश लेकर लौट आता था. जैसे कि तंत्र के /etc/fstab या mtab में कोई सीडी रॉम पारिभाषित नहीं है, कोई सीडी रॉम डिवाइस /dev में उपलब्ध नहीं है. या फ़िर सीडी रॉम ड्राइव सिर्फ रूट उपयोगक्ता के द्वारा ही माउन्ट / अनमाउन्ट किया जा सकता है. फ़िर ड्राइव माउन्ट / अनमाउन्ट करने के लिए अलग अलग अनुमतियों के कारण हर बार अलग अलग उपयोक्ताओं के पासवर्ड के त्रुटि संदेश ले आता था. ट्रोज़न चलने के बजाए यह भी त्रुटि बताता था कि सीडी रॉम ड्राइव माउन्ट / अनमाउन्ट नहीं किया जा सकता चूंकि उपकरण व्यस्त है. ख़ूब मगज़मारी के बाद भी बात नहीं बनी चूंकि हर दूसरे लिनक्स सिस्टम में या तो सीडी रॉम ड्राइव के माउन्ट होने की डिरेक्ट्री भिन्न होती थी, या अनुमतियाँ भिन्न मिलती थी या फ़िर वह उपयोक्ताओं के खाते में पारिभाषित ही नहीं होती थी! कुछ ख़तरनाक क़िस्म के, सुरक्षित लोगों ने तो कर्नेल मॉड्यूल में सीडी रॉम ड्राइव को शामिल ही नहीं किया था! मुझे ख़ासी कोफ़्त हुई. विंडोज़ के लिए दर्जनों वायरस चुटकी में लिख लेने वाला लिनक्स के लिए एक सड़ा सा ट्रोज़न नहीं लिख सकता! शर्म!शर्म!

अबकी बार मैं जबरदस्त तैयारी कर मैदान में उतरा और एक शानदार वायरस लिखा जो खुद-बखुद लिनक्स तंत्र में संस्थापित होकर वहां की फ़ाइलें नष्ट कर सकता था. पर यह क्या? परीक्षण के दौरान तो और भी अजीब - अजीब तरह की मुश्किलें आईं. किसी तंत्र में कम्पाइलर का कोई संस्करण संस्थापित नहीं था अतः वायरस सोर्स के द्वारा संस्थापित हो ही नहीं सकता था. कोई आरपीएम बाइनरी पैकेज़ को ही संस्थापना के लिए स्वीकार करता था तो किसी लिनक्स तंत्र में संस्थापना हेतु डेब पैकेज आवश्यक था. कहीं पर जीपीजी सुरक्षा कुंजी की आवश्यकता होती थी तो कहीं फ़ाइल डिपेंडेसीज़ के लफ़ड़े मिलते थे. मैंने यहाँ भी हार मान ली.

अंततः मैंने एक एक्स-विंडोज़ का वायरस लिखा. आख़िर विंडोज़ - एक्स विंडोज़ एक जैसे ही तो हैं.

अपनी जबर्दस्त चतुराई, समस्त कलाकारी और शैतानियत की पराकाष्ठा के उपयोग से मैंने अंततः एक्स विंडोज के लिए एक वायरस लिखा जो लिनक्स तंत्रों में घुसकर मारामारी मचा सकने की क्षमता रखता था. नेट पर वायरस जारी करने के बाद उसके द्वारा लोगों पर होने वाले असर के बारे में सोच सोच कर उत्तेजित, कंपित, उत्साहित और न जाने क्या क्या होता रहा. पर यह क्या? एक दिन बीता, दो दिन बीता, कई दिन बीत गए. कहीं कोई हलचल नहीं हुई, कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं हुई. ज़ाहिर सी बात थी अपना यह अभियान भी फ़ेल हो गया था. डरते डरते त्रुटियों की लॉग फ़ाइल खोली. पढ़ते पढ़ते रोना आ गया. हे भगवान! लिनक्स में तो तमाम तरह के विंडोज़ हैं. कोई टीडब्ल्यू एम उपयोग करता है, कोई ग्नोम २.४ तो कोई केडीई ३.२ वहीं किसी को एक्सएफ़सीई ४.२ का संस्करण पसंद है. लिहाज़ा मेरा वायरस हर जगह जाकर, क्यूटी, जीटीके और डबल्यूएक्स-विंडोज़ में कन्फ़्यूज़ होकर पैंगो बन जाता था कि इधर जाऊँ या उधर जाऊँ? किधर जाऊँ? कोई अपना एक्स-विंडोज़ वीटी ७ पर चलाता था तो कोई ४ पर या फिर ५ पर. कोई कोई तो एक साथ ही दो-तीन तरह के एक्स-विंडोज़ एक साथ ही वीटी ४,५,६,७ पर चला रहे होते थे तो किसी लिनक्स तंत्र का विंडो चलता हुआ दिखता तो कहीँ था, पर वह चलता कहीँ और रिमोट स्थान से था! विंडोज़ के नामी वायरस लेखक! लिनक्स में दिख गई तेरी औकात! रोते रोते मेरी हिचकियाँ बंध गईं.

