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स्टीफन हॉकिंग - 75 वर्षीय जिजीविषा को सलाम!

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स्टीफन हॉकिंग 75 साल के हो गए। कोई 50 साल पहले डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे और कहा था कि हॉकिंग साल-दो-साल और जी पाएंगे।

परंतु उन सभी को धता बताते हुए वे जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं। वैसे, आधुनिक तकनीक और चिकित्सा सुविधा से भी यह संभव हो सका है। बहुतों के प्रेरणा स्रोत हैं हॉकिंग। खासकर गंभीर रूप से बीमार लोगों के लिए।
स्टीफन हॉकिंग को ढेर सारी शुभकामनाएं।

हाय! 101 वें साल में हमारा क्या होगा?

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और, हमारे 500 वें साल का, 1000 वें साल का क्या?

क्या पॉलिटिक्स है पार्टनर?

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आप वामी हैं, आपिए हैं, दक्षिण पंथी हैं या फिर शुद्ध कांगी। आप जो भी हैं, इसके जिम्मेदार आप नहीं हैं!

आ गया! मुफ़्त, निःशुल्क, शुद्ध परिणाम वाला हिंदी ओसीआर

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और, यह इंडसैंज के हिंदी ओसीआर से भी अधिक शुद्ध है. यदि इसे कमांड मोड में बैच मोड में इस्तेमाल किया जाए, तो यह तेज भी है. बहरहाल, इसके इंस्टाल करने व इस्तेमाल करने के बारे में विस्तृत जानकारी श्रीदेवी कुमार ने गूगल तकनीकी हिंदी समूह में दी है, जिसे यहाँ दी जा रही है. मैंने इसे प्रयोग किया और पाया कि ठीक-ठाक इमेज फ़ाइल में अशुद्धि का प्रतिशत पांच (5) प्रतिशत से भी कम है. और यही बात इस निशुल्क, ओपनसोर्स ओसीआर को लाजवाब बनाती है. यह वस्तुतः ओपनसोर्स ओसीआर प्रोग्राम टैसरैक्ट का जीयूआई पोर्ट है.इसे प्रयोग करने की विधि यह है -1. निम्न लिंक में से अपने कंप्यूटर के हिसाब से प्रोग्राम को डाउनलोड कर इंस्टाल करें. यदि आप सुनिश्चित नहीं हैं कि आपका कंप्यूटर 64 बिट का है या 32 बिट का तो आप नीचे वाली लिंक का प्रोग्राम डाउनलोड कर इंस्टाल करें. यह सभी कंप्यूटरों में काम करेगा: https://smani.fedorapeople.org/tmp/gImageReader_3.2.0_qt5_x86_64_tesseract-25fed52.exehttps://smani.fedorapeople.org/tmp/gImageReader_3.2.0_qt5_i686_tesseract-25fed52.exe2. उसके बाद 4.0.0alpha Hindi traineddata यहाँ से डाउनलोड क…

अक्षर - यूनिकोड हिंदी रेमिंगटन कुंजीपट युक्त - बहुभाषी, बहु-सुविधा युक्त भारतीय भाषाई शब्द संसाधक

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इस बहुभाषी बहु-सुविधा युक्त शब्द संसाधक को भानुमति का पिटारा कह सकते हैं.क्योंकि इसमें है -हिंदी, गुरुमुखी, शाहमुखी और अंग्रेजी  लिपि में लिखने की सुविधाप्रत्येक लिपि में दर्जनों कीबोर्ड में लिखने की सुविधा.उदाहरण के लिए, हिंदी में -इनस्क्रिप्टअनमोल हिंदीचाणक्यडेवलिसकृष्णाकृतिदेवकुंडलीमुगलनारदपारसशुषाकीबोर्ड लेआउट से हिंदी यूनिकोड टाइपिंग की सुविधा. और, यह विंडोज़ 10 में शानदार काम करता है.इसका अर्थ है कि विंडोज 10 में रेमिंगटन कीबोर्ड लेआउट से यूनिकोड टाइप करने की चिरकालिक समस्या का निदान.सोने में सुहागा यह है कि इसमें हिंदी का अंतर्निर्मित वर्तनी जांचक (स्पेल चेकर) भी है. हालांकि चलाने में यह थोड़ा अजीब किस्म का है, और टाइप करते वर्तनी जांच की सुविधा नहीं है.क्या इतने से ही इसे भानुमति का पिटारा कह सकते हैं? बिल्कुल नहीं.  आगे और भी सुविधाएँ हैं इसमें -[ads-post]बहुभाषी लिप्यंतरण (पुराने फ़ॉन्ट की सामग्री को यूनिकोड में) की सुविधाहिंदी में -तीन दर्जन से अधिक फ़ॉन्ट को यूनिकोड में बदलने की सुविधा. वह भी फार्मेटिंग, फ़ॉन्ट आकार, फ़ॉन्ट रंग आदि में बिना किसी बदलवा के, फ़ॉर्मेटिंग बनाए …

