November 2016

सिनेमा ही क्यों, हर टीवी चैनल पर हर सीरियल के पहले राष्ट्रगान सुनाया जाना चैये!

अनिवार्य रूप से!

लोगों की राष्ट्रभक्ति तो जाने कहाँ गायब हुई जा रही है, उसे इसी जरिए से वापस लाया जा सकेगा.

घर घर में, हर घर में.

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चलो, अब मूवी थोड़ा लेट भी हो जाएंगे तब भी चलेगा. बल्कि थोड़ा लेट जाने से ही ठीक रहेगा :)



इधर मैंने वह खबर टीवी पर देखी,  उधर मेरे दिमाग का हाजमा खराब हुआ था. मुझे रात में हजारों सूरज दिखाई देने लगे थे. सुबह ही मैंने एटीएम से पूरे पाँच हजार रुपए निकलवाए थे – पाँच पाँच सौ के पूरे दस नोट. वे अब मुझे चिढ़ाते से प्रतीत हो रहे थे. रात बारह बजे के बाद से वो महज कागज के टुकड़े भर रह जाने वाले थे.

रॉबर्ट के हाथ में भी टीवी का रिमोट था. उसके टीवी में भी, तमाम चैनलों में वही सुर्खियाँ थीं. वह भी वही खबर देख सुन रहा था. खबर सुन कर उसकी भी आंखें फटी रह गई थी. वह भी घबरा गया था. अलबत्ता उसके घबराने की वजह मुझसे जुदा थी. वह भागा. भागकर अपने बॉस लॉयन के पास पहुँचा था. पसीने से सराबोर, हाँफते हुए उसने लॉयन से फरियाद की थी – “बॉस अब अपना क्या होगा? सरकार ने देश में पुराने नोट बंद कर दिए हैं और बदले में नए नोट चलाने का फैसला कर लिया है. इस तरह तो हमारा धंधा चौपट हो जाएगा. मार्केट में हमारे फ्रेश नक़ली नोट जो असली कटे-फटे, सड़े-गले वोटों की तुलना में ज्यादा आथेंटिक दिखते हैं उसका तो डिब्बा ही गोल हो जाएगा. ऊपर से बहुत सारा माल मार्केट में आने को तैयार है उस स्टाक का क्या होगा? हम तो कहीं के न रहेंगे”

लॉयन हँसा था. वह भी टीवी के सामने जमा हुआ था. वह भी वही समाचार देख रहा था. परंतु  उसके चेहरे पर हमेशा मौजूद रहने वाली कुटिलता और बढ़ गई थी. वह बोला था – “बेवकूफ़ ! सरकार ने बहुत दिनों बाद यह एक अच्छा काम किया है. दरअसल बिजनेस का चार्म इधर खत्म होता जा रहा था. लाइफ़ में कोई चैलेंज साला बचा ही नहीं था. अब आएगा मजा. असली चैलेंज का असली मजा. जल्द से जल्द इन नए नोटों के असली से भी असल लगने वाले नकली नोटों को छापना और चलाना. अभी तक तो हर ऐरा-गैरा, पाकी-ए-टू-जैड गैंग इन पुराने नोटों का नकल छाप लेता था और मार्केट में चला डालता था. नए नोट चैलेंजिंग है, सुना है कि इसमें चिप लगा है, ट्रैकिंग डिवाइस है, कैमरा है, न जाने क्या क्या है. अब कोई बनाए इनकी नकल! हमारे सिवा किसी के पास इस तरह की तकनीक मिलना मुश्किल है. मोना डार्लिंग वाह ! मजा आ गया. लॉयन के बिजनेस एम्पायर के लिए एक और स्कोप मिल गया है. अब तो हम इसकी तकनीक आउटसोर्स कर और ज्यादा बिजनेस करेंगे”

