December 2015

कल भोपाल शहर में (संभवतः अन्य शहरों में भी दिखा होगा) अद्भुत नजारा दिखा. अंतर्राष्ट्रीय उड़ान की जेट प्लेनें ऊपर आकाश में अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर उड़ते हुए गुजरीं तो अद्भुत पेंटिंग की तरह नजारा बन गया. पहले एक दो, फिर तो सिलसिला चल पड़ा और आकाशीय केनवस पर लगा कि किसी नटखट बच्चे ने आड़ी तिरछी रेखाओं के जरिए नीले कैनवस पर सफेद तूलिका से रंग बिखेर दिए हों.

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हाल ही में, दुनिया को देखते हुए और उसके पीछे चलते हुए, मैंने भी अपना स्मार्टफ़ोन अपग्रेड कर लिया. और इस तरह एप्पल, सेमसुंग और एलजी आदि आदि कंपनियों को घाटे से उबारने में मैंने भी अपना थोड़ा सा योगदान दे दिया. मगर समस्या यह नहीं थी कि मेरा योगदान कितना क्या रहा. समस्या कुछ दूसरे किस्म की रही. अब आपका फ़ोन जब स्मार्ट हो गया है तो समस्या को भी स्मार्ट होना चाहिए कि नहीं!

मेरा पुराना डेटा, कॉन्टैक्ट, हजारों-लाखों की संख्या में बारंबार ठेले गए वाट्सएप्प चुटकुले और चित्र और वीडियो आदि आदि तो मेरे पुराने फ़ोन से आराम से नए फ़ोन में आ गए. इसमें मुझे कहीं कोई समस्या नहीं आई. नया फ़ोन वाकई स्मार्ट है. परंतु इसका इंटरफ़ेस पुराने से कुछ जुदा है कुछ अलग सा है. ठीक है, वो भी झेल लेंगे कोई बात नहीं. प्ल्टेफ़ॉर्म एक ही (एंड्रायड) होने से कोई ज्यादा समस्या भी नहीं.

पर, जल्द ही समस्याएँ सामने आने लगीं. स्मार्टफ़ोन जनित स्मार्ट समस्याएँ.

मेरे नए स्मार्टफ़ोन में एक अदद अतिरिक्त सेंसर लगा है. फिंगर प्रिंट सेंसर तो खैर लगा ही है जिससे कि अब लॉगइन करने के लिए न पिन डालना पड़ता है न कोई निशान खींचना पड़ता है न पासवर्ड भरना पड़ता है, बल्कि सेंसर के ऊपर फिंगर स्वाइप करना यानी उँगली फिराना होता है. पर एक दिन मेरी उँगली जल गई. ऊपर फफोला पड़ गया. अब सेंसर भ्रमित हो गया. ये तो किसी और की उँगली है यह ऐसा सोचकर उसने लॉगिन करने से मना कर दिया. वो तो भला हो स्मार्टफ़ोन का जो थोड़ा अधिक स्मार्ट है, और बैकअप प्लान बना रखा है – पासवर्ड का, तो मेरा काम निकल गया वरना...

हाँ, तो मैं किसी दूसरे सेंसर की बात कर रहा था. इसमें हार्टबीट सेंसर भी है. उस सेंसर के ऊपर हाथ की उँगली थोड़ी देर के लिए रखिए, और यह आपके उम्र आदि के हिसाब से सही हार्ट बीट की गणना कर वास्तविक दिल की धड़कन को पढ़ कर उसमें हो रही समस्या को बता देता है कि आपकी धड़कन में क्या गड़बड़ी है. हो गई न समस्या बैठे ठाले. जो आदमी हार्ट अटैक से पहले डॉक्टर के पास जाने और अपने स्वास्थ्य संबंधी विवरण जानने से परहेज करता रहा हो, उसे उसका स्मार्टफ़ोन पल प्रतिपल दिल की धड़कन के बारे में बताता रहता है कि अभी ठीक है, अभी गड़बड़ है. अब आप अपने दिल पर हाथ रख कर सोचते रहें कि क्या ये अभी धड़क भी रहा है या नहीं! मेरी धड़कन को इसने मापा और बताया कि मेरा प्रतिमिनट धड़कन 71 है जो स्वस्थ व्यक्ति के धड़कन 70 के रेंज से बाहर है और इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए! पूरे 1 धड़कन ज्यादा. मैं अपने कॉर्डियोलॉजिस्ट से एप्वाइंटमेंट लेने की सोच ही रहा था, अब इस स्मार्टफ़ोन ने पुष्टि भी कर दी कि बच्चे जांच पड़ताल करवाओ.

