October 2016

मेरी तेरी उसकी दीवाली

औरों की तरह इस बार मैं भी, स्वतःस्फूर्त, भरा बैठा था. जम के दीपावली मनाऊँगा. पर, पूरी तरह देसी, राष्ट्रीय किस्म की, पर्यावरण-प्रिय दीपावली.

महीने भर पहले से ही तमाम सोशल-प्रिंट-दृश्य-श्रव्य मीडिया में मैंने विविध रूप रंग धर कर चीनी माल, खासकर चीनी दियों, चीनी लड़ियों, और चीनी पटाखों का बहिष्कार कर शानदार देसी दीवाली मनाने का आग्रह-पूर्वग्रह, अनुरोध-चेतावनी सबकुछ देता रहा था. चहुँ ओर से आ रहे ऐसे संदेशों को आगे रह कर फारवर्ड पे फारवर्ड मार कर, और जरूरत पड़ने पर नया रंग रोगन लगा कर फिर से फारवर्ड मार कर यह सुनिश्चित करता रहा कि कोई ऐसा कोई संदेश व्यर्थ, अपठित, अफारवर्डित न जाए.

मेरे आग्रह-पूर्वग्रह, अनुरोध-चेतावनी में पर्यावरण-प्रेम भी सम्मिलित था, जिसमें आतिशबाज़ी, पटाखों से दूर रहने और अनावश्यक रौशनी करने, बिजली की लड़ियां लगा कर बिजली की कमी से जूझ रहे देश के सामने संकट को और बढ़ाने के कार्य से दूर रहने का आग्रह भी सम्मिलित था.

यही नहीं, मैंने तो अपने मुहल्ले में और अपनी सोसाइटी में भी पूरा दम लगा दिया था कि इस बार की दीपावली पूरी तरह देसी, राष्ट्रीय और पर्यावरण प्रिय मनाई जाएगी. इसके लिए हमने एक घोषणापत्र भी छपवाया था और बाकायदा हस्ताक्षर अभियान चलाकर उस पर अपने स्टाइलिश हस्ताक्षर भी किए थे.

पिछले पखवाड़े भर से सोशल मीडिया में चहुँओर से आ-जा रहे तमाम संदेशों, स्टेटसों से यह लग रहा था कि अपना यह प्रयास, यह अभियान बेहद सफल रहा है और इस बार की दीपावली बड़ी अच्छी, राष्ट्र प्रिय, शांति प्रिय, पर्यावरण प्रिय रहेगी और एक मिसाल के रूप में मनाई जाएगी.

दीपावली की शाम आ चुकी थी, और सोशल मीडिया स्टेटस अपडेट, ट्वटिर ट्वीट आदि पर परिपूर्ण शांति छाई थी जो यह इंगित कर रही थी कि इस दफा दीपावली सचमुच अलग किस्म की, राष्ट्रीय, पर्यावरण प्रिय होने वाली है. मन में एक अजीब किस्म की खुशी और गर्व का अहसास हो रहा था.

मोहल्ले में भी कहीं कोई धूम-धड़ाका नहीं हो रहा था जो यह इंगित कर रहा था कि जनता सचमुच जागृत हो गई है और पर्यावरण के प्रति उसका प्रेम, उसकी चिंता जाग चुकी है और वो समाज और प्रकृति को संरक्षित करने की ओर अपना कदम बढ़ा चुका है. बच्चे-बच्चे में जागृति छा चुकी है.

सूरज डूब रहा था, थोड़ा अँधेरा हो रहा था और आसमान में रौशनी भी आम दिनों की तरह ही नजर आ रही थी, उजाला ज्यादा नहीं हो रहा था इसका अर्थ था कि जनता चीनी लड़ियों से मुक्त हो चुकी है और राष्ट्रीय संपत्ति, महंगी बिजली बचाने की खातिर अपने घर को रौशन करने के बजाए अपने मन-मंदिर को रौशन करने के लिए प्रतिबद्ध हो चुकी है. एक शिक्षित, समृद्ध राष्ट्र की ओर हम आज बढ़ चुके थे. विश्व की सबसे बड़ी शक्ति बनने से बस हम चंद कदम ही दूर थे. यूँ भी जनसंख्या के लिहाज से तो यह कदम और भी कम है. बहरहाल.

