2017

आप कहेंगे कि इनका क्या संबंध है?

संबंध है भाई. पर, पहली बात.

मोदी भक्तों में एक बड़ा नाम जुड़ा है. और कोई हवा हवाई नहीं. महान् बिल गेट्स. तमाम फैक्ट शीट और 360 डिग्री वर्चुअल रीयलिटी वीडियो सहित.

आप उनका मूल ब्लॉग अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़ सकते हैं.

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अब आगे.

हाल ही में गूगल ने अपने मशीनी भाषाई अनुवाद तंत्र में अच्छा-खासा सुधार किया है. और यह वाकई बड़ा आश्चर्यकारी है. मैंने बिल गेट्स के पोस्ट को गूगल के नए अनुवाद तंत्र से हिंदी में अनुवादित किया और उसे जस का तस नीचे छापा है. आप मूल अंग्रेज़ी पढ़ें (शायद जरूरत भी नहीं है!) और नीचे अनुवाद पढ़ें. चमत्कारी.

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(बिल गेट्स के मूल अंग्रेज़ी ब्लॉग पोस्ट का गूगल मशीनी स्वचालित हिंदी अनुवाद - )

भारत मानव अपशिष्ट पर इसका युद्ध जीत रहा है

बिल गेट्स द्वारा | 25 अप्रैल, 2017

लगभग तीन साल पहले, भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक स्वास्थ्य पर एक दमदार टिप्पणी की जिसमें मैंने कभी एक निर्वाचित अधिकारी से सुना है। आज भी इसका एक बड़ा प्रभाव रहा है।

उन्होंने भारत के स्वतंत्रता दिवस की स्मृति के दौरान अपने पहले भाषण के दौरान टिप्पणी की। मोदी ने कहा: "हम 21 वीं सदी में रह रहे हैं। क्या यह कभी हमें परेशान किया है कि हमारी मां और बहनों को खुले में शौच करना है? ... गांव के गरीब महिलाएं रात की प्रतीक्षा कर रही हैं; जब तक अंधेरा उतरता है, तब तक वे मलबे को बाहर नहीं जा सकते क्या शारीरिक यातना वे महसूस करना चाहिए, कितनी बीमारियों कि पैदा हो सकता है engender क्या हम अपनी मां और बहनों की गरिमा के लिए शौचालयों की व्यवस्था नहीं कर सकते हैं? "

मैं एक और समय के बारे में नहीं सोच सकता जब एक राष्ट्रीय नेता ने इस तरह के एक संवेदनशील विषय को इतनी स्पष्ट रूप से और इतनी सार्वजनिक रूप से उभारा है। इससे भी बेहतर, मोदी ने अपने शब्दों को क्रियाओं के साथ समर्थन दिया। उस भाषण के दो महीने बाद उन्होंने स्वच्छ भारत (हिंदी में "स्वच्छ भारत") नामक एक अभियान का शुभारंभ किया, जिसमें अब पूरे देश में 75 मिलियन शौचालय स्थापित करने के लिए 201 9 तक देश भर में खुले शौचालय खत्म करना शामिल है -और यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई इलाज नहीं है कचरे को पर्यावरण में फेंक दिया जाता है

मेरी सबसे हाल ही में भारत की यात्रा पर, मैंने इस अद्भुत उपक्रम के बारे में एक छोटी आभासी वास्तविकता की वीडियो बनाई:

मोबाइल उपयोगकर्ताओं

नीचे आभासी वास्तविकता फिल्म देखने के लिए, यहां क्लिक करें YouTube में खोलने के लिए

नोट: यह एक वर्चुअल रिएलिटी फिल्म है जिसे आप एक वीआर हेडसेट, या अपने ब्राउज़र में 360 ° वीडियो के रूप में देख सकते हैं। अधिक जानें →

यदि आप सोच रहे हैं कि प्रधान मंत्री एक ऐसे विषय पर एक स्पॉटलाइट क्यों डालेगा, जो कि हम में से ज्यादातर सोच भी नहीं लेंगे, आंकड़ों पर नज़र डालें। दुनिया भर में 1.7 मिलियन लोगों में से प्रत्येक वर्ष असुरक्षित जल, स्वच्छता और स्वच्छता से मर जाते हैं, 600,000 से अधिक लोग भारत में हैं एक चौथाई युवा लड़कियों को स्कूल से बाहर निकलता है क्योंकि वहां कोई शौचालय उपलब्ध नहीं है। जब आप मौत, बीमारी, और खो दिया मौका का कारण बनते हैं, तो खराब स्वच्छता भारत को 106 अरब डॉलर से ज्यादा सालाना खर्च करती है।

दूसरे शब्दों में, इस समस्या को सुलझाना हर साल सैकड़ों हजारों लोगों को बचाएगा, लड़कियों को स्कूल में रहने में सहायता करेगा और देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा। स्वच्छता में सुधार हमारी नींव के लिए एक बड़ा ध्यान है, और हम अपने लक्ष्यों के समर्थन में भारतीय सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

स्वच्छ भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दो चाबियाँ हैं एक व्यक्ति को एक सुव्यवस्थित प्रबंधित शौचालय तक पहुंच प्रदान करना शामिल है, जिसका अर्थ है कि रोगियों को बीमार करने के लिए सभी कचरा (या तो साइट पर या उपचार सुविधा में) का इलाज किया जाता है पूरी प्रक्रिया सही करने के लिए, एक टॉयलेट में कचरे को इकट्ठा करना, इसे इकट्ठा करने, आवश्यकतानुसार परिवहन, और इसके इलाज के लिए महत्वपूर्ण है। यदि श्रृंखला में एक लिंक विफल रहता है, तो लोग अभी भी बीमार हो जाते हैं

दुर्भाग्य से, कई जगहों में, सीवर पाइपों को डालना या उपचार की सुविधा का निर्माण करना संभव नहीं है। यही कारण है कि भारतीय शोधकर्ता विभिन्न प्रकार के नए उपकरणों का परीक्षण कर रहे हैं, जिनमें पुनर्निर्मित शौचालय शामिल हैं, जिन्हें सीवर सिस्टम की आवश्यकता नहीं होती है और मानव कचरे का इलाज करने के लिए उन्नत तरीके हैं।

अब तक, प्रगति प्रभावशाली है। 2014 में, जब स्वच्छ भारत शुरू हुआ, तो सिर्फ 42 प्रतिशत भारतीयों को उचित स्वच्छता का उपयोग किया गया। आज 63 प्रतिशत लोग करते हैं और सरकार 2 अक्टूबर, 201 9 तक महात्मा गांधी के जन्म की 150 वीं वर्षगांठ की नौकरी खत्म करने की एक विस्तृत योजना है। अधिकारियों को पता है कि कौन से राज्य ट्रैक पर हैं और जो पिछड़ रहे हैं, एक मजबूत रिपोर्टिंग प्रणाली के लिए धन्यवाद जिसमें फोटोग्राफिंग और प्रत्येक नए स्थापित शौचालय जियोटैगिंग शामिल है।

एक मजबूत रिपोर्टिंग प्रणाली में प्रत्येक नए स्थापित शौचालय की तस्वीरें और जियोटैगिंग शामिल है।

लेकिन लोगों को शौचालय तक पहुंचाना पर्याप्त नहीं है आपको शौचालयों का उपयोग करने के लिए उन्हें मनाने की भी ज़रूरत है यह भारत को साफ करने की दूसरी कुंजी है, और कुछ मायनों में यह पहले की तुलना में भी कठिन है। लोग पुरानी आदतों को बदलने के लिए अनिच्छुक हो सकते हैं

स्वच्छ भारत में उस समस्या से निपटने के सरल तरीके हैं। कुछ समुदायों में, बच्चों के समूह एक साथ बैंड को एक साथ कॉल करने के लिए कहते हैं, जो खुले में शौच कर रहे हैं और उन्हें सार्वजनिक शौचालयों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। एक पायलट प्रोजेक्ट में अगले साल विस्तार किया जाएगा, सरकार ने Google के साथ काम किया ताकि 11 शहरों में उपयोगकर्ता निकटतम सार्वजनिक शौचालयों के लिए ऑनलाइन खोज कर सकते हैं, निर्देश प्राप्त कर सकते हैं, और अन्य उपयोगकर्ताओं द्वारा समीक्षा पढ़ सकते हैं। पूरे देश में सड़कों पर, बिलबोर्ड यात्रियों को याद दिलाते हैं- मिशन के द्वारा बॉलीवुड फिल्मों और क्रिकेट टीमों के सितारे टीवी और रेडियो पर बोलते हैं यहां तक ​​कि भारत की मुद्रा में स्वच्छ भारत लोगो भी शामिल है।

कड़ी मेहनत बंद हो रही है आज भारतीय गांवों के 30 प्रतिशत से अधिक गांवों को 2015 में 8 प्रतिशत से मुक्त खुली मलजल घोषित कर दिया गया है। (आप इस काम डैशबोर्ड पर प्रगति को ट्रैक कर सकते हैं।)

स्वच्छ भारत के बारे में मुझे क्या पसंद है, यह है कि यह एक बड़ी समस्या की पहचान करता है, हर कोई इस पर कार्य करता है, और यह दिखाने के लिए माप का उपयोग कर रहा है कि चीजें अलग-अलग करने की आवश्यकता है। जैसा कि पुरानी कहावत है, जो मापा जाता है वह हो जाता है यदि आप महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित नहीं करते हैं और अपनी प्रगति को चार्ट करते हैं, तो आप सामान्य रूप से व्यापार के लिए बसने को समाप्त करते हैं- और इस मामले में, सामान्य रूप से व्यापार का मतलब है कि स्वच्छ स्वच्छता हर साल करीब पांच लाख भारतीयों की हत्या करता है।

उच्च लक्ष्य से, भारत के लोग परिवर्तन की मांग कर रहे हैं, और वे इसे होने के लिए कार्रवाई कर रहे हैं। यह अन्य देशों के लिए एक बढ़िया उदाहरण है और हमारे सभी के लिए एक प्रेरणा है जो विश्वास करते हैं कि स्वस्थ, उत्पादक जीवन में हर किसी को मौका मिलना चाहिए।

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(चित्र – साभार – डॉ. अरविंद मिश्र का फ़ेसबुक पृष्ठ)

परकाया प्रवेश विधा का उपयोग कर मैं एक वरिष्ठ आईएएस अफ़सर के शरीर में घुस गया था. बड़े दिनों से तमन्ना थी कि लाल-बत्ती वाली गाड़ी का आनंद लूं. परंतु ये क्या! इधर मैंने परकाया प्रवेश किया और उधर नोटबंदी की तरह लाल-बत्ती बंदी हो गई.

