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राष्ट्रवादी सरकार की राष्ट्रवादी न्यायपालिका!

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सिनेमा ही क्यों, हर टीवी चैनल पर हर सीरियल के पहले राष्ट्रगान सुनाया जाना चैये! अनिवार्य रूप से! लोगों की राष्ट्रभक्ति तो जाने कहाँ गायब हुई जा रही है, उसे इसी जरिए से वापस लाया जा सकेगा.घर घर में, हर घर में.चलो, अब मूवी थोड़ा लेट भी हो जाएंगे तब भी चलेगा. बल्कि थोड़ा लेट जाने से ही ठीक रहेगा :)

नया रुपया पुराना रुपया

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इधर मैंने वह खबर टीवी पर देखी,  उधर मेरे दिमाग का हाजमा खराब हुआ था. मुझे रात में हजारों सूरज दिखाई देने लगे थे. सुबह ही मैंने एटीएम से पूरे पाँच हजार रुपए निकलवाए थे – पाँच पाँच सौ के पूरे दस नोट. वे अब मुझे चिढ़ाते से प्रतीत हो रहे थे. रात बारह बजे के बाद से वो महज कागज के टुकड़े भर रह जाने वाले थे.

रॉबर्ट के हाथ में भी टीवी का रिमोट था. उसके टीवी में भी, तमाम चैनलों में वही सुर्खियाँ थीं. वह भी वही खबर देख सुन रहा था. खबर सुन कर उसकी भी आंखें फटी रह गई थी. वह भी घबरा गया था. अलबत्ता उसके घबराने की वजह मुझसे जुदा थी. वह भागा. भागकर अपने बॉस लॉयन के पास पहुँचा था. पसीने से सराबोर, हाँफते हुए उसने लॉयन से फरियाद की थी – “बॉस अब अपना क्या होगा? सरकार ने देश में पुराने नोट बंद कर दिए हैं और बदले में नए नोट चलाने का फैसला कर लिया है. इस तरह तो हमारा धंधा चौपट हो जाएगा. मार्केट में हमारे फ्रेश नक़ली नोट जो असली कटे-फटे, सड़े-गले वोटों की तुलना में ज्यादा आथेंटिक दिखते हैं उसका तो डिब्बा ही गोल हो जाएगा. ऊपर से बहुत सारा माल मार्केट में आने को तैयार है उस स्टाक का क्या होगा? हम तो कहीं के…

रेत में से तेल निकालने की क्लासिक कवायद

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वह भी पूरी तरह देसी, निपट भारतीय.

नोटबंदी - बिजनेस की नई, नायाब संभावनाएं

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ओह, तो अब पता चला कि नए नोट कहां जा रहे हैं और नए नोटों की मारामारी क्यों है!

मंत्रियों का असली काम क्या है?

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ओह, तो यह है मंत्रियों का असल काम-

भक्त एटीएम विरुद्ध आपिया एटीएम

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भक्त एटीएम विरुद्ध आपिया एटीएम नोटबंदी के साइड-इफ़ेक्ट के चलते काम के अधिक बोझ की वजह से एटीएम खराब हो रहे हैं. सुधारने के लिए तकनीशियन बुलाए जा रहे हैं. एक तकनीशियन के हाथ दो एटीएम का रिकवर्ड डेटा मिला. एक था भक्त एटीएम और दूसरा था आपिया एटीएम.पहले भक्त एटीएम का रिकवर्ड डेटा मुलाहिजा फरमाएँ –· आज नोटबंदी का पहला दिन है. वाह क्या सर्जिकल स्ट्राइक मारा है काले धन और भ्रष्टाचारियों पर. पूरी मुस्तैदी से लगा हूँ, लोगों की सेवा करने में. मजा आ रहा है. इतनी भीड़ देखकर ही मन प्रसन्न हो जा रहा है. · आज नोटबंदी का दूसरा दिन है. चहुँओर से इस कदम की प्रशंसा हो रही है. आम जनता में गजब का उत्साह है. लोग घंटों लाइन में लगे हैं, मगर उनके माथे पर शिकन तक नहीं. बड़े नोटों की कमी की वजह से मेरा पेट जरा जल्दी ही खाली हो रहा है – इस बात का मलाल है, नहीं तो चौबीसों घंटे लोगों की सेवा करने की बात सोच के ही मन प्रफुल्लित हो रहा है. · आज नोटबंदी का तीसरा दिन है. पहले दो दिन तो विरोधियों को सांप सूंघा रहा. वे सोच नहीं पाए कि क्या करें, क्या बोलें, क्या कहें. शायद दो दिन इस विचार में लगे कि उनके पास रखे काल…