अचानक कहीं पड़ोस में एक पिद्दी सा फटाका फूटा. सोचा, इतना तो चलेगा. शायद पिछले साल का बचा खुचा पटाखा होगा, किसी ने चला लिया होगा. उधर थोड़ा अँधेरा और बढ़ा तो दूर रौशनी की कतारें थोड़ी दिखने लगी थीं. सोचा, किसी अज्ञानी ने, किसी प्रकृति-अप्रेमी ने बिजली की लड़ लगा ली होगी, और लगाई होगी भी तो देसी – चीनी नहीं.

इधर सोशल मीडिया में भी यही हाल था. मामला बेहद ही शालीन. बहुत ही अच्छा लग रहा था. बस, पटाखे फ़ोड़ने के, दिए जलाने के और बिजली की लड़ियाँ लगाने के, कहीं कहीं इक्का-दुक्का अपडेट आने लगे थे – इन बेशर्मों ने सचमुच देश का कबाड़ा किया हुआ है. न इन्हें राष्ट्र की चिंता है और न ही पर्यावरण की.

पर, ये क्या! आधा घंटा बीतते न बीतते माहौल गरमाने लगा. दीपावली के स्टेटसों की बाढ़ आ गई. कोई फुलझड़ी के चित्र लगा रहा था तो कोई रॉकेट के तो कोई रौशनी के. मुहल्ले में इक्का दुक्का चलने वाले पटाखे अब आगे बढ़कर सौ और हजार, पाँच हजार लड़ियों वाले लगातार दस-बीस मिनट चलने वाले पटाखों के रूप में तबदील हो चुके थे. इधर सूरज पूरी तरह डूब चुका था और पूरा मुहल्ला, पूरा शहर, पूरा देश जगमग रौशनी में नहाया हुआ था. चहुँ और तेज, और तेज आवाजों वाले पटाखे चल रहे थे. जहाँ रॉकेट ऊपर आसमान में जाकर रौशनी कर रहे थे आवाज कर फूट रहे थे, वहाँ नीचे अनार और चकरी जुगलबंदी से समां बाँध रहे थे. देश के हर शहर हर गांव के हर घर में बिजली की लड़ से रौशनी हो रही थी – गोया बिजली इस बार मुफ़्त थी और बिजली के लड़ चीन से मुफ़्त में मिल गए थे.

और, बचा हुआ तो केवल मैं और केवला मेरा ही घर था. परंतु मैं क्या कोई कच्चा खिलाड़ी था? बिलकुल नहीं. मैंने भी स्विच ऑन कर दिया. और मेरा घर भी रौशनी से जगमग कर उठा. पिछले वर्ष की सहेजी लड़ियों को मैंने पहले ही टाँग दिया था, और तीन-चार दर्जन चीनी लड़ियाँ और उठा लाया था. चीनी सामानों के बहिष्कार के कारण डर्ट-चीप दाम में मिल रही थीं. जस्ट इन केस, यू नो! सही समय पर बड़ी काम आ गई थीं वे. कुल मिलाकर मेरा घर पूरे मुहल्ले में, पूरे शहर में सर्वाधिक रौशनीयुक्त, सर्वाधिक प्रकाशित घर हो गया था.

साथ ही, मैंने अपना सीक्रेट भी बक्सा खोल ही लिया. क्लायंट दीपावली गिफ्ट कर गए थे, और उनका उपयोग नहीं करना वैसे भी उनका अनादर होता. अंदर एक से बढ़कर एक रौशनी वाले, आवाज वाले, स्टाइलिश चीनी पटाखे थे जिनकी बराबरी अपने इंडियन, शिवकाशी वाले पटाखे क्या खा-पी के करते! कसम से, इस बार तो मोहल्ले में अपनी पूरी धाक जम जाएगी. दो घंटे से कम का नजारा नहीं होगा, और वो भी पूरे धूम धड़ाके सहित!

तो ये थी हमारी दीवाली. आपकी अपनी दीपावली कैसी रही पार्टनर?

भोपाल की ब्रिटिश लाइब्रेरी - वर्तमान नाम विवेकानंद लाइब्रेरी में अंग्रेज़ी और पश्चिमी (जर्मन, फ्रेंच) आदि भाषाओं की किताबें ही मिलती थीं.