मैंने सोचा, चलो, एक वरिष्ठ आईएएस के शरीर में प्रवेश किया है जो अब तक लाल-बत्ती वाली गाड़ी का आनंद उठाता फिरता था, उसके नए, गैर-लाल-बत्ती वाले अनुभव को एक दिन जी कर देख लिया जाए –

“आज सुबह जब मैं उठा तो मुंह सूजा और आँखें फूली हुई थीं. मैंने मन में ही सोचा क्या शक्ल हो गई है एक वरिष्ठ अफसर की. पूरी रात करवटें बदलते गुजरी जो थीं. पूरी रात सपने में लाल-बत्ती वाली गाड़ियां अजीब अजीब शक्लों में, रूपाकारों में आती रहीं और डराती रही थीं तो नींद बार बार टूट जो जाती थी. जैसे लाल-बत्ती ने मुंह का पूरा नूर नोच लिया है लगता था. वैसे भी आज आफिस जाने का बिलकुल भी मन नहीं हो रहा था. जैसे तैसे आलस्य को त्यागकर तैयार होकर बाहर निकला, तो बिना लाल-बत्ती के अपनी सरकारी गाड़ी को देख कर दिल धक्क से हो गया और बुझ गया. लगा, जैसे गाड़ी विधवा हो गई है, उसके सिर का सिंगार, सुहाग चिह्न जबरदस्ती उतार लिया गया हो. गाड़ी पूरी तरह बेनूर हो गई थी. इधर ड्राइवर का हाल भी बुरा था. ड्राइवर का भी सबकुछ बुझा हुआ सा लग रहा था. मुझे लगा कि वो जल्दी ही इस बोरिंग, बिना लाल-बत्ती वाली गाड़ी की उतनी ही बोरिंग गाड़ी से पीछा छुड़ाने वाला है. आखिर, सड़कों पर मुझसे ज्यादा सैल्यूट और सम्मान मेरा ड्राइवर पाता था जो उसे केवल और केवल लाल-बत्ती वाली गाड़ी की वजह से हासिल था. जब मैं गाड़ी में बैठा, तो लगा कि ड्राइवर बस रो ही देगा. मैं स्वयं उसे तसल्ली देने की स्थिति में नहीं था, क्योंकि भीतर से रो तो मैं भी रहा था.

गाड़ी का इंजन आज अजीब आवाज कर रहा था. बिलकुल मरियल. आज तो गाड़ी की चाल में भी दम नहीं दिख रहा था. यकीनन उसे भी अपनी लाल-बत्ती गंवाने का दुःख हो रहा था. आगे बढ़े तो सरकारी कॉलोनी के मुहाने पर बने चेकपोस्ट के चौकीदार ने कोई तवज्जो नहीं दी, और उसका ध्यान खींचने के लिए ड्राइवर को हॉर्न बजाना पड़ गया. इससे पहले ऐसा हादसा कभी नहीं हुआ था. गाड़ी के ऊपर डुलबुग जलती लाल-बत्ती को देखते ही चौकीदार दौड़कर बैरियर हटाता था. आज जब चौकीदार बैरियर हटा रहा था तो उसमें वह फुर्ती तो ख़ैर दिखी ही नहीं, उल्टे उसके चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कान अलग तैर रही थी जो बड़ी दूर से महसूस की जा सकती थी. लगा कि वो जानबूझ कर देर से और बड़े आराम से बैरियर हटा रहा है ताकि उसके चेहरे की व्यंग्यात्मक मुस्कान को ठीक से पढ़ा समझा जा सके.

आगे बढ़े तो जैसी आशंका थी, वही हुआ. चौराहे पर ट्रैफ़िक सिपाही ने उलटे तरफ का ट्रैफ़िक क्लीयर करने के चक्कर में अपनी गाड़ी रोक दी. सैल्यूट मारना तो दूर की बात थी. लाल-बत्ती रहती तो ट्रैफ़िक की ऐसी-तैसी बोल वो पहले तो लाल-बत्ती वाली गाड़ी को एक शानदार सैल्यूट ठोंकता, इस बात से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि गाड़ी के भीतर कोई बैठा भी है या नहीं, या बैठा है तो कोई अफ़सर है नेता है या कोई अपराधी जो नक़ली लाल-बत्ती लगाए घूम रहा है, और फिर वो लाल-बत्ती वाली गाड़ी के लिए पहले रास्ता क्लीयर करता. पूरे रास्ते यही हाल रहा और दस मिनट में नित्य ऑफ़िस पहुंचने वाले रास्ते में आज पूरे पैंतालीस मिनट लग गए. लगा कि भारत में जनता और गाड़ियों की भरमार हो गई है और इस पर नियंत्रण के लिए हम जैसे अफसरों को ही कुछ करना होगा. इन नेताओं के भरोसे बैठे रहे तो बस लाल-बत्ती लाल-बत्ती खेलते रह जाएंगे.

आफिस में विशिष्ट वीआईपी पार्किंग के हाल बुरे थे. कोई रौनक नहीं थी, कोई एटीट्यूड नहीं था, कोई गर्व नहीं था, कोई रौब नहीं था. कहीं लाल-पीली-नीली बत्ती का नामोनिशान नहीं था तो एक सिरे से दूसरे सिरे तक सारी गाड़ियाँ मारूती 800 की तरह बेजान, एक-सी नजर आ रही थीं. प्रधान सचिव की पर्सनल मर्सिडीज़ बैंज, जिस पर वे शान से लाल-बत्ती लगाया करते थे, रोती हुई-सी प्रीमियम पार्किंग में खड़ी थी. और कुछ इस तरह खड़ी थी जैसे वह पार्किंग उसे धकिया रहा हो – कलमुंही परे हट, यह स्थल तो लाल-बत्ती वाली गाड़ी के लिए आरक्षित है. तू बिना बत्ती के यहाँ कैसे खड़ी है?

ऑफ़िस के अपने चैम्बर में घुसा तो अर्दली को हमेशा की तरह दरवाजे पर स्वागत में नहीं पाया. वो दरअसल खिड़की से नीचे झांक रहा था. जहाँ से प्रीमियम पार्किंग का दिलकश नजारा दिखाई देता था. आज उसकी निगाह में अलग चमक थी, जो स्पष्ट प्रतीत हो रही थी, और मुख पर थी संतुष्टि और प्रसन्नता के साथ व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट. उसे मेरी स्थिति का आभास नहीं था. मैंने टेबल पर निगाह मारी. धूल की परत जमी हुई थी. प्रकटतः उसने आज टेबल साफ नहीं किया था.

मैंने अपनी गर्दन मोड़ी और दीवार की और मुख किया. मेरी निगाह कैलेंडर को खोज रही थी. मैं अपने रिटायरमेंट के बचे-खुचे दिन गिनने लगा.”

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ऊपर जो स्क्रीनशॉट है वह याहू मेल में आया है। सभी लिंक यह बयान कर रहे हैं कि बड़ा फर्जीवाड़ा हो रहा है मगर याहू सो रहा है। इस ईमेल की भाषा ऐसी है कि कोई भी धोखा खा जाए।

नीचे का स्क्रीनशॉट भी कम नहीं है -


शायद इसीलिए याहू के बुरे दिन चल रहे हैं। 😕

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ईवीएम से छेड़छाड़ के आपको कितने तरीके पता हैं?
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यदि आप एक आईआईटी इंजीनियर हैं तो शर्तिया आपको ये दस तरीके तो पता होंगे ही–

1. एक हथौड़ी लें, ईवीएम पर दन्न से दे मारें. बल्कि हथौड़ा ठीक रहेगा. वो भी लुहार वाला.

2. एक प्लायर लें, ईवीएम के बटनों को, फिर सर्किट को और अंत में प्रोसेसर व रोम को प्लायर की सहायता से क्रम से उखाड़ें. बेतरतीब से उखाड़ने में न तो ईवीएम को मजा आएगा न देखने वालों को.

3. ईवीएम के बैटरी कंपार्टमेंट को खोलें और उसमें सीधे 440 वोल्ट का करेंट दें. करेंट कैसे दें यदि नहीं पता तो आईआईटी में फिर से एडमीशन लें. इस बार सब्जैक्ट मेटलर्जी लें. इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में करेंट कैसे देना यह नहीं सिखाया जाता. वैसे, सीखकर भी क्या हासिल होगा? थ्योरी और प्रैक्टिक में जमीन आसमान का अंतर होता है. आजकल करेंट वैसे भी फेज़ में नहीं आती, आती भी है तो बार बार जाती है जबकि न्यूट्रल और अर्थ में आती है तो फिर जाती नहीं. 