स्मार्टफ़ोनों में अब अंतर्निर्मित हेल्थ ऐप्प भी आ रहे हैं. अगर स्मार्टफ़ोनों में हेल्थ ऐप्प की सुविधा न हो तो वो काहे के स्मार्ट. मेरे इस नए फ़ोन में भी है. तो यह आपके बैग में, आपकी जेब में या आपके टेबल पर रहते हुए भी आपके हेल्थ की चिंता करता रहता है और आपको बताता रहता है कि आपको आज कितना कदम चलना चाहिए, कितना कदम चल चुके, कितना बाकी है, कितनी चर्बी (यानी कैलोरी) आपने बर्न कर ली है और आज के लिए कितना बर्न करना बाकी है ये सब आपको मिनट-दर-मिनट बताता रहता है. यह आपके कदमों की आहट का पता लगाते रहता है और बताता है कि आप कितने कदम चल चुके हैं, कितने कदम और चलना बाकी है. लगता है जैसे कि आप केवल इस स्मार्टफ़ोन के सहारे जी रहे हैं और आपकी सबसे बड़ी समस्या आज के कैलोरी बर्न करने के टारगेट को पूरा करना होता है जो कि आज दिनांक तक कतई संभव प्रतीत नहीं होता – खासकर तब जब टीवी पर इंडिया पाकिस्तान क्रिकेट मैच का तीसरी दफा री-रन आ रहा हो. बुरी बात यह है कि यह स्मार्टफ़ोन बड़े ही स्मार्ट तरीके से नोटिफ़िकेशन के माध्यम से आपको बताता है कि आपने आज अपने अपना लक्ष्य पूरा नहीं किया है!

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आमतौर पर लोगों को अपने स्मार्टफ़ोनों के साथ समस्या ये भी रहती है कि उनके स्मार्टफ़ोनों में कितनी और क्या क्या सुविधाएँ और फंक्शन होते हैं जिनका ज्ञान उन्हें नहीं होता, जिनका प्रयोग करना वे नहीं जानते. कंपनियां बहुत ही फूहड़ होती हैं, फ़ोन को फ़ोन नहीं रहने दे रहीं बल्कि भानुमति का पिटारा बनाए दे रही हैं. अभी कल की ही बात है. मैं अपना टीवी ऑन करने के लिए रिमोट ढूंढ रहा था जो कहीं दब छुप गया था. इतने में पड़ोस का 6 वर्षीय होनहार को जो किसी काम से आया था, मेरी व्यथा देख कर मेरे हाथों में नया स्मार्ट मोबाइल देख कर बोला – अंकल, आप रिमोट क्यों ढूंढ रहे हैं? क्या आपको पता नहीं है कि रिमोट तो आपके इस स्मार्टफ़ोन में भी है. इसके रिमोट से अपना टीवी चालू कर लीजिए ना!

धत् तेरे की! स्मार्टफ़ोन आपके स्मार्टनेस की हवा कभी भी कहीं भी निकाल सकता है – एक छः वर्षीय के सामने भी. और यही सबसे बड़ी समस्या है.

फ़ेसबुक का फ्रीबेसिक्स का भ्रामक गोयबल्सिया अभियान जारी है.  आज भी अखबारों में पूरे दो पन्नों का विज्ञापन है. फ़ेसबुक के पास इफरात पैसा होने का यह दो पेजिया विज्ञापन सबूत है, और इस पैसे के दम पर लोगों को गुमराह करने की नाकाम कोशिश है. बड़ी ही सफाई से कॉपी राइटरों ने नैटन्यूट्रैलिटी का तोड़ डिजिटल इक्वैलिटी निकाला है. मगर फ़ोकट में फ़ेसबुक (और बंडल में एक दो और साइटें दे ) दे देने मात्र से क्या डिजिटल इक्वैलिटी मिल जाएगी? वॉट्स्एप्प में पिली पड़ी भारतीय जनता क्या इतनी बेवकूफ़ है?

शायद नहीं!

