टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

January 2016

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कुछ दिनों पहले मेरा विंडोज कंप्यूटर, जो पिछले दशक से, बिलानागा हर दूसरे हफ्ते अपडेट होता रहता था, फुल विंडोज 10 पर मुफ़्त में अपग्रेड हुआ तो कुछ मामले ठीक हुए तो बहुत से उलझे. सबसे बड़ी समस्या थी सिस्टम से आ रहे घटिया, शोर युक्त साउंड की. जब कोई उपाय नहीं सूझा तो साउंड चिपसेट निर्माता की साइट से नवीनतम ड्राइवर डाउनलोड कर फोर्स इंस्टाल किया गया तो मामला जमा. अब जब मामला कुछ जमा तो, अच्छे के लिए हुए इस अद्यतन – माने अपडेट में हुई इस गड़बड़ी के लिए मियाँ मरफ़ी याद आए, और बहुत याद आए. तो बन गए मरफी के कंप्यूटर सिस्टम, स्मार्टफ़ोन अपडेट नियम. आप भी आनंद लें, और आपके जेहन में कुछ अक्स उभरते हैं तो उन्हें भी साझा करें.

मरफ़ी के कंप्यूटर सिस्टम, स्मार्टफ़ोन अपडेट / अपग्रेड नियम

· जब कोई जरूरी काम होता है, तभी अपडेट के लिए सिस्टम फ्रीज़ रहता है.

· जरूरी काम सिस्टम फ्रीज़ अपडेट लेकर आता है.

· जब कोई जरूरी ऐप्प अपडेट आता है तभी बैटरी लो हो जाती है.

· जब बैटरी लो हो जाता है तभी जरूरी ऐप्प अपडेट आता है और जिसके लिए फुल बैटरी आवश्यक होती है.

· जिस अपडेट के लिए फुल बैटरी जरूरी होती है वहाँ न तो बिजली होती है न फुल बैटरी.

· जो जरूरी अपडेट आप चाहते हैं वे कभी नहीं आते, कभी भी नहीं.

· अपडेट नित्य आते हैं, परंतु आपके काम के ऐप्प के जरूरी फ़ीचर के रूप में कभी नहीं.

· अप्रत्याशित अपडेट का परिणाम अप्रत्याशित होता है.

· प्रत्याशित अपडेट का भी परिणाम अप्रत्याशित ही होता है.

· पहले से अपडेटेड, अपग्रेडेड सिस्टम में अपडेट अधिक होते हैं.

· यदि कहीं अपडेट हो रहा है तो इसका अर्थ है कि सिस्टम पहले से ही अपडेटेड है.

· अनअपडेटेड सिस्टम भी अपडेटेड सिस्टम जैसा ही काम करता है न कम न जियादा.

· अपडेट सबको चाहिए – ऐप्प से लेकर आदमी तक, परंतु धार्मिकों और नेताओं को नहीं.

· ओटीए (ऑन द एयर) अपडेट पाने के लिए भी अपने सिस्टम को पावर सप्लाई केबल से जोड़ना होता है, बिला नागा, हर बार.

· अपडेट से जरूरी नहीं कि अपडेटेड या अपटूडेट काम हो.

· नए अपडेट नई, अपडेटेड समस्याएँ लाते हैं.

· अपडेट नहीं है तो समझिए की अपडेट की जरूरत नहीं है, अपडेट हैं तो वैसे भी अपडेट की जरूरत नहीं है.

· आपका कार्य निर्बाध चल रहा है इसका अर्थ है कि आपको अब एक सिस्टम अपग्रेड की जरूरत है.

· दूसरे के मोबाइल और सिस्टम जियादा अपडेटेड दीखते हैं.

· एक ही ब्रांड के आपके मोबाइल में महीनों अपडेट नहीं आते, जबकि आपके दोस्त का मोबाइल में दिन में दो बार अपडेट होता है.

· निरंतर अपडेट के जमाने में सिस्टम और मोबाइलों से काम लेते रहना बड़ी कला है.

· आपका अच्छा भला चल रहा सिस्टम एक बहु प्रतीक्षित अपग्रेड से बिखर जाता है.

· बहु प्रतीक्षित अपडेट या सॉफ़्टवेयर का नया संस्करण अच्छे भले सिस्टम के लिए नहीं होता है

· नया संस्करण नई समस्याएँ, पुराना संस्करण – पुरानी+नई समस्याएँ.

· कोई भी दिया गया अपडेट 99% तक पहुँचने के उपरांत ही ब्रेक होता है.

मरफ़ी के अन्य नियम यहाँ पढ़ें

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आप कहेंगे कि अब ये क्या शीर्षक है. क्या इतनी असहिष्णुता आ गई है जो भारत भूमि के दो बड़े धर्म को छोड़ने की बात कर रहे हो.

परंतु, जरा ठंड रखिए.

पिछले दिनों मेरे पेट में कुछ क्रॉनिक संक्रमण की समस्या हुई, तो मैंने चिकित्सक को दिखाया. चिकित्सक ने रोग निदान में पाया कि, एक परजीवी, जो कि दुनिया की आबादी के करीब 50 प्रतिशत व्यक्तियों के पेट में बिना नुकसान पहुँचाए मौजूद रहती है, वह थोड़ी अधिक सक्रिय हो गई है. उसकी अति सक्रियता के कारण पेट में गैस, अपच, जलन आदि समस्याएँ होती हैं, और जब तक लंबा ट्रीटमेंट न लिया जाए, निदान नहीं होता. मेरे साथ यही समस्या थी. जब तब पेट अपसेट होता, ओवर द काउन्टर दवाई ली, आराम मिल जाता. परंतु फिर कुछ दिन बाद यही समस्या. अंततः यह पता चला कि इस समस्या से मुक्ति पाने के लिए 'कम्प्लीट क्योर' यानी संपूर्ण रोग निदान होना चाहिए.

अब, इसके लिए चिकित्सक ने कोई आधा दर्जन गोलियाँ लिख दीं. जिसमें एक दो तो जाहिर है एंटीबैक्टीरियल ही थीं, साथ में कुछ विटामिन्स और फूड सप्लीमेंट एडेड सबस्टैंस जो पेट यानी अंतड़ियों और लीवर की हालत भी इस लंबी चिकित्सा में ठीक रखे. बताता चलूं कि कोई बीस साल पहले जब मेरी जन्मजात हृदय संबंधी समस्या के निदान के लिए हृदय शल्य चिकित्सा हुई थी और कोई 45 दिन अस्पताल में भर्ती था,  उस वक्त मैं शाकाहारी था, परंतु डायटीशियन ने जोर देकर मेरे डाइट में एनीमल प्रोटीन्स को शामिल किया था ताकि स्वास्थ्यलाभ जल्द हो सके.

 

बहरहाल, इधर जब मैं दवाई लेकर आया तो आज के आधुनिक वेल इन्फ़ॉर्म्ड पेशेंट के रूप में अपने आप को पाया और कंप्यूटर स्क्रीन पर दवाइयों के गुण, साइड इफ़ेक्ट आदि के बारे में खोजबीन करने लगा. मुझे अपने चिकित्सक पर पूरा विश्वास है, मगर, फिर है तो वह भी इन्सान ही और इन्सानों से गलतियाँ हो जाती हैं. क्या पता वो मेरे पेट के रोग निदान में किसी एमआर के चक्कर में भूलवश कोई गायनिक समस्या का टैबलेट न लिख दिया हो.

तो, एक दवाई उन्होंने दी थी पैंक्रिएटिन.

जब मैंने इसके बारे में खोजबीन की तो ये दिखा -

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ये कोई कचरा या गलत साइट नहीं है. नहीं तो इंटरनेट पर 80 प्रतिशत से अधिक जानकारी कूड़ा है, प्रोपोगंडा है और धरती को चपटी मानने वाले लोग भी अपने धांसू तर्क देते मिल जाते हैं.

मेरी दवाई की सामग्री में है सूअरों और गायों के पैंक्रियास से निकाला गया पैंक्रियाटिन.

हे! डॉक्टर, तूने ये क्या किया. मुझे न हिंदू रखा न मुसलमान. क्या कहा, मुझे इंसान रखना चाहता है? पर, मुझे तो ये नामंजूर है!

जिंदा रहना है तो ये गोली खानी होगी. धार्मिक-शहीद होना होगा तो इस गोली को गटर में फेंकना होगा.

दुविधा में हूँ. बताओ क्या करूं?

इंसान ही बन जाऊँ?

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हिंग्लिश इज़ कूल यार!

रवि रतलामी

पहले पहली बात. बधाई. हम महान भारत के वासियों ने हाल ही के दिनों में एक नई भाषा ईजाद कर ली है और गर्व से उसे अपना भी लिया है. और उसका नाम है – हिंग्लिश. यकीन नहीं होता? यह नीचे का स्क्रीनशॉट देखें –

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यह एक नवीनतम एप्पल उपकरण की भाषा सेटिंग का स्क्रीनशॉट है, जिसमें भाषा और कीबोर्ड सेटिंग में यह मौजूद है. विश्व की तमाम बड़ी भाषाओं के बीच गर्व से सीना उठाए अपनी प्रविष्टि दर्ज कराए हुए – हिंग्लिश नाम की, अपनी नई भाषा, नया की-बोर्ड. न केवल एप्पल, बल्कि दो अन्य प्रमुख प्लेटफ़ॉर्म - एंड्रायड और विंडोज़ में भी हिंग्लिश कीबोर्ड की सम्मानित उपस्थिति लंबे समय से है.

मेरे बचपन की भाषा

आज कोई मुझसे पूछे कि मेरी मातृभाषा क्या है? तो, मैं शायद थोड़े से शर्म और झिझक से कहूंगा – हिंग्लिश.

क्योंकि मेरी भाषा में – लेखन और वाचन – दोनों में, अंग्रेज़ी के शब्दों की भरमार होती है. एक-2 वाक्य में 40-50 प्रतिशत तक शब्द अंग्रेज़ी के आने लगे हैं – ठीक आज के हिंदी अखबारों की भाषा के अनुरूप. अकसर हिंदी भाषा के अख़बारों को गरियाया जाता है कि उन्होंने हिंग्लिश अपना लिया है, मगर वास्तविकता यह है कि पाठकों ने हिंग्लिश पहले अपनाया, और मजबूरन, पाठकों में पैठ मचाने की होड़ और सर्कुलेशन बढ़ाने की तरतीब में अंततः हर हिंदी अखबार हिंग्लिश अपनाने को मजबूर हो गया. कोई अपवाद स्वरूप जनसत्ता का उदाहरण दे सकता है, मगर, फिर उसका सर्कुलेशन भी तो मायने रखता है.

आमतौर पर, भारत में रहने वाला हर शख्स भाषाई पहचान से, भाषाई समस्या से जब तब जूझता रहता है. और क्यों न जूझे – जब किसी देश में क्षेत्रवार 22 से अधिक प्रमुख भाषाएँ हों, हर प्रमुख भाषा (जैसे कि हिंदी) के भीतर उसकी दर्जनों उप-भाषाएं हों, तो समस्या तो आनी ही है.

बचपन में मेरी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी थी. मैं छत्तीसगढ़ क्षेत्र में पैदा हुआ, जहाँ ठेठ छत्तीसगढ़ी बोली जाती थी. तो जब तक स्कूल जाना प्रारंभ नहीं किया, छत्तीसगढ़ी के अलावा और कुछ नहीं बोलता-समझता था.

स्कूल में पहले ही दिन क – कमल का और ख – खरगोश का सिखाया गया. परंतु छत्तीसगढ़ी में नहीं. हिंदी में. तब पता चला कि हिंदी नाम की भी कोई भाषा होती है, और कमल और खरगोश के बारे में पढ़ने लिखने के लिए छत्तीसगढ़ी नहीं, हिंदी नाम की एक दूसरी, बाहरी भाषा सीखनी, उपयोग करनी पड़ी. ग़नीमत यह रही कि तब छत्तीसगढ़ प्रदेश नहीं बना था और छत्तीसगढ़ी भाषा में लिखत-पढ़त का तंत्र उतना विकसित नहीं था और स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई देवनागरी हिंदी में होती थी. नहीं तो समस्या कुछ और बड़ी होती. या शायद नहीं होती? उस समय, मुझे अब भी याद है - मजेदार बात यह होती कि हम अपने स्कूली मित्रों से या शिक्षक से टूटी-फूटी हिंदी में बात करते और घर-परिवार तथा मोहल्ले के मित्रों से खांटी, लच्छेदार धाराप्रवाह छत्तीसगढ़ी में! यह सिलसिला आज भी जारी है. मां अभी भी हिंदी नहीं समझतीं. उनसे बात करने के लिए छत्तीसगढ़ी बोलना पड़ता है, जबकि उस क्षेत्र, माहौल और भाषा के उपयोग को छोड़े हुए कोई तीस साल से अधिक हो चुके हैं! लेखन में तथा कार्यस्थल पर भाषा उपयोग में छत्तीसगढ़ी कहीं पीछे छूट गई, और केवल हिंदी रह गई, जो अंततः हिंग्लिश में बदल रही है.

तो, मेरे बचपन में छत्तीसगढ़ी से शुरु हुई मेरी मातृ भाषा, आज कोई तीस साल गुजर जाने के बाद हिंग्लिश में कैसे बदल गई? कहानी जरा लंबी है और तफ़सील मांगती है.

बचपन का ही किस्सा है. हम जहाँ रहते थे, वहाँ एक भरा पूरा गुजराती परिवार रहता था. वह पूरा परिवार वाचाल और तमाम तरह की सामाजिक गतिविधियों में संलग्न. हमारा परिवार भी जैसे उनके परिवार से घुल मिल गया था. दो-तीन वर्षों के सान्निध्य ने हम दोनों परिवारों के न केवल आचार-व्यवहार, बल्कि बोली और भाषा पर भी असर डाला. उस वक्त यदि कोई मेरी भाषा (वाचक) पूछता तो मैं कहता – हिंगुज (हिंदी-गुजराती मिक्स) – क्योंकि मेरी बोली में जाने अनजाने तमाम गुजराती शब्द और वाक्य-विन्यास घुस आए थे और अच्छे खासे घुस आए थे. और यदि कोई उस वक्त मेरी हम उम्र, सहपाठिन, गुजरातिन पड़ोसन से उसकी मातृभाषा पूछता तो शायद वो कहती – गुजहिंद (गुजराती-हिंदी मिक्स).

यानी, सीधा सा – न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह है – भाषा का नियम – कोई भी दी गई एक भाषा अपने आस पड़ोस में प्रयोग में होने वाली दूसरी भाषा को अपनी ओर आकर्षित कर अंगीकार करने लग जाती है.

मेरे ब्लॉग की भाषा

मुझे याद है, मेरे ब्लॉग लेखन के शुरूआती दौर में मेरे ब्लॉग के एक पाठक की टिप्पणी आई थी जो कुछ यूं थी –

“आपकी भाषा समझने में कठिन होती है, कृपया सरल भाषा में लिखा करें”

टिप्पणीकार के प्रोफ़ाइल से पता चला कि वो कंप्यूटर प्रोग्रामर था, जाहिर है उसकी शिक्षा दीक्षा भी अधिकांशतः अंग्रेज़ी माध्यम में हुई होगी. मैंने प्रति टिप्पणी की, और पूछा कि भाई, मेरी भाषा में आपको कहाँ कठिनाई दिखती है? मैं तकनीकी आदमी हूँ, तकनीकी भाषा में थोड़ा मोड़ा अंग्रेज़ी के शब्द आ जाते हैं, जो जाहिर है कि हिंदी के उचित समानार्थी शब्द न होने के कारण अनिवार्य रूप से शामिल हो जाते हैं.

