टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

June 2017

image

हिन्दी ब्लॉग सर्वेक्षण : परिणाम हाजिर हैं

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मई 08, 2009

चित्र

वैसे तो किसी सर्वेक्षण की सफलता या ये कहें कि उसकी परिशुद्धता उसके सैंपलिंग की मात्रा के समानुपाती होती है, तो इस आधार पर अनुमानित 10 हजार हिन्दी चिट्ठाकारों में से कम से कम 1 हजार चिट्ठाकार इस सर्वे में भाग लेते तो आंकड़ों पर दमदारी से कुछ कहा जा सकता था. फिर भी, इस सीमित सर्वेक्षण में कुछ ट्रैंड तो पता चले ही हैं. तो प्रस्तुत है हिन्दी ब्लॉग सर्वेक्षण के परिणाम:(1) हिन्दी चिट्ठाकारी में अचानक टपक पड़ने वाले अधिकांश (57.4%) का मानना है कि वे इंटरनेट सर्च के माध्यम से यकायक इस दुनिया से परिचित हुए. बहुत से चिट्ठाकारों ने अपने ब्लॉग का हर संभव प्रचार प्रसार अपने मित्रों के बीच किया, और वे भी अपने मित्रों (27.9%) को हिन्दी ब्लॉग दुनिया में खींच लाने में सफल हुए.एक चिट्ठाकार की मजेदार प्रतिक्रिया रही : हमें तो हिन्दी चिट्ठाकारी के बारे में पता ही नहीं था जी, अपने आप को फन्ने खां समझ रहे थे हिन्दी ब्लॉग चालू करके जब दूसरे लोगों ने आकर भ्रम तोड़ा!! ;)(2) चिट्ठाकारों के बीच हिन्दी में लिखने का सबसे सुलभ तरीका (52.5%), जाहिर है – फोनेटिक कुंजीपट ही बना हुआ है:(3) हिन्दी में लिखने के लिए चिट्ठ…

26 टिप्पणियां

पढ़ते रहें

विश्व के शीर्ष चिट्ठाकार क्या और कैसे चिट्ठे लिखते हैं....

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava जुलाई 29, 2007

चित्र

(डिजिटल इंसपायरेशन में अमित अग्रवाल ने पेज-व्यू के बारे में लिखा) (प्रोब्लॉगर में डेरेन रॉस ने पेज-व्यू के बारे में लिखा) क्या आपको पता है कि विश्व के शीर्ष क्रम के चिट्ठाकार क्या और कैसे लिखते हैं? मेरा मतलब है कि वे अपना विषय कैसे चुनते हैं? कैसे वे सोचते हैं कि कौन सा विषय उनके पाठकों को सर्वाधिक आकर्षित करेगा? खासकर तब, जब वे नियमित, एकाधिक पोस्ट लिखते हैं. मैं पिछले कुछ दिनों से विश्व के कुछ शीर्ष क्रम के ब्लॉगरों (अंग्रेज़ी के) के चिट्ठों को खास इसी मकसद से ध्यानपूर्वक देखता आ रहा हूँ, और मुझे कुछ मजेदार बातें पता चली हैं जिन्हें मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ. बड़े - बड़ों की कहानियाँ हथिया लें.इस बात की पूरी संभावना होती है कि शीर्ष क्रम के सारे के सारे चिट्ठाकार बड़ी कहानियों और बड़े समाचारों के बारे में चिट्ठा पोस्ट लिखें. बड़े समाचार को कोई भी शीर्ष क्रम का चिट्ठाकार छोड़ना नहीं चाहता. अब चाहे इससे पहले सैकड़ों लोगों ने उस विषय पर चिट्ठा लिख मारे हों, मगर फिर भी बड़े चिट्ठाकार उस विषय पर लिखते हैं कुछ अलग एंगल और अलग तरीके से पेश करते हुए – हालाकि वे कोई नई बात नहीं ब…

13 टिप्पणियां

पढ़ते रहें

ब्लॉगिंग एथिक्स बनाम कार्पेल टनल सिंड्रोम

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava फ़रवरी 09, 2007

चित्र

आप पूछेंगे कि दोनों में क्या समानता है?पहले पूरा आलेख तो पढ़िए जनाब. समानता है भी या नहीं आपको खुद-बख़ुद पता चल जाएगा.तो आइए, पहले बात करें कार्पेल टनल सिंड्रोम की. मेरे एक बार निवेदन करने पर ही फुरसतिया जी ने मेरी फ़रमाइश पूरी कर दी. उन्होंने दो-दो बार फ़रमाइशें दे कर मुझे शर्मिंदा कर दिया कि मैं कार्पेल टनेल सिंड्रोम के बारे में लिखूं. अब भले ही मैं कार्पेल टनल सिंड्रोम के बारे में ज्यादा बोलने बताने का अधिकारी नहीं हूं, मैं स्वयं मरीज हूँ - चिकित्सक नहीं, मगर उनका आग्रह तो मानना पड़ेगा.मगर, फिर, कार्पेल टनल सिंड्रोम के बारे में बात करने से पहले चर्चा कर ली जाए ब्लॉगों की - खासकर हिन्दी ब्लॉगों की. पिछला हफ़्ता हिन्दी ब्लॉगों के लिए कई महत्वपूर्ण मुकाम लेकर आया. एनडीटीवी पर हिन्दी चिट्ठों के बारे में नियमित क्लिप दिए जाने हेतु कुछ चिट्ठाकारों की बात अभी हुई ही थी कि याहू हिन्दी ने अपने पृष्ठ पर नारद के सौजन्य से हिन्दी चिट्ठों को जोड़ लिया. बीबीसी से भी प्रस्ताव आया है और इधर जीतू भाई बता रहे हैं कि उनकी सीक्रेट बातचीत गूगल से भी चल रही है. एमएसएन पिछड़ क्यों रहा है यह मेरी मोटी बुद…

11 टिप्पणियां

पढ़ते रहें

चिट्ठाकारों के लिए नए साल के टॉप 10 संकल्प

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava जनवरी 02, 2008

प्रत्येक हिन्दी चिट्ठाकार को निम्न दस संकल्प लेने चाहिएँ. ये संकल्प उन्हें चिट्ठासंसार में प्रसिद्धि, खुशहाली व समृद्धि दिलाने में शर्तिया मददगार होंगे. मैं टिप्पणी करूंगा – हर तरह की, हर किस्म की, नियमित, नामी-बेनामी-सुनामी-कुनामी. शुरुआत इस चिट्ठे पर टिप्पणी देकर कर सकते हैं. प्रति दस टिप्पणियों पर एक प्रति-टिप्पणी की गारंटी, तथा साथ ही यह भी ध्यान रखें कि इस चिट्ठे पर टिप्पणी प्रदान करने पर सफलता की संभावना अधिक है. मैं नित्य कम से कम एक चिट्ठा पढूंगा – ठीक है, प्रतिदिन सौ दो सौ चिट्ठे प्रकाशित होने लगे हैं और इनकी संख्या 2008 में एक्सपोनेंशियली बढ़नी ही है और एक पाठक के रुप में कोई भी इनमें से सभी पोस्टों को अपनी पूरी जिंदगी में नहीं पढ़ सकता मगर वो रोज कम से कम एक, इस चिट्ठे को तो पढ़ ही सकता है. तो, अच्छे प्रतिफल के लिए अपने संकल्प में इस चिट्ठे की हर प्रविष्टि को पढ़ने में अवश्य शामिल करें मैं सप्ताह में कम से कम एक पोस्ट लिखूंगा. वैसे तो कोई भी हिन्दी चिट्ठाकार नित्य न्यूनतम चार पोस्ट (अमित अग्रवाल और डेरेन रोज़ इसीलिए सफल हुए हैं, पर वो अंग्रेज़ी की बात है) ठेल सकता है, मग…

13 टिप्पणियां

पढ़ते रहें

अथ श्री उत्तम चिट्ठा आचार संहिता

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मार्च 18, 2007

चित्र

पिछले दिनों चिट्ठों के आचार संहिता बनने बनाने व उन्हें अपनाने पर खूब बहसें हुईं. इसी बीच चिट्ठाकारों के अनाम -बेनाम-कुनाम मुखौटों पर भी खूब जमकर चिट्ठाबाजी हुई. इसी बात को मद्देनजर रखते हुए इस ‘अथ श्री उत्तम चिट्ठा आचार संहिता' की रचना की गई है. सभी हिन्दी चिट्ठाकारों को इन्हें मानना व पालन करना घोर अनिवार्य है. अन्यथा उन्हें चिट्ठाकार बिरादरी से निकाल बाहर कर दिया जाएगा और उनका सार्वजनिक ‘चिट्ठा' बहिष्कार किया जाएगा. चिट्ठे विवादास्पद मुद्दों पर ही लिखे जाएँ. मसलन धर्म, जाति, आरक्षण, दंगा-फ़साद इत्यादि. इससे हिन्दी चिट्ठों का ज्यादा प्रसार-प्रचार होगा. सीधे सादे सरल विषयों पर लिखे चिट्ठों को कोई पढ़ता भी है? अतः ऐसे सीधे-सरल विषयों पर लिख कर अपना व पाठकों का वक्त व नारद-ब्लॉगर-वर्डप्रेस का रिसोर्स फ़ालतू जाया न करें. इस तरह के सादे चिट्ठों की रपट ब्लॉगर और वर्ड प्रेस को एब्यूज के अंतर्गत कर दी जाएगी और उस पर बंदिश लगाने की सिफ़ॉरिश कर दी जाएगी.अखबारी-साहित्यिक-संपादित तरह की तथाकथित ‘पवित्र' भाषा यहाँ प्रतिबंधित रहेगी. हर तरह का …