जनता की बेहद मांग पर हिंदी की किताबें इस वर्ष के हिंदी पखवाड़े से नसीब होने लगी हैं और क्या खूब होने लगी हैं. दूसरी खेप आई है जिसकी ये झलकी है -

 

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नए संग्रह में शामिल 20 किताबों की सूची इस प्रकार है । 

  1. मुसाफिर कैफ़े (दिव्य प्रकाश दुबे)
  2. बनारस टॉकीज (सत्या व्यास)
  3. आज़ादी मेरा ब्रांड (अनुराधा बेनीवाल)
  4. मम्मा की डायरी (अनु सिंह चौधरी) 
  5. जादू भरी लड़की (किशोर चौधरी)
  6. टर्म्स एंड कंडिशन्स एप्लाई (दिव्यप्रकाश दुबे )
  7. ज़िंदगी आइस पाइस (निखिल सचान )
  8. नमक स्वादानुसार (निखिल सचान )
  9. नीला स्कार्फ (अनु सिंह चौधरी )
  10. वो अजीब लड़की (प्रियंका ओम)
  11. कुल्फी एंड कैपूचिनो (आशीष चौधरी )
  12. नॉन रेजीडेंट बिहारी (शशिकांत मिश्रा )
  13. लूजर कहीं का (पंकज दुबे)
  14. कोस कोस शब्दकोश (राकेश कायस्थ )
  15. इश्कियापा (पंकज दुबे)
  16. इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं (विनीत कुमार )
  17. चौराहे पर सीढ़ियाँ (किशोर चौधरी )
  18. मसाला चाय (दिव्य प्रकाश दुबे )
  19. बकर पुराण (अजीत भारती )
  20. ठीक तुम्हारे पीछे (मानव कौल )

 

ज्ञातव्य है कि इन किताबों को उनकी मांग और विविध स्रोतों से हासिल किए गए लोकप्रिय / हालिया बेस्टसेलर हिंदी किताबों की सूची में से छांट कर संग्रहित किया गया है.

सूची में शामिल लेखकों को बधाईयाँ, शुभकामनाएँ और प्रकाशकों को भी. इनमें से बहुत सारा हिंद युग्म से प्रकाशित है. शैलेश भारतवासी को भी विशेषतः बधाई.

और, विनीत की इश्क कोई न्यूज़ नहीं तो है ही, किशोर चौधरी की दो, अनु सिंह चौधरी की भी दो, और दिव्य प्रकाश दुबे की तो तीनों किताबें हैं :)

पेट्रोल जांच कर लो, डीजल, गैस जांच कर लो, आटा दाल जांच कर लो। नोट भी जांच कर लो।
गोया आदमी नहीं जांच मशीन हो!

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यूँ, सोशल मीडिया में लोग मुखौटे लगाए मिलते हैं, परंतु इन मुखौटों में थोड़ा और पॉलिश करने की जरूरत अब आ ही गई समझो!

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पुनर्धर्मभीरूभव:

बहुत पुरानी बात है. धरती पर एक बार एक इंसान गलती से बिना धर्म का, नास्तिक पैदा हो गया. उसका कोई धर्म नहीं था. उसका कोई ईश्वर नहीं था. वो नास्तिक था.

चहुँ ओर हल्ला मच गया. आश्चर्य! घोर आश्चर्य!¡ एक इंसान बिना धर्म के, नास्तिक कैसे पैदा हो सकता है. वो बिना हाथ-पैर के, जन्मजात विकृतियों समेत भले ही पैदा हो सकता है, और अब तो विज्ञान की सहायता से बिना मां-बाप के भी पैदा हो सकता है, मगर बिना धर्म के? लाहौलविलाकूवत! ये कैसी बात कह दी आपने! पैदा होना तो दूर की बात, बिना धर्म के कोई इंसान, इंसान हो भी सकता है भला?

ताबड़तोड़ उस इंसान को अपने-अपने धर्मों में खींचने की, उसे आस्तिक बनाने की जंग शुरू हो गई.

“उद्धरेदात्मनात्मानम् ... वसुधैव कुटुंबकम्...” सहिष्णुता और विश्वबंधुत्व केवल हिंदुओं में है... इसका धर्म हिंदू होना चाहिए. हिंदुओं ने कहा.

“बिस्मिल्लाहिर्रहमानेहिर्रहीम...” ईश्वर केवल एक है और उसके सबसे निकट, शांति और सहिष्णुता का धर्म इस्लाम है, वही स्वर्ग जाने का एकमात्र रास्ता है. इसका धर्म इस्लाम होना चाहिए. मुस्लिमों ने अधिकार जताया.

