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सिस्टम अपडेट उपलब्ध है… क्या आप अभी अपडेट करना चाहते हैं?

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कुछ दिनों पहले मेरा विंडोज कंप्यूटर, जो पिछले दशक से, बिलानागा हर दूसरे हफ्ते अपडेट होता रहता था, फुल विंडोज 10 पर मुफ़्त में अपग्रेड हुआ तो कुछ मामले ठीक हुए तो बहुत से उलझे. सबसे बड़ी समस्या थी सिस्टम से आ रहे घटिया, शोर युक्त साउंड की. जब कोई उपाय नहीं सूझा तो साउंड चिपसेट निर्माता की साइट से नवीनतम ड्राइवर डाउनलोड कर फोर्स इंस्टाल किया गया तो मामला जमा. अब जब मामला कुछ जमा तो, अच्छे के लिए हुए इस अद्यतन – माने अपडेट में हुई इस गड़बड़ी के लिए मियाँ मरफ़ी याद आए, और बहुत याद आए. तो बन गए मरफी के कंप्यूटर सिस्टम, स्मार्टफ़ोन अपडेट नियम. आप भी आनंद लें, और आपके जेहन में कुछ अक्स उभरते हैं तो उन्हें भी साझा करें.मरफ़ी के कंप्यूटर सिस्टम, स्मार्टफ़ोन अपडेट / अपग्रेड नियम· जब कोई जरूरी काम होता है, तभी अपडेट के लिए सिस्टम फ्रीज़ रहता है. · जरूरी काम सिस्टम फ्रीज़ अपडेट लेकर आता है. · जब कोई जरूरी ऐप्प अपडेट आता है तभी बैटरी लो हो जाती है. · जब बैटरी लो हो जाता है तभी जरूरी ऐप्प अपडेट आता है और जिसके लिए फुल बैटरी आवश्यक होती है. · जिस अपडेट के लिए फुल बैटरी जरूरी होती है वहाँ न तो बि…

मैं हिंदू रहूंगा न मुसलमान रहूंगा…

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आप कहेंगे कि अब ये क्या शीर्षक है. क्या इतनी असहिष्णुता आ गई है जो भारत भूमि के दो बड़े धर्म को छोड़ने की बात कर रहे हो.परंतु, जरा ठंड रखिए. पिछले दिनों मेरे पेट में कुछ क्रॉनिक संक्रमण की समस्या हुई, तो मैंने चिकित्सक को दिखाया. चिकित्सक ने रोग निदान में पाया कि, एक परजीवी, जो कि दुनिया की आबादी के करीब 50 प्रतिशत व्यक्तियों के पेट में बिना नुकसान पहुँचाए मौजूद रहती है, वह थोड़ी अधिक सक्रिय हो गई है. उसकी अति सक्रियता के कारण पेट में गैस, अपच, जलन आदि समस्याएँ होती हैं, और जब तक लंबा ट्रीटमेंट न लिया जाए, निदान नहीं होता. मेरे साथ यही समस्या थी. जब तब पेट अपसेट होता, ओवर द काउन्टर दवाई ली, आराम मिल जाता. परंतु फिर कुछ दिन बाद यही समस्या. अंततः यह पता चला कि इस समस्या से मुक्ति पाने के लिए 'कम्प्लीट क्योर' यानी संपूर्ण रोग निदान होना चाहिए.अब, इसके लिए चिकित्सक ने कोई आधा दर्जन गोलियाँ लिख दीं. जिसमें एक दो तो जाहिर है एंटीबैक्टीरियल ही थीं, साथ में कुछ विटामिन्स और फूड सप्लीमेंट एडेड सबस्टैंस जो पेट यानी अंतड़ियों और लीवर की हालत भी इस लंबी चिकित्सा में ठीक रखे. बताता चलूं कि…

हिंग्लिश इज़ कूल यार!