4. गैस बर्नर को चालू करें. सब्सिडी छोड़ी गई वाली गैस से छेड़छाड़ अच्छी होगी. हाँ, तो गैस जलाएँ, उस पर चाय की पतीली जिस तरह रखी जाती है उस तरह ईवीएम को रखें. मस्त छेड़छाड़ होगी. सुगंध सूंघकर धुंआ देखकर एनजीटी वाले आ धमकेंगे ऐसा अगर सोच रहे हैं तो निश्चिंत रहें, ऐसा कुछ नहीं होगा. उनके अपने एजेंडे हैं, उनकी अपनी अलग समस्याएँ हैं.

5. एक हेलिकॉफ्टर किराए पर लें. चार्टर्ड हो तो उत्तम. मालिकाना हो तो सर्वोत्तम. फिर पंद्रह हजार फुट की ऊँचाई से ईवीएम को नीचे गिराएं. यदि तीस हजार फुट ऊंचे से गिराएंगे तो छेड़छाड़ सर्वोत्तम तो होगी ही, छेड़छाड़ का सबूत भी नहीं मिलेगा.

6. सर्वोच्च न्यायालय की रोक के बावजूद बाजार में बेधड़क बिक रहे एसिड का पूरा एक ड्रम खरीदें. उस ड्रम में ईवीएम को डाल दें. बड़ी रासायनिक किस्म की छेड़छाड़ होगी, पूरी तरह विकृत करती हुई. बाजार में यदि एसिड न मिले तो मुहल्ले के मजनूं के पास शर्तिया बढ़िया स्टॉक होगा, और असली भी और सस्ती भी.

7. ईवीएम को पेचकस की सहायता से ठीक से खोलें. सर्किट बोर्ड अलग करें. डीसॉल्डरिंग मशीन से सारे कंपोनेंट अलग करें. डीसॉल्डरिंग मशीन चलाना नहीं आता तो आईटीआई में वेल्डिंग कोर्स में एडमीशन लें. आईआईटी व आईटीआई में केवल अक्षरों के क्रम का अंतर है.

8. ईवीएम को लेकर किसी जलाशय के किनारे जाएँ. अच्छा होगा उस जलाशय के किनारे जाएँ दुर्गा गणेश आदि विसर्जित होते हैं. ईवीएम को भी उसी तरह विसर्जित करें. यह नारा भी लगाएं – ईवीएम तोरया, अगले चुनाव तू मत आ! (यह भी ठीक रहेगा - ईवीएम मोरया, अगला चुनाव मुझे जितवा)

9. मटन काटने वाला छुरा लें. आजकल यह बहुतायत में कबाड़ियों के पास मिल रहा है. ईवीएम को इससे काटें. समस्या हो तो गौरक्षक सेना की सहायता लें.

10. शराब दुकान जाएँ. ताज़ा ताज़ा राष्ट्रीय राजमार्ग से डीनोटीफ़ाई होकर अर्बन सिटी सड़क के किनारे की शराब दुकान हो तो ज्यादा अच्छा. ईवीएम को सामने रखें और अपनी पसंद की वह्सिकी या रम के तीन चार तग़ड़े शॉट मारें. दारू नहीं पीते हों तो भोलेनाथ की पसंदीदा प्रसाद स्वरूप भाँग / गांजे की दुकान में ठंडाई या सुट्टे का शॉट मारें. आप पूछेंगे कि ईवीएम में छेड़छाड़ कहाँ हो रही है? हो रही है भाई, बखूबी हो रही है. थोड़ा नशा चढ़ने दो. फिर दिखेगा कि एक नहीं, दस ^ दस तरीकों से हो रही है!

भूल से, यदि आप आईआईटीएन नहीं हैं, तो फिर आपके अपने तरीके होंगे ईवीएम में छेड़छाड़ के. जरा हमें भी तो बता दें?














लिनक्स उपयोग करने का एक और ठोस कारण।
अब आप चलाएँ लाखों एंड्रॉयड ऐप्प अपने लिनक्स डेस्कटॉप या लैपटॉप में। और यह वर्चुअल मशीन जैसी व्यवस्था में नहीं बल्कि नेटिव यानी मूल रूप में चलते हैं।

सेल्फ़ियों का जमाना है. जित देखो तित सेल्फियाँ.
मैंने पेड़ पौधों, जानवरों और निर्जीव दुनिया में खींची जा रही सेल्फ़ियों पर कुछ शोध किया और मेरा चित्रमय शोधपत्रक आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है-

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गिरगिटिया सेल्फ़ी – शायद राजनेताओं ने इनसे सीख ले ली है. राजस्थान जाएंगे तो राजस्थानी पगड़ी पहन कर सेल्फ़ी, चेन्नई गए तो लुंगीदार सेल्फ़ी.

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झूला सेल्फ़ी. ऐसी मनोरंजक राइड कि डिज्नीवर्ल्ड की 10जी राइडें भी पानी मांगे.

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मंदिर इन मेकिंग सेल्फ़ी – ईश्वर ने मनुष्य को बनाया, अब मनुष्य ईश्वर को यत्र-तत्र-सर्वत्र बना रहा है. बनाए जा रहा है. यह एक सर्वथा नए ईश्वर की सगर्व, सर्वथा प्रथम सेल्फ़ी है.

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वृक्ष सेल्फ़ी. किराए पर झाड़. जब इस नवीन दुनिया में किराए पर कोख मिल रही है तो फिर पेड़ों  को तो किराए पर चढ़ना ही था…

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कटा झाड़ या गंदा नाला सेल्फ़ी? पाठकों के निर्णय पर…

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निर्जीव, निर्लिप्त सेल्फ़ी. या फिर, काला और गेहुंआ सेल्फ़ी. जो भी हो, शर्तिया, नस्लवादी सेल्फ़ी.

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एक नया शिकार सेल्फ़ी 1
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एक नया शिकार  सेल्फ़ी 2. (वैसे तो यह अनटाइटल्ड सेल्फ़ी है, सेल्फ़ एक्सप्लेंड. पीरियड.)

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मोहल्ला आईपीएल सेल्फ़ी. इस तरह के, बेहद मनोरंजक इवेंट के सभी प्रीमियम टिकट पहले ही ब्लैक में बिक चुके होते हैं!

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असली गौरक्षा सेल्फ़ी. नो कमेंट्स. नहीं तो गोरक्षकों का हमला होने की पूर्ण संभावना है.

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टायर्ड सेल्फ़ी.

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ऑब्सलीट (टेक्नोलॉजी) सेल्फ़ी

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असली भेड़चाल सेल्फ़ी

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द अर्बन जंगल सेल्फ़ी

कहावत है कि एक चित्र बराबर हजार शब्द. तो इस हिसाब से कोई दर्जन भर से अधिक सेल्फ़ी हो गई. याने दस हजार से अधिक शब्द! इतना लिखने के बाद थकावट दूर करने के लिए थोड़ा आराम, उसके बाद फिर सेल्फ़ी सत्र. ठीक है?

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यूँ, देखा जाए, तो इस जग का आधार है मूर्खता. कल्पना कीजिए कि यदि दुनिया में मूर्खता नहीं होती तो क्या कैसा होता? मूर्खता के बगैर दुनिया का दृश्य क्या होता? एक ऐसी रसहीन, आनंदहीन, अति-जहीन दुनिया होती जहाँ जीने का कोई मज़ा, कोई स्वाद ही नहीं होता. एक तरह से, दुनिया बनाने वाले ने भी एक बड़ी भारी मूर्खता की है और इस दुनिया को बना डाला. या, उसके किसी मूर्खतापूर्ण कार्य की वजह से कहीं कुछ बिगबैंग जैसा गड़बड़ हो गया और दुनिया का निर्माण हो गया. इसीलिए तो कहीं आग उगलते सूरज है तो कहीं ठंडे चाँद और कहीं सबकुछ खा जाने वाले विशाल श्याम विवर हैं तो कहीं नित्य नए सूर्य बनाती नीहारिकाएँ.  फिर, जरा याद करें, ट्रम्प के बगैर, अभी साल भर पहले अमरीका कैसा था? किम जोंग उन के बगैर  उत्तरी कोरिया कैसा लगेगा?

परंतु आज एक अलग तरह की मूर्खता के बारे में बात हो रही है. लेखकीय मूर्खता. वह भी, खासतौर पर हिंदी भाषाई. आदमी (औरत भी समझा जाए, और थर्ड जैंडर भी, पढ़ने वाले अपनी सहूलियत और प्रेफ़रेंस से जैसा समझना चाहें, बवाल न काटें) जब तक लेखक नहीं होता या बनता या सिद्ध नहीं होता कि वो एक लेखक है, मूर्खता का प्रमाण उसमें ढूंढे नहीं मिलता. लेकिन जैसे ही वो लेखक बन जाता है उसके जीनोम में मूर्खता सर्वत्र छा जाती है, और उसके रग-रग में/से मूर्खता बसने-टपकने लग जाती है. दरअसल, मूर्खता का बग जब किसी अच्छे-भले आदमी को काटता है तो वो लेखक बन जाता है और यदि यह इन्फ़ैक्शन जरा ज्यादा हो जाता है तो वो एक कदम और आगे बढ़कर व्यंग्यकार बन जाता है.