व्यंग्य जुगलबंदी : तूने किया कैसा ये कर्म है, देश दिसम्बर में भी गर्म है

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दिसम्बर में देश

(चित्र साभार - कस्बा ब्लॉग)

दिसम्बर की एक सुबह, कड़ाके की ठंड में ठिठुरता दुकालू देश का हाल जानने के लिए निकला।


सबसे पहले उसकी मुलाकात हल्कू से हुई। अपने खेत में हल्कू सदा सर्वदा की तरह आज भी जुटा हुआ था। मौसम की मार और बिगड़ी बरसात ने पिछली फसल खराब कर दी थी तो उसके लंगोट का कपड़ा प्रकटतः  इंच भर और छोटा हो गया था। और सदा की तरह उसकी छाती उधड़ी हुई थी, जिसे वस्त्र सुख वैसे भी वार-त्यौहार ही हासिल हो पाता था। ठंडी बर्फीली हवा जहाँ पूरी दुनिया में ठिठुरन पैदा कर रही थी, हल्कू के पसीने से चचुआते शरीर को राहत प्रदान कर रही थी ।


दुकालू आगे बढ़ा। सामने स्मार्ट  सिटी की नींव खुद रही थी। काम जोर शोर से चल रहा था। होरी नींव खोदने के दिहाड़ी काम में लगा था। होरी ने जब से होश संभाला है तब से उसने दैत्याकार भवनों की नींव ही खोदी है। अनगिनत भवनों को उनकी  नींव की मजबूती होरी के पसीने की बूंदों  से ही मिली है। लगता है जैसे सर्वशक्तिमान परमपिता परमेश्वर ने उसे खास इसी काम के लिए बनाया है। हां, उसी ईश्वर ने, जिसने ब्रह्मांड बनाया, निहारिकाएं बनाई और, और यह उबड़-खाबड़ धरती भी बना…

फेसबुक तूने बहुत दुखी कीना

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संगीत श्रवण पुनर्परिभाषित - डॉल्बी एटमॉस

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संगीत के दीवानों के लिए - आपके एंड्रॉयड स्मार्टफ़ोन पर आ गया है - डॉल्बी एटमॉस। लिनोवो तथा मोटोरोला के कुछ फोन पर यह उपलब्ध है और खबर है कि अगले साल यह विंडोज व एक्सबाक्स में भी उपलब्ध हो जाएगा। मैंने इस तकनीक को हाल ही में जांचा परखा और पाया है कि यह वास्तव में अविश्वसनीय रूप से उत्तम है। हालांकि संगीत का यह उत्तम अनुभव तभी मिलेगा जब आपके संग्रह में आधुनिक, उच्च गुणवत्ता के गीत संगीत हों।
उदाहरण के लिए, राजकपूर के गाने में अनुभव सही नहीं मिलता है क्योंकि तब रिकार्डिंग तकनीक अच्छी नहीं थी। परंतु हृतिक रौशन, जाकिर हुसैन, ब्रिटनी स्पीयर्स के गीत डॉल्बी एटमॉस से सुनने में एक नया समां बांध देते हैं।

अबकी, मौका हमें भी तो दो!

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अबकी बार, किसकी सरकार?

सन् 2016 का वैरायटीज़ से भरा साल - कार्टूनिस्टों की नज़र में

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कार्टूनिस्टों की नजर में वर्ष 2016 कैसा रहा? लेखा जोखा दिसम्बर 2016 के हिंदी फ़ेमिना में उपलब्ध है. इस्माइल लहरी, मन्जुल, कीर्तीश भट्ट और अजीत नैनन मौजूद हैं यहाँ. मेरे पसंदीदा कार्टूनिस्ट काजल कुमार को भी होना चाहिए था यहाँ, मगर ख़ैर. मैंने फ़ेमिना के इस अंक को अपने स्मार्टफ़ोन में मुफ़्त जियो मैग्स ऐप्प के जरिए पढ़ा है और इसके कुछ पन्ने आपसे नीचे साझा किए हैं - ऐप्प पर वहाँ मौजूद साझा विकल्प के जरिए. यदि आपके पास रिलायंस जियो कनेक्शन है तो आप भी जियो मैग्स ऐप्प डाउनलोड कर यह अंक मुफ़्त में डाउनलोड कर इसका आनंद उठा सकते हैं - हाँ, अच्छे अनुभव के लिए आपके स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन पांच इंच या बड़ी होनी चाहिए. टैबलेट पर यह और अच्छे से पढ़ा जा सकता है. बाजार में प्रिंट मैग्जीन का विकल्प तो खैर है ही - कीमत - केवल 40 रुपए.

