October 2015


दाल के मुहावरे आपने पढ़े सुने होंगे- घर की मुर्गी..., दाल में काला आदि...
लीजिए कुछ नए मुहावरे-

चोरी की दाल बघारना
दूसरे की दाल गलाना
तेरी दाल मेरी दाल
मुट्ठी में दाल
ये मुंह और दाल
ऊंट के मुंह में दाल
आदमी क्या जाने दाल का स्वाद
दूसरे की थाली की दाल ज्यादा गाढ़ी/पीली
काले में दाल
नमक में दाल
घर की दाल बकरी बराबर
दाल के भाव
दाल कमाना
नाहक दाल पकाना
दाल है तो थाली है
खयाली दाल

झांसे में न आइए. यह पोस्टर जो आप रचनाकार पर देख रहे हैं, वो नीतीश-लालू गठजोड़ का विज्ञापन है, जो रचनाकार के पृष्ठों पर एडसेंस  के जरिए आया है. यानी यह रचनाकार पर गूगल एडसेंस का विज्ञापन है, जो देश दुनिया भाषा को ध्यान में रख कर स्वचालित लोड हुआ है. अब तक भारतीय जनता पार्टी और मोदी को तकनीकी, डिजिटल इंडिया, सोशल मीडिया आदि पर अति सक्रिय बताया जाता रहा है और इलजाम लगाए जाते रहे हैं कि इनके ब्रिगेड ने इंटरनेट पर कब्जा जमाया हुआ है. मगर, मुझे तो अभी तक बीजेपी इस बिहार चुनाव में एडसेंस का कोई विज्ञापन बीजेपी का नहीं दिखा. पाठकों को यदि कभी कहीं दिखा हो तो बताएं.

बहरहाल, चुनाव परिणाम चाहे कुछ और कहें, नीतीश-लालू के गठजोड़ ने ऑनलाइन पाठकों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए ऑनलाइन विज्ञापनों का सहारा लेकर इस मामले में ही सही, बाजी तो मार ही ली है.

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लोग एक दूसरे को पाकिस्तान जाकर या समंदर में जाकर डूब मरने की बद्दुआएं देते हैं. लोग मुझे ब्रिटेन में जा मरने की बद्दुआ दें तो मैं उनका बहुत-2 शुक्रगुजार होऊँगा.

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साहित्यकार सदा दुखी होता है. खासकर भारतीय. उसे हर बात का दुख रहता है. जब सरकार वामपंथी झुकाव वाली थी, तो दक्षिण पंथी साहित्यकार जिनका अस्तित्व पवित्र भारत भूमि में होने की कल्पना नहीं की जा सकती, दुखी रहते थे और वामपंथी साहित्यकार इसलिए दुखी रहते थे कि सरकार के कामकाज वामपंथ की विचारधारा के विपरीत हैं. और अब जब घोषित रूप से दक्षिणपंथी झुकाव वाली सरकार है तब तो वामपंथी साहित्यकारों का दुखी होना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है. दक्षिणपंथी साहित्यकार, जिनके अस्तित्व को पहले के वाक्य में खारिज किया जा चुका है, वे भी दुखी हैं क्योंकि सरकार के कामकाज दक्षिणपंथी विचारधारा को स्थापित नहीं करते!

लिहाजा, हर ओर विरोध की पुरजोर आवाजें आ रही हैं. वैसे, साहित्यकार केवल सरकार की ही नहीं, बल्कि एक दूसरे का भी खुलकर और उसी तीव्र्ता से विरोध करते हैं. कोई किसी को प्लास्टिक कवि की उपाधि से नवाजता है तो कोई किसी के कवि-पन को अ-कवि बता कर खारिज करता है. कोशकार-सह-साहित्यकार बताता है कि 90 प्रतिशत कविता कविता नहीं होती - यानी जाहिर है, 90 प्रतिशत कवि कवि नहीं होते. वैसे भी जब कोई बड़ा-तथाकथित-पुरस्कृत-स्थापित कवि किसी कहानीकार की "गद्य" कहानी को टीप-टाप कर अपनी कविता बनाकर पेश कर वाहवाही बटोरते समय उसका चौर कार्य पकड़ लिया जाता है, तब अदने कवियों का क्या हाँ और क्या ना!

