रविवार, 2 अक्तूबर 2016

आइए, अगांधीगिरी की सर्जिकल स्ट्राइक मारें

वो मारा! बुद्ध और गांधी का देश बदले की हिंसक आग में सुलग रहा था. जल रहा था. कुछ इस तरह कि उस आग में स्वयं जला जा रहा था. इससे पहले इतनी आग कभी भी, कहीं भी नहीं लगी थी. सर्जिकल स्ट्राइक ने दिल में थोड़ा सा ही सही, सुकून का ठंडा पानी तो डाला. मामला 40 के बजाए 400 होता तो और ज्यादा सुकून मिलता, और ज्यादा ठंडक मिलती. चहुं और खुशी व्याप्त है. सुकून, चैन और दिल में ठंडक व्याप्त है. चैनलों में, सोशल मीडिया में प्रकटतः और ज्यादा.

कुछ ही समय पहले कुछ इसी तरह की, बदले की आग देश के दक्षिण में लगी थी. पानी ने आग लगाई थी. देश में प्यासे को पानी पिला कर पुण्य बटोरने की प्रथा है, रिवाज है. मेहमान घर में आता है तो सबसे पहले पानी का लोटा दिया जाता है. उसी देश में, कावेरी का पानी तू पिए कि मैं, इस पर दो पड़ोसी भाइयों में आग लगी थी. मामला दो पड़ोसी मुल्कों की बात होती तो फिर भी सिंधु की तरह बात अलग होती. और, यह आग भी भयावह थी. राजनीति प्रेरित जनता के एक वर्ग ने खुद ही, अपने ही अड़ोसी-पड़ोसी के लिए, अपने ही स्टाइल में सर्जिकल स्ट्राइकें मारीं, और सुकून-पे-सुकून हासिल किया. लोगों ने माथे पर क्षेत्र-प्रांत की बिंदी, गाड़ी के लाइसेंस प्लेट पर चिपके नंबर के आधार पर पड़ोसियों के जाति-धर्म-क्षेत्र को पहचाना और आग लगाई. इस सर्जिकल प्रक्रिया में वे खुद झुलसे, खुद आग में मरे. पर, इससे क्या? दिल को सुकून तो मिला. सुलग रहे दिल में ठंडक तो पहुंची. यह आग अभी पूरी ठंडी नहीं हुई है. क्षुद्र राजनीतिक मानसिकता, और न्यायालयीन हस्तक्षेप ने आग में सल्फर का काम किया है. आप पूछेंगे कि ये कौन सा नया मुहावरा आ गया. आग में घी था, वो कहाँ गया. तो भइये, आग तो सर्वत्र है, घी कहाँ और कितना डालोगे? घी की सर्वत्र कमी हो रही है. इसलिए सल्फर ले आए हैं. घी तो फिर भी आग में डल कर यज्ञ जैसा माहौल पैदा करता है. यहाँ तो आग जहरीले किस्म के हो रहे हैं. इसलिए सल्फर. आग भी, धुंआ भी और जहर भी.

देश में जाति और आरक्षण की हिंसक आग तो सदा सर्वदा से लगी हुई है. दो दशक पहले मंडल-कमंडल ने इसमें ऑक्सीजन दिया और तब से लेकर अब तक हर छठे चौमासे जब तब जहाँ तहाँ सर्जिकल स्ट्राइकें होती रहती हैं. ताज़ा सर्जिकल स्ट्राइक जाट आरक्षण का था, जहाँ राजनीति प्रेरित जनता के एक वर्ग ने अपने ही प्रदेश को हिंसक आग में जला डाला, जाति विशेष की पहचान को तबाह कर डाला और इस बहाने मानव के आदिम बर्बरता की पहचान विश्व के सम्मुख रख दी.

कुछ समय से, गांधी और बुद्ध के इस अहिंसक देश में, अहिंसक गौमाता की रक्षा के लिए, अति-हिंसक गौरक्षक रक्त-बीज की तरह नामालूम कहां से, कल्कि अवतार की तरह अवतरित हो गए हैं. वे भी, अपनी सुविधा से, जहाँ मन पड़े, जहाँ भी शक-सुबहा हो, सर्जिकल स्ट्राइकें मारते हैं और तमाम तरह के बर्बर अत्याचार कर अपने गौरक्षक धर्म का प्रचार-प्रसार कर अपने-अपने दिलों में सुकून हासिल करते हैं. अब यह जुदा बात है कि ऐसे फर्जी गौरक्षकों के खात्मे के लिए सर्जिकल स्ट्राइक की ही असल जरूरत देश को है. यूं, देश की बात चली है तो  किसी भी किस्म के सर्जिकल स्ट्राइक को सबसे पहले भ्रष्टाचारियों पर चलाना जरूरी है. परंतु इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं है. और, यदि थोड़ा मोड़ा है भी तो दिखावे के लिए, आधी-अधूरी!

इधर देश प्रांत की सरकारें, सरकारी विभाग, न्यायालय भी नित्य, अपने तरह की नायाब, नई सर्जिकल स्ट्राइकें मारते रहते हैं. एक सर्जिकल स्ट्राइक से शराब-बंदी,  होती है, डांस-बार-बंदी होती है, शहाबुद्दीनों को जमानतें मिलती है, तो दूसरी प्रति-सर्जिकल स्ट्राइक से शराब-बंदी, डांस-बार-बंदी, शहाबुद्दीनों की जमानतें अवैध, गैरकानूनी घोषित होती है.

सोशल मीडिया में तो सर्जिकल स्ट्राइकों के बगैर काम ही नहीं चलता. जातिवादी, धर्म-अधर्म-वादी राष्ट्रवादी, आपिए, वामिए, प्रलेस, दलेस आदि आदि तमाम खेमों के लोग एक दूसरे की पोस्ट-बमों पर अपनी टिप्पणी-बमों से सर्जिकल स्ट्राइक मारते रहते हैं और इस तरह, अधिकांश निष्पक्ष, निस्पृह जनता का घोर मनोरंजन करते रहते हैं. इन सर्जिकल स्ट्राइकों को मारते समय वे यह भूल-भुला जाते हैं कि उनके इन हिंसक लेखन से उनके तथाकथित ज्ञान का क्षद्म आवरण तो निकला जा रहा है, फटा जा रहा है, वे एक्सपोज हो जा रहे हैं, उनकी नंगई उघड़ रही है. परंतु उनके मन में भरी हुई आदिम हिंसक आग यह भान नहीं होने देती.

वैसे, यह आलेख भी अपने तरह का सर्जिकल स्ट्राइक मारने को लिखा गया है. आपको भी सर्जिकल स्ट्राइक मारने का सादर आमंत्रण है. आप अपनी टिप्पणी नुमा सर्जिकल स्ट्राइक से इसे समृद्ध कर सकते हैं या फिर इसकी बखिया उधेड़ सकते हैं. J

1 टिप्पणियाँ./ अपनी प्रतिक्रिया लिखें:

  1. बढिया लेख लिख मारा गांधी जी के बहाने ! बधाई !

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