March 2017

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(कार्टून - साभार काजल कुमार )

 

गरमी अभी ठीक से आई नहीं है, और लोगों को गरमी चढ़ रही है. एक नेता इतनी गरमी खा बैठे कि सीधे हवाई जहाज से गिरे और ट्रेन में अटके. एक रोस्टिया कॉमेडियन सफलता की गरमी से इतने स्व-रोस्ट हुए कि उनके इनकम टैक्स में करोड़ों की कमी होने का अंदेशा है.

गरमी केवल लोग नहीं खाते. अपने आसपास की तमाम चीजों, उपकरणों पर गरमी चढ़ जाती है. पिछले साल सेमसुंग गैलेक्सी नोट 7 को अपने नए-पन की इतनी गर्मी चढ़ी कि वो जहाँ तहाँ ही फटने ही लगी. पंखे में लगे कैपेसिटर का इलेक्ट्रोलाइट गरमी खाकर सूख जाता है तो पंखा मरियल चाल चलने लग जाता है. आपके कंप्यूटिंग उपकरणों में लगे इलेक्ट्रानिक कलपुर्जे गरमी खा जाते हैं तो वे उपकरण को बेकार कर देते हैं और फिर उन्हें रिपेयर या रीप्लेस करना पड़ता है. वाहन का इंजन गरमी खाकर ब्लॉक हो जाता है तो टायर गरमी खाकर बर्स्ट हो जाता है.

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साहित्यकारों, खासकर व्यंग्यकारों में गरमी खाने की अच्छी खासी परंपरा रही है. वैसे भी, बिना गरमी खाए कोई सरोकारी, चर्चित, लोकप्रिय, पसंदीदा आदि-आदि किस्म का व्यंग्यकार नहीं बना जा सकता. बिना गरमी खाए, कहीं से, किसी कोने से, किसी भी तरतीब से व्यंग्य निकल ही नहीं सकता. कुंजीपट से (हें, आजकल कोई कलम-दवात से लिखता भी है क्या?) सही, मारक व्यंग्य टाइप करने के लिए गरमी खाना जरूरी है. गरमी कहाँ से, किधर से, किस विषय पर खाएँ यह एक बड़ी समस्या है. वैसे आजकल लोग टुंडे के कबाब खाने-नहीं-खाने के नाम पर गरमी खा रहे हैं, और अच्छी खासी खा रहे हैं, और उनमें साहित्यकारों की भी अच्छी खासी संख्या है.  हर एक साहित्यकार हर दूसरे साहित्यकार पर इसलिए गरमी खाता है कि सामने वाला लिखता तो कूड़ा है, पर हर कहीं छपता है, प्रशंसित होता है. लेखन में पठनीयता, सरोकार, मौलिकता तो घेले भर की नहीं, मगर मजमा जमाए फिरता है. और, जो बचे खुचे साहित्यकार सार्वजनिक गरमी नहीं दिखाते हैं वे ठीक इसी किस्म की अंदरूनी गरमी से त्रस्त रहते हैं.

गरमी खाकर रिश्ते परिपक्व होते हैं तो टूटते-फूटते भी हैं. तीन तलाक का मामला चहुँओर गरमी खा खिला रहा है, इतना कि स्थापित राजकुमारों की कुर्सियाँ तक हिल गईं और नए योगी सत्तानशीं हो गए. रोमियो जूलियट के रिश्तों में भारतीय संस्कृति के तथाकथित रक्षक भाले त्रिशूल लेकर और पुलिसिये डंडे लेकर गर्मी पैदा करने की कोशिशों में आदि काल से लगे हैं तो भारतीय जनमानस के जातीय और सामाजिक रिश्तों में जातीय गणित के समीकरण बिठाने वाले नेता. मंदिर मस्जिद का मसला लेकर तो लोग जब तब गरमी खाने लगते हैं.

जिस तरह से कार्बन-पुनर्चक्रण होता है, ठीक उसी तरह से गरमी खाने का पुनर्चक्रण होता है. उदाहरण के लिए, पसंदीदा ठेकेदार को टेंडर नहीं मिलने से गरमी खाकर नेता अफ़सर को ठांसता है, तो अफ़सर कुछ गरमी अपने मातहत पर निकाल देता है. मातहत घर जाकर वह गरमी अपनी पत्नी पर निकालता है तो पत्नी या तो अधिक नमक की पतली बेस्वाद दाल बना कर गरमी निकालती है या फिर बच्चे को होमवर्क करने के बाद भी टीवी नहीं देखने देती और बच्चा हुक्मउदूली कर गरमी निकालता है. यह गरमी भुगतकर मातहत दूसरे दिन कार्यालय में आकस्मिक अवकाश का आवेदन भेज देता है, अफ़सर, नेता के गोटी बिठाए टेंडर पर कोई नेगेटिव टीप ठोंक मारता है और इससे आहत नेता फिर किसी दूसरे अफ़सर या विरोधी पार्टी के नेता पर गर्मी उतारता है अथवा अपने ट्रांसफर पोस्टिंग के रेट बढ़ा देता है. यह चक्र अक्षुण्ण होता है, और सेल्फ प्रोपेल्ड होता है, और इसे किसी बाहरी ऊर्जा की जरूरत नहीं होती है.