“ईश्वर दयालु है- ईश्वर इन्हें माफ करना, ये नहीं जानते ये क्या कर रहे हैं...” दयालु ईश्वर केवल यीशु हैं और केवल वो ही इसके पापों को क्षमा कर सकते हैं. ईसाइयों ने बताया.

उस बेधर्मी इंसान ने कहा – ठीक है, मैं सभी धर्मों का अध्ययन करूंगा और जो सबसे अच्छा लगेगा उसे धारण करूंगा.

उसने विभिन्न धर्मों के अध्ययन के लिए पर्याप्त समय लगाया और अंततः अपना अध्ययन पूरा कर लिया. ओर फिर उसने एक सभा रखी जिसमें उसे घोषणा करनी थी कि वो कौन सा धर्म अपनाएगा.

बड़ी भीड़ जुटी. तमाम धर्मों की जनता और तमाम धर्मों के गुरु उस सभा में स्वतःस्फूर्त जुटे. एक बेधर्मी इंसान के धर्म के अपनाने का जो खास अवसर था यह. नास्तिक के आस्तिक बनने का अवसर जो था यह.

भरी सभा में उस बेधर्मी इंसान ने भीड़ की ओर दुःख भरी नजर डाली और ऐलान किया – मैं बिना किसी धर्म का ही अच्छा हूँ. मैं नास्तिक ही ठीक हूँ. मुझे किसी ईश्वर में, किसी धर्म में कोई विश्वास नहीं है.

“भला ऐसा कैसे हो सकता है?” क्रोध से हिंदू धर्माचार्य चिल्लाये. उनके त्रिनेत्र खुल चुके थे. लोग त्रिशूल, भाले लेकर उस बेधर्मी इंसान की ओर दौड़े.

“लाहौलविलाकूवत!” ये तो ईशनिंदा है. परम ईशनिंदा. इसे दोजख में भी जगह नहीं मिलनी चाहिए... मुसलिम धर्माचार्य गरजे. पत्थर, कंकर लेकर लोग उसे मारने दौड़े.

“हे ईश्वर इसे क्षमा करना.. ये नहीं जानता ये क्या कह रहा है...” ईसाई धर्माचार्यों ने हल्ला मचाया. लोग कीलें हथौड़े लेकर उसके पापों के प्रायश्चित्त करवाने के लिए उसे सूली पर टांगने दौड़े.

 

तब से, इस धरती पर कोई भी इंसान, गलती से भी, बिना धर्म के पैदा नहीं होता.

हिंदी उपयोगकर्ताओं (को सिखाने) के लिए गूगल ने जोरदार विज्ञापन अभियान निकाला है -

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कि, अब आप सर्च आदि बहुत सारे काम हिंदी में बोल कर भी कर सकते हैं, और बहुत बेहतर तरीके से कर सकते हैं.  हिंदी (और तमाम अन्य भारतीय भाषाओं की) की ध्वन्यात्मक खूबी के कारण परिणाम बेहद शुद्ध आते हैं.

आप भी आजमाएँ. यदि अब तक नहीं आजमाएँ हैं तो!

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कूल काऊ ट्रैकिंग - एक विज्ञापन की तस्वीर. असली. कोई फ़ोटोशॉप्ड नहीं, कोई नकली नहीं.

सवार के मुख पर प्रसन्नता की लकीरें बताती हैं कि यह कितना आह्लादकारी होगा! तो चलें, अपन भी ऐसी सवारी करने?

नहीं?

वैसे, अपने यहाँ भी लोग-बाग अक्सर गाय की सवारी अपने राजनीतिक लाभ के लिए करते रहे हैं. पर, वो आपको भी पता है कि अलग किस्म की अलहदा सवारी होती है, और उसका विजुअल इफ़ेक्ट नहीं, कुछ और इफ़ेक्ट होता है. हाँ, आह्लादकारी तो अवश्य होता होगा - राजनीतिक लाभ की तरह.

गऊ भक्तों से अग्रिम क्षमा याचना सहित. स्ट्रिक्टली नो ऑफ़ेंस टू एनीबडी!