व्यंग्य जुगलबंदी - कैशलेस इकॉनॉमी

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“भारत में कैशलेस इकॉनॉमी”. पर एक मेघावी विद्यार्थी (वो, जाहिर है, सीए इन्टर्न था) का लिखा निबंध आपके अवलोकनार्थ अविकल प्रस्तुत है –कैशलेस इकॉनॉमी की सोच बहुत ही फासीवादी, निरक्षर किस्म की, तुगलकी, फूहड़ और निकृष्ट विचार वाली है. यह ऐसा विचार है, जिसको अपना कर भारत प्रागैतिहासिक काल वाली स्थिति में पहुंच जाएगा. बहुत पीछे चला जाएगा. उसकी प्रगति खत्म हो जाएगी. भारत में क्या, कहीं भी कैशलेस इकॉनॉमी की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए. कैशलेस इकॉनॉमी भी कोई इकॉनॉमी होती है भला? जहाँ कैश नहीं वहाँ इकॉनॉमी कैसी? कैशलेस इकॉनॉमी से बहुतों का धंधा चौपट हो जाएगा. सबसे पहले चार्टर्ड एकाउन्टेंटों का धंधा चौपट होगा. जब हर ट्रांजैक्शन, हर लेन-देन खाता बही में दर्ज होगा, सारा कुछ ब्लैक एंड व्हाइट में दर्ज होगा, तो फिर भला हम चार्टर्ड एकाउन्टेंटों को कौन पूछेगा? कैशलेस इकॉनॉमी से भयंकर मंदी आएगी. ऐसी मंदी जिससे देश कभी उबर नहीं सकेगा. कैशलेस सिस्टम से दो नंबर का धंधा बंद हो जाएगा, जिससे बहुत सारी इंडस्ट्री बंद हो जाएगी. स्टील और सीमेंट आदि सैक्टर में तो तालाबंदी हो जाएगी. जिस देश की इंडस्ट्री में सत्तर प्रत…

सरदी की वापसी उर्फ एक मफलर की वापसी

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एक गुलुबन्द यानी मफलर की वापसी.शीर्षक में आधुनिक, कूल-डूड, भारतीय पाठकों को गुलुबन्द का अर्थ बताना बनता है ना? नहीं तो बहुत से लोगों को आइडेन्टिटी क्राइसिस हो जाएगा. बहरहाल, सरदी का मौसम लौट आया है और साथ में गुलुबन्द भी. मैंने भी अपनी आलमारी से अपना गुलुबन्द निकालने की कोशिश की तो उसने निकलने से मना कर दिया. मैंने पूछा, भइए, क्या बात है? किस बात की नाराजगी? तो वह बेहद भावुक हो गया. देश में भावुक होने का मौसम है. प्रधान मंत्री से लेकर प्रधान न्यायाधीश सभी भावुक हो रहे हैं. हर छोटी बड़ी बात पर. मैं भी बड़ा भावुक होकर यह तथाकथित व्यंग्य जुगलबंदी लिख रहा हूँ – जिसे पढ़कर (या शायद घोर अपठनीय होने के कारण हिकारत से देख कर) पाठक लोग और ज्यादा भावुक होंगे और कहेंगे – ये व्यंग्य है? व्यंग्य का स्तर इतना न्यून! फिर वे और भावुक हो जाएंगे. तो, बात गुलुबन्द की भावुकता की हो रही थी. वो बेहद भावुक होकर बोला – किसी ने मेरी अपनी इच्छा, मेरी अपनी अभिलाषा पूछी है? फिर उसने पूरी भावुकता में अपनी अभिलाषा कुछ यूँ बयान की - गुलुबन्द यानी मफलर की अभिलाषाचाह नहीं, मैं सुरबाला के
गले में लिपट जाऊँ,
चाह नहीं…

कैशलेस की टेक्नोलॉजी : आइए, कैशलेस अपनाएँ और सुखी रहें

कल्पना कीजिए कि आप बाहर यात्रा के लिए निकले हैं, ट्रेन पकड़नी है, और समयाभाव व ट्रैफ़िक जाम की वजह से थोड़ी जल्दी में भी हैं. अचानक आपको याद आता है कि आप अपना टूथब्रश और टूथपेस्ट रखना भूल गए हैं. कोई बात नहीं, आप इसे रास्ते चलते परचून की दुकान से खरीदने के लिए रुक जाते हैं. दुकान वाला पहले ही किसी अन्य खरीदार से जूझ रहा होता है. उसे निपटाकर वह आपसे मुखातिब होता है. आप जल्दी में हैं, आपके ट्रेन छूट जाने का समय हो रहा है, मगर दुकानदार को आपकी यह अर्जेंसी पता नहीं है, तो वो अपने हिसाब से आपको सामान देता है. फिर आप खरीदी हुई वस्तु का भुगतान करते हैं तो एक और समस्या आती है. आपके पास केवल बड़े नोट हैं और दुकानदार के पास आपको देने को पर्याप्त छुट्टे नहीं हैं. इस आपाधापी में आपकी ट्रेन छूट जाती है.