इस तरह लॉयन ने रॉबर्ट का कन्फ्यूजन दूर कर दिया था. इधर नए रुपए के संबंध में मेरा भी सारा कन्फ्यूजन दूसरे दिन ही दूर हो गया था. पुराने नोटों के चलन से बाहर होने के कारण बाजार में नए नोटों की भारी डिमांड हो गई. लिहाजा उसकी भारी कालाबाजारी शुरू हो गई. नए नोटों के बंडल ऑन में बिकने लगे. किसी जमाने में सिनेमा टिकटों की कालाबाजारी जैसी होती थी वैसी इन रुपयों की काला बाजारी होने लगी. भ्रष्टाचार और कालाधन मिटाने के चक्कर में सरकार ने देश की मासूम जनता के हाथ में भ्रष्टाचार करने का एक और सरल किस्म का, आसान सा औजार थमा दिया था. जिधर, जिस बैंक में निगाह डालो, उधर लोग लाइन में लगे थे और कमीशन लेकर एक दूसरे के नोट अदला-बदली कर रहे थे और अपने सुप्त-गुप्त खातों को किराए पर प्रस्तुत कर रहे थे. तीस प्रतिशत में तो आप चाहे जितना पुराना रुपया नए रुपए से बदल सकते थे. टार्गेट पूरा करने के चक्कर में बेचारे जिन बैंकरों ने अपनी जेब से दस रुपल्ली खर्च कर, ऐसे लोगों को पकड़-पकड़ कर, जिनके पास शाम की दारू के पैसे के लाले हमेशा बने रहते थे, जन-धन खाते खुलवाए थे उनमें अचानक, नामालूम कहाँ से पैसों की बरसात होने लगी थी. बैंकों में पिछले दरवाजे का उपयोग बढ़ गया था, और विशिष्ट कस्टमर सेवा का प्रचलन बढ़ गया था. जिन लोगों ने पूरी जिंदगी अरूणाचल प्रदेश, सिक्किम और नागालैंड का नाम तक नहीं सुना था, वहां के लिए चार्टर्ड प्लेन बुक कर फेरियां लगाने लगे थे.

अचानक बहुतों का जमीर भी जाग गया था. बड़े अकड़ वाले अफसर और नेता अचानक रिश्तेदारी निभाने लग गए थे. चार्टर्ड अकाउंटैंट और बैंकर्स को जिन्हें लोग साल में एकाध बार भी दुआ-सलाम नहीं करते थे. अचानक सबके दुलारे बन बैठे. हर कोई उनसे रिश्तेदारी निभाने, निकालने और जमाने में लग गया था.

इधर हफ़्ते भर की मशक्कत के बाद, एटीएम से निकाले अपने इकलौते दोहजारी नए नोट के साथ सब्जी खरीदने गया तो ठेले वाले ने मुझ पर हिकारत भरी नजर डाली और कहा – या तो खुल्ले लाओ या फिर फैटीएम से पेमेंट करो. संदेश साफ था – या तो जुगाड़ कर चिल्लर ले आओ या फिर अपग्रेड हो जाओ.

लगता है नए रूपए ने भारत को सचमुच बदल दिया है. एक नए भारत का निर्माण हो रहा है. नई इकॉनामी, नए प्रयोग, नए-नए रास्ते और नई-नई रिश्तेदारियाँ.

 

भक्त एटीएम विरुद्ध आपिया एटीएम

नोटबंदी के साइड-इफ़ेक्ट के चलते काम के अधिक बोझ की वजह से एटीएम खराब हो रहे हैं. सुधारने के लिए तकनीशियन बुलाए जा रहे हैं. एक तकनीशियन के हाथ दो एटीएम का रिकवर्ड डेटा मिला. एक था भक्त एटीएम और दूसरा था आपिया एटीएम.

पहले भक्त एटीएम का रिकवर्ड डेटा मुलाहिजा फरमाएँ –

· आज नोटबंदी का पहला दिन है. वाह क्या सर्जिकल स्ट्राइक मारा है काले धन और भ्रष्टाचारियों पर. पूरी मुस्तैदी से लगा हूँ, लोगों की सेवा करने में. मजा आ रहा है. इतनी भीड़ देखकर ही मन प्रसन्न हो जा रहा है.

· आज नोटबंदी का दूसरा दिन है. चहुँओर से इस कदम की प्रशंसा हो रही है. आम जनता में गजब का उत्साह है. लोग घंटों लाइन में लगे हैं, मगर उनके माथे पर शिकन तक नहीं. बड़े नोटों की कमी की वजह से मेरा पेट जरा जल्दी ही खाली हो रहा है – इस बात का मलाल है, नहीं तो चौबीसों घंटे लोगों की सेवा करने की बात सोच के ही मन प्रफुल्लित हो रहा है.