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हिंग्लिश इज़ कूल यार!रवि रतलामीपहले पहली बात. बधाई. हम महान भारत के वासियों ने हाल ही के दिनों में एक नई भाषा ईजाद कर ली है और गर्व से उसे अपना भी लिया है. और उसका नाम है – हिंग्लिश. यकीन नहीं होता? यह नीचे का स्क्रीनशॉट देखें – यह एक नवीनतम एप्पल उपकरण की भाषा सेटिंग का स्क्रीनशॉट है, जिसमें भाषा और कीबोर्ड सेटिंग में यह मौजूद है. विश्व की तमाम बड़ी भाषाओं के बीच गर्व से सीना उठाए अपनी प्रविष्टि दर्ज कराए हुए – हिंग्लिश नाम की, अपनी नई भाषा, नया की-बोर्ड. न केवल एप्पल, बल्कि दो अन्य प्रमुख प्लेटफ़ॉर्म - एंड्रायड और विंडोज़ में भी हिंग्लिश कीबोर्ड की सम्मानित उपस्थिति लंबे समय से है. मेरे बचपन की भाषाआज कोई मुझसे पूछे कि मेरी मातृभाषा क्या है? तो, मैं शायद थोड़े से शर्म और झिझक से कहूंगा – हिंग्लिश. क्योंकि मेरी भाषा में – लेखन और वाचन – दोनों में, अंग्रेज़ी के शब्दों की भरमार होती है. एक-2 वाक्य में 40-50 प्रतिशत तक शब्द अंग्रेज़ी के आने लगे हैं – ठीक आज के हिंदी अखबारों की भाषा के अनुरूप. अकसर हिंदी भाषा के अख़बारों को गरियाया जाता है कि उन्होंने हिंग्लिश अपना लिया है, मगर वास्तविकत…

हिंदी में स्थानीयकरण (लोकलाइज़ेशन) की समस्याएँ

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हिंदी में स्थानीयकरण (लोकलाइज़ेशन) की समस्याएँ - रवि रतलामी ( रविशंकर श्रीवास्तव, 101, आदित्य एवेन्यू, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 ) हिन्दी कम्प्यूटर की पृष्ठभूमिमैं पिछले पच्चीसेक वर्ष से हिन्दी साहित्य लेखन से जुड़ा हुआ हूँ हालांकि मैंने कोई धुआँधार नहीं लिखा है, न ही जाने- पहचाने लेखकों की श्रेणी में मेरा नाम है, मगर लेखन की यह यात्रा अमूमन अनवरत जारी है. यह तो सभी को पता है कि किसी भी रचना को प्रिंट मीडिया में प्रकाशित करवाने के लिए आपको पहले अच्छी हस्त- लिपि में लिख कर या टाइप करवा कर भेजना होता है. अब से कोई पच्चीस साल पहले, मैं इस कार्य को आसान बनाने के तरीकों को हमेशा ढूंढता रहता था. जब मैं अस्सी दशक के उत्तरार्ध में पीसी एटी (33 मेगाहर्त्ज प्रोसेसर, 1 मेगाबाइट मेमोरी, 20 मेगा बाइट हार्ड डिस्क और 1.44 मेगाबाइट फ्लॉपी ड्राइव) पर डास आधारित हिन्दी शब्द संसाधक अक्षर' पर कार्य करने में सक्षम हुआ तो मैंने उस वक्त सोचा था कि यह तो किसी भी हिन्दी लेखक के लिए अंतिम, निर्णायक उपहार है. लिखना, लिखे को संपादित करना और जब चाहे उसकी प्रति छाप कर निकाल लेना - कितना आसान हो गया था…