 

इधर बहुत से साहित्यकार इसलिए दुखी हो रहे हैं कि विरोध करने के लिए उनके पास कोई बड़ा औजार नहीं है. औजार मने कोई बड़ा पुरस्कार, जिसे वे लौटा कर विरोध दर्ज कर सकें. जो पुरस्कृत हैं उनमें से भी बहुत इसलिए दुखी हो रहे हैं कि अब भेड़चाल में उन्हें भी अपना अच्छा खासा पुरस्कार लौटाना पड़ेगा. कोई इसलिए दुखी हो रहा है कि अगले वाले ने पहले पुरस्कार लौटा दिया और ज्यादा लाइमलाइट ले गया. बाद वाले के लिए तो शायद टीआरपी का मामला ही न बने, और लौटाने-नहीं-लौटाने में फर्क ही न रहे. बाद में कोई पूछे - अरे! आपने भी पुरस्कार लौटाया था क्या? और, यह बात तो और भी ज्यादा दुखदायी होगी. हाँ, पर शायद अच्छी भी होगी. जिन साहित्यकार दुख नईं वेख्या, उ साहित्यकार ही नईं! जो साहित्यकार सदा दुखी नहीं, वो साहित्यकार ही नहीं.

 

साहित्यकार और भी कारणों से दुखी रहते हैं. अव्वल तो उनकी शानदार पांडुलिपियों के लिए कोई प्रकाशक नहीं मिलता, जुगाड़ से या जेब-खर्च देकर कोई प्रकाशक मिल भी जाता है तो 200-300 प्रतियों से अधिक प्रिंट ऑर्डर नहीं होता, उस किताब का शानदार विमोचन नहीं हो पाता, विमोचनोपरांत ढंग से समीक्षाएं आदि नहीं हो पातीं, किताब कोई मुफ़्त में भी लेने को तैयार नहीं होता क्योंकि भारतीय पाठकों के 2 बेडरूम फ्लैट में वैसे भी बच्चों के टैक्स्ट बुक रखने को जगह नहीं तो साहित्यिक किताबें क्या खाक रखेंगे, और, इस तरह ये किताबें ताजिंदगी अपठ रह जाती हैं. वैसे भी, विषय-वस्तु से लेकर भाषा-कथ्य आदि तो घोर अपठनीय रहते ही हैं, ये दीगर बात है.

 

दुख की बहुत सी बातें हो गईं. चलिए, खुश हुआ जाए. चर्चा यहीं बंद करते हैं.

Smile

***

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ओह! आह!! यहाँ तो सभी हमसफर हैं मेरे!

 

व्यंज़ल

जीवन का अर्क है

जिंदगी बस नर्क है

 

तू काला मैं गोरा

बस यहीं फर्क है

 

तू नहीं समझेगा

वाह क्या तर्क है

 

राजनीति में यारों

सब बेड़ा गर्क है

 

पहचानें कैसे रवि

चेहरों में वर्क है

 

****

यूनुस भाई ( https://www.facebook.com/yunus.radiojockey) ने खबर दी है कि अब अपने मोबाइलों में ऐप्प के जरिए विविध भारती को कहीं भी कभी भी सुना जा सकता है. 

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अब हम-आप चाहे जहाँ कहीं भी रहें, यदि अच्छी गति का और निःशुल्क असीमित नेट उपलब्ध है, तो समझिए हम संगीत सुनने वालों के अच्छे दिन आ गए.

वैसे तो कई तरह के जुगाड़ से आप अपने मोबाइल अथवा कंप्यूटिंग उपकरणों के ब्राउज़र में विविध भारती इंटरनेट से स्ट्रीमिंग के जरिए सुन सकते थे, परंतु ऐप्प की बात ही कुछ और है.

आपके पास कोई सा भी स्मार्ट मोबाइल हो - आईफ़ोन, विंडोज़ लूमिया या एंड्रायड (सेमसुंग, एलजी, माइक्रोमैक्स, शियामी, एचटीसी, सोनी, नैक्सस आदि आदि) तीनों के लिए ही ऐप्प जारी किया गया है.

ऐप्प बढ़िया चलता है और आप इसे ऐप स्टोर या प्ले स्टोर में all india radio live नाम से सर्च कर इंस्टाल कर सकते हैं. ध्यान दें केवल all india radio live ऐप ही इंस्टाल करें, अन्यथा मिलते जुलते नामों के भी ऐप हैं जो आपको भ्रमित कर सकते हैं.

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असली ऐप पहला वाला है, जबकि दूसरे दो आकाशवाणी का असली लोगो लगाए हैं, परंतु वह अन्य विकासकर्ताओं द्वारा वैकल्पिक सुविधा प्रदान करने के लिए बनाए गए हैं.