आप कहेंगे यह क्या बकवास है? तो पहली बात, स्पष्ट कर दें कि इस देश में हर किसी को बकवास करने का हक है. यहाँ अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है, और असहिष्णुता बर्दाश्त नहीं की जाती. दूसरी बात, आदमी, अपनी मूर्खता में, ईश्वर-प्रदत्त अपना असली काम-धाम छोड़-छाड़कर कुछ रचने लग जाता है जिसे वो साहित्य कहता है. साहित्य रच कर फिर वह इसे प्रकाशित-प्रसारित करने-करवाने की मूर्खता करता है. इसके लिए वो ऐसा प्रकाशक ढूंढने की कोशिश करता है जो उसे उसकी रचना को न केवल बढ़िया कलेवर-काग़ज़ में छापे, विज्ञापित करे, विमोचन करे-करवाए, बल्कि छापने के एवज में तगड़ा रॉयल्टी भी प्रदान करे. है न और बड़ी मूर्खता?

कोढ़ में खाज ये कि लेखक अपने साहित्य को बेस्ट सेलर होने के मूर्खता भरे दिवा-स्वप्न भी देखता है और इस दिवा-स्वप्न को हकीकत में बदलने की मूर्खता में मित्र-साहित्यकारों से, जो पहले ही उसी तरह की, अपनी-अपनी मूर्खता में लिप्त-संलग्न होते हैं, बढ़िया समीक्षाएँ लिखवाता-छपवाता है. इधर पाठक, सर्वकालिक रूप से जनप्रिय लेखकों जैसे कि देवकीनंदन खत्री और सुमोपा (अरे, वही अपने पाठक जी,) आदि की रचनाओं में साहित्यानंद-पठनानंद ढूंढ लेता है.

लेखकीय मूर्खता के कई आकार-प्रकार-भेद-विभेद होते हैं. और इसीलिए, दिए गए किसी एक आलोचक की नजर में आए, किसी एक परिपूर्ण, मौलिक किस्म की कहानी में, दिए गए किसी अन्य आलोचक की नजर में “प्रेमचंदीय” भाषाई सहजता-सरलता-खूबसूरती, स्थानीयता, देशजता आदि-आदि का तो अभाव होता ही है, मौलिकता कहीं, किसी सूरत नजर नहीं आती. गजल ग़ज़ल नहीं बन पाती, व्यंग्य में सरोकार नहीं होता और पंच प्रपंच बन कर रह जाता है.

लेखकीय मूर्खता के उच्चस्तरीय उदाहरणों में शामिल होते हैं लेखक के स्वप्रकाशित, उच्च-मूल्यित, 200 प्रतियों के - फर्स्ट एंड लास्ट - प्रिंट रन वाली साहित्यिक किताब के नोबुल-बूकर पुरस्कार न मिल पाने की सूरत में, स्थानीय, तात्कालिक सृजित साहित्यिक संस्था से पुरस्कृति होना, जिसकी चर्चा 125 सदस्यों वाले अति सक्रिय साहित्यिक वाट्सएप्प ग्रुप में गर्व के साथ होती है और जिसकी खबर  स्थानीय साप्ताहिक अखबार के एक संस्करण में, एक पत्रकार मित्र के अतिमित्रवत् सहयोग से 1x1 कॉलम सेंटीमीटर में  छपती भी है.

और, लेखकीय मूर्खता की पराकाष्ठा का उदाहरण है यह लेख जिसके वायरल होने, सर्वत्र वाहवाही मिलने, सैकड़ा भर टिप्पणियाँ और हजार भर पसंद मिलने की आशा-प्रत्याशा में लिखा जा रहा है. मगर, हिंदी साहित्य का सार्वकालिक, सार्वभौमिक सत्य क्या है यह सबको खबर है, सबको पता है - भारतीय पाठक भारतीय लेखकों में से चेतन भगतों, अमीषों  जैसों को उनकी मूल भाषा अंग्रेज़ी में पढ़ता है, और यदि अंग्रेज़ी में हाथ तंग है तो उनका हिंदी अनुवाद पढ़ता है और या सुमोपा जैसों को पढ़ता है जो, हिंदी साहित्य कदापि नहीं होता है!

थंडरबर्ड आउटलुक की तरह ही एक बेहद लोकप्रिय व काम का ईमेल क्लाएंट है, जिसका प्रयोग मैं पिछले दशक भर से करता आ रहा हूँ. यह विंडोज पर भी है और लिनक्स पर भी. इसका नो-नॉनसैंस इंटरफ़ेस व कार्यक्षमता बाकी अन्य दूसरे ईमेल क्लाएंट से अलग करता है. यह जीमेल से बढ़िया जुड़ जाता है और आमतौर पर मैं जीमेल का इस्तेमाल इसी, थंडरबर्ड क्लाएंट से ही करता हूँ.

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(ऊपर का चित्र - थंडरबर्ड में हिंदी वर्तनी जांच की सुविधा)

 

इसमें हिंदी वर्तनी जांच की सुविधा अरसे से उपलब्ध थी, अभी यह थोड़ा और उन्नत है और बढ़िया है.

आइए, सीखें कि इसे कैसे इंस्टाल करें.

टूल्स > ऑप्शन्स मेनू में जाएं और वहाँ पर कंपोजिशन टैब पर क्लिक करें.

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फिर डाउनलोड मोर डिक्शनरीज़ पर क्लिक कर लिंक खोलें.

हिंदी (भारत) डिक्शनरी डाउनलोड करें व इंस्टाल करें. वर्जन इनकम्पेटिबलिटी की चेतावनी आ सकती है, उसे अनदेखा करें. थंडरबर्ड में जोड़ें का विकल्प आएगा, उसे स्वीकारें और बस हो गया आपका थंडरबर्ड तैयार शुद्ध हिंदी लिखने को.

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आप अपने सही शब्द जोड़कर इसके शब्दभंडार को और समृद्ध बना सकते हैं.

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(कार्टून - साभार काजल कुमार )

 

गरमी अभी ठीक से आई नहीं है, और लोगों को गरमी चढ़ रही है. एक नेता इतनी गरमी खा बैठे कि सीधे हवाई जहाज से गिरे और ट्रेन में अटके. एक रोस्टिया कॉमेडियन सफलता की गरमी से इतने स्व-रोस्ट हुए कि उनके इनकम टैक्स में करोड़ों की कमी होने का अंदेशा है.

गरमी केवल लोग नहीं खाते. अपने आसपास की तमाम चीजों, उपकरणों पर गरमी चढ़ जाती है. पिछले साल सेमसुंग गैलेक्सी नोट 7 को अपने नए-पन की इतनी गर्मी चढ़ी कि वो जहाँ तहाँ ही फटने ही लगी. पंखे में लगे कैपेसिटर का इलेक्ट्रोलाइट गरमी खाकर सूख जाता है तो पंखा मरियल चाल चलने लग जाता है. आपके कंप्यूटिंग उपकरणों में लगे इलेक्ट्रानिक कलपुर्जे गरमी खा जाते हैं तो वे उपकरण को बेकार कर देते हैं और फिर उन्हें रिपेयर या रीप्लेस करना पड़ता है. वाहन का इंजन गरमी खाकर ब्लॉक हो जाता है तो टायर गरमी खाकर बर्स्ट हो जाता है.

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साहित्यकारों, खासकर व्यंग्यकारों में गरमी खाने की अच्छी खासी परंपरा रही है. वैसे भी, बिना गरमी खाए कोई सरोकारी, चर्चित, लोकप्रिय, पसंदीदा आदि-आदि किस्म का व्यंग्यकार नहीं बना जा सकता. बिना गरमी खाए, कहीं से, किसी कोने से, किसी भी तरतीब से व्यंग्य निकल ही नहीं सकता. कुंजीपट से (हें, आजकल कोई कलम-दवात से लिखता भी है क्या?) सही, मारक व्यंग्य टाइप करने के लिए गरमी खाना जरूरी है. गरमी कहाँ से, किधर से, किस विषय पर खाएँ यह एक बड़ी समस्या है. वैसे आजकल लोग टुंडे के कबाब खाने-नहीं-खाने के नाम पर गरमी खा रहे हैं, और अच्छी खासी खा रहे हैं, और उनमें साहित्यकारों की भी अच्छी खासी संख्या है.  हर एक साहित्यकार हर दूसरे साहित्यकार पर इसलिए गरमी खाता है कि सामने वाला लिखता तो कूड़ा है, पर हर कहीं छपता है, प्रशंसित होता है. लेखन में पठनीयता, सरोकार, मौलिकता तो घेले भर की नहीं, मगर मजमा जमाए फिरता है. और, जो बचे खुचे साहित्यकार सार्वजनिक गरमी नहीं दिखाते हैं वे ठीक इसी किस्म की अंदरूनी गरमी से त्रस्त रहते हैं.

गरमी खाकर रिश्ते परिपक्व होते हैं तो टूटते-फूटते भी हैं. तीन तलाक का मामला चहुँओर गरमी खा खिला रहा है, इतना कि स्थापित राजकुमारों की कुर्सियाँ तक हिल गईं और नए योगी सत्तानशीं हो गए. रोमियो जूलियट के रिश्तों में भारतीय संस्कृति के तथाकथित रक्षक भाले त्रिशूल लेकर और पुलिसिये डंडे लेकर गर्मी पैदा करने की कोशिशों में आदि काल से लगे हैं तो भारतीय जनमानस के जातीय और सामाजिक रिश्तों में जातीय गणित के समीकरण बिठाने वाले नेता. मंदिर मस्जिद का मसला लेकर तो लोग जब तब गरमी खाने लगते हैं.

