December 2016


स्टीफन हॉकिंग 75 साल के हो गए। कोई 50 साल पहले डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे और कहा था कि हॉकिंग साल-दो-साल और जी पाएंगे।

परंतु उन सभी को धता बताते हुए वे जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं। वैसे, आधुनिक तकनीक और चिकित्सा सुविधा से भी यह संभव हो सका है। बहुतों के प्रेरणा स्रोत हैं हॉकिंग। खासकर गंभीर रूप से बीमार लोगों के लिए।
स्टीफन हॉकिंग को ढेर सारी शुभकामनाएं।

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और, यह इंडसैंज के हिंदी ओसीआर से भी अधिक शुद्ध है. यदि इसे कमांड मोड में बैच मोड में इस्तेमाल किया जाए, तो यह तेज भी है. बहरहाल, इसके इंस्टाल करने व इस्तेमाल करने के बारे में विस्तृत जानकारी श्रीदेवी कुमार ने गूगल तकनीकी हिंदी समूह में दी है, जिसे यहाँ दी जा रही है. मैंने इसे प्रयोग किया और पाया कि ठीक-ठाक इमेज फ़ाइल में अशुद्धि का प्रतिशत पांच (5) प्रतिशत से भी कम है. और यही बात इस निशुल्क, ओपनसोर्स ओसीआर को लाजवाब बनाती है. यह वस्तुतः ओपनसोर्स ओसीआर प्रोग्राम टैसरैक्ट का जीयूआई पोर्ट है.

इसे प्रयोग करने की विधि यह है -

 

1. निम्न लिंक में से अपने कंप्यूटर के हिसाब से प्रोग्राम को डाउनलोड कर इंस्टाल करें. यदि आप सुनिश्चित नहीं हैं कि आपका कंप्यूटर 64 बिट का है या 32 बिट का तो आप नीचे वाली लिंक का प्रोग्राम डाउनलोड कर इंस्टाल करें. यह सभी कंप्यूटरों में काम करेगा:

https://smani.fedorapeople.org/tmp/gImageReader_3.2.0_qt5_x86_64_tesseract-25fed52.exe

https://smani.fedorapeople.org/tmp/gImageReader_3.2.0_qt5_i686_tesseract-25fed52.exe

2. उसके बाद 4.0.0alpha Hindi traineddata यहाँ से डाउनलोड करें -

https://github.com/tesseract-ocr/tessdata/blob/master/hin.traineddata

3. इस hin.traineddata को यहाँ सहेजें - Start→All Programs→gImageReader→Tesseract language definitions. (वैसे यह डिफ़ॉल्ट डायरेक्ट्री होती है, जहाँ कॉपी करना होती है - C:\Program Files\gImageReader\share\tessdata)

4. अब Giamagereader प्रोग्राम को चालू करें

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5. यदि आपके प्रोग्राम में Recognize all मेनू के नीचे हिंदी नहीं दिखती है तो शीर्ष दाएं कोने में दिए  /Settings/Tools पर क्लिक करें और. Redetect languages चुनें. हिंदी दिखेगा. नहीं तो जहाँ डिफाल्ट English लिखा है वहां ड्रापडाउन मेनू से हिंदी चुनें. आपका प्रोग्राम हिंदी ओसीआर करने को तैयार है. यह द्विभाषी ओसीआर भी कर सकता है!

6. चित्र फ़ाइल जिसका ओसीआर किया जाना है उन्हें जोड़ने के लिए, ऊपरी बाएं कोने में सोर्सेस आइकन के नीचे  फ़ाइल को क्लिक करें.

7.  OCR किए जाने वाली फ़ाइल को चुनने पर यह चित्र प्रोग्राम के मुख्य विंडो में बीच में दिखने लगेगी.

8. यदि पहले से ही हिंदी नहीं है तो   प्रोग्राम मेनू में 'Recognize All' के नीचे हिंदी चुनें.

9. चित्र के किसी खास हिस्से को ओसीआर करने के लिए प्लस कर्सर से चित्र का क्षेत्र हाइलाइट करें और  recognize all बटन को क्लिक करें. या पूरा चित्र ओसीआर करना चाहते हैं तो क्षेत्र चुनने की आवश्यकता नहीं है. पास में मैजिक वेंड भी है जो स्वचालित क्षेत्र का चुनाव करता है, पर वह शुद्ध नहीं है.

10. प्रोग्राम के नीचे दाएं बाजू में हो रहे ओसीआर की प्रगति की स्थिति प्रतिशत (%) में दिखेगी.

11. ओसीआर किया गया पाठ दाएं विंडो में कुछ इस तरह प्रकट होगा.

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आपने सही देखा, इसमें बेसिक किस्म का हिंदी वर्तनी जाँचक भी अंतर्निर्मित है.

 

12. आप नए चित्र का ओसीआर पाठ इसी पाठ के बीच में, ऊपर या नीचे जोड़ सकते हैं और इसे टैक्स्ट फ़ाइल के रूप में सहेज सकते हैं या कॉपी पेस्ट कर प्रयोग में ले सकते हैं.

 

बैच फ़ाइल के लिए श्रीदेवी जी ने निम्न कमांड का प्रयोग सुझाया है -

Commands followed under bash environment under windows 10 -

1. convert pdf to images using ghostscript

gs -q -dNOPAUSE -r300x300 -sDEVICE=tiffg4 -sOutputFile=WMH%03d.tif WMH.pdf -dFirstPage=10 -dLastPage=20

2. Use scantailor on windows

to automatically crop the images, deskew them

3. Run tesseract batch process for imagefiles 

#!/bin/bash

#run in anunad/out dir

export TESSDATA_PREFIX=/mnt/c/Users/User/shree

    img_files=${img_files}' '$(ls *.tif)

    for img_file in ${img_files}; do

       echo ${img_file}

        time tesseract ${img_file} ${img_file%.*} --psm 6 --oem 1 -l hin+eng

    done    

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इस बहुभाषी बहु-सुविधा युक्त शब्द संसाधक को भानुमति का पिटारा कह सकते हैं.

क्योंकि इसमें है -

 

हिंदी, गुरुमुखी, शाहमुखी और अंग्रेजी  लिपि में लिखने की सुविधा

प्रत्येक लिपि में दर्जनों कीबोर्ड में लिखने की सुविधा.