शब्दवेधी - अरविंद कुमार की आत्मकथा - शब्दवेध : एक समीक्षा

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आधुनिक, समकालीन हिंदी सृजनधर्मियों का नाम अगर लिया जाए, तो अरविंद कुमार का नाम सर्वोपरि होगा. हिंदी के एकमात्र समांतर कोश के कोशकार अरविंद कुमार हाल ने ही में अपने 86 वें जन्मदिवस पर प्रकाशित अपनी आत्मकथा - शब्दवेध में सत्तर सालों के अपने हिंदी शब्द संसार के अनुभवों को बेहद खूबसूरती और दिलचस्प, साथ ही जानकारी परक तरीके से संजोया है.अरविंद कुमार के हिंदी थिसारस की आवश्यकता मुझे तब हुई जब मैं 2000 के आसपास हिंदी कंप्यूटरीकरण के कार्य में जुटा. सॉफ़्टवेयरों के हिंदी स्थानीयकरण में हम लोगों के एक समूह इंडलिनक्स ने शुरूआत की थी, और कहीं कोई मानक आदि नहीं होने से अंग्रेज़ी शब्दों के हिंदी अनुवादों के लिए अकसर शब्दकोशों की जरूरत होती थी. संदर्भानुसार कई शब्दों के विविध विकल्पों पर विचार होता था, और साथ ही भारत के विशाल भूभाग और कई तरह की हिंदी से समस्या विकराल होती थी. उदाहरण के लिए एक थीम था - पंपकिन. उसका हिंदी शब्द ढूंढने निकले तो कई रूप सामने आए - कद्दू, पेठा, लौकी, घिया, कुम्हड़ा, कोंहड़ा आदि आदि और न जाने क्या क्या. हिंदी समांतर कोश ने ऐसे समय में हमारा बहुत कुछ काम आसान किया और बहुत स…

इंडस - एक नया, भारतीय भाषाई स्मार्टफ़ोन ऑपरेटिंग सिस्टम

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यदि इसकी आधिकारिक साइट http://www.indusos.com पर जाएँ, और वहाँ दिए गए चित्रमय दावों पर विश्वास करें, तो यह सवा अरब भारतीयों के लिए उनकी अपनी भाषा वाला शानदार स्मार्टफ़ोन / टैबलेट वाला लोकप्रिय ऑपरेटिंग सिस्टम बन सकता है. वैसे तो एंड्रायड वन तथा माइक्रोमैक्स मोबाइल फ़ोनों में भारतीय भाषाओं में यूआई (ग्राफिकल यूज़र इंटरफ़ेस ) सहित तमाम भारतीय भाषाई सुविधाओं युक्त स्मार्टफ़ोन पहले से ही आ रहे हैं, परंतु भारतीय भाषाओं में उचित और आवश्यक ऐप्प पर्याप्त संख्या में न होने के कारण उनकी स्वीकार्यता जरा कम ही रही है और यदि उपयोगकर्ता इन सुविधाओं वाले स्मार्टफ़ोन खरीदते भी हैं तो वे अंततः अंग्रेज़ी इंटरफ़ेस का ही उपयोग करते हैं. एक बड़ा कारण भारतीय भाषाई इंटरफ़ेस का उपयोग नहीं करना घटिया और अमानक अनुवादों का भी है जिससे उपयोगकर्ताओं में कन्फ़्यूजन पैदा होता है. इसके बारे में विस्तार से यहाँ लिखा है. उम्मीद है कि इंडस न केवल अमानक अनुवादों के संबंध में गुणवत्ता पर पर्याप्त ध्यान देगा, पर्याप्त संख्या में भाषाई ऐप्प भी लाएगा जिससे इसकी स्वीकार्यता बढ़ेगी. यूँ तो यह इंडस भी एक तरह से एंड्रायड का ही …

पुनर्दलितोभव:

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भारतवर्ष नामक पवित्र पावन देश में तपस्यारत एक सिद्ध ऋषि के सम्मुख एक प्रकटतः दुःखी मानव पहुँचा.
ऋषि ने मन की आँखों से उस दुःखी मानव का हाल जान लिया, मगर इसे प्रत्यक्ष न करते हुए पूछा –
“बोल मानव, क्या दुःख है तुझे?”