13 टिप्पणियां

पढ़ते रहें

दशक के हिंदी चिट्ठाकार के लिए कृपया अवश्य वोट करें

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मई 15, 2012

चित्र

परिकल्पना पर दशक के हिंदी चिट्ठाकार व हिंदी चिट्ठा को चुनने के लिए एक पोल लगाया गया है. जिसमें आप अपना बहुमूल्य वोट देकर इनका चुनाव कर सकते हैं. आपकी सुविधा के लिए (कृपया ध्यान दें, महज आपकी सुविधा के लिए,) वहाँ 10-10 चिट्ठाकार व चिट्ठों की सूची लगाई गई है. तो आप उनमें से चुन सकते हैं, या आपकी नजर में वे अनुपयुक्त हैं तो आप कोई अन्य उपयुक्त नाम सुझा सकते हैं, और उसे वोट दे सकते हैं. और, जैसा कि जाहिर है, इन पुरस्कारों की घोषणा के साथ ही विरोध (और कहीं कहीं थोड़े बहुत समर्थन) के सुर चहुँ ओर टर्राने लगे हैं. रुदन, क्रंदन और विलाप प्रारंभ हो गए हैं. चिट्ठाकार पुरस्कारों (चिट्ठाकार क्या हर किस्म के पुरस्कारों पर यह लागू है) पर नाहक हो हल्ला और गर्दभ-रुदन की परंपरा पुरानी रही है. जो नाहक गर्दभ-रुदन करते हैं और मठाधीशी जैसी बातें करते हैं उनसे गुजारिश है कि वे भी अपने मठ तो बनाएं और ऐसा कुछ प्रकल्प प्रारंभ तो करें. ब्लॉगिंग पुरस्कार तमाम भाषाओं के ब्लॉगों में चलते हैं. अंग्रेज़ी भाषाई ब्लॉगों में तो सैकड़ों पुरस्कार हैं और सैकड़ों स्तर पर प्रदान किए जाते हैं – और, विवाद वहाँ भी होते हैं…

25 टिप्पणियां

पढ़ते रहें

आप कितने अच्छे चिट्ठा पाठक हैं?

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मई 31, 2008

चित्र

आइए, जाँचिए अपने अंक.प्रस्तुत है आपके लिए चिट्ठाकार वर्ग पहेली
चिट्ठाकार और चिट्ठे.सीधे
3. बिस्मिल्लाहिर्रहमानुर्रहीम
5. मानसिक नॉलेज
7. अज्ञानी गुरू, दूसरे का लिखा कूड़ा समझे
8. दिल में, पेट में, मन में जहां कहीं भी हो न हो, उगलना तो पड़ेगा
9. छम्मकछल्लो
10. आदि चिट्ठाकार और वर्तमान व्यंग्यकार में समानता
12. डायरी वाला भारतीय
14. कस्बे का रहवासी
19. शब्दों के बीच सेतु बनाती हैं
20. जहां का हर सेर सस्ता होता है
21. नुकीली दृष्टि
23. आज के जमाने में ठुमरी कौन गाता है
24. हिन्दी का एक मात्र मालदार चिट्ठा
25. कह न सकने के बावजूद
नीचे
1. नेपाली हिन्दी चिट्ठाकार
2. एक यात्री जो अक्षरों का जोड़ घटाना करता है
4. लिखता तो है, कभी कभी, गाहे बगाहे
6. चिट्ठाजगत् की माता
9. इनके तो लब सचमुच आजाद हैं
11. जरा मुस्कुरा दो ब्रदर
12. कबाड़खाने का एक कबाड़िया
13. फटा मुँह, कुछ दूसरे तरीके से
15. राहुल उपाध्याय समेत हम सभी जिसमें लगे होते हैं
16. कीचड़ में मरीचिका देखने दिखाने का साहस
17. चार सौ बीस लेखक
18. चिट्ठाकार का पूरा नाम जो फुरसत में लंबी पोस्टें लिखने के लिए प्रसिद्ध हैं, अलबत्ता पाठकों के पास फुरसत हो न हो
19. हिन्दी ब्ल…

4 टिप्पणियां

पढ़ते रहें

करम करे तो फल की इच्छा क्यों न करे चिट्ठाकार?

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava सितंबर 13, 2007

चित्र

कर्मा-फैन हमारे जैसे लोगों के लिए ही है. जो कर्म करते हैं तो लागत से दो-गुना, तीन गुना, कई-कई गुना फल की इच्छा पालते हैं. कर्मा-फैन इंटरनेट पर बेहद उम्दा, नया और नायाब विचार है. कम से कम चिट्ठाकारों के लिये तो है ही. वैसे तो यह दो तरफा  काम करता है, परंतु इसका टैग-लाइन है- गेट सपोर्ट फ्रॉम योर फैन्स!यानी अपने चिट्ठा फैनों से आप कर्मा-फैन के जरिए सहयोग व भरणपोषण स्वरूप नकद राशि प्राप्त कर सकते हैं. जब आप अपने अनवरत चिट्ठा-पोस्टों से अपने पाठकों का मनोरंजन करते हैं, उनके ज्ञान में वृद्धि करते हैं तो क्या उनका दायित्व नहीं बनता कि वे भी आपको कुछ वापस दें? इस काम के लिए कर्मा-फैन चिट्ठाकारों व चिट्ठापाठकों के सहयोग के लिए तत्पर है. आप कर्मा-फैन से जुड़कर अपने चिट्ठे में अपने पाठकों से सहयोग प्राप्त तो कर ही सकते हैं, आप अपने पसंदीदा चिट्ठाकारों को नकद राशि देकर उनका उत्साहवर्धन भी कर सकते हैं. तो, यदि आपको इस चिट्ठाकार को कुछ गिव-बैक, कुछ धन्यवाद स्वरूप वापस करना है तो कर्मा-फैन में अभी ही खाता बनाएँ. यदि आप चिट्ठाकार हैं और अपने पाठकों से कुछ आशीर्वाद (मात्र आशीर्वचन नहीं,) स्वरूप, …

4 टिप्पणियां

पढ़ते रहें

अभिकलन एवं प्रक्रमण के दौरान मुंबइया चिट्ठाकार संगोष्ठी

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मार्च 29, 2007

चित्र

पिछले दिनों वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग ने सीडॅक मुंबई के तत्वावधान में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था जिसमें मैंने भी भाग लिया था. विषय था - भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटर के भाषाई संसाधनों का निर्माण (क्रिएशन ऑफ़ लेक्सिकल रिसोर्सेज़ फ़ॉर इंडियन लेंगुएज कम्प्यूटिंग एंड प्रोसेसिंग). वैसे, शुद्ध साहित्यिक भाषा में इसका हिन्दी अनुवाद कुछ यूं किया गया था -भारतीय भाषी अभिकलन एवं प्रक्रमण के लिए शाब्दिक संसाधनों का सृजनकम्प्यूटिंग एंड प्रोसेसिंग की जगह अभिकलन एवं प्रक्रमण का इस्तेमाल किया गया था, जो कि न तो प्रचलित ही है और न ही सुग्राह्य. परंतु यह क्यों किया गया था या जा रहा है - इसकी कथा बाद में. शब्दावली आयोग के वर्तमान अध्यक्ष प्रो. बिजय कुमार ने जब अपना प्रजेंटेशन देना प्रारंभ किया तो पावर-पाइंट में बनाए गए प्रजेंटेशन ने हिन्दी दिखाने से मना कर दिया. जाहिर है, यह प्रजेंटेशन प्रो. बिजय कुमार के कार्यालय-सहायकों ने तैयार किया था, और यूनिकोड में नहीं वरन् किसी अन्य फ़ॉन्ट में था, जो कि एलसीडी प्रोजेक्टर से जुड़े कम्प्यूटर में उस फ़ॉन्ट के संस्थापित नहीं होने से चला ही नहीं. प…

9 टिप्पणियां

पढ़ते रहें

देबाशीष चक्रवर्ती से खास साक्षात्कार

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava मार्च 24, 2007

चित्र

मिलिए देबाशीष चक्रवर्ती से
"भारतीय कम्प्यूटिंग व भारतीय भाषाओं में सामग्री के विस्तार की संभावनाएँ."पुणे निवासी, सॉफ़्टवेयर सलाहकार देबाशीष चक्रवर्ती को भारत के वरिष्ठ चिट्ठाकारों में गिना जाता है. वे कई चिट्ठे (ब्लॉग) लिखते हैं जिनमें भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटिंग से लेकर जावा प्रोग्रामिंग तक के विषयों पर सामग्रियाँ होती हैं. हाल ही में वे भारतीय चिट्ठा जगत में अच्छी खासी सक्रियता पैदा करने के कारण चर्चा में आए. उन्होंने इंडीब्लॉगीज़ नाम का एक पोर्टल संस्थापित किया है जो भारतीय चिट्ठाजगत के सभी भारतीय भाषाओं के सर्वोत्कृष्ट चिट्ठों को प्रशंसित और पुरस्कृत कर विश्व के सम्मुख लाने का कार्य करता है. देबाशीष डीमॉज संपादकहैं, तथा भारतीय भाषाओं में चिट्ठों के बारे में जानकारियाँ देने वाला पोर्टल चिट्ठाविश्व भी संभालते हैं. देबाशीष ने न सिर्फ भारत का एकमात्र और पहला बहुभाषी चिट्ठा पुरस्कार इंडीब्लॉगीज़ का भी शुभारंभ किया, बल्कि भारतीय ब्लॉग-दुनिया पर वे पैनी नजर भी रखते हैं. आपने बहुत सारे सॉफ़्टवेयर जैसे कि वर्डप्रेस, इंडिकजूमला, आई-जूमला, पेबल, स्कटलइत्यादि के स्थानीयकरण (सॉफ़…

11 टिप्पणियां

पढ़ते रहें

चिट्ठाकारों की नियमित, योग्यता जाँच

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava जुलाई 27, 2008

चित्र

क्या खयाल है? चलिए मान लिया, यहाँ कोई न न्यूनतम और न महत्तम मापदण्ड है, मगर योग्यता के नाम पर कुछ तो होगा? पर, अब आप कहेंगे कि एक चिट्ठाकार की योग्यता आखिर क्या होनी चाहिए जो जांची-परखी भी जा सके. और यदि कुछ तो ऐसा होगा जिसे चिट्ठाकार की योग्यता कहा जा सके तो फिर उसे जांचने में कोई हर्ज है क्या?मेरे एक चिट्ठे पर हाल ही में एक टिप्पणी आई – “*तिए ये तूने क्या लिखा है?” वो तो टिप्पणी मॉडरेशन का धन्यवाद कि मैंने उस टिप्पणीकार के *तियापे को प्रकाशित नहीं किया. मगर यहाँ पर सवाल यह उठता है कि मैंने जो कुछ लिखा था, वो तो मेरी अपनी नज़रों में महान था. तमाम इंटरनेटी दुनिया में तांक झांक कर मसाला उड़ाकर निचोड़ बनाकर मैंने लिखा था. मेरे अपने हिसाब से वो एक क्लासिक था. जितनी दफा और जितनी मर्तबा और जितनी बार, बार-बार मैं उसे पढ़ता, पढ़कर मुग्ध हो जाता और सोचता कि क्या गजब लिखा है. मुझे लगता कि उसने कहा था की तर्ज पर मेरा यह मात्र एक लेख मुझे चिट्ठासंसार में स्थापित कर सकने की क्षमता रखता है. मगर उस पर आई भी तो यह टिप्पणी!मगर, फिर मैंने अपने आप को दिलासा दिया - वह पाठक और वह टिप्पणीकार अवश्य ही *तिय…