अब अपनी इस कल्पना में थोड़ा सा ट्विस्ट कीजिए. आप जिस दुकान पर टूथपेस्ट लेने जा रहे हैं, वहाँ आरएफआईडी सेंसर युक्त कॉन्टैक्टलेस पेमेंट की सुविधा है और आपने भी कॉन्टैक्टलैस पेमेंट वाला आरएफआईडी टैग युक्त रिस्टबैंड पहना हुआ है. आप दुकान में घुसते हैं, टूथपेस्ट, टूथब्रश उस दुकान के काउंटर से उठाते ह…

खाए, पिए, अघाए और... तरक्की पसंद नहीं करने वालों का है फेसबुक!

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सदी का सबसे बड़ा सरकारी चुटकुला

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डीओटी : देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स

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दुनिया में आईओटी यानी इंटरनेट ऑफ़ थिंग्सकी विचारधारा अभी आई ही थी, कि अब एक नई विचारधारा ने पूरी दुनिया को लपेट में ले लिया है. डीओटी यानी देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स. इतना कि इसके सामने इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स प्रागैतिहासिक काल की अवधारणा लगने लगी है. अब पूरी दुनिया देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स की ओर तेजी से अग्रसर हो रही है. न्यूयॉर्क से लेकर बस्तर तक और दिल्ली से लेकर वाशिंगटन तक लोग अपना अपना राष्ट्रगान हर यथासंभव स्थान और समय पर गा रहे हैं और राष्ट्रवाद का ट्रम्पेट बजा रहे हैं. आइए, आपको ले चलते हैं कुछ लाइव शो में जहाँ आप देखेंगे कि देशभक्ति ऑफ़ थिंग्स के पीछे भारतीय मन मानस किस तरह डूब-उतरा रहा है – दृश्य एक – सीपीडबल्यूडी हैडक्वार्टर पर एक नामचीन ठेकेदार, महा-मुख्य-अभियंता से जो अपना पिछला तीन टर्म एक्सटेंशन करवाने में ऑलरेडी महा-सफल हो चुके हैं : “सर, एक जबरदस्त राष्ट्रवाद स्कीम का आइडिया लाया हूँ. सीधे पचास परसेंट का खेल हो सकता है. पूरे देश में मकानों-दुकानों-सरकारी-गैर-सरकारी बिल्डिंगों के बाहरी रंग को अनिवार्य रूप से तिरंगे रंग में करने का प्लान लाया जाए. टेंडर और वर्क-ऑर्डर तो सदा की तरह अपन…

राष्ट्रवादी सरकार की राष्ट्रवादी न्यायपालिका!

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सिनेमा ही क्यों, हर टीवी चैनल पर हर सीरियल के पहले राष्ट्रगान सुनाया जाना चैये! अनिवार्य रूप से! लोगों की राष्ट्रभक्ति तो जाने कहाँ गायब हुई जा रही है, उसे इसी जरिए से वापस लाया जा सकेगा.घर घर में, हर घर में.चलो, अब मूवी थोड़ा लेट भी हो जाएंगे तब भी चलेगा. बल्कि थोड़ा लेट जाने से ही ठीक रहेगा :)

नया रुपया पुराना रुपया

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इधर मैंने वह खबर टीवी पर देखी,  उधर मेरे दिमाग का हाजमा खराब हुआ था. मुझे रात में हजारों सूरज दिखाई देने लगे थे. सुबह ही मैंने एटीएम से पूरे पाँच हजार रुपए निकलवाए थे – पाँच पाँच सौ के पूरे दस नोट. वे अब मुझे चिढ़ाते से प्रतीत हो रहे थे. रात बारह बजे के बाद से वो महज कागज के टुकड़े भर रह जाने वाले थे.

रॉबर्ट के हाथ में भी टीवी का रिमोट था. उसके टीवी में भी, तमाम चैनलों में वही सुर्खियाँ थीं. वह भी वही खबर देख सुन रहा था. खबर सुन कर उसकी भी आंखें फटी रह गई थी. वह भी घबरा गया था. अलबत्ता उसके घबराने की वजह मुझसे जुदा थी. वह भागा. भागकर अपने बॉस लॉयन के पास पहुँचा था. पसीने से सराबोर, हाँफते हुए उसने लॉयन से फरियाद की थी – “बॉस अब अपना क्या होगा? सरकार ने देश में पुराने नोट बंद कर दिए हैं और बदले में नए नोट चलाने का फैसला कर लिया है. इस तरह तो हमारा धंधा चौपट हो जाएगा. मार्केट में हमारे फ्रेश नक़ली नोट जो असली कटे-फटे, सड़े-गले वोटों की तुलना में ज्यादा आथेंटिक दिखते हैं उसका तो डिब्बा ही गोल हो जाएगा. ऊपर से बहुत सारा माल मार्केट में आने को तैयार है उस स्टाक का क्या होगा? हम तो कहीं के…

रेत में से तेल निकालने की क्लासिक कवायद

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वह भी पूरी तरह देसी, निपट भारतीय.