· आज नोटबंदी का तीसरा दिन है. पहले दो दिन तो विरोधियों को सांप सूंघा रहा. वे सोच नहीं पाए कि क्या करें, क्या बोलें, क्या कहें. शायद दो दिन इस विचार में लगे कि उनके पास रखे काले धन को कहाँ ठिकाने लगाएँ. आज उनके श्री मुख से कुछ बोल फूटे हैं – सदा की तरह विरोध में. यह तो होना ही था. विरोधी विरोध न करें ऐसा कैसे हो सकता है. इधर हमारा मन सदा की तरह राष्ट्रवाद से ओतप्रोत है. जनता को थोड़ी असुविधा हो रही है, मगर, सुना है कि वह उन लोगों की वजह से ज्यादा हो रही है जो भाड़े के लोगों को बारंबार लाइनों में चार हजार रुपये बदलने के लिए किराए पर लाइनों में लगवा रहे हैं. बहुत जगह से समाचार भी आ रहे हैं कि डील पाँच सौ – हजार रुपए तक में हो रही है – चार हजार के पुराने नोटों को बदलवाने के एवज में. इधर हमारे पेट में सौ-सौ के नोट ही आ पा रहे हैं जिसका मलाल है कि हमारे पेट जल्द ही खाली हो जा रहे हैं और हम जनता की पूरी कैपेसिटी से सेवा नहीं कर पा रहे हैं. जल्द ही स्थिति सुधरेगी. लाइन में लगी जनता में अभी भी गज़ब का उत्साह है और वे अब अपने आप को अमीरों के बराबर की श्रेणी में मान रही है – अब आया अमीर भ्रष्टाचारी गरीब के नीचे!

· “........”

· नोटबंदी का दसवां दिन है. पेट में सर्जरी कर सुधार कर दिया है, जिससे मेरे तन और मन में नई ऊर्जा का संचार हुआ है. और अब मेरे पेट में आराम से दो हजार और पाँच सौ के नए नोट भी आने लगे हैं. जनता की नए नोटों से सेवा करने का जैसे ही अहोभाग्य प्राप्त उधर लाइन भी कम हो गई. लोगों की प्रतिक्रियाएँ सुनने में बड़ा मजा आता था. सुना है कि बैंकों में लाखों करोड़ रूपए जमा हुए हैं. वर्षों से मुर्दा पड़े खाते जी उठे हैं और गरीबी रेखा वाले जन धन खातों में रुपयों की बरसात हो गई है. बैंक ब्याजदर घटेंगे जिससे महंगाई कम होगी. कैशलेस ट्रांजैक्शन की तरफ भारत बढ़ रहा है. सब्जी भाजी वाले भी पीओएस लेने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. यानी सर्वत्र एक नंबर का मार्केट. भारत में कोई टैक्सचोर नहीं बचेगा. जल्द ही भारत की तस्वीर बदलेगी. नया भारत उभरेगा. शक्तिशाली. समृद्ध. भारत एक बार फिर सोने की चिड़िया बनेगा.

अब एक आपिए एटीएम का रिकवर्ड डेटा पढ़िए –

· आज नोटबंदी का पहला दिन है. अजीब तुगलकी निर्णय है. न इन्फ्रास्ट्रक्चर न तैयारी. जनता इस निर्णय की तो वाट लगा देगी. दंगा फसाद कर देगी. ये कोई बात हुई – रात से आपका 500 और 1000 का नोट नोट नहीं रहेगा कागज का टुकड़ा रहेगा. हर नोट पर गवर्नर का लिखा व हस्ताक्षरित प्रत्याभूत क्या मजाक है? लोगों की लाइन है कि खत्म ही नहीं हो रही. लाइन में खड़ा हर आदमी इस तुगलकी निर्णय को गरिया रहा है. भीड़ देखकर तो मुझे पसीना आ रहा है. रोते हुए और गुस्से में अपना काम कर रहा हूँ – जानता हूँ कि उनका अपना ही पैसा है, मगर चाहते हुए भी लोगों को उनके पूरे पैसे नहीं दे पा रहा हूँ. जिस काम के लिए बनाया गया हूँ, वही ढंग से नहीं कर पा रहा हूँ!