मामला कुछ ज्यादा ही गरमाने लगा है? इससे पहले कि आप यह पढ़ते पढ़ते गरमी खा जाएँ और आइंदा इन पंक्तियों के लेखक को हमेशा के लिए पढ़ने से मना कर दें, किस्सा यहीं तमाम करते हैं. मगर, फिर, इतनी गरमी आपको किन्हीं और दूसरे लेखकों में से किसी से कभी मिली भी है भला?

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आज मैं आपको एक ऐसा व्यंग्य सुनाने जा रहा हूँ जिसे आप एक सांस में पढ़कर वाह! वाह!! कह उठेंगे. आज नहीं तो कल, पर ये तय है कि रवि रतलामी के व्यंग्य सभी पढ़ने लगेंगे. एक दिन ऐसा जरूर आएगा, जब जिंदगी का पाठ इन व्यंग्यों के माध्यम से पढ़ाया जाने लगेगा.

ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि आज जब हर ओर तकनीक, बिजनेस, धन, कामयाबी की ही बातें चल रही हैं तो रवि रतलामी के व्यंग्य जीवन के सत्य की बातें करती हैं. खैर, रवि रतलामी आज आपको चुनाव के बाद का हाल सुनाएगा. वो चुनाव, जो आगे, आपके जीवन के विकास क्रम में कभी-न-कभी तो आएगा!

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जम्बू द्वीप में सृष्टि के प्रारंभ से ही चुनावी व्यवस्था लागू थी. वैसे, एक धड़े के वैज्ञानिकों का कहना है कि, बिगबैंग की थ्योरी तो बकवास है,  चुनाव से ही, और चुनाव के लिए ही सृष्टि का प्रारंभ हुआ. वैसे भी, कुछ लोग चुनाव में ही जीते मरते हैं – उनके लिए संपूर्ण सृष्टि, सपूर्ण ब्रह्मांड चुनाव और केवल चुनाव होता है – उनकी सृष्टि का आरंभ और अंत चुनाव से ही होता है. वे खाते-पीते-उठते-बैठते चुनावी चक्र में उलझे रहते हैं और अपना सारा कार्य चुनाव को ध्यान में रखते हुए ही करते हैं.

बहुत आगे की बात है, यथा समय जम्बू द्वीप में आम-चुनाव हुए. चुनाव में सत्तासीन पार्टी की हार हुई और विपक्ष की जमीन-खिसकती (अरे, वही, लैंडस्लाइड विक्ट्री) जीत हुई.

जैसा कि होता आया है, चुनाव के बाद हार-जीत का विश्लेषण किया गया.

हार-जीत के कुछ मुख्य कारक ये रहे –

1 – बायोमैट्रिक तरीके से, 1048 बिट एनक्रिप्टेड सेक्योर्ड साइट के जरिए जो मतदान करवाए गए उसमें हैकिंग की गई, और तमाम वोट परसेंटेज जीतने वाली पार्टी को चले गए. (इसीलिए, वापस, पुराने, ईवीएम तरीके से, बूथ आधारित मतदान कराने की पुरजोर मांग हारने वाली पार्टी की ओर से की गई)

2- चुनावी पंडितों ने बताया कि इस बार अगड़ों ने पिछड़ों को जमकर वोट दिया, पिछड़ों ने अगड़ों को, नारियों ने पुरुषों को, अल्प-संख्यकों ने बहु-संख्यकों को, और इसके उलट, भरपूर वोट दिया और इस तरह से बहुत ही तीव्र अ-ध्रुवीकरण हुआ जिसके फलस्वरूप यह जमीन-खिसकती हार/जीत हासिल हुई.

3 – चुनाव के दौरान वोटरों को जमकर लुभाया गया. चुनावी घोषणा-पत्र में पर्सनल ड्रोन से लेकर पर्सनल रोबॉटिक असिस्टेंट तक देने के वायदे किए गए और बांटे गए, जिससे लालच में अंधी होकर जनता ने वोट दिए.