उदाहरण के लिए, एंड्रायड फ़ोनों के लिए, गूगल प्ले स्टोर पर यह सही आल इंडिया रेडियो लाइव ऐप्प इस लिंक पर उपलब्ध है -

https://play.google.com/store/apps/details?id=com.ionicframework.air152951

 

मैंने आल इंडिया रेडियो लाइव के संबंधित ऐप्प को विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म - नोट 2, लूमिया 720 तथा नैक्सस 5 तथा आईफ़ोन 5 में आजमाया तो पाया कि यह इन सभी प्लेटफ़ॉर्म में शानदार कार्य कर रहा है. ऑडियो क्वालिटी अच्छी है और विविध भारती के तो क्या कहने - नो बकवास, नो फ़ालतू विज्ञापन - ओनली एंटरटेनमेंट!

 

इस ऐप्प में, जैसा कि आप ऊपर चित्र में देख रहे हैं - विविध भारती के अलावा, एफ़ एम गोल्ड, एफ़ एम रेनबो, आल इंडिया रेडियो उर्दू सर्विस तथा गुजराती, मराठी, मलयालम और पंजाबी भी शामिल है, और संभवतः ऐप के अपडेट संस्करणों में अन्य चैनल भी शामिल किए जाएं. यानी संगीत का ऐप एक, विकल्प अनेक.

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उत्तर भारत में आमतौर पर चितरी केले ही बहुतायत में मिलते हैं, जो अत्यधिक मीठे होते हैं, और आमतौर पर उन्हें कैल्शियम कार्बाइड में पकाया गया होता है.

दक्षिण भारत में कई तरह के केले मिलते हैं. कुछ खट-मीठे तो कुछ बेहद मीठे. ऊपर जो हरे रंग के केले दिख रहे हैं, वे सर्वाधिक मीठे होते हैं.

ऊपर के चित्र में कोई छः किस्म के केले दिखाई दे रहे हैं.

मजे की बात यह है कि केले वहां पान के ठेलों आदि में भी मिलते हैं. यह चाय-पान की दुकान ही है. फलों के नाम पर केवल केले!

मुझे खासतौर पर लाल दिख रहे केले अधिक पसंद हैं. यह थोड़े महंगे मिलते हैं. यहाँ भोपाल में लाल केले के ऊपर टंगे छोटे केले किसी किसी  मॉल में तथा दक्षिणभारतीय-स्टोर में मिल जाते हैं. परंतु लाल केले आमतौर पर नहीं मिलते. एक बार मैं दक्षिण भारत की यात्रा से इन लाल केलों की पूरी शाखा ही ले आया था. शाखा में लगे रहने पर ये जल्द खराब नहीं होते. मैंने इन लाल केलों का पौधा उगाने की कोशिश भी की थी, परंतु बात नहीं बनी. शायद जलवायु की समस्या हो. छोटे केले यहाँ एक मित्र ने लगाए हुए हैं. अम्बिकापुर के जंगली इलाकों में इसी किस्म के जंगली छोटे केले पाए जाते हैं, जिनका रंग भीतर भी पीला होता है, और वे अधिक खट्टे होते हैं.

क्या आपने इन केलों के अतिरिक्त भी केले देखे या खाए हैं? यदि हाँ, तो हमें भी बताएँ!

गाय पर आधुनिक अत्याधुनिक निबंध  new essay on cow

अपनी प्राथमिक कक्षा की परीक्षाओं में हम सबने गाय पर निबंध लिखे हैं. इधर, तारीखें बदल गई हैं, मौसम बदल गए हैं, तो गाय भी बदल गई है और गाय पर निबंध भी.

यह है प्राथमिक कक्षा के एक विद्यार्थी द्वारा गाय पर लिखा गया ताजा, अत्याधुनिक निबंध –

