शनिवार, 10 दिसंबर 2016

सरदी की वापसी उर्फ एक मफलर की वापसी

एक गुलुबन्द यानी मफलर की वापसी.

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शीर्षक में आधुनिक, कूल-डूड, भारतीय पाठकों को गुलुबन्द का अर्थ बताना बनता है ना? नहीं तो बहुत से लोगों को आइडेन्टिटी क्राइसिस हो जाएगा.

बहरहाल, सरदी का मौसम लौट आया है और साथ में गुलुबन्द भी. मैंने भी अपनी आलमारी से अपना गुलुबन्द निकालने की कोशिश की तो उसने निकलने से मना कर दिया. मैंने पूछा, भइए, क्या बात है? किस बात की नाराजगी? तो वह बेहद भावुक हो गया. देश में भावुक होने का मौसम है. प्रधान मंत्री से लेकर प्रधान न्यायाधीश सभी भावुक हो रहे हैं. हर छोटी बड़ी बात पर. मैं भी बड़ा भावुक होकर यह तथाकथित व्यंग्य जुगलबंदी लिख रहा हूँ – जिसे पढ़कर (या शायद घोर अपठनीय होने के कारण हिकारत से देख कर) पाठक लोग और ज्यादा भावुक होंगे और कहेंगे – ये व्यंग्य है? व्यंग्य का स्तर इतना न्यून! फिर वे और भावुक हो जाएंगे.

तो, बात गुलुबन्द की भावुकता की हो रही थी. वो बेहद भावुक होकर बोला – किसी ने मेरी अपनी इच्छा, मेरी अपनी अभिलाषा पूछी है?

फिर उसने पूरी भावुकता में अपनी अभिलाषा कुछ यूँ बयान की -

गुलुबन्द यानी मफलर की अभिलाषा

चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गले में लिपट जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-कंधे में फहर
प्यारी को ललचाऊँ,


चाह नहीं जनता के कानों में
हे हरि लपेटा जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर
बंधूं भाग्य पर इठलाऊँ,


मुझे बांध कर हे! राजनेता,
उस पथ पर चल देना तुम!
क्षुद्र निकृष्ट राजनीति करने,
जिस पथ पर जावें नेता अनेक!

(स्व. श्री माखनलाल चतुर्वेदी जी की आत्मा से क्षमायाचना सहित)

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