टिप्पणीकार का जवाब आया कि आपकी भाषा संस्कृत निष्ठ (सैंस्कृटाइज़्ड) होती है. जिसे समझने में दिक्कत आती है, अतः थोड़ी सरल हिंदी में लिखा करें.

मुझे झटका लगा था. कहाँ तो मैं समझ रहा था कि तकनीकी लेखों के वाक्यों में मेरे अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों के प्रयोग से समस्या हो रही होगी, मगर मामला तो यहाँ उल्टा ही था. मेरी भाषा को जटिल, संस्कृत निष्ठ माना जा रहा था. वैसे, बता दूं कि मैं कोई साहित्य का आदमी नहीं था, हिंदी मैंने केवल काम भर की, ग्यारहवीं (उच्चतर माध्यमिक) कक्षा तक ही पढ़ी थी, और हिंदी में किताबें भी मैंने जासूसी और रोमांटिक पल्प साहित्य – सुरेंद्र मोहन पाठक, जेम्स हेडली चेईज़ और गुलशन नंदा जैसे लेखकों की ही पढ़ी थीं. काशी का अस्सी या वैशाली की नगर वधू जैसी साहित्यिक भाषा की साहित्यिक किताबें मैंने पढ़ने की कोशिश कई बार की थी, और मेरे लिए वे अपठनीय ही बनी रहीं. संस्कृत से पीछा तो आठवीं कक्षा में ही छूट गया था, क्योंकि वह हमारे विज्ञान संकाय में विकल्प भाषा के रूप में विषय में शामिल ही नहीं था.

मैंने अपने पुराने लेखों की आंतरिक ऑडिट की और ढूंढने की कोशिश की कि आखिर मामला कहाँ गड़बड़ है. मगर मेरे कुछ व्यंग्य और व्यंग्यात्मक दोहे, जिन्हें मैं व्यंज़ल कहता आया हूँ, में कुछ इक्का दुक्का कठिन हिंदी शब्दों के अलावा और जटिलता नहीं थी – ऐसा मेरा मानना है. उल्टे, मेरे तकनीकी आलेखों में अंग्रेज़ी के शब्दों की प्रचुरता थी, जो कि लाज़िमी था – क्योंकि कंप्यूटर टेक्नोलॉज़ी और संचार सूचना भारत में उसी समय लोकप्रिय होने लगी थी, और रोजमर्रा जीवन में वह शामिल होती जा रही थी. कंप्यूटर, कीबोर्ड, माउस, रैम, हार्ड-डिस्क, मदर-बोर्ड आदि-आदि अंग्रेज़ी शब्दों का न तो सटीक हिंदी पर्याय था, और न ही जनता हिंदी पर्याय अपनाने को आतुर थी, बल्कि वो तो मजे से इसे अपनाती जा रही थी जैसे कि ये सब शब्द उनकी अपनी हिंदी के ही हों.

अब जब अंग्रेज़ी भाषा की बात आ ही गई है तो थोड़ी सी उसकी भी बात कर लें. मुझे बखूबी याद है कि हमारे जमाने में अंग्रेज़ी स्कूल इक्का दुक्का ही होते थे, जिन्हें तब कॉन्वेंट स्कूल कहा जाता था, और उनमें कौन पढ़ने जाता था, यह पता ही नहीं चलता था क्योंकि उनका वर्ग अलग होता था – श्रेष्ठि वर्ग. मेरे समेत अधिकांश जनता हिंदी माध्यम स्कूलों में ही पढ़ती थी. तो, जब मैं माध्यमिक स्कूल में, आठवीं कक्षा में पढ़ रहा था, उस समय हमारे प्रदेश में अंग्रेज़ी हटाओ आंदोलन जोर शोर से चला था. तब त्रिभाषा फ़ार्मूले के तहत अंग्रेज़ी भाषा ग्यारहवीं (उच्चतर माध्यमिक) कक्षा तक अनिवार्य थी. उस राजनैतिक आंदोलन के फलस्वरूप उस वर्ष से पढ़ाई में अंग्रेज़ी भाषा की अनिवार्यता खत्म कर दी गई थी. मुझे याद है कि उस वर्ष अंग्रेज़ी भाषा की केवल छःमाही परीक्षा हुई थी, और वार्षिक परीक्षा में उसके नंबर नहीं जोड़े गए थे. तब हमें बहुत ही खुशी हुई थी और हम सालभर खुशियां मनाते हुए इसी तरह की बातें करते रहते थे कि अब विदेशी – अंग्रेज़ी भाषा नहीं पढ़नी पड़ेगी और इस बेकार की भाषा से हमारा पीछा छूटा. ऐसा नहीं था कि मैं अंग्रेज़ी में कमजोर होऊँ, मेरे साथ एक एंग्लोइंडियन लड़का पढ़ता था, और जाहिर है उसकी अंग्रेज़ी अच्छी, बहुत अच्छी थी, मगर परीक्षा में मैं हमेशा उससे बाजी ही मार ले जाता था और परीक्षा में सबसे अधिक नंबर लाता था. मगर पढ़ाई में अंग्रेज़ी हटी तो सबसे ज्यादा खुश होने वालों में मैं भी था! स्वदेशी अपनाने और अपनी भाषा में पढ़ने का गर्व कुछ अलग ही था.

मैं विज्ञान का विद्यार्थी था. पढ़ाई में अंग्रेज़ी भाषा हटने की खुशी महाविद्यालय में आते-आते गम में बदल गई. बल्कि यह तो एक तरह से सज़ा के रूप में बदल गई. तकनीकी की कक्षा में पहले दिन से ही अंग्रेज़ी से सामना पड़ गया. महाविद्यालय की मेरी पहली ही कक्षा में रसायन विज्ञान का प्राध्यापक आया और विशुद्ध अंग्रेज़ी में कोई पचास मिनट का वक्तव्य झाड़ गया. जाहिर है, जिसका एक भी शब्द पल्ले नहीं पड़ा. आप उस समय की मेरी स्थिति समझ सकते हैं. ऊपर से उन प्राध्यापक महोदय ने कहा कि जो आज लैक्चर झाड़ा है, उसका नोट बनाकर आप अपनी कॉपी कल लेकर आएंगे और मुझे दिखा कर मेरा हस्ताक्षर लेंगे. कोढ़ में खाज यह कि उसे अंग्रेज़ी भाषा में लिख कर ले जाना था. यानी जिस वक्तव्य का एक भी शब्द समझा नहीं, उसे अंग्रेज़ी में लिख कर ले जाना है और बाकायदा उसकी जांच भी करवानी है. रसायन विज्ञान की कक्षा में मैं कई दिनों तक नहीं गया क्योंकि पर्याप्त प्रयास के बावजूद भी मैं लिख नहीं पाता था. स्कूल में हम जिस रासायनिक वस्तु को ओसजन और नत्रजन (अंग्रेज़ी नाइट्रोजन का हिंदी में सरलीकृत नाम) कहते थे, अचानक वे हमारे लिए ऑक्सीजन और नाइट्रोजन हो गए. यही नहीं, दूसरे, गणित और भौतिकी में भी यही हाल हो गया. ज्या और त्रिज्या आदि साइन और कोसाइन बन गए. मेरे अपने जीवन में, हिंग्लिश की नींव यहीं पड़ी, जब हम अपनी पढ़ाई के दौरान बातचीत में इन अंग्रेज़ी शब्दों का उपयोग करते थे. इलेक्ट्रॉनिकी की प्रयोग शाला में प्रयोग शाला सहायक हमें निर्देश देता – इस सर्किट बोर्ड में जो एसी126 ट्रांजिस्टर लगा है उसके कलेक्टर में एक 2.5 माइक्रो फैराड का कैपेसिटर लगाना पड़ेगा और एमिटर में 100 ओम का रजिस्टर, तब उसको सही बायस मिलेगा. जो लोग अखबारों की हालिया हिंग्लिश होती भाषा पर हल्ला मचाते हैं, उन्हें यह जानना चाहिए, कि मामला अभी का नहीं है, बल्कि तीस साल पहले का, नहीं, नहीं, यह तो दो सौ साल पहले का है!

आप ठेठ हिंदी भाषी हों, अंग्रेज़ी की एबीसीडी नहीं जानते हों, मगर यदि आपने किसी विज्ञान/चिकित्सा या अभियांत्रिकी महाविद्यालय में प्रवेश लिया, तो न केवल पढ़ाई अंग्रेज़ी में करनी होगी, बल्कि अंग्रेज़ी में परीक्षा भी देनी होगी (यह स्थिति अधिकांश हिंदी राज्यों में आज भी है). यह तो हमारे जैसे लोगों के लिए दोहरी मार वाली स्थिति थी. पहले अपनी अंग्रेज़ी सुधारो, अंग्रेज़ी पढ़ने समझने लायक तैयार होओ, फिर अंग्रेज़ी में पढ़ाई करो, और अंग्रेज़ी में परीक्षा दो. ग़नीमत यह थी कि तकनीकी की पढ़ाई अंग्रेज़ी भाषा में थी जरूर, मगर क्लिष्ट नहीं थी, और आमतौर पर अंग्रेज़ी के गलत-सलत वाक्य-विन्यास तथा व्याकरण दोषों को आमतौर पर अनदेखा कर दिया जाता था, यदि हम उत्तर पुस्तिकाओं में अपनी बात तकनीकी तौर पर सही-सही बताने में कामयाब हो जाते थे. उत्तर लिखते समय दिमाग में तब सोचते हिंदी में थे, उसका तर्जुमा मन ही मन अंग्रेज़ी में करते थे, और फिर उसे लिखते थे. आज भी यही स्थिति है – यदि कहीं पूरा अंग्रेज़ी में बोलने या लिखने कहा जाए तो मानसिक प्रक्रिया यही होती है.

ठीक इसी प्रकार, कंप्यूटरों के स्थानीयकरण में तो ख़ैर, हिंग्लिश अपने पूरे ठसके से मौजूद रही है क्योंकि बहुत से अंग्रेज़ी शब्दों का प्रचलित और सरल हिंदी शब्द मौजूद ही नहीं था, तो कहीं और कोई चारा ही नहीं था. जरा ये स्क्रीनशॉट देखें –

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हिंदी ने हिंग्लिश का यह नया रूप कैसे धरा?

भारतेंदु हरिश्चंद्र की नई हिंदी

भाषा-विज्ञान के आचार्यों ने भाषाओं की विभिन्नता में एकता ढूंढ कर उनका पारिवारिक वर्गीकरण किया है. इस वर्गीकरण के अनुसार, संस्कृत, प्राचीन फ़ारसी, प्राचीन ग्रीक तथा लैटिन आदि एक ही – भारतीय-योरोपीय (या भारोपीय) परिवार की भाषाएँ हैं. इस लिहाज से लैटिन से बनी अंग्रेज़ी तथा संस्कृत से निकली हिंदी वस्तुतः एक ही परिवार की भाषा मानी जाएगी. अब भले ही इन दोनों भाषाओं की लिपि व वाक्य विन्यास में जमीन आसमान का अंतर हो. भाषा परिवर्तनशील होती है. देश-काल और परिस्थिति के अनुसार भाषा में परिवर्तन होता है. शब्दों के अर्थ में परिवर्तन होता है, उपयोग में परिवर्तन होता है. पहले साहसिक शब्द डाकू के अर्थ में प्रयुक्त होता था पर अब वह उत्साही और साहसी के रूप में होता है. भाषा कठिनता की अपेक्षा सरलता का वरण करती है. मनुष्य का स्वभाव है कि वह प्रचलित और सरल से सरल शब्दों का उपयोग करना चाहता है. कालांतर में देवेन्द्र देव और विजयेन्द्र विजय बन जाते हैं. भाषा सामाजिक वस्तु है और वह समाज में विकसित और परिष्कृत होती है. भाषा का कोई रूप अन्तिम नहीं होता. भाषा लगातार समृद्ध होती रहती है. जब से मनुष्य का जन्म हुआ है, तभी से भाषा का प्रवाह भी निरन्तर चला आ रहा है. हिन्दी के बारे में कहा जाता है कि वह खड़ी बोली नाम की उत्तर-भारतीय भाषा का एक परिष्कृत रूप है. भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय से आधुनिक समकालीन हिंदी का स्वरूप बनना प्रारंभ हुआ. भारतेंदु ने एक लेख में लिखा लिखा था – हिन्दी नई चाल में ढली – सन् 1873 ई. भारतेंदु की हिंदी वह हिंदी नहीं थी जो कोई पचास साल पहले थी.

सूरति मिश्र के हिंदी में लिखे बैताल पच्चीसी की प्रतिलिपि सन् १८२६ में मुनुवा पंडित ने की थी। उसकी एक कहानी का एक वाक्यांश कुछ तरह का है –

''बैताल बोला ए राजा मैं तेरा धीरज और साहस देखकर अति प्रसन्न हुआ परंतु एक बात मैं कहता हूँ सो सुन कि जिसके शरीर के रोम कांटों के समान और देह काठ सी और नाम शांतशील सो तुम्हारे नगर में आया है सो तुमको उसने मेरे लेने के लिए पठाया है ।

कोई तीस साल बाद यही हिंदी थोड़ी और परिष्कृत हो गई. लल्लू लाल की बैताल पचीसी (लंदन संस्करण, १८५७) में यह अंश इस प्रकार है,

''फिर बैताल खुश हो बोला कि ऐ राजा! मैं तेरा धीरज और साहस देख अति प्रसन्न हुआ पर एक बात मैं तुझसे कहता हूं, सो तू सुन; कि जिसके शरीर के रोम समान कांटों के, और देह काठ-सी, और नाम शांतशील, सो तेरे नगर में आया है और तुझे उनने मेरे लाने को भेजा है' ।

यही अंश अगर रवि रतलामी 2015 में लिखता तो?

यह कुछ इस तरह होता –

“फिर बैताल ने प्रसन्नता से कहा – ओ! किंग, आपके एंड्यूरेंस और ब्रेवरी को देख कर दिल खुश हो गया, परंतु मेरी बात सुनो. थॉर्नी बॉडी हेयर तथा वुडन बॉडी वाले शांतशील ने मुझे आपको उठा लाने का आर्डर दिया है।”

मुझे इस तरह लिखना ही होगा, नहीं तो लोग फिर मुझसे अर्थ पूछेंगे कि भाई, आखिर लिखा क्या है? यदि मैं आपसे आपकी चलित वार्ता का क्रमांक पूछूं तो आप क्या उत्तर देंगे? बहुत संभव है, यह कहें – कि भाई, हिंदी में कहो न कि मोबाइल नंबर क्या है!

सवाल यह है कि अंग्रेज़ी शब्दों ने हिंदी में घुसपैठ कब शुरू की? विज्ञान और तकनालॉज़ी के क्षेत्र को, जहाँ अंग्रेज़ी शब्दों का उपयोग करना अनिवार्यता थी, को छोड़ भी दें, तो रोजमर्रा, बोलचाल अखबारी लेखन और यहाँ तक कि शुद्ध साहित्य में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रचलन, वह भी “हिंदी के हिंग्लिश होने की तादाद तक” कैसे आया?

