रविवार, 12 मार्च 2017

व्यंग्य जुगलबंदी - 25 : हुड़दंग – होली बेहोली

बेचारा होली बेकार ही बदनाम है हुड़दंग के लिए. जबकि इस देश में गाहे बेगाहे, जब तब, कारण बेकारण, बात बेबात, यत्र तत्र सर्वत्र हुड़दंग होते ही रहते हैं. हम होली की हुड़दंग की बात तो करते हैं, मगर दीवाली की हुड़दंग क्यों भूल जाते हैं? दीवाली के महीने भर पहले से हुड़दंग जो चालू हो जाता है उसकी बात कोई नहीं करता. सबसे पहले तो घर में साफ सफाई रँगाई पुताई का हुड़दंग मचता है, फिर नए कपड़े जूते पटाखे आदि खरीदने के लिए बाजारों में जो हुड़दंग मचता है वो क्या है? इधर पर्यावरणवादी हुड़दंग मचाए फिरते हैं – पटाखे मत फोड़ो, फुलझड़ी मत जलाओ. पटाखे जलाओ तो 10 डेसीबेल ध्वनि से कम वाला जलाओ, रात दस बजे से पहले जलाओ आदि आदि. इधर लेखकों-कवियों-संपादकों की टोली दीवाली में अपनी अपठनीय रचनाओं को हर संभावित प्लेटफ़ॉर्म पर दीपावली विशेषांकादि के नाम पर दशकों से परोसती आ रही हैं, वे क्या किसी हुड़दंग से कम हैं? फिर दीपावली की शुभकामना संदेशों के हुड़दंग... बाप रे बाप! ये अपने किस्म के, साहित्यिक-सांस्कृतिक हुड़दंग हैं और किसी अन्य हुड़दंग प्रकार से किसी तरह से कमतर नहीं हैं. ईद-बकरीद-क्रिसमस में भी हुड़दंगों का कमोबेश यही हाल रहता है.

नववर्ष उत्सव के हुड़दंगों के उदाहरण देना तो सूरज को दिया दिखाने के समान है. धरती का हर प्राणी, जो नववर्ष को समझता है, हुड़दंग मचाता है. अब, ये बात दीगर है कि कुछ लोग सभ्य तरीके से, किसी पब या मॉल में, जेब से रोकड़ा खर्च कर डीजे की धुन में और पव्वे की मस्ती में शालीनता से हुड़दंग करते हैं, तो कुछ लोग सड़कों पर मोबाइकों में बीयर की बोतलों को लेकर हुड़दंग मचाते हैं. बहुत से लोग टीवी स्क्रीन पर अभिनेताओं कलाकारों को हुड़दंग मचाते देखकर अपने मानसिक हुड़दंग से काम चला लेते हैं. पिछले नववर्ष में हुए बैंगलोर के हुड़दंग की टीस क्या कोई भुला पाएगा?

राष्ट्रीय त्यौहारों – स्वतंत्रता-गणतंत्र दिवस के हुड़दंग मत भूलिये. हफ़्ता-दो-हफ़्ता पहले से गली मुहल्ले चौराहों में मेरे देश की धरती सोना उगले हीरा मोती जो बजना चालू होता है तो फिर बंद होने का नाम ही नहीं लेता. गणेश-दुर्गा पूजा के लिए, महीने भर पहले से जो हुड़दंग चंदा लेने से शुरु होता है वो उनके विसर्जन तक बदस्तूर जारी रहता है. इस बीच जन्माष्टमी के दही-हांडी मटका लूट, नवरात्रि गरबा आदि आदि न जाने कितने हुड़दंग अपने समय से बदस्तूर हर साल आते हैं और चले जाते हैं.

यहाँ के स्कूलों, कॉलेजों में हुड़दंग तो रोज की बात है. जेएनयू और डीयू तो खैर देश की राजधानी में है, तो गाहे बगाहे इसका हुड़दंग न्यूज में आ जाता है, और कभी कोई बड़ा, विशाल किस्म का हुड़दंग हो जाता है तो व्यापक चर्चा हो जाती है. टीचर ने क्लास नहीं लिया तो हुड़दंग, क्लास ले लिया तो हुड़दंग. जीटी के बावजूद किसी पढ़ाकू विद्यार्थी ने क्लास अटेंड करने की हिमाकत कर दी तो हुड़दंग. किसी दिन कोई हुड़दंग नहीं तो क्यों नहीं इस बात पर हुड़दंग. यानी पूरा हुड़दंग अड्डा.

अच्छा, हुड़दंग कोई वार-त्यौहार या स्कूल-कॉलेजों तक सीमित है? नहीं. ऐसा नहीं है. हुड़दंग तो भारत में हर ओर है. आपके चहुँओर. किसी नामालूम दिवस में जरा ध्यान कीजिए – हुड़दंग सुबह ब्रह्म मुहूर्त के अजान से शुरू होता है, और आसपास तीन तरफ हो रही धार्मिक तकरीरों-प्रवचनों-कथाओं, चार तरफ स्थापित मंदिरों की आरतियों से परवान चढ़ता है, और दिन-भर ट्रैफ़िक, शोर, धूल-धक्कड़ और फिर रात की आरती, प्रवचन और तकरीर से खत्म होता है. और, यहाँ पर हमारे कंप्यूटर/मोबाइल उपकरणों के  सोशल मीडिया – फ़ेसबुक ट्विटरादि तथा हमारे ड्राइंग/बेडरूम में स्थापित टीवी सीरियलों से (में) मचने वाले हुड़दंगों के उदाहरण नहीं हैं!

ऐसे में जीवन? वो भी एक हुड़दंग ही है!

 

व्यंज़ल

 

हर तरफ है हुड़दंग

ये जीवन है हुड़दंग

 

दिल कहीं लगता है

तो मचता है हुड़दंग

 

जीना भी क्या जहां

नहीं होता है हुड़दंग

 

सक्रिय दिमाग में ही

तो रहता है हुड़दंग

 

देखो सभ्य रवि भी

तो करता है हुड़दंग

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