June 2004


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एक अखबार के संपादकीय में मैंने पढ़ा था कि नई सरकार ने जो कॉमन मिनिमम प्रोग्राम
बनाया है वह जो भी हो, अगर उसका नाम इंडिया डेवलपमेंट प्रोग्राम रखा जाता तो शायद
उसका ज्यादा और भला असर लोगों पर पड़ता.

बहरहाल, जो भी हो, एक बात पर सभी आंखें मूंदे हुए हैं. देश की बढ़ती जनसंख्या.
उपलब्ध रिसोर्सेज़ सीमित हैं, और जनसंख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है.
सीएमपी कहता है कि दस लाख रोज़गार पैदा (कहाँ से?) किए जाएंगे. मान लिया भाई, पर
जनसंख्या तो अगले साल बीस लाख बढ़ गई.... यह एक बहुत बड़ी समस्या है और अपने
तत्कालीन राजनीतिक लाभ के लिए कोई भी सरकार उस तरफ़ निगाह नहीं डालना चाहती.
जाहिर है, इस साधन सम्पन्न राष्ट्र के साधन कुछ ही वर्षों में जब कम पड़ने
लगेंगे तो अराजकता से निपटने हेतु हमारे पास कुल्हड़ों के सिवा कुछ न रहेगा. सारा
देश कुल्हड़ मय हो जाएगा. या शायद हमें शीघ्र ही सद्बुद्धि आएगी...

इसी समस्या को सोचते दिमाग में कुछ पंक्तियाँ आईं तो लिख डाली एक ग़ज़ल जो पेश
हैः
(एक स्वीकारोक्ति करूँ, तो एक स्वस्थापित (?) ग़ज़लकार ने मेरी ग़ज़लें पढ़
टिप्पणी की कि लिखने से पहले मैं कोई उस्ताद ढूंढूं - ग़ज़ल कहना सीखने के
लिए... भाई वाह. क्या सलाह है. मगर, मुझे कोई यह बताए कि फिर उसका उस्ताद कौन है
जिसने जमाने की पहली ग़ज़ल कही... हा..हा..हा..हा...)

ग़ज़ल

धुआं ही धुआं भरा है क्यों हर तरफ़
सवाल ही सवाल फैले हैं क्यों हर तरफ़.

आखिर क्यों नहीं इस मर्ज़ का इलाज
भीड़ की भीड़ मौजूद है क्यों हर तरफ़.

समाज, देश, विश्व की बातें भूल कर
सब अपनी भलाई में हैं क्यों हर तरफ़.

खाने, पीने, पहनने, ओढ़ने का क्या हो
बिकवालों की बस्ती है क्यों हर तरफ़.

अगरचे यहाँ जीना है मुश्किल तो फिर
मरना अधिक कठिन है क्यों हर तरफ़.

कहते हैं लोग कि कल हो न हो रवि,
फिर कल की चिंता है क्यों हर तरफ़.

आपके अमूल्य समय के लिए बहुत सारा धन्यवाद.
अपनी टिप्पणी अवश्य लिखें ताकि मेरी लेखनी को संबल मिलता रहे...

भाई संजय खत्री को उनकी टिप्पणी हेतु धन्यवाद. मेरे दिमाग में यह बात तो थी ही कि
अपनी भाषा में ब्लॉग लिखने में आई कठिनाइयों तथा अनुभव को लोगों को बताया जाए
ताकि सभी को अपनी भाषा में ब्लॉग लिखने में आसानी रहे. इसी बात को ध्यान में
रखते हुए मैंनें एक आलेख अंग्रेजी में लिखा है, जो आईटी पत्रिका (दिल्ली) के आने
वाले किसी संस्करण में प्रकाशित होगी. फिर भी, आपकी सुविधा के लिए यह लेख निम्न
यूआरएल पर उपलब्ध है, आप चाहें तो मार्ग दर्शन हेतु या सिर्फ मेरे अनुभव जानने
हेतु उसे पढ़ सकते हैं-
http://www.geocities.com/raviratlami/blog.htm


ई मेल से भेजी गई मेरी पिछली पोस्टिंग हवा में ही गायब हो गई. न तो पोस्ट हुआ न
ही वापस आया. लगता है कि कोई त्रुटि हो गई है. देखें कि यह भी आता है या नही
अन्यथा ऑन लाइन ही पोस्ट करना पड़ेगा.
विंडोज़ एक्सपी के आउटलुक से किया गया पोस्ट का शीर्षक ??? दिखाता है. इसका कारण
यह हो कि मेरे पास ऑफ़िस एक्सपी हिंदी नहीं है. हो सकता है कि नए संस्करण में यह
समस्या नहीं आती हो.
        बहरहाल, लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम से केमेल से किया गया पोस्ट बढ़िया रहा.
कहीं कोई समस्या नहीं आई. हिंदी वेब ब्लॉग्स आप केडीई के कॉन्क्वेरर ब्राउज़र से
बढ़िया देख सकते हैं. विंडोज़ में हिंदी देखने में तो कोई समस्या है ही नहीं, बस
आपका ऑपरेटिंग सिस्टम एक्सपी या उससे अद्यतन होना चाहिए.

ब्लॉग में पोस्टिंग ई मेल से भी संभव है, पर क्या यह हिंदी जैसी कॉम्पलेक्स भाषा
में संभव है जहाँ ऑपरेटिंग सिस्टम से लेकर ईमेल क्लाएंट तक से समस्या उठ खड़ी
होती है? अगर यह संभव है तो भई वाह क्या बात है. यह भी जाँच ब्लॉग ही है जो मैं
भिन्न ईमेल प्रोग्राम से और भिन्न ऑपरेटिंग सिस्टम से कर रहा हूँ...

--
Regards,
Ravi
**********
http://www.geocities.com/raviratlami
http://www.geocities.com/rekharatlami
**********
Life is no staright corridor... but a maze...
-Page 1, Who moved my cheese?

परीक्षण सफल रहा.
लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के मोज़िला ब्राउज़र में अक्षर सही नहीं आ रहे. इसका एक पैच्ड संस्करण है जो पैंगो फ़ॉन्ट्स को समर्थित करता है उसका उपयोग करना होगा. विंडोस में तो कोई समस्या ही नहीं है.

कल बहुत सी बातें लिखेंगे

मेरी हिंदी ग़ज़लें पढ़िए तब तक: http://www.geocities.com/raviratlami

नमस्ते !

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