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व्यंज़ल

इंटरनेट के मैदान पर एक और सिक्स
लगाने की चाल है फ़ेसबुक फ्रीबेसिक्स

नैटन्यूट्रैलिटी का हमें क्या करना है
जब मुफ़्त में है फ़ेसबुक फ्रीबेसिक्स

दुनिया अब जल्द भूल जाएगी गूगल
इंटरनेट का मतलब फ़ेसबुक फ्रीबेसिक्स

दुनिया में नहीं मिलती फोकट की दारू
क्या सही में फ्री है फेसबुक फ्रीबेसिक्स

याहू से चला था रवि गूगल पे आया
खत्म करेगा सफर फेसबुक फ्रीबेसिक्स

फ़ेसबुक का और अधिक कमाई करने का महा विज्ञापन अभियान जारी है. आज तो मामला हाईप्रोफ़ाइल एनबीए (नर्मदा-बचाओ-आंदोलन) की तरह नजर आ रहा है.
फ़ेसबुक का भारतीय जनता को बेवकूफ़ बनाने (समझने?) और  नेटन्यूट्रैलिटी कार्यकर्ताओं का छीछालेदर करने का नया अभियान है ये -

फ़ेसबुक के मुफ़्त इंटरनेट के झांसे में न आएँ, कृपया!

अंग्रेज़ी गानों के लिए लिरिक यानी गीतों के बोल पढ़ने की सुविधा तो बहुत पहले से है. परंतु हिंदी में, वो भी देवनागरी में किसी प्लेयर में गीत सुनते सुनते गीत पढ़ने की सुविधा जरा कम ही मिलती है.
अचानक ही मुझे एक ऐप्प मिला - म्यूजिक्समैच (गूगल प्ले स्टोर पर सर्च करें - musixmatch) यह हिंदी देवनागरी में तथा हिंदी रोमन में हिंदी गानों के बोलों को रीयल टाइम में दिखाता चलता है. तमाम लोकप्रिय गीतों के बोल यह इंटरनेट से ढूंढ-ढांढ कर आपको दिखाता है. बहुत से स्वयंसेवी लोगों ने तथा गीत-संगीत प्रेमियों ने विभिन्न डेटाबेसों में हिंदी गानों के बोलों को इंटरनेट पर अपलोड कर रखा है. यह ऐप्प, आपके स्मार्टफ़ोन पर बज रहे गाने को पहचान कर, वहीं से गीतों के बोल उठाता है, औ आपको दिखाता है (यदि डेटाबेस में आपका गीत मिल गया तो)
जरा नीचे देखें -
इसकी खूबी यह है कि यह एक म्यूजिक प्लेयर तो है ही, गीतों के बोल दिखाने के लिए आपके दूसरे संगीत प्लेयर के साथ भी काम कर सकता है.




वह भी एक झटके में !
अब हमें अपने सदियों पुराने रेजर ब्लेड से छुटकारा मिल जाएगा। क्योंकि अब एकदम नई टेक्नॉलजी का लेजर रेजर ब्लेड आ गया है। जिसमें  आपको मिलेगा बेहतरीन  क्लोज शेव वह भी बिना पानी साबुन के। ऊपर से कट लगने का डर भी नहीं। 
कब खरीद रहे हैं इसे आप? 


यदि आप गीत-संगीत के दीवाने हैं, तो डॉल्बी को जानते होंगे. और अच्छी तरह से.

अभी तक तो मैं समझता रहा था कि डॉल्बी ऑडियो के लिए न्यूनतम हार्डवेयर आवश्यकताएँ होंगी ही, कोई खास चिप या सर्किटरी होती ही होगी.
परंतु टेक्नोलॉज़ी जो न कर दें कम है!

अब आपके विंडोज 10 पीसी पर डॉल्बी डिजिटल और डॉल्बी डिजिटल प्लस दोनों ही माइक्रोसॉफ़्ट एज ब्राउज़र के जरिए उपलब्ध होंगे - सॉफ़्टवेयर के जरिए.

ओह आह वाह! क्या बात है! आज ही एक स्टीकर ले आते हैं - अपने पुराने जमाने के पीसी के लिए जिस पर अभी ही हमने एज ब्राउजर चढ़ाया है - डॉल्बी डिजिटल प्लस का! क्योंकि हमारा पीसी भी अब हो गया है डॉल्बी डिजिटल युक्त. अब महंगे संगीत प्लेयरों का क्या काम जब हमारा पीसी ही डॉल्बी डिजिटल युक्त है!