· आज नोटबंदी का दूसरा दिन है. चहुँओर इस कदम की लानत मलामत हो रही है. आम जनता बेहद परेशान हो रही है. लगता है जैसे पूरा देश फिर से लाइन में लगने को अभिशप्त हो गया हो. मेरा मशीनी पार्ट हर दो मिनट में चल-चल कर थक कर चूर हो गया है, घिस घिस कर खराब होने की कगार पर आ गया है, मगर भीड़ है कि कम नहीं हो रही. ऊपर से बड़े नोटों की कमी के कारण मेरा पेट जल्दी जल्दी खाली भी होता जा रहा है. बिना सोचे समझे, बिना तैयारी के ऐसा काम करने का प्रतिफल तो ऐसा ही होना था. ऊपर से कहा जा रहा है यह साहसिक कदम है – तो अंधे कुएं में कूदना भी साहसिक कदम होता है और फांसी लगाकर झूलना भी!

· आज नोटबंदी का तीसरा दिन है. स्थिति सुधरने के बजाए बिगड़ रही है, और भीड़ कम होने के बजाए बढ़ रही है. जनता के धैर्य का इम्तिहान हो रहा है. कमाल है! जनता इतनी भीड़ में इतनी लंबी लाइनों में घंटों खड़ी है, मगर वह उग्र विरोध का कोई काम क्यों नहीं कर रही. जनता को तो तोड़ फोड़ चालू कर देनी चाहिए. कुछ दंगा फसाद, आग जनी आदि कर देनी चाहिए ताकि कर्ता-धर्ताओं की नींद तो खुले. इस वाहियात निर्णय को वापस ले. नहीं तो साल भर इसी तरह की भीड़ भरी लाइन की सेवा करते करते तो अपना जल्दी ही इंतकाल हो जाएगा. मुर्दों का राष्ट्र है यह. क्रांति यहाँ हो नहीं सकती. अपने ही रुपयों को निकालने के लिए लंबी कतार और कभी वो भी संभव नहीं. यह तो अघोषित आपातकाल है. बल्कि आपातकाल से भी बड़ा!

· “......”

· आज नोटबंदी का दसवां दिन है. जबरन अच्छे खासे चल रहे कलपुर्जों को हटा कर नया पाँच सौ और दो हजार रुपयों का कैसेट लगाया गया और मेरा सॉफ़्टवेयर अपडेट किया गया. जनता तो कष्ट भोग ही रही है, हम मशीनों को भी जबरिया कष्ट में ढकेला गया. बंदर के हाथ में उस्तुरा देने से यही तो होता है. बड़े नोट आ जाने से ज्यादा लोगों की सेवा कर सकूंगा, परंतु जनता की भीड़ कम हो गई. जनता भी दस दिन लाइन में खड़ी रह कर त्रस्त और तंग हो गई लगती है, और उनके पैरों का दम निकल गया लगता है. सुना है कि नोटबंदी भारत के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है. अपनों को फायदा पहुँचाया गया, उद्योगपतियों के ऋण आम जनता के पैसों से माफ किए गए और जनता को झांसे में रखा गया. भारत की स्थिति तो अब नाईजीरिया से भी भयावह होने वाली है. उद्योगधंधे चौपट पड़े हैं, व्यवसाय खत्म हो गया है, मंदी की मार में भारत गिरफ्त हो गया है. भारत का सबसे बुरा दिन आया है. एक समय की सोने की चिड़िया भारत को विदेशियों ने लूटा, और एक बार फिर भारत लुट रहा है, कोढ़ में खाज यह कि अब भारतीय ही इसे लूट रहे हैं.

(अभिषेक ओझा के लेख - http://www.aojha.in/quotes-etc/useyourbrainormaybe से प्रेरित.)

(चित्र - समीर लाल के ब्लॉग पोस्ट मशीन की व्यथा-कथा  http://udantashtari.blogspot.in/2016/11/blog-post_20.html से साभार)

यह मुई सोनम गुप्ता है कौन, और यह बेवफा क्यों है?

 


जब इंसान के हाथ में नोट ही न हों, पता लगे कि आपके पास के 86 फीसद, अरे साहब वही 5 सौ और हजार वाले नोट, अब सब्जीवाले, चायवाले, कपड़ेवाले, धोबी, बढ़ई वगैरह-वगैरह नहीं लेंगे। आपको इस साल के खत्म होने से पहले अपने सारे ऐसे नोट बैंक में वापस धर देने हैं, उसके बदले नए कलदार निकारने हैं। आपके मोबाइल में देश से काला धन को जड़ से खत्म कर देने के देशभक्त संकल्प आ-जा रहे हैं, आप ऊर्जा से भरे हैं और प्रधानमंत्री के आदेशानुसार अपने पास पड़े चार हज़ार के बड़े नोटों को चिल्लर में बदलवाने बैंक जा रहे हैं। आपको उम्मीद है कि आप जाएंगे और बैंक मैनेजर फूलों के हार के साथ आपका स्वागत करेगा।