तभी किसी ने मुझे झंझोड़ा. सपने में क्या कोई बग फ़िक्स नहीं हो रहा था क्या? पत्नी सुबह की चाय लेकर खड़ी थी. सुबह के क्षीण उजाले में उसका चिर प्रफ़ुल्लित चेहरा और भी निख़रा हुआ था. नहीं यार, दुःस्वप्न में तुम मुझसे बिछुड़ गई थीं- मैंने उसे अपनी ओर भींचते हुए कहा.
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सॉफ़्टवेयर समीक्षाः
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कंप्यूटर आधारित अँग्रेज़ी हिन्दी शब्दकोश
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लिनक्स के हिन्दी अनुवाद कार्य के दौरान अँग्रेज़ी शब्दों के उपयुक्त अर्थ तथा उतने ही उपयुक्त हिन्दी शब्दों को ढूंढने में खासी मुश्किलें आती रहीं. प्रायः अँग्रेज़ी शब्दों के अर्थ मोटे तथा भारी भरकम शब्दकोशों के पन्ने पलटने के उपरांत भी उचित प्रकार से मिल नहीं पाते थे चूंकि भिन्न शब्दकोशों का दायरा भिन्न होता है. ऐसे में, जब आप कंप्यूटर पर कार्य कर रहे होते हैं तो कंप्यूटर पर ही संस्थापित या ऑनलाइन क़िस्म के शब्दकोश आपको खासा राहत पहुँचाते हैं. यहाँ पर आपको भारी भरकम शब्दकोशों के पन्ने पलट कर शब्द-दर-शब्द ढूंढने की आवश्यकता नहीं होती. बस, दिए गए इनपुट फ़ील्ड में वांछित अँग्रेज़ी का शब्द भरा और आपके पास उसका हिन्दी शब्द, अन्य समानार्थी शब्दों सहित हाजिर. कंप्यूटर आधारित शब्दकोश न सिर्फ उपयोग में आसान होते हैं, बल्कि आपके कार्यों में तीव्रता भी लाते हैं. कुछ अच्छे, ऑनलाइन शब्दकोश इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं, पर इस हेतु आपको २४x७ ऑनलाइन होना पड़ेगा, जो प्रायः बहुतों को हासिल नहीं होता है. ऐसे में विकल्प एक ही बचता है- कंप्यूटर में संस्थापन योग्य अँग्रेज़ी-हिन्दी सॉफ़्टवेयर

कुछ समय पूर्व तक अँग्रेज़ी - हिन्दी शब्दकोश सॉफ़्टवेयर के रूप में उपलब्ध नहीं था, और, एकाध थे भी तो बगी होने के कारण वे उतने अच्छे और लोकप्रिय नहीं थे. परिस्थितियों में अब सुधार आया है और अब आपको आधा दर्जन अँग्रेज़ी - हिन्दी शब्दकोश सॉफ़्टवेयर मिल जाएँगे. पर इनमें से अधिकांश, जाहिर है, विंडोज़ के लिए ही हैं तथा इनमें से कुछेक लिनक्स में वाइन या क्रास-ओवर ऑफ़िस के द्वारा चल सकते हैं. प्रस्तुत है तीन भिन्न क़िस्म के अँग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश सॉफ़्टवेयर की समीक्षाः