सोनम गुप्ता बेवफ़ा क्यों है... / मंजीत ठाकुर

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यह मुई सोनम गुप्ता है कौन, और यह बेवफा क्यों है?
जब इंसान के हाथ में नोट ही न हों, पता लगे कि आपके पास के 86 फीसद, अरे साहब वही 5 सौ और हजार वाले नोट, अब सब्जीवाले, चायवाले, कपड़ेवाले, धोबी, बढ़ई वगैरह-वगैरह नहीं लेंगे। आपको इस साल के खत्म होने से पहले अपने सारे ऐसे नोट बैंक में वापस धर देने हैं, उसके बदले नए कलदार निकारने हैं। आपके मोबाइल में देश से काला धन को जड़ से खत्म कर देने के देशभक्त संकल्प आ-जा रहे हैं, आप ऊर्जा से भरे हैं और प्रधानमंत्री के आदेशानुसार अपने पास पड़े चार हज़ार के बड़े नोटों को चिल्लर में बदलवाने बैंक जा रहे हैं। आपको उम्मीद है कि आप जाएंगे और बैंक मैनेजर फूलों के हार के साथ आपका स्वागत करेगा। आगे का पूरा मनोरंजक आलेख रचनाकार पर यहाँ पढ़ें - http://www.rachanakar.org/2016/11/blog-post_18.html

व्हाट्सएप्प से परेशान हैं? छोड़ने की सोच रहे हैं? तो यह पोस्ट आपके लिए है.

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तकनीक के पंडित बी.एस.पाबला जी ने व्हाट्सएप्प को छोड़ने की घोषणा की है. अपने फ़ेसबुक स्टेटस पर  -स्क्रीनशॉट नीचे है -व्हाट्सएप्प एक नो-नॉनसेंस, बेहतरीन, उच्च दर्जे का कम्यूनिकेशन प्रोग्राम है, इस्तेमाल में बेहद आसान और पूरा- 100% यूजर फ़्रेंडली.परंतु इसकी इन्हीं खूबियों ने इसे बहुतों को रुलाना शुरू कर दिया है. और शायद यही कारण है पाबला जी का व्हाट्सएप्प छोड़ने का. एक दिन उन्होंने स्टेटस छापा था कि उनके व्हाट्सएप्प संदेश में 4500 संदेश दिनभर में आए. इतना संदेश आदमी पढ़ तो क्या देख भी नहीं पाए! व्हाट्सएप्प की सबसे बड़ी समस्या है इसके आपके फ़ोन के तमाम संपर्क को स्वचालित रूप से पॉपुलेट करने की - जिससे पता चल जाता है कि व्हाट्सएप्प पे कौन कौन बंदा तैयार बैठा है और फिर सिलसिला चालू हो जाता है असीमित संदेश भेजने, असीमित समूहों में जोड़ने घटाने का.इसकी एक और बड़ी समस्या है - तमाम मीडिया के स्वचालित डाउनलोड होने का. कुछ बजट फ़ोन के उपयोगकर्ताओं को हवा नहीं रहती और उनका डेटा पैक तो बारंबार, अंतहीन फारवर्ड किए गए उन्हीं सड़ियल जोक, वीडियो और पिक्चर को डाउनलोड में ही हवा हो जाता है और उनके फोन की…

शब्द-उपनिषद् - डा. सुरेन्द्र वर्मा

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शब्द उपनिषद‘ उपनिषद” का शब्दार्थ ‘समर्पणभाव से निकट बैठना’ है.उप का अर्थ है निकट;;नि; से तात्पर्य है’समर्पण’भाव और सद माने बैठना है.ऋषियों के पास बैठकर जिज्ञासुओं को जो ज्ञान प्राप्त हुआ वही उप्निषदों में संकलित है.एक मज़ेदार बात यह है कि जूतों के लिये एक प्राचीन शब्द ;उपानत’ था उपानत का अर्थ है, जिसे निकट लाया जाए. आख़िर जूते हमारे पैरों के सबसे नज़दीक नज़दीक रहने वाली वस्तु है. “उपनिषद” और उपानत,दोनो में इस प्रकार जो भावात्मक सम्बंध है, देख्ते ही बनता है‌,भले ही दोनों के अर्थ में कोई सिर पैर न हो. या,यों कहें ,सिर और पैर का अंतर हो.यदि हम समर्पण भाव से शब्दों के निकट जाएं तो शब्द अपने तमाम रहस्य रहस्य हमारे समक्ष खोल देते हैं. कुछ ऐसे ही शब्दों का जायज़ा लीजिए....आप इस ज्ञानवर्धक आलेख को आगे आप यहाँ रचनाकार.ऑर्ग पर पढ़ सकते हैं - http://www.rachanakar.org/2016/11/blog-post_17.html

निर्विवादित रूप से, दुनिया का सर्वकालिक, सबसे ज्यादा बहुमुखी-प्रतिभा वाला इन्सान!