 

उदाहरण के लिए, हिंदी में -

 

इनस्क्रिप्ट

अनमोल हिंदी

चाणक्य

डेवलिस

कृष्णा

कृतिदेव

कुंडली

मुगल

नारद

पारस

शुषा

कीबोर्ड लेआउट से हिंदी यूनिकोड टाइपिंग की सुविधा. और, यह विंडोज़ 10 में शानदार काम करता है.

इसका अर्थ है कि विंडोज 10 में रेमिंगटन कीबोर्ड लेआउट से यूनिकोड टाइप करने की चिरकालिक समस्या का निदान.

सोने में सुहागा यह है कि इसमें हिंदी का अंतर्निर्मित वर्तनी जांचक (स्पेल चेकर) भी है. हालांकि चलाने में यह थोड़ा अजीब किस्म का है, और टाइप करते वर्तनी जांच की सुविधा नहीं है.

क्या इतने से ही इसे भानुमति का पिटारा कह सकते हैं? बिल्कुल नहीं.  आगे और भी सुविधाएँ हैं इसमें -

 

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बहुभाषी लिप्यंतरण (पुराने फ़ॉन्ट की सामग्री को यूनिकोड में) की सुविधा

हिंदी में -

तीन दर्जन से अधिक फ़ॉन्ट को यूनिकोड में बदलने की सुविधा. वह भी फार्मेटिंग, फ़ॉन्ट आकार, फ़ॉन्ट रंग आदि में बिना किसी बदलवा के, फ़ॉर्मेटिंग बनाए रखते हुए, और आमतौर पर शुद्ध.

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ट्रांसलिट्रेशन की सुविधा - हिंदी में - यूनिकोड देवनागरी से रोमनागरी तथा इसके उलट.

शब्द से अंक तथा अंक से शब्द परिवर्तन की सुविधा

डिक्शनरी सुविधा

अंग्रेज़ी टैक्स्ट टू स्पीच सुविधा

ऑनस्क्रीन कीबोर्ड सुविधा

अंतर्निर्मित कैरेक्टर मैप

अनुवाद सुविधा (पंजाबी-हिंदी-उर्दू-मालवी)

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और, अंग्रेजी, उर्दू,  पंजाबी (गुरुमुखी)  में ओसीआर ( ऑप्टिकल कैरेक्टर रीकग्नीशन) की सुविधा.

है ना भानुमति का पिटारा?

यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं -  http://akhariwp.com/

दिसम्बर में देश

(चित्र साभार - कस्बा ब्लॉग)

दिसम्बर की एक सुबह, कड़ाके की ठंड में ठिठुरता दुकालू देश का हाल जानने के लिए निकला।


सबसे पहले उसकी मुलाकात हल्कू से हुई। अपने खेत में हल्कू सदा सर्वदा की तरह आज भी जुटा हुआ था। मौसम की मार और बिगड़ी बरसात ने पिछली फसल खराब कर दी थी तो उसके लंगोट का कपड़ा प्रकटतः  इंच भर और छोटा हो गया था। और सदा की तरह उसकी छाती उधड़ी हुई थी, जिसे वस्त्र सुख वैसे भी वार-त्यौहार ही हासिल हो पाता था। ठंडी बर्फीली हवा जहाँ पूरी दुनिया में ठिठुरन पैदा कर रही थी, हल्कू के पसीने से चचुआते शरीर को राहत प्रदान कर रही थी ।


दुकालू आगे बढ़ा। सामने स्मार्ट  सिटी की नींव खुद रही थी। काम जोर शोर से चल रहा था। होरी नींव खोदने के दिहाड़ी काम में लगा था। होरी ने जब से होश संभाला है तब से उसने दैत्याकार भवनों की नींव ही खोदी है। अनगिनत भवनों को उनकी  नींव की मजबूती होरी के पसीने की बूंदों  से ही मिली है। लगता है जैसे सर्वशक्तिमान परमपिता परमेश्वर ने उसे खास इसी काम के लिए बनाया है। हां, उसी ईश्वर ने, जिसने ब्रह्मांड बनाया, निहारिकाएं बनाई और, और यह उबड़-खाबड़ धरती भी बनाई । नेता और अफसर भी बनाए। होरी भी पसीने से तरबतर था और बर्फीली ठंडी हवा उसे भी राहत प्रदान कर रही थी।

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चलते चलते दुकालू सचिवालय पहुंच गया। केंद्रीयकृत वातानुकूलन - हां, वही- सेंट्रलाइज्ड एयरकंडीशनिंग - से लैस पूरे सचिवालय परिसर में दिसम्बरी ठिठुरन का कहीं अता पता नहीं था। लग रहा था कि टेंडर निकाल कर दिसम्बर को यह ठेका दे दिया गया है कि वो यहाँ से फूट ले और अपना पूरा जलवा बगल के झोपड़पट्टी में दिखाए जहां होरी और हल्कू का डेरा है। सचिवालय के भीतर का बाबू जगत पसीने से तरबतर था। बजट वर्ष के खत्म होने में महज दो माह बचे थे और फंड का एडजस्टमेंट करना जरूरी था नहीं तो फंड के लैप्स हो जाने का खतरा था। फंड लैप्स हुआ तो साथ ही अपना हिस्सा भी तो होगा। आसन्न खतरे से निपटने के जोड़ जुगाड़ मैं जूझते बाबू लोग पसीना पसीना हो रहे थे। एसी की हवा भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रही थी।


दुकालू ने सोचा चलो  अब संसद का हाल चाल ले लिया जाए। संसद जिससे देश चलता है।   वहाँ तो हाल और भयंकर था। नेता एक दूसरे पर पिले पड़े थे। कोई किसी की सुन नहीं रहा था। सब अपनी अपनी सुनाने की जुगत में लगे हुए थे। कोई अपने मन की बात कह रहा था तो कोई दूसरे के मन की। कोई अपनी बात से जलजला का खतरा लाने की बात कर रहा था तो कोई अपने एक इशारे से। भयंकर गर्मागर्मी थी। विस्फोटक।  नाभिकीय संलयन की अवधारणा वैज्ञानिकों को संसद से ही मिली होगी। जाहिर है, दिसम्बरी जाड़े का यहाँ दूर दूर तक अता पता नहीं था।  वहां जो कुछ था वह यह था कि चुनावी दंगल में उलझे नेता एक दूसरे को पटखनी देने दांव पर दांव लगाए जा रहे थे और इस खेल में पसीना पसीना हुए जा रहे थे।


दुकालू वापस लौटा। गली के मुहाने पर ओवरफ्लो हो रहे कचरे के डिब्बे के पास एक आवारा कुतिया अपने पिल्लों के साथ कचरे में मुंह मार रही थी। पास ही दीवार पर स्वच्छ भारत अभियान का पोस्टर चिपका था जिसे किसी मनचले ने किनारे से फाड़ दिया था।  दुकालू को बड़ी जोर की ठंड लगी। वह जल्दी से अपनी झोपड़ी में घुसा और कथरी ओढ़ कर सो गया।


कहते हैं कि तब से दुकालू उठा नहीँ है। वह विस्फरित आंखों से कथरी ओढ़े लेटा हुआ है। उसका देश दिसम्बर में ही कहीं अटक कर रह गया है।


व्यंज़ल

तूने किया कैसा ये कर्म है

देश दिसम्बर में भी गर्म है

.