नोटबंदी - बिजनेस की नई, नायाब संभावनाएं

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ओह, तो अब पता चला कि नए नोट कहां जा रहे हैं और नए नोटों की मारामारी क्यों है!

मंत्रियों का असली काम क्या है?

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ओह, तो यह है मंत्रियों का असल काम-

भक्त एटीएम विरुद्ध आपिया एटीएम

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भक्त एटीएम विरुद्ध आपिया एटीएम नोटबंदी के साइड-इफ़ेक्ट के चलते काम के अधिक बोझ की वजह से एटीएम खराब हो रहे हैं. सुधारने के लिए तकनीशियन बुलाए जा रहे हैं. एक तकनीशियन के हाथ दो एटीएम का रिकवर्ड डेटा मिला. एक था भक्त एटीएम और दूसरा था आपिया एटीएम.पहले भक्त एटीएम का रिकवर्ड डेटा मुलाहिजा फरमाएँ –· आज नोटबंदी का पहला दिन है. वाह क्या सर्जिकल स्ट्राइक मारा है काले धन और भ्रष्टाचारियों पर. पूरी मुस्तैदी से लगा हूँ, लोगों की सेवा करने में. मजा आ रहा है. इतनी भीड़ देखकर ही मन प्रसन्न हो जा रहा है. · आज नोटबंदी का दूसरा दिन है. चहुँओर से इस कदम की प्रशंसा हो रही है. आम जनता में गजब का उत्साह है. लोग घंटों लाइन में लगे हैं, मगर उनके माथे पर शिकन तक नहीं. बड़े नोटों की कमी की वजह से मेरा पेट जरा जल्दी ही खाली हो रहा है – इस बात का मलाल है, नहीं तो चौबीसों घंटे लोगों की सेवा करने की बात सोच के ही मन प्रफुल्लित हो रहा है. · आज नोटबंदी का तीसरा दिन है. पहले दो दिन तो विरोधियों को सांप सूंघा रहा. वे सोच नहीं पाए कि क्या करें, क्या बोलें, क्या कहें. शायद दो दिन इस विचार में लगे कि उनके पास रखे काल…

सोनम गुप्ता बेवफ़ा क्यों है... / मंजीत ठाकुर

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यह मुई सोनम गुप्ता है कौन, और यह बेवफा क्यों है?
जब इंसान के हाथ में नोट ही न हों, पता लगे कि आपके पास के 86 फीसद, अरे साहब वही 5 सौ और हजार वाले नोट, अब सब्जीवाले, चायवाले, कपड़ेवाले, धोबी, बढ़ई वगैरह-वगैरह नहीं लेंगे। आपको इस साल के खत्म होने से पहले अपने सारे ऐसे नोट बैंक में वापस धर देने हैं, उसके बदले नए कलदार निकारने हैं। आपके मोबाइल में देश से काला धन को जड़ से खत्म कर देने के देशभक्त संकल्प आ-जा रहे हैं, आप ऊर्जा से भरे हैं और प्रधानमंत्री के आदेशानुसार अपने पास पड़े चार हज़ार के बड़े नोटों को चिल्लर में बदलवाने बैंक जा रहे हैं। आपको उम्मीद है कि आप जाएंगे और बैंक मैनेजर फूलों के हार के साथ आपका स्वागत करेगा। आगे का पूरा मनोरंजक आलेख रचनाकार पर यहाँ पढ़ें - http://www.rachanakar.org/2016/11/blog-post_18.html

व्हाट्सएप्प से परेशान हैं? छोड़ने की सोच रहे हैं? तो यह पोस्ट आपके लिए है.

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तकनीक के पंडित बी.एस.पाबला जी ने व्हाट्सएप्प को छोड़ने की घोषणा की है. अपने फ़ेसबुक स्टेटस पर  -स्क्रीनशॉट नीचे है -व्हाट्सएप्प एक नो-नॉनसेंस, बेहतरीन, उच्च दर्जे का कम्यूनिकेशन प्रोग्राम है, इस्तेमाल में बेहद आसान और पूरा- 100% यूजर फ़्रेंडली.परंतु इसकी इन्हीं खूबियों ने इसे बहुतों को रुलाना शुरू कर दिया है. और शायद यही कारण है पाबला जी का व्हाट्सएप्प छोड़ने का. एक दिन उन्होंने स्टेटस छापा था कि उनके व्हाट्सएप्प संदेश में 4500 संदेश दिनभर में आए. इतना संदेश आदमी पढ़ तो क्या देख भी नहीं पाए! व्हाट्सएप्प की सबसे बड़ी समस्या है इसके आपके फ़ोन के तमाम संपर्क को स्वचालित रूप से पॉपुलेट करने की - जिससे पता चल जाता है कि व्हाट्सएप्प पे कौन कौन बंदा तैयार बैठा है और फिर सिलसिला चालू हो जाता है असीमित संदेश भेजने, असीमित समूहों में जोड़ने घटाने का.इसकी एक और बड़ी समस्या है - तमाम मीडिया के स्वचालित डाउनलोड होने का. कुछ बजट फ़ोन के उपयोगकर्ताओं को हवा नहीं रहती और उनका डेटा पैक तो बारंबार, अंतहीन फारवर्ड किए गए उन्हीं सड़ियल जोक, वीडियो और पिक्चर को डाउनलोड में ही हवा हो जाता है और उनके फोन की…