भारत में अंग्रेज़ी – अभिजात्य वर्ग की भाषा या विदेशी भाषा की गुलामी

भारत में अंग्रेज़ों के राज के साथ-साथ एक और साम्राज्य स्थापित हो गया था. अंग्रेज़ी का साम्राज्य. और, अंग्रेज़ी का साम्राज्य ऐसा स्थापित हुआ कि स्लैंग बन गया – अँग्रेज़ चले गए, अपनी औलादें (अंग्रेज़ी भाषी) छोड़ गए. महात्मा गांधी भी भारत में अंगेज़ी के फैल रहे साम्राज्य से व्यथित थे. उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में दिए अपने व्याख्यान में कहा था –

“अंग्रेज़ों को हम गालियां देते हैं कि उन्होंने हिन्दुस्तान को गुलाम बना रखा है, लेकिन अंग्रेज़ी के तो हम खुद ही गुलाम बन गए हैं. अंग्रेज़ों ने हिन्दुस्तान को काफी पामाल किया है. इसके लिए मैंने उनकी कड़ी से कड़ी टीका भी की है. परंतु अंग्रेज़ी की अपनी इस गुलामी के लिए मैं उन्हें जिम्मेदार नहीं समझता. खुद अंग्रेज़ी सीखने और अपने बच्चों को अंग्रेज़ी सिखाने के लिय़े हम कितनी-कितनी मेहनत करते हैं? अगर कोई हमें यह कहता है कि हम अग्रेज़ों की तरह अंग्रेज़ी बोल लेते हैं तो हम मारे खुशी के फूले नहीं समाते. इससे बढ़कर दयनीय गुलामी और क्या हो सकती है? ... कोई दूसरी जगह होती तो शायद यह सब बर्दाश्त कर लिया जाता, मगर यह तो हिन्दू विश्वविद्यालय है. .... रास्ते में विश्वविद्यालय का विशाल प्रवेश द्वार पड़ा. उस पर नजर गयी तो देखा – नागरी लिपि में “हिन्दू विश्वविद्यालय” इतने छोटे हरफों में लिखा है कि ऐनक लगाने पर भी वे पढ़े नहीं जाते. पर अंग्रेज़ी में बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी ने तीन चौथाई से ज्यादा जगह घेर रखी थी. मैं हैरान हुआ कि यह क्या मामला है?...”

बापू, आज मामला, इतना हैरानी भरा है कि अब अंग्रेज़ी रोमन लिपि से उतर कर नागरी लिपि पर सवार हो गई है और हिंग्लिश रूप धर चुकी है.

हिंग्लिश का इतिहास और आरंभिक रूप

सूचना प्रौद्योगिकी और संचार क्रांति ने हिंग्लिश को भले ही हवा दी हो और स्थापित किया हो, मगर हिंग्लिश के पाँव सिनेमा और विज्ञापन के जरिए जमे. चटनीफाइंग इंग्लिश में हिंग्लिश के इतिहास के बारे में बताते हुए हवाला दिया गया है कि 1887 में अयोध्या प्रसाद खत्री ने अपनी ग़ज़ल में हिंग्लिश का प्रयोग किया –

रेंट लॉ का ग़म करें या बिल ऑफ़ इनकम टैक्स का?

क्या करें अपना नहीं है सेंस राइट नाऊ ए डेज़,

... डार्कनेस छाया हुआ है हिंद में चारों तरफ़

नाम की भी है नहीं बाकी ना लाइट नाउ ए डेज़.

वैसे, इस तरह के उदाहरण “आइसोलेटेड” किस्म के ही हैं, और आमतौर पर सामान्य आचार व्यवहार तथा साहित्य व अखबारों में हिंदी एक तरह से पवित्र ही बनी रही और टेक्निकल शब्दों के अलावा, अन्य बाकी चीजें हिंदी में ही प्रयोग में ली जाती रहीं.

मेरे अपने स्मरण के अनुसार, हिंग्लिश के सर्वत्र पहले पहल प्रयोग की याद में एक विज्ञापन प्रकट होता है. नब्बे दशक की शुरुआत में जब भारत में केबल टेलिविजन क्रांति हो रही थी, तब विज्ञापन जगत में भी क्रांति हो रही थी. टेलिविजन के विज्ञापन बाजार को आंदोलित करते थे और नया बाजार बनाते थे. विज्ञापनों के कॉपी राइटर नई/पुरानी चीज़ों के बारे में नए अंदाज में बताते थे. सर्फ और निरमा के साम्राज्य को तोड़ने के लिए एरियल का “माइक्रोसिस्टम” आया. जाहिर है, माइक्रोसिस्टम हिंदी में भी माइक्रोसिस्टम था. पर, इससे भी बढ़कर एक शीतल पेय का विज्ञापन आया. उसका टैग लाइन था – ये दिल मांगे मोर.

मोर – जंगल में मोर नाचा वाला नहीं था. वह और वाला मोर था. ये दिल मांगे और की जगह मोर ने ले ली. और क्या खूब ली. यह टैग लाइन कुछ इस तरह लोगों की जुबान चढ़ा कि लोगों का तकिया कलाम बन गया. अभी भी बहुधा प्रयोग में लिया जाता है. ठंडा ठंडा कूल कूल भी उसी दौरान आया और लोगों की जुबान पर चढ़ा.

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हीरो होंडा का लोकप्रिय विज्ञापन – हिंग्लिश में.

इससे पहले, जब उस जमाने की बेहद लोकप्रिय अंग्रेज़ी समाचार पत्रिका इंडिया टुडे ने अपना हिंदी संस्करण निकाला तो उसका ट्रांसलिट्रेटेड नाम ही रखा – “इंडिया टुडे”. हिंग्लिश नामों की स्वीकार्यता उसी समय स्थापित हो गई जब लोगों ने इस पत्रिका को हाथों हाथ लिया. उस समय प्रतिस्पर्धा में हिंदी समाचार पत्रिका माया थी, जिसका वर्चस्व था, और जिसने इंडिया टुडे हिंग्लिश नाम की बड़ी खिल्ली उडाई, मगर लोगों ने नोटिस नहीं लिया. माया अब बंद है, और इंडिया टुडे आज भी सर्कुलेशन में है. वैसे, मजेदार बात यह है कि नाम के अतिरिक्त, सामग्री परोसने में इंडिया टुडे में हिंग्लिश का तड़का आमतौर पर नगण्य ही रहता है.

इधर कुछ समय से अंग्रेज़ी अखबारों के शीर्षक हिंग्लिश या कि रोहिंदी (रोमन हिंदी) से सजने लगे हैं. एक उदाहरण नीचे है –

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अमूल का लोकप्रिय कार्टून-विज्ञापन सीरीज तो हिंदी – अंग्रेज़ी का पूरी तरह फेंट कर मक्खन निकाल कर ही परोसता रहा है. इसका ताजातरीन विज्ञापन (संदर्भ छोटा राजन की गिरफ्तारी का समाचार) देखें –

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ऐसा पंचलाइन हिंग्लिश में ही संभव है.

इंडियन एक्सप्रेस में एक रोहिंदी विज्ञापन –

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यह है टाइम्स ऑफ़ इंडिया में 2005 में छपा विज्ञापन –

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और, रोहिंदी या (देवइंग्लिश?) इतनी ख़ूबसूरत तो कभी नहीं रही –

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बहुत पहले, एक मोबाइल फ़ीचर फ़ोन ने पहले पहल हिंग्लिश कीबोर्ड का विज्ञापन कुछ यूँ दिया था –

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तब, स्मार्टफ़ोनों पर देवनागरी दिखती नहीं थी, और हिंग्लिश का अर्थ था रोमन में हिंदी! यानी – रोहिंदी.

और, भारत में हिंदी ही हिंग्लिश नहीं हो रही, बल्कि इंग्लिश भी इंडिश बन रही है –

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रीडर्स डाइजेस्ट के संपादक बता रहे हैं कि भारत में अंग्रेज़ी बदल रही है और उसका रूप इंडिश या भांग्रेज़ी होता जा रहा है – डोंट एंग्री मी – इसका सटीक उदाहरण है.

हिंदी साहित्य और अख़बारों में हिंग्लिश

कई बड़े अखबारों में संपादक रहे शंभूनाथ शुक्ल अपने संस्मरण में हिंग्लिश के प्रथम प्रयोग के बारे में अपने मजेदार अनुभव यूं बताते हैं –

“भाषा को युवा ही बढ़ा पाते हैं। युवाओं ने अपनी पढ़ाई के लिए भले अंग्रेजी माध्यम को चुना हो मगर तमाम दबावों के बीच भी वे हिंदी को ही अपनी बातचीत का माध्यम बनाए रहे। इसके अलावा हिंदी में अन्य भाषाओं के शब्द इतने सहज तरीके से प्रवेश पा गए कि आज लगता ही नहीं कि अंग्रेजी के तमाम शब्द हमारी मातृभाषा के शब्द नहीं हैं। जिंगल्स और हिंग्लिश के बढ़ते चलन ने भी हिंदी का बाजार बढ़ाया। आज मजबूरी यह है कि हिंदी हार्टलैंड के लगभग सारे अखबार अब शीर्षक तक में अंग्रेजी या अन्य भाषाओं के शब्द लिखने में हिचक नहीं दिखाते। मुझे याद है कि एक बार जब मैं अमर उजाला के कानपुर संस्करण का स्थानीय संपादक था तब लीड में ‘चक दित्ता इंडिया!’ लिखने पर कितना हंगामा मच गया था। मुझे अखबार के मुख्यालय से फोन आए और अखबार के प्रबंध निदेशक ने भी पूछा कि शुक्ला जी आपको यह शीर्षक अटपटा नहीं लगता। मैंने दृढ़तापूर्वक कहा नहीं मुझे यह बाजार का सबसे प्रचलित शब्द लगता है। तब मेरी बात को न चाहते हुए लोगों ने गले उतारा। मगर आज ऐसा शब्द किसी को भी अटपटा नहीं लगेगा। आज महानगरों में ही नहीं छोटे शहरों से निकलने वाले अखबार भी ऐसे शब्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। भाषा अपने तत्सम रूप से नहीं बल्कि पारस्परिक बोलचाल में अपने इस्तेमाल से मजबूत होती है। और हिंदी आज बाजार की सबसे सक्षम भाषा है।“

साहित्यकार सूर्यकांत नागर ने अपने संस्मरण “सरे राह चलते चलते” में लिखा है –

“शकुन (पत्नी) के साहस और क्रांतिकारी सोच का आभास होने लगा था... बेटी को भी उसने मम्मी डैडी कहना सिखाया था. यह कोई गौरव की बात नहीं थी, लेकिन आधी सदी पूर्व जब निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों में संतान को मां, पिताजी, बाबूजी कहना सिखाया जाता था, पुराणपंथी सासुजी के समक्ष तब बेटी को डैडी-मम्मी कहना सिखाना बड़ी बात थी.”

परंतु अब यह बड़ी बात नहीं है. भारत के अधिकांश घरों में हिंग्लिश का पदार्पण “मम्मी डैडी” से ही होता है और नित्य फलता फूलता रहता है. और, वैसे भी, जब भारत का एक स्थापित हिंदी साहित्यकार हिंग्लिश मम्मी डैडी को कृपा पूर्वक, गर्व पूर्वक अपनाता है, तो फिर भारतीय जनता क्यों पीछे रहे?

अखबारों में हिंग्लिश का प्रचलन हाल ही के वर्षों में तेज़ी से हुआ है. हालात यह हैं कि समाचारों-आलेखों में चालीस-पचास प्रतिशत अंग्रेज़ी के शब्द लिए जा रहे हैं. कहीं कहीं तो केवल क्रिया आदि ही हिंदी के हैं, बाकी सारे शब्द अंग्रेज़ी के.

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जब इस तरह का पहला प्रयोग नई दुनिया इंदौर के युवा-केंद्रित पृष्ठों पर होने लगा तो रतलाम के पत्रकार-ब्लॉगर विष्णु बैरागी ने कड़ी आपत्ति दर्ज करवाई और संपादक के साथ साथ अपने ब्लॉग पर यह लिखा कि संवाददाता ने “मातृ भाषा हिंदी पर बलात्कार किया है”. विवाद इतना बढ़ा कि मामला लीगल नोटिस तक जा पहुँचा और विष्णु बैरागी को वह पोस्ट क्षमापूर्वक हटानी पड़ी. दरअसल, युवा संवाददाता गायत्री शर्मा को संपादकीय सलाह मिली थी कि वो अपने लेखों में चालीस प्रतिशत अंग्रेज़ी के शब्द इस्तेमाल करे ताकि युवाओं को लुभाया जा सके और इस तरह अख़बार का सर्कुलेशन बढ़ाया जा सके. इस विवाद में मैं भी पड़ा था और मैंने अपनी टीप दी थी –

मगर, मैं अरविन्द कुमार (हिन्दी थिसॉरस)के विचारों का समर्थन करता हूँ कि भाषा तो बहती हुई नदी की तरह होती है जो भू-भाग के ऊँच-नीच और मौसम के लिहाज से रूप बदलती रहती है. तो, इस तरह से मैं भी पूर्ण शुद्धतावादी नहीं हूँ. अख़बारों में अख़बारी, व्यवहारिक भाषा का चलन आपत्तिजनक नहीं है, अन्यथा अखबारों का रूप गूढ़ साहित्यिक होने में देर नहीं लगेगी...

प्रत्युत्तर में विष्णु बैरागी ने लिखा था –

शुघ्‍दतावादी तो मैं भी नहीं हँ और आपके जरिए अरविन्‍दकुमारजी से सहमत हँ। किन्‍तु ऐसी बातें शायद कहने/सुनने/लिखने में ही अच्‍छी लगती हैं। इसी तर्क के आधार पर यह कोई नहीं बताता कि सम्‍पादकीय अग्रलेखों और सम्‍पादकीय पृष्‍ठ पर प्रकाशित होनेवाले लेखों में यह 'बोलचाल की भाषा' अनुपस्थित क्‍यों रहती है। आप पाऍंगे कि बोलचाल की यह भाषा केवल समाचारों में ही प्रयुक्‍त होती है, आलेखों में नहीं।

विष्णु बैरागी का यह सूक्ष्म अवलोकन गौर करने लायक है. अखबारों में आप पाएंगे कि हिंग्लिश नुमा भाषा अकसर समाचारों या फिर युवा केंद्रित पन्नों पर ही मिलेगी. संपादकीय पन्नों में अभी भी शुद्ध हिंदी का साम्राज्य है. वहाँ न तो अखबारी हिंदी है और न ही हिंग्लिश. आप इसे अखबारों का दोगलापन भी कह सकते हैं, और एक्सपेरीमेंटेशन भी.

नब्बे के आखिरी दशक और दो हजार के शुरूआती वर्षों में हिंग्लिश ने अपने पैर पसारने प्रारंभ कर दिए. एक तो मशरूम की तरह उग आए अंग्रेज़ी स्कूलों ने, बरसाती नालों की तरह उफन आए तकनीकी (इंजीनियरी, कंप्यूटरी और प्रबंधन) महाविद्यालयों ने आग में घी डालने का काम किया. जनता जब हिंदी से किनारा करने लगी तो आसपास की दुनिया भी इस ओर हो ली. पूर्वी दिल्ली से एक समाचार पत्र निकला – हैलो ईस्ट. यहाँ तो हिंग्लिश अपने पराकाष्ठा में मौजूद थी – पूरे अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप में. हैलो East. अब ये मत पूछें कि सामग्री कैसी रहती थी – रोमन में या नागरी में!

