टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

May 2017

31-5-17(विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष )

तम्बाकू  का जहर

यशवंत कोठारी

तम्बाकू `निकोटियाना” नामक पौधे की सुखी पत्तियों के रूप में पाया जाता है.

इस पौधे की लगभग 60 किस्में होती है जिनमें से केवल 2 निकोटीयाना टबेकुम और निकोटी याना रसटीका बहुतायत से उगाई जाती है. भारत में निकोटी याना टबेकम का उपयोग सिगरेट ,सिगार,चुरुट ,बीड़ी ,हुक्का और सुन्गनी के लिए किया जाता है. यह पूरे देश में उगाई जाती हैं. लेकिन निकोटीयाना रसटिका के लिए ठंडी जलवायु चाहिए ,  अतः:यह पंजाब,हिमाचल बिहार आसाम में होती है. भारत में हजारों करोड़ की तम्बाकू हर साल पैदा होती हैं. काफी भाग निर्यात किया जाता है. तम्बाकू की पैदावार का मूल्य व् लाभ काफी अधिक है. इस आय को मूर्खों का सोना कहा जाता है. क्योंकि इस आय के कारण कई प्रकार के नुकसान होते हैं. दवा, बीमारी , कैंसर  , असामयिक मृत्यु आदि के कारण केवल अमेरिका में ही सौ करोड़ डालर का नुकसान हर साल होता है. भारत में यह नुकसान और भी ज्यादा है.

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इस फसल के कारण अधिक आय के लोभ के कारण किसान अनाज , फल सब्जी की खेती कम कर देता है. नाइजीरिया में यही हालत हो गयी है.

तंबाकू से कर व् राजस्व प्राप्त होता है,लेकिन होने वाले नुकसान ज्यादा बड़े व् भयंकर होते हैं. यदि बीमारी व् दवा को जोड़ा जाय तो तम्बाकू से नुकसान ही नुकसान है. सिगरेट,बीड़ी गुटखा, खैनी, व् अन्य प्रकार के तम्बाकू से कैंसर,पेट के रोग व् अन्य कई परेशानियाँ होती है.

बीड़ी के लिए तम्बाकू को तेंदू के पत्ते पर लपेटा जाता है . तेंदू पत्तों के कारण कई जंगल नष्ट हो गए हैं. बीड़ी बनाने वाले मजदूरों की हालत खराब हैं , इस काम में बच्चों व औरतों को लगाया जाता है बिचौलिये इनका शोषण करते हैं.

घर से का म करने के कारण मालिकों की कोई जिम्मेदारी नहीं होती. बीड़ी मजदूर कल्याण एक्ट बना है मगर इन मजदूरों को कोई फायदा नहीं मिला. तम्बाकू ,गुटका सिगरेट लॉबी बड़ी प्रभाव शाली हैं.

गुटके , पान मसाले, खैनी बनाने वाले बड़े बड़े मिल मालिक तम्बाकू में कई प्रकार की चीजें मिला देते हैं, जिनमें कुछ जीवित कीट पतंग भी हो सकते हैं. जिस से नशा आ जाता है. सिगरेट के कागज के कारण हजारों पेड़ कट जाते है, जंगल तबाह हो गए हैं. यह उद्योग जंगलों को नष्ट करने में पहले स्थान पर है. हर तीन सौ सिगरेटों के लिए एक पेड़ की बलि ली जाती है. एक रपट के अनुसार आंध्र व् तेलन्गाना रेगिस्तान में बदल रहे हैं क्योंकि वहां पर तम्बाकू की फसलों के कारण जमीन  बंजर हो गयी है. काम करने वाले मजदूरों के स्वास्थ्य के प्रति कोई जिम्मेदारी मिल मालिक नहीं निभाता. सरकार कभी कभी कानून के नाम पर खाना पूर्ति करती हैं. बीड़ी सिगरेट व् गुटके पर होने वाले व्यय के कारण परिवार भूखे सोते हैं , कम खाते हैं, पारिवारिक जीवन नष्ट हो रहे है. बड़ी कम्पनियां इस व्यापी से कम कर दूसरे उद्योग लगा रहे हैं. देखे देखते गु टका उद्योग कहाँ  से कहाँ पहुँच गया है.