सियासत में मानवता नहीं

कोई और दूसरा ही धर्म है

.

झंडा उठाने की चाह तो है

पर तबीयत जरा सी नर्म है

.

छोड़ दो हमें हमारे हाल पे

जड़ों ने पकड़ लिया जर्म है

.

राजनीति में सफल है रवि

छोड़ी उसने अपनी शर्म है


संगीत के दीवानों के लिए - आपके एंड्रॉयड स्मार्टफ़ोन पर आ गया है - डॉल्बी एटमॉस। लिनोवो तथा मोटोरोला के कुछ फोन पर यह उपलब्ध है और खबर है कि अगले साल यह विंडोज व एक्सबाक्स में भी उपलब्ध हो जाएगा। मैंने इस तकनीक को हाल ही में जांचा परखा और पाया है कि यह वास्तव में अविश्वसनीय रूप से उत्तम है। हालांकि संगीत का यह उत्तम अनुभव तभी मिलेगा जब आपके संग्रह में आधुनिक, उच्च गुणवत्ता के गीत संगीत हों।
उदाहरण के लिए, राजकपूर के गाने में अनुभव सही नहीं मिलता है क्योंकि तब रिकार्डिंग तकनीक अच्छी नहीं थी। परंतु हृतिक रौशन, जाकिर हुसैन, ब्रिटनी स्पीयर्स के गीत डॉल्बी एटमॉस से सुनने में एक नया समां बांध देते हैं।

कार्टूनिस्टों की नजर में वर्ष 2016 कैसा रहा? लेखा जोखा दिसम्बर 2016 के हिंदी फ़ेमिना में उपलब्ध है. इस्माइल लहरी, मन्जुल, कीर्तीश भट्ट और अजीत नैनन मौजूद हैं यहाँ. मेरे पसंदीदा कार्टूनिस्ट काजल कुमार को भी होना चाहिए था यहाँ, मगर ख़ैर.

मैंने फ़ेमिना के इस अंक को अपने स्मार्टफ़ोन में मुफ़्त जियो मैग्स ऐप्प के जरिए पढ़ा है और इसके कुछ पन्ने आपसे नीचे साझा किए हैं - ऐप्प पर वहाँ मौजूद साझा विकल्प के जरिए. यदि आपके पास रिलायंस जियो कनेक्शन है तो आप भी जियो मैग्स ऐप्प डाउनलोड कर यह अंक मुफ़्त में डाउनलोड कर इसका आनंद उठा सकते हैं - हाँ, अच्छे अनुभव के लिए आपके स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन पांच इंच या बड़ी होनी चाहिए. टैबलेट पर यह और अच्छे से पढ़ा जा सकता है. बाजार में प्रिंट मैग्जीन का विकल्प तो खैर है ही - कीमत - केवल 40 रुपए.

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“भारत में कैशलेस इकॉनॉमी”. पर एक मेघावी विद्यार्थी (वो, जाहिर है, सीए इन्टर्न था) का लिखा निबंध आपके अवलोकनार्थ अविकल प्रस्तुत है –

कैशलेस इकॉनॉमी की सोच बहुत ही फासीवादी, निरक्षर किस्म की, तुगलकी, फूहड़ और निकृष्ट विचार वाली है. यह ऐसा विचार है, जिसको अपना कर भारत प्रागैतिहासिक काल वाली स्थिति में पहुंच जाएगा. बहुत पीछे चला जाएगा. उसकी प्रगति खत्म हो जाएगी. भारत में क्या, कहीं भी कैशलेस इकॉनॉमी की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए. कैशलेस इकॉनॉमी भी कोई इकॉनॉमी होती है भला? जहाँ कैश नहीं वहाँ इकॉनॉमी कैसी?

कैशलेस इकॉनॉमी से बहुतों का धंधा चौपट हो जाएगा. सबसे पहले चार्टर्ड एकाउन्टेंटों का धंधा चौपट होगा. जब हर ट्रांजैक्शन, हर लेन-देन खाता बही में दर्ज होगा, सारा कुछ ब्लैक एंड व्हाइट में दर्ज होगा, तो फिर भला हम चार्टर्ड एकाउन्टेंटों को कौन पूछेगा?

कैशलेस इकॉनॉमी से भयंकर मंदी आएगी. ऐसी मंदी जिससे देश कभी उबर नहीं सकेगा. कैशलेस सिस्टम से दो नंबर का धंधा बंद हो जाएगा, जिससे बहुत सारी इंडस्ट्री बंद हो जाएगी. स्टील और सीमेंट आदि सैक्टर में तो तालाबंदी हो जाएगी. जिस देश की इंडस्ट्री में सत्तर प्रतिशत बिजनेस दो नंबर में, बिना बिल के, या एक ही बिल में दर्जनों बार माल आर पार कर खेल होता है वह समाप्त हो जाएगा, जिससे बिजनेस मर जाएगा. इंडस्ट्री ये टैक्स, वो टैक्स दे देकर घाटे में आकर मर जाएगी. अरे! एप्पल जैसी विश्व की सबसे बड़ी, अमरीकी कंपनी भी आज अगर नंबर एक पर है तो इसलिए कि वो अमरीका में टैक्स नहीं देती, अपना पैसा और बिजनेस आयरलैंड में बताती और पार्क करती है. और आप बात करते हैं! जो आदमी अब तक दिन में सौ रुपए लगाकर पाँच हजार रुपए की चाय बेचकर नित्य चार हजार नौ सौ रुपए कमाता था और कोई टैक्स नहीं देता था, वो तो चाय के हर कप पर टैक्स देने के विचार के सदमे से मर ही जाएगा. भारती की अधिकांश जनसंख्या इन्हीं सदमों से सफाचट हो जाएगी. ओह! अतिरेक हो गया? मगर, फिर, धंधा किये और टैक्स दिए – यह भी कोई जीना, आईमीन, धंधा है लल्लू?