इस सप्ताह व्यंग्य की जुगलबंदी का विषय था -
बदलता मौसम

मालवा क्षेत्र में मौसम के बदलाव का पूर्वानुमान या फिर यूं कहिए कि बदलते मौसम की भविष्यवाणी हवा का रूख देख कर किया जाता रहा है। कुरावन नाम की हवा की दशा-दिशा और गति को भांप कर बुजुर्ग आज भी सटीक भविष्यवाणियां करते हैं कि पानी कब, कितना गिरेगा और ठंडी गर्मी कितनी पडे़गी। मगर आज के जमाने का आदमी अपनी इंद्रियों की अपेक्षा वेदर डॉट कॉम पर ज्यादा भरोसा करने लगा है। वो घर से निकलने से पहले लोटा भर पानी पी कर, हाथ में छतरी लेकर या रैनकोट डाटकर निकलने के बजाए गूगल नाओ पर मौसम चेक कर निकलता है। क्योंकि वैसे भी उसे अब कहीं पानी की किल्लत कहीं नहीं होती। धन्य हो बोतलबंद पानी बनाने वाली कंपनियों का। बीस रुपल्ली निकालो और एक बोतल पानी हाजिर। कभी भी कहीं भी। हां, अगर कहीं बिन बुलाए बरसात हो गई, आंधी-तूफान आ गया और पास में छतरी या रेनकोट न हो तो उसका प्रोग्राम बरबाद हो सकता है। इसलिए बदलते मौसम के पूर्वानुमान पर अपडेट, एक अदद पानी के लोटे से ज्यादा जरूरी है।


साथ ही, अचानक कहीं चटख धूप के बीच पानी की बौछारें होने लगे तो एक अदद छतरी का जुगाड़ होना मुश्किल है। पर यह भी सत्य है कि ऐसी चटख धूप में भी कोई बंदा यदि छतरी लिए या रेनकोट पहने दिख जाए तो यह समझें कि उसने पक्के तौर पर मौसम ऐप्प पर मौसम का मिजाज चेक कर लिया है और उसे अपने मौसम भविष्यवाणी करने वाले ऐप्प पर अपने आप से ज्यादा भरोसा है कुछ इस तरह कि हिंदी का कवि इस पक्के भरोसे में रहता है कि 250 प्रतियों के प्रिंट आर्डर में, सहयोग राशि के सहयोग से प्रकाशित उसके इकलौते कविता संग्रह के लाखों पाठक हैं और वो दुनिया में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध कवियों की कतार में खड़ा है ।


भारत में यूं तो प्रकट रूप में तीन मुख्य मौसम हैं - ठंडी, गर्मी और बरसात। परंतु इधर कुछ सालों में भारत के मौसम में बहुत बड़ा बदलाव आया है। एक नया, सुहावना, सबके फायदे का मौसम  पैदा हो गया है - चुनाव का मौसम।


चुनाव का मौसम बहुत से परिवर्तन लाता है। चुनाव के मौसम में कहीं पैसों की बारिश होती है, कहीं टीवी, रेडियो, स्मार्टफ़ोन और लैपटॉप की। भारत की जनता के लिए यही मौसम सबसे बेहतर होता है। इसी मौसम में कई नई योजनाएं अवतरित-स्वीकृत होती हैं। पुरानी रूकी फंसी पड़ी योजनाएं द्रुतगति पाती हैं। कभी-कभी दस-बारह वर्षों से रूके फंसे पुलों के काम तो इतनी द्रुतगति पाते हैं कि भरभराकर ढह भी जाते हैं।


सोशल मीडिया के आभासी संसार के वास्तविक मौसम के तो क्या कहने! यहाँ का मौसम प्रकाश की रफ्तार से भी अधिक गति से बदलता है, बनता-बिगड़ता है। यहां का मौसम परिवर्तन ब्रह्मांड के किसी नियम कानून को नहीं मानता। दरअसल यहां पर हर नियम फट जाता है। ऊपर से बड़े अजीब अजीब, अब तक के अनदेखे अनसुने मौसम आते-जाते हैं। कभी कन्हैया मौसम तो कभी वेमुला मौसम तो कभी पुरस्कार लौटाऊ मौसम। कुछ समय पहले तोता-तोती कविताई का ऐसा बिगड़ा मौसम आया कि कोई बच न पाया। किसी सर्जिकल स्ट्राइक के रूप में, वर्तमान में अचानक ही, बेमौसम बरसात की तरह, आलुओं का, बल्कि सड़े गले आलुओं का मौसम यहां छाया हुआ है।


ओह, मौसम की बात करते-करते यहां का अच्छा भला मौसम भी मोनोटोनस हो गया। तो क्यों न, यह लेख व्यंग्य है कि हास्य, कि महज बकवास, इस बात पर, आइए, गर्मागर्म बहस करें और यहां के मौसम के मिजाज को थोड़ा बदलें।
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अगले सप्ताह की जुगलबंदी जमाने आप सभी सादर आमंत्रित हैं। विषय है - आस्तिक कि नास्तिक?