20 टिप्पणियां

पढ़ते रहें

फंसने फंसाने का दैत्याकार नेटवर्क

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava फ़रवरी 22, 2007

चित्र

हिन्दी चिट्ठाजगत में फंसने-फांसने का नेटवर्क दूसरी बार आया है. और, खुदा करे, यह तिबारा-चौबारा, फिर कभी नहीं आए. फंसने-फांसने का क्यों? यह मैं आगे बताता हूं.उन्मुक्त ने मुझे फांसा (टैग किया) तो मैं नादान बनकर कि मैंने उसकी पोस्ट पढ़ी ही नहीं, पीछा छुड़ा सकता था. और छुड़ा ही लिया था...परंतु उन्होंने मुझे ई-मेल किया, और उनका ईमेल मेरे गूगल ईमेल के स्पैम फ़िल्टर से जाने कैसे बचता-बचाता मेरे इनबॉक्स में आ गया. उन्होंने लिखा था-Hi I have a request to make. It is contained here
http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/02/blog-post_18.html
I hope you will not mind.मैंने वह पोस्ट दुबारा पढ़ी (उस पोस्ट को पहले पढ़ कर नादान बन कर भूल चुका था) और यह प्रत्युत्तर लिखा:well, I DO MIND, but will reply not-so-mindfully in my post :)जाहिर है, मैं फुल्ली माइंडफुली प्रत्युत्तर दे रहा हूँ.तो, सबसे पहले फंसने-फांसने का गणित.पहले स्तर पर एक चिट्ठाकार ने फांसा - 5 चिट्ठाकारों को.दूसरे स्तर पर पाँच चिट्ठाकारों ने शिकार फांसे - 25तीसरे स्तर पर पच्चीस चिट्ठाकारों ने फांसे - 125चौथे स्तर पर 125 चिट्ठाकारों ने फांसे -…

4 टिप्पणियां

पढ़ते रहें

थकेले दिग्गजों की तरफ से आपके लिए ब्लॉगिंग टिप्स...

रवि रतलामी [ Ravishankar Shrivastava अगस्त 31, 2009

चित्र

वैसे तो अपने तमाम हिन्दी चिट्ठाकारों ने समय समय पर ब्लॉग उपदेश दिए हैं कि चिट्ठाकारी में क्या करो और क्या न करो. परंतु अभी हाल ही में दो सुप्रसिद्ध, शीर्ष के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले भारतीय अंग्रेज़ी-भाषी ब्लॉगरों की गिनती में शामिल, अमित वर्मा (इंडिया अनकट) तथा अर्नाब –ग्रेटबांग (रेंडम थॉट्स ऑफ डिमेंटेड माइंड) ने अपने अपने ब्लॉगों में कुछ काम के टिप्स दिए हैं. उनके टिप्स यहाँ दिए जा रहे हैं. अमित वर्मा से विशेष अनुमति ली गई है तथा ग्रेटबांग के चिट्ठे की सामग्री का क्रियेटिव कामन्स के अंतर्गत प्रयोग किया गया है.तो, सबसे पहले, पहली बात. पेंगुइन की एक किताब – गेट स्मार्ट – राइटिंग स्किल्स के लिए लिखे अपने लेख में अमित वर्मा कहते हैं:ब्लॉग लेखन मनुष्य की सर्जनात्मकता का सर्वाधिक आनंददायी पहलू है. एक चिट्ठाकार पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं होता कि वो क्या लिखे, कैसे लिखे, कितना लिखे. आप चार शब्दों में अपना पोस्ट समेट सकते हैं तो चालीस पेज भी आपके लिए कम हो सकते हैं. इसी तरह, न तो विषयों पर कोई रोक है, और न आपकी शैली पर कोई टोक.(अमित वर्मा – चित्र – साभार http://labnol.org)अमित अपने ब्ल…

28 टिप्पणियां

पढ़ते रहें


---

कुछ और पुरानी यादें ताजा करना चाहते हैं? इस लिंक पर जाएँ .

तो, ज्यादा स्मार्ट बनें, और अपने स्मार्टफ़ोन को फेंक दें।
पर, शायद आप ऐसा नहीं कर पाएं।
तो? और अधिक बेवकूफियों के लिए तैयार रहें!

image

भूमिका : जबकि हिंदी व्यंग्य की दुनिया व्यंग्य क्या है, व्यंग्यकार क्या है, क्या व्यंग्य केवल उंगली में गिने जाने वाले व्यंग्यकारों तक सिमट गया है, समकालीन टॉप 10 कितने व्यंग्यकार हैं, वन लाइनर को व्यंग्य मानें या नहीं, व्यंग्य में करुणा और सरोकार होने चय्ये कि नईं आदि आदि पर उलझी हुई है, इधर तकनीकी क्रांति अपनी रफ़्तार से चल रही है, और एक ऐसा ऐप्प ईजाद हो गया है जो महज एक टच पर व्यंग्य पैदा कर देता है. आपको विश्वास नहीं हो रहा? मुझे भी नहीं हो रहा था. तो मैंने इस ऐप्प की टेस्टिंग की. इस ऐप्प में गूगल एलो, अलेक्सा, सिरी आदि की सम्मिलित एआई की शक्ति है और यह सचमुच महज एक टच पर झकास व्यंग्य पैदा कर देता है. मैंने इस बार की जुगलबंदी के लिए अपने स्मार्टफ़ोन पर इस ऐप्प को इंस्टाल किया और विषय दर्ज कर केवल एक टच मारा और इसने संपूर्ण ब्रह्मांड में से खोज खंगाल कर बढ़िया तरतीब से लाइनें जमाकर एक शानदार व्यंग्य लिख कर मेरे सामने पेश कर दिया. नीचे इस झकास व्यंग्य को पढ़ें – इस व्यंग्य आलेख में मेरा कोई योगदान नहीं है, बल्कि इस व्यंग्य-लेखक ऐप्प का योगदान है. यह ऐप्प किसी भी – जी हाँ, किसी भी (मेरे जैसे?) ऐरे-गैरे को व्यंग्यकार बना सकता है. ऐसा कि व्यंग्य और व्यंग्य क्या है आदि आदि की बहसें फ़िजूल हो जाएँ. नीचे व्यंग्य पढ़ें और व्यंग्य पसंद आने पर आप भी इस ऐप्प को अपने ऐप्प स्टोर से इंस्टाल करें और व्यंग्यकार बनें. सबसे बड़ी बात ये है कि ये ऐप्प पूरी तरह निःशुल्क है (ऐड सपोर्टेड – मुफ़्त खजूर की तरह की कोई चीज नहीं होती हुजूर! – बीयर अपने इधर नहीं चलता, सो तुकबंदी के लिए खजूर सही है ना?)

व्यंग्य -

योग करो, सुख से जियो
-----------------------------
हमने दोस्त के यहां फोन किया। उसके बच्चे ने उठाया।

मैंने पूछा -पापा कहां हैं।

वो बोला- पापा योग कर रहे हैं।

क्यों, क्या हुआ? कोई समस्या है क्या? -मैं योगी हो गया।

नहीं,नहीं अंकल कोई परेशानी नहीं। पापा तो आजकल रोज योग करते हैं। उनका डेली रूटीन है। कहते हैं इससे तबियत ठीक् रहती है। बच्चा शांत आवाज में बता कम समझा ज्यादा रहा था।

हम बच्चे की समझाइश के झांसे में आने ही वाले थे कि हमारे दिमाग में तुलसीदास् टुनटुनाये- जे न मित्र दुख होंहिं योगारी/ तिनहिं बिलोकत पातक भारी।

हमारा मित्र रोज डेली योग कर रहा है, माने कि सुखी है। उसके सुख में सुखी न हुये तो वो सुख हमारे पास पातक बनकर आयेग। भारी वाला। विलोकेगा। लफ़ड़ा होगा। आफ़त है।

हमने सोचा मित्र् के सुख में सुखी हो आते हैं। अपना पातक बचा लेते हैं। सावधानी सटा के , दुर्घटना घटा लें। प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योरे भी हो जायेगा। इतवार है, छुट्टी है।

चाहे जितना सुखी हो चाय-साय तो पिलायेगा ही। यहां तो अब कोई चौथी चाय पूछने से रहा।

पांच मिनट में हम सुख जाहिर करने के लिये दौड़े। पहुंचे दोस्त-द्वारे। सोचा पूछेंगे-क्या हाल हैं प्यारे। क्या हुआ अब हम इतने गैर हो गये कि बताते भी नहीं और अकेले-अकेले सुखी हो लेते हो। कम से कम हमारा तो सोचते क्या होगा! ये तो कहो हमने फोन कर लिया वर्ना हम तुम्हारे सुख में सुखी न हो पाते और हमें तो बड़ा सुख पकड़ लेता। तुम इतने खुदगर्ज निकलोगे, सोचा भी न था। तुमसे ऐसी आशा तो न थी।

लेकिन हम अपनी सोच को अमली जामा न् पहना पाये। हम कुछ पूछे इससे पहले ही दोस्त ढीले नाड़े वाला पायजामा संभालते हुये बोला- आओ, आओ। बैठो। इतनी सुबह। सब खैरियत तो है। बेटा मून्नू देखो अंकल आये हैं। चाय-पानी लाओ। मम्मी को बुलाओ। देखते आओ सूरज किधर निकला है।

हम जिसका हाल पूछने आये वह खुद हमारी खैरियत पूंछ रहा है। कौन कहता है दुनिया में साधुवाद युग का श्राद्ध हो गया। ये तो हमींअस्तो, हमीअस्तो वाला सीन है।

हमने पूछना शुरू किया-सुना है आजकल तुम रोज योग करते हो!

