टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

पाठशाला बनाम भोजनशाला

पाठशाला बनाम भोजनशाला
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मैंने अपने पिछले कुछेक ब्लॉग्स में अदूरदर्शी नीति द्वारा पाठशाला को भोजनशाला बना दिए जाने के परिप्रेक्ष्य में कुछ प्रश्न उठाए थे. उसके समर्थन में कुछ नई घटनाएँ-
--जिला शाजापुर, म.प्र. के एक स्कूल में मध्याह्न भोजन में छिपकली गिर जाने से ९० बच्चे बीमार हो गए.
--सीहोर, म.प्र. के एक स्कूल में खराब सब्जी खाने से लगभग सवा सौ बच्चों की तबीयत बिगड़ गई.

शायद हमें कुछ और भी भयानक हादिसों के लिए तैयार रहना होगा...

ग़ज़ल
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गुजरे ऐसे कि हादिसे आदत बन गए
मदरसे हर प्रयोग के शहादत बन गए

ग़ली के गंवारों को न जाने क्या हुआ
सड़क में आकर बड़े नफ़ासत बन गए

रक़ीबों की अब किसको ज़रूरत होगी
अपने विचार ही जो खिलाफ़त बन गए

इश्क इबादतों का कोई दौर रहा होगा
धन दौलतें अब असली चाहत बन गए

प्रेम का भूख़ा रवि दर-दर भटका फिरा
क्या इल्म था इंसानियत आहत बन गए

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