शब्द-उपनिषद् - डा. सुरेन्द्र वर्मा

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शब्द उपनिषद‘ उपनिषद” का शब्दार्थ ‘समर्पणभाव से निकट बैठना’ है.उप का अर्थ है निकट;;नि; से तात्पर्य है’समर्पण’भाव और सद माने बैठना है.ऋषियों के पास बैठकर जिज्ञासुओं को जो ज्ञान प्राप्त हुआ वही उप्निषदों में संकलित है.एक मज़ेदार बात यह है कि जूतों के लिये एक प्राचीन शब्द ;उपानत’ था उपानत का अर्थ है, जिसे निकट लाया जाए. आख़िर जूते हमारे पैरों के सबसे नज़दीक नज़दीक रहने वाली वस्तु है. “उपनिषद” और उपानत,दोनो में इस प्रकार जो भावात्मक सम्बंध है, देख्ते ही बनता है‌,भले ही दोनों के अर्थ में कोई सिर पैर न हो. या,यों कहें ,सिर और पैर का अंतर हो.यदि हम समर्पण भाव से शब्दों के निकट जाएं तो शब्द अपने तमाम रहस्य रहस्य हमारे समक्ष खोल देते हैं. कुछ ऐसे ही शब्दों का जायज़ा लीजिए....आप इस ज्ञानवर्धक आलेख को आगे आप यहाँ रचनाकार.ऑर्ग पर पढ़ सकते हैं - http://www.rachanakar.org/2016/11/blog-post_17.html

निर्विवादित रूप से, दुनिया का सर्वकालिक, सबसे ज्यादा बहुमुखी-प्रतिभा वाला इन्सान!

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मेरे जैसे अलालों के लिये

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अल्टीमेट आविष्कार!

ट्रम्प प्रभाव? झूठा कहीं का!

यह तो कुछ और प्रभाव है!

व्यंग्य जुगलबंदी - एक चुटकी नमक की कीमत तुम क्या जानो रवि बाबू!

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अंततः मैं भी आधा दर्जन पैकेट नमक के ले ही आया. थोड़ी बहुत मशक्कत तो खैर करनी ही पड़ी, और बहुत सारा जुगाड़ भी. जो कि इस देश-वासियों की खासियत या ये कहें कि जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है. छः घंटे की लाइन में लगकर, रात बारह बजे, दैवयोग से खुली किराने की दुकान से, और, उससे भी बड़े दैवयोग से कि मेरा नंबर आते तक स्टॉक खत्म नहीं हुआ. जेब में, जोड़-तोड़ और जुगाड़ से हालिया हासिल किए नए-नकोर पिंक कलर के एक-मात्र दो हजार रुपये के नोट से छः किलो नमक ले आना तो जैसे स्वर्गिक आनंद की तरह था. जी हाँ, स्वर्गिक आनंद. जरा डॉमिनोज़ के एक्स्ट्रा टॉपिंग वाले पित्ज़ा या केएफसी के फ़ाइव-इन-वन मील बॉक्स को बिना नमक के खाने का अहसास कर देखिए. आपके हजार रुपल्ली के माल का वैसे भी स्वाद भूसे जैसा होगा. ऐसे में, हजार रुपए में भी हासिल एक चुटकी नमक अपनी कीमत की औकात बखूबी बता ही देता है. और, मैंने तो वैसे भी हजार रुपए में तीन पैकेट के भाव से नमक खरीदा है. माना कि महीने भर में मेरा नमक-खर्च कोई सौ-पचास ग्राम भी नहीं होगा, मगर भविष्य को सुरक्षित रखना भी तो कोई बात है. आदमी पशु तो है नहीं जो भविष्य की चिंता न करे. यूं…

मेरी अलाली का आखिर मैं क्या करूँ?

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जबकि यह समस्या यूनिवर्सल और जेनेटिक है!

आपके उपकरणों के साइलेंट किलर

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ओह, तो ये हैं हमारे उपकरणों के साइलेंट किलर!

क्या आपकी भी कभी अवमानना हुई है?

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सवाल ये है कि (क्या ) केवल न्यायालय की ही अवमानना (क्यों) होती है?

ओह, तो काला धन इधर था!