जिस तरह से कार्बन-पुनर्चक्रण होता है, ठीक उसी तरह से गरमी खाने का पुनर्चक्रण होता है. उदाहरण के लिए, पसंदीदा ठेकेदार को टेंडर नहीं मिलने से गरमी खाकर नेता अफ़सर को ठांसता है, तो अफ़सर कुछ गरमी अपने मातहत पर निकाल देता है. मातहत घर जाकर वह गरमी अपनी पत्नी पर निकालता है तो पत्नी या तो अधिक नमक की पतली बेस्वाद दाल बना कर गरमी निकालती है या फिर बच्चे को होमवर्क करने के बाद भी टीवी नहीं देखने देती और बच्चा हुक्मउदूली कर गरमी निकालता है. यह गरमी भुगतकर मातहत दूसरे दिन कार्यालय में आकस्मिक अवकाश का आवेदन भेज देता है, अफ़सर, नेता के गोटी बिठाए टेंडर पर कोई नेगेटिव टीप ठोंक मारता है और इससे आहत नेता फिर किसी दूसरे अफ़सर या विरोधी पार्टी के नेता पर गर्मी उतारता है अथवा अपने ट्रांसफर पोस्टिंग के रेट बढ़ा देता है. यह चक्र अक्षुण्ण होता है, और सेल्फ प्रोपेल्ड होता है, और इसे किसी बाहरी ऊर्जा की जरूरत नहीं होती है.

मामला कुछ ज्यादा ही गरमाने लगा है? इससे पहले कि आप यह पढ़ते पढ़ते गरमी खा जाएँ और आइंदा इन पंक्तियों के लेखक को हमेशा के लिए पढ़ने से मना कर दें, किस्सा यहीं तमाम करते हैं. मगर, फिर, इतनी गरमी आपको किन्हीं और दूसरे लेखकों में से किसी से कभी मिली भी है भला?

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आज मैं आपको एक ऐसा व्यंग्य सुनाने जा रहा हूँ जिसे आप एक सांस में पढ़कर वाह! वाह!! कह उठेंगे. आज नहीं तो कल, पर ये तय है कि रवि रतलामी के व्यंग्य सभी पढ़ने लगेंगे. एक दिन ऐसा जरूर आएगा, जब जिंदगी का पाठ इन व्यंग्यों के माध्यम से पढ़ाया जाने लगेगा.

ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि आज जब हर ओर तकनीक, बिजनेस, धन, कामयाबी की ही बातें चल रही हैं तो रवि रतलामी के व्यंग्य जीवन के सत्य की बातें करती हैं. खैर, रवि रतलामी आज आपको चुनाव के बाद का हाल सुनाएगा. वो चुनाव, जो आगे, आपके जीवन के विकास क्रम में कभी-न-कभी तो आएगा!

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जम्बू द्वीप में सृष्टि के प्रारंभ से ही चुनावी व्यवस्था लागू थी. वैसे, एक धड़े के वैज्ञानिकों का कहना है कि, बिगबैंग की थ्योरी तो बकवास है,  चुनाव से ही, और चुनाव के लिए ही सृष्टि का प्रारंभ हुआ. वैसे भी, कुछ लोग चुनाव में ही जीते मरते हैं – उनके लिए संपूर्ण सृष्टि, सपूर्ण ब्रह्मांड चुनाव और केवल चुनाव होता है – उनकी सृष्टि का आरंभ और अंत चुनाव से ही होता है. वे खाते-पीते-उठते-बैठते चुनावी चक्र में उलझे रहते हैं और अपना सारा कार्य चुनाव को ध्यान में रखते हुए ही करते हैं.

बहुत आगे की बात है, यथा समय जम्बू द्वीप में आम-चुनाव हुए. चुनाव में सत्तासीन पार्टी की हार हुई और विपक्ष की जमीन-खिसकती (अरे, वही, लैंडस्लाइड विक्ट्री) जीत हुई.

जैसा कि होता आया है, चुनाव के बाद हार-जीत का विश्लेषण किया गया.

हार-जीत के कुछ मुख्य कारक ये रहे –

1 – बायोमैट्रिक तरीके से, 1048 बिट एनक्रिप्टेड सेक्योर्ड साइट के जरिए जो मतदान करवाए गए उसमें हैकिंग की गई, और तमाम वोट परसेंटेज जीतने वाली पार्टी को चले गए. (इसीलिए, वापस, पुराने, ईवीएम तरीके से, बूथ आधारित मतदान कराने की पुरजोर मांग हारने वाली पार्टी की ओर से की गई)

2- चुनावी पंडितों ने बताया कि इस बार अगड़ों ने पिछड़ों को जमकर वोट दिया, पिछड़ों ने अगड़ों को, नारियों ने पुरुषों को, अल्प-संख्यकों ने बहु-संख्यकों को, और इसके उलट, भरपूर वोट दिया और इस तरह से बहुत ही तीव्र अ-ध्रुवीकरण हुआ जिसके फलस्वरूप यह जमीन-खिसकती हार/जीत हासिल हुई.

3 – चुनाव के दौरान वोटरों को जमकर लुभाया गया. चुनावी घोषणा-पत्र में पर्सनल ड्रोन से लेकर पर्सनल रोबॉटिक असिस्टेंट तक देने के वायदे किए गए और बांटे गए, जिससे लालच में अंधी होकर जनता ने वोट दिए.

4 – चुनावी विश्लेषकों के मुताबिक दरअसल, अधिकांशतः जीते वही हैं जो टिकट नहीं मिलने या अन्य वजहों से ऐन चुनाव से ठीक पहले पाला बदल लिए थे. इस लिहाज से, जिस पार्टी की जीत है, सत्यता में वह जीत नहीं है, और जिस पार्टी की हार है, वस्तुतः वह हार नहीं है. ठीक ठीक कहें, तो यह तो यथा-स्थिति-वाद है!

और, यह यथास्थिति-वाद अगले पाँच साल बदस्तूर जारी रही और फिर एक और चुनाव जनता के सामने आ गया और उस चुनाव में भी ऊपर वाली कहानी एक बार फिर से दोहराई गई. और, उस चुनाव के बाद भी, अमूमन विश्लेषण वही का वही रहा. लगे हाथ आपको बता दें कि पांच साल पहले की कहानी भी कुछ इसी तरह की ही थी.

यह कहानी है ही ऐसी.  चुनाव के बाद की कहानी. एक सी.

Ravi Ratlami

#जुगलबंदी

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(अस्वीकरण – अरे, भाई, डिस्क्लेमर! – यह काल्पनिक पोस्ट है और इस पोस्ट की स्टाईल का किसी अन्य जीवित-मृत व्यक्ति के स्टाइल से कोई संबंध नहीं है और यदि ऐसा लगता है तो इसे केवल संयोग मात्र समझा जाए)

टेक्नोलॉज़ी की जय हो!

यदि आप गीत संगीत गाने-बजाने में रुचि रखने हैं, तो रिफ़स्टेशन के बारे में जानते होंगे.

यदि नहीं, तो यह आपके लिए बहुमूल्य टूल है.

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रिफ़स्टेशन को कंप्यूटर पर भी इंस्टाल किया जा सकता है और इसे ब्राउज़र के जरिए क्लाउड के द्वारा भी उपयोग में लिया जा सकता है.

वैसे तो इसमें बहुत सी सुविधाएँ हैं, परंतु मूलभूत सुविधा ये है कि इस टूल से किसी भी एमपी 3 गीत का नोटेशन / कार्ड हासिल कर सकते हैं. गीत-संगीत साधकों और सीखने वालों के लिए यह शानदार और बेहद काम का है. नोटेशन की सटीकता 85 प्रतिशत तक आती है, जिसमें मामूली फेरबदल से सटीकता 100 प्रतिशत तक बनाई जा सकती है. पीसी टूल पर इसमें वांछित बदलाव कर अपना नया म्यूजिक भी अरेंज किया जा सकता है.

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वेबसाइट के जरिए इसका उपयोग तो और आसान है. अपने किसी गाने को इसके इंटरफ़ेस में सर्च करिए और बस आपके सामने नोटेशन हाजिर - यदि गीत लोकप्रिय किस्म का है, तब तो तुरंत हाजिर, नहीं तो थोड़ा खोजबीन करें, और नहीं तो अपलोड कर दें. मैंने लता मंगेशकर का गाया ठंडी हवाएँ लहरा के जाएँ आजमाया तो यह तुरंत हाजिर हो गया - यू-ट्यूब वीडियो एक तरफ चलता हुआ और दूसरी तरफ गानों के नोटेशन्स. है न कमाल?

इसे यहाँ से आजमा सकते हैं - https://play.riffstation.com/

मित्र संजय बेंगाणी ने जब बताया कि उन्होंने हिंदी का भौतिक कीबोर्ड ऑनलाइन साइट से खरीदा है और उस पर काम करना सीख रहे हैं तो मुझे उत्सुकता हुई कि इस हिंदी के भौतिक कीबोर्ड में क्या कुछ सुविधा है यह देखा जाना चाहिए.

टीवीएस देवनागरी हिंदी मराठी भौतिक कीबोर्ड

हिंदी कंप्यूटिंग की दुनिया को तीस साल से ऊपर हो गए हैं, मगर, आज भी लोग कंप्यूटिंग उपकरणों, मोबाइल उपकरणों, ब्राउज़रों में हिंदी टाइपिंग के लिए जूझते दिखाई दे जाते हैं. रहा सहा कचरा नित्य होते सॉफ़्टवेयर और ऑपरेटिंग सिस्टमों के अद्यतनों के कारण कचरा हो जाता है क्योंकि अच्छा खासा चलता सिस्टम फट जाता है और टाइपिंग की नई नई समस्याएँ पैदा हो जाती हैं.