कैशलेस इकॉनॉमी से देश के मतदाताओं को पंचसालाना चुनावी उत्सव से महरूम होना पड़ेगा. अहा! वे भी क्या दिन थे. जब देश में चुनाव एक महोत्सव हुआ करता था. बुरा हो शेषन का जिसने चुनावी महोत्सवों के गुब्बारे में इतने छेद कर दिए कि गुब्बारा फूट गया और चुनाव बस उत्सव बन कर रह गए और मामला भूकंप के बाद बचे अवशेषों को सजाने-सम्भालने जैसा हो गया. कैशलेस इकॉनॉमी से परेशान नेतागण आपस में सिर जोड़ कर यह जुगाड़ भिड़ाने में बैठे हैं कि पार्टी लाइन की ओर से मतदाताओं को दिए जाने वाले मंगलसूत्र, टीवी, साइकिल आदि तो खैर ठीक है, व्यक्तिगत जीत सुनिश्चित करने के लिए कंबल ओढ़ कर दिए जाने वाले कैश का विकल्प कैशलेस में आखिर कैसे संभव होगा? वैसे ये जमात भारत की सबसे जुगाड़ू जमात है. चुनाव आते न आते कैशलेस का कैशबैक किस्म का कोई न कोई जुगाड़ निकल ही आएगा.

कैशलेस इकॉनॉमी से आम जनता को अपना रोजमर्रा का कार्य करने-करवाने में बहुत समस्या आएगी. अभी तो किसी किस्म का ड्राइविंग लाइसेंस लेने, किसी बिल्डिंग का परमीशन लेने या राशन कार्ड बनवाने के लिए कैश बहुत काम आता है. दलालों और अफ़सरों को उनके सुविधा शुल्क के तयशुदा रेट कैश में दो और काम घर बैठे हो जाता है. कैशलेस इकॉनॉमी में यह सब कैसे होगा यह सोच-सोच कर जनता परेशान हो रही है हलाकान हो रही है और इस समस्या का कहीं कोई हल नजर नहीं आता.

कैशलेस इकॉनॉमी से आने वाले समय में कभी भी किसी का कहीं कोई काम नहीं होने वाला. कोई लाइसेंस नहीं बनेगा, न कहीं कोई परमीशन मिलेगी. किसी का राशनकार्ड भी नहीं बनेगा. चहुँओर अव्यवस्था हो जाएगी. दंगे भड़क उठेंगे. मारकाट मच जाएगी.  हाँ, कौन जाने आगे शायद नेताओं की तरह, भारतीय जुगाड़ू जनता इसका कोई हल निकाल ले. वैसे भी, आजकल की अधिकांश  भारतीय जनता किसी न किसी किस्म की नेतागिरी में व्यस्त है और यह फर्क करना मुश्किल हो जाता है कि ये नेता है या आदमी या आदमी है या नेता. शायद पेटम जैसा कोई ऐप्प निकल आए जो बिटक्वाइन जैसे ब्लॉकचैन आभासी मुद्रा के जरिए पैरेलल कैशलेस इकॉनॉमी चलाए और जो केवल ऐसे काम-धाम के लिए खास, गुपचुप तौर पर बनाया जाए. वैसे इस विचार का भविष्य उज्जवल प्रतीत होता है. सचिवालयों में जहाँ टेंडर आदि होते हैं, बिटक्वाइन के बारे में आजकल तहकीकातें वैसे भी जरा ज्यादा होने लगी हैं. जो दसवीं फेल नेता कभी इंटरनेट और कंप्यूटर को टेढ़ी निगाह से देखते थे और पूछते थे कि ये क्या बला है, वे भी बड़े कुतूहूल से बिटक्वाइन के बारे में पूछते फिर रहे हैं. जब दो-नंबरी, इंटरनेशनल पैरेलल कैशलेस इकॉनॉमी इस रफ़्तार से आ रही है तो कुल मिलाकर, एक नंबर की देशीय कैशलेस इकॉनॉमी को फेल होना ही है.

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व्यंज़ल

 

आया था कैशलेस जाएगा कैशलेस

फिर डर क्यों, हो जाएगा कैशलेस

 

गुमान क्योंकर हो, जब ये तय है

एक दिन, सब हो जाएगा कैशलेस

 

सभी देख रहे हैं चेहरे दूसरों के

कि कौन पहले हो जाएगा कैशलेस

 

याद रख, जन्नत में तुझे हूरें मिलेंगी

यदि, बंदे, तू हो जाएगा कैशलेस

 

क़तार में सबसे पहले खड़ा है रवि

जानता है, वो हो जाएगा कैशलेस

एक गुलुबन्द यानी मफलर की वापसी.

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शीर्षक में आधुनिक, कूल-डूड, भारतीय पाठकों को गुलुबन्द का अर्थ बताना बनता है ना? नहीं तो बहुत से लोगों को आइडेन्टिटी क्राइसिस हो जाएगा.

बहरहाल, सरदी का मौसम लौट आया है और साथ में गुलुबन्द भी. मैंने भी अपनी आलमारी से अपना गुलुबन्द निकालने की कोशिश की तो उसने निकलने से मना कर दिया. मैंने पूछा, भइए, क्या बात है? किस बात की नाराजगी? तो वह बेहद भावुक हो गया. देश में भावुक होने का मौसम है. प्रधान मंत्री से लेकर प्रधान न्यायाधीश सभी भावुक हो रहे हैं. हर छोटी बड़ी बात पर. मैं भी बड़ा भावुक होकर यह तथाकथित व्यंग्य जुगलबंदी लिख रहा हूँ – जिसे पढ़कर (या शायद घोर अपठनीय होने के कारण हिकारत से देख कर) पाठक लोग और ज्यादा भावुक होंगे और कहेंगे – ये व्यंग्य है? व्यंग्य का स्तर इतना न्यून! फिर वे और भावुक हो जाएंगे.

तो, बात गुलुबन्द की भावुकता की हो रही थी. वो बेहद भावुक होकर बोला – किसी ने मेरी अपनी इच्छा, मेरी अपनी अभिलाषा पूछी है?