“ऋषिवर, मुझे अपनी जाति से बहुत कष्ट है. तमाम अन्य मुझसे उच्च जाति के लोग मुझ पर सदियों से अत्याचार करते आ रहे हैं... मुझ पर कृपा करें महाराज...”

“जा.. तुझे आज से तेरी वर्तमान जाति से थोड़ी उच्च जाति का बना दिया... जा.. मौज कर - ओबीसीभवः”

“धन्यवाद... जै हो महाराज..” वह मानव नए, उच्च जीवन की आस में प्रसन्न मन वहाँ से विदा हुआ.

कुछ दिनों के बाद वह व्यक्ति ऋषि के पास फिर पहुँच गया. प्रकटतः वह पहले से अधिक दुःखी था. इस बार भी ऋषि ने उसके मन की बात अपनी छठी इंद्रिय से जान ली, मगर प्रकटतः उससे पूछे –
“अब क्या कष्ट है भक्त?”

“कष्ट तो बढ़ गया है मुनिवर. कुछ करिए... अब तो मुझे मुझसे नीची जाति वालों से भी कष्ट है और ऊंची जाति वालों से भी. समस्या बढ़ गई है महाराज...”

“जा... आज से तुझे सर्वोच्च जाति का बना दिया... जा... मौज कर... ब्राह्मणोभवः”

“मुनिवर की जै हो, ऋषिवर की जै ह…

जानिए कि मेरी हाई-टैक चाहत कैसे पूरी हो रही है…

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कोई दस साल पहले मैंने हास-परिहास में ही सही, कुछ चाहत पूरी होने की ख्वाहिश पाली थी. जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं
अब आइए, देखते हैं कि इनमें से कितनी पूरी हुईं -

1 - मैंने ऐसा तकनीकी गॅजेट चाहा था जो ऑल-इन-वन किस्म का हो. जिसे मैंने आई-मॉड नाम दिया था. तब आई-पॉड आया था, आईफ़ोन नहीं, और स्मार्टफ़ोनों की दस्तक सुनाई दे रही थी. तब मैंने इसमें वास्तविक वास्तविक विस्तारणीयता व परिवर्धनीयता (स्केलेबिलिटी और अपग्रेडेबिलिटी) चाही थी - जो अब मॉड्यूलर स्मार्ट फ़ोन के आने से यह चाहत पूरी हो गई है.
2 - ट्राई बैंड ड्यूअल प्लेटफ़ॉर्म की सुविधा - अब तो यह सामान्य फ़ीचर है, ड्यूअल ट्रिपल सिम के साथ!
3 - पीडीए (पर्सनल डिजिटल असिस्टेंट) व ब्लूटूथ आदि सुविधा हो - दुनिया इससे कहीं आगे बढ़ गई है. अब तो हेल्थ असिस्टेंट भी आ गया है!
4 - अंतर्निर्मित पूर्ण व्यवसायिक कैमरा व कैमकॉर्डर हो जिसमें अंतर्निर्मित मिनिएचर डीवीडी रेकॉर्डर हो - यह सुविधा तो लो एंड के फ़ोनों में भी सामान्य बात है.
5 - अंतर्निर्मित स्पीकर सहित एएम-एफ़एम-वर्डस्पेस रेडियो तथा अंतर्निर्मित एफएम ट्रांसमीटर हो - क्या? तब ऐसी सुविधा एक सपना थी? …

फेसबुक खाओ पीओ ओढ़ो बिछाओ, और कहीं मत जाओ!

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फ्रीबेसिक्स में मुंह की खाने के बाद अब एक नया पैंतरा

द ओनियन का देसी संस्करण - द लल्लनटॉप?

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फेकिंग न्यूज़ हिंदी में अरसे से चल रहा है और बढ़िया चल रहा है. इसी श्रेणी में अब नया नाम जुड़ा है - द लल्लनटॉप का.सरसरी निगाह मारने पर साइट सुरूचिपूर्ण तरीके से तैयार लगती है. सामग्री भी थोड़ा गंभीर, थोड़ा-बहुत हास्य-व्यंग्य है. और, लगता है कि इस रोस्टियाई जमाने में यह लल्लनटॉप दूर की पारी खेलेगा.