हां यार तुमको बताना भूल गया। आजकल रोज नियम् से योगी हो लेता हूं। बड़ा फ़ायदा है। -दोस्त ने बताया।

अबे योगी होने से फ़ायदा! ये क्या के रे हो? दिमाग तो नहीं फिर गया! क्या ताजमहल को वोट देने आगरा गये थे और वहीं टिक गये पागलखाने में कुछ दिन और कहीं जगह न मिलने के कारण।-हमने फ़ार्म में आने का प्रयास किया।

अरे हम भी यही सोचते थे। लेकिन जब से योगी होना शुरू किया है बहुत फ़ायदा है। वजन कंट्रोल में हैं। टाइम बचता है। घर बैठे सेहत चकाचक। -दोस्त के चेहरे पर हमको मूढ़मति मानने वाली दिव्य मुस्कान विराज रही थी।

योगी होने से फ़ायदा! ये क्या पहेलियां बुझा रहे हो? सबेरे से कोई मिला नहीं क्या? -हम पानी पीते हुये बोले।

हां भाई, सच कहता हूं। योगी होने से बहुत फ़ायदा होता है। दिखता नहीं तुमको कि मेरा वजन कितना कम हो गया। -दोस्त उवाचा।

हां सो तो देख रहा हूं पहले से आधे हो गये। ऐसा कैसे हुआ? हम जिज्ञासु बन गये।

ये इसी ‘योग थेरेपी’ से हुआ। हम रोज नियमित एक घंटा योगी हो लेते हैं।

नियमित योग करने मात्र से वजन कंटोल में है। पहले हम ये मत खाओ, वो मत छुओ, इत्ती कैलोरी, उत्ती वसा के झमेले में हलकान रहते थे। कैलोरी चार्ट रटते-रटते इतना दुखी हुयी जितना बचपन में पहाड़ा रटने में नहीं हुये। अब जब से योगी होना शुरू किया सब झंझट से मुक्ति। अब शान से खाते हैं, शान से सोते हैं। मार्निंग वाक, एवनिंग वाक को अपने रूटीन से डिलीट कर दिया। हम तो कहते हैं कि जिसको अपने स्वास्थ्य की रत्ती भर भी योग है उसे योग करना शुरू कर देना चाहिये। -दोस्त सूचना मोड से प्रवचन मोड में आ रहा था।

तुम यार पहेलिया मत बुझाऒ। सीधे-सीधे काम की बात पर आओ। अपनी बात के पीछे की थ्योरी बताओ। उदाहरण सहित समझाऒ। -दोस्त के सूचना ज्ञान से हम झल्लाने लगे।

यार, बताता हूं। योग का ऐसा है कि हमारे यहां सब पुराने लोग बता गये हैं। हम बुड़बक की तरह उसे देखते नहीं और सारी बातों के लिये विकसित देशों की तरफ़ ताकते रहते हैं।

हमारे यहां पहले बहुत से लोग बता गये हैं योग से आदमी दुबला होता है। कहावत में इशारा भी है- काजी शहर के अंदेशे में दुबला। बीरबल की कहानियों में भी बताया गया है न कि एक बकरे को खूब खिलाया-पिलाया और सामने शेर को बैठा दिया गया। शेर की योग में बकरे का वजन रत्ती भर नहीं बढ़ा। माल-मत्ता खाने से जितना बढ़ा उतना ही शेर को देखकर घटता गया। इसी सिद्धान्त पर योग थेरेपी की नींव टिकी है। आदमी नियमित योग करता रहे तो उसका वजन घटता रहता है। चाहे जो खाये नियंत्रण में रहता है।

इसीलिये ये देखो हमने अपने घर की दीवारों पर योग थेरेपी वाले पोस्टर लगा रखे हैं- योग करो, सुख से जियो। योग सरोवर में डुबकी लगायें, अपना वजन मनचाहा घटायें। बढ़ते वजन से परेशान, नियमित योग से तुरंत आराम। योगी होते ही वजन की चर्बी गायब।

लेकिन हमने तो देखा है लोग खूब योगी रहते हैं फिर भी दुबले नहीं होते। कैसे तुम्हारी बात सच मान लें। -हमने प्रतिवाद किया।

अब ये तो श्रद्धा-विश्वास की बात है। जिसको श्रद्धा होगी उसकी फ़ायदा मिलेगा। जिसको नहीं होगी नहीं मिलेगा। और फिर योग में भी ईमानदारी होनी चाहिये। श्रद्धा में खोंट होगी तो योग का फ़ायदा नहीं मिलेगा। योग शुद्ध होनी चाहिये, २४ कैरेट सोने की तरह तभी आपको लाभ मिलेगा।- दोस्त सांस लेने के लिये रुका।
यार पता नहीं तुम कैसी बातें करते हो। मुझे कुछ समझ में नहीं आता। -हम भ्रमित थे।

हमको भी पहले ऐसा ही लगता था। अच्छा ये बताओ कि ये अमेरिका के राष्ट्रपति इतना स्लिम-ट्रिम, स्मार्ट छैला बाबू टाइप कैसे बने रहते हैं? -दोस्त अब सवाल करने लगा।

उनके खान-पान का ध्यान रखने के लिये डाक्टरों की फ़ौज लगी रहती है। दवा-दारू के लिये उनको किसी सरकारी अस्पताल में लाइन नहीं लगानी पड़ती। नियमित चेकअप होते हैं। व्यायाम-स्यायाम करते रहते हैं। यही कारण होंगे और क्या!

अरे भैया की बातें। ये सुविधायें तो किसी भी अमीर आदमी को मिल सकती हैं। लेकिन उससे वो अमेरिकी राष्ट्रपति के तरह स्मार्ट, स्लिम-ट्रिम, छैला बाबू टाइप थोडी़ हो जायेगा। और फिर समझने की बात है कि जो शख्स पूरी दुनिया को अपने ठेंगे रखने की ऐंठ रखता है। जरा-जरा सी बात पर दुनिया भर में जहां मन आये बम की कालीन बिछा देता है जिस देश को मन आये पाषाण युग में ठेले देता है वो भला डाक्टर-हकीम के इशारे पर चलेगा! हमें तुम्हारी अकल पर तरस आता है।- दोस्त हम पर दया भाव दिखाने लगे।

अच्छा तुम ही बताओ भला अमेरिकन राष्ट्रपति की स्लिमनेश का राज- हमने सवाल किया।

इसका राज यह है कि वह योगी रहता है। उसके जिनती योग खुदा भी नहीं करता होगा। वह एक देश में लोकतंत्र बहाल करने के लिये इतना योगी होता है कि उस देश को तहस-नहस कर देता है। एक अपराधी को पकड़ने की योग में पूरी दुनिया को जहां शक होता है रौंद देता है। पूरी दुनिया भर में शांति बहाल करने के लिये अपनी इतना योगी रहता है कि हर जगह अपने हथियार तैनात कर देता है। अपने पास हजारों बम होते हुये भी दूसरे देश के परमाणु परीक्षण को दुनिया भर के लिये खतरा मानकर योगी होता रहता है। इसी तरह के तमाम योगऒं के कारण ही वह दुबला-पतला, स्लिम-ट्रिम, स्मार्ट-छैला बाबू टाइप बना रहता है।

इसके बाद न जाने कितने उदाहरण से हमारे दोस्त ने यह साबित करने का पूरा इंतजाम किया कि अगर हम ईमानदारी से योगी हो सकें तो सारे सुख हमारी झोली में होंगें। योग करना शुरू करते ही हम तड़ से खुशहाल हो जायेंगे। उनके वक्तव्य के कुछ अंश जो हमें याद रह गये वे यहां दे रहा हूं।

भगवान रामचंद्र पहले राज्य जाने के कारण योगी हुये, फिर पत्नी के अपहरण से, फिर धोबी द्वारा अपनी बदनामी से फिर अपने पुत्रों द्वारा अपनी सेना की पराजय से और बाद में सीतागमन से। इन्हीं तमाम बातों के चलते वे योगी होते रहे और कालांतर में मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये। यही बात कृष्णजी के बारे में सही है। पहले अनगिनत गोपियों की योग फ़िर सोलह हजार पटरानियों के चलते उनकी योग की कल्पना ही की जा सकती है। इसी योग के चलते वे सोलह कलाऒं युक्त सम्पूर्ण अवतार् माने गये। डबीरदास ने तो डंके की चोट पर कहा- सुखिया सब संसार है खावै अरु सोवै, योगी दास डबीर है जागै अरु रोवै। इसी योगीपने के कारण डबीर दुबले पतले बने रहकर सौ से ज्यादा साल जीये और इतने प्रसिद्ध हस्ती कहलाये।

योग करना आजकल स्वास्थ्य के लिये बहुत आवश्यक है। अगर हम ठीक से योगी होना सीख गये तो समझिये स्वस्थ हो गये। पुराने समय में भी जितने महान लोग हुये, जितने दीर्घायु हुये वे सब योग करने के ही कारण हुये।

आजकल भी देखिये ये जो जीवन अवधि बढ़ गयी है, लोग ज्यादा दिन तक जीने लगे हैं तो इसीलिये कि लोग तमाम तरह की योग मुद्राएँ करने लगे हैं। दुनिया की हालत से योगी बने हैं, अपने बच्चों की वजह से योगी हैं, बुढ़ापे में जवान पत्नी की बेवफ़ाई से योगी हैं, जवानी में किसी हसीन, अमीर बुढिया के इश्क में फ़ंसकर योगी हैं। इन सब योग मुद्राऒं के चलते आदमी दुबला होता है और उसकी जीवन अवधि बढ़ जाती है।