फिर उसने पूरी भावुकता में अपनी अभिलाषा कुछ यूँ बयान की -

गुलुबन्द यानी मफलर की अभिलाषा

चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गले में लिपट जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-कंधे में फहर
प्यारी को ललचाऊँ,


चाह नहीं जनता के कानों में
हे हरि लपेटा जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर
बंधूं भाग्य पर इठलाऊँ,


मुझे बांध कर हे! राजनेता,
उस पथ पर चल देना तुम!
क्षुद्र निकृष्ट राजनीति करने,
जिस पथ पर जावें नेता अनेक!

(स्व. श्री माखनलाल चतुर्वेदी जी की आत्मा से क्षमायाचना सहित)

कल्पना कीजिए कि आप बाहर यात्रा के लिए निकले हैं, ट्रेन पकड़नी है, और समयाभाव व ट्रैफ़िक जाम की वजह से थोड़ी जल्दी में भी हैं. अचानक आपको याद आता है कि आप अपना टूथब्रश और टूथपेस्ट रखना भूल गए हैं. कोई बात नहीं, आप इसे रास्ते चलते परचून की दुकान से खरीदने के लिए रुक जाते हैं. दुकान वाला पहले ही किसी अन्य खरीदार से जूझ रहा होता है. उसे निपटाकर वह आपसे मुखातिब होता है. आप जल्दी में हैं, आपके ट्रेन छूट जाने का समय हो रहा है, मगर दुकानदार को आपकी यह अर्जेंसी पता नहीं है, तो वो अपने हिसाब से आपको सामान देता है. फिर आप खरीदी हुई वस्तु का भुगतान करते हैं तो एक और समस्या आती है. आपके पास केवल बड़े नोट हैं और दुकानदार के पास आपको देने को पर्याप्त छुट्टे नहीं हैं. इस आपाधापी में आपकी ट्रेन छूट जाती है.

अब अपनी इस कल्पना में थोड़ा सा ट्विस्ट कीजिए. आप जिस दुकान पर टूथपेस्ट लेने जा रहे हैं, वहाँ आरएफआईडी सेंसर युक्त कॉन्टैक्टलेस पेमेंट की सुविधा है और आपने भी कॉन्टैक्टलैस पेमेंट वाला आरएफआईडी टैग युक्त रिस्टबैंड पहना हुआ है. आप दुकान में घुसते हैं, टूथपेस्ट, टूथब्रश उस दुकान के काउंटर से उठाते हैं, और बस वहां से बाहर आ जाते हैं. आपके दुकान में घुसते ही वहाँ का आरएफआईडी सेंसर आपको पहचान लेता है और दुकान पर स्थित विभिन्न सेंसर सक्रिय हो जाते हैं और जो जो सामान आप उठाते हैं उनकी कीमत जोड़ते जाते हैं. जैसे ही आप दुकान से बाहर आते हैं, आपके खाते में स्वचालित बिलिंग हो जाती है और स्वचालित भुगतान हो जाता है जिसकी सूचना आपको आपके मोबाइल पर एसएमएस और ईमेल के जरिए मिल जाती है. दुकान के गेट पर बैठे दुकानदार या चौकीदार के पास ग्रीन सिग्नल आता है कि भुगतान हो चुका है. वो आपका अभिनंदन करता है और आप इस तर तुरंत ही खुशी-खुशी इंस्टैंट भुगतान कर निकल लेते हैं. और आपकी ट्रेन आपको आराम से मिल जाती है. ऊपर से, न चिल्लर का चक्कर और न ढेर सारे रुपए लेकर साथ चलने की जरूरत.

कैशलेस भुगतान की यही सबसे बड़ी खूबी है. आप अपने साथ अपना बैंक लेकर चल सकते हैं, हर किस्म का चिल्लर और कितनी ही बड़ी राशि चाहे वह लाखों में हो – अपने जेब में साथ लेकर – एक प्लास्टिक कार्ड – डेबिट या क्रेडिट कार्ड - में या अपने मोबाइल वालेट के रूप में साथ लेकर चल सकते हैं, और उसका उपयोग चौबीसों घंटे कभी भी, कहीं भी कर सकते हैं. वह भी पूरी तरह सुरक्षित.
आइए, अब जानते हैं कि कैशलेस भुगतान प्रणाली के पीछे का विज्ञान क्या है क्या क्या विकल्प हैं और यह काम कैसे करता है. परंतु पहले इसका इतिहास जानें –

कैशलेस भुगतान प्रणाली का इतिहास मानवीय सभ्यता जितना पुराना है जिसमें बार्टर यानी वस्तु-विनिमय का उपयोग किया जाता था. उधारी प्रथा भी एक तरह का कैशलेस तंत्र है जिसमें महीने के अंत में या एक नियमित अंतराल पर वास्तविक रकम का लेन-देन किया जाता है, बाकी समय लेन-देन को एक रजिस्टर या बही में दर्ज कर लिया जाता है. परंतु आधुनिक कैशलेस भुगतान प्रणाली जिसमें क्रेडिट डैबिट कार्डों अथवा ईवालेट जैसी टेक्नोलॉज़ी का उपयोग होता है, वह जटिल कंप्यूटिंग और इंटरनेट प्रणाली का सुरक्षित प्रयोग कर बनाया गया है.
लेन-देन के लिए रुपए-पैसे के बदले क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने की संकल्पना और इस शब्द का उपयोग उपन्यासकार एडवर्ड बेलामी ने अपने उपन्यास लुकिंग बैकवर्ड में सन 1887 में किया. तब इसे कोरी कल्पना ही कहा जा सकता था. मगर जल्द ही, विभिन्न व्यापारिक संस्थानों जिनमें होटल, डिपार्टमेंटल स्टोर और पेट्रोल पम्प आदि शामिल थे, अपने परिचित व बारंबार आने वाले ग्राहकों की सुविधा के लिए कुछ उपाय गढ़ने प्रारंभ किए. उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में चार्ज-क्वाइन का प्रयोग प्रारंभ हुआ. ये चार्ज-क्वाइन आमतौर पर धातुओं के बने होते थे और केवल परिचित और नियमित ग्राहकों को दिए जाते थे जिनका खाता व्यापारिक संस्थानों में होता था. इस तरह इन चार्ज क्वाइन को दिखाकर लेन-देन को खाते में दर्ज कर लिया जाता था. सन् 1920 के आते आते चार्ज क्वाइन का रुपरंग बदल गया और चार्ज-प्लेट और चार्ज कार्ड का उपयोग होने लगा. वेस्टर्न यूनियन ने अपने नियमित ग्राहकों के लिए चार्ज कार्ड पेश किया और दस साल के भीतर ही ये कार्ड इतने लोकप्रिय हुए कि अन्य व्यापारिक संस्थानों ने एक दूसरे के कार्ड भी स्वीकार करना प्रारंभ कर दिए. चूंकि उस जमाने में इंटरनेट या इलेक्ट्रॉनिकी जैसी कोई सुविधा नहीं थी, अतः उन कार्डों में एम्बोज कर या कार्ड के पीछे चिपकी कागज की शीट पर मशीन से छपाई कर लेनदेन का विवरण दर्ज किया जाता था और महीने के अंत में कार्ड पर देय रकम का भुगतान किया जाता था.

