बुधवार, 22 दिसंबर 2004

भारतीय भाषणबाजियाँ

भारत और भाषण
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इन्फ़ोसिस के नारायणमूर्ति कहते हैं कि नेताओं को भाषण देने के बजाए काम करना चाहिए. भारत में अब भाषणों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए.

बात वाजिब है. परंतु नेताओं का कोई काम भाषण के बगैर हो सकता है क्या? वे खांसते छींकते भी हैं तो भाषणों में. वे खाते पीते ओढ़ते बिछाते सब काम भाषणों में करते हैं. कोई उद्घाटन होगा, कोई समारोह होगा तो कार्यक्रम का प्रारंभ भाषणों से होगा और अंत भी भाषणों से होगा. संसद के भीतर और बाहर तमाम नेता भाषण देते नजर आते हैं, और उससे ज्यादा इस बात पर चिंतित रहते हैं कि उनकी बकवास को हर कोई ध्यान से सुने. दो रेलगाड़ियाँ आपस में भिड़ती हैं तो मांग की जाती है कि रेल्वे मंत्री वक्तव्य दें. कहीं कोई घोटाला होता है तो विरोधी चिल्लाते हैं कि प्रधानमंत्री वक्तव्य दें. राजनेताओं का तो खाना ही हजम नहीं होता होगा जब तक वे भाषण नहीं देते हों. मुझे तो लगता है कि कोई नेता अपनी प्रेयसी से प्रेम का इजहार भाषणों से ही करता होगा. आज भारत की पूरी सियासत वक्तव्यमय-भाषणमय हो गई है.

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ग़ज़ल
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गुम गया मुल्क भाषणों में
जनता जूझ रही राशनों में

नेताओं की है कोई जरूरत
दुनिया को सही मायनों में

इस दौर के नेता जुट गए
गलियारा रास्ता मापनों में

बदहाल क़ौम के धनी नेता
लोग घूम रहे हैं कारणों में

जिंदा रहा है अब तक रवि
और रहेगा बिना साधनों में

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