दुनिया जटिल हो रही है। लोगों की योग मुद्रायें भी जटिल हो रही हैं। हर समय अंग्रेजीपूर्ण माहौल में रहने वाला हिंदी की स्थिति के लिये योगी है। बात-बात पर गाली निकालने वाले को समाज में घटते भाईचारे की भावना योगी बनाती है। कुछ लोग अपनी योग का स्तर उठाकर देश तक ले जाते हैं। देश की योग के बाद भी जिनकी योग का स्टाक खतम नहीं होता वो अपनी योग का तंबू पूरे विश्व में तान देते हैं। ब्रह्मांड में अपनी योग मुद्राएँ छितरा देते हैं। वे योगी रहते हैं ताकि योग के चलते वे दुबले रह सकें और सुखी रह सकें। जो शख्स कायदे से योगी होना सीख गया उसकी सारी योग मुद्राएँ समाप्त हो जाती हैं।

योग थेरेपी की सम्भावनायें अनन्त हैं। अगर इसे मान्यता मिल सके तो सरकार की तमाम कमियां भगवान की कमियों की तरह छुप सकती हैं। अभी भूख से मरने वालों के लिये सरकार तमाम तरह से साबित करती है कि मरने वाला भूख से नहीं मरा। लेकिन इसके लिए उसकी बहुत छीछालेदर होती है। जैसे ही योग थेरेपी को मान्यता मिली सरकार हर मौत के लिये कह सकेगी ये भूख से नहीं अन्न की कमीं की योग से मरा है। यह अपनी यौगिक मौत मरा है। हजारों लाखों लोग जिनको आज असहाय होकर भूख से मरने के लिये बाध्य होना पड़ रहा है वे योगी होकर मरने लगेंगे। इससे सरकारें भी योगी हो जायेंगी। बिना किसी खर्च के मरने वाली की भावनाओं और सरकार की स्पिरिट के हो जायेगी।

दुनिया में आज जहां भी परिवर्तन हुये हैं वे सब के सब योगी लोगों के कारण हुये। अपने देश की आजादी की लड़ाई में जो भी महान नेता हुये वे देश के लिये योगी रहते थे। देश की योग में दुबले रहते थे तब जाकर हमें आजादी मिल पायी। गांधीजी देश की इतनी योग करते थे। देश की योग के ही कारण वे इतने दुबले-पतले थे कि सरपट चलकर हर क्षेत्र में पहुंचकर योगी हो जाते थे। इसीलिये देश को आजाद कराने में उनका नाम आदर से लिया जाता है।

इसीलिये यह योगी रहना बहुत जरूरी है। अगर अभी तक आप योगी रहना नहीं सीख पाये तो समझ लीजिये आपकी जीवन शिक्षा अधूरी है। आप तुरंत उठिये और योग करना शुरू कर दीजिये।

उद्बोधन इसके बाद समाप्त हो गया। हम उठकर चल दिये। रास्ते में हमने अपने साथ के युवा दोस्त, जो दोस्त के घर मेरे साथ गया था और जिसने अपने स्वभाव के विपरीत अब तक चुप रहकर अपनी समझदारी का परिचय से दिया था, से पूछा- क्यों यार ये योग थेरेपी के बारे में तुम्हारा क्या कहना, क्या विचार है?
भाई अगर आप बुरा न मानें तो मुझे तो आपका यह दोस्त सिरफ़िरा लगता है।-युवा साथी ने राय दी!

नहीं यार, इसमें बुरा मानने की क्या बात। जो सच है सो है। सच को कोई थोड़ी झुठला सकता है। लेकिन तुमको मेरा दोस्त क्यों सिरफिरा लगता है?-मैंने कारण जानना चाहा।

अरे उसको ये तक नहीं पता कि आजादी के समय यहां कोई गांधी नहीं थे। प्रियंका, राहुल, वरुण गांधी उस समय पैदा नहीं हुये थे। सोनिया गांधी, मेनका गांधी दोनों की उस समय शादियां हुयीं नहीं थी लिहाजा उनके आजादी दिलाने का कोई सवाल ही नहीं उठता। फिर कहां से गांधीजी आजादी के समय आ गये। जबकि आपका दोस्त बताता है कि गांधीजी ने देश को आजाद कराने में योग-दान दिया। आपके जिस दोस्त की इतिहास की समझ इस हद दर्जे की माशाअल्लाह है उसकी किसी भी बात पर गौर करने के पहले से मैं हजार बार विचार करूंगा। मुझे तो योग होने लगी है कि कैसी-कैसी योग की समझ वाले निर्योगी लोग आपके दोस्त हैं।

अपने नौजवान दोस्त की बात सुनकर मैं भी योगी होने लगा।

आपके क्या हाल हैं? आपने योगी होना शुरू किया कि नहीं!

--------

(अस्वीकरण – अनूप शुक्ल के चिंता विषयक आलेख से इस आलेख की समानता केवल फ़ाइंड-एंड-रीप्लेस तकनीकी संयोग मात्र है)

हास्य-व्यंग्य की जुगलबंदी 38 - खेती पर लिखी मेरी व्यंग्य रचना को अर्चना चावजी ने आवाज दी है. उनका धन्यवाद और आभार. व्यंग्य में, जाहिर है ड्रामा का आनंद भी जुड़ गया है. सुनें और आनंद लें -

अर्चना चावजी


पॉडकास्ट नीचे प्लेयर के प्ले बटन (बटन को प्रकट / लोड होने में कुछ समय लग सकता है, कृपया धैर्य बनाए रखें) पर क्लिक कर सुनें -


how to type in remington kritidev layout in 32 / 64 bit windows 10

image

मरफ़ी का नियम यहाँ सत्य है - हर दिए गए सॉफ़्टवेयर का नया, उन्नत संस्करण तमाम नई, उन्नत समस्याएँ लेकर आता है.

विंडोज 10 में रेमिंगटन कीबोर्ड (कृतिदेव लेआउट) से यूनिकोड हिंदी टाइप करने की सुविधा ही छिन गई, और बहुत से लोग जिन्होंने अपने कंप्यूटर मुफ़्त में अपग्रेड किए (अपग्रेड के लिए विंडोज 10 मुफ़्त था) या नए कंप्यूटर लिए जो केवल विंडोज 10 प्रीइंस्टाल हैं, और केवल रेमिंगटन से टाइप करना जानते हैं उनके लिए बड़ी समस्या हो गई.

अंततः इसका समाधान आ गया है और विंडोज 10 के प्रायः हर संस्करण, यहाँ तक कि टैबलेट संस्करण के लिए भी ये समाधान काम करते हैं. आपको ट्रायल एंड एरर विधि अपना कर इनमें से कोई एक चुन कर इंस्टाल करना होगा. समाधान राजभाषा.नेट की साइट पर उपलब्ध है.

इस साइट पर तीन अलग तरह के समाधान हैं. एक पुराना इंडिक आईएमई हिंदी टूलकिट नाम  से है, जो संभवतः विंडोज 10 के 32 बिट संस्करण में बढ़िया काम करता है.

दूसरा समाधान है रेमिंगटन ईएक्सई नाम की एक इंस्टालर फ़ाइल जो कि विंडोज 10 के 32 बिट टैबलेट पर बढ़िया काम करता है (यह मेरे टैबलेट में बढ़िया काम कर रहा है)

तीसरा, एकदम नया समाधान है विंडोज के 64 बिट संस्करणों के लिए - हिंदी इंडिक इनपुट 3 - 64 बिट.

इन तीनों ही समाधानों को आप राजभाषा की साइट पर यहाँ जाकर आजमा सकते हैं. निश्चित रूप से इनमें से कोई न कोई आपके विंडोज 10 संस्करण के लिए काम अवश्य करेगा -

http://rajbhasha.net/drupal514/New+Remington+Unicode+Hindi+Keyboard+Layout


ऊपर दिए गए लिंक (लिंक क्लिक करने योग्य नहीं है) को कॉपी कर अपने ब्राउजर के एड्रेस बार में पेस्ट करें.

इस साइट पर इन औजारों को कैसे इंस्टाल करें व उपयोग में लें इस हेतु विस्तृत जानकारी भी उपलब्ध है.

clip_image002

वैधानिक चेतावनी – यदि आप क्रोमकास्ट, अमेजन फायर या एप्पल टीवी जैसे मीडिया रेंडरर का इस्तेमाल करते हैं, तो इस आलेख को पढ़ने के बाद उन्हें कचरे की टोकरी में फेंकना चाहेंगे तो इसके लिए यह आलेख कतई जिम्मेदार नहीं होगा.

बहुत दिनों के बाद टेक्नोलॉज़ी की दुनिया में हल्ला मचा है. हल्ला तो ख़ैर चालक-रहित कारों का भी हो रहा है, मगर वो बाजार में अभी उपलब्ध नहीं हैं. हाँ, तो हल्ला मचा है - टेक्नोलॉज़ी की दुनिया में, इतना कि अमेजन जैसी कंपनियों ने हाल ही में अपने प्लैटफ़ॉर्म पर इनकी बिक्री पर प्रतिबंध भी लगा दिया. जी हाँ, आपने सही अनुमान लगाया – फुल्ली लोडेड कोडी मीडिया बॉक्स. नया हल्ला, मगर वाकई काम का.

क्या है कोडी?

कोडी एक मुक्त-स्रोत मीडिया सेंटर ऐप्प है जो विंडोज़, लिनक्स, एंड्रायड और एप्पल के लिए बनाया गया है. इसका पुराना संस्करण एक्सबीएमसी मीडिया प्लेयर के नाम से बहुत पहले से आता रहा है, मगर हाल ही में इसने लोगों का ध्यान तब खींचना चालू किया जब कोडी प्रोग्राम की विशिष्ट सुविधा - थर्ड पार्टी एड ऑन - के जरिए लोगों को इंटरनेट के तमाम वैध और अवैध और चाइल्ड और एडल्ट हर किस्म के ऑडियो-वीडियो मीडिया को बेहद सस्ते फुल्ली लोडेड कोडी बॉक्स के जरिए निःशुल्क उपभोग की सुविधा मिली. जाहिर है, ग्राहकों से मासिक शुल्क लेने वाली ऑनलाइन मीडिया रेंडरिंग कंपनियां जैसे कि नेटफ्लिक्स, पेंडोरा आदि को यह नागवार गुजरना ही था. लिहाजा हल्ला मचा, खूब हल्ला मचा और नतीजतन ऐसे फुल्ली लोडेड मीडिया बाक्सों की मार्केटिंग पर कुछ ऑनलाइन स्टोरों ने प्रतिबंध लगा दिया.