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व्यंग्य जुगलबंदी - व्यंग्य का विषय

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व्यंग्य का विषय क्या हो? (चित्र - काजल कुमार http://kajalkumarcartoons.blogspot.in/2016/11/india-kajal-cartoon-orop-khattar-kejriwal-suicide.html का कार्टून) बहुत पुरानी बात है. एक परिपूर्ण, आइडियल, खुशहाल देश हुआ करता था. खुशहाली के इंडैक्स में पूरे सौ में से सौ. पर, वहाँ एक कमी खलती थी. वहाँ सब कुछ था, सारी खुशी थी, परंतु वहाँ, उस देश में कोई व्यंग्यकार नहीं था, कोई व्यंग्य नहीं था. दरअसल, वहाँ व्यंग्य के लिए कोई विषय ही नहीं था. वहाँ के शीर्ष साहित्यकारों ने एक दिन एक आम बैठक बुलाई और व्यंग्य की अनुपलब्धता पर गहन चिंतन मनन किया. देश में, साहित्य में, साहित्यकारों में व्यंग्य कहाँ से, कैसे, किस प्रकार लाए जाएं इस पर गहन विचार विमर्श हुआ. किसी ने कहा – व्यंग्य दिल से निकलता है. लगता है यहाँ दिल वाले नहीं रह गए हैं. किसी ने कहा – व्यंग्य के लिए दुःख जरूरी है, वर्ग-संघर्ष जरूरी है, असमानता आवश्यक है. यहाँ, इस देश में तो चहुँओर खुशियाली है, कहीं कोई दुःख-तकलीफ़ नहीं है, फिर व्यंग्य कहाँ से आएगा? एक ने कहा – व्यंग्य न रहने से साहित्य सूना हो गया है. हम सबको प्रयास कर कहीं न कहीं से…

रे फ़ेसबुक, इब तो फ्रेंड सीमा 5000 हटा ही दे...

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मैं तो, फ़ेसबुक में (ही), पूरी दुनिया को अपना फ्रेंड बनाना चाहूंगा!

व्यंग्य जुगलबंदी : मेरी तेरी उसकी दीवाली

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मेरी तेरी उसकी दीवालीऔरों की तरह इस बार मैं भी, स्वतःस्फूर्त, भरा बैठा था. जम के दीपावली मनाऊँगा. पर, पूरी तरह देसी, राष्ट्रीय किस्म की, पर्यावरण-प्रिय दीपावली. महीने भर पहले से ही तमाम सोशल-प्रिंट-दृश्य-श्रव्य मीडिया में मैंने विविध रूप रंग धर कर चीनी माल, खासकर चीनी दियों, चीनी लड़ियों, और चीनी पटाखों का बहिष्कार कर शानदार देसी दीवाली मनाने का आग्रह-पूर्वग्रह, अनुरोध-चेतावनी सबकुछ देता रहा था. चहुँ ओर से आ रहे ऐसे संदेशों को आगे रह कर फारवर्ड पे फारवर्ड मार कर, और जरूरत पड़ने पर नया रंग रोगन लगा कर फिर से फारवर्ड मार कर यह सुनिश्चित करता रहा कि कोई ऐसा कोई संदेश व्यर्थ, अपठित, अफारवर्डित न जाए. मेरे आग्रह-पूर्वग्रह, अनुरोध-चेतावनी में पर्यावरण-प्रेम भी सम्मिलित था, जिसमें आतिशबाज़ी, पटाखों से दूर रहने और अनावश्यक रौशनी करने, बिजली की लड़ियां लगा कर बिजली की कमी से जूझ रहे देश के सामने संकट को और बढ़ाने के कार्य से दूर रहने का आग्रह भी सम्मिलित था. यही नहीं, मैंने तो अपने मुहल्ले में और अपनी सोसाइटी में भी पूरा दम लगा दिया था कि इस बार की दीपावली पूरी तरह देसी, राष्ट्रीय और पर्याव…

ब्रिटिश लाइब्रेरी अंततः हिंदीमय हुआ...

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भोपाल की ब्रिटिश लाइब्रेरी - वर्तमान नाम विवेकानंद लाइब्रेरी में अंग्रेज़ी और पश्चिमी (जर्मन, फ्रेंच) आदि भाषाओं की किताबें ही मिलती थीं.जनता की बेहद मांग पर हिंदी की किताबें इस वर्ष के हिंदी पखवाड़े से नसीब होने लगी हैं और क्या खूब होने लगी हैं. दूसरी खेप आई है जिसकी ये झलकी है -नए संग्रह में शामिल 20 किताबों की सूची इस प्रकार है ।  मुसाफिर कैफ़े (दिव्य प्रकाश दुबे) बनारस टॉकीज (सत्या व्यास) आज़ादी मेरा ब्रांड (अनुराधा बेनीवाल) मम्मा की डायरी (अनु सिंह चौधरी)  जादू भरी लड़की (किशोर चौधरी) टर्म्स एंड कंडिशन्स एप्लाई (दिव्यप्रकाश दुबे ) ज़िंदगी आइस पाइस (निखिल सचान ) नमक स्वादानुसार (निखिल सचान ) नीला स्कार्फ (अनु सिंह चौधरी ) वो अजीब लड़की (प्रियंका ओम) कुल्फी एंड कैपूचिनो (आशीष चौधरी ) नॉन रेजीडेंट बिहारी (शशिकांत मिश्रा ) लूजर कहीं का (पंकज दुबे) कोस कोस शब्दकोश (राकेश कायस्थ ) इश्कियापा (पंकज दुबे) इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं (विनीत कुमार ) चौराहे पर सीढ़ियाँ (किशोर चौधरी ) मसाला चाय (दिव्य प्रकाश दुबे ) बकर पुराण (अजीत भारती ) ठीक तुम्हारे पीछे (मानव कौल )ज्ञातव्य है कि इन कित…

क्या क्या जांच कर के लें?