4 – चुनावी विश्लेषकों के मुताबिक दरअसल, अधिकांशतः जीते वही हैं जो टिकट नहीं मिलने या अन्य वजहों से ऐन चुनाव से ठीक पहले पाला बदल लिए थे. इस लिहाज से, जिस पार्टी की जीत है, सत्यता में वह जीत नहीं है, और जिस पार्टी की हार है, वस्तुतः वह हार नहीं है. ठीक ठीक कहें, तो यह तो यथा-स्थिति-वाद है!

और, यह यथास्थिति-वाद अगले पाँच साल बदस्तूर जारी रही और फिर एक और चुनाव जनता के सामने आ गया और उस चुनाव में भी ऊपर वाली कहानी एक बार फिर से दोहराई गई. और, उस चुनाव के बाद भी, अमूमन विश्लेषण वही का वही रहा. लगे हाथ आपको बता दें कि पांच साल पहले की कहानी भी कुछ इसी तरह की ही थी.

यह कहानी है ही ऐसी.  चुनाव के बाद की कहानी. एक सी.

Ravi Ratlami

#जुगलबंदी

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(अस्वीकरण – अरे, भाई, डिस्क्लेमर! – यह काल्पनिक पोस्ट है और इस पोस्ट की स्टाईल का किसी अन्य जीवित-मृत व्यक्ति के स्टाइल से कोई संबंध नहीं है और यदि ऐसा लगता है तो इसे केवल संयोग मात्र समझा जाए)

टेक्नोलॉज़ी की जय हो!

यदि आप गीत संगीत गाने-बजाने में रुचि रखने हैं, तो रिफ़स्टेशन के बारे में जानते होंगे.

यदि नहीं, तो यह आपके लिए बहुमूल्य टूल है.

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रिफ़स्टेशन को कंप्यूटर पर भी इंस्टाल किया जा सकता है और इसे ब्राउज़र के जरिए क्लाउड के द्वारा भी उपयोग में लिया जा सकता है.

वैसे तो इसमें बहुत सी सुविधाएँ हैं, परंतु मूलभूत सुविधा ये है कि इस टूल से किसी भी एमपी 3 गीत का नोटेशन / कार्ड हासिल कर सकते हैं. गीत-संगीत साधकों और सीखने वालों के लिए यह शानदार और बेहद काम का है. नोटेशन की सटीकता 85 प्रतिशत तक आती है, जिसमें मामूली फेरबदल से सटीकता 100 प्रतिशत तक बनाई जा सकती है. पीसी टूल पर इसमें वांछित बदलाव कर अपना नया म्यूजिक भी अरेंज किया जा सकता है.

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वेबसाइट के जरिए इसका उपयोग तो और आसान है. अपने किसी गाने को इसके इंटरफ़ेस में सर्च करिए और बस आपके सामने नोटेशन हाजिर - यदि गीत लोकप्रिय किस्म का है, तब तो तुरंत हाजिर, नहीं तो थोड़ा खोजबीन करें, और नहीं तो अपलोड कर दें. मैंने लता मंगेशकर का गाया ठंडी हवाएँ लहरा के जाएँ आजमाया तो यह तुरंत हाजिर हो गया - यू-ट्यूब वीडियो एक तरफ चलता हुआ और दूसरी तरफ गानों के नोटेशन्स. है न कमाल?

इसे यहाँ से आजमा सकते हैं - https://play.riffstation.com/

मित्र संजय बेंगाणी ने जब बताया कि उन्होंने हिंदी का भौतिक कीबोर्ड ऑनलाइन साइट से खरीदा है और उस पर काम करना सीख रहे हैं तो मुझे उत्सुकता हुई कि इस हिंदी के भौतिक कीबोर्ड में क्या कुछ सुविधा है यह देखा जाना चाहिए.

टीवीएस देवनागरी हिंदी मराठी भौतिक कीबोर्ड

हिंदी कंप्यूटिंग की दुनिया को तीस साल से ऊपर हो गए हैं, मगर, आज भी लोग कंप्यूटिंग उपकरणों, मोबाइल उपकरणों, ब्राउज़रों में हिंदी टाइपिंग के लिए जूझते दिखाई दे जाते हैं. रहा सहा कचरा नित्य होते सॉफ़्टवेयर और ऑपरेटिंग सिस्टमों के अद्यतनों के कारण कचरा हो जाता है क्योंकि अच्छा खासा चलता सिस्टम फट जाता है और टाइपिंग की नई नई समस्याएँ पैदा हो जाती हैं.