खांटी ब्लॉगरों को विंडोज लाइव राइटर का नाम न केवल मालूम होगा, बल्कि वे इसकी उपयोगिता से वाकिफ भी होंगे.
मेरे लिए यह औजार जीमेल से भी बढ़कर था, और अब तक नित्य उपयोग में आता था. मेरी ब्लॉगिंग की उत्पादकता को श्रेय यदि दिया जाए, तो उसमें बड़ा हाथ विंडोज लाइव राइटर का भी होगा.

परंतु अब विंडोज लाइव राइटर की मौत हो गई है. कम से कम मेरे लिए.
बहुत तकनीकी तो नहीं, परंतु मोटे तौर पर जो बात समझ में आई है वो यह है कि माइक्रोसॉफ़्ट ने इस 10 साल पुरानी तकनीक को डेवलप करना बंद कर दिया था और यह केवल ऑक्सीजन के सहारे चल रही थी. इधर गूगल ब्लॉगर ने नई ऑथेंटिकेशन और लॉगिन तकनीक 2 निकाली है, जिसका समर्थन विंडोज लाइव राइटर में नहीं है.

यानी मेरे लिए अब विंडोज़ लाइव राइटर की मौत हो चुकी है. 11 दिसम्बर से यह काम करना भी बंद कर चुका है. शायद भविष्य में कोई काम न आए. रेस्ट इन पीस विंडोज लाइव राइटर - WLW जैसा कि लोगबाग प्यार से संक्षिप्त में कहते थे.

परंतु जीवन चक्र चलता रहता है. पुनर्जन्म की अवधारणा के सहारे.
जब विंडोज़ लाइव राइटर के विकल्पों की खोज हुई तो सामने आया - ओपन लाइव राइटर.
वस्तुतः यह विंडोज़ लाइव राइटर का नया संस्करण ही है, जिसे माइक्रोसॉफ़्ट के कुछ कर्मियों ने ओपन सोर्स के तहत सक्रिय डेवलपमेंट के रूप में नया-नया लांच किया है.

प्रारंभ में यह मूल रूप में विंडोज लाइव राइटर की तरह की कार्य करेगा, मगर सक्रिय डेवलपमेंट साइकल और ओपन सोर्स होने के कारण इसके आकार प्रकार और सुविधाओं में तेजी से बढ़ोत्तरी होने की संभावना है. वैसे भी विंडोज लाइव राइटर मेरे लिए अब तक का सबसे बेहतरीन ब्लॉग लेखन औजार था - वह भी तब जब यह सक्रिय डेवलपमेंट में नहीं था. यानी ओपन लाइव राइटर के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग लेखन औजार होने की संभावना से नकारा नहीं जा सकता और इसमें ट्विटर फेसबुक पिंटरेस्ट इंस्टाग्राम जैसे प्लगइन जुड़ने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

ओपन लाइव राइटर को आप यहाँ से डाउनलोड कर जांच परख कर सकते हैं. हालाकि, अभी भी यह ब्लॉगर के नए ऑथेंटिकेशन सिस्टम के लिए समर्थन जुटा नहीं पाया है, मगर इसके डेवलपरों ने भरोसा दिलाया है कि वे इसे जल्द ही लाएंगे.

देखते हैं कितनी जल्दी. क्योंकि अभी तो ब्राउज़र आधारित ब्लॉगिंग से उत्पादकता की वाट लगी हुई है.

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फ़ॉक्सवैगन (या वॉक्सवैगन?) कारों में प्रदूषण का स्तर वास्तविक से कम दिखाने के लिए डिफ़ीट टेक्नोलॉज़ी (चीटिंग या मूर्ख बनाने वाली भी कह सकते हैं) का प्रयोग करने को लेकर उसकी दुनिया भर में थू-थू हो रही है. फ़ॉक्सवैगन को न केवल सफाई देनी पड़ रही है, दुनिया-भर से इस तरह की कारों को वापस बुला कर उन्हें ठीक करने का काम भी कर रही है. इस वजह से न केवल फ़ॉक्सवैगन, बल्कि जर्मनी में स्थित, विश्व की सबसे बड़ी कार निर्माताओं में से एक होने के कारण जर्मनी की अर्थव्यवस्था को झटका लगा है.