पर, अब एकमात्र यह समाधान आपकी तमाम समस्याओं का हल हो सकता है.

मैं अभी भी कह रहा हूँ कि हो सकता है, है नहीं!

बहरहाल, तो बात भौतिक कीबोर्ड की हो रही है.

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हिंदी का भौतिक, देवनागरी कीबोर्ड को स्थानीय कंप्यूटर बाजार में ढूंढना और खरीदना टेढ़ी खीर है.

ऑनलाइन साइटों पर भी टेढ़ी खीर है. कहीं यह मिलता है कहीं नहीं. सर्च परिणाम उल्टे सीधे सामान दिखाते हैं.

मैंने कोई दो दर्जन उल्टे सीधे सर्च किए, तब देवनागरी कीबोर्ड से इस कीबोर्ड की लिंक मिली, वह भी अमेजन पर. अन्य साइटों पर सर्च परिणाम उपयुक्त नहीं रहे.

यह कीबोर्ड भारत की बड़ी कंपनी टीवीएस इलेक्ट्रॉनिक बनाती है, जिसका मेकेनिकल कीबोर्ड टीवीएस गोल्ड मैं पिछले दो दशकों से इस्तेमाल करता आ रहा हूँ, और, जो इसे इस्तेमाल करते हैं वे इसकी कीमत जानते हैं. यह जीरो टैक्टाइल फ़ोर्स का फेदर टच कीबोर्ड है, जिसमें ज्यादा टाइपिंग से उंगलियों में दर्द जैसी होने  वाली समस्याएँ कम होती हैं.

परंतु हिंदी का यह कीबोर्ड गो़ल्ड वाला नहीं आता, बल्कि साधारण मेम्ब्रेन वाला आता है टीवीएस चैम्प के नाम से,  जिसकी कीमत कोई छः सौ रुपए के आसपास है.

वस्तुतः यह कीबोर्ड साधारण क्वर्टी कीबोर्ड ही है, परंतु इसके कीबोर्ड में हिंदी देवनागरी अक्षर - इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड - लेज़र इच्ड छपे हुए हैं.

इसका सीधा सा अर्थ है, यदि आपने अपने ऑपरेटिंग सिस्टम में डिफ़ॉल्ट रूप से मौजूद हिंदी टाइपिंग टूल इनस्क्रिप्ट को इनेबल किया हुआ है तो आप सीधे इस कीबोर्ड से टाइप करना प्रारंभ कर सकते हैं, क्योंकि हिंदी के अक्षर सामने, कीबोर्ड में ही छपे हुए हैं.

इसे आप ओटीजी केबल के जरिए अपने मोबाइल फ़ोन में भी सीधे जोड़कर हिंदी टाइप कर सकते हैं. परंतु इसके लिए आपको एक ऐप्प इंस्टाल करना होगा - मल्टीलिंग ओ कीबोर्ड तथा मल्टीलिंग हिंदी एडऑन.

इस कीबोर्ड को अमेजन से आप यहाँ से ऑनलाइन देख सकते हैं, जानकारी ले सकते हैं अथवा खरीद सकते हैं -

http://www.amazon.in/TVS-Champ-Devnagric-Keyboard-USB/dp/B01BI0JAQA?

यदि यहाँ उपलब्ध न हो तो अमेजन, फ्लिपकार्ट अथवा अपनी पसंदीदा ऑनलाइन साइट पर इस कीवर्ड से खोजें और खरीदें-

TVS-Champ-Devnagric-Keyboard

टीवीएस इलेक्ट्रॉनिक की होम साइट पर भी आप इसे खरीद सकते हैं.

इस कीबोर्ड के साथ अंकुर पत्रिका नामक मॉड्यूलर इन्फ़ोटैक का एक हिंदी सॉफ़्टवेयर इंस्टालर सीडी मुफ़्त आता है, परंतु वह पुराना वर्जन है और यूनिकोड सपोर्ट नहीं करता. उसका उपयोग आज के जमाने में फालतू है. फ़ालतू सॉफ़्टवेयर को इस तरह कीबोर्ड के साथ देने का आशय समझ से परे है.

इसके बजाये यूनिकोड आधारित कुछ टूल दिए जाने चाहिए जो आज की जरूरत है.

बेचारा होली बेकार ही बदनाम है हुड़दंग के लिए. जबकि इस देश में गाहे बेगाहे, जब तब, कारण बेकारण, बात बेबात, यत्र तत्र सर्वत्र हुड़दंग होते ही रहते हैं. हम होली की हुड़दंग की बात तो करते हैं, मगर दीवाली की हुड़दंग क्यों भूल जाते हैं? दीवाली के महीने भर पहले से हुड़दंग जो चालू हो जाता है उसकी बात कोई नहीं करता. सबसे पहले तो घर में साफ सफाई रँगाई पुताई का हुड़दंग मचता है, फिर नए कपड़े जूते पटाखे आदि खरीदने के लिए बाजारों में जो हुड़दंग मचता है वो क्या है? इधर पर्यावरणवादी हुड़दंग मचाए फिरते हैं – पटाखे मत फोड़ो, फुलझड़ी मत जलाओ. पटाखे जलाओ तो 10 डेसीबेल ध्वनि से कम वाला जलाओ, रात दस बजे से पहले जलाओ आदि आदि. इधर लेखकों-कवियों-संपादकों की टोली दीवाली में अपनी अपठनीय रचनाओं को हर संभावित प्लेटफ़ॉर्म पर दीपावली विशेषांकादि के नाम पर दशकों से परोसती आ रही हैं, वे क्या किसी हुड़दंग से कम हैं? फिर दीपावली की शुभकामना संदेशों के हुड़दंग... बाप रे बाप! ये अपने किस्म के, साहित्यिक-सांस्कृतिक हुड़दंग हैं और किसी अन्य हुड़दंग प्रकार से किसी तरह से कमतर नहीं हैं. ईद-बकरीद-क्रिसमस में भी हुड़दंगों का कमोबेश यही हाल रहता है.

नववर्ष उत्सव के हुड़दंगों के उदाहरण देना तो सूरज को दिया दिखाने के समान है. धरती का हर प्राणी, जो नववर्ष को समझता है, हुड़दंग मचाता है. अब, ये बात दीगर है कि कुछ लोग सभ्य तरीके से, किसी पब या मॉल में, जेब से रोकड़ा खर्च कर डीजे की धुन में और पव्वे की मस्ती में शालीनता से हुड़दंग करते हैं, तो कुछ लोग सड़कों पर मोबाइकों में बीयर की बोतलों को लेकर हुड़दंग मचाते हैं. बहुत से लोग टीवी स्क्रीन पर अभिनेताओं कलाकारों को हुड़दंग मचाते देखकर अपने मानसिक हुड़दंग से काम चला लेते हैं. पिछले नववर्ष में हुए बैंगलोर के हुड़दंग की टीस क्या कोई भुला पाएगा?

राष्ट्रीय त्यौहारों – स्वतंत्रता-गणतंत्र दिवस के हुड़दंग मत भूलिये. हफ़्ता-दो-हफ़्ता पहले से गली मुहल्ले चौराहों में मेरे देश की धरती सोना उगले हीरा मोती जो बजना चालू होता है तो फिर बंद होने का नाम ही नहीं लेता. गणेश-दुर्गा पूजा के लिए, महीने भर पहले से जो हुड़दंग चंदा लेने से शुरु होता है वो उनके विसर्जन तक बदस्तूर जारी रहता है. इस बीच जन्माष्टमी के दही-हांडी मटका लूट, नवरात्रि गरबा आदि आदि न जाने कितने हुड़दंग अपने समय से बदस्तूर हर साल आते हैं और चले जाते हैं.

यहाँ के स्कूलों, कॉलेजों में हुड़दंग तो रोज की बात है. जेएनयू और डीयू तो खैर देश की राजधानी में है, तो गाहे बगाहे इसका हुड़दंग न्यूज में आ जाता है, और कभी कोई बड़ा, विशाल किस्म का हुड़दंग हो जाता है तो व्यापक चर्चा हो जाती है. टीचर ने क्लास नहीं लिया तो हुड़दंग, क्लास ले लिया तो हुड़दंग. जीटी के बावजूद किसी पढ़ाकू विद्यार्थी ने क्लास अटेंड करने की हिमाकत कर दी तो हुड़दंग. किसी दिन कोई हुड़दंग नहीं तो क्यों नहीं इस बात पर हुड़दंग. यानी पूरा हुड़दंग अड्डा.

अच्छा, हुड़दंग कोई वार-त्यौहार या स्कूल-कॉलेजों तक सीमित है? नहीं. ऐसा नहीं है. हुड़दंग तो भारत में हर ओर है. आपके चहुँओर. किसी नामालूम दिवस में जरा ध्यान कीजिए – हुड़दंग सुबह ब्रह्म मुहूर्त के अजान से शुरू होता है, और आसपास तीन तरफ हो रही धार्मिक तकरीरों-प्रवचनों-कथाओं, चार तरफ स्थापित मंदिरों की आरतियों से परवान चढ़ता है, और दिन-भर ट्रैफ़िक, शोर, धूल-धक्कड़ और फिर रात की आरती, प्रवचन और तकरीर से खत्म होता है. और, यहाँ पर हमारे कंप्यूटर/मोबाइल उपकरणों के  सोशल मीडिया – फ़ेसबुक ट्विटरादि तथा हमारे ड्राइंग/बेडरूम में स्थापित टीवी सीरियलों से (में) मचने वाले हुड़दंगों के उदाहरण नहीं हैं!