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बाद में इस नायाब हिंग्लिशिया विचार को तमाम अखबारों ने अपनाया. भारत के सर्वाधिक बिकने वाले हिंदी अखबारों में से एक दैनिक भास्कर का 4 पृष्ठीय पुलआउट सिटी भास्कर कहलाता है. नहीं, वह City भास्कर कहलाता है. वास्तविक अंतर्राष्ट्रीय भाषा. यह न हिंदी है न अंग्रेज़ी, और न ही हिंग्लिश. यह तो एक अलग तरह की अंतर्राष्ट्रीय भाषा है – जिसमें abcd भी है और कखगघ भी.

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दैनिक भास्कर का रविवारी – सॉरी, Sunday संस्करण!

हिंग्लिश जब अपने उफनती शुरुआती दौर में अखबारों आदि में पैर जमा रही थी तब लोगों ने इस पर खूब तंज कसे, व्यंग्य मारे. मगर हिंग्लिश की बयार बहती ही रही और बहार बढ़ती ही गई. उस समय इन्द्र अवस्थी ने हिंग्लिश के बारे में अपने एक ब्लॉग पोस्ट (http://theluwa.blogspot.in/2004/12/blog-post.html) में यह व्यंग्य लिखा –

“इनविटेशन - आइये, अपनी नेशनल लैंगुएज को रिच बनायें

जस्ट अभी ब्रेकफास्ट फिनिश करके उठे थे. थोड़ा हेडेक था, प्राबेबली ओवरस्लीपिंग इसका रीजन था.

एक फ्रेंड का फोन आ गया, काफी इंटिमेट हैं, लेकिन अपने को टोटल अमेरिकन समझते हैं. पूरे टाइम इंगलिश में कनवरसेशन! अरे अपनी भी तो कांस्टिट्यूशन में रिकग्नाइज़्ड एक नेशनल लैंगुएज है. लेकिन एजुकेटेड होने का यही प्राब्लम है, स्टेटस सिंबल की बात हो जाती है. ब्रिटिश लोग तो चले गये बैग एंड बैगेज, स्लेव मेंटालिटी यहीं छोड़ गये.

इन मैटर्स में हम भी बहुत स्ट्रेटफारवर्ड है. हम कांटीन्युअसली अपनी मदर टंग में बोलते रहे. भई, हम तो इरिटेट हो जाते हैं इस काइंड के लोगों से.

अभी एक कमर्शियल वाच कर रहे थे बासमती राइस के बारे में जिसमें किट्टू गिडवानी अपनी डाटर से कहती है - 'होल्ड इट सीधा. इफ यू वांट टू डू इट प्रापरली, योर प्रेपरेशन हैज टू बी बिलकुल पक्का.' कैसी लंगड़ी लैंगुएज है ये! लोग प्राउडली इसे हिंगलिश बताते हैं. कितना रिडिक्युलस फील होता है जब कोई अपना फैमिली मेम्बर ही ऐसे बोलता है.

अरे ऐड को ऐसे भी प्रेजेन्ट कर सकते थे - 'इसको स्ट्रेट होल्ड करो, प्रापरली करने के लिये प्रेपरेशन बिलकुल सालिड होनी चाहिये.'

इसे कहते हैं 'मैकूलाल चले माइकल बनने'.

अब देखिये न, जैसे पंकज बहुत ही करेक्ट लिखते हैं कि अपनी लैंगुएज में टाक करना आलमोस्ट अपनी मदर से टाक करने के जैसा है. कितना अच्छा थाट है! यही होता है कल्चर या क्या कहते हैं उसको- संस्कार (अब इसके लिये कोई प्रापर इंगलिश वर्ड ही नहीं है, यही तो प्रूव करती है अपने कल्चर की रिचनेस ) ....”

कितनी नैचुरल हिंग्लिश है, है न?

इंटरनेटी हिंदी – हिंग्लिश, रोहिंदी या हिंडिश?

मोबाइल और कंप्यूटिंग टेक्नोलॉज़ी ने भाषाई दीवारों को ढहाने में ग़ज़ब का काम किया है. आप किसी का भी – जी हाँ, किसी भी हिंदी भाषी व्यक्ति का मोबाइल उठाकर उसके संदेश बक्से में, वाट्सएप्प वार्तालाप श्रृंखला में झांक लें. आपको ऐसे एसएमएस मिलेंगे जो न केवल मिली जुली भाषा, बल्कि रोमन हिंदी और देवनागरी अंग्रेजी >> कृपया ध्यान दें, रोमन हिंदी और देवनागरी अंग्रेज़ी << में लिखे होंगे. यूँ रोमन हिंदी को पढ़ने में कठिनाई होती है और कभी कभार अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है, मगर मोबाइलों में हिंदी लिखने की अंतर्निर्मित सुविधा न होने पर भी लोग धड़ल्ले से रोमन लिपि में हिंदी में संदेशों का बखूबी आदान प्रदान कर रहे हैं. इधर अपने अखबारों के पन्ने तो देवनागरी अंग्रेज़ी की मिसाल बनते जा रहे हैं. बहुत से मोबाइलों में हिंदी (देवनागरी लिपि) में लिखने की सुविधा तो मिलती है, परंतु यह बाई डिफ़ॉल्ट अभी भी नहीं मिलता और हिंदी माने देवनागरी लिखने में लोगों को जरा ज्यादा ही समस्या होती है.

पुराने मोबाइलों में सीमित भौतिक कुंजी से समस्या और विकट रहती थी, और साथ ही एनकोडिंग के भ्रष्ट हो जाने से हिंदी के कचरा हो जाने की समस्या भी. आधुनिक टेक्नोलॉज़ी से समृद्ध स्मार्टफ़ोनों ने आज हिंदी लिखने पढ़ने में होने वाली समस्याओं से निजात तो दिला दी है, मगर उस रफ़्तार से हिंदी का उपयोगकर्ता आगे नहीं बढ़ा है और स्थिति ये है कि गर्व से तमाम उच्चस्तरीय स्मार्टफ़ोन लहराने वाले लोग भी अपने स्मार्ट मोबाइल उपकरणों में भी लोगबाग देवनागरी में हिंदी पढ़ने-लिखने में कोताही करते मिल जाते हैं. क्या आप जानते हैं कि आजकल भारत में मिलने वाले अधिकांशतः मोबाइल फ़ोनों का इंटरफ़ेस अब हिंदी में उपलब्ध हो गया है. और क्या आपने अपने मोबाइल का इंटरफ़ेस डिफ़ॉल्ट अंग्रेजी से बदल कर हिंदी में कर लिया है? बहुत संभव है – नहीं!.

इंटरनेट पर यूनिकोड हिंदी आने के पहले एक तरह से रोमन हिंदी का ही साम्राज्य चलता था. स्थिति तेजी से बदली है और अब तो कम्प्यूटर पर हिंदी (यूनिकोड देवनागरी) टाइप करने के तमाम किस्म के अनगिनत आसान औजारों से इंटरनेट पर हिंदी प्रयोक्ताओं का एक तरह से महाविस्फोट हो गया है. इसमें डिजिटल इंडिया मिशन के तहत नित्य विस्तार ले रही विशाल हिंदी भाषी प्रयोगकर्ताओं का बहुत बड़ा हाथ है. इंटरनेट पर हिंदी पृष्ठों की संख्या अंग्रेज़ी व चीनी के बाद तीसरे नंबर पर जल्द ही पहुँच जाएगी. इंटरनेट पर हिंदी पृष्ठों में खासा इज़ाफ़ा ब्लॉगों, फ़ेसबुक, ओरकुट जैसे सोशल नेटवर्किंग साइटों के हिंदी प्रयोक्ताओं के कारण हो रहा है. इन साइटों के प्रयोक्ता दिन दूनी रात चौगुनी के दर से बढ़ रहे हैं और सामग्री दिन चौगुनी रात नौगुनी की दर से. इंटरनेट से जुड़ा हर व्यक्ति अपनी बात, अपने विचार, अपना सृजन सबके के सामने रखना चाह रहा है. प्रश्न उठता है कि उसकी हिंदी कैसी है? हिंदी इन नए माध्‍यमों के आने से क्या कुछ बदल रही है और इन माध्‍यमों का हिंदी भाषा, शैली आदि पर क्‍या कोई प्रभाव पड़ रहा है?

इंटरनेट पर अपने तरह के अनगिनत ‘हंस के अभिनव ओझा’ अवतरित हो गए हैं जो गाहे-बगाहे, ठहरते-विचरते लोगों की भाषा, व्याकरण और वर्तनी की ग़लतियों की ओर इंगित करते रहते हैं. यहाँ फर्क यह है कि मामला एकतरफा नहीं होता. हाल ही में तकनीकी हिंदी फोरम में शब्दकोश के ‘कोश’ या ‘कोष?’ को लेकर लंबी बहस छिड़ी जो हफ़्तों जारी रही और जब इस सिलसिले में हिंदी भाषा के इतिहास के पन्ने खुले तो तथाकथित बड़े साहित्यकारों समेत ऐसे ओझाओं के तथाकथित ज्ञान की परतें भी खुल गईं.

इंटरनेट में एक ओर भाषा में परिशुद्धता के पैरोकारों की कमी नहीं है तो वहीं दूसरी ओर मस्त-मौला चाल में अपनी भाषा, अपनी वर्तनी और अपने स्टाइल में लिखने वालों की भी कमी नहीं है. आपकी परिशुद्ध भाषा जाए भाड़ में हमारी तो अपनी शैली, अपनी भाषा के तर्ज पर. वैसे भी, जब आप ट्रांसलिट्रेशन जैसे औजारों की सहायता से लिख रहे हों तो ‘कि’ और ‘की’ में फर्क को पाठकों पर ही क्यों न छोड़ दें! बात यहीं तक थी तब तक भी ठीक-ठाक था. प्रयोगवादी तो लिपि का भी अंतर्राष्ट्रीयकरण कर रहे हैं – यानी तुक भिड़ानी हो तो धड़ल्ले से रोमन लिपि का प्रयोग. आपको ये बात भले ही ऊटपटांग लगे, मगर ऐसे ही एक प्रयोगवादी कवि राहुल उपाध्याय की ‘इंटरनेशनल हिंदी’ में ये ग़ज़ल देखिए जो उन्होंने अपने ब्लॉग पर छापी है –

21 वीं सदी

डूबते को तिनका नहीं 'lifeguard' चाहिये

'graduate' को नौकरी ही नहीं 'green card' चाहिये

खुशियाँ मिलती थी कभी शाबाशी से

हर किसी को अब 'monetary reward' चाहिये

जो करते हैं दावा हमारी हिफ़ाज़त का

उन्हें अपनी ही हिफ़ाज़त के लिये 'bodyguard' चाहिये

घर बसाना इतना आसान नहीं इन दिनों

कलेजा पत्थर का और हाथ में 'credit card' चाहिये

'blog, email' और 'groups' के ज़माने में

भुला दिये गये हैं वो जिन्हें सिर्फ़ 'postcard' चाहिये

एक और उम्दा उदाहरण – अभिषेक ओझा ने अपने ब्लॉग पर एक गणितीय प्रेमपत्र पोस्ट किया, जो उस समय बहुत वायरल हो चला था. प्रेमपत्र का एक हिस्सा आप भी पढ़ें –

“...अभिषेक ओझा का गणितीय प्रेमपत्र :

मेरा प्यार अगर कॉम्प्लेक्स है... तो इसमें इमाजीनरी पार्ट ज्यादा है ! अगर फंक्शन है तो अनबाउंडेड इंक्रीजिंग... सेट है तो जूलिया सेट से ज्यादा खूबसूरत।

अगर खूबसूरती का प्लॉट बनाऊँ तो तुम आउटलायर हो...किसी ग्राफ में तुम नहीं आ सकती। 'खूबसूरत' शब्द तुम्हें पाकर धन्य है ! गणित खूबसूरत जैसे शब्दों को अनडिफ़ाइंड कहता है... मैं कहता हूँ तुम मेरे लिए सुंदरता की परिभाषा हो ! मेरे लिए अगर ब्रह्मांड में ओयलर की आइडेंटिटी से ज्यादा खूबसूरत कुछ है तो वो बस तुम ही हो। सौंदर्यनुपात फिबोनाकी से क्या परिभाषित होगा? अगर तुम उस अनुपात में नहीं हो तो प्रकृति के अनुपातों को वैसे ही फिर से परिभाषित होना पड़ेगा जैसे क्वान्टम फिजिक्स से क्लासिकल।

(http://uwaach.aojha.in/2011/12/blog-post.html)

यहाँ लेखक ने अपने प्रेमपत्र में जो उपमाएं दी हैं, वे खूबसूरत गणितीय श्रृंखलाएं अथवा सूत्र हैं, साथ ही उनके विकिपीडिया लिंक भी हैं ताकि उन गणितीय सूत्रों को जरूरत के समय समझा जा सके कि लेखक इन उपमाओं से आखिर अपने प्रेम को किस तरीके से व्यक्त कर रहा है.

अब एक नजर मारते हैं हिंदी के एक बेहद लोकप्रिय फ़ेसबुकिए की पोस्ट की भाषा की ओर –

फ़ेसबुकिया भाषा में नई विधा की फ़ेसबुकी कहानी (लप्रेक की तर्ज पर?) का एक हिस्सा -

सारनाथ एक्सप्रेस में नवाज़उद्दीन की फिल्म

पिछले हफ्ते किसी काम से भोपाल गया था। पहुंचा ही था की खबर मिली की माँ बीमार है और अस्पताल में भर्ती है। सो सब काम छोड़ कर बनारस जाना पडा। जो भी पहली ट्रेन मिली पकड़ ली। southern express पकड़ के झांसी तक आया। वहाँ से रात तीन बजे संपर्क क्रांति मिली जिसने सुबह दस बजे मानिक पुर उतार दिया। दस मिनट बाद ही दुर्ग छपरा सारनाथ एक्सप्रेस आ गयी। उसमे स्लीपर क्लास में दरवाज़े के साथ जो एक अकेली सीट होती है TTE वाली , उस पे बैठ गया। सारनाथ एक्सप्रेस में PANTRY CAR नहीं होती। मानिक पुर की कैंटीन से खाना चढ़ता है। सो एक पैंट्री कर्मी वहाँ से सवार हुआ और उसने दरवाज़ा बंद कर वहीं सामने ज़मीन पे 30 - 40 प्लेट खाना रख दिया। ट्रेन चल पडी और वो अलग अलग डिब्बों में खाना , आर्डर के अनुसार पहुंचाने लगा। तभी वहाँ एक लड़का आया। उम्र रही होगी यही कोई तेरह चौदह साल। एक दम फटेहाल नहीं था। बहुत गंदा मैला कुचैला भी नहीं था। उसकी निगाह वहाँ रखे खाने की प्लेटों पे पडी। दो किस्म की प्लेटें थी। एक तो सामान्य थर्माकोल की प्लेट थी जिसपे silver foil चढ़ा था। उसके ऊपर कुछ hi fi किस्म की प्लेटें रखी थी। एकदम पारदर्शी। और उसमे रखा भोजन बड़ा आकर्षक था। दो तीन किस्म की सब्जी , परांठे ,पुलाव , रायता , सलाद……. और हाँ ……एक गुलाब जामुन भी था। ....

सामने रखा भोजन देख वो लड़का ठिठक गया।....

- अजित सिंह “करप्ट”

है न दमदार लेखनी? और, एक कोण से, लेखक का उपनाम भी दमदार है. बीच बीच में जो रोमन घुस रहा है वो शायद हिंदी टाइपिंग टूल के ट्रांसलिट्रेशन के ठीक से काम न कर पाने के कारण है, मगर इससे फ़ेसबुकी कहानी के भाषाई फ़्लो में कहीं कोई व्यवधान नहीं आ रहा है, और यह भेलपुरी में बीच-बीच में आ रहे अदरक के मजेदार स्वाद सा है.