पर, अब एकमात्र यह समाधान आपकी तमाम समस्याओं का हल हो सकता है.

मैं अभी भी कह रहा हूँ कि हो सकता है, है नहीं!

बहरहाल, तो बात भौतिक कीबोर्ड की हो रही है.

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हिंदी का भौतिक, देवनागरी कीबोर्ड को स्थानीय कंप्यूटर बाजार में ढूंढना और खरीदना टेढ़ी खीर है.

ऑनलाइन साइटों पर भी टेढ़ी खीर है. कहीं यह मिलता है कहीं नहीं. सर्च परिणाम उल्टे सीधे सामान दिखाते हैं.

मैंने कोई दो दर्जन उल्टे सीधे सर्च किए, तब देवनागरी कीबोर्ड से इस कीबोर्ड की लिंक मिली, वह भी अमेजन पर. अन्य साइटों पर सर्च परिणाम उपयुक्त नहीं रहे.

यह कीबोर्ड भारत की बड़ी कंपनी टीवीएस इलेक्ट्रॉनिक बनाती है, जिसका मेकेनिकल कीबोर्ड टीवीएस गोल्ड मैं पिछले दो दशकों से इस्तेमाल करता आ रहा हूँ, और, जो इसे इस्तेमाल करते हैं वे इसकी कीमत जानते हैं. यह जीरो टैक्टाइल फ़ोर्स का फेदर टच कीबोर्ड है, जिसमें ज्यादा टाइपिंग से उंगलियों में दर्द जैसी होने  वाली समस्याएँ कम होती हैं.

परंतु हिंदी का यह कीबोर्ड गो़ल्ड वाला नहीं आता, बल्कि साधारण मेम्ब्रेन वाला आता है टीवीएस चैम्प के नाम से,  जिसकी कीमत कोई छः सौ रुपए के आसपास है.

वस्तुतः यह कीबोर्ड साधारण क्वर्टी कीबोर्ड ही है, परंतु इसके कीबोर्ड में हिंदी देवनागरी अक्षर - इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड - लेज़र इच्ड छपे हुए हैं.

इसका सीधा सा अर्थ है, यदि आपने अपने ऑपरेटिंग सिस्टम में डिफ़ॉल्ट रूप से मौजूद हिंदी टाइपिंग टूल इनस्क्रिप्ट को इनेबल किया हुआ है तो आप सीधे इस कीबोर्ड से टाइप करना प्रारंभ कर सकते हैं, क्योंकि हिंदी के अक्षर सामने, कीबोर्ड में ही छपे हुए हैं.

इसे आप ओटीजी केबल के जरिए अपने मोबाइल फ़ोन में भी सीधे जोड़कर हिंदी टाइप कर सकते हैं. परंतु इसके लिए आपको एक ऐप्प इंस्टाल करना होगा - मल्टीलिंग ओ कीबोर्ड तथा मल्टीलिंग हिंदी एडऑन.

इस कीबोर्ड को अमेजन से आप यहाँ से ऑनलाइन देख सकते हैं, जानकारी ले सकते हैं अथवा खरीद सकते हैं -

http://www.amazon.in/TVS-Champ-Devnagric-Keyboard-USB/dp/B01BI0JAQA?

यदि यहाँ उपलब्ध न हो तो अमेजन, फ्लिपकार्ट अथवा अपनी पसंदीदा ऑनलाइन साइट पर इस कीवर्ड से खोजें और खरीदें-

TVS-Champ-Devnagric-Keyboard

टीवीएस इलेक्ट्रॉनिक की होम साइट पर भी आप इसे खरीद सकते हैं.

इस कीबोर्ड के साथ अंकुर पत्रिका नामक मॉड्यूलर इन्फ़ोटैक का एक हिंदी सॉफ़्टवेयर इंस्टालर सीडी मुफ़्त आता है, परंतु वह पुराना वर्जन है और यूनिकोड सपोर्ट नहीं करता. उसका उपयोग आज के जमाने में फालतू है. फ़ालतू सॉफ़्टवेयर को इस तरह कीबोर्ड के साथ देने का आशय समझ से परे है.

इसके बजाये यूनिकोड आधारित कुछ टूल दिए जाने चाहिए जो आज की जरूरत है.