तो, क्या कोडी का उपयोग गैरकानूनी है?

नहीं, बिल्कुल नहीं. कोडी का उपयोग कतई गैरकानूनी नहीं है. गैरकानूनी वह कार्य है जिसके जरिए आप अवैध प्लगइन के जरिए, कोडी की सहायता से नेटफ़्लिक्स पर वंडरवूमन फ़िल्म बिना रकम खर्च किए देखते हैं. पर, खैर, यह कार्य तो इंटरनेट के बाबा आदम के जमाने से चला आ रहा है और टोरेंटादि की सहायता से, दी गई कोई भी फ़िल्म रिलीज होने के सप्ताह भर पहले या बाद में इंटरनेट पर विचरने लग जाती है. इसलिए, यदि आपकी गीत-संगीत-फ़िल्मों में रूचि है तो कोडी पर एक बार जरूर हाथ आजमाएँ. अपने प्लेटफ़ॉर्म पर कोडी इंस्टाल करें. बेहतर ये होगा कि – यदि आपका टीवी पहले से ही स्मार्ट नहीं है तो – कोई बढ़िया एंड्रायड मीडिया बॉक्स ले आएँ (बहुतों में कोडी पहले से ही इंस्टाल रहता है और बहुतों में फुल्ली लोडेड कोडी संस्करण भी) और कोडी का ऑफ़ीशियल संस्करण इंस्टाल करें. यदि आपके पास विंडोज 8-10 कंप्यूटर है तो कोडी ऐप्प इंस्टाल करें. आप कोडी को शियामी एमआई बॉक्स, अमेजन फायर, रास्पबेरी पाई आदि में भी इंस्टाल कर सकते हैं. यदि आप कोई नया एंड्रायड मीडिया बॉक्स लेने की सोच रहे हैं तो इसमें आउटपुट-इनटपुट इंटरफ़ेस की उपलब्धता अवश्य देख लें. ब्लूटूथ और ऑप्टिकल आउट की सुविधा अवश्य होनी चाहिए नहीं तो अपने स्पीकरों को जोड़ने के लिए अलग जुगाड़ लगाने होंगे.

कोडी का उपयोग कैसे करें?

कोडी आपके तमाम मीडिया उपभोग के लिए एक केंद्रीयकृत ऐप्प है. आप इसके जरिए गाने सुन सकते हैं, अपने उपकरण पर मौजूद चित्रों को खोज-देख सकते हैं, वीडियो देख सकते हैं, इंटरनेट रेडियो सुन सकते हैं, यूट्यूब जैसे स्ट्रीमिंग वीडियो देख सकते हैं, आरएसएस फ़ीड से समाचार पढ़ सकते हैं, और हाँ, अपने मुहल्ले का मौसम का हाल भी जान सकते हैं. यानी, आपने ठीक समझा – पूरा भानुमती का पिटारा. असली वाला.

ऊपर दिए गए कोडी का स्क्रीनशॉट देखें. आपको उनमें मूलभूत प्रविष्टियाँ दिखेंगी – मूवीज़, टीवी शो, म्यूज़िक वीडियो, टीवी (जी हाँ, यदि आपके उपकरण में टीवी सिग्नल पकड़ने वाला चिप या यूएसबी उपकरण लगा हो तो ये भी!) रेडियो, पिक्चर, वीडियो, मौसम आदि आदि और जो छूट रहे हैं उनके लिए एड-ऑन.

image

कोडी के साथ एक बड़ी सुविधा यह भी है कि इसे आप रिमोट कंट्रोल से चला सकते हैं. यदि आप मीडिया बॉक्स लेते हैं तो साथ में भौतिक रिमोट कंट्रोल भी आता है जो खासतौर पर कोडी के लिए डिजाइन किया गया होता है. यदि आप विंडोज कमप्यूटर आदि पर कोडी का प्रयोग करना चाहते हैं तो अपने मोबाइल फ़ोन में कोडी को रिमोट कंट्रोल करने वाला ऐप्प कोर इंस्टाल कर अपने फ़ोन को रिमोट कंट्रोलर की तरह उपयोग में ले सकते हैं. अपने मोबाइल फ़ोन से एक से अधिक कोडी (उदाहरण के लिए मैं अपने बैठक कक्ष में कोडी मीडिया बॉक्स को और अपने शयन कक्ष में डेस्कटॉप कंप्यूटर पर विंडोज 10 में स्थापित कोडी ऐप्प को) को आसानी से, और बेहतर तरीके से नियंत्रित करता हूँ.

कोडी का सेटअप कैसे करें

clip_image004

कोडी का उपयोग करने से पहले इसे थोड़ा सेटअप करना होता है. कोडी को पहली बार चालू करने पर यदि आप किसी भी कैटेगरी में जाएंगे तो वहाँ यह लिखा मिलेगा - आपकी लाइब्रेरी अभी खाली है, इसे भरने के लिए आपको फ़ाइल खंड में जाना होगा और मीडिया स्रोत जोड़ना होगा और उसे कॉन्फ़िगर करना होगा. जब आपका स्रोत जुड़ जाएगा और सूचीबद्ध कर लिया जाएगा तो फिर आप अपनी लाइब्रेरी में ब्राउज़ कर उसका उपयोग कर सकेंगे.

जब आप एंटर फ़ाइल सेक्शन में क्लिक/टच कर आगे जाएंगे तो आपको मीडिया के लिए ब्राउज़ करने कहा जाएगा. आप चाहें तो स्थानीय फ़ाइलों/डिरेक्ट्री/फ़ोल्डर चुन सकते हैं अथवा इंटरनेट पर उपलब्ध किसी रेपोसिटरी से एडऑन जोड़ सकते हैं. जैसे कि मैंने अपने संगीत में काम रेडियो और रेडियो सिटी फ़्यूजन को शामिल किया है.

कोडी – एडऑन की दुनिया

कोडी का असली मजा उसके एड-ऑन हैं. हर किस्म के एड-ऑन. हर मौके के लिए. गीत-संगीत-हँसी-मजाक-खाना-खजाना-खेल-खिलाड़ी-फ़िल्म-पर्यटन-कार्टून सबकुछ. यहाँ अलजजीरा भी है तो बीयर गीक्स भी. बस, थोड़ी शांति से खोजबीन की जरूरत है. वैध-अवैध सबकुछ. एक नजर नीचे दिए गए कोडी के संगीत के ऑफ़ीशियल एड ऑन के स्क्रीनशॉट पर मारें –

clip_image006

पसंदीदा एडऑन इंस्टाल करें और अंतहीन, ब्रेक-रहित गीत-संगीत की दुनिया में खो जाएँ. कोडी – आपकी दुनिया बदल देगी.

कोडी की साइट पर यह भी लिखा है, और वाजिब लिखा है –

clip_image008

विंडोज के लिए कोडी यहाँ से डाउनलोड करें - https://kodi.tv/

एंड्रायड के लिए गूगल प्लेस्टोर से कोडी (Kodi) तथा कोडी रिमोट कोर (kore) सर्च कर इंस्टाल करें.

यदि आपका टीवी स्मार्ट नहीं है, और उसमें एक अदद अतिरिक्त एचडीएमआई इनपुट है, तो बेहतर तो यह होगा कि ईबे या अपने शहर के इलेक्ट्रॉनिक मार्केट से एंड्रायड मीडिया बॉक्स (कोडी पूर्व स्थापित हो तो बेहतर) ले आएँ. यदि आपका स्मार्ट टीवी एंड्रायड / गूगल प्लेस्टोर सपोर्ट करता है तो प्लेस्टोर से कोडी ऐप्प इंस्टाल करें.

क्योंकि कोडी में सबकुछ है! और इसके सामने तो तथाकथित स्मार्ट-टीवी को भी शर्म आ जाए!

--

image


दृश्य एक
पहला : यार! बहुत दिनों से कोई स्कीम नहीं लाए
दूसरा : सर, एक एकदम चकाचक स्कीम लाया हूँ. दिल खुश हो जाएगा.
पहला (खुश होकर, उम्मीद से) : बताओ बताओ
दूसरा : सर, एक योजना आई है. सेंट्रल की है. 50% सब्सिडी की. हर्बल, एलोवीरा या जेट्रोफा की खेती पर.
पहला : अच्छा! ये तो बढ़िया है.
दूसरा : सर, कोई पचासेक बड़े क्लाइंट आ गए हैं. सबसे बात हो गई है. सबके कागज़ात भी तैयार हो गए हैं. हर एक को उनकी जमीन के रकबे के अनुसार दो से पांच करोड़ के बीच फाइनेंस का मामला बनता है.
पहला : वाह! यार, तुम तो बड़े तेज निकले. इधर गाय बियाई नहीं, उधर दुहना चालू. हे हे हे... (कुटिल हँसी)
दूसरा :  हे हे हे... (बड़ी कुटिल हँसी). अब आप देख लीजिएगा, काम जल्दी हो जाए. कहीं अड़चन न आने पावे.
पहला : बिल्कुल.

दृश्य दो
पहला : यार! बहुत दिनों से कोई स्कीम नहीं लाए?
दूसरा : सर, वही तो लेके आया हूँ. याद है, पिछली दफा की 50% हर्बल खेती सब्सिडी योजना?
पहला :  हाँ हाँ, वो तो क्या बढ़िया स्कीम थी यार. मजा आ गया था.
दूसरा : हाँ, सर तो उसी में आगे हुआ ये है कि कुछ क्षेत्रों को अवर्षाग्रस्त घोषित किया जा रहा है, और 25% कर्जमाफी की बात हो रही है. अपने लोग इस क्षेत्र में नहीं आ पा रहे हैं. कुछ करें और इन्हें भी जोड़ लें तो बढ़िया स्कीम हो जाएगी.
पहला : वाह! यार क्या बात है! सही समय पे बताया. आज ही रिकमंडेशन जाने वाली है. तुम मुझे डिटेल दो अभी जोड़वाता हूँ.