मगर यह डिफ़ीट टैक्नोलॉज़ी तो बाई डिफ़ॉल्ट हम भारतीयों के जीन में होता है. इसलिए फ़ॉक्सवैगन की इस डिफ़ीट या चीटिंग टेक्नोलॉज़ी का न केवल स्वागत किया जाना चाहिए, बल्कि उच्चतम टेक्नोलॉज़ी का कोई पुरस्कार भी देना चाहिए जो किसी नोबल-फोबल से कम कतई न हो. क्या गजब की, उन्नत टेक्नोलॉज़ी लगाई थी उन्होंने. जब कारों को दौड़ाया जाता था तब डीजल इंजन धुँए-प्रदूषण की चिंता किए बगैर कार को पूरी शक्ति प्रदान करता था, जिससे चालकों को गाड़ी भगाने में असली आनंद आता था. परंतु जैसे ही इस कार की प्रदूषण जांच की जाती थी, इसकी उन्नत टेक्नोलॉज़ी सक्रिय हो जाती थी और प्रदूषण स्तर मानक स्तर से भी कई गुना कम कर देती थी. जिस किसी के दिमाग की परिकल्पना थी. उसे दाद देनी होगी. हो न हो यह मेरे जैसे किसी भारतीय इंजीनियर के दिमाग की उपज होगी.

अब देखिए न, इधर पेरिस में प्रदूषण पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हो रहा है, दिल्ली में प्रदूषण कम करने सम-विषम गाड़ियाँ चलने और डीजल गाड़ियाँ बंद करने के उपाय किए जा रहे हैं, वही दूसरी ओर हमारे आटो चालक बंधु पेट्रोल इंजन में जुगाड़ फ़िट कर (यह भी चीटिंग डिवाइस का देसी संस्करण है) केरोसीन से इसे दौड़ाते हैं और बड़े गर्व से भरपूर काला धुंआ छोड़ते हैं. इधर कोने में प्रदूषण जांच कर प्रमाण पत्र देने वाला भी बिना किसी जांच-पड़ताल किए उसे चालीस रुपए में प्रदूषण अंडर कंट्रोल का प्रमाणपत्र दे देता है. ट्रैफ़िक के सिपाही भी जेब में दस-बीस रुपए ठूंस कर ऑटो के काले धुँए को अनदेखा कर देते हैं. क्योंकि यदि वो इसे अनदेखा न करे तो शाम की बैठक का इंतजाम कैसे होगा, और फिर रात काली हो जाएगी. इस डिफ़ीट टेक्नोलॉज़ी की मजेदार बात यह है कि इसका इंजन भी नशेड़ी होता है. स्टार्ट होने के लिए इसे पेट्रोल सुंघाना पड़ता है. हाँ, एक बार स्टार्ट हो जाए तो फिर यह अपनी मस्ती की चाल में घनघोर धुआँ छोड़ता हुआ अनंत काल तक – जब तक मानव सभ्यता प्रदूषण से मर खप न जाए, चलते रहने की ताकत रखता है.

भारत में डिफ़ीट टेक्नोलॉज़ी को जुगाड़ कहा जाता है. तमाम स्कूली वैनों में और मारूती 800 में जुगाड़ के रसोई गैस के टैंक लगे मिल जाएंगे. भले ही अभी पेट्रोल सस्ता हो गया हो और रसोई गैस महंगी, मगर रसोई गैस की सब्सिडी खत्म करने और इसे महंगा करने में भारतीय वाहनों में लगे इन्हीं गैस किटों का हाथ रहा है. जब आप सड़क पर किसी मारूति वैन के पीछे चल रहे होते हैं तो आती हुई गैस की हल्की सी महक से आपको अपने किचन में होने का सा अहसास होता है. डिफ़ीट टेक्नोलॉज़ी जो न कराए कम है.