आगे का पूरा मनोरंजक आलेख रचनाकार पर यहाँ पढ़ें - http://www.rachanakar.org/2016/11/blog-post_18.html

तकनीक के पंडित बी.एस.पाबला जी ने व्हाट्सएप्प को छोड़ने की घोषणा की है. अपने फ़ेसबुक स्टेटस पर  -

स्क्रीनशॉट नीचे है -

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व्हाट्सएप्प एक नो-नॉनसेंस, बेहतरीन, उच्च दर्जे का कम्यूनिकेशन प्रोग्राम है, इस्तेमाल में बेहद आसान और पूरा- 100% यूजर फ़्रेंडली.

परंतु इसकी इन्हीं खूबियों ने इसे बहुतों को रुलाना शुरू कर दिया है. और शायद यही कारण है पाबला जी का व्हाट्सएप्प छोड़ने का. एक दिन उन्होंने स्टेटस छापा था कि उनके व्हाट्सएप्प संदेश में 4500 संदेश दिनभर में आए. इतना संदेश आदमी पढ़ तो क्या देख भी नहीं पाए!

व्हाट्सएप्प की सबसे बड़ी समस्या है इसके आपके फ़ोन के तमाम संपर्क को स्वचालित रूप से पॉपुलेट करने की - जिससे पता चल जाता है कि व्हाट्सएप्प पे कौन कौन बंदा तैयार बैठा है और फिर सिलसिला चालू हो जाता है असीमित संदेश भेजने, असीमित समूहों में जोड़ने घटाने का.

इसकी एक और बड़ी समस्या है - तमाम मीडिया के स्वचालित डाउनलोड होने का. कुछ बजट फ़ोन के उपयोगकर्ताओं को हवा नहीं रहती और उनका डेटा पैक तो बारंबार, अंतहीन फारवर्ड किए गए उन्हीं सड़ियल जोक, वीडियो और पिक्चर को डाउनलोड में ही हवा हो जाता है और उनके फोन की मेमोरी भी जल्द ही फुल हो जाती है. और फ़ोन हैंग होने लग जाता है.

ये दोनों समस्याएँ बड़ी सिरदर्द हैं.

परंतु आप इन दोनों से मुक्त हो सकते हैं.

दूसरी समस्या तो आसान है, स्वचालित मीडिया डाउनलोड को डिसेबल कर दें बस. यह व्हाट्सएप्प की सेटिंग में उपलब्ध होता है. पाबला जी की समस्या यह नहीं है, उनकी समस्या शायद पहली है -

 

पहली समस्या का एक शानदार जुगाड़ है. आप केवल अपने ही पसंदीदा या वांछित व्यक्ति को व्हाट्सएप्प में जोड़ सकते हैं, बाकी को हवा नहीं लगेगी कि आप व्हाट्सएप्प उपयोग करते हैं.

इसके लिए क्या करना होगा?

पहले तो आप अपने पुराने व्हाट्सएप्प एकाउंट को हटा दें (यदि कोई हो). न भी हटाएँ तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा, परंतु फिर मामला थोड़ा लंबा हो जाएगा, इसलिए इसी विधि को अपनाते हैं.

फिर आप कोई नया, चालू सिम लें, (नया नंबर , और अच्छा हो कि वह  दूसरे प्रदेश या और भी अच्छा हो कि वो दूसरे देश - जी हाँ! दूसरे देश का हो - जैसे कि ब्रिटेन या पाकिस्तान! का - पर यदि सिम दूसरे देश/प्रदेश का हो तो यह ध्यान रखें कि उसमें रोमिंग एनेबल है और चालू है ताकि आप वाट्सएप्प एक्टिवेट कर सकें).

इस नए सिम से नया  व्हाट्सएप्प खाता सक्रिय कर लें. सक्रियण हो जाने के बाद अपने पुराने सिम को वापस फ़ोन में लगा लें.

वाट्सएप्प आपसे पूछेगा कि आप क्या नए नंबर से व्हाट्सएप्प चलाना चाहेंगे या फिर पुराने नंबर से ही चलने दें.