दृश्य तीन
पहला : यार! बहुत दिनों से कोई स्कीम नहीं लाए?
दूसरा : अरे सर, इलैक्शन में बिजी था. वो क्या है ना अगली बार अपने को टिकिट मिलने का जुगाड़ लगाना है ना तो गोटियाँ बिठा रहे थे और क्या.
पहला : अच्छा, अच्छा. पर कोई स्कीम भी तो लाओ!
दूसरा : हाँ, हाँ, उसी सिलसिले में ही तो आया हूँ सर. नई सरकार की, मेनिफेस्टो के तहत कर्जमाफी की योजना बन रही है. पता चला है कि उसमें कुछ लिमिट होगी. तो, यदि हर्बल, अलोवीरा, जेट्रोफा पर लिमिट हटा दें तो मामला मस्त हो जाएगा.
पहला : अच्छा, वो पहले वाला सेंट्रल सब्सिडी वाला?
दूसरा : हाँ हाँ, वही.
पहला : यार, वो महकमा दूसरे के पास है, जिससे मेरी पटरी नहीं बैठती. फिर भी कुछ टुकड़े फेंक कर प्रयास किया जा सकता है.
दूसरा : तो कीजिए न सर! चकाचक काम हो जाएगा. 75% तो हो ही गया है भगवान की दया से. बाकी 25% ही तो बचा है. हें हें हें ... (कुटिल हँसी)
पहला : ये तो तुम सौ परसेंट की स्कीम ले आए यार! इसमें तो क्लाएंट भी बड़े इमानदार हैं. कुछ ठोस करना ही पड़ेगा. हें हें हें... (बड़ी कुटिल हँसी)

दृश्य चार
पहला : यार! इस बार बड़ी जल्दी आ गए? कोई नई स्कीम लाए हो?
दूसरा : वो क्या है ना सर, टाइम बढ़िया चल रहा है. सेलेब्रेशन टाइम. मिठाई का पैकेट लेकर आया हूँ. 100% स्कीम की मिठाई. शुद्ध मावे से बनी काजू कतली और स्विस चॉकलेट. आपका पिछला प्रयास सफल रहा था. सारी खेती 100% में सेटल हो गई. हें हें हें... (कुटिल हँसी)
पहला : मिठाई का टुकड़ा मुँह में रखते हुए – हें..हें..हें... (बड़ी कुटिल हँसी) पर, यार कोई नई स्कीम तो लाओ…

दूसरा : है ना सर. बिल्कुल है. किसान आंदोलन….
-------------

image

पूरे एक दशक में भी भारत नहीं बदला. एक जज फरार है और भारतीय पुलिस उसे खोज नहीं पाई है! पूरा सिस्टम ही फरार है.

प्रस्तुत है 2005 में फरार पर लिखी पोस्ट का रीपोस्ट -


बिहार के पाँच विधायक अर्से से फरार थे, जो, जाहिर है, चुनावी बेला पर नमूदार हो गए. इससे पूर्व केंद्रीय मंत्री शिबूसोरेन को कोर्ट का समन जारी हुआ था तो वे मंत्री पद छोड़ कुछ दिनों तक फरार हो गए थे. इस बीच वे मीडिया को साक्षात्कार देते रहे. जब समन बीत गया तो वे प्रकट हो फिर मंत्री बन गए. यूं तो सारा देश फरार हो गया है. सोने की चिड़िया भारत, हिन्दुस्तान बचा है क्या? उसे हमने कहीं फरार करवा दिया है और जो हमारे पास बचा है वह प्लास्टिक, पॉलिथीन का इंडिया है...
*-*-*
व्यंज़ल
//**//
समग्र मुल्क फरार है
जिस्म है जाँ फरार है


अवाम बैठी मुँह खोले
और हाकिम फरार है


क़ैदी है जेल में लेकिन
वहाँ सिपाही फरार है


देखो दुनिया दीवानी
जिए वही जो फरार है


सोचे है रवि बहुत पर
उसका कर्म फरार है
--**--

image

साहित्यिक खेती

यदि आपमें पत्रकारीय गुण हैं तो आप साहित्यिक खेती के लिए सदा-सर्वदा से उपयुक्त पात्र होंगे, वो भी इस सृष्टि के प्रारंभ से, और इसके अंत होने तक. क्योंकि, जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे साहित्यकार. ठीक है, तुकबंदी में थोड़ी तुक मिल नहीं रही है, मगर मसला अब खांटी-कवि से आगे बढ़कर बहु-विध-साहित्यकार तक पहुँच गया है, इसलिए बेतुका भी चलेगा.

तो, बात साहित्यिक खेती की और पत्रकारीय गुण की हो रही थी. यदि आपमें पत्रकारीय गुण हैं तो आप हर विषयों में लिखने में पैदाइशी सक्षम होंगे. सृष्टि के हर अंधे कोने में प्रकाश डालने में सक्षम होंगे. हर विषयों के ज्ञाता होंगे. आपके लिखे के हर हर्फ, हर वाक्य और हर पैराग्राफ में ज्ञान-गंगा बहती मिलेगी. इतनी, कि आप लता को लता नहीं, केवल भजन गायिका भी कह लेंगे, और ऐसा कहते हुए आपको कान पकड़ने की भी जरूरत नहीं होगी. अब भले ही उस किस्म का लेखन केल्कुलेटेड मूव हो, टीआरपी बटोरक हो, मगर भई, बात खेती की हो रही है तो उपज तो अच्छा मंगता है ना? इसलिए, कंट्रोवर्सी की  शातिराना खाद, इन्वोकिंग की कीटनाशक-खरपतवार नाशक और ट्रॉलिंग की निराई-गुड़ाई भी भरपूर होती है और ऐवज में उपज में बढ़ोत्तरी दिनोंदिन होती है. इतनी, कि इधर स्टेटस का एक सड़ियल सा बीज बोया, और उधर लहलहाती फसल तैयार!

साहित्यिक खेती में कविताई खेती सबसे आसान है. हर कोई – दोहराया जा रहा है – हर कोई, जिसके हाथ में आज एक अदद स्मार्टफ़ोन है, वो कविता लिखने में सक्षम है और अधिकांश लिख रहे हैं, छप भी रहे हैं, भले ही ये बात दीगर हो कि कहाँ छप रहे हैं अथवा छप कहाँ रहे हैं. मेहनत लगे न मजूरी, कविता बढ़िया आय. वो भक्तिकालीन जमाना गया जब रसछंदालंकार की बातें होती थीं, और कविताई में मात्रादि की गिनती होती थी, भाव और वर्तनी की बातें होती थी. अब तो जब भाषा में देवनागरी अक्षरों के साथ रोमन स्क्रिप्ट भी घुसती चली आ रही है तो मात्राओं की गिनती की बातें तो छोड़िये, वर्तनी भी भूल जाइए. पता नहीं किस दिलजले शब्दकार ने ‘कि’ और ‘की’ गढ़ दिया जिसमें प्रकटतः आज के तथाकथित मॉडर्न साहित्यकारों को कोई आम-या-खास अंतर नज़र ही नहीं आता.

कविता में, जब भावों को पढ़ने वालों के ऊपर छोड़ा जा सकता है तो वर्तनी को भी तो पाठक के ऊपर छोड़ा जा सकता है – कि भइए, तुझमें अगर औकात है तो ठीक करके पढ़ले. नहीं तो आगे बढ़ले! या, शायद अधिकांश समकालीन कविता लेखन इसी थ्योरी के आधार पर होने लगी हैं. भले ही माइक्रोसॉफ्ट, गूगल से लेक फ़ेसबुक तक सब अपने अपने लेखन प्लेटफ़ॉर्म में हिंदी वर्तनी जांच की अंतर्निर्मित सुविधा प्रदान कर दें, पर, हमें क्या? वर्तनी से हमारे लेखन को क्या लेना-देना? आज की साहित्यिक खेती की फसल में वेल्यू एडीशन वर्तनी से नहीं, बल्कि स्त्रीवाद, दलितवाद, किसानवाद, राष्ट्रवाद आदि-आदि से होता है. और हाँ, मार्क्सवाद से कभी आता रहा होगा, पर अब जमाना आईएसआईएसवाद का आ गया है, गौरक्षावाद का आ गया है.

साहित्यिक खेती में एक बात और विशिष्ट किंतु मजेदार है. हर कोई, अपने-अपने खेत-खलिहान को बटोरने, चमकाने, बढ़िया फसल पाने और उसके बाद बाजार में उसका उत्तम मूल्य पाने में संघर्षरत है. मगर साथ-साथ वो दूसरे की खेती को एकदम निकृष्ट, बेकार, अनुपयोगी, कचरादि बताने-स्थापित करने में उतना ही तल्लीन और प्रयासरत है. यहाँ तक कि एक समकालीन कवि अपने और गिनती के दो और के अलावा किसी और को कवि मानता ही नहीं. बताओ भला! जिस देश में सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया तक में कवि, कविताई, कविता-संग्रहादि भरे पड़े हों, यहाँ तक कि नुक्कड़ की भजिए की दुकान में किसी कागज के ठोंगे में पकौड़े खाते हुए इस बात की शत-प्रतिशत संभावना रहती है कि ठोंगे का कागज़ किसी कविता-संग्रह के चिकने आर्टपेपर का बना है और उसमें किसी कवि की उद्दात्त प्रेम कविता छपी है, वहाँ केवल और केवल तीन अदद कवि! हे ईश्वर! इन पंक्तियों का सृजन होते समय यह सृष्टि नष्ट क्यों न हो गई!

मैंने भी आज की अपनी साप्ताहिक जुगलबंदी की खेती कर ली है. देखते हैं टिप्पणियों, साझाकरण आदि की वाइरल फसल कितनी होती है.

1.6.2017_kajal_cartoon_bihar_exam_topper

(कार्टून – साभार काजल कुमार के कार्टून)

दुनिया में केवल और केवल दो तरह के लोग होते हैं. या तो टॉपर या फिर टॉपरों से भयभीत. मैं दूसरे किस्म का व्यक्ति हूँ. टॉपरों से भयभीत. टॉप और टॉपरों से मुझे सदैव भय लगता आया है. जिस तरह से कुछ लोगों को ऊंचाई से भय लगता है, बिलावजह, शायद जेनेटिक खामियों की वजह से. ठीक उसी तरह मुझे भी टॉप और टॉपरों से भय लगता रहा है. कुछ केमिकल लोचा है. कुछ जेनेटिक खामी है मुझमें.

