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पुनर्दलितोभव:

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भारतवर्ष नामक पवित्र पावन देश में तपस्यारत एक सिद्ध ऋषि के सम्मुख एक प्रकटतः दुःखी मानव पहुँचा.
ऋषि ने मन की आँखों से उस दुःखी मानव का हाल जान लिया, मगर इसे प्रत्यक्ष न करते हुए पूछा –
“बोल मानव, क्या दुःख है तुझे?”

“ऋषिवर, मुझे अपनी जाति से बहुत कष्ट है. तमाम अन्य मुझसे उच्च जाति के लोग मुझ पर सदियों से अत्याचार करते आ रहे हैं... मुझ पर कृपा करें महाराज...”

“जा.. तुझे आज से तेरी वर्तमान जाति से थोड़ी उच्च जाति का बना दिया... जा.. मौज कर - ओबीसीभवः”

“धन्यवाद... जै हो महाराज..” वह मानव नए, उच्च जीवन की आस में प्रसन्न मन वहाँ से विदा हुआ.

कुछ दिनों के बाद वह व्यक्ति ऋषि के पास फिर पहुँच गया. प्रकटतः वह पहले से अधिक दुःखी था. इस बार भी ऋषि ने उसके मन की बात अपनी छठी इंद्रिय से जान ली, मगर प्रकटतः उससे पूछे –
“अब क्या कष्ट है भक्त?”

“कष्ट तो बढ़ गया है मुनिवर. कुछ करिए... अब तो मुझे मुझसे नीची जाति वालों से भी कष्ट है और ऊंची जाति वालों से भी. समस्या बढ़ गई है महाराज...”

“जा... आज से तुझे सर्वोच्च जाति का बना दिया... जा... मौज कर... ब्राह्मणोभवः”

“मुनिवर की जै हो, ऋषिवर की जै हो...” मारे खुशी के चिल्लाता हुआ मानव प्रस्थान कर गया.
मगर इधर थोड़े समय बाद ही वह मानव पुनः ऋषिवर के सम्मुख प्रस्तुत था.

उसका चेहरा निचुड़ा हुआ था, गर्दन लटकी हुई थी और वह दुःखों से लबरेज था. वह अत्यंत दुःखी था.
सर्वज्ञानी मुनि ने, जाहिर है मानव के दुःख के कारण को जान लिया, और भयंकर रूप से क्रोधित हो उठे. पर, इस बार भी न अपने क्रोध, रोष को प्रकट किया न मानव मन के अंतर्द्वंद्व को. पूछा – अब क्या कष्ट है मानव?

“मुनिवर, ऋषिवर, मैं अज्ञानी, निपट गंवार... मुझे पता नहीं था... मैं गलत था. मुझे माफ कर दीजिए... मेरे नए अवतार में तो मेरी अब कहीं कोई पूछ परख ही नहीं है...तमाम सोशल मीडिया, टीवी, अख़बार, नेता, राजनीति, सरकारी नीतियों आदि में मेरी इस नई जाति के लिए कहीं कोई स्कोप ही नहीं है... बू हू हू...”
ऋषि को दया आ गई. उनका हृदय पिघल गया. भक्त के प्रति भगवान सदैव कृपारत होते हैं.

ऋषि ने अपना हाथ उठाया और आशीर्वाद दिया – पुनर्दलितोभव:















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