आप दूसरा विकल्प चुनें. यानी पुराने, आपके संपर्कों को अज्ञात नंबर से व्हाट्सएप्प चलने का विकल्प चुनें.

हो गया.

मैंने अपने फ़ोन में व्हाट्स्एप्प नाईजीरिया के नंबर (जस्ट जोकिंग!) से एक्टिवेट किया हुआ है. और मैं केवल तीन लोगों से नियमित संवाद करता हूँ (बता सकते हैं कि कौन-कौन?) बाकी किसी को हवा ही नहीं लगती कि ये "नाईजीरियाई" नंबर का आदमी "रविरतलामी" हो सकता है. कोई स्पैम नहीं, कोई समूह में जोड़-घटाना नहीं. बस, काम की बातें, वह भी जिनसे मैं चाहूँ! और, यदि मैंने बिना बताए किसी को वाट्सएप्प किया तो वो तुरंत मुझको बाहर का रास्ता दिखा देता है ये सोचते हुए कि ये नाईजीरियाई जबरिया मुझे क्यों संदेश भेज रहा है - क्या इसका फ़िशिंग का इरादा है?

हाँ, पर, पाबला होना भी अलग बात है. उनका नाईजीरियाई नंबर तो हर कोई ग्रुप में बांटता फिरेगा - अरे, ये नाईजीरियाई नंबर पाबला जी का है, उनसे व्हाट्सएप्प पे राय मांग लो या कोई ज्ञान की बात या कोई सड़ियल जोक ठेल दो और अपने ग्रुप में जोड़ लो!

शब्द उपनिषद

‘ उपनिषद” का शब्दार्थ ‘समर्पणभाव से निकट बैठना’ है.उप का अर्थ है निकट;;नि; से तात्पर्य है’समर्पण’भाव और सद माने बैठना है.ऋषियों के पास बैठकर जिज्ञासुओं को जो ज्ञान प्राप्त हुआ वही उप्निषदों में संकलित है.

एक मज़ेदार बात यह है कि जूतों के लिये एक प्राचीन शब्द ;उपानत’ था उपानत का अर्थ है, जिसे निकट लाया जाए. आख़िर जूते हमारे पैरों के सबसे नज़दीक नज़दीक रहने वाली वस्तु है. “उपनिषद” और उपानत,दोनो में इस प्रकार जो भावात्मक सम्बंध है, देख्ते ही बनता है‌,भले ही दोनों के अर्थ में कोई सिर पैर न हो. या,यों कहें ,सिर और पैर का अंतर हो.

यदि हम समर्पण भाव से शब्दों के निकट जाएं तो शब्द अपने तमाम रहस्य रहस्य हमारे समक्ष खोल देते हैं. कुछ ऐसे ही शब्दों का जायज़ा लीजिए....

आप इस ज्ञानवर्धक आलेख को आगे आप यहाँ रचनाकार.ऑर्ग पर पढ़ सकते हैं - http://www.rachanakar.org/2016/11/blog-post_17.html

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अंततः मैं भी आधा दर्जन पैकेट नमक के ले ही आया. थोड़ी बहुत मशक्कत तो खैर करनी ही पड़ी, और बहुत सारा जुगाड़ भी. जो कि इस देश-वासियों की खासियत या ये कहें कि जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है. छः घंटे की लाइन में लगकर, रात बारह बजे, दैवयोग से खुली किराने की दुकान से, और, उससे भी बड़े दैवयोग से कि मेरा नंबर आते तक स्टॉक खत्म नहीं हुआ. जेब में, जोड़-तोड़ और जुगाड़ से हालिया हासिल किए नए-नकोर पिंक कलर के एक-मात्र दो हजार रुपये के नोट से छः किलो नमक ले आना तो जैसे स्वर्गिक आनंद की तरह था.

जी हाँ, स्वर्गिक आनंद. जरा डॉमिनोज़ के एक्स्ट्रा टॉपिंग वाले पित्ज़ा या केएफसी के फ़ाइव-इन-वन मील बॉक्स को बिना नमक के खाने का अहसास कर देखिए. आपके हजार रुपल्ली के माल का वैसे भी स्वाद भूसे जैसा होगा. ऐसे में, हजार रुपए में भी हासिल एक चुटकी नमक अपनी कीमत की औकात बखूबी बता ही देता है. और, मैंने तो वैसे भी हजार रुपए में तीन पैकेट के भाव से नमक खरीदा है.