शिप्रा कंप्यूलॉज़िक का अँग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोश
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यह शब्दकोश सॉफ़्टवेयर काफ़ी समय से प्रचलन में है. इसका सरल इंटरफेस इसे उपयोग में आसान बनाता है. इसमें कई छोटे छोटे विंडो हैं, जिनमे से एक इनपुट फ़ील्ड के लिए है, दूसरा एक जैसे अँग्रेज़ी शब्दों के लिए है तथा तीसरा संपूर्ण उपलब्ध शब्दावली के लिए है, जिसमें आप अकारादिक्रम से शब्दों को ढूंढ सकते हैं. जैसे जैसे आप अँग्रेजी शब्द के हिज्जे इसके इनपुट फ़ील्ड में भरते जाते हैं, यह गतिशील रूप में उससे मिलते जुलते आगे के हिज्जों वाले शब्दों को खुद ही नीचे के एक विंडो में छांट कर रखता है. अब यदि इसमें आपका वांछित शब्द उपलब्ध है, तो आपको पूरा हिज्जा भरने की ज़रूरत नहीं है. बस उस शब्द पर क्लिक करने से उसका अर्थ सबसे नीचे के विंडो में उपलब्ध हो जाता है. हालाँकि इसका शब्द भंडार उतना समृद्ध नहीं है, परंतु यह आपकी दैनिक ज़रूरतों को पूरा करने में समर्थ है. यह परीक्षित किए गए अन्य सभी शब्दकोशों से थोड़ा सा धीमा चलता है. इस सॉफ़्टवेयर के बारे में और अधिक जानकारी हेतु http://www.computantra.com पर जा सकते हैं या shipracomp@rediffmail.com से ईमेल से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं.

टर्टल का हिन्दी अँग्रेज़ी शब्दकोश संस्करण 1
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यह सॉफ़्टवेयर शब्दकोश अपने रूप विन्यास में शिप्रा कंप्यूलाज़िक के शब्दकोश का परिवर्धित रूप लगता है. चलने में यह थोड़ा सा तेज भी है. इसमें आपके पिछले, छांटे गए शब्दों के इतिहास को याद रखने की क्षमता भी है. इसका शब्दकोश भंडार भी ज्यादा समृद्ध है. इसका मदद तंत्र बहुत मज़ेदार है. जैसे ही आप हेल्प बटन पर क्लिक करते हैं, एक चित्रमय विंडो प्रकट होता है, जिसमें एक ही चित्र में वाक्यांशों तथा चिह्नों के माध्यम से इस सॉफ़्टवेयर के उपयोग के बारे में बताया गया है. हालाकि इसका इस्तेमाल आसान है, परंतु इसका मदद तंत्र लाजवाब है. शिप्रा कंप्यूलॉज़िक के शब्दकोश की तरह, इसमें भी, आपको सिर्फ अँग्रेजी शब्दों के हिन्दी अर्थ ही उपलब्ध हो पाते हैं, अन्य जानकारी यथा अँग्रेज़ी शब्दों के हिज्जे-उच्चारण इत्यादि नहीं, जो किसी शब्दकोश के आवश्यक अंग होते हैं. पब्लिक सॉफ़्ट द्वारा प्रस्तुत इस शब्दकोश के बारे में और अधिक जानकारी psl@nde.vsnl.net.in को ईमेल कर प्राप्त की जा सकती है.

बीपीबी अँग्रेज़ी हिन्दी टाकिंग डिक्शनरी
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यह शब्दकोश उच्च गुणवत्ता युक्त तथा ढेर सारी विशेषताओं से युक्त है. परंतु इसका एक ही ऋणात्मक पहलू है वह यह है कि यह मेक्रोमीडिया फ़्लैश / शॉकवेव पर आधारित है जिसके कारण यह पूरे स्क्रीन पर चलता है. अतः जब यह चलता है तो आपके विंडो पर इसका एकाधिकार हो जाता है, जो प्रायः अटपटा और उपयोग में अड़चनें पैदा करता है. चलाने पर हर बार एक प्रारंभिक वीडियो चलाता है, जो अनावश्यक है. इसका इंटरफ़ेस भरा-भरा सा है, उसकी भी आवश्यकता नहीं थी तथा उसे डिफ़ॉल्ट रूप से विंडो में ही चलना चाहिए, जबकि यह पूरे स्क्रीन पर ही चलता है, ऊपर से विंडो में चलाने का कोई विकल्प इसमें नहीं है. यह पुराने, कम गति वाले कंप्यूटरों पर चलने में समस्याएँ पैदा कर सकता है, चूंकि इसमें मल्टीमीडिया भी है. इन बातों को छोड़ दें तो इसमें ढेर सी अच्छी और उपयोगी विशेषताएँ हैं. उदाहरण के लिए, जैसे कि नाम से ही प्रतीत होता है, यह अँग्रेज़ी शब्दों के शुद्ध उच्चारण बोल कर भी बताता है, (जिसे आप बन्द कर सकते हैं) तथा लिख कर भी बताता है. अँग्रेज़ी शब्दों के हिन्दी में अर्थ तो बताता ही है, उसके अँग्रेज़ी अर्थों को भी समझाता है. कुछ आम, प्रचलित संज्ञा शब्दों के चित्र भी दिखाता है. इसका शब्दभंडार भी खासा विशाल है. परंतु फिर भी आधुनिक तकनीकी शब्दावली का अभाव इसमें भी है. कुल मिलाकर यह शब्दकोश उपयोगी तो है. और अगर मुझे इनमें से किसी एक का चुनाव करना होगा, तो मैं इसको ही चुनना चाहूँगा.