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मेरे जैसे अलालों के लिये

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अल्टीमेट आविष्कार!

ट्रम्प प्रभाव? झूठा कहीं का!

यह तो कुछ और प्रभाव है!

व्यंग्य जुगलबंदी - एक चुटकी नमक की कीमत तुम क्या जानो रवि बाबू!

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अंततः मैं भी आधा दर्जन पैकेट नमक के ले ही आया. थोड़ी बहुत मशक्कत तो खैर करनी ही पड़ी, और बहुत सारा जुगाड़ भी. जो कि इस देश-वासियों की खासियत या ये कहें कि जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है. छः घंटे की लाइन में लगकर, रात बारह बजे, दैवयोग से खुली किराने की दुकान से, और, उससे भी बड़े दैवयोग से कि मेरा नंबर आते तक स्टॉक खत्म नहीं हुआ. जेब में, जोड़-तोड़ और जुगाड़ से हालिया हासिल किए नए-नकोर पिंक कलर के एक-मात्र दो हजार रुपये के नोट से छः किलो नमक ले आना तो जैसे स्वर्गिक आनंद की तरह था. जी हाँ, स्वर्गिक आनंद. जरा डॉमिनोज़ के एक्स्ट्रा टॉपिंग वाले पित्ज़ा या केएफसी के फ़ाइव-इन-वन मील बॉक्स को बिना नमक के खाने का अहसास कर देखिए. आपके हजार रुपल्ली के माल का वैसे भी स्वाद भूसे जैसा होगा. ऐसे में, हजार रुपए में भी हासिल एक चुटकी नमक अपनी कीमत की औकात बखूबी बता ही देता है. और, मैंने तो वैसे भी हजार रुपए में तीन पैकेट के भाव से नमक खरीदा है. माना कि महीने भर में मेरा नमक-खर्च कोई सौ-पचास ग्राम भी नहीं होगा, मगर भविष्य को सुरक्षित रखना भी तो कोई बात है. आदमी पशु तो है नहीं जो भविष्य की चिंता न करे. यूं…

मेरी अलाली का आखिर मैं क्या करूँ?

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जबकि यह समस्या यूनिवर्सल और जेनेटिक है!

आपके उपकरणों के साइलेंट किलर

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ओह, तो ये हैं हमारे उपकरणों के साइलेंट किलर!

क्या आपकी भी कभी अवमानना हुई है?

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सवाल ये है कि (क्या ) केवल न्यायालय की ही अवमानना (क्यों) होती है?

ओह, तो काला धन इधर था!

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व्यंग्य जुगलबंदी - व्यंग्य का विषय

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व्यंग्य का विषय क्या हो? (चित्र - काजल कुमार http://kajalkumarcartoons.blogspot.in/2016/11/india-kajal-cartoon-orop-khattar-kejriwal-suicide.html का कार्टून) बहुत पुरानी बात है. एक परिपूर्ण, आइडियल, खुशहाल देश हुआ करता था. खुशहाली के इंडैक्स में पूरे सौ में से सौ. पर, वहाँ एक कमी खलती थी. वहाँ सब कुछ था, सारी खुशी थी, परंतु वहाँ, उस देश में कोई व्यंग्यकार नहीं था, कोई व्यंग्य नहीं था. दरअसल, वहाँ व्यंग्य के लिए कोई विषय ही नहीं था. वहाँ के शीर्ष साहित्यकारों ने एक दिन एक आम बैठक बुलाई और व्यंग्य की अनुपलब्धता पर गहन चिंतन मनन किया. देश में, साहित्य में, साहित्यकारों में व्यंग्य कहाँ से, कैसे, किस प्रकार लाए जाएं इस पर गहन विचार विमर्श हुआ. किसी ने कहा – व्यंग्य दिल से निकलता है. लगता है यहाँ दिल वाले नहीं रह गए हैं. किसी ने कहा – व्यंग्य के लिए दुःख जरूरी है, वर्ग-संघर्ष जरूरी है, असमानता आवश्यक है. यहाँ, इस देश में तो चहुँओर खुशियाली है, कहीं कोई दुःख-तकलीफ़ नहीं है, फिर व्यंग्य कहाँ से आएगा? एक ने कहा – व्यंग्य न रहने से साहित्य सूना हो गया है. हम सबको प्रयास कर कहीं न कहीं से…

रे फ़ेसबुक, इब तो फ्रेंड सीमा 5000 हटा ही दे...

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मैं तो, फ़ेसबुक में (ही), पूरी दुनिया को अपना फ्रेंड बनाना चाहूंगा!

विशाल लाइब्रेरी में से पढ़ें >

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