माना कि महीने भर में मेरा नमक-खर्च कोई सौ-पचास ग्राम भी नहीं होगा, मगर भविष्य को सुरक्षित रखना भी तो कोई बात है. आदमी पशु तो है नहीं जो भविष्य की चिंता न करे. यूं भी अपने नमक का हिसाब कौन रखता है कि कितना खाया. अलबत्ता दूसरों को नमक खिलाने और दूसरों के नमक खाने का हिसाब-किताब रखना हमारी "गब्बर-कालिया" परंपरा रही है, मगर आजकल परंपराओं को तोड़ने-मरोड़ने व उन्हें उखाड़ फेंकने, गोली मारने का रिवाज भी तो चल पड़ा है. फिर भी, नमक के मामले में कोई रियायत नहीं. इसलिए, यदि खाने-खिलाने को नमक न रहे जीवन में तो ये जीवन ही क्या! इसलिए, सभी को नमक का पर्याप्त संग्रह कर रखना चाहिए. बल्कि तो भारतीय परंपरानुसार सात पुश्तों तक के लिए नमक-संग्रह कर रखना चाहिए. जितना अधिक संग्रह उतना अच्छा!

इस देश में वैसे भी कहीं भी कुछ भी हो सकता है. जब पत्थर के गणेश दूध पी सकते हों, जब किसी खूबसूरत सी शाम आप जेब में हजार पाँच सौ के नोट लेकर घूमने निकले हों और पता चले कि घंटा भर पहले तो ये अप्रचलित हो चुके हैं, तो फिर वास्तव में कहीं भी, कुछ भी हो सकता है. देश क्या दुनिया में कहीं भी कुछ भी हो सकता है – जब ट्रम्प अमरीकी चुनाव जीत सकता है तो यह देश क्या पूरी दुनिया नमक से खाली हो सकती है. वैसे भी देश का सारा नमक लोग-बाग खा-खा-कर नमकहरामी तो आजादी के पहले से करते आ रहे हैं और आजादी के बाद भी ये बदस्तूर एक्सपोनेंशियली बढ़ता हुआ जारी ही है. तो ये भी हो सकता है कि किसी दिन अलसुबह पता चले कि नमकहरामों ने देश का सारा नमक रातोंरात हजम कर लिया है. और आम जनता की थाली से नमक ग़ायब हो गया है.

आपकी चुटकी में लिए नमक में स्वाद तब और बढ़ जाता है जब आप इसे हजार रुपल्ली किलो के भाव में खरीदते हैं. खुल्ले में मिलने वाला पच्चीस पैसे किलो का नमक भी कोई नमक हुआ. वो तो पूरा बेस्वाद ही होगा. फेंकने लायक. महंगे, पैकेज्ड आयोडीन से भरपूर, भले ही एक स्वस्थ आदमी को उसकी आवश्यकता हो न हो, की बात ही कुछ और है. स्वाद की कहें तो इसका स्वाद तब और द्विगुणित हो जाता है जब आपके चिकित्सक ने अधिक नमक खाने से मना किया हो. आपको बीपी आदि की शिकायत हो और आपको कम नमक खाने की हिदायत हो.

नमक में यदि अंग्रेज़ी का तड़का हो तो खाने-खिलाने का मजा कुछ और होता है. फ़्रूट साल्ट हो या ब्लैक साल्ट. सी साल्ट हो या हिमालयन साल्ट या फ्लैक साल्ट. नमक के स्वाद पर देश-स्थान-समय-वातावरण आदि का भी धीर-गंभीर असर होता है. शीशम के डाइनिंग टेबल पर रखे चाँदी-सोने के नमक-दानी में रखे 'टेबल साल्ट' यानी साधारण नमक का स्वाद तो वही बता सकता है जिसने ऐसा खाया हो. अलबत्ता किसी मजदूर के रात्रि भोजन में सादी रोटी के साथ एक चुटकी नमक का स्वाद सर्वश्रेष्ठ होता है – ऐसा पंडितों (ब्राह्मणों नहीं, विचारकों) का कहना है. क्या किसी ने खाया है ऐसा नमक? मुझे तो आजतक यह नमक मिला नहीं, मैं इस नमक की एक चुटकी के लिए हजार रुपए तक देने को तैयार हूँ. पुराना अप्रचलित नहीं, नया, प्रचलित.

व्यंग्य का विषय क्या हो?