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तब की उपलब्ध ये सारी सुविधाएँ, तब की उपलब्ध वैज्ञानिकी, प्रौद्योगिकी पर निर्भर थीं, और इसी वजह से बेहद सीमित मात्रा में ही प्रचलित थीं. आमतौर पर क्षेत्र विशेष में ही. और इनके इस्तेमाल में तमाम झंझटें भी थी. फिर, सितंबर 1958 में बैंक ऑफ अमरीका ने एक बड़ा दांव खेला. बैंक ऑफ अमेरिका ने फ्रेस्नो शहर के सभी 60 हजार योग्य निवासियों को बैंकअमरीकार्ड नामक क्रेडिट कार्ड मुफ़्त में भेज दिया और इसका उपयोग शहर के तमाम व्यापारिक संस्थानों में करने का अनुरोध किया. शहर के तमाम व्यापारिक संस्थानों से भी इस कार्ड को स्वीकार करने का अनुरोध किया. यह परीक्षण चल निकला और इस कार्ड की मांग तो बढ़ी ही, नए प्रकल्पों के गठन का रास्ता भी खुला. 1966 में मास्टरकार्ड का जन्म हुआ और 1976 में बैंकअमरीकीकार्ड का नाम बदल कर वीजा कार्ड हो गया. दुनियाभर के देशों में यही दो कार्ड अधिक लोकप्रिय हैं. परंतु तब इन कार्डों का प्रयोग, कैशलेस की सुविधा देते होते हुए भी उपयोगकर्ताओं के लिए झंझट भरा होता था, बावजूद इसे ये कार्ड लोकप्रिय होते रहे.

आप पूछेंगे कि कैसे? तब जब आप अपना क्रेडिट कार्ड कहीं प्रयोग में लेते थे तो व्यापारिक संस्थान पहले आपके कार्ड के बैंक में फ़ोन लगाते थे और फिर आपके कार्ड के सही होने की व खाते में पर्याप्त बैलेंस या लिमिट की पुष्टि करते थे. पुष्टि हो जाने के उपरांत ही वे आपके कार्ड के लेनदेन को स्वीकृत करते थे. कार्ड लेनदेन की स्वचालित सुविधा ग्राहकों को तब मिलने लगी जब 1973 के पश्चात बैंकों में बड़े स्तर पर कंप्यूटरीकरण का दौर प्रारंभ हुआ. और नेटवर्क के जरिए कंप्यूटर पूरे समय एक दूसरे से जुड़े रहने लगे.

और जब दुनिया को इंटरनेट की सुविधा मिली, तब कैशलेस भुगतान सुविधा को तो जैसे पंख लग गए. बैंकों के चौबीसों घंटे आपस में जुड़े रहने और उपलब्ध रहने की सुविधा ने न केवल नए-नए विकल्प प्रदान किए, ये क्रेडिट कार्ड इंटरनेट बैंकिंग सेवा से पूर्ण रूपेण जुड़ गए और इनके विविध रूप जैसे कि डेबिट कार्ड, प्रीपेड कार्ड, पेट्रो कार्ड आदि भी आ गए. इंटरनेट के माध्यम से ही लेनदेन का प्रकल्प पेपाल भी आ गया जिसके जरिए घर बैठे ही समुद्रपार लेनदेन किया जा सकता था. अब तो एनएफ़सी और आरएफआईडी टैग जैसे सिस्टम आ चुके हैं जिनके जरिए बिना किसी कार्ड स्वाइप के, मात्र अपनी उपस्थिति से भुगतान कर सकते हैं. यही नहीं, इंटरनेट की अपनी, आभासी मुद्रा बिटक्वाइन भी आ गई जिसे लोगों ने हाथों हाथ लिया.

इसतरह, कैशलेस लेनदेन को देखें तो यह इंटरनेट के साथ ही पला-बढ़ा. हालांकि विभिन्न देशों में इस विधि की स्वीकार्यता विभिन्न कारणों से, इंटरनेट की स्वीकार्यता से बिलकुल भिन्न किस्म की रही है. फिर भी, जिन देशों में इंटरनेट को समग्र रूप से उपयोग में लिया जाता रहा है, वहां कैशलेस भुगतान प्रणाली परिपूर्ण विकसित और स्वीकार्य हो चुकी है. कुछ उन्नत देशों में तो यह 90-95 प्रतिशत तक स्वीकार्य हो चुकी है और केवल 5-10 प्रतिशत लोग ही लेन-देन के लिए यदा कदा रुपए पैसे का उपयोग करते हैं. यूँ तो अब, कैशलेस लेनदेन पूरी तरह इंटरनेट पर निर्भर है. परंतु बहुत सी जगह मोबाइल फ़ोनों से एसएमएस के जरिए भी कैशलेस बैंकिंग की सुविधा हासिल हो रही है, मगर इनके बैकएंड में तगड़ा इंटरनेट सपोर्ट समाहित होता है.

अभी जब आप कोई कैशलेस लेनदेन करते हैं – उदाहरण के लिए, आपने किसी दुकान पर अपने डेबिट कार्ड से स्वाइप मशीन से भुगतान किया. आपने कार्ड स्वाइप किया, मशीन में अपना पिन डाला और भुगतान हो गया. इस पूरी प्रक्रिया में पीछे बेहद जटिल कार्य निष्पादित हुए हैं – जिन्हें सिलसिलेवार इस तरह समझा जा सकता है – जैसे ही आपने कार्ड स्वाइप किया, इसके मैग्नेटिक स्ट्रिप् में मौजूद डेटा को पढ़कर वह स्वाइप मशीन आपके कार्ड को, आपके खाते को पहचान गया, और एक सेंट्रल सर्वर पर डेटा को भेज दिया कि कार्ड के जरिए इतनी राशि का भुगतान करना है. सर्वर पर आपके खाते में मौजूद रकम या लिमिट की सत्यता को चेक किया जाता है और आपके पिन को वेलिडेट किया जाता है. यह सही होने पर पलक झपकते ही भुगतान हो जाता है. यह सारा संचार अति सुरक्षित एनक्रिप्टेड होता है. हालांकि हाल ही में कुछ रपट यह भी आई थी कि किसी खास कंपनी के पीओएस मशीनों में वायरस इंस्टाल कर उनके डेटा चुराए गए थे और कंपनियों और बैंकों को बड़ा चूना लगाया गया था.