पाई जीरो। 5 डॉलर का कंप्यूटर।

वो भी क्रेडिट कार्ड साइज का आधा।
पर, शक्ति में भरपूर।
मल्टीमीडिया, एचडीएमआई युक्त!
एक ले ही लें?

स्वच्छता अभियान के मरफ़ी के नियम

किसी भी दिए गए इलाके में, स्वच्छता अभियान के पहले और बाद में गंदगी की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

यदि किसी राजनीतिक व्यक्ति ने कहीं स्वच्छता अभियान में हिस्सा लिया है तो यकीनन, अभियान के बाद गंदगी की मात्रा में और बढ़ोतरी हो जाती है।

दिया गया कोई भी स्वच्छता अभियान, विरोधी दल की नजरों में सदैव असफल रहता है। बल्कि घोर असफल रहता है।

स्वच्छता अभियान अक्सर दूसरों के क्षेत्र में चलाए जाते हैं, ताकि यह बताया जा सके कि उनका गली मोहल्ला साफ सुथरा है और सफाई वफाई की जरूरत नहीं है, जबकि सफाई की ज्यादा जरूरत वहीं होती है।

स्वच्छता अभियान में तामझाम उसमें भाग ले रहे नेता अफसर के समानुपाती होती है और वास्तविक सफाई व्युत्क्रमानुपाती।

स्वच्छता अभियान में जितना ज्यादा जोर शोर होगा, उतनी ही कम साफ-सफाई होगी।

दिए गए किसी भी स्वच्छता अभियान में, इधर के कूड़े को उधर और उधर के कूड़े को इधर किया जाता है। यानी कूड़े की मात्रा में कहीं कोई कमी नहीं होती।

ऊपर दिए गए नियम का उपनियम - दिए गए किसी भी स्वच्छता अभियान में कूड़े की मात्रा में अंतिम रूप से बढोतरी ही होती है क्योंकि दिया गया कोई भी अभियान भी न्यूनतम ही सही, कूड़ा उत्पन्न करता ही है।

जहाँ कूड़ा होता है वहाँ स्वच्छता अभियान नहीं होता।

कूड़ा कूड़े को खींचता है। स्वच्छता अभियान, स्वच्छता अभियान को।

स्वच्छता अभियान में शामिल लोगों के लिए कूड़ा फैलाने का अधिकार स्वयमेव हासिल होता है।

अधिकांश स्वच्छता अभियान फोटो शूट करने के लिए आयोजित किए जाते हैं। बाकी के भी फोटो शूट करने के लिए ही आयोजित किए जाते हैं, अलबत्ता मौका हासिल नहीं होता।

और भी नियम हैं। पर, नेट पर भी स्वच्छता अभियान चलाने की जरूरत है। इसलिए कम लिखेंगे।

व्यंग्यकार, वृत्तांतकार अनूप शुक्ल व्यंग्य के बहाने सम-सामयिक व्यंग्य और व्यंग्यकारों पर अपनी ही शैली में ग़ज़ब की समीक्षा कर रहे हैं, और जीवंत विमर्श को न्यौता दे रहे हैं.

 

आलेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें - http://www.rachanakar.org/2016/10/4.html



कल मैंने विंडोज़ 10 अपडेट के फटने - माने काम करते प्रोग्रामों के खराब हो जाने के बारे में अपनी व्यथा लिखी थी। और आज ये खबर भी आ गई!

क्या आप भी विंडोज़ 10 अनइंस्टाल करने की सोच रहे हैं?

माना, कि अपडेट अच्छे भले के लिए किए जाते हैं, परंतु यहाँ तो मामला उल्टा हो रहा है भाई!

हिंदी कंप्यूटिंग उपयोगकर्ता विंडोज 10 पर अपडेट होने वाले अपने रेमिंगटन कीबोर्ड के नहीं चलने के चलते अच्छे खासे परेशान हो ही रहे थे कि इस नए अपडेट ने और सत्यानाश कर दिया.