बेचारा होली बेकार ही बदनाम है हुड़दंग के लिए. जबकि इस देश में गाहे बेगाहे, जब तब, कारण बेकारण, बात बेबात, यत्र तत्र सर्वत्र हुड़दंग होते ही रहते हैं. हम होली की हुड़दंग की बात तो करते हैं, मगर दीवाली की हुड़दंग क्यों भूल जाते हैं? दीवाली के महीने भर पहले से हुड़दंग जो चालू हो जाता है उसकी बात कोई नहीं करता. सबसे पहले तो घर में साफ सफाई रँगाई पुताई का हुड़दंग मचता है, फिर नए कपड़े जूते पटाखे आदि खरीदने के लिए बाजारों में जो हुड़दंग मचता है वो क्या है? इधर पर्यावरणवादी हुड़दंग मचाए फिरते हैं – पटाखे मत फोड़ो, फुलझड़ी मत जलाओ. पटाखे जलाओ तो 10 डेसीबेल ध्वनि से कम वाला जलाओ, रात दस बजे से पहले जलाओ आदि आदि. इधर लेखकों-कवियों-संपादकों की टोली दीवाली में अपनी अपठनीय रचनाओं को हर संभावित प्लेटफ़ॉर्म पर दीपावली विशेषांकादि के नाम पर दशकों से परोसती आ रही हैं, वे क्या किसी हुड़दंग से कम हैं? फिर दीपावली की शुभकामना संदेशों के हुड़दंग... बाप रे बाप! ये अपने किस्म के, साहित्यिक-सांस्कृतिक हुड़दंग हैं और किसी अन्य हुड़दंग प्रकार से किसी तरह से कमतर नहीं हैं. ईद-बकरीद-क्रिसमस में भी हुड़दंगों का कमोबेश यही हाल रहता है.

नववर्ष उत्सव के हुड़दंगों के उदाहरण देना तो सूरज को दिया दिखाने के समान है. धरती का हर प्राणी, जो नववर्ष को समझता है, हुड़दंग मचाता है. अब, ये बात दीगर है कि कुछ लोग सभ्य तरीके से, किसी पब या मॉल में, जेब से रोकड़ा खर्च कर डीजे की धुन में और पव्वे की मस्ती में शालीनता से हुड़दंग करते हैं, तो कुछ लोग सड़कों पर मोबाइकों में बीयर की बोतलों को लेकर हुड़दंग मचाते हैं. बहुत से लोग टीवी स्क्रीन पर अभिनेताओं कलाकारों को हुड़दंग मचाते देखकर अपने मानसिक हुड़दंग से काम चला लेते हैं. पिछले नववर्ष में हुए बैंगलोर के हुड़दंग की टीस क्या कोई भुला पाएगा?

राष्ट्रीय त्यौहारों – स्वतंत्रता-गणतंत्र दिवस के हुड़दंग मत भूलिये. हफ़्ता-दो-हफ़्ता पहले से गली मुहल्ले चौराहों में मेरे देश की धरती सोना उगले हीरा मोती जो बजना चालू होता है तो फिर बंद होने का नाम ही नहीं लेता. गणेश-दुर्गा पूजा के लिए, महीने भर पहले से जो हुड़दंग चंदा लेने से शुरु होता है वो उनके विसर्जन तक बदस्तूर जारी रहता है. इस बीच जन्माष्टमी के दही-हांडी मटका लूट, नवरात्रि गरबा आदि आदि न जाने कितने हुड़दंग अपने समय से बदस्तूर हर साल आते हैं और चले जाते हैं.

यहाँ के स्कूलों, कॉलेजों में हुड़दंग तो रोज की बात है. जेएनयू और डीयू तो खैर देश की राजधानी में है, तो गाहे बगाहे इसका हुड़दंग न्यूज में आ जाता है, और कभी कोई बड़ा, विशाल किस्म का हुड़दंग हो जाता है तो व्यापक चर्चा हो जाती है. टीचर ने क्लास नहीं लिया तो हुड़दंग, क्लास ले लिया तो हुड़दंग. जीटी के बावजूद किसी पढ़ाकू विद्यार्थी ने क्लास अटेंड करने की हिमाकत कर दी तो हुड़दंग. किसी दिन कोई हुड़दंग नहीं तो क्यों नहीं इस बात पर हुड़दंग. यानी पूरा हुड़दंग अड्डा.