ऐसे में जीवन? वो भी एक हुड़दंग ही है!

 

व्यंज़ल

 

हर तरफ है हुड़दंग

ये जीवन है हुड़दंग

 

दिल कहीं लगता है

तो मचता है हुड़दंग

 

जीना भी क्या जहां

नहीं होता है हुड़दंग

 

सक्रिय दिमाग में ही

तो रहता है हुड़दंग

 

देखो सभ्य रवि भी

तो करता है हुड़दंग

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(आईबस हिंदी आईएमई में रेमिंगटन, फ़ोनेटिक, इनस्क्रिप्ट, आईट्रांस आदि आदि कीबोर्ड से हिंदी टाइपिंग की सुविधा)

 

बहुत सी जनता विंडोज़ 10 में रेमिंगटन हिंदी टाइपिंग न हो पाने की समस्या से ग्रसित है, और बाकी बहुत सी जनता फ़ेसबुक में, तो क्रोम में, तो जीमेल आदि में यदा कदा हिंदी टाइपिंग की समस्याओं से ग्रस्त होती रहती है.

इन सबका समाधान है, लिनक्स पर आईबस टाइपिंग टूल का उपयोग. पिछले कई वर्षों से यह टूल बिना किसी समस्या के लगातार बढ़िया परफ़ॉर्मेंस दे रहा है.

अब इसमें एक और सुविधा जुड़ गई है.

टाइपिंग बूस्टर.

और, हिंदी टाइपिंग में भी आप इसे धड़ल्ले से उपयोग कर सकते हैं.

यह कुछ कुछ अपने स्मार्टफ़ोनों में उपलब्ध टी-9 और प्रेडिक्टिव टैक्स्ट जैसा काम करता है और यह वर्तमान स्थापित शब्दकोश के साथ तो काम करता ही है, आपकी नित्य प्रति की टाइपिंग के साथ यह सीखते जाता है. यानी आप जितना अधिक टाइप करेंगे, उतना ही यह सीखता जाएगा और आपके लिए अधिकाधिक काम का होगा.

उदाहरण -

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आपने विश्व लिखा तो आगे विश्वसनीय लिखने के लिए आगे सनीय लिखने की जरूरत नहीं 6 वां बटन दबाएं या शॉर्टकट कुंजी (डिफ़ॉल्ट - स्पेस बार दो बार दबाएँ) दबाएं, और पूरा शब्द लिख जाएगा.

 

यह बहुभाषी भी है. यानी चलते चलते यदि आप कीबोर्ड अंग्रेज़ी में बदलते हैं तो यह अंग्रेज़ी के शब्दों को भी प्रेडिक्ट करेगा, और रोमन हिंदी को भी.

 

इसका उपयोग कैसे करें आदि के लिए एक ट्यूटोरियल प्रवीण सातपुते ने लिखा है जिसे आप यहाँ से पढ़-समझ सकते हैं -

https://fedoramagazine.org/master-typing-ibus-booster/

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(चित्र - अनूप शुक्ल के फ़ेसबुक वॉल से साभार)

आदमी जितना सभ्य, टेक्नोलॉज़ी एडॉप्टिव होता जा रहा है, अपनी प्रकाशित-अप्रकाशित, व्यक्त-अव्यक्त अभिव्यक्ति से उतना ही परेशान होते जा रहा है. अभिव्यक्ति का मसला आने वाले समय में और समस्याएँ पैदा करेगा. जरा याद कीजिए, आपकी अभिव्यक्ति दस साल पहले कहाँ थी? या फिर, याद कीजिए, आपकी अभिव्यक्ति बीस साल पहले कहाँ थी? और, यदि आप अपने आप को बुजुर्ग कहते-समझते हैं तो आपकी अभिव्यक्ति पचास साल पहले कहाँ थी?

कोई तीसेक साल पहले, हमारे जैसे लोगों की अभिव्यक्तियों के कोई लेवाल नहीं होते थे. हमारी अभिव्यक्तियाँ, प्रकाशित-प्रसारित होकर दुनिया तक पहुँचने की लालसा में, अक्सर लाइन वाली कॉपी के काग़ज़ में पेन से लिखी जाकर या यदा कदा, मेकेनिकल टाइपराइटर के जरिए टाइप होकर, लिफ़ाफ़े में बंद होकर, दो रुपए के डाक-टिकट के खर्चे पर, किसी पत्रिका या समाचार पत्र के संपादक के पास पहुँचती थी, और अकसर उसकी कुर्सी के नीचे रखे कचरे की टोकरी में अपनी वीर-गति को प्राप्त होती थी. क्योंकि हमारे पास अपनी अप्रकाशित अभिव्यक्ति को वापस अपने पास वापस बुलाने के लिए वापसी का, पता लिखा, पर्याप्त डाक टिकट लगा लिफ़ाफ़ा संलग्न करने के संसाधन आमतौर पर नहीं होते थे. और हम महीनों झूठ-मूठ का इंतजार करते रहते थे कि कोई दयालु संपादक हमारी अभिव्यक्ति को दुनिया तक जरूर पहुंचाएगा. मगर, संपादक एक, गिनती के पृष्ठों वाली पत्रिका, समाचार पत्र एक, और संपादक-प्रकाशक के मित्र-मंडली के लोग और प्रकाशित-प्रसारित होने के इंतजार में, लाइन में लगी उनकी अपनी अभिव्यक्तियाँ. लिहाजा, हमारी अभिव्यक्तियां बेमौत मरती रही दशकों तक. दिमाग के अंदर ही अंदर. हमारी अप्रकाशित, अप्रसारित अभिव्यक्तियों से भले ही हमें बड़ी भयंकर किस्म की शारीरिक-मानसिक समस्याएँ होती थी मगर अगले को, किसी अन्य को, आम जनता को इससे कोई समस्या नहीं होती थी. कुछ अज्ञेय किस्म के कवि हृदय लोग, इसीलिए अपनी अभिव्यक्तियों को प्रकट करने के लिए जंगलों में, नदियों के किनारे चले जाते थे और प्रकृति को अपनी रचना-पाठ (अभिव्यक्ति ही कहें,) सुना कर, हल्के होकर आते थे. और, बहुधा, यूज़-इट-ऑर-लूज़ इट की तर्ज पर, आमतौर पर लोग अभिव्यक्ति रहित बने रह कर ही काल-कवलित हो जाते थे.

और फिर आ गया इंटरनेट. बुलेटिन-बोर्ड. ब्लॉग. ट्विटर. फ़ेसबुक. व्हाट्सएप्प. हरेक की हर अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त जगह. यहाँ तक कि आपके रसोई घर के तिलचट्टे की अपनी अभिव्यक्ति को दुनिया के सामने रखने के लिए भी पर्याप्त से अधिक जगह. जो चाहे लिखो और छाप दो. जो चाहे सोचो और छाप दो. चाहो तो बिना सोचे छाप दो और चाहे तो छापने के बाद सोचो कि अरे, ये क्या छाप दिया. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में छापो, शाम गोधूली बेला में छापो, रात के ठीक बारह बजे, चाहे जिस अवस्था में हो, छापो. और, प्रिंट वर्जन की तरह ये भी नहीं कि तीर कमान से निकला तो वापस नहीं हुआ. छापो, और हल्ला मचे या पता चले कि गलत छप गया तो मिटा डालो. कह दो कि आपका एकाउंट हैक हो गया और आपके नाम से किसी दुश्मन ने या हैकर ने ऊलजुलूल छाप दिया. अलबत्ता इंटरनेट पर एक मर्तबा छप गई चीज अमिट हो जाती है तो क्या हुआ. अगला स्क्रीन-शॉट ले के रख ले तो क्या हुआ. या फिर, डेढ़ सयाने बन कर ये कह दो कि आपकी अभिव्यक्ति का वो मतलब कतई नहीं था जो समझा जा रहा है. मतलब वो है जिसको समझ कर लिखा गया था. अगला अनपढ़ है, मूर्ख है, कम पढ़ा लिखा है, आपकी बातों को सही तरीके से नहीं समझता है तो इसमें आपकी और आपकी अभिव्यक्ति की क्या ग़लती है भला?

अब तो अभिव्यक्ति का बड़ा मार्केट भी हो गया है. अभिव्यक्ति का माध्यम लेखन-पठन-पाठन से बहुत आगे निकल कर दृश्य-श्रव्य माध्यम तक तो ख़ैर पहुंच ही गया है, इसका बड़ा बाजार भी बन गया है. लाइक का बाजार. साझा का बाजार. आपकी अभिव्यक्ति को अगर न्यूनतम हजार लाइक नहीं मिला, एक सैकड़ा साझा नहीं हुआ, पचास कमेंट हासिल नहीं हुआ तो फिर वो क्या खाक अभिव्यक्ति हुआ? वायरल अभिव्यक्ति वाला तो आज के जमाने का हीरो है. लिहाजा बहुतों की अभिव्यक्ति सलेक्टिव किस्म की, ऑलवेज़ कंट्रोवर्सियल किस्म की हो गई है. पता है कि यदि अभिव्यक्ति को सीधे-सपाट-सच्चे तरीके से परोसा जाएगा तो कोई इसे तवज़्ज़ो नहीं देगा. कोई पूछेगा भी नहीं, कोई घास नहीं डालेगा. इसीलिए अभिव्यक्ति में विवादास्पद चीज़ों का हींग-मिर्च जैसा जोरदार तड़का मारा जाता है, और फिर उससे उठने वाले बवाल का मजा लिया जाता है. टिप्पणियों, प्रति टिप्पणियों की गिनती रखी जाती है, रिपोर्ट और ब्लॉक करने के नायाब खेल होते हैं और इस तरह अपनी-अपनी अभिव्यक्ति को और पंख लगाए जाते हैं.