मेरे दो जरूरी प्रोग्राम, जिनके चलते मैं अब तक विंडोज़ पर चिपका हुआ था, अब नए अपडेट के बाद ठीक से चल ही नहीं रहे!

नीचे का स्क्रीनशॉट देखें -

 

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ऊपर स्क्रीनशॉट में नीचे के विंडो में जो डब्बे दिख रहे हैं वो यूनिकोड हिंदी है. आज से कोई पंद्रह साल पहले, विंडोज 95 के जमाने में ऐसा विविध प्रोग्रामों में दिखता था. अब जब विंडोज 10 का नया अपडेट आया है, उसमें कई प्रोग्रामों में यह फिर से दिखने लगा है. यानी हिंदी का सत्यानाश! डब्बों से आप काम कैसे करेंगे भला?

समस्या एक नहीं है. और भी है. अच्छा खासा ओपन लाइव राइटर चल रहा था, उसमें हिंदी स्पेल चेकर भी बढ़िया चल रहा था. जाने क्या हुआ कि इसका हिंदी स्पेलचेकर भी इस अपडेट के बाद गायब हो गया. विंडोज पर अब इसकी उपयोगिता शून्य जैसी ही हो गई है.

वैसे, अब विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम में कुछ खास रह नहीं गया है. आधी से अधिक चीजें क्लाउड में चली गई हैं, और बहुत सा काम लिनक्स/एंड्रायड में हो जाता है.  विंडोज इस लिए चिपकाए बैठे हैं कि कुछ पुराने जरूरी प्रोग्राम केवल और केवल इसी पर चलते हैं. परंतु यदि पुराने प्रोग्राम इसी तरह फटते रहे तो फिर क्यों कोई खरीदेगा विंडोज़? फिर चाहे वो 10 हो या 20!

सत्यानाश हो तेरा विंडोज़ 10 अपडेट.

अब तो, डेस्कटॉप पर लिनक्स की ओर पूर्ण माइग्रेशन पक्का समझो!

वो मारा! बुद्ध और गांधी का देश बदले की हिंसक आग में सुलग रहा था. जल रहा था. कुछ इस तरह कि उस आग में स्वयं जला जा रहा था. इससे पहले इतनी आग कभी भी, कहीं भी नहीं लगी थी. सर्जिकल स्ट्राइक ने दिल में थोड़ा सा ही सही, सुकून का ठंडा पानी तो डाला. मामला 40 के बजाए 400 होता तो और ज्यादा सुकून मिलता, और ज्यादा ठंडक मिलती. चहुं और खुशी व्याप्त है. सुकून, चैन और दिल में ठंडक व्याप्त है. चैनलों में, सोशल मीडिया में प्रकटतः और ज्यादा.

कुछ ही समय पहले कुछ इसी तरह की, बदले की आग देश के दक्षिण में लगी थी. पानी ने आग लगाई थी. देश में प्यासे को पानी पिला कर पुण्य बटोरने की प्रथा है, रिवाज है. मेहमान घर में आता है तो सबसे पहले पानी का लोटा दिया जाता है. उसी देश में, कावेरी का पानी तू पिए कि मैं, इस पर दो पड़ोसी भाइयों में आग लगी थी. मामला दो पड़ोसी मुल्कों की बात होती तो फिर भी सिंधु की तरह बात अलग होती. और, यह आग भी भयावह थी. राजनीति प्रेरित जनता के एक वर्ग ने खुद ही, अपने ही अड़ोसी-पड़ोसी के लिए, अपने ही स्टाइल में सर्जिकल स्ट्राइकें मारीं, और सुकून-पे-सुकून हासिल किया. लोगों ने माथे पर क्षेत्र-प्रांत की बिंदी, गाड़ी के लाइसेंस प्लेट पर चिपके नंबर के आधार पर पड़ोसियों के जाति-धर्म-क्षेत्र को पहचाना और आग लगाई. इस सर्जिकल प्रक्रिया में वे खुद झुलसे, खुद आग में मरे. पर, इससे क्या? दिल को सुकून तो मिला. सुलग रहे दिल में ठंडक तो पहुंची. यह आग अभी पूरी ठंडी नहीं हुई है. क्षुद्र राजनीतिक मानसिकता, और न्यायालयीन हस्तक्षेप ने आग में सल्फर का काम किया है. आप पूछेंगे कि ये कौन सा नया मुहावरा आ गया. आग में घी था, वो कहाँ गया. तो भइये, आग तो सर्वत्र है, घी कहाँ और कितना डालोगे? घी की सर्वत्र कमी हो रही है. इसलिए सल्फर ले आए हैं. घी तो फिर भी आग में डल कर यज्ञ जैसा माहौल पैदा करता है. यहाँ तो आग जहरीले किस्म के हो रहे हैं. इसलिए सल्फर. आग भी, धुंआ भी और जहर भी.