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(चित्र - काजल कुमार http://kajalkumarcartoons.blogspot.in/2016/11/india-kajal-cartoon-orop-khattar-kejriwal-suicide.html का कार्टून)

बहुत पुरानी बात है. एक परिपूर्ण, आइडियल, खुशहाल देश हुआ करता था. खुशहाली के इंडैक्स में पूरे सौ में से सौ. पर, वहाँ एक कमी खलती थी. वहाँ सब कुछ था, सारी खुशी थी, परंतु वहाँ, उस देश में कोई व्यंग्यकार नहीं था, कोई व्यंग्य नहीं था. दरअसल, वहाँ व्यंग्य के लिए कोई विषय ही नहीं था.

वहाँ के शीर्ष साहित्यकारों ने एक दिन एक आम बैठक बुलाई और व्यंग्य की अनुपलब्धता पर गहन चिंतन मनन किया. देश में, साहित्य में, साहित्यकारों में व्यंग्य कहाँ से, कैसे, किस प्रकार लाए जाएं इस पर गहन विचार विमर्श हुआ.

किसी ने कहा – व्यंग्य दिल से निकलता है. लगता है यहाँ दिल वाले नहीं रह गए हैं.

किसी ने कहा – व्यंग्य के लिए दुःख जरूरी है, वर्ग-संघर्ष जरूरी है, असमानता आवश्यक है. यहाँ, इस देश में तो चहुँओर खुशियाली है, कहीं कोई दुःख-तकलीफ़ नहीं है, फिर व्यंग्य कहाँ से आएगा?

एक ने कहा – व्यंग्य न रहने से साहित्य सूना हो गया है. हम सबको प्रयास कर कहीं न कहीं से व्यंग्य लाना ही होगा. किराए पर ही सही. नकली ही सही. बाई हुक आर क्रुक. व्यंग्य हमें चाहिए ही!

उनमें से एक साहित्यकार, जो अपनी उलटबांसी के लिए जाना जाता था, चुपचाप लोगों की बातें सुन रहा था. लोगों ने एक स्वर में उससे पूछा – तुम चुप क्यों हो? तुम भी तो कुछ कहो?

उसने प्रतिप्रश्न किया – क्या हमारे देश में चुनाव होते हैं? क्या हमारी इस साहित्यिक समिति में कभी चुनाव हुए हैं?

सबने आश्चर्य से मुंह बिचकाते हुए, उपहास से कहा – ये कैसा अजीब प्रश्न है? यहाँ तो राम-राज्य है. यहाँ चुनाव का क्या काम? चुनाव जैसी व्यवस्था का यहाँ क्या काम?

वही तो! इसीलिए व्यंग्य नहीं है – उसने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान फेंकी - और कहा – तो, चलिए आज हम अपनी इस साहित्यिक समिति में एक चुनाव कर लेते हैं. कुछ पदाधिकारियों का चुनाव. कल देश में भी आम चुनाव के लिए माहौल बना लेंगे, आवाज उठा लेंगे, और शायद परसों देश में  भी चुनाव  हो जाए!

कुछ लोगों ने सोचा, ये पागल हो गया है, जो व्यंग्य के लिए चुनाव करवा रहा है. परंतु, व्यंग्य के इतर, कुछेक को चुनाव का विचार बहुत पसंद आया. कुछेक ने यह विचार सिरे से ही खारिज कर दिया. देखते देखते ही वहाँ बहस होने लगी. घंटे भर में तो मामला यूँ गर्मागर्मी का हो गया कि अंततः नतीजा ये निकाला गया कि एक समिति बनाई जाए जो सप्ताह भर के भीतर साहित्यकारों में चुनाव करवाएगी कि कौन अध्यक्ष बनेगा और कौन सचिव और कौन कोषाध्यक्ष.

इस घटना के अगले दिन, वहाँ के अख़बार व्यंग्य से भरे पड़े थे. हर दूसरे साहित्यकार ने व्यंग्य लिख मारा था. विषय था – साहित्य में चुनाव!

सुनते हैं कि जल्द ही उस देश में आम-चुनाव भी होने लगे. तब से उस देश में व्यंग्य के लिए विषयों की कोई कमी कभी नहीं रही. हर लेखक, हर साहित्यकार अंततः व्यंग्यकार हो गया था. लोग कहानी, कविता, संस्मरण यहाँ तक कि अपने इनकमटैक्स रिटर्न में भी व्यंग्य मार देते थे!

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