विद्युत मंडल की नौकरी के दौरान कई उन्नत किस्म के डिफ़ीट टेक्नोलॉज़ी और डिफ़ीट टेक्नोलॉजिस्ट से पाला पड़ता था. कुछ उदाहरण हैं – एक सर्किट ब्रेकर निर्माता महोदय ने उच्च कमीशन खोरी से तंग आकर इसे बैलेंस करने का शानदार डिफ़ीट टेक्नोलॉज़ी ईजाद किया. सर्किट ब्रेकरों के अंदरूनी हिस्सों में तांबे की जगह लोहा लगाना प्रारंभ कर दिया. पर इन ब्रेकरों को आवश्यकता और सीमा से सदैव अधिक रहने वाले करंट और लो वोल्टेज ने डिफ़ीट कर दिया और ब्रेकर धड़ाधड़ फेल होने लगे. फ़ॉक्सवैगन कारों की डिफ़ीट टेक्नोलॉज़ी की तरह यह भी अंततः पकड़ में आ गई. इसी तरह, जब नए इलेक्ट्रॉनिक मीटर आए, तो डिफ़ीट टेक्नोलॉज़ी में उस्ताद भारतीय उपभोक्ताओं बिजली की खपत कम दर्ज करवाने कई तरह के नए नायाब डिफ़ीट टैक्नोलाज़ी ईजाद किए. किसी ने बाहर से चुंबक लगाया, किसी ने सर्किट में नजर न आने वाला रेजिस्टेंस लगा कर करंट बायपास किया, किसी ने अंडरग्राउंड बायपास किया तो किसी ने सीधे कंटिया ही डाल लिया. वैसे कंटिया लगाकर विद्युत मंडलों की कार्यप्रणाली को डिफ़ीट देने वाले तो यत्र-तत्र-सर्वत्र मिल जाएंगे. एक आईएएस अफसर ने अपने विशाल सरकारी बंगले का (बँगला सरकारी होता है, परंतु निजी क्षेत्र का बिल जेब से भरना होता है) सारा क्षेत्र सरकारी ऑफ़िस के मीटर से रौशन करवा रखा था और इस तरह से भारी बिल को डिफ़ीट देता रहता था.

अब इससे पहले कि आप मेरे इन डिफ़ीटिया किस्सों को पढ़ते पढ़ते इस पृष्ठ को छोड़ने का डिफ़ीटिया मन बनाएँ, किस्सा यहीं समाप्त करते हैं और इल्तिज़ा करते हैं कि आप भी अपना कोई डिफ़ीट टेक्नोलॉज़ी वाला धांसू किस्सा तो सुना दें!

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भारत सरकार ने सरकारी कार्यालयों में मुक्त स्रोत (ओपन सोर्स) सॉफ़्टवेयरों का उपयोग अनिवार्य कर दिया है. 

कोई तेरह वर्ष पहले, मुक्त स्रोत का लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम तथा ऐप्लिकेशन सूट हमने इंडलिनक्स परियोजना के तहत हिंदी भाषा (तथा अन्य भारतीय भाषाओं में) जारी किया था. भागीरथी प्रयास किए थे, जुनून की हद तक जाकर कार्य किये थे, परंतु कोई लेवाल नहीं था - मुफ़्त में भी!

कम से कम अब उस ओर लोगों की निगाहें तो पड़ेंगी ही.

भारत की केंद्रीय सरकार को साधुवाद, जिसने यह बहु प्रतीक्षित, कड़ा, विवेकपूर्ण निर्णय लिया - आप समझ सकते हैं - प्रोप्राइटरी सॉफ़्टवेयर विक्रेताओं की दशकों पुरानी पैठ व लॉबीइंग को धता बता कर यह निर्णय लिया गया है, जो निश्चय ही स्वागत योग्य है. आप समझ सकते हैं कि प्रोप्राइटरी सॉफ़्टवेयर विक्रेताओं के लिए केंद्र सरकार कितनी असहिष्णु हो गई है!

केंद्र सरकार को एक और काम तुरंत करना चाहिए. सीडैक जिस्ट के तमाम उत्पादों को मुक्त स्रोत में तत्काल जारी करना चाहिए. जनता के पैसे से बने उत्पादों का विक्रय किया जाता है जो किसी सूरत उचित नहीं है. सीडैक के उत्पादों के डाउनलोड के लिए बाबूगिरी किस्म की व्यवस्था है जिसमें लॉगिन करना होता है, तमाम एग्रीमेंट करने होते हैं आदि आदि इन्हें भी तत्काल खत्म किया जाए.

मुक्त स्रोत जिंदाबाद!

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