देश में जाति और आरक्षण की हिंसक आग तो सदा सर्वदा से लगी हुई है. दो दशक पहले मंडल-कमंडल ने इसमें ऑक्सीजन दिया और तब से लेकर अब तक हर छठे चौमासे जब तब जहाँ तहाँ सर्जिकल स्ट्राइकें होती रहती हैं. ताज़ा सर्जिकल स्ट्राइक जाट आरक्षण का था, जहाँ राजनीति प्रेरित जनता के एक वर्ग ने अपने ही प्रदेश को हिंसक आग में जला डाला, जाति विशेष की पहचान को तबाह कर डाला और इस बहाने मानव के आदिम बर्बरता की पहचान विश्व के सम्मुख रख दी.

कुछ समय से, गांधी और बुद्ध के इस अहिंसक देश में, अहिंसक गौमाता की रक्षा के लिए, अति-हिंसक गौरक्षक रक्त-बीज की तरह नामालूम कहां से, कल्कि अवतार की तरह अवतरित हो गए हैं. वे भी, अपनी सुविधा से, जहाँ मन पड़े, जहाँ भी शक-सुबहा हो, सर्जिकल स्ट्राइकें मारते हैं और तमाम तरह के बर्बर अत्याचार कर अपने गौरक्षक धर्म का प्रचार-प्रसार कर अपने-अपने दिलों में सुकून हासिल करते हैं. अब यह जुदा बात है कि ऐसे फर्जी गौरक्षकों के खात्मे के लिए सर्जिकल स्ट्राइक की ही असल जरूरत देश को है. यूं, देश की बात चली है तो  किसी भी किस्म के सर्जिकल स्ट्राइक को सबसे पहले भ्रष्टाचारियों पर चलाना जरूरी है. परंतु इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं है. और, यदि थोड़ा मोड़ा है भी तो दिखावे के लिए, आधी-अधूरी!

इधर देश प्रांत की सरकारें, सरकारी विभाग, न्यायालय भी नित्य, अपने तरह की नायाब, नई सर्जिकल स्ट्राइकें मारते रहते हैं. एक सर्जिकल स्ट्राइक से शराब-बंदी,  होती है, डांस-बार-बंदी होती है, शहाबुद्दीनों को जमानतें मिलती है, तो दूसरी प्रति-सर्जिकल स्ट्राइक से शराब-बंदी, डांस-बार-बंदी, शहाबुद्दीनों की जमानतें अवैध, गैरकानूनी घोषित होती है.

सोशल मीडिया में तो सर्जिकल स्ट्राइकों के बगैर काम ही नहीं चलता. जातिवादी, धर्म-अधर्म-वादी राष्ट्रवादी, आपिए, वामिए, प्रलेस, दलेस आदि आदि तमाम खेमों के लोग एक दूसरे की पोस्ट-बमों पर अपनी टिप्पणी-बमों से सर्जिकल स्ट्राइक मारते रहते हैं और इस तरह, अधिकांश निष्पक्ष, निस्पृह जनता का घोर मनोरंजन करते रहते हैं. इन सर्जिकल स्ट्राइकों को मारते समय वे यह भूल-भुला जाते हैं कि उनके इन हिंसक लेखन से उनके तथाकथित ज्ञान का क्षद्म आवरण तो निकला जा रहा है, फटा जा रहा है, वे एक्सपोज हो जा रहे हैं, उनकी नंगई उघड़ रही है. परंतु उनके मन में भरी हुई आदिम हिंसक आग यह भान नहीं होने देती.

वैसे, यह आलेख भी अपने तरह का सर्जिकल स्ट्राइक मारने को लिखा गया है. आपको भी सर्जिकल स्ट्राइक मारने का सादर आमंत्रण है. आप अपनी टिप्पणी नुमा सर्जिकल स्ट्राइक से इसे समृद्ध कर सकते हैं या फिर इसकी बखिया उधेड़ सकते हैं. J

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