हरे तम्बाकू से सेवन से चक्कर आते हैं,सर दर्द होता है साँस लेने में परेशानी आती है. सूखी खांसी हो जाती है. मजदूरों में कैंसर टी बी ,दमा ,एलर्जी गठिया आदि हो जाते हैं. लेकिन सरकार इसके उत्पादन , वितरण पर रोक नहीं लगाना चाहती. गुटका, पान मसाला , खैनी, व् सुखी तम्बाकू बेचने वाले शक्तिशाली हैं इस लॉबी से निपटना मुश्किल है. तम्बाकू से जुड़ी कम्पनियां विज्ञापन ,व् अन्य उपायों से बिक्री बढ़ाती है. भारतीय तम्बाकू उद्योग करोड़ों रुपये बिक्री बढ़ाने में खर्च करता है. सरकार केवल डिब्बी पर चेतावनी छपवा देती है,कठोर कार्यवाही नहीं करती है.

नए किशोर लड़के इस और जल्दी आकर्षित होते हैं. वे शुरू में शौक शौक में पीते हैं फिर आदत पड़ जाती है. नयी पीढ़ी की लड़कियां भी हॉस्टल में सिगरेट का धुंआ उड़ाती है.

कई अध्ययनों से पता चला है की तम्बाकू से फेफड़ों व् मुंह का कैंसर  होता है. हृदय रोग,साँस रोग भी हो जाते हैं. भारत में करोड़ों लोग इन रोगों से ग्रस्त है . प्रति वर्ष लाखों लोग तम्बाकू जनित रोगों से मर जाते हैं. धूम्रपान न करने वाला ज्यादा जीता है. अप्रत्यक्ष धूम्रपान भी बहुत हानिकारक है. बंद कमरे में पी गयी दो सिगरेटें वातावरण को बीस गुना ज्यादा दूषित करती हैं.

गर्भावस्था में धूम्र पान शिशु को नुकसान पहुंचाता है. ,बच्चा कमज़ोर हो सकता है, मरा पैदा हो सकता है. माता को भी नुकसान पहुंचता है.

आयुर्वेद में धूम्रपान को एक इलाज के रूप में प्रयुक्त करने का विधान है. हानिकारक स्मोकिंग को दवाओं के स्मोकिंग से छुड़ाया जा सकता है.

तम्बाकू किसी भी रूप में हो नुकसान ही करता है, कैंसर ,  से होने वाली मौतों का प्रमुख कारण तम्बाकू ही है . सरकार को तम्बाकू के खिलाफ और भी कठोर कानून बनाने चाहिए ताकि जन स्वास्थ्य अच्छा रहे व् देश की प्रगति में योग दान दे सके .

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यशवंत कोठारी ८६, लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी बहार जयपुर -३०२००२

मो-९४१४४६१२०७

मानहानि का तो अपने देश में ऐसा है कि बच्चा पैदा होते ही अपने साथ एक अदद मानहानि साथ लेकर आता है. दरअसल बच्चा कोख में कंसीव होते ही अपने पालकों के लिए संभाव्य मानहानि लेकर आता है. तमाम भ्रूण-लिंग-परीक्षणोपरांत कन्या-भ्रूण-हत्या इस बात के जीवंत उदाहरण हैं कि उन बेचारी लाखों अजन्मा-कन्याओं ने इस नश्वर संसार में पदार्पण से जबरिया इन्कार कर अपने पालकों, रिश्तेदारों, समाज आदि की संभाव्य मानहानि को अपनी कुर्बानी देकर किस तरह से बचाया है.

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जन्मोपरांत भी मामला मानहानि का ही रहता है. सदैव. शाश्वत. सर्वत्र. नवजात शिशु – चाहे वो पुत्र हो या - सोनोग्राफ़ी की पकड़ में आने से बच निकल चुकी - पुत्री - यदि वो अल्पसंख्यक जमात में पैदा होते हैं तो वो बहुसंख्यकों की मानहानि करते हैं. यदि वो बहुसंख्यक जमात में पैदा होते हैं तो फिर जाति-कुनबे-अगड़े-पिछड़े-ब्राह्मण-दलितों-आदि के बीच मानहानि का मामला बनता है. ऊपर से, लोग दलित को दलित बना-बता कर मानहानि करते हैं तो इधर ब्राह्मण-ठाकुर को ब्राह्मण-ठाकुर बना-बता कर मानहानि करते हैं. अर्थ ये कि किसी जात में शांति नहीं. भारत में आदमी आदमी से मिलता है तो प्रकटतः भले ही मौसम की बात करे, पर उसके मुंह में एक अदृश्य प्रश्न सबसे पहले तैरता है – कौन जात हो? अब आदम जात चाहे साक्षात ब्रह्मा की नाभि से निकला हो, मगर मानहानि होना तय है. दोनों बामन भी होंगे तो सामने वाले को बोलेंगे – साला कान्यकुब्जी, सरयूपारीण के सामने बात करता है (या, इसके उलट,)!