तो, एक तरफ इंटरनेटी हिंदी में तमाम किस्म के भाषाई घालमेल बहुतायत में नजर आते हैं, वहीं दूसरी तरफ छिटपुट तौर पर भाषा प्रयोग के नए अनगढ़ शिल्प भी देखने को मिलते हैं. प्रमोद सिंह पठन-पाठन में थकने की बात कुछ इस नए, नायाब अंदाज में कह रहे हैं –

“...लल्‍ली बरसात का पानी में लेसराया साड़ी समेट रही थी, मने असमंजस था कि कड़ाही में चूड़ा भूज लें कि पाव भर पकौड़ी छान लें, उखड़े मन छनछनाई बोलीं, तुमलोक को सरम नहीं लगता कि इसके और उसके पीछे साहित्तिक अलता सजाते चलते हो? सोहर गाते हो तो अइसा जेमें दू आना के जलेबी जेतना भी मिठास नहीं है, और हमरे छिनके मन को अपने बभनई में उलझाते हो? हमरे बिस्‍वास को? हमरे मन के अंतरंग के अनुराग को?...”

ये एक ऐसी कौमार्य हिंदी है जिसमें आंचलिकता की छाप है, देसी मिट्टी की सुगंध है, नए शब्दों का छौंक है. जाहिर है इन सोशल नेटवर्किंग साइटों में एक ओर हिंदी का घोर इंटरनेशलाइजेशन हो रहा है तो दूसरी ओर हिंदी की आंचलिक भाषाओं को अपने पवित्र रूप में फलने फूलने और जमे रहने का सस्ता सुंदर और टिकाऊ वातावरण भी मिला है जहाँ अवधी भी है, मालवी भी है, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, हरियाणवी इत्यादि सभी हैं. और, यदि आप में क्रिएटिविटी हो तो इनमें घालमेल कर कोई नई सरसराती भाषा शैली भी ईजाद कर लें, और यकीन मानिए, आपके फालोअरों की कोई कमी भी नहीं होगी. इंटरनेट है ही ऐसा. सबके लिए स्पेस. वृहत्. अनंत. असीमित. यहाँ सब मिलेगा हिंदी भी, हिंग्लिश, रोहिंदी या हिंडिश भी!

पहली हिंग्लिश किताब

इसमें विवाद हो सकता है. परंतु मेरी पुख्ता जानकारी के मुताबिक इसका श्रेय दिव्य प्रकाश दुबे के हिंग्लिश कहानी संग्रह टर्म्स एंड कंडीशंस एप्लाई को दिया जा सकता है. दरअसल जब यह किताब प्रकाशित हुई तो अपनी हिंग्लिश भाषा के कारण यह शीघ्र ही बेस्टसैलर की सूची पर नजर आने लगी और कुछ दिनों तक तो यह इन्फ़ीबीम पर विक्रय आंकड़ों के लिहाज से शीर्ष पर भी बनी रही. इस किताब की समीक्षा में प्रशांत प्रियदर्शी लिखते हैं –

कहानियां साहित्यिक मामलों में कुछ भी नहीं है और बेहद साधारण है, मगर कहानियों की बुनावट और कसावट आपको किताब छोड़ने से पहले पूरा पढने को मजबूर कर दे.... मैं आपकी किताब से नए लोगों को पढ़ाना सिखा रहा हूँ. मेरे वैसे दोस्त जो कभी कोई किताब नहीं पढ़ते वे भी आपकी किताब बड़े चाव से पढ़े."
मैं यह बात अभी भी उतने ही पुख्ते तौर से कह रहा हूँ. अगर आप हिंदी पढना जानते हैं मगर कभी कोई किताब हिंदी की नहीं पढ़ी है तो यह आपके लिए पहला पायदान है..पहली सीढी... और दिव्य भाई, आपको यह जानकार और भी अधिक आश्चर्य होगा की आपकी पहली पुस्तक अभी मेरे एक कन्नड़ मित्र के पास है जो हिंदी बेहद हिचक-हिचक कर ही पढ़ पाती हैं. मगर थोड़ा पढने के बाद मुझे बोल चुकी हैं की यह तो मैं पूरा पढ़ कर ही वापस करुँगी, कम से कम दो महीने बाद...

इस किताब को दिव्य प्रकाश ने फुल हिंग्लिश में लिखा है. इस किताब की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि दिव्य प्रकाश को बैंगलोर टेडएक्स टॉक में हिंग्लिश में व्याख्यान देने आमंत्रित किया गया. अपने व्याख्यान में दिव्य प्रकाश कहते हैं –

“इस दुनिया में ‘शुद्ध हिन्दी जैसा’ कुछ भी exist नहीं करता है और न ही कभी करता था। यकीन मानिए ये हिन्दी की सबसे खराब नहीं बल्कि सबसे अच्छी बात है कि कि वो कभी भी pure नहीं रही, शुद्ध नहीं रही । मैं एक example देता हूँ आपको

मैं कमरे में गया मैंने कमीज़ उतार कुर्सी पर रख दी, खिड़की खोली टेलिविजन चला दिया आकाश की ओर देखा। छ भाषाएँ हैं इसमें, कमरा- इटालियन है, कमीज़ अरबी, कुर्सी पोर्टगीज़ से, टीवी इंग्लिश से, आकाश संस्कृत से और बाकी जो बचा वो है हिन्दी ! हिन्दी को ऐसे ही दिल की भाषा नहीं कहा जाता। हिन्दी का दिल इतना बड़ा है कि वो अपने घर में बाकी सभी भाषाओं को आराम से जगह दे देती है।

बंगलोरे मुंबई पुणे या दिल्ली में आप किसी चाय की टपरी पर जाकर कभी ऐसे ही बिना काम के खड़े हो जाओ तो वहाँ सुनोगे। एक frustrated employee दूसरे को बोल रहा होगा, अच्छा employee में frustrated silent होता है

क्या यार बॉस ने दिमाग का दही कर दिया, शाम को दारू पीकर दिमाग की battery रीचार्ज करनी पड़ेगी”

ये आज की हिन्दी है जो रोज़ जाने अनजाने में हम और आप बनाते हैं। कोई भी भाषा बना ही केवल वो सकता है जो उसका एक्सपेर्ट न हो। ....

मेरी किताब आने के बाद एक चीज सुनकर बड़ा अच्छा लगता है जब लोग बताते हैं कि मेरी किताब उनकी पहली हिंदी किताब है। लेकिन इससे भी अच्छा तब लगता है जब वही लोग किताब पढ़ने के बाद बोलते हैं-

हिंदी इज कूल यार, हिंदी की कुछ और किताबें बताओ।”

यहाँ दिव्य प्रकाश जिस कूल हिंदी की बात कर रहे हैं, वो दरअसल हिंग्लिश है.

हिंग्लिश इज़ कूल यार!

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This blog post is inspired by the blogging marathon hosted on IndiBlogger for the launch of the #Fantastico Zica from Tata Motors. You can apply for a test drive of the hatchback Zica today.

हिंदी में स्थानीयकरण (लोकलाइज़ेशन) की समस्याएँ

- रवि रतलामी

( रविशंकर श्रीवास्तव, 101, आदित्य एवेन्यू, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 )

हिन्दी कम्प्यूटर की पृष्ठभूमि

मैं पिछले पच्चीसेक वर्ष से हिन्दी साहित्य लेखन से जुड़ा हुआ हूँ हालांकि मैंने कोई धुआँधार नहीं लिखा है, न ही जाने- पहचाने लेखकों की श्रेणी में मेरा नाम है, मगर लेखन की यह यात्रा अमूमन अनवरत जारी है. यह तो सभी को पता है कि किसी भी रचना को प्रिंट मीडिया में प्रकाशित करवाने के लिए आपको पहले अच्छी हस्त- लिपि में लिख कर या टाइप करवा कर भेजना होता है. अब से कोई पच्चीस साल पहले, मैं इस कार्य को आसान बनाने के तरीकों को हमेशा ढूंढता रहता था.

जब मैं अस्सी दशक के उत्तरार्ध में पीसी एटी (33 मेगाहर्त्ज प्रोसेसर, 1 मेगाबाइट मेमोरी, 20 मेगा बाइट हार्ड डिस्क और 1.44 मेगाबाइट फ्लॉपी ड्राइव) पर डास आधारित हिन्दी शब्द संसाधक अक्षर' पर कार्य करने में सक्षम हुआ तो मैंने उस वक्त सोचा था कि यह तो किसी भी हिन्दी लेखक के लिए अंतिम, निर्णायक उपहार है. लिखना, लिखे को संपादित करना और जब चाहे उसकी प्रति छाप कर निकाल लेना - कितना आसान हो गया था.

उसके बाद, थोड़ा उन्नत किस्म का सीडेक का जिस्ट आया, जिसमें भारत की कई भाषाओं में कम्प्यूटर पर काम किया जा सकता था, जिसमें वर्तनी जांच आदि की सुविधाएँ थी. परंतु उसके उपयोग हेतु एक अलग से हार्डवेयर कार्ड लगाना होता था जो बहुत मंहगा था, और मेरे जैसे आम उपयोक्ताओं की पहुँच से बाहर था. शीघ्र ही विंडोज का पदार्पण हुआ और उसके साथ ही विंडोज आधारित तमाम तरह के अनुप्रयोगों में हिन्दी में काम करने के लिए ढेरों शार्टकट्‌स उपलब्ध हो गए और मेरे सहित तमाम लोग प्रसन्नतापूर्वक कम्प्यूटरों में हिन्दी में काम करने लगे.

इसी अवधि में मैंने विंडोज पर हिन्दी में काम करने के लिए उपलब्ध प्राय: सभी प्रकार के औजारों को आजमाया. मैंने मुफ्त उपलब्ध शुषा फ़ॉन्ट को आजमाया, परंतु उसमें हिन्दी के एक अक्षर को लिखने के लिए जरूरत से ज्यादा (दो या तीन) कुंजियाँ दबानी पड़ती हैं. मैंने लीप आजमाया, परंतु हिन्दी की पोर्टेबिलिटी लीप तक ही सीमित थी और विंडोज के दूसरे अनुप्रयोगों में इसके लिखे को काट- चिपका कर उपयोग नहीं हो सकता था. ऊपर से, लीप से लिखे गए दस्तावेजों को अगर आप किसी दूसरे के पास भेजते थे, तो वह तभी उसे पढ़ पाता था, जब उसके पास भी लीप संस्थापित हो. इसी वजह से यह लोकप्रिय नहीं हो पाया. इन्हीं वजहों से मैंने कभी भी श्रीलिपि का भी उपयोग नहीं किया.

कम्प्यूटर पर हिन्दी लेखन के लिए मैं कृतिदेव फ़ॉन्ट पर निर्भर था, जो मूलत: अंग्रेजी आस्की फ़ॉन्ट ही है, परंतु उसका रूप हिन्दी के अक्षरों जैसा बना दिया गया है. कृतिदेव अब भी डीटीपी के लिए, तथा तमाम अन्य हिंदी लेखकों का अत्यंत लोकप्रिय फ़ॉन्ट है, उपयोग में सरल है, आसानी से मिल जाता है, आसानी से इंस्टाल हो जाता है, हिंदी के रेमिंगटन कीबोर्ड से मिलता जुलता है, इसी लिए बहुत से हिंदी के लेखक यूनिकोड हिंदी के आ जाने के दशक बाद भी इसी फ़ॉन्ट का उपयोग करते हैं. परंतु अन्य दस्तावेजों में इस फ़ॉन्ट का उपयोग बेहद सीमित है.

अब तो समय इंटरनेट पर हिंदी के साम्राज्य के फैलाव का है और हर कोई छोटा बड़ा आदमी और संगठन इंटरनेट पर हिंदी में अपनी उपस्थिति दर्ज

कराने में लगा हुआ है. और इसके लिए यूनिकोड फ़ॉन्ट पर आना ही होगा.

हिंदी इंटरनेट के शुरुआती दिनों की बात करें तो हिन्दी अखबार नई दुनिया ने अपने अखबार को इंटरनेट पर लाकर इसकी शुरूआत कर दी थी, परंतु उनका फ़ॉन्ट वेबदुनिया था, जो कंप्यूटर पर इंस्टाल किए बगैर काम नहीं करता था. धीरे से प्राय: सभी मुख्य हिन्दी अखबार इंटरनेट पर उतर आए. परंतु वेब दुनिया की तरह इन अखबारों में उपयोग किए जा रहे फ़ॉन्ट अलग- अलग व एक दूसरे से भिन्न होते थे. एक अखबार का लिखा उसी अखबार के फ़ॉन्ट से ही पढ़ा जा सकता था. इस बीच, अपेक्षाकृत नई तकनीक के डायनॉमिक फ़ॉन्ट – ऐसे फ़ॉन्ट जो इंटरनेट पृष्ठ पर ब्राउज करने पर स्वयं इंस्टाल हो जाते हैं, से कुछ समस्याओं को दूर करने की कोशिशें की गईं, मगर वे सिर्फ एक ही ब्राउज़र, इंटरनेट एक्सप्लोरर तक सीमित रहीं. अन्य ब्राउजरों में यह काम नहीं आया. इससे परिस्थितियाँ पेचीदा होती गईं, चूँकि एक आम कम्प्यूटर उपयोक्ता से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वह किसी खास साइट को पढ़ने के लिए खास तरह के फॉन्ट को पहले डाउनलोड करे फिर संस्थापित भी करे, या किसी खास ब्राउज़र को ही इस्तेमाल करे.

मुझ समेत बहुत से लेखकों हिंदी इंटरनेट के शुरूआती दौर में अपनी रचनाएँ पीडीएफ तथा चित्र (जेपीईजी या पीएनजी इमेज) रूप में प्रकाशित की ताकि पाठकों को फ़ॉन्ट की समस्या से मुक्ति मिले. परंतु इसमें भी झमेला यह था कि जब तक उपयोक्ता के कम्प्यूटर पर एक्रोबेट रीडर ( या पीडीएफ प्रदर्शक) संस्थापित नहीं हो, वह इसे भी नहीं पढ़ पाता था. या चित्र डाउनलोड कर ही पढ़ पाता था. ऊपर से पीडीएफ फाइलें व चित्र फ़ाइलें बहुत बड़ी होती हैं, और इन्हें पढ़ने के लिए पहले इसे कम्प्यूटर पर डाउनलोड करना होता है. अत' इंटरनेट पर समय अधिक लगता है.

यह समस्या केवल उपयोगकर्ताओं की नहीं थी, बल्कि सामग्री प्रदाता सेवाओं की भी थी, और दुनिया की तमाम अन्य भाषाओं के साथ भी थी. इन्हीं समस्याओं को हल करने के लिए यूनिकोड नामक प्रकल्प का गठन किया गया ताकि इंटरनेट की सामग्री को भाषाई फ़ॉन्ट की समस्या से छुटकारा मिल सके.

जल्द ही सन 2000 के आते आते तमाम ओर यूनिकोड का समर्थन आने लगा. अब जब इंटरनेट व कंप्यूटर पर हिंदी (तथा अन्य तमाम भाषा) भाषा के प्रदर्शन व फ़ॉन्ट पर निर्भरता यूनिकोड के आ जाने से दूर हो गई तो यह प्रयास किए जाने लगे कि यूनिकोड में हिंदी में कंप्यूटर भी हो.