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पेट्रोल जांच कर लो, डीजल, गैस जांच कर लो, आटा दाल जांच कर लो। नोट भी जांच कर लो। गोया आदमी नहीं जांच मशीन हो!

ट्विटर, फ़ेसबुक पर आप किस तरह से खांसते छींकते हैं?

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यूँ, सोशल मीडिया में लोग मुखौटे लगाए मिलते हैं, परंतु इन मुखौटों में थोड़ा और पॉलिश करने की जरूरत अब आ ही गई समझो!

व्यंग्य जुगलबंदी - पुनर्धर्मभीरूभव:

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पुनर्धर्मभीरूभव:बहुत पुरानी बात है. धरती पर एक बार एक इंसान गलती से बिना धर्म का, नास्तिक पैदा हो गया. उसका कोई धर्म नहीं था. उसका कोई ईश्वर नहीं था. वो नास्तिक था. चहुँ ओर हल्ला मच गया. आश्चर्य! घोर आश्चर्य!¡ एक इंसान बिना धर्म के, नास्तिक कैसे पैदा हो सकता है. वो बिना हाथ-पैर के, जन्मजात विकृतियों समेत भले ही पैदा हो सकता है, और अब तो विज्ञान की सहायता से बिना मां-बाप के भी पैदा हो सकता है, मगर बिना धर्म के? लाहौलविलाकूवत! ये कैसी बात कह दी आपने! पैदा होना तो दूर की बात, बिना धर्म के कोई इंसान, इंसान हो भी सकता है भला? ताबड़तोड़ उस इंसान को अपने-अपने धर्मों में खींचने की, उसे आस्तिक बनाने की जंग शुरू हो गई. “उद्धरेदात्मनात्मानम् ... वसुधैव कुटुंबकम्...” सहिष्णुता और विश्वबंधुत्व केवल हिंदुओं में है... इसका धर्म हिंदू होना चाहिए. हिंदुओं ने कहा. “बिस्मिल्लाहिर्रहमानेहिर्रहीम...” ईश्वर केवल एक है और उसके सबसे निकट, शांति और सहिष्णुता का धर्म इस्लाम है, वही स्वर्ग जाने का एकमात्र रास्ता है. इसका धर्म इस्लाम होना चाहिए. मुस्लिमों ने अधिकार जताया. “ईश्वर दयालु है- ईश्वर इन्हें माफ करना, …

पाओ जवाब आसानी से!

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हिंदी उपयोगकर्ताओं (को सिखाने) के लिए गूगल ने जोरदार विज्ञापन अभियान निकाला है -कि, अब आप सर्च आदि बहुत सारे काम हिंदी में बोल कर भी कर सकते हैं, और बहुत बेहतर तरीके से कर सकते हैं.  हिंदी (और तमाम अन्य भारतीय भाषाओं की) की ध्वन्यात्मक खूबी के कारण परिणाम बेहद शुद्ध आते हैं.आप भी आजमाएँ. यदि अब तक नहीं आजमाएँ हैं तो!

क्या कभी आप भी गाय की सवारी करना चाहेंगे...?

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कूल काऊ ट्रैकिंग - एक विज्ञापन की तस्वीर. असली. कोई फ़ोटोशॉप्ड नहीं, कोई नकली नहीं.सवार के मुख पर प्रसन्नता की लकीरें बताती हैं कि यह कितना आह्लादकारी होगा! तो चलें, अपन भी ऐसी सवारी करने?नहीं?वैसे, अपने यहाँ भी लोग-बाग अक्सर गाय की सवारी अपने राजनीतिक लाभ के लिए करते रहे हैं. पर, वो आपको भी पता है कि अलग किस्म की अलहदा सवारी होती है, और उसका विजुअल इफ़ेक्ट नहीं, कुछ और इफ़ेक्ट होता है. हाँ, आह्लादकारी तो अवश्य होता होगा - राजनीतिक लाभ की तरह.गऊ भक्तों से अग्रिम क्षमा याचना सहित. स्ट्रिक्टली नो ऑफ़ेंस टू एनीबडी!

क्लाउड कंप्यूटिंग, फॉग कंप्यूटिंग, रेन कंप्यूटिंग, विंड, स्टार्म...

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कंप्यूटिंग की दुनिया आखिर कहां जा कर रुकेगी?

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