इधर बेचारा बच्चा पूरे दो साल का हुआ नहीं, ठीक से बोल-बता पाता नहीं, चल-फिर पाता नहीं, और पालक उसकी मानहानि का पूरा इंतजाम पहले ही किए हुए रखते हैं. प्री-स्कूल, प्ले-स्कूल या नर्सरी (शुद्ध हिंदी वालों से क्षमायाचना सहित, उनकी मानहानि करने का कतई इरादा इस लेख या इस लेख के लेखक का नहीं है) में मोटी फीस देकर दाखिला दिला देंगे, वो भी अपनी जी-जान से की गई कमाई और बरसों की बचत में से अच्छा खासा हिस्सा निकाल कर. यहाँ चौ-तरफा मानहानि हो रही है जो किसी को दिखाई नहीं देती. फ्रैंचाइजी स्कूल दिहाड़ी मजदूर के बराबर सैलरी में शिक्षक-शिक्षिका नियुक्त कर पालकों से मोटी फीस लेकर निरीह, अबोध छात्र को दाखिला देते हैं. एक पालक बड़े गर्व से दूसरे पालक को बताता है – मेरा गोलू तो टैडी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ता है! दरअसल, वो घोषित तौर पर, अप्रत्यक्ष रूप से, सामने वाले की मानहानि कर रहा होता है – अबे! मेरी जैसी तेरी औकात है भला? अगर हमारे देश में न्याय तुरंत-फुरंत मिलता, न्याय मिलने में इतनी देरी नहीं होती, ज्यूरी सिस्टम चलता होता तो ऐसे मानहानि के केसेज़ भी बहुत आते – मीलार्ड, इसने पब्लिकली मुझे बताया कि इसका बेटा टैडी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ता है. यह तो सरासर मेरी पब्लिकली मानहानि हुई. क्या मेरी औकात नहीं है, जो ये मुझे पब्लिकली सुना रहा है?

भारत भूमि के जातक के इस प्रकार, बचपन से शुरू हुए मानहानि का ये सिलसिला उसके महाप्रयाण तक, और उसके बाद भी जारी रहता है. जनसंख्या के दबाव में उसे दफनाने के लिए ढंग के दो गज जमीन मिलना मुश्किल है, तो जलाने के लिए घी-चंदन की लकड़ी की जगह विद्युत-शवदाह गृह मृत देह के आसरा बनने लगे हैं. इधर, मृतात्मा की शांति के लिए मृत्यु-भोज से लेकर क्रिया-कर्म के पाखंड हुतात्माओं के लिए मानहानि नहीं तो और क्या हैं?

जिधर भी देख लें – मानहानि प्रत्यक्ष है. उदाहरण के तौर पर लें तो लेखक-पाठक के बीच भी मानहानि का परस्पर सीधा सच्चा संबंध है. खासकर हिंदी लेखकों-पाठकों का. मुझे मिलाकर (मुझमें कोई सुर्खाब के पर नहीं लगे हैं इसकी तसदीक मैंने भली प्रकार से कर ली है!) अधिकांश हिंदी लेखक टेबल-राइटिंग के शिकार हैं और वो जो भी घोर-अपठनीय लिखते-प्रकाशित करते हैं, उसका सीधा अर्थ होता है – पाठकीय मानहानि. इधर पाठक भी उन रचनाओं पर तिरछी निगाह मारकर, उन घोर अपठनीय रचनाओं को न पढ़ कर, रद्दी की टोकरी में फेंक कर लेखकों की मानहानि कर देता है. हिसाब बराबर.

शायद, मानहानि के देश में,  जीवन का असली आनंद मानहानि में ही है.