इससे पहले सीडैक के पहल से भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर लाने का प्रयास इंडिक्स कंप्यूटिंग के नाम से एक अच्छी शुरूआत की गई थी जो कि इस्की फ़ॉन्ट पर निर्भर था, परंतु इस्की फ़ॉन्ट के प्रचलन में नहीं होने व गलत नीतियों के फलस्वरूप यह योजना अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गई.

उस समय मुफ़्त व मुक्त स्रोत का लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम लोकप्रिय हो रहा था जिसमें प्रारंभ से ही अपनी भाषा में अनुवाद (स्थानीयकरण या लोकलाइज़ेशन) की सुविधा थी, और उसमें यूनिकोड का समर्थन था. परंतु हिंदी यूनिकोड के लिए जटिल समस्याएं, यथा उचित फॉन्ट रेंडरिंग इत्यादि से भी जूझना पड़ रहा था.

हम लोगों ने एक संस्था इंडलिनक्स बनाया और उसके तहत कंप्यूटरों को भारतीय भाषा में लाने का स्वयंसेवी प्रयास करने लगे. तब मैं विद्युत विभाग में इंजीनियर था और अपने खाली समय में अनुवाद का कार्य करता और इस प्रकार प्रत्येक माह लगभग एक हजार वाक्याँशों का अनुवाद कर रहा था. उस समय तक मैं हिन्दी में कृतिदेव फॉन्ट का अभ्यस्त हो चुका था, और मजे की बात यह कि लोकलाइजेशन या स्थानीयकरण के लिए कृतिदेव फ़ॉन्ट काम नहीं आता था. इसके लिए यूनिकोड फ़ॉन्ट में काम करना होता था, जिसका कुंजीपट सीडैक ने डिजाइन किया था जो इनस्किप्ट कुंजी पट कहलाता था जो आज भी कंप्यूटरों में डिफ़ॉल्ट इंस्टाल होता है. यह भी एक तरह का मजाक था, क्योंकि उस वक्त हिंदी टाइपिंग आदि में रेमिंगटन (यानी कृतिदेव फ़ॉन्ट वाला हिंदी कीबोर्ड) कीबोर्ड ही मानक था, तमाम लोग उसी के अभ्यस्त थे, टाइपिंग की परीक्षाएँ उसी में होती थीं, पुराने तमाम हिंदी के वर्डप्रोसेसर इसी रेमिंगटन में चलते थे. मगर जब यूनिकोड आया तो गलत फैसले से सीडैक का इनस्क्रिप्ट अपनाया गया जिससे यूनिकोड में हिंदी सामग्री रचने की समस्या विकराल हो गई. और यह विकरालता इसलिए भी बड़ी रही क्योंकि भारत में कहीं भी हिंदी का भौतिक कीबोर्ड उपलब्ध ही नहीं है. जो लोग रेमिंगटन के अभ्यस्त हो चुके थे, जैसे कि मैं, उन्हें इसे भूलकर नया कुंजीपट इनस्क्रिप्ट सीखना पड़ा – मजबूरी में.

कृतिदेव के कुंजी पट से बिलकुल अलग था इनस्क्रिप्ट कुंजीपट. उस वक्त हिन्दी कुंजीपट को मैप कर बदलने के औजार भी नहीं थे. अतः यूनिकोड में हिन्दी अनुवादों के लिए मुझे एक नए हिन्दी कुंजीपट - इनस्किप्ट को शून्य से सीखना पड़ा, जो कि कृतिदेव से पूरी तरह भिन्न था, और जिसे मैं इस्तेमाल करता था. छः महीने तो मुझे अपने दिमाग से कृतिदेव हिन्दी को निकालने में लगे और लगभग इतना ही समय इनस्किप्ट हिन्दी में महारत हासिल करने में लग गए. कुंजी पट की समस्या अभी भी है – अधिकांश हिंदी सामग्री अभी भी कृतिदेव, चाणक्य आदि फ़ॉन्टों में सृजित होती है और नेट पर प्रकाशित करने के लिए उपलब्ध फ़ॉन्ट कन्वर्टरों का सहारा लेना होता है.

मानक टर्मिनलॉजी की समस्या

हिंदी स्थानीयकरण के शुरूआती चरणों में हमारे पास कोई हिन्दी आईटी टर्मिनलॉजी नहीं थी. ऑनलाइन / पीसी आधारित शब्दकोश भी नहीं थे, जिसके कारण हमारा कार्य अत्यधिक उबाऊ, थका देने वाला हुआ करता था.

अनुवादों में संगतता की समस्याएँ थीं. उदाहरण के लिए, अंग्रेजी के Save शब्द के लिए संचित करें, सुरक्षित करें, बचाएँ, सहेजें इत्यादि का उपयोग अलग- अलग अनुवादकों ने अपने हिसाब से कर रखे थे. फाइल के लिए फाईल, सूचिका, संचिका और कहीं कहीं तो, संदर्भ न मालूम होने से ‘रेती’ का उपयोग किया गया था. इस दौरान हिन्दी भाषा के प्रति लगाव रखने वाले लोग इंडलिनक्स में बड़े उत्साह से स्वयंसेवी अनुवादकों के रूप में आते, दर्जन दो दर्जन वाक्यों- वाक्याँशों का अनुवाद करते, अपने किए गए कार्य का हल्ला मचाते और जब उन्हें पता चलता कि अनुवाद - असीमित, उबाऊ, थकाऊ, ग्लैमरविहीन, मुद्राहीन, थैंकलेस कार्य है, तो वे उसी तेजी से गायब हो जाते जिस तेजी और उत्साह से वे आते थे. कुल मिलाकर

हिन्दी ऑपरेटिंग सिस्टम का सपना साकार करने के लिए मेरे अलावा जी. करूणाकर ही लगातार और निष्ठापूर्वक कार्य कर रहे थे. हमारे हाथों में मात्र कुछ हजार वाक्यांशों के अनुवाद थे, जिस वजह से हम किसी को हिन्दी में ऑपरेटिंग सिस्टम कार्य करता हुआ नहीं दिखा सकते थे. फिर, जो माल हमारे

पास था, वह बहुत ही कच्चा था, निहायत असुंदर था और काम के लायक नहीं था. इंडलिनक्स कछुए की रफ्‌तार से चल रहा था, सिर्फ एक व्यक्ति- जी. करुणाकर के समर्पित कार्यों से जो तकनीकी पहलुओं को तो देख ही रहे थे, मेरे जैसे स्वयंसेवी अनुवादकों को ( हिन्दी के इतर अन्य भारतीय भाषाओं के

भी) अनुवाद कार्य के लिए आवश्यक तकनीक सिखाने- पड़ाने का कार्य भी करते थे और इस बीच समय मिलने पर अनुवाद कार्य भी करते थे.

अंतत: पहिया घूम ही गया:

सन् 2003 में इंडलिनक्स की गतिविधियों में कुछ तेजी आई. इसी दौरान मैंने अपनी नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली और इंटरनेट व कंप्यूटरों के स्थानीयकरण व सामग्री सृजन को पूर्णकालिक कार्य के रूप में अपना लिया. जल्द ही हमारे प्रयासों से लिनक्स का हिंदी में कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम जारी हुआ जिसे लोगों ने हाथों हाथ लिया. और चहुँ ओर इसकी चर्चा और प्रतिक्रिया रही. लोगों ने इसे अपने मौजूदा अंग्रेजी लिनक्स के ऊपर संस्थापित कर पहली मर्तबा हिन्दी में ऑपरेटिंग सिस्टम के माहौल को घोर आश्चर्य से देखा. इंडलिनक्स के प्रयासों की हर तरफ सराहना तो हो ही रही थी, अब लोगों ने इसकी तरफ ध्यान देना भी श्]रू किया. इस दौरान, सीएसडीएस सराय के रविकान्त ने एक

महत्वपूर्ण योगदान हिन्दी लिनक्स को दिया. उन्होंने सराय, दिल्ली में एक हिन्दी लिनक्स वर्कशॉप का आयोजन किया जिसमें साहित्य, संस्कृति और मीडिया कर्मी सभी ने मिल बैठ कर हिन्दी अनुवाद में अशुद्धियों को दूर करने का गंभीर प्रयास किया, जिसके नतीजे बहुत ही अच्छे रहे. बाद में सराय से ही हिन्दी अनुवादों के लिए कई परियोजनाएँ भी स्वीकृत की गईं जिसके फलस्वरूप हिंदी कंप्यूटिंग का कार्य और तेजी से बढ़ा.

हिंदी में स्थानीयकरण की असली समस्या

हिंदी अब चहुँओर स्थापित हो गई है. आमतौर पर फ़ॉन्ट की समस्या भी सुलझ गई है और यूनिकोड मानक फ़ॉन्ट के रूप में स्वीकार्य हो गया है. भारत का हिंदी का विशाल बाजार भी बाजार के बड़े बड़े खिलाड़ियों जिनमें गूगल, एप्पल व फ़ेसबुक शामिल हैं उन्हें खींच रहा है और उनके तमाम उत्पाद हिंदी में आ रहे हैं. मगर असली समस्या अब आ रही है. बाजार के सभी खिलाड़ी अपने अपने हिसाब से स्थानीयकरण करवा रहे हैं. एप्पल व विंडोज का प्रमुख कार्य वेब दुनिया का अनुवाद प्रकल्प करता है. गूगल का अनुवाद बहुत से फ्रीलांसरों के जरिए किया जाता है, इसी तरह फ़ेसबुक के अपने वेंडर हैं. रेडहेट ने रेडहेट लिनक्स को भारतीय भाषाओं में लाने के लिए एक सक्षम व वृहद भाषाई टीम पुणे में बनाया था, परंतु भाषाई कंप्यूटिंग में जब उसे कोई आर्थिक लाभ हासिल नहीं हुआ तो वह टीम बंद कर दी गई. इन सब वजहों से स्थानीयकरण के अनुवादों में मानकीकरण कहीं है ही नहीं. आपके लिए एक उदाहरण काफी होगा –

आजकल हर व्यक्ति के हाथ में एक अदद स्मार्टफ़ोन होता है. आजकल के प्रायः सभी स्मार्टफ़ोनों में न केवल हिंदी में काम किए जा सकते हैं, बल्कि उनके यूआई (यूजर इंटरफ़ेस) भी हिंदी में आ चुके हैं. विंडोज, एप्पल तथा बेहद लोकप्रिय एंड्रायड तंत्र के स्मार्टफ़ोनों में भाषाई विकल्प चुनकर फ़ोन की मूल व प्रदर्शन की भाषा हिंदी में की जा सकती है.

जब आप अपने स्मास्टफ़ोन की भाषा हिंदी में बदल लेंगे तो सबसे पहले सेटिंग में जाते हैं. सही? या फिर, सेटिंग्स में जाते हैं? या कि सेटिंग्ज़ में?

यह निर्भर करता है कि आपके हाथ में कौन सी कंपनी का स्मार्टफ़ोन है. विंडोज वाले सेटिंग्स कहते हैं, एप्पल वाले सेटिंग्ज़ और एंड्रायड में सेटिंग चलता है. सही क्या है? मानक क्या है? मानक कौन तय करेगा? यदि सेटिंग को लेकर इतने सेटिंग्ज़ चलते रहे, तो अपने उपकरणों में हिंदी कौन इस्तेमाल करेगा? करेगा भी तो कन्फ़्यूज होता रहेगा.

यदि आपको विश्वास न हो रहा हो तो नीचे स्क्रीनशॉट पर नजर मार लें –

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ऊपर – विंडोज़ फ़ोन में सेटिंग्स

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ऊपर – एप्पल आई फ़ोन में सेटिंग्ज़

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ऊपर एंड्रायड फ़ोन में सेटिंग

यह तो केवल एक सेटिंग की बात थी, बहुत से ऐसे ही टर्मिनलॉजी में घोर होचपोच है. एक्सेसिबिलिटी को कोई सरल उपयोग कहता है तो कोई सहायक सेवाएँ तो कोई उपलब्धता! बताइए, हिंदी वाला कैसे समझेगा कि भाई, तू बोल क्या रहा है और तेरा असली मतलब क्या है!

हिंदी की अपनी, भारी समस्या

हिंदी भाषा की अपनी स्वयं की समस्या भी है. उदाहरण के लिए, एक स्थान है Orlando. हिंदी में आप इसे कैसे लिखेंगे? पहले, आपके लिए एक चित्र. वास्तविक, रीयलटाइम ऑनलाइन अनुवाद उपकरण का स्क्रीनशॉट है यह –

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किसका लिखा सही है और किसका गलत? माना, आपने ऊपर दिए में से कोई एक चुन लिया, मगर नीचे कोई छप्पन और तरीके से ऑरलैंडो, ओह – ओरलेंडो या फिर ओरलांडो को लिखा गया है – तो उसमें से किसे चुनेंगे?

आर्लैंडो

ऑर्लैंडो

और्लैंडो

ओर्लैंडो

आरलैंडो

ऑरलैंडो

औरलैंडो

ओरलैंडो

आरलैण्डो

ऑरलैण्डो

औरलैण्डो

ओरलैण्डो

आरलैन्डो

ऑरलैन्डो

औरलैन्डो

ओरलैन्डो

आर्लेंडो

ऑर्लेंडो

और्लेंडो

ओर्लेंडो

आरलेंडो

ऑरलेंडो

औरलेंडो

ओरलेंडो

आरलेण्डो

ऑरलेण्डो

औरलेण्डो

ओरलेण्डो

आरलेन्डो

ऑरलेन्डो

औरलेन्डो

ओरलेन्डो

आर्लांडो

ऑर्लांडो

और्लांडो

ओर्लांडो

आरलांडो

ऑरलांडो

औरलांडो

ओरलांडो

आरलाण्डो

ऑरलाण्डो

औरलाण्डो

ओरलाण्डो

आरलान्डो

ऑरलान्डो

औरलान्डो

ओरलान्डो

यदि मानकीकरण हो, तो ऐसी समस्याओं से आसानी से निपटा जा सकता है. स्थानीयकरण में गुणवत्ता और मानकीकरण को बढ़ावा देने और उसे चहुंओर विस्तार देने के उद्देश्य से एक प्रकल्प फ़्यूल (FUEL - Frequently Used Entries in Localization ) बनाया गया है (अधिक जानकारी के लिए - http://raviratlami.blogspot.in/2014/11/2014.html पर जाएँ) जिसमें स्थानीयकरण में जरूरी शब्दों को संग्रहित कर उनका मानक अनुवाद वैबसाइट पर प्रदर्शित किया गया है जिसे हर वेंडर यदि अपनाए तो ऐसी समस्याएं नहीं होंगी, कंप्यूटरों में हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ेगी और जनता अपने कंप्यूटिंग और मोबाइल कंप्यूटिंग उपकरणों में शान से, और बिना किसी कनफ़्यूजन के, हिंदी का उपयोग किया करेगी.

लेखक का संक्षिप्त परिचय –

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कर्मकुण्डली (बायोडेटा)

नाम – रविशंकर श्रीवास्तव

उपनाम – रवि रतलामी

जन्म तिथि – 5 अगस्त 1958

शिक्षा – अभियांत्रिकी में स्नातक

पदनाम – अतिरिक्त कार्यपालन अभियंता, मप्रविमं, (स्वैच्छिक सेवानिवृत्त)

पता – 101, आदित्य एवेन्यू, एयरपोर्ट रोड, द्रोणांचल के सामने, भोपाल मप्र 462030

ईमेल – raviratlami@gmail.com

मो. - 9329490014

कार्यपथ –

1. विगत 20 वर्षों से हिंदी में तकनीकी/साहित्य लेखन व संपादन तथा कंप्यूटरों, आईटी के हिंदी व छत्तीसगढ़ी भाषा में स्थानीयकरण में सक्रिय भूमिका.