अच्छा, हुड़दंग कोई वार-त्यौहार या स्कूल-कॉलेजों तक सीमित है? नहीं. ऐसा नहीं है. हुड़दंग तो भारत में हर ओर है. आपके चहुँओर. किसी नामालूम दिवस में जरा ध्यान कीजिए – हुड़दंग सुबह ब्रह्म मुहूर्त के अजान से शुरू होता है, और आसपास तीन तरफ हो रही धार्मिक तकरीरों-प्रवचनों-कथाओं, चार तरफ स्थापित मंदिरों की आरतियों से परवान चढ़ता है, और दिन-भर ट्रैफ़िक, शोर, धूल-धक्कड़ और फिर रात की आरती, प्रवचन और तकरीर से खत्म होता है. और, यहाँ पर हमारे कंप्यूटर/मोबाइल उपकरणों के  सोशल मीडिया – फ़ेसबुक ट्विटरादि तथा हमारे ड्राइंग/बेडरूम में स्थापित टीवी सीरियलों से (में) मचने वाले हुड़दंगों के उदाहरण नहीं हैं!

ऐसे में जीवन? वो भी एक हुड़दंग ही है!

 

व्यंज़ल

 

हर तरफ है हुड़दंग

ये जीवन है हुड़दंग

 

दिल कहीं लगता है

तो मचता है हुड़दंग

 

जीना भी क्या जहां

नहीं होता है हुड़दंग

 

सक्रिय दिमाग में ही

तो रहता है हुड़दंग

 

देखो सभ्य रवि भी

तो करता है हुड़दंग

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(आईबस हिंदी आईएमई में रेमिंगटन, फ़ोनेटिक, इनस्क्रिप्ट, आईट्रांस आदि आदि कीबोर्ड से हिंदी टाइपिंग की सुविधा)

 

बहुत सी जनता विंडोज़ 10 में रेमिंगटन हिंदी टाइपिंग न हो पाने की समस्या से ग्रसित है, और बाकी बहुत सी जनता फ़ेसबुक में, तो क्रोम में, तो जीमेल आदि में यदा कदा हिंदी टाइपिंग की समस्याओं से ग्रस्त होती रहती है.

इन सबका समाधान है, लिनक्स पर आईबस टाइपिंग टूल का उपयोग. पिछले कई वर्षों से यह टूल बिना किसी समस्या के लगातार बढ़िया परफ़ॉर्मेंस दे रहा है.

अब इसमें एक और सुविधा जुड़ गई है.

टाइपिंग बूस्टर.

और, हिंदी टाइपिंग में भी आप इसे धड़ल्ले से उपयोग कर सकते हैं.

यह कुछ कुछ अपने स्मार्टफ़ोनों में उपलब्ध टी-9 और प्रेडिक्टिव टैक्स्ट जैसा काम करता है और यह वर्तमान स्थापित शब्दकोश के साथ तो काम करता ही है, आपकी नित्य प्रति की टाइपिंग के साथ यह सीखते जाता है. यानी आप जितना अधिक टाइप करेंगे, उतना ही यह सीखता जाएगा और आपके लिए अधिकाधिक काम का होगा.

उदाहरण -

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आपने विश्व लिखा तो आगे विश्वसनीय लिखने के लिए आगे सनीय लिखने की जरूरत नहीं 6 वां बटन दबाएं या शॉर्टकट कुंजी (डिफ़ॉल्ट - स्पेस बार दो बार दबाएँ) दबाएं, और पूरा शब्द लिख जाएगा.

 

यह बहुभाषी भी है. यानी चलते चलते यदि आप कीबोर्ड अंग्रेज़ी में बदलते हैं तो यह अंग्रेज़ी के शब्दों को भी प्रेडिक्ट करेगा, और रोमन हिंदी को भी.

 

इसका उपयोग कैसे करें आदि के लिए एक ट्यूटोरियल प्रवीण सातपुते ने लिखा है जिसे आप यहाँ से पढ़-समझ सकते हैं -

https://fedoramagazine.org/master-typing-ibus-booster/

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(चित्र - अनूप शुक्ल के फ़ेसबुक वॉल से साभार)

आदमी जितना सभ्य, टेक्नोलॉज़ी एडॉप्टिव होता जा रहा है, अपनी प्रकाशित-अप्रकाशित, व्यक्त-अव्यक्त अभिव्यक्ति से उतना ही परेशान होते जा रहा है. अभिव्यक्ति का मसला आने वाले समय में और समस्याएँ पैदा करेगा. जरा याद कीजिए, आपकी अभिव्यक्ति दस साल पहले कहाँ थी? या फिर, याद कीजिए, आपकी अभिव्यक्ति बीस साल पहले कहाँ थी? और, यदि आप अपने आप को बुजुर्ग कहते-समझते हैं तो आपकी अभिव्यक्ति पचास साल पहले कहाँ थी?