#व्यंग्यजुगलबंदी 36

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(अनाम, अज्ञात कलाकार की अनटाइटल्ड कलाकृति)

  मुफ़्त के बियर की तरह, “बिना शीर्षक” जैसा दुनिया में कुछ भी नहीं होता. यह एक काल्पनिक अवधारणा है. जैसे ही आप कुछ देखते पढ़ते हैं, आपके दिमाग में कुछ न कुछ शीर्षकीय विचार आते ही हैं. यही तो शीर्षक होता है. पर अकसर होता यह है कि सृजनकर्ता सामने वाले को ‘कुछ और’ समझ अपना विवादित किस्म का शीर्षक अलग से, सोच-विचार कर चिपका देता है. उदाहरण के लिए, आप कोई कहानी पढ़ रहे होते हैं जिसका कोई बढ़िया सा, आकर्षक सा शीर्षक होता है, और जिसकी वजह से ही आप उस कहानी को पढ़ने के लिए आकर्षित हुए होते हैं. पर, पूरी कहानी पढ़ लेने के बाद, और बहुत से मामलों में तो, पहला पैराग्राफ़ पढ़ने के बाद ही, आपको लगता है कि आप उल्लू बन गए और सोचते हैं कि  यार! ये कैसा लेखक है? इसे तो सही-सही शीर्षक चुनना नहीं आता. इस कहानी का शीर्षक यदि ‘यह’ के बजाय ‘वह’ होता तो कितना सटीक होता!

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ग़नीमत ये है कि कलाकारों के उलट, साहित्यकारों की दुनिया में बिना-शीर्षक कहानी-कविताएँ-गीत-व्यंग्य प्रकाशित प्रसारित होने की कोई खास परंपरा नहीं है! यही हाल कहानी-कविता-व्यंग्य-हाइकु-ग़ज़ल संग्रहों का भी होता है. और, इसी वजह से, किसी लेखक के संग्रह का बड़ा ही टैम्प्टिंग किस्म का शीर्षक होता है - “मेरी 20 प्रिय कहानियाँ” तो वस्तुतः शीर्षक यह माना जाना चाहिए – “मेरी 20 बेसिर-पैर-की-बिना-प्लाट-की-घोर-अपठनीय” कहानियाँ. या फिर, ऐसा ही दूसरा और कुछ. उपन्यासों की तो खैर, बात ही छोड़ दें.  तब लगता है कि इस तरह की रचनाओं को तो बिना शीर्षक ही रहना चाहिए – जब वे बिना पाठक रहने को पहले ही अभिशप्त हैं तो फिर धांसू शीर्षक भी क्या कर लेगा भला! 

और, यह अकाट्य सत्य भी है कि यदि बहुत सी कहानियों उपन्यासों के शीर्षक दिलचस्प और आकर्षित करने वाले न होते, यदि वे बिना शीर्षक होते, तो शायद वे इस दुनिया में अवतरित ही नहीं होते. अधिकांश रचनाओं के शीर्षक सबसे पहले रचे जाते हैं – जैसे कि यह बिना शीर्षक वाली जुगलबंदी, फिर उसके बाद शब्दों का जाल बुना जाता है. ऐसे प्रयास में बहुधा रचना अपने शीर्षक से तारतम्य खो बैठती है – रचना कहीं और जाती है और शीर्षक कहीं और, और नतीजतन घोर उबाऊ, घोर अपठनीय रचना का जन्म होता है जिसे रचनाकार-मित्र-मंडली की समीक्षाओं-लोकार्पणों आदि आदि की सहायता से कालजयी सिद्ध करने का उतना ही उबाऊ और असफल प्रयास किया जाता है.

इधर, कलाकारों की दुनिया बड़ी विचित्र होती है. कुछ चतुर कलाकार उल्टे-सीधे, प्रोवोकेटिव किस्म के, विवादित शीर्षक देते हैं, तो बहुत से, शीर्षक-रहित खेलते हैं. वे कैनवास पर रंगों की होली खेलते हैं और नाम दे देते हैं – शीर्षकहीन. या कोई मूर्तिकार अपनी छिलाई-ढलाई में कुछ नया-पुराना सा प्रयोग करेगा, और - उसके सफल-असफल होने की, जैसी भी स्थिति हो - अपनी कलाकृति को प्रदर्शनी में टांग देगा और शीर्षक देगा – अनटाइटल्ड. याने शीर्षक भी “बिना-शीर्षक”. अब ये काम आपके, यानी दर्शक के जिम्मे होता है. प्रश्न पत्र में आए फिल इन द ब्लैंक की तरह, उसे देख कर उसमें शीर्षक भरने का. जैसे ही आप वो कलाकृति देखते हैं, और उसका शीर्षक ‘अनटाइटल्ड’ देखते हैं, आपका दिमागी घोड़ा शीर्षक ढूंढने दौड़ पड़ता है.

आदमी के जेनेटिक्स में ही कुछ है. वो किसी चीज को बिना शीर्षक रहने ही नहीं देता. और, कुछ ही चक्कर में आपका दिमागी घोड़ा धांसू सा शीर्षक निकाल ले आता है और, तब फिर आप कलाकार को कोसते हैं – मूर्ख है! इसका शीर्षक “यह” तो ऑब्वियस है. किसी अंधे को भी सूझ जाएगा. पता नहीं क्यों अनटाइटल्ड टंगाया है.

समकालीन राजनीति में तो स्थिति और भी अधिक शीर्षक युक्त है. बिना-शीर्षक कुछ-भी लिख दो, लोग शीर्षक निकाल ही लेते हैं. यहाँ तक कि एक दो अक्षरों के शब्द लिख दो तो भी लोग उसका शीर्षक निकाल लेते हैं. आप कहेंगे कि कुछ उदाहरण दूं? ठीक है, मुझे आपके चेहरे की स्माइली स्पष्ट नजर आ रही है, फिर भी, कुछ शब्द रैंडमली उछालते हैं. देखिए आपके जेहन में कुछ शीर्षक आते हैं या फिर आपकी सोच बिना शीर्षक ही रह जाती है –

फेंकू

पप्पू

नौटंकी

शीर्षक कौंधे दिमाग में? यह तो, शीर्षक के भी शीर्षक होने वाली बात हो गई. अर्थ यह कि बिना शीर्षक जैसा कहीं कुछ भी नहीं. “शीर्षक” तो, सीधे स्वर्ग से, जन्नत से उतरा है.

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कोदसेक साल पहले मैंने कुछ कल्पना की थी कि मेरा स्मार्टफ़ोन कैसा हो. मेरी बहुत सी इच्छाएँ पूरी हो गई है. परंतु इच्छाओं का क्या. एक पूरी हो तो दूसरी. और, इच्छाएं ऐसी हों कि हर इच्छा पे सांस फूले. बहरहाल, आने वाले समय के लिए मेरी स्मार्टफ़ोनी इच्छाएँ कुछ ऐसी हैं –

1 स्मार्टफ़ोन रीयल स्मार्ट हो नाम के नहीं

जी हाँ! अभी का, आपके हाथों का स्मार्टफ़ोन, भले ही फ्लैगशिप किस्म का हो, मार्केट में हाल ही में नया नकोर उपलब्ध हाई एंड कॉन्फ़िगुरेशन, डेका-कोर और 8 जीबी रैम, 128 जीबी रोम वाला हो, मगर है तो वो बिलकुल डम्ब ही. आप पूछेंगे कि भला कैसे? तो भइए, जरा ये बताओ, आपके वाट्सएप्प पे आने वाला हर दूसरा संदेश, वही, सड़ाऊ, पकाऊ, ठीक तीन संदेश ऊपर आया, और अनंत बार फारवर्ड मारा हुआ क्यों आता है? क्या इसीलिए आपने स्मार्टफ़ोन खरीदा है? क्या आपका स्मार्टफ़ोन ये बता नहीं सकता है फारवर्ड मारने वाले को कि भइए, इस सड़ेले, फेक संदेश को फारवर्ड मत मार, तेरी बड़ी किरकिरी होने वाली है. या कि, स्मार्टफ़ोन यह तो कर ही दे कि जिस संदेश को आप एक निगाह मार कर मुंह बिसूर कर तुरंत मिटा चुके हैं, उसे वो आपके स्मार्टफ़ोन में किसी सूरत दोबारा डिलीवर ही न होने दे? समय और श्रम की तो बचत होगी ही, फ्री डेटा के जमाने में भी डेटा की भी बचत होगी. यही हाल फ़ेसबुक का है. आपका, नाम का स्मार्टफ़ोन न ये बता सकता है कि सामने वाले की प्रोफ़ाइल फेक है या असली, जो प्रोफ़ाइल पिक के पीछे चेहरा है वो असली है या नकली या कि, जेंडर ही चेंज है! फिर, फ़ेसबुक स्टेटस में जो लेखन शैली की, मौलिक लेखन की वाह-वाही मिल रही है वो कहां से किस तरह से उड़ाई हुई है. हद है! और आप कहते हैं कि ये स्मार्टफ़ोन है!

2 स्मार्टफ़ोन दिखने में भी स्मार्ट हों, मूर्ख चौकोर डब्बे नहीं.

गोल्ड स्मार्टफ़ोन ले लो, डायमंड स्टडेड ले लो, ब्लू या फिर सिल्वर ले लो. अथवा सेरेमिक बैक वाला ले लो, और अपनी पसंदीदा बैक-कवर या बम्प कवर ले लो या कोई रंगीन, बोल्ड तस्वीर वाली स्किन लगा लो. आपका स्मार्टफ़ोन वही चपटा सा, आयताकार, बेहद बदसूरत और हाथों में पकड़ने में घटिया, दर्दयुक्त फ़ीलिंग देने वाला होता है. इस मामले में दो-हजार के स्मार्टफ़ोन और दो-लाख के स्मार्टफ़ोन में कोई अंतर नहीं होता. बल्कि महंगे स्मार्टफ़ोन में बदसूरती थोड़ी महंगी ही मिलती है. तो, सवाल ये है कि स्मार्टफ़ोन दिखने में कैसे हों? भाई, स्मार्ट हों. फ़ैंसी हों. कुछ टिप कैशियो जी-शॉक घड़ियों के मॉडलों से लिया जा सकता है. भई, डायल भी वही, घड़ी के कांटे भी वही, मगर घड़ी जी-शॉक जैसी दिखती तो है. और, आपका स्मार्टफ़ोन? आईफ़ोन और शियामी में कोई अंतर बता तो दो मुझे! अब यहाँ झगड़ा मत करिएगा. मैंने लुक और फ़ील में अंतर की बात कही है. ये नहीं कि आप 8 जीबी रोम वाले आईफ़ोन और 128 जीबी रोम वाले शियामी की कीमत और परफ़ॉर्मेंस में अंतर बताने लग जाएं!

3 स्मार्टफ़ोन में ट्रू-स्मार्ट प्रेडिक्शन हो.

ठीक है, कि आपका स्मार्टफ़ोन भविष्यवाणी कर देता है कि शाम को आपके क्षेत्र में बारिश होगी या नहीं, आज धूप निकलेगी या आसमान में बादल छाए रहेंगे, और आजकल के डेटा-माइनिंग के दौर में आपका स्मार्टफ़ोन सटीकता से ये भी बता देता है कि आपके कार्यालय से निकल कर घर जाने के रास्ते में कहां-कहां ट्रैफ़िक जाम हैं और जाम है तो कितना, और कितने देर में आप घर पर पहुँच जाएंगे – जिस पर रीयल टाइम में आप पर निगाह घर से रखी जा रही होती है और आप कतई बहाना नहीं मार सकते कि आप जाम में फंसे होने के कारण लेट हो गए. मगर, आपका स्मार्टफ़ोन यह बताने में असमर्थ रहता है कि आखिर, क्यूं, आपके समय पर, बल्कि कभी समय से पहले, और साथ में एक अदद गुलाब का फूल लेकर जाने के बावजूद किसी अच्छे खासे खुशनुमा शाम को, आपकी बीवी का मुंह फूला हुआ क्यों मिलता है और उस दिन जम कर झगड़ा क्यों हो जाता है. यदि आपका स्मार्टफ़ोन वाकई स्मार्ट होता तो वो आपको पहले ही आगाह कर देता कि भइए, आज जरा बचके रहना. हो सके तो वो क्राउड-सोर्स के जरिए, आपको दो-चार बचाव के अनुभूत नुस्खे भी सुझा दे, तब तो सही स्मार्टनेस होगी. अन्यथा क्या तो स्मार्टफ़ोन और क्या फ़ीचरफ़ोन! और, ये भी भला कोई स्मार्टनेस हुई कि दिनभर, किसी आदमी के कदमों का हिसाब लिखते रहो कि भाई, आज तुम डेढ़ हजार कदम चले और पचीस कैलोरी बर्न किए. या फिर, भाई, आज आपके दिल की धड़कन थोड़ी असामान्य थी – अरे भई, नई, खूबसूरत इंटर्न ने आज ही तो ज्वाइन किया और वहाँ से एक दिलकश मुस्कान मिलेगी तो अच्छे से अच्छा भला चंगा दिल एक बीट स्किप तो मारेगा ही.

यूँ तो मैं कोई दर्जन भर और ऐसे फ़ीचर गिनवा सकता हूँ, जो कि एक स्मार्टफ़ोन की न्यूनतम आवश्यकताओं में होने चाहिए, मगर पहले ऊपर दी गई सुविधाएँ हासिल तो हों! आपकी भी कोई इच्छा सूची है क्या? यदि हो, तो कृपया हमें भी बता कर उपकृत करने का कष्ट करें.

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(काजल कुमार के कार्टून की पैरोडी

एक आरटीआई आवेदन लगाकर एक मंत्रालय की “कड़ी निंदा” पर तैयार की गई नोट-शीट की 2 प्रतियाँ हासिल की गई हैं जिनका मजमून आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है –

कड़ी निंदा नोटशीट 1

देश में विभिन्न प्रकार की वांछित-अवांछित अप्रत्याशित और अप्रिय घटनाओं की मजम्मत करने के लिए और जनता में यह संदेश देने के लिए कि सरकार कार्य कर रही है और इन अप्रिय घटनाओं पर उसका रूख प्रकट करने के लिए आमतौर पर “कड़ी निंदा” शब्द का इस्तेमाल किया जाता है.

इस बीच, सोशल मीडिया आदि की सर्वहारा और आम-जन में अतिसंलिप्तता के वर्तमान दौर में यह पाया गया है कि यह शब्द “कड़ी निंदा” हास्य-व्यंग्य और हंसी ठट्ठा का पात्र बन गया है. सरकार की ओर से जब भी “कड़ी निंदा” वाला बयान जारी किया जाता है, सोशल मीडिया में चुटकुलों, मजाक, रोस्ट आदि की बाढ़ आ जाती है. और अब तो मेनस्ट्रीम मीडिया यानी अख़बार और टीवी में भी मजाक और हँसी ठट्ठों के दौर चलने लग जाते हैं.
अतः इस शब्द “कड़ी निंदा” के विकल्प के तौर पर कोई अन्य समानार्थी शब्द का उपयोग करने का विचार किया गया, जिसके लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी गठित की गई. कमेटी ने अपनी रपट में यह स्पष्ट दर्शाया कि इसके लिए किसी मल्टीनेशनल लिंग्विस्ट कंपनी की सेवाएं ली जाएँ. लिहाजा एक ग्लोबल ई-टैंडर जारी किया गया. न्यूनतम टेंडर राशि भरने वाले को इस कार्य का वर्क आर्डर नियमानुसार दिया गया और कंपनी ने तय समय सीमा के भीतर अपने विश्वस्तरीय संसाधनों का उपयोग कर यह अनुसंशा की है कि “कड़ी निंदा” शब्द के बदले “कड़ी भर्त्सना” शब्द का उपयोग किया जाए.

लिहाजा, सूचना प्रसारण से जुड़े समस्त विभागों, विभाग प्रमुखों को एक अत्यंत आवश्यक सर्कुलर जारी किया जाए जिसमें “कड़ी निंदा” के बदले “कड़ी भर्त्सना” शब्द का उपयोग किया जाए. “कड़ी निंदा” शब्द का उपयोग करने वालों पर घोर अनुशासनात्मक कार्यवाही की जावेगी, क्योंकि इससे सरकार की छवि खराब होती है, और सरकार हंसी-ठट्ठा का पात्र बनती है.

 
कड़ी निंदा नोटशीट 2

कड़ी निंदा नोटशीट 1 का अवलोकन करने की कृपा करें जिसकी प्रति इस नोटशीट के साथ संलग्न है. संलग्न नोट में यह स्पष्ट दर्शित है कि किस तरह “कड़ी निंदा” शब्द को उच्च स्तरीय समिति की सिफ़ारिश पर ई-टेंडर आदि प्रक्रिया का कानून-सम्मत पालन कर और पूर्ण पारदर्शिता से वैकल्पिक शब्द ““कड़ी भर्त्सना” का उपयोग करने के आदेश प्रदान किये गए थे.