2. शासकीय विद्युत मंडल में 20+ वर्ष से अधिक का प्रसाशकीय/प्रबंधन/तकनीकी अनुभव (भाषाई कंप्यूटिंग के क्षेत्र में कार्य करने हेतु 2003 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्त).

3. नई दिल्ली से प्रकाशित इलेक्ट्रॉनिक फ़ॉर यू समूह की पत्रिका – लिनक्स फ़ॉर यू में 8+ वर्ष के लिए तकनीकी लेखन.

4. हिन्दी दैनिक चेतना, हिन्दुस्तान टाइम्स, कादम्बिनी, अहा! जिंदगी, भास्कर, नई दुनिया, प्रभासाक्षी.कॉम, अभिव्यक्ति.कॉम आदि प्रमुख व प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में तकनीकी स्तंभ व साहित्य लेखन.

5. प्रतिष्ठित ग्लोबल वाइसेज इंडिया में हिंदी अनुवाद कार्य. लिंक - http://hi.globalvoicesonline.org/author/ravishankar/ , इंटरनेट का मानकीकरण करने वाली साइट W3C का हिंदी अनुवाद. लिंक - http://www.webstyles.in , ट्विटर को आरंभिक हिंदी रूप देने में प्रमुख भूमिका.

6. सीएसडीएस दिल्ली, हिंदी व छत्तीसगढ़ी कंप्यूटिंग के स्थानीयकरण हेतु 3 फ़ैलोशिप प्राप्त.

7. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में अतिथि अध्यापन कार्य.

8. 20+ सम्मेलनों, ऑनलाइन सम्मेलनों, कार्यशालाओं में हिंदी कंप्यूटिंग, ब्लॉग, हिंदी इंटरनेट संबंधी प्रस्तुतिकरण.

9. हिंदी लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रारंभिक रिलीज में महत्वपूर्ण भूमिका. 1000+ कंप्यूटिंग अनुप्रयोगों का हिंदी में स्थानीयकरण. अधिकतर कार्य GNU GPL के तहत, निःशुल्क, मानसेवी आधार पर.

10. छत्तीसगढ़ी लिनक्स तथा छत्तीसगढ़ी विंडोज एप्लीकेशन सूट निर्माण में प्रमुख भूमिका.

11. 10+ वर्षों से नियमित रूप से हिंदी में तकनीकी/हास्य-व्यंग्य ब्लॉग लेखन, ऑनलाइन पत्रिका रचनाकार.ऑर्ग का संपादन तथा हिंदी की सर्वाधिक समृद्ध ऑनलाइन वर्गपहेली का सृजन.

पुस्तकें –

1. रवि रतलामी के व्यंग्य

2. रवि रतलामी के ग़ज़ल और व्यंज़ल

3. लिनक्स पॉकेट गाइड हिंदी में

4. आसपास की कहानियाँ (हिंदी में सह-अनुवाद)

पुरस्कार

1. रवि रतलामी का हिंदी ब्लॉग (वर्तमान नाम छींटे और बौछारें) – माइक्रोसॉफ़्ट भाषा इंडिया सर्वश्रेष्ठ हिंदी ब्लॉग 2006

2. 2007-9 माइक्रोसॉफ़्ट मोस्ट वेल्यूएबल प्रोफ़ेशनल

3. अभिव्यक्ति.ऑर्ग टेक्नोलॉजी लेखक 2007

4. छत्तीसगढ़ी गौरव सम्मान 2008 – सृजन सम्मान रायपुर छत्तीसगढ़

5. FOSS IN 2008 – Nrcfoss (नेशनल रिसोर्स कौंसिल फ़ॉर फ्री ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर) प्रायोजित राष्ट्रीय पुरस्कार (KDE हिंदी अनुवाद हेतु)

6. आई टी मंथन 2009 (छत्तीसगढ़ी लिनक्स हेतु)

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This blog post is inspired by the blogging marathon hosted on IndiBlogger for the launch of the #Fantastico Zica from Tata Motors. You can apply for a test drive of the hatchback Zica today.

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आधुनिक, समकालीन हिंदी सृजनधर्मियों का नाम अगर लिया जाए, तो अरविंद कुमार का नाम सर्वोपरि होगा. हिंदी के एकमात्र समांतर कोश के कोशकार अरविंद कुमार हाल ने ही में अपने 86 वें जन्मदिवस पर प्रकाशित अपनी आत्मकथा - शब्दवेध में सत्तर सालों के अपने हिंदी शब्द संसार के अनुभवों को बेहद खूबसूरती और दिलचस्प, साथ ही जानकारी परक तरीके से संजोया है.

अरविंद कुमार के हिंदी थिसारस की आवश्यकता मुझे तब हुई जब मैं 2000 के आसपास हिंदी कंप्यूटरीकरण के कार्य में जुटा. सॉफ़्टवेयरों के हिंदी स्थानीयकरण में हम लोगों के एक समूह इंडलिनक्स ने शुरूआत की थी, और कहीं कोई मानक आदि नहीं होने से अंग्रेज़ी शब्दों के हिंदी अनुवादों के लिए अकसर शब्दकोशों की जरूरत होती थी. संदर्भानुसार कई शब्दों के विविध विकल्पों पर विचार होता था, और साथ ही भारत के विशाल भूभाग और कई तरह की हिंदी से समस्या विकराल होती थी. उदाहरण के लिए एक थीम था - पंपकिन. उसका हिंदी शब्द ढूंढने निकले तो कई रूप सामने आए - कद्दू, पेठा, लौकी, घिया, कुम्हड़ा, कोंहड़ा आदि आदि और न जाने क्या क्या. हिंदी समांतर कोश ने ऐसे समय में हमारा बहुत कुछ काम आसान किया और बहुत साथ दिया.

इस बीच अरविंद कुमार जी से ईमेल के जरिए, व तकनीकी हिंदी समूह के जरिए परिचय हुआ, और जब हमने एक परियोजना के तहत मुफ़्त व मुक्त स्रोत वर्तनी जांचक का निर्माण प्रारंभ किया तो हमने उनसे उनके शब्दों के डेटाबेस मुहैया कराने का निवेदन किया. उन्होंने अपने डिजिटल रूप में विशाल संकलित हिंदी शब्दकोश को इस परियोजना के लिए निःशुल्क उपलब्ध करवाया. जिसके लिए हिंदी जगत सदैव उनका आभारी रहेगा.

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अरविंद कुमार की आत्मकथा - शब्दवेध एक ऐसी पुस्तक है जो केवल आत्मकथा नहीं है. बल्कि यह प्रत्येक हिंदी सृजनधर्मी, हिंदी रचनाकार के लिए संदर्भ पुस्तक (रेफ़रेंस बुक) की तरह भी है. इस किताब में कई दिलचस्प विषयों पर भी अरविंद कुमार ने लिखा है. उदाहरण के लिए, इस किताब में एक अध्याय है -

हिदी मेँ इंग्लिश कैसे लिखें

जब नायक नायिका मिले? या साथ सोए?

अँगरेजी का यूसेज तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन सवाल यह है कि अँगरेजी शब्द देवनागरी में लिखेँ कैसे.

बदलती हिदी मेँ अँगरेजी शब्दों का यूसेज या प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है. उन्हें देवनागरी मेँ सही सही लिखने मेँ कई समस्याएँ आती हैं.

हम हर ध्वनि को जैसा बोलते हैँ वैसा ही लिखते हैं और जैसा लिखते हैं वैसा ही बोलते हैं लेकिन रोमन लिपि मेँ लिखना पढ़ना हमारी देवनागरी जैसा नहीं  है. उस मेँ ए से जैड तक कुल 26 अक्षर हैं-और उन के जरिए सभी उच्चारण लिखने होते हैं उदाहरण के लिए सी (c) को स बोलना है या क यह दर्शाने के लिए सी के बाद कई भिन्न स्वर या वर्ण लगाने की प्रथा बनाई गई है. मोटे तौर पर सी के बाद आई (i) है या ई (e) है या सी के पहले ऐस (s) है तो उच्चारण है स; सी के बाद ए (a), यू (u) या ओ (o) हो तो बोलते हैं क. इस लिए अँगरेजों को भी अँगरेजी हिज्जे रटने पड़ते हैँ

अँगरेजी में स्वरों की संख्या तो कुल पाँच है. लेकिन हमारे 1० स्वर उच्चारण की जगह (अँ अ: को नहीं गिना गया है, न ही ऋ और लृ को) अँगरेजी मेँ कम से कम 14 हैं स्पष्ट है कि देवनागरी के पुराने स्वरों और मात्राओं के सहारे वे नहीं लिखे जा सकते. उन के लिए हमेँ अपने नियम बदलने पड़ेंगे, या नए अक्षर गढ़ने पड़ेंगे, आ और औ के बीच मेँ ऑ लिखा जाने लगा है. सवाल उठता है कि उन्हें कोश क्रम मेँ कहाँ रखा जाएगा? कोई भी यूजर कैसे समझेगा कि उसे आ देखना है, ओ. या फिर औ या ऑ. फिर ऑ के ऊपर अनुस्वार या चंद्रानस्वार चिह्न कहाँ लगेंगे!

यूरोप की भाषाओं में लिपि तो वही रोमन है, लेकिन अक्षरों का उच्चारण अलग है.

अनेक देवनागरी उच्चारण कई यूरोपीय देशों में हैँ ही नहीं. अँगरेज या फ्राँसीसी खादी' को 'काडी' या 'कादी' बोलते हैँ.

विदेशी नार्मों की बात तो दूर, रोमन मेँ लिखे अपने भारतीय शब्द भी हम अपनी भाषाओं मेँ सही नहीं-लिख पाते. मेरे जन्म स्थान मेरठ (meerut ) को मराठी मेँ मीरुत लिखा जाता है. बांग्ला में Saurav का सही उच्चारण है सौरभ क्यों कि वहाँ व का उच्चरण ब या भ है, लेकिन हिंदी मेँ उसे सौरव लिखने की प्रवृत्ति है….. (आदि…)

स्पष्ट है कि अरविंद कुमार ने हिंदी भाषा से संबंधित तमाम आयामों को भी अपने इस आत्मकथा में खूबसूरती से पिरोया है.

 

अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक शब्दवेध के बारे में स्वयं अरविंद कुमार कहते हैं -

 

शब्दवेध - एक परिचय

मेरे जीवन मेँ कोई सतत थीम है, तो वह है शब्दों से लगाव, हिंदी से प्रेम, हिंदी के लिए कुछ अनोखा करने की तमन्ना, हिंदी को संसार की समृद्धतम भाषाऔं मेँ देखने की अभिलाषा. रोजेट के इंग्लिश थिसारस जैसी कोई हिंदी किताब बनाने के लिए माधुरी पत्रिका से त्यागपत्र दे कर मैं 1978 मेँ मुंबई से दिल्ली चला आया था. कई साल बीत जाने पर भी वह किताब बन ही रही थी. तेरह चौदह साल बाद सन 1991 मेँ दिल्ली के हिंदी जगत मेँ यह विस्मय का विषय बना हुआ था. थिसारस क्या होता है - यह जिज्ञासा तो थी ही, यह अचरज भी कम नहीं था कि इतने साल बीत गए और किताब बन ही रही है! ऐसी क्या किताब है! ऐसे मेँ मेरे घनिष्ठ मित्र राजेंद्र यादव ने आग्रह किया कि मैं उन की पत्रिका हंस मेँ लेखमाला के जरिए उस के बारे मेँ बताऊँ. उन्होंने लेखमाला को शीर्षक दिया - शब्दवेध. अब वह इस किताब का नाम है.

इस की सामग्री नौ संभागों मेँ विभाजित है. एक संभाग अगले संभाग तक सहज भाव से ले जाता है. ये हैं: 1 पूर्वपीठिका. 2 समांतर सृजन गाथा. 3 तदुपरांत. 4 कोशकारिता. 5 सचूना प्रौद्योगिकी. ० हिंदी. 7 अनुवाद. 8 साहित्य. 9 सिनेमा.

इन मेँ संकलित हैँ समय समय पर लिखे गए मेरे अपने लेख और कुछ वे लेख जो लोगों ने मेरे काम के बारे मेँ लिखे. स्वाभाविक है कि कुछ प्रसंगों का कई स्थानों पर दोहराव है. वे निकालने की मैं ने भरसक कोशिश की है. कई स्थानों पर विषय विशेष मेँ संदर्भ क्रम टूट जाने पर वह अनर्गल सा लग सकता है. इस लिए कुछ दोहरावों को मेरी मजबूरी समझ कर क्षमा करें, मेरे जीवन मेँ जो कुछ भी उल्लेखनीय है, वह मेरा काम ही है. मेरा निजी जीवन सीधा सादा सपाट और नीरस है. कोई प्रवाद मेरे बारे मेँ कभी नहीं हुआ. इस लिए मैं शब्दवेध को शब्दों के संसार मेँ सत्तर साल - एक कृतित्व कथा कह रहा हूँ.

साहित्य से मेरा जुड़ाव कुछ बहुत अधिक नहीं रहा. कुछ छुटपुट कविताओं कहानियों लेख. समीक्षाओं और साहित्यिक अनुवादों तक ही सीमित रह पाया मैं.

कोशकारिता से मेरा जुड़ाव 1973 मेँ किए गए एक संकल्प से हुआ. अपने पूरे परिवार के सहयोग से ही मैं समांतर कोश ( 1996) और उस के बाद कई कोशों की रचना कर पाया, सब अपनी अलग तरह के. उन का पूरा लेखाजोखा यहाँ मौजूद है.

शब्दवेध सुहृदों को पसंद आ पाएगा - इस आशापूर्ण संभावना के साथ,

-अरविंद कुमार, 17 जनवरी 2०16

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इस बेहद महत्वपूर्ण, जानकारी परक  किताब को आप यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं -

अरविंद लिंग्विस्टिक प्राइवेट लिमिटेड,

ई 28, एफ एफ, कालिंदी कालोनी, नई दिल्ली 65

फ़ोन - 91 9810016586

ईमेल - info@arvindlexicon.com

वैबसाइट - www.arvindlexicon.com

जल्द ही यह किताब अमेजन  / फ्लिपकार्ट / स्नैपडील पर उपलब्ध होगी.

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यदि इसकी आधिकारिक साइट http://www.indusos.com पर जाएँ, और वहाँ दिए गए चित्रमय दावों पर विश्वास करें, तो यह सवा अरब भारतीयों के लिए उनकी अपनी भाषा वाला शानदार स्मार्टफ़ोन / टैबलेट वाला लोकप्रिय ऑपरेटिंग सिस्टम बन सकता है. वैसे तो एंड्रायड वन तथा माइक्रोमैक्स मोबाइल फ़ोनों में भारतीय भाषाओं में यूआई (ग्राफिकल यूज़र इंटरफ़ेस ) सहित तमाम भारतीय भाषाई सुविधाओं युक्त स्मार्टफ़ोन पहले से ही आ रहे हैं, परंतु भारतीय भाषाओं में उचित और आवश्यक ऐप्प पर्याप्त संख्या में न होने के कारण उनकी स्वीकार्यता जरा कम ही रही है और यदि उपयोगकर्ता इन सुविधाओं वाले स्मार्टफ़ोन खरीदते भी हैं तो वे अंततः अंग्रेज़ी इंटरफ़ेस का ही उपयोग करते हैं. एक बड़ा कारण भारतीय भाषाई इंटरफ़ेस का उपयोग नहीं करना घटिया और अमानक अनुवादों का भी है जिससे उपयोगकर्ताओं में कन्फ़्यूजन पैदा होता है. इसके बारे में विस्तार से यहाँ लिखा है. उम्मीद है कि इंडस न केवल अमानक अनुवादों के संबंध में गुणवत्ता पर पर्याप्त ध्यान देगा, पर्याप्त संख्या में भाषाई ऐप्प भी लाएगा जिससे इसकी स्वीकार्यता बढ़ेगी.