पढ़ाई के दौरान टॉपरों से अधिक भय लगता रहा. पता नहीं कब, कौन, कैसा साथी टॉप कर जाए और अपन टीपते रह जाएँ, और पालकों की तिर्यक निगाहों का सामना करना पड़ जाए! प्रायोगिक विषयों के विद्यार्थी होने के कारण, बिना किसी आग्रह-पूर्वग्रह के, जब कुछ विशिष्ट सहपाठियों के प्रति कुछ विशिष्ट शिक्षकों के कुछ विशिष्ट अति उदारमना होने और उन्हें अतिरिक्त दक्षिणा की तरह सोत्साह अतिरिक्त अंक प्रदान करने की टॉप घटनाओं से कई-कई बार आहत होते रहे और टॉप की अंकीय-चोटें खाते रहे.

image

इस तरह, टॉपरों से जूझते-उलझते जब नौकरी में आए तो ऐसे विभाग से पाला पड़ गया जहाँ हर महीने और हर महत्वपूर्ण कार्यालयीन बैठकों में टॉपरों, टॉप की सूचियों से पाला पड़ता रहा. टॉप-परफ़ॉर्मेंस के लक्ष्य तो खैर दिए ही जाते थे, जिसमें उत्साही और अति-उत्साही किस्म के लोग लक्ष्य हासिल करने में सदा-सर्वदा टॉप में ही आते रहे और हमारे जैसे जन्माल्सी (भई, जन्म से आलसी, और क्या!), टॉप से भयभीत लोगों के लिए टॉप की जगह सदैव दूर की कौड़ी बनी रही. इस बीच कुछ ऐसे उप-विभाग में भी पदस्थापना हुई जहाँ किसिम किसिम के टॉपरों की सूची तैयार करनी होती थी. एक बानगी तो ऊपर दिए गए चित्र से प्रकट हो ही रही है.

तब टॉपरों से और भी अधिक समस्याएँ होती थी. टॉपरों की सूची बनाने में ही समस्या खड़ी हो जाती थी. उन दिनों, जब दुनिया में कंप्यूटर नहीं था, एक क्लिक से डेटा सार्टिंग होती नहीं थी, बिग डेटा जैसी परिकल्पना नहीं थी, डेटा-एनालिस्ट होते नहीं थे, तब आपको हजारों लाखों विद्युत उपभोक्ताओं में से अपने हाथों से छांटकर टॉप की सूची बनानी होती थी कि कौन सबसे डिफ़ॉल्टर है, कौन सबसे ज्यादा बिजली उपयोग करता है, कौन सबसे कम बिजली जलाता है, किस क्षेत्र में सबसे ज्यादा चोरी या गुल होती है, किस क्षेत्र के लोग बिजली, ट्रांसफ़ार्मरों से बिजली का तेल, बिजली के तार आदि न जाने क्या क्या चोरी ज्यादा करते हैं आदि आदि. बात यहीं तक यानी केवल टॉपरों की सूची बनाने तक होती तो भी ठीक थी. ऐसी टॉपर सूची बनाकर बैठकों में अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत कर गालियाँ ऊपर से खाते थे और नए टॉप लक्ष्य पाते थे – टॉप डिफ़ॉल्टरों की सूची के लिए समय-बद्ध कार्ययोजना बनाई जाकर डिफ़ॉल्टरों से पैसा वसूला जाए और यह डिफ़ॉल्टर टॉपर सूची शून्य पर लाई जाए. अब कोई अफसरों को बताए कि मनुष्य के विकासक्रम में डिफ़ॉल्टर कहीं भी, कभी भी शून्य स्तर पर रहे हैं? जब मानवता के इतिहास में डिफ़ॉल्टर कभी भी शून्य नहीं रहे हैं तो बिजली उपभोक्ताओं से उम्मीदें क्यों पाली जाती हैं भला, और ऐसे इम्पॉसिबल, नामुमकिन किस्म के लक्ष्य अफ़सरों द्वारा अपने अधीनस्थों को क्यों दिए जाते हैं. ऐसे असंभव किस्म के लक्ष्य देने वाले अफ़सरों की मनोवैज्ञानिक जांच की जानी चाहिए और यथासंभव उन्हें लूप-लाइन में डालना चाहिए जहाँ अफ़सरशाही की संभावना शून्य हो. और, बिजली ही क्यों, बैंकिंग, टेलिफ़ोन आदि आदि उपभोक्ताओं से भी क्यों उम्मीदें पाली जाएँ!

जब देखा गया कि टॉप डिफ़ॉल्टर कम ही नहीं हो रहे हैं, तो किसी अद्भुत किस्म के अफ़सर ने उतनी ही अद्भुत कल्पना की और कार्यालयीन इतिहास का सदा-सर्वदा का अद्भुत आदेश जारी किया – टॉप 10 डिफ़ॉल्टरों की सूची सार्वजनिक नोटिसबोर्ड और इंटरनेट पर जारी की जाए. इससे डिफ़ॉल्टरों में शर्म महसूस होगी और मारे शर्म के वे अपना लंबित बिजली बिलों का भुगतान करेंगे. मगर माल्या – माफ कीजिए, कीबोर्ड मालफंक्शन हो गया लगता है - मामला बूमरैंग की तरह हो गया लगता है. टॉप डिफ़ॉल्टरों की सार्वजनिक इंटरनेटी सूची का कोई भला मानुस अध्ययन करे, शोध करे तो यह पाएगा कि सूची नियमित अंतराल पर बिला-नागा अपडेट होती है और डिफ़ॉल्टर और डिफ़ॉल्ट की दर भी बिला-नागा उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर है. प्रतीत होता है कि डिफ़ॉल्टरों में टॉप सूची में आने हेतु बमचक मची है और हर कोई उस टॉप सूची में शामिल होने की दौड़ में शामिल है. नए-नए लोग उस सूची में आने को लालायित हैं!

अब आप अपनी बताएं. आप टॉपर हैं या टॉपरों से भयभीत?

#व्यंग्यजुगलबंदी 37

image

यदि आप गीत संगीत वह भी अच्छी गुणवत्ता का सुनने-सुनाने का शौक फरमाते हैं तो डॉल्बी एटमॉस के बारे में जरूर जानते होंगे और बहुत संभव है कि आपके पास कोई न कोई उपकरण – ऑडियो या वीडियो उपकरण ऐसा होगा जो डॉल्बी एटमॉस संगत होगा. डॉल्बी एटमॉस उच्च गुणवत्ता का ध्वनि प्रभाव उत्पन्न करता है और आजकल बहुत से फ़िल्मों में भी यह तकनीक आ रही है – खासकर 3डी एनीमेशन में.

अभी तक कुछ लैपटॉप आदि में तथा कुछ उच्च गुणवत्ता के डेस्कटॉप पीसी में डॉल्बी और डॉल्बी एटमॉस उपलब्ध थे, जो अतिरिक्त हार्डवेयर लगा कर सक्षम किए जाते थे. बहुत से मोबाइल उपकरणों में भी यह उपलब्ध है.

परंतु हाल ही में उपलब्ध विंडोज क्रिएटर्स अपडेट के जरिए अब यह सुविधा हर डेस्कटॉप पीसी पर उपलब्ध हो सकेगी.

हाल ही में मैंने भी अपने डेस्कटॉप कंप्यूटर पर विंडोज क्रिएटर्स अपडेट स्थापित किया और पाया कि डॉल्बी एटमॉस की मल्टीचैनल संगीत सुनने की सुविधा  डॉल्बी ऐक्सेस नाम का ऐप्प इंस्टाल करने पर हासिल हो गई है. 7.1 स्पीकर वर्चुअल सराउंड की सुविधा हेडफ़ोन से मिलती है और यदि आपके पास 7.1 या 5.1 स्पीकर सिस्टम है तो अपने डेस्कटॉप पीसी के ऑप्टिकर आडियो आउट या एसपीडीआईएफ आउट से अथवा एचडीएमआई आउट से इसे जोड़ कर वास्तविक डॉल्बी डिजिटल साउंड का आनंद ले सकते हैं.

मेरे पीसी में ऑप्टिकल / एसपीडीआईएफ आउटपुट की सुविधा नहीं है, मगर एचडीएमआई आउट की एक अतिरिक्त सुविधा है तो मैंने अपने डिस्प्ले को विस्तारित किया, एचडीएमआई केबल को 5.1 ऑडियो रिसीवर से जोड़ा और थोड़ी सी स्पीकर सेटिंग के बाद यह हो गया पूरी तरह तैयार – डॉल्बी सिस्टम से मल्टी चैनल म्यूजिक प्लेबैक के लिए. हाँ, इसका सही अनुभव करने के लिए कुछ अच्छी क्वालिटी का फ्लैक म्यूजिक फ़ाइल डाउनलोड कर चलाएँ तो और बढ़िया. हालांकि डॉल्बी एटमॉस के लिए आपका ऑडियो रिसीवर  सिस्टम भी डॉल्बी एटमॉस युक्त होना चाहिए, और 7.1 स्पीकर सिस्टम होना चाहिए. यह प्रीकंडीशन हेडफ़ोन के लिए नहीं है, मगर हेडफ़ोन में वर्चुअर सराउंड का प्रभाव जाहिर है, सीमित ही होता है. फिर भी, मेरे वर्तमान ऑडियो वीडियो रिसीवर सिस्टम में जिसमें डॉल्बी डिजिटल प्लस की सुविधा है, फ़ूबार 2000 के जरिए बज रहा संगीत वही है, परंतु अब 5.1 सराउंड मोड में यह नया, अद्भुत क्वालिटी का संगीत प्रभाव पैदा कर रहा है.

जाहिर है, वास्तविक डॉल्बी एटमॉस तो और भी अधिक गुणवत्ता का होगा. लगता है अपने रिसीवर को भी 7.1 डॉल्बी एटमॉस में बदलने का समय आ गया है.

अन्य रचनाएँ

[random][simplepost]

व्यंग्य

[व्यंग्य][random][column1]

विविध

[विविध][random][column1]

हिन्दी

[हिन्दी][random][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][random][column1]

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

[random][column1]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget