टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

व्यंग्य जुगलबंदी : तूने किया कैसा ये कर्म है, देश दिसम्बर में भी गर्म है

दिसम्बर में देश

(चित्र साभार - कस्बा ब्लॉग)

दिसम्बर की एक सुबह, कड़ाके की ठंड में ठिठुरता दुकालू देश का हाल जानने के लिए निकला।


सबसे पहले उसकी मुलाकात हल्कू से हुई। अपने खेत में हल्कू सदा सर्वदा की तरह आज भी जुटा हुआ था। मौसम की मार और बिगड़ी बरसात ने पिछली फसल खराब कर दी थी तो उसके लंगोट का कपड़ा प्रकटतः  इंच भर और छोटा हो गया था। और सदा की तरह उसकी छाती उधड़ी हुई थी, जिसे वस्त्र सुख वैसे भी वार-त्यौहार ही हासिल हो पाता था। ठंडी बर्फीली हवा जहाँ पूरी दुनिया में ठिठुरन पैदा कर रही थी, हल्कू के पसीने से चचुआते शरीर को राहत प्रदान कर रही थी ।


दुकालू आगे बढ़ा। सामने स्मार्ट  सिटी की नींव खुद रही थी। काम जोर शोर से चल रहा था। होरी नींव खोदने के दिहाड़ी काम में लगा था। होरी ने जब से होश संभाला है तब से उसने दैत्याकार भवनों की नींव ही खोदी है। अनगिनत भवनों को उनकी  नींव की मजबूती होरी के पसीने की बूंदों  से ही मिली है। लगता है जैसे सर्वशक्तिमान परमपिता परमेश्वर ने उसे खास इसी काम के लिए बनाया है। हां, उसी ईश्वर ने, जिसने ब्रह्मांड बनाया, निहारिकाएं बनाई और, और यह उबड़-खाबड़ धरती भी बनाई । नेता और अफसर भी बनाए। होरी भी पसीने से तरबतर था और बर्फीली ठंडी हवा उसे भी राहत प्रदान कर रही थी।

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चलते चलते दुकालू सचिवालय पहुंच गया। केंद्रीयकृत वातानुकूलन - हां, वही- सेंट्रलाइज्ड एयरकंडीशनिंग - से लैस पूरे सचिवालय परिसर में दिसम्बरी ठिठुरन का कहीं अता पता नहीं था। लग रहा था कि टेंडर निकाल कर दिसम्बर को यह ठेका दे दिया गया है कि वो यहाँ से फूट ले और अपना पूरा जलवा बगल के झोपड़पट्टी में दिखाए जहां होरी और हल्कू का डेरा है। सचिवालय के भीतर का बाबू जगत पसीने से तरबतर था। बजट वर्ष के खत्म होने में महज दो माह बचे थे और फंड का एडजस्टमेंट करना जरूरी था नहीं तो फंड के लैप्स हो जाने का खतरा था। फंड लैप्स हुआ तो साथ ही अपना हिस्सा भी तो होगा। आसन्न खतरे से निपटने के जोड़ जुगाड़ मैं जूझते बाबू लोग पसीना पसीना हो रहे थे। एसी की हवा भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रही थी।


दुकालू ने सोचा चलो  अब संसद का हाल चाल ले लिया जाए। संसद जिससे देश चलता है।   वहाँ तो हाल और भयंकर था। नेता एक दूसरे पर पिले पड़े थे। कोई किसी की सुन नहीं रहा था। सब अपनी अपनी सुनाने की जुगत में लगे हुए थे। कोई अपने मन की बात कह रहा था तो कोई दूसरे के मन की। कोई अपनी बात से जलजला का खतरा लाने की बात कर रहा था तो कोई अपने एक इशारे से। भयंकर गर्मागर्मी थी। विस्फोटक।  नाभिकीय संलयन की अवधारणा वैज्ञानिकों को संसद से ही मिली होगी। जाहिर है, दिसम्बरी जाड़े का यहाँ दूर दूर तक अता पता नहीं था।  वहां जो कुछ था वह यह था कि चुनावी दंगल में उलझे नेता एक दूसरे को पटखनी देने दांव पर दांव लगाए जा रहे थे और इस खेल में पसीना पसीना हुए जा रहे थे।


दुकालू वापस लौटा। गली के मुहाने पर ओवरफ्लो हो रहे कचरे के डिब्बे के पास एक आवारा कुतिया अपने पिल्लों के साथ कचरे में मुंह मार रही थी। पास ही दीवार पर स्वच्छ भारत अभियान का पोस्टर चिपका था जिसे किसी मनचले ने किनारे से फाड़ दिया था।  दुकालू को बड़ी जोर की ठंड लगी। वह जल्दी से अपनी झोपड़ी में घुसा और कथरी ओढ़ कर सो गया।


कहते हैं कि तब से दुकालू उठा नहीँ है। वह विस्फरित आंखों से कथरी ओढ़े लेटा हुआ है। उसका देश दिसम्बर में ही कहीं अटक कर रह गया है।


व्यंज़ल

तूने किया कैसा ये कर्म है

देश दिसम्बर में भी गर्म है

.

सियासत में मानवता नहीं

कोई और दूसरा ही धर्म है

.

झंडा उठाने की चाह तो है

पर तबीयत जरा सी नर्म है

.

छोड़ दो हमें हमारे हाल पे

जड़ों ने पकड़ लिया जर्म है

.

राजनीति में सफल है रवि

छोड़ी उसने अपनी शर्म है

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