टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

व्यंग्य जुगलबंदी 26 : जम्बूद्वीप में सन् 3050 के चुनाव के बाद

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आज मैं आपको एक ऐसा व्यंग्य सुनाने जा रहा हूँ जिसे आप एक सांस में पढ़कर वाह! वाह!! कह उठेंगे. आज नहीं तो कल, पर ये तय है कि रवि रतलामी के व्यंग्य सभी पढ़ने लगेंगे. एक दिन ऐसा जरूर आएगा, जब जिंदगी का पाठ इन व्यंग्यों के माध्यम से पढ़ाया जाने लगेगा.

ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि आज जब हर ओर तकनीक, बिजनेस, धन, कामयाबी की ही बातें चल रही हैं तो रवि रतलामी के व्यंग्य जीवन के सत्य की बातें करती हैं. खैर, रवि रतलामी आज आपको चुनाव के बाद का हाल सुनाएगा. वो चुनाव, जो आगे, आपके जीवन के विकास क्रम में कभी-न-कभी तो आएगा!

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जम्बू द्वीप में सृष्टि के प्रारंभ से ही चुनावी व्यवस्था लागू थी. वैसे, एक धड़े के वैज्ञानिकों का कहना है कि, बिगबैंग की थ्योरी तो बकवास है,  चुनाव से ही, और चुनाव के लिए ही सृष्टि का प्रारंभ हुआ. वैसे भी, कुछ लोग चुनाव में ही जीते मरते हैं – उनके लिए संपूर्ण सृष्टि, सपूर्ण ब्रह्मांड चुनाव और केवल चुनाव होता है – उनकी सृष्टि का आरंभ और अंत चुनाव से ही होता है. वे खाते-पीते-उठते-बैठते चुनावी चक्र में उलझे रहते हैं और अपना सारा कार्य चुनाव को ध्यान में रखते हुए ही करते हैं.

बहुत आगे की बात है, यथा समय जम्बू द्वीप में आम-चुनाव हुए. चुनाव में सत्तासीन पार्टी की हार हुई और विपक्ष की जमीन-खिसकती (अरे, वही, लैंडस्लाइड विक्ट्री) जीत हुई.

जैसा कि होता आया है, चुनाव के बाद हार-जीत का विश्लेषण किया गया.

हार-जीत के कुछ मुख्य कारक ये रहे –

1 – बायोमैट्रिक तरीके से, 1048 बिट एनक्रिप्टेड सेक्योर्ड साइट के जरिए जो मतदान करवाए गए उसमें हैकिंग की गई, और तमाम वोट परसेंटेज जीतने वाली पार्टी को चले गए. (इसीलिए, वापस, पुराने, ईवीएम तरीके से, बूथ आधारित मतदान कराने की पुरजोर मांग हारने वाली पार्टी की ओर से की गई)

2- चुनावी पंडितों ने बताया कि इस बार अगड़ों ने पिछड़ों को जमकर वोट दिया, पिछड़ों ने अगड़ों को, नारियों ने पुरुषों को, अल्प-संख्यकों ने बहु-संख्यकों को, और इसके उलट, भरपूर वोट दिया और इस तरह से बहुत ही तीव्र अ-ध्रुवीकरण हुआ जिसके फलस्वरूप यह जमीन-खिसकती हार/जीत हासिल हुई.

3 – चुनाव के दौरान वोटरों को जमकर लुभाया गया. चुनावी घोषणा-पत्र में पर्सनल ड्रोन से लेकर पर्सनल रोबॉटिक असिस्टेंट तक देने के वायदे किए गए और बांटे गए, जिससे लालच में अंधी होकर जनता ने वोट दिए.

4 – चुनावी विश्लेषकों के मुताबिक दरअसल, अधिकांशतः जीते वही हैं जो टिकट नहीं मिलने या अन्य वजहों से ऐन चुनाव से ठीक पहले पाला बदल लिए थे. इस लिहाज से, जिस पार्टी की जीत है, सत्यता में वह जीत नहीं है, और जिस पार्टी की हार है, वस्तुतः वह हार नहीं है. ठीक ठीक कहें, तो यह तो यथा-स्थिति-वाद है!

और, यह यथास्थिति-वाद अगले पाँच साल बदस्तूर जारी रही और फिर एक और चुनाव जनता के सामने आ गया और उस चुनाव में भी ऊपर वाली कहानी एक बार फिर से दोहराई गई. और, उस चुनाव के बाद भी, अमूमन विश्लेषण वही का वही रहा. लगे हाथ आपको बता दें कि पांच साल पहले की कहानी भी कुछ इसी तरह की ही थी.

यह कहानी है ही ऐसी.  चुनाव के बाद की कहानी. एक सी.

Ravi Ratlami

#जुगलबंदी

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(अस्वीकरण – अरे, भाई, डिस्क्लेमर! – यह काल्पनिक पोस्ट है और इस पोस्ट की स्टाईल का किसी अन्य जीवित-मृत व्यक्ति के स्टाइल से कोई संबंध नहीं है और यदि ऐसा लगता है तो इसे केवल संयोग मात्र समझा जाए)

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बढ़िया है, रवि जी| बधाई! अस्वीकरण में मज़ा आ गया|

गजब कल्पना ! :)

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