आमतौर पर यह सवाल उठाया जाता रहा है कि इंटरनेट बैंकिंग जो कि वर्तमान के किसी भी किस्म के कैशलेस लेन-देन का बैकबोन है, असुरक्षित रहता है और हैकर्स इसमें सेंध मारते रहते हैं. तो मामला भले ही तू डाल-डाल-और मैं पात-पात जैसा रहता हो, आमतौर पर यदि थोड़ी सी सावधानी बरती जाए, तो आधुनिक कैशलेस लेन-देन पूरी तरह सुरक्षित रहता है. मैं स्वयं पिछले बीस साल से इंटरनेट बैंकिंग व डेबिट/क्रेडिट कार्डों का उपयोग कर रहा हूँ, यहाँ तक कि पुराने मोबाइल फ़ीचर फ़ोन में स्टेटबैंक ऑफ इंडिया के मोबाइल बैंकिंग का प्रयोग भी एसएमएस के जरिए करता रहा हूँ, जिसमें इंटरनेट की जरूरत नहीं होती है, आज तक मुझे किसी किस्म की कोई परेशानी नहीं हुई और न ही मेरा एक पैसा किसी गलत या फर्जी ट्रांजैक्शन में फंसा. एकाध बार एटीएम में कैश नहीं निकला और खाते में क्रेडिट हो गया, मगर वह पैसा भी सप्ताह भर के भीतर वापस खाते में जमा हो गया. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कैशलेस लेनदेन पूरी तरह सुरक्षित रहता है और केवल एक-दो प्रतिशत मामले में ही समस्या होती है.

वर्तमान में भारत में कैशलेस लेनदेन के लिए अति सुरक्षित पेमेंट ग्रेड एनक्रिप्शन टेक्नोलॉज़ी का उपयोग किया जाता है जिससे कि उपयोगकर्ता व बैंक का डेटा सुरक्षित रहे. इसे खासतौर पर सरकार के नेशनल पेमेंट कार्पोरेशन ऑफ इंडिया के लिए बनाया गया है. मास्टरकार्ड और वीज़ा के कार्ड में भी उन्नत किस्म की एनक्रिप्शन टेक्नोलॉज़ी का प्रयोग किया जाता है जिससे प्रयोग के दौरान हैकिंग आदि के जरिए उपयोगकर्ताओं या व्यापारिक संस्थानों को चूना लगाने वाली संभावना नहीं होती. आमतौर पर इन कार्डों के प्रयोग में सुरक्षा की समस्या कार्ड धारक के कार्ड गुमने, गलत हाथों में जाने अथवा कार्ड का प्रयोग जहाँ हुआ है वहां के सिस्टम में सेंध मारकर डेटा चुराने आदि से होती है. फिर भी, ऐसे गलत लेनदेन की रपट यदि तीन कार्यदिवस के भीतर दे दी जाए तो उपयोगकर्ता का पैसा आमतौर पर सुरक्षित होता है चूंकि कानूनन, ऐसे लेनदेन के लिए फिर सेवा-प्रदाता कंपनियाँ जिम्मेदार होती हैं.

आज के दौर में कैशलेस लेनदेन के लिए बहुत सारे विकल्प हैं. क्रेडिट/डेबिट/प्रीपेड कार्ड में पहले मैग्नेटिक स्ट्रिप का प्रयोग होता था. जिसे पीओएस मशीन से स्वाइप कर लेनदेन सुनिश्चित किया जाता था. सुरक्षा बढ़ाने के लिहाज से उनमें चिप लग कर आने लगे. फिर उनमें सुविधा के लिहाज से एनएफसी टैग आने लगा जिससे भुगतान में और आसानी होने लगी – यानी बिना स्वाइप किए, कार्ड को मशीन में बिना लगाए, केवल टैप कर लेनदेन पूरा किया जाने लगा. इंटरनेट बैंकिंग व मोबाइल ऐप्प से बैंकिंग भले ही थोड़ा झंझट भरा हो सकता है, मगर यह एक अति सुरक्षित माध्यम कहा जा सकता है क्योंकि इसमें द्विस्तरीय और त्रिस्तरीय सुरक्षा जोड़ी जा सकती है. आपके रजिस्टर्ड मोबाइल पर प्रत्येक ट्रांजैक्शन के लिए पासवर्ड या पिन भेजा जाता है जिसे भर कर आपको अपना भुगतान वेलिडेट करना होता है. हाल ही में आरबीआई ने नया गाइडलाइन जारी किया है जिससे पंजीकरण के उपरांत उपयोगकर्ता और व्यापारिक संस्थान दो हजार रुपये से कम के लेनदेन पर हर बार पासवर्ड या पिन दर्ज करने के झंझट से मुक्ति पा सकेंगे और उनका केशलेस व्यवहार और आसान होगा. आजकल हर व्यक्ति के हाथ में एक अदद मोबाइल वह भी स्मार्टफ़ोन किस्म का दिख ही जाता है. फ्रीचार्ज और पेटीएम जैसे ऐप्प से आपका स्मार्टफ़ोन अब आपके बटुए का रूप धारण करने में पूरी तरह सक्षम हैं, और वह भी पूरी तरह सुरक्षित. आपका बटुआ यदि कोई चुरा ले तो उसमें रखा पूरा रुपया उस पॉकेटमार का हो जाता है, मगर यदि आपका मोबाइल बटुआ यानी मोबाइल फ़ोन यदि कोई चुरा ले या गुम जाए, तो भी उसमें से आमतौर पर कोई कुछ चुरा नहीं सकता क्योंकि पासवर्ड और पिन तो आपको आपके मन में याद रहता है. ऊपर से, आज की उन्नत तकनीक में इंटरनेट के जरिए या किसी अन्य मोबाइल के जरिए तत्काल ही अपने मोबाइल फ़ोन को लॉक कर सकते हैं व उसमें मौजूद डेटा को हटा सकते हैं.