आधुनिक अभिव्यक्तियाँ कई कई रंगों में आती हैं. धार्मिक-अधार्मिक हरी, नीली, पीली, गेरुआ. चाहे जिस रंग की कल्पना कर लें. इतने रंगों में अभिव्यक्तियाँ जितने कि आपके मिलियन कलर वाले मोबाइल-कंप्यूटर के फ़ुल हाई-डेफ़िनिशन स्क्रीन में उतने रंग के पिक्सेल नहीं होंगे. बड़ी बात ये है कि गेरुआ अभिव्यक्तियों को हरी अभिव्यक्तियाँ पसंद नहीं और हरी को गेरुआ पसंद नहीं. वे एक दूसरे के वॉल और वेब पृष्ठों पर कालिख रंग की अभिव्यक्तियाँ लेकर कूद पड़ती हैं, और समय-कुसमय कालिख की होली खेलती हैं. और, राजनीतिक अभिव्यक्तियों की तो बात ही छोड़ दें. कण-कण में भगवान के दर्शन वाले देश भारत में आजकल अभिव्यक्ति के कण-कण में राजनीति का दर्शन चलता है. अब तक तो वाम और दक्षिणी राजनीतिक अभिव्यक्तियाँ चलती थीं, पिछले कुछ वर्षों से आपिया राजनीतिक अभिव्यक्तियाँ भी धड़ल्ले से चलने लगी हैं. बीच-बीच में राष्ट्रवादी अभिव्यक्तियाँ भी उछलकूद मचाती आती हैं.

साझा, फारवर्ड, टैग जैसी आधुनिक अभिव्यक्तियों की तो और बड़ी समस्याएँ हैं. आपने कुछ बढ़िया सोच कर वो!मारा!! अंदाज़ में किसी प्लेटफ़ॉर्म पर कुछ अच्छा सा, क्रियेटिव सा अभिव्यक्त किया, और अभी घंटा भर गुजरा नहीं कि वो अंतहीन फारवर्ड होकर, घूम-फिर-कर वापस आपके पास ही चला आया, किसी और नाम से, किसी और के क्रेडिट से. अभिव्यक्ति आपकी, क्रेडिट किसी और को! ये तो फिर भी ठीक है, परंतु जब एक ही अभिव्यक्ति, आपके पचास संपर्कों-समूहों-मित्रों से, बारंबार घूम-फिर-कर, हर संभावित प्लेटफ़ॉर्म से, सैकड़ा बार आपके पास आने लगे तो आप क्या करेंगे?

आधुनिक अभिव्यक्ति से सन्यास लेंगे? हाँ, शायद यही उचित समय है.

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भई, मैं तो, नित्य 300 ईमेल, 500 फ़ेसबुक स्टेटस पोस्ट, 1000 ट्वीट, 2500 वाट्सएप्प संदेश पढ़ता हूँ, मगर, कुछ स्टैण्डर्ड, कुछ मानकों के हिसाब से, हूँ अनपढ़ का अनपढ़!

आप बताएँ, आप पढ़े लिखे हैं या अनपढ़?

(स्वतः मूल्यांकन करें! )

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ग़लती से मैं शराफ़त से पैदा हो गया, साथ में शराफ़त लेकर, शराफ़त से लबरेज़. अब देखिए ना, जिस दिन से मैंने होश सँभाला, अपने आप को निहायत ही शराफ़त से ओतप्रोत पाया. हर काम, जाने-अनजाने व चाहे-अनचाहे शराफ़त से करता आया. जैसे कि, स्कूल में जनगणमन गाते समय टाँग में भयंकर खुजली मचने पर भी, बिना किसी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के, मैंने अपने आप को सदैव शराफ़त से खड़ा रखा – वह भी सावधान की मुद्रा में. शायद ये मेरी शराफ़त थी कि मैं वहीं का वहीं रह गया, जबकि मेरा एक सहपाठी जो टांगों में खुजली नहीं मचने पर भी जबरन खुजाता रहता था और इस तरह उसने कभी सावधान की मुद्रा का पालन नहीं किया, आगे चलकर बहुत बड़ा नेता बना और देश के लिए कानून बनाने का काम करने लगा.

कॉलेज में आए तो हमने अपनी शराफ़त में और पर लगा लिए. शराफ़त से कक्षा के और कॉलेज के सक्रिय समूह से जुड़े और अनगिनत कक्षा-बहिष्कारों में शामिल रहे. शिक्षकों के पढ़ाने का निहायत शराफ़त से तिरस्कार-बहिष्कार किया. जुलूस धरना प्रदर्शन आदि में शराफ़त से नारे लगाए और यदि कहीं उत्तेजना और भीड़-तंत्र में बावले होकर झूमा-झटकी व कुर्सी मेजों की उठापटक भी कभी की तो, यकीन मानिए, पूर्णतः शराफ़त से.

इधर नौकरी में आए, तो अपनी शराफ़त में और कलफ़ लगा लिए और इस्तरी आदि भी कर ली. बॉस ने “ये” कहा तो हमने भी यस बॉस “ये” कहा. बॉस ने “वो” कहा तो हमने भी यस बॉस “वो” कहा. बॉस ने “नो” कहा तो हमने भी यस बॉस, “नो” कहा. शराफ़त का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है भला? नौकरी में सारे समय शराफ़त से मलाईदार विभाग के बजाय लूप लाइन में जमे रहे और, जब देखा कि राजनीति के चलते वहाँ भी शराफ़त निभाना मुश्किल है तो शराफ़त से वीआरएस ले ली. राजनीति की बात से याद आया - नोटा से पहले, बहुत पहले हम नोटा का उपयोग शराफ़त से करते आ रहे हैं. हम अपने वोट शराफ़त से हर उम्मीदवार को देते रहे हैं - कमल हो या पंजा सब में ठप्पा. किसी तरह का कोई विभाजन नहीं, कोई जांत-पांत, ऊंच-नीच, धर्म-बेधर्म की बात नहीं!

इस बीच शादी भी हो गई. किसी व्यक्ति के शराफ़त का अंदाज़ा उसके वैवाहिक स्थिति से जाना जा सकता है. यदि वो शादीशुदा है तो बाई-डिफ़ॉल्ट वो शराफ़त का पुलिंदा होगा. क्योंकि अपने इधर तो जन्मकुंडली से लेकर कर्मकुंडली तक का मिलान और तसदीक कर, शराफ़त का सर्टिफिकेट हासिल कर शादियां होती हैं, भले ही अगला सुपरबग का मरीज हो, उसकी चिंता नहीं. अब तक तो केवल मुझे ही पता था, मेरी शादी ने पूरी दुनिया के सामने यह स्थापित कर दिया कि ये शख्स शराफ़त से परिपूर्ण है. शराफ़त का एक अदद लाइसेंस इसके हाथ में है जो ये दुनिया को सगर्व दिखा सकता है.

आजकल लोगों को एक और जीवन जीना पड़ता है. सोशल मीडिया का जीवन. खुदा कसम, सोशल मीडिया में तो मैं और ही निहायत शराफ़त भरा जीवन जी रहा हूँ. पूरा सोशल मीडिया खंगाल लें. हर कहीं मेरी टीका-टिप्पणियों लेखों आदि में भली प्रकार देख-झांक लें. मैंने सदैव शराफ़त दिखाई है. वर्तनी और व्याकरण की उपेक्षा से भरपूर, की और कि के धड़ल्ले से आपसी प्रयोग और है और हैं के बीच बिना-भेदभाव वाले लेखन की भी मैंने उतने ही शराफ़त से, दिल खोल कर तारीफ़ की है, जितनी की धीर-गंभीर और छंद-मात्रा को गिन कर लिखे गए लेखन की. दक्षिण और वाम दिशाओं में भी निहायत शरीफ़ाना अंदाज़ से घूमा फिरा हूँ और वहाँ भी हर कहीं शरीफ़ाना तारीफ़ें की हैं. टालरेंस में भी शरीफ़ी दिखाई है तो इनटालरेंस में भी!

मेरी शराफ़त के किस्से इतने हैं कि पूरा महाभारत जैसा ग्रंथ तैयार हो जाए. और तो और, जब ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों में कुछ मासूम लोगों ने मुझे मरियल और गूगल का एजेंट कहा, तब भी मैंने शराफ़त से उनका धन्यवाद किया.

अब तो लगता है, एक दिन, मेरी शराफ़त ही मेरी जान लेगी!

अब जरा आप भी अपनी शराफ़त, यदि कुछ हो, तो दिखाएँ, - टीका टिप्पणी करें, इसे साझा करें, वायरल करें. :)






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शौचालय तीन ताले में
जनता निपटे मैदान में
    बोलो सा रा रा रा रा रा


 
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मुर्दा पूछे है कहाँ जाए
श्मशान या कब्रिस्तान में
           बोलो सा रा रा रा रा रा

 


 
करिए अंधेरा एक समान

दीवाली औ रमजान में
    बोलो सा रा रा रा रा रा
 


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गुजराती गधे चले दिल्ली
और सैफई के नखलऊ में
    बोलो सा रा रा रा रा रा

 


 
जाति-धर्म के टोले में
बाबा वोटों की लाइन में
    बोलो सा रा रा रा रा रा

 

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गाय, भैंस हो या सूअर

सब बराबर, मिले पौंड में

बोलो सा रा रा रा रा रा

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