 

यूँ तो यह इंडस भी एक तरह से एंड्रायड का ही संस्करण है, परंतु पूरी तरह से लोकलाइज़्ड और भारतीय. यहाँ तक कि इसका ऐप्प स्टोर भी भारतीय भाषाओं में, खास भारतीयों के लिए बनाया गया है.

डिजिटल इंडिया मिशन के तहत, मार्च 2016 में इंडस में 9 भारतीय भाषाओं में पाठ से वार्ता (टैक्स्ट टू स्पीच) तंत्र भी जुड़ने वाला है जिसे आईआईटी मद्रास और अन्य दर्जन भर ऐसी ही संस्थाओं के कंसोर्शियम से तैयार किया गया है और जिसके बारे में कहा जाता है कि यह सुनने सुनाने में अत्यधिक प्राकृतिक है. वर्तमान में एप्पल आईओएस तथा गूगल में महज इक्का दुक्का भारतीय भाषाओं में, जिनमें हिंदी शामिल है, पाठ से वार्ता उपलब्ध है. 9 भारतीय भाषाओं में पाठ से वार्ता उपलब्ध होना निश्चित ही बड़ी उपलब्धि है और इससे उपयोगकर्ताओं को डिजिटल सामग्री के उपयोग में न केवल वृद्धि होगी, बल्कि उनके लिए यह आसान और सरल होगी. कल्पना करें कि गांव का निरक्षर रमई भी यदि अपने स्मार्टफ़ोन पर कुछ टैप करना सीख ले तो वो पाठ से वार्ता सुविधा के जरिए समाचार, जानकारियाँ और किस्से कहानी का आनंद सुनकर ले सकता है.

 

ये रहे कुछ चित्र जो इंडस की वैबसाइट से साभार  लिए गये हैं -

indus os

नया, 12 भारतीय भाषाओं सहित  इंडस स्मार्टफ़ोन ऑपरेटिंग सिस्टम - क्या यह भारत में लोकप्रिय हो पाएगा?

 

hindi app bazar

हर ऐप्प खास भारतीय भाषाओं में!

 

 

indus app bazzar

स्वयं का कस्टमाइज़्ड ऐप्प स्टोर. भारतीय भाषाओं में.

 

indus gui

बेहतर हिंदी यूआई

 

 

indus keyboard

इंडस कीबोर्ड - हर भाषा में 2 लाख से अधिक सही शब्दों के वर्ड बैंक सहित - सटीक और सही वर्ड प्रेडिक्शन के लिए. साथ ही, त्वरित टाइपिंग के लिए अनोखा द्विस्तरीय वर्ड प्रेडिक्शन सुविधा.

 

indus smartphone in 12 indian languages

12 भारतीय भाषाओं का समर्थन

indus with swipe language technology

टैक्स्ट स्वाइप से अनुवाद व ट्रांसलिट्रेशन - एक नया और नायाब तरीका.

 

payment by talk time - no need to net banking or credit card - true indian style

ऐप स्टोर में भुगतान के लिए एकदम भारतीय तरीका - टाकटाइम से भुगतान करें. क्रेडिट कार्ड या नेटबैंकिंग की जरूरत नहीं.

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भारतवर्ष नामक पवित्र पावन देश में तपस्यारत एक सिद्ध ऋषि के सम्मुख एक प्रकटतः दुःखी मानव पहुँचा.
ऋषि ने मन की आँखों से उस दुःखी मानव का हाल जान लिया, मगर इसे प्रत्यक्ष न करते हुए पूछा –
“बोल मानव, क्या दुःख है तुझे?”

“ऋषिवर, मुझे अपनी जाति से बहुत कष्ट है. तमाम अन्य मुझसे उच्च जाति के लोग मुझ पर सदियों से अत्याचार करते आ रहे हैं... मुझ पर कृपा करें महाराज...”

“जा.. तुझे आज से तेरी वर्तमान जाति से थोड़ी उच्च जाति का बना दिया... जा.. मौज कर - ओबीसीभवः”

“धन्यवाद... जै हो महाराज..” वह मानव नए, उच्च जीवन की आस में प्रसन्न मन वहाँ से विदा हुआ.

कुछ दिनों के बाद वह व्यक्ति ऋषि के पास फिर पहुँच गया. प्रकटतः वह पहले से अधिक दुःखी था. इस बार भी ऋषि ने उसके मन की बात अपनी छठी इंद्रिय से जान ली, मगर प्रकटतः उससे पूछे –
“अब क्या कष्ट है भक्त?”

“कष्ट तो बढ़ गया है मुनिवर. कुछ करिए... अब तो मुझे मुझसे नीची जाति वालों से भी कष्ट है और ऊंची जाति वालों से भी. समस्या बढ़ गई है महाराज...”

“जा... आज से तुझे सर्वोच्च जाति का बना दिया... जा... मौज कर... ब्राह्मणोभवः”

“मुनिवर की जै हो, ऋषिवर की जै हो...” मारे खुशी के चिल्लाता हुआ मानव प्रस्थान कर गया.
मगर इधर थोड़े समय बाद ही वह मानव पुनः ऋषिवर के सम्मुख प्रस्तुत था.

उसका चेहरा निचुड़ा हुआ था, गर्दन लटकी हुई थी और वह दुःखों से लबरेज था. वह अत्यंत दुःखी था.
सर्वज्ञानी मुनि ने, जाहिर है मानव के दुःख के कारण को जान लिया, और भयंकर रूप से क्रोधित हो उठे. पर, इस बार भी न अपने क्रोध, रोष को प्रकट किया न मानव मन के अंतर्द्वंद्व को. पूछा – अब क्या कष्ट है मानव?

“मुनिवर, ऋषिवर, मैं अज्ञानी, निपट गंवार... मुझे पता नहीं था... मैं गलत था. मुझे माफ कर दीजिए... मेरे नए अवतार में तो मेरी अब कहीं कोई पूछ परख ही नहीं है...तमाम सोशल मीडिया, टीवी, अख़बार, नेता, राजनीति, सरकारी नीतियों आदि में मेरी इस नई जाति के लिए कहीं कोई स्कोप ही नहीं है... बू हू हू...”
ऋषि को दया आ गई. उनका हृदय पिघल गया. भक्त के प्रति भगवान सदैव कृपारत होते हैं.

ऋषि ने अपना हाथ उठाया और आशीर्वाद दिया – पुनर्दलितोभव:
















कोई दस साल पहले मैंने हास-परिहास में ही सही, कुछ चाहत पूरी होने की ख्वाहिश पाली थी. जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं
अब आइए, देखते हैं कि इनमें से कितनी पूरी हुईं -

1 - मैंने ऐसा तकनीकी गॅजेट चाहा था जो ऑल-इन-वन किस्म का हो. जिसे मैंने आई-मॉड नाम दिया था. तब आई-पॉड आया था, आईफ़ोन नहीं, और स्मार्टफ़ोनों की दस्तक सुनाई दे रही थी. तब मैंने इसमें वास्तविक वास्तविक विस्तारणीयता व परिवर्धनीयता (स्केलेबिलिटी और अपग्रेडेबिलिटी) चाही थी - जो अब मॉड्यूलर स्मार्ट फ़ोन के आने से यह चाहत पूरी हो गई है.
2 - ट्राई बैंड ड्यूअल प्लेटफ़ॉर्म की सुविधा - अब तो यह सामान्य फ़ीचर है, ड्यूअल ट्रिपल सिम के साथ!
3 - पीडीए (पर्सनल डिजिटल असिस्टेंट) व ब्लूटूथ आदि सुविधा हो - दुनिया इससे कहीं आगे बढ़ गई है. अब तो हेल्थ असिस्टेंट भी आ गया है!
4 - अंतर्निर्मित पूर्ण व्यवसायिक कैमरा व कैमकॉर्डर हो जिसमें अंतर्निर्मित मिनिएचर डीवीडी रेकॉर्डर हो - यह सुविधा तो लो एंड के फ़ोनों में भी सामान्य बात है.
5 - अंतर्निर्मित स्पीकर सहित एएम-एफ़एम-वर्डस्पेस रेडियो तथा अंतर्निर्मित एफएम ट्रांसमीटर हो - क्या? तब ऐसी सुविधा एक सपना थी? हे भगवान!
6 - अंतर्निर्मित टीवीट्यूनर कार्ड हो - विंक, यू-ट्यूब और नेटफ्लिक्स के जमाने में ये कहां!
7 - विस्तारणीयता सहित, हॉट स्वेपेबल, न्यूनतम 20 जीबी फ़लॅश मेमोरी हो - यह तो क्लासिक 640 केबी मेमोरी जैसा जोक हो गया. भाई, आपके स्मार्टफ़ोन की मेमोरी कितनी है, जरा बताना तो!
8 - बाहर खींच कर निकाला जा सकने वाला स्विस-आर्मी चाकू सेट हो - यह भी उपलब्ध है. नेट पर सर्च मारो.
9 - अंतर्निर्मित, शक्तिशाली टॉर्चलाइट तथा मिनिएचर पंखा हो - टॉर्च तो आ गया है, यूएसबी से यूएसबी फैन भी चला सकते हैं, शायद अंतर्निर्मित पंखा वाला भी आता हो. आपने देखा हो यदि तो कृपया बताना. एक अदद तुरंत खरीदूंगा.
10 - व्यक्तिगत एयर आयोनाइज़र, इलेक्ट्रॉनिक वाटर प्यूरीफ़ायर हो - अब तक आया नहीं? हद है. यह तो आसान है.
11 - इलेक्ट्रिक शॉक गन हो - ( स्त्रियों के उनके अपने बचाव के लिए) - गन का तो पता नहीं, पर भारत में सभी स्मार्टफ़ोनों में पैनिक ऐप्प इंस्टाल करना अनिवार्य किया जाएगा यह खबर जरूर कहीं पढ़ी थी.
12 - इलेक्ट्रॉनिक मच्छर भगाने वाला यंत्र हो - कई ठो ऐप्प हैं. पर क्या ये वाकई काम करते हैं?
13 - अलग किया जा सकने वाला बहु उपयोगी बाल पाइंट पेन हो जिससे कागज के साथ-साथ पीडीए के वर्ड दस्तावेज़ में भी लिखा जा सके - शायद सेमसुंग नोट 2 की कल्पना इसी चाहत से हुई होगी?
14 - स्कैनर - जो अंतर्निर्मित कैमरे के जरिए काम करे तथा मिनिएचर प्रिंटर हो - स्कैनर तो आ गया, मिनिएचर प्रिंटर का खयाल सेमसुंग-एलजी को अब तक क्यों नहीं आया आश्चर्य है!
15 - मिनिएचर एलसीडी प्रोजेक्टर हो - आपको नहीं पता? ऐसी सुविधा वाले कई ठो स्मार्टफ़ोन आ गए हैं
16 - बैटरी की जरूरत कभी न हो - यह वातावरण की व सूर्य की रौशनी से, और हो सके तो शोर व ध्वनि प्रदूषण से अपनी शक्ति बनाए - घड़ियाँ तो आ चुकी हैं, स्मार्टफ़ोन में ये तकनीक आने वाला ही समझो
17 - प्लेटिनम से बना ढांचा जिसमें असली हीरों से पच्चीकारी की गई हो - आईफ़ोन गोल्ड नहीं देखा-सुना?

हुर्रे!

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फेकिंग न्यूज़ हिंदी में अरसे से चल रहा है और बढ़िया चल रहा है. इसी श्रेणी में अब नया नाम जुड़ा है - द लल्लनटॉप का.

सरसरी निगाह मारने पर साइट सुरूचिपूर्ण तरीके से तैयार लगती है. सामग्री भी थोड़ा गंभीर, थोड़ा-बहुत हास्य-व्यंग्य है. और, लगता है कि इस रोस्टियाई जमाने में यह लल्लनटॉप दूर की पारी खेलेगा.

 

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हिंदी का विस्तार चहुँओर हो रहा है. इंटरनेट पर तो धूम मची है. फ़ेसबुक-व्हाट्सएप्प पर हर कोई जो देवनागरी (या कि अलाल लोग रोमन हिंदी ) में टाइप करने की शिक्षा पा चुका है, हिंदी में पोंक रहा है. बहरहाल, यदि आप साहित्यिक पठन पाठन व लेखन में रुचि रखते हैं तो आपके लिए एक अदद नया ऐप्प आ गया है - मातृभारती.

मातृभारती ऐप्प एंड्रायड व आईओएस के लिए उपलब्ध है. इसकी बड़ी खासियत यह है कि यह नए लेखकों को आमंत्रित तो करती ही है, आपकी रचना के एवज में भुगतान का वादा करती है. यह ऐप्प निःशुल्क उपलब्ध है और इसकी सारी सामग्री भी निःशुल्क पठन पाठन के लिए उपलब्ध है.

ऐप्प को आप प्लेस्टोर पर Matrubharti से सर्च कर इंस्टाल कर सकते हैं.

संदर्भवश, आपको बताते चलें कि रचनाकार का भी ऐप्प है, आपके इस पसंदीदा ब्लॉग छींटे और बौछारें का भी, और तो और, वर्ग पहेली का भी ऐप्प है. तो देर किस बात की? इंस्टाल कीजिए! अब तो दुनिया ही ऐप्पों की है!

 

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ये ल्यौ। एक ऐसा ऐप्प आ गया है जो ये बता देगा कि आपका बच्चा अगर रो रहा है तो आखिर क्यों।
इसके लिए बड़ी उन्नत टेक्नॉलाज़ी का उपयोग किया गया है और बच्चे के रोने के तरीके, इंटैंसिटी आदि आदि के जरिए विश्लेषण कर आपको सूचित किया जाता है कि बच्चा इस वजह से रो रहा है।
यह तो कमाल हो गया है। अब जब

कि तकनीक उपलब्ध है, बहुत सारी संभावनाएं बनती हैं।
* ऐप्प बताएगा कि आपका लाइफ पार्टनर आज अगर कुछ एब्नार्मल बिहैव कर रहा है तो आखिर क्यों।
* ऐप्प बताएगा कि किसी सरकारी दफ्तर में आपकी फाइल को आगे सरकाने या क्लीयर करने के लिए सरकारी बाबू कितना मुंह खोलेगा।
* ऐप्प बताएगा कि कोई नेता अपने चुनावी भाषण में कोई वादा करते समय सीरियस है या महज जुमला फेंक रहा है।
* आदि - आदि।

किताबों से हमें, बहुत सहारा मिलता है -

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पर, हमें किताबों से क्या लेना देना?

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द्विभाषी रामायण -

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जाति-जाति की किताबें -

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पतली किताबें, मोटी किताबें -

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बेस्ट ऑफ किताब्स -

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हाँ यह तो है -

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वाह जिंदगी वाह भी मिली! -

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और, अंत में, विमोचन? -

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