यूँ भी आने वाला समय कैशलेस का होगा. कहीं भी जाइए, किसी भी देश में जाइए, किसी भी मुद्रा में लेनदेन करिए, कितनी ही छोटी बड़ी राशि का लेनदेन करिए, किसी भी समय लेनदेन करिए – कहीं कोई समस्या नहीं. कैशलेस तंत्र की यही खूबी है. तो आइए, इसे अभी से क्यों न अपनाएँ? आइए, कैशलेस हो जाएँ!

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दुनिया में आईओटी यानी इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स

 

की विचारधारा अभी आई ही थी, कि अब एक नई विचारधारा ने पूरी दुनिया को लपेट में ले लिया है. डीओटी यानी देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स. इतना कि इसके सामने इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स प्रागैतिहासिक काल की अवधारणा लगने लगी है.

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अब पूरी दुनिया देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स की ओर तेजी से अग्रसर हो रही है. न्यूयॉर्क से लेकर बस्तर तक और दिल्ली से लेकर वाशिंगटन तक लोग अपना अपना राष्ट्रगान हर यथासंभव स्थान और समय पर गा रहे हैं और राष्ट्रवाद का ट्रम्पेट बजा रहे हैं.

आइए, आपको ले चलते हैं कुछ लाइव शो में जहाँ आप देखेंगे कि देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स के पीछे भारतीय मन मानस किस तरह डूब-उतरा रहा है –

दृश्य एक –

सीपीडबल्यूडी हैडक्वार्टर पर एक नामचीन ठेकेदार, महा-मुख्य-अभियंता से जो अपना पिछला तीन टर्म एक्सटेंशन करवाने में ऑलरेडी महा-सफल हो चुके हैं : “सर, एक जबरदस्त राष्ट्रवाद स्कीम का आइडिया लाया हूँ. सीधे पचास परसेंट का खेल हो सकता है. पूरे देश में मकानों-दुकानों-सरकारी-गैर-सरकारी बिल्डिंगों के बाहरी रंग को अनिवार्य रूप से तिरंगे रंग में करने का प्लान लाया जाए. टेंडर और वर्क-ऑर्डर तो सदा की तरह अपन मैनेज कर ही लेंगे. इस राष्ट्रवादी प्लान को हर ओर से समर्थन मिलेगा, विभाग को जबरदस्त फंड मिलेगा. विरोधियों की तो हवा गोल हो जाएगी क्योंकि कोई बोलेगा ही नहीं, क्योंकि जो बोला समझो वो राष्ट्रद्रोही मरा. सर, आपके एक और टर्म एक्सटेंशन के पूरे चांस हो जाएंगे.”

“वाह! क्या प्लान लाए हो! समझो, हो गया!” – तीन-टर्म-एक्सटेंसित-महा-मुख्य-अभियंता ने खुशी से दाँत चियारते हुए, अति-प्रफुल्लित मुद्रा में कहा.

दृश्य दो –

सूचना-प्रसारण हैडक्वार्टर पर एक कार्यकर्ता, महा-मुख्य-सचिव से जो हाल ही में महा-जुगाड़ कर इस महा-मलाईदार पद पर आसीन हुए हैं : “सर, सिनेमाघर की तर्ज पर हर टीवी शो के पहले, हर रेडियोकार्यक्रम के पहले, हर वाट्सएप्प पोस्ट के पहले, हर फ़ेसबुक स्टेटस के पहले, हर इसके पहले, हर उसके पहले राष्ट्रगीत अनिवार्य किया जाना चाहिए और इसका पालन सुनिश्चित करने के लिए एक नौ-नॉनसैंन-फुलप्रूफ़, राष्ट्रवाद-रक्षक विभाग गठित किया जाना चाहिए. इस विभाग को जाहिर है 24X7 मॉनीटरिंग और इंसपैक्टिंग करनी होगी तो हर लेवल पर तगड़ा स्टाफ़ भी चाहिए होगा. तो देखिए कि कितनी संभावनाएँ बनती हैं. अपन अधिकांशतः तो अपनी ही विचारधारा के लोगों को भर्ती करेंगे और बाकी तो फिर आप समझ ही रहे होंगे...”

“वाह! क्या प्लान लाए हो! समझो, हो गया!” – महा-जुगाड़ित-महा-मलाईदार-पदासीन-महा-मुख्य-सचिव ने खुशी से दाँत चियारते हुए, अति-प्रफुल्लित मुद्रा में कहा.

कुछ समय बाद -

कण कण में भगवान वाले देश में कण कण में देशभक्ति और राष्ट्रवाद आ गया. देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स की क्रांतिकारी अवधारणा ने देश में क्रांति ला दी, और बाढ़-सूखा-गरीबी-भुखमरी-अशिक्षा-गंदगी-भ्रष्टाचार-कालाधन आदि आदि समस्याएँ गौण होकर नेपथ्य में चली गई. पूरा देश फुल राष्ट्रवाद की आगोश आ गया. कहीं सबसे ऊँचा, सबसे बड़ा राष्ट्रीय झंडा फहरा रहा है, दुकानों मकानों की दीवारें, छत तो तिरंगे हो ही चुके हैं, घर के भीतर किचन और टॉयलेट की दीवारें भी तिरंगी हो गई हैं. लोगों ने अपने परिधान, अपने केश तक तिरंगे कर लिए हैं – वस्तुतः अन्य रंगों का उपयोग देश में दंडनीय-अपराध हो गया है. देशवासियों को दिन में पाँच वक्त राष्ट्रगीत गाना अनिवार्य हो गया है. किसी भी फ़िल्मी-ग़ैर-फ़िल्मी-भजन-ग़ज़ल-कव्वाली-पॉप-रॉक-रैप गीत का मुखड़ा राष्ट्रगीत होना अनिवार्य है. अतः अब हर कहीं या तो कोई राष्ट्रगीत गा रहा है, या कोई बजा रहा है, या कहीं बज रहा है, या कहीं कोई सुन-सुना रहा है. और सम्मान में हर कोई हर कहीं सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया है. इस तरह पूरा देश सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया है.

ल्लो! कहीं किसी ने राष्ट्रगीत बजा दिया – शायद किसी सरकारी-न्यायालयीन आदेश के तहत! सावधान!

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