म़जेदार मीडिया सुर्खियाँ

आज़कल की कुछ मज़ेदार मीडिया सुर्ख़ियाँ-
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-- केंद्रीय मंत्री शिबू सोरेन को अदालत ने भगौड़ा घोषित किया , गिरफ़्तारी का वारंट ज़ारी किया, पुलिस बल को उनके नहीं मिलने पर अदालत के आदेश की तामील के सिलसिले में वह वारंट उनके घर पर चस्पा करना पड़ा.

-- शहाबुद्दीन (संसद सदस्य, जो जेल में रहकर चुनाव लड़े और जीते) को हाईकोर्ट के आदेश के तहत वापस जेल भेजा गया तथा फास्ट ट्रेक कोर्ट के उस जज को बर्खास्त किया गया जिसने शहाबुद्दीन को आनन फ़ानन में जमानत दी थी. पूरे प्रकरण की सीबीआई जाँच के आदेश दिए गए.

-- पप्पू यादव (विधान सभा सदस्य) को भी, जेल में रहने के बजाए जो अपनी बीमारियों के इलाज हेतु पटना अस्पताल में भर्ती थे से वापस अदालत द्वारा बेऊर जेल भेजा गया.

-- प्रभुनाथ सिंह (संसद सदस्य) के लिए हत्या जैसे ज़ुर्म के सिलसिले में गिरफ़्तारी का वारंट जारी. उन्हें १० दिवस के भीतर आत्म समर्पण करने को कहा गया.

-- राजा भैया को यूपी में पुनः मंत्री बनाया गया जो पहले पोटा में बंद थे, जिनके घर से खतरनाक हथियार बरामद हुए थे, और जिनके विरूद्ध ३० से ज़्यादा प्रकरण अदालत में चल रहे हैं.

उक्त सुर्ख़ियाँ उत्तर भारत की हैं. शुक्र है, दक्षिण से ऐसी सुर्ख़ियाँ नहीं आतीं. दरअसल, इन सब के पीछे गहरा कारण रहा है. जनसंख्या घनत्व यूपी, बिहार में सर्वाधिक है. रिसोर्सेज़ कम हैं, और इनका न्यायसंगत वितरण तो असंभव है. लिहाज़ा अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए लोगों को हर प्रकार के अराजक कार्यों में लिप्त होना पड़ता ही है. मुझे याद है कि बीसेक साल पहले म.प्र. और बिहार के बार्डर रामानुजगंज में जहाँ रहता था, वहां इन दोनों राज्यों में कितनी ज़मीन आसमान की भिन्नताएँ थीं, जो बढ़ती ही गईं. उदाहरण के लिए, जो यात्री बसें दोनों राज्यों के बीच चलती थीं, उनमें म.प्र. के क्षेत्र में सभी यात्री गण बस के भीतर बैठते थे. पर जैसे ही बिहार की सीमा आती थी, समस्त पुरूष यात्री बस की छत पर बैठ जाते थे और कहते थे कि बस के भीतर तो वृद्ध-बीमार पुरूष, स्त्रियाँ और बच्चे बैठते हैं. उस समय म.प्र. में पूरे समय बिजली रहती थी, और बिहार में यदा कदा. बिहार में बिजली के ट्रांसफ़ार्मरों को डीपी पर वेल्ड कर लगाया जाता था नहीं तो चोर उसे तोड़ कर उसकी वाइंडिग के तांबे को निकाल कर बेच (लाखों रूपए का ट्रांसफ़ार्मर खराब कर मात्र कुछ रूपयों में) देते थे! उस दौरान कहावतें थीं कि बिहार का हर पैसे वाला घर अपनी सुरक्षा के लिए एक लठैत पाल रखता है.

पर, हम अब भी बढ़ते जनसंख्या घनत्व के कारण तेज़ी से बढ़ती अराज़कता की ओर आंखें मूंदे हुए हैं. भूखे व्यक्ति को कहीं से कुछ खाने को मिलेगा नहीं तो वह आत्म हत्या करेगा (आंध्र के किसान) या अपराध के सहारे अपनी रोटी का जुगाड़ करेगा.
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ग़ज़ल
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क्या मज़ाक है
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देश और समाज को देखूं क्या मज़ाक है
दो वक्त़ की रोटी नहीं ये कोई मज़ाक है

हौसले ले के तो पैदा हुआ था बहुत मगर
खड़े होने को जगह नहीं कैसा मज़ाक है

तमन्ना तो रही थी तुलसी कब़ीर बनने की
दाऊद, राजन जमाने का भीषण मज़ाक है

शाम से भूखे और सुबह आपका ये दावा
लाओगे कुल्हड़ में तूफ़ान बढ़िया मज़ाक है

असम, बिहार में बाढ़ और दिल्ली में गरमी
कभी तो बदले सिलसिला अच्छा मज़ाक है

देखे है रवि अपने भविष्य के सुनहरे सपने
लगता है किया किसी ने तुच्छ मज़ाक है

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