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हिन्दी कंप्यूटिंग जगत से ख़बरों की कुछ कतरनें
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।। केडीई 3.2 हिन्दी का परिवर्धित, परिष्कृत संस्करण जारीः सराय, दिल्ली के प्रायोजन में केडीई 3.2 हिन्दी का रूप दर्जन भर से ज्यादा लोगों की टोली ने सजाया-संवारा और अशुद्धियों को झाड़ा – पोंछा. नतीजतन, केडीई 3.2 हिन्दी अब अधिक आकर्षक, स्वीकार्य, निश्चित ही सरल, सुखद रूप में जारी किया जा चुका है.

।। माई जावा सर्वर पर हिन्दी ब्लॉग के संकलनः माई जावा सर्वर पर देबाशीष (http://nuktachini.blogspot.com ) ने बड़ी मेहनत से एक साइट तैयार किया है, जिसमें हिन्दी के विभिन्न लोकप्रिय ब्लॉग साइटों के संकलन, समीक्षाएँ इत्यादि तो उपलब्ध होते ही हैं, इसका जावास्क्रिप्ट वेब के ताज़ातरीन हिन्दी ब्लॉग्स को भी गतिमय रूप में दिखाता है. यहाँ पर आरएसएस फ़ीड से लेकर हिन्दी से संबंधित अन्य साइटों की उपयोगी कड़ियाँ भी आपको मिलती हैं. बानगी देखें http://www.myjavaserver.com/~hindi

।। रेडहैट का हिन्दी विभाग सक्रियः रेडहैट में कुछ समय से हिन्दी अनुवाद का कार्य चल रहा था, जो प्रायः रेडहैट कॉन्फ़िग फ़ाइलों तथा उनके अन्य दस्तावेज़ों और सहायक अनुप्रयोगों के लिए थे. अब एक अलग इकाई इसका काम देख रही है और इस काम में तेज़ी लाई गई है. उम्मीद है कि हमें शीघ्र ही रेडहैट का हिन्दी संस्करण उपयोग हेतु मिलेगा. मगर, रेडहैट को विशुद्ध हिन्दी-वाद से पूरी तरह बचना चाहिए. नहीं तो होगा यह कि मेनू में जब यह लिखा प्रकट होगाः “तंत्र प्रोफाइल में संचित संस्करण का अध्यारोहण करें” या कि “अधिष्ठापन के बाद, डिस्क पर द्विआधारी संकुलों को रखें” (संदर्भः रेडहेट जाल क्रम विन्यास, अगर आपमें से किसी पाठक को इन पंक्तियों का अर्थ माफ करें—मतलब समझ आया हो तो कृपया बताएँ) तब बेचारे मुझ जैसे आम कंप्यूटर उपयोक्ता को हिन्दी लिनक्स के उचित प्रकार से उपयोग करने से पहले हिन्दी की पढ़ाई में एम.ए. करना चाहिए होगा.

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एक माइक्रॉन मुस्कान
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क्या आपको पता है कि प्रोग्रामरों की एक टोली, सर्वज्ञ, सर्वज्ञानी लोगों के लिए एक ऐसा शब्दकोश सॉफ़्टवेयर विकसित करने की फ़िराक में है जिसके सभी पृष्ठ कोरे होंगे !

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