कोई तीसेक साल पहले, हमारे जैसे लोगों की अभिव्यक्तियों के कोई लेवाल नहीं होते थे. हमारी अभिव्यक्तियाँ, प्रकाशित-प्रसारित होकर दुनिया तक पहुँचने की लालसा में, अक्सर लाइन वाली कॉपी के काग़ज़ में पेन से लिखी जाकर या यदा कदा, मेकेनिकल टाइपराइटर के जरिए टाइप होकर, लिफ़ाफ़े में बंद होकर, दो रुपए के डाक-टिकट के खर्चे पर, किसी पत्रिका या समाचार पत्र के संपादक के पास पहुँचती थी, और अकसर उसकी कुर्सी के नीचे रखे कचरे की टोकरी में अपनी वीर-गति को प्राप्त होती थी. क्योंकि हमारे पास अपनी अप्रकाशित अभिव्यक्ति को वापस अपने पास वापस बुलाने के लिए वापसी का, पता लिखा, पर्याप्त डाक टिकट लगा लिफ़ाफ़ा संलग्न करने के संसाधन आमतौर पर नहीं होते थे. और हम महीनों झूठ-मूठ का इंतजार करते रहते थे कि कोई दयालु संपादक हमारी अभिव्यक्ति को दुनिया तक जरूर पहुंचाएगा. मगर, संपादक एक, गिनती के पृष्ठों वाली पत्रिका, समाचार पत्र एक, और संपादक-प्रकाशक के मित्र-मंडली के लोग और प्रकाशित-प्रसारित होने के इंतजार में, लाइन में लगी उनकी अपनी अभिव्यक्तियाँ. लिहाजा, हमारी अभिव्यक्तियां बेमौत मरती रही दशकों तक. दिमाग के अंदर ही अंदर. हमारी अप्रकाशित, अप्रसारित अभिव्यक्तियों से भले ही हमें बड़ी भयंकर किस्म की शारीरिक-मानसिक समस्याएँ होती थी मगर अगले को, किसी अन्य को, आम जनता को इससे कोई समस्या नहीं होती थी. कुछ अज्ञेय किस्म के कवि हृदय लोग, इसीलिए अपनी अभिव्यक्तियों को प्रकट करने के लिए जंगलों में, नदियों के किनारे चले जाते थे और प्रकृति को अपनी रचना-पाठ (अभिव्यक्ति ही कहें,) सुना कर, हल्के होकर आते थे. और, बहुधा, यूज़-इट-ऑर-लूज़ इट की तर्ज पर, आमतौर पर लोग अभिव्यक्ति रहित बने रह कर ही काल-कवलित हो जाते थे.

और फिर आ गया इंटरनेट. बुलेटिन-बोर्ड. ब्लॉग. ट्विटर. फ़ेसबुक. व्हाट्सएप्प. हरेक की हर अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त जगह. यहाँ तक कि आपके रसोई घर के तिलचट्टे की अपनी अभिव्यक्ति को दुनिया के सामने रखने के लिए भी पर्याप्त से अधिक जगह. जो चाहे लिखो और छाप दो. जो चाहे सोचो और छाप दो. चाहो तो बिना सोचे छाप दो और चाहे तो छापने के बाद सोचो कि अरे, ये क्या छाप दिया. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में छापो, शाम गोधूली बेला में छापो, रात के ठीक बारह बजे, चाहे जिस अवस्था में हो, छापो. और, प्रिंट वर्जन की तरह ये भी नहीं कि तीर कमान से निकला तो वापस नहीं हुआ. छापो, और हल्ला मचे या पता चले कि गलत छप गया तो मिटा डालो. कह दो कि आपका एकाउंट हैक हो गया और आपके नाम से किसी दुश्मन ने या हैकर ने ऊलजुलूल छाप दिया. अलबत्ता इंटरनेट पर एक मर्तबा छप गई चीज अमिट हो जाती है तो क्या हुआ. अगला स्क्रीन-शॉट ले के रख ले तो क्या हुआ. या फिर, डेढ़ सयाने बन कर ये कह दो कि आपकी अभिव्यक्ति का वो मतलब कतई नहीं था जो समझा जा रहा है. मतलब वो है जिसको समझ कर लिखा गया था. अगला अनपढ़ है, मूर्ख है, कम पढ़ा लिखा है, आपकी बातों को सही तरीके से नहीं समझता है तो इसमें आपकी और आपकी अभिव्यक्ति की क्या ग़लती है भला?