साहित्य के डिजिटल सफर में आप सादर आमंत्रित हैं - ऐप्प की दुनिया में आएं

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हिंदी का विस्तार चहुँओर हो रहा है. इंटरनेट पर तो धूम मची है. फ़ेसबुक-व्हाट्सएप्प पर हर कोई जो देवनागरी (या कि अलाल लोग रोमन हिंदी ) में टाइप करने की शिक्षा पा चुका है, हिंदी में पोंक रहा है. बहरहाल, यदि आप साहित्यिक पठन पाठन व लेखन में रुचि रखते हैं तो आपके लिए एक अदद नया ऐप्प आ गया है - मातृभारती.मातृभारती ऐप्प एंड्रायड व आईओएस के लिए उपलब्ध है. इसकी बड़ी खासियत यह है कि यह नए लेखकों को आमंत्रित तो करती ही है, आपकी रचना के एवज में भुगतान का वादा करती है. यह ऐप्प निःशुल्क उपलब्ध है और इसकी सारी सामग्री भी निःशुल्क पठन पाठन के लिए उपलब्ध है.ऐप्प को आप प्लेस्टोर पर Matrubharti से सर्च कर इंस्टाल कर सकते हैं. संदर्भवश, आपको बताते चलें कि रचनाकार का भी ऐप्प है, आपके इस पसंदीदा ब्लॉग छींटे और बौछारें का भी, और तो और, वर्ग पहेली का भी ऐप्प है. तो देर किस बात की? इंस्टाल कीजिए! अब तो दुनिया ही ऐप्पों की है!

मुझे भी एक ऐसा ऐप्प चाहिए!

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ये ल्यौ। एक ऐसा ऐप्प आ गया है जो ये बता देगा कि आपका बच्चा अगर रो रहा है तो आखिर क्यों।
इसके लिए बड़ी उन्नत टेक्नॉलाज़ी का उपयोग किया गया है और बच्चे के रोने के तरीके, इंटैंसिटी आदि आदि के जरिए विश्लेषण कर आपको सूचित किया जाता है कि बच्चा इस वजह से रो रहा है।
यह तो कमाल हो गया है। अब जब

कि तकनीक उपलब्ध है, बहुत सारी संभावनाएं बनती हैं।
* ऐप्प बताएगा कि आपका लाइफ पार्टनर आज अगर कुछ एब्नार्मल बिहैव कर रहा है तो आखिर क्यों।
* ऐप्प बताएगा कि किसी सरकारी दफ्तर में आपकी फाइल को आगे सरकाने या क्लीयर करने के लिए सरकारी बाबू कितना मुंह खोलेगा।
* ऐप्प बताएगा कि कोई नेता अपने चुनावी भाषण में कोई वादा करते समय सीरियस है या महज जुमला फेंक रहा है।
* आदि - आदि।

अब तो फेसबुक छोड़ ही दीजिये!

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खासकर तब जब फेसबुक फ्रीबेसिक्स का डब्बा गोल होने वाला है!

हिंदी के अच्छे दिन तो समझो आ ही गए!

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और, ये कोई अप्रैल फूल पोस्ट या व्यंग्य नहीं है!

विश्व पुस्तक मेला दिल्ली 2016 - कुछ झलकियाँ

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किताबों से हमें, बहुत सहारा मिलता है -पर, हमें किताबों से क्या लेना देना?द्विभाषी रामायण -जाति-जाति की किताबें -पतली किताबें, मोटी किताबें -बेस्ट ऑफ किताब्स -हाँ यह तो है -वाह जिंदगी वाह भी मिली! -और, अंत में, विमोचन? -

विशाल लाइब्रेरी में से पढ़ें >

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