यह आदेश लागू होने के उपरांत कुछ ही समय बाद से यह पाया गया कि आम, सर्वहारा जनता को “कड़ी भर्त्सना” शब्द से घोर आपत्ति हो गई. भाषाई पंडितों ने इसे हिंदी का सैंस्कृटाइज़ेशन करार दे दिया और तो और भाषा में परिशुद्धतावाद की खिलाफ़त करने वालों ने इसे हिंदी को कठिन बनाने की सरकारी चाल करार देकर अवार्ड वापसी का नया दौर चला दिया जो और भी अधिक सफल रहा. अधिकांश जनता “कड़ी भर्त्सना” शब्द का अर्थ नहीं समझती ऐसा अखबारी पत्रकारों के एक सर्वे में भी आया है. लोग भर्त्र्साना, भर्त्सर्साना, भरतसरना आदि आदि तरीके से इसे लिख रहे हैं, कोई इसे ठीक से लिख ही नहीं पा रहा. लोग ठीक से बोल नहीं पा रहे. यानी - समस्या, घोर समस्या. कई क्षेत्रों से इसके रोमनाइज़ेशन की घोर वकालत की गई है और बड़े आंदोलन चल रहे हैं.

रहा सवाल सोशल मीडिया का, तो “कड़ी भर्त्सना” की तो और भी ज्यादा खिल्ली उड़ने लगी. कार्टूनों, चुटकुलों, वनलाइनर और यहाँ तक कि व्यंग्य जुगल बंदी में भी “कड़ी भर्त्सना” पर व्यंग्य लेख लिखे गए. सरकार कई मौकों पर अपनी छीछालेदर से बचने के लिए अप्रिय घटनाओं की “कड़ी भर्त्सना” नहीं कर पाई. कुल मिलाकर “कड़ी भर्त्सना” ने “कड़ी निंदा” से भी बड़ी समस्या पैदा कर दी.

अतएव यह निर्णय लिया गया कि “कड़ी भर्त्सना” के लिए कोई अन्य सरल सा वैकल्पिक शब्द ढूंढा जाए. इसके लिए, सदा की तरह ही, जैसा कि नियम है, नियमानुसार एक उच्चस्तरीय कमेटी गठित की गई. इस नई कमेटी में इस नियम का यह ध्यान रखा गया कि पूर्व गठित कमेटी के 20 प्रतिशत से अधिक सदस्य न रखे जावें. कमेटी ने कोई पचास उच्चस्तरीय बैठकों के बाद अनुसंशा दी है कि इस कार्य के लिए ग्लोबल ई-टैंडरिंग के जरिए भरोसेमंद, सक्षम लिंग्विस्ट कंपनी का चयन किया जाए जो कि इस शब्द “कड़ी भर्त्सना” का हर तरह से सर्वे आदि कर हर लिहाज से स्वीकार्य वैकल्पिक शब्द सुझाए.

तदनुसार एक लिंग्विस्टिक कंपनी को यह कार्य-आदेश दिया गया जिसकी निविदा की दर न्यूनतम थी. निविदा के रेट पिछले सिमिलर कार्य से दो गुने थे जो वाजिब हैं क्योंकि पूरे विश्व में मंदी छाई है और इस दौरान रुपए का मूल्य और गिर गया था. इस कार्य के लिए वित्त विभाग की ऋणात्मक टीप और अस्वीकृति को पूर्व में ही निराकृत करने के लिए, फंड की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर फंड में से कटौती कर प्रावधान किया गया. कंपनी ने तय समय सीमा में कार्य पूर्ण कर कोई 2000 पृष्ठों में अपना निष्कर्ष प्रस्तुत किया है. समर्थन के दस्तावेज बीस हजार पृष्ठों में अलग से संलग्न हैं.

कंपनी के निष्कर्षानुसार “कड़ी भर्त्सना” के बदले “कड़ी निंदा” का उपयोग किया जाना चाहिए. तद्नुसार समस्त विभाग प्रमुखों को यह आदेशित किया जाए कि भविष्य में अप्रिय घटनाओं के संबंध में केवल “कड़ी निंदा” शब्द का ही प्रयोग करें.
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