अब तो अभिव्यक्ति का बड़ा मार्केट भी हो गया है. अभिव्यक्ति का माध्यम लेखन-पठन-पाठन से बहुत आगे निकल कर दृश्य-श्रव्य माध्यम तक तो ख़ैर पहुंच ही गया है, इसका बड़ा बाजार भी बन गया है. लाइक का बाजार. साझा का बाजार. आपकी अभिव्यक्ति को अगर न्यूनतम हजार लाइक नहीं मिला, एक सैकड़ा साझा नहीं हुआ, पचास कमेंट हासिल नहीं हुआ तो फिर वो क्या खाक अभिव्यक्ति हुआ? वायरल अभिव्यक्ति वाला तो आज के जमाने का हीरो है. लिहाजा बहुतों की अभिव्यक्ति सलेक्टिव किस्म की, ऑलवेज़ कंट्रोवर्सियल किस्म की हो गई है. पता है कि यदि अभिव्यक्ति को सीधे-सपाट-सच्चे तरीके से परोसा जाएगा तो कोई इसे तवज़्ज़ो नहीं देगा. कोई पूछेगा भी नहीं, कोई घास नहीं डालेगा. इसीलिए अभिव्यक्ति में विवादास्पद चीज़ों का हींग-मिर्च जैसा जोरदार तड़का मारा जाता है, और फिर उससे उठने वाले बवाल का मजा लिया जाता है. टिप्पणियों, प्रति टिप्पणियों की गिनती रखी जाती है, रिपोर्ट और ब्लॉक करने के नायाब खेल होते हैं और इस तरह अपनी-अपनी अभिव्यक्ति को और पंख लगाए जाते हैं.

आधुनिक अभिव्यक्तियाँ कई कई रंगों में आती हैं. धार्मिक-अधार्मिक हरी, नीली, पीली, गेरुआ. चाहे जिस रंग की कल्पना कर लें. इतने रंगों में अभिव्यक्तियाँ जितने कि आपके मिलियन कलर वाले मोबाइल-कंप्यूटर के फ़ुल हाई-डेफ़िनिशन स्क्रीन में उतने रंग के पिक्सेल नहीं होंगे. बड़ी बात ये है कि गेरुआ अभिव्यक्तियों को हरी अभिव्यक्तियाँ पसंद नहीं और हरी को गेरुआ पसंद नहीं. वे एक दूसरे के वॉल और वेब पृष्ठों पर कालिख रंग की अभिव्यक्तियाँ लेकर कूद पड़ती हैं, और समय-कुसमय कालिख की होली खेलती हैं. और, राजनीतिक अभिव्यक्तियों की तो बात ही छोड़ दें. कण-कण में भगवान के दर्शन वाले देश भारत में आजकल अभिव्यक्ति के कण-कण में राजनीति का दर्शन चलता है. अब तक तो वाम और दक्षिणी राजनीतिक अभिव्यक्तियाँ चलती थीं, पिछले कुछ वर्षों से आपिया राजनीतिक अभिव्यक्तियाँ भी धड़ल्ले से चलने लगी हैं. बीच-बीच में राष्ट्रवादी अभिव्यक्तियाँ भी उछलकूद मचाती आती हैं.

साझा, फारवर्ड, टैग जैसी आधुनिक अभिव्यक्तियों की तो और बड़ी समस्याएँ हैं. आपने कुछ बढ़िया सोच कर वो!मारा!! अंदाज़ में किसी प्लेटफ़ॉर्म पर कुछ अच्छा सा, क्रियेटिव सा अभिव्यक्त किया, और अभी घंटा भर गुजरा नहीं कि वो अंतहीन फारवर्ड होकर, घूम-फिर-कर वापस आपके पास ही चला आया, किसी और नाम से, किसी और के क्रेडिट से. अभिव्यक्ति आपकी, क्रेडिट किसी और को! ये तो फिर भी ठीक है, परंतु जब एक ही अभिव्यक्ति, आपके पचास संपर्कों-समूहों-मित्रों से, बारंबार घूम-फिर-कर, हर संभावित प्लेटफ़ॉर्म से, सैकड़ा बार आपके पास आने लगे तो आप क्या करेंगे?

आधुनिक अभिव्यक्ति से सन्यास लेंगे? हाँ, शायद यही उचित समय है.

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भई, मैं तो, नित्य 300 ईमेल, 500 फ़ेसबुक स्टेटस पोस्ट, 1000 ट्वीट, 2500 वाट्सएप्प संदेश पढ़ता हूँ, मगर, कुछ स्टैण्डर्ड, कुछ मानकों के हिसाब से, हूँ अनपढ़ का अनपढ़!

आप बताएँ, आप पढ़े लिखे हैं या अनपढ़?

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