गाय एक चौपाया जानवर है जो भारत की सड़कों पर रहती है. वह भयंकर भीड़ भरी सड़कों के बीच भी बेखौफ होकर चलती है, और बहुधा वहीं बैठकर पगुराती यानी आराम भी फरमाती है. हम सब उसकी बहुत इज्जत करते हैं क्योंकि वह हमारे लिए मां के समान है और हम सब उसे इज्जत देकर उसके आजू बाजू से निकल जाते हैं. गाय हमारे लिए श्रद्धेय है इसीलिए सड़क पर पहला अधिकार उसका ही होता है. ट्रैफिक पुलिस वाला भी गाय को सड़क से नहीं हटाता. गाय का मुख्य भोजन प्लास्टिक, कचरा आदि है, और इसीलिए वह अधिकतर नगर निगम के कचरा पेटी के आसपास घूमती रहती है. आजकल गाय को चारा नहीं मिलता क्योंकि मवेशियों का चारा अब राजनीतिज्ञों और अफसरों के खाने के काम में आता है. गाय सब्जी बाजार में फेंके गए सड़े गले फल सब्जी भी खाती है और इस तरह सड़ा गला कचरा साफ कर वह मानव जाति का बहुत कल्याण करती है. वैसे भी आजकल भारत में स्वच्छता अभियान पर जोर है, जिसमें गाय का बहुत महत्व है. गाय न हो तो भारत स्वच्छ भी न हो.

गाय का वैज्ञानिक महत्व भी है. हाल ही में एक बड़े नेता ने खुलासा किया कि गाय के गोबर में परमाणु बम के प्रभाव को भी निष्क्रिय करने की ताकत होती है. यह सत्य भी है क्योंकि आधुनिक गाय प्लास्टिक की थैलियाँ ज्यादा खाती है, जो कि वैसे भी नॉन-डिस्ट्रेक्टिबल होते हैं, तो उसे परमाणु बम भी कैसे मिटा सकेगा. वैसे, बहुत लोगों के अनुसार गाय का मूत्र सामने वाले की हर बीमारी – सर्दी से लेकर कैंसर तक का इलाज करने की क्षमता रखता है.

भारत में गाय और भी बहुत काम आती है. न्यायालय में गाय पर कई तरह के पीआईएल लगाए जाते हैं. गाय न होती तो कई एनजीओ, पीआईएल कार्यकर्ता निठल्ले बैठे रहते, न्यायालयों में काम की कमी हो जाती – कई वकील भूखे मर जाते. गोमांस खाने पर बैन उसी राज्य की न्यायालय लगाती है जिस राज्य में सबसे ज्यादा कत्लखाने होते हैं, और जहाँ से सबसे ज्यादा गोमांस निर्यात होता है. भारत की राजनीति में गाय का तो और भी ज्यादा महत्व है. गाय ने न केवल कई नेताओं को विधान-सभा, राज्य-सभा, लोक-सभा की सीटें दिलवाई है, बल्कि कई लोगों को मंत्री पद भी दिलवाया है. इस मामले में गाय बहुत पावर फुल है. वैसे, कभी-कभी गाय ने किसी मंत्री का पद भी लिया है. राजनीति में बहुत आगे जाने की ख्वाहिश रखने वाले अधिकांश लोग अब गाय की सवारी करने लगे हैं.

धार्मिक कार्यों में भी गाय का बहुत महत्व है. प्रेमचंद का गोदान गवाह है कि गाय ने पंडितों के पोंगा कर्मकांडो को बहुत आश्रय दिया है. तमाम टीवी चैनलों में आने वाले बाबा अपने प्रवचनों में गाय के गुण गा-गा कर अपनी टीआरपी और इस तरह अपने को प्राप्त होने वाली दक्षिणा बढ़ाते रहते हैं. ऐसे लोगों के लिए गाय का और अधिक महत्व है. वस्तुतः यदि गाय न होती तो भारत में कोई पंडित, कोई सन्यासी नहीं होता. भारत की धार्मिकता को पैदा करने, बनाए रखने और बढ़ाने में एक किसी वस्तु का नाम लेने कहा जाए तो वह गाय ही होगी.

भारत में गाय को नित्य ऑक्सीटोसिन का इंजैक्शन लगा कर धीमी, पीड़ादायक मौत देने में लोगों को कोई हर्ज नहीं होता है मगर यहाँ गाय को सीधा नहीं मारा जा सकता जबकि पूरे विश्व में गोमांस निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश भारत है. यहाँ खुले आम गोमांस खाया नहीं जा सकता है. अलबत्ता आप बड़े 3-5-7 सितारा होटल में आराम से और बेखटके गोमांस ऑर्डर कर खा सकते हैं.  ऑक्सीटोसिन के इंजैक्शन से प्राप्त किए गए रक्त-कण मिश्रित गाय के दूध को हम गर्व से और शौक से पीते हैं और यह अधिक महंगा भी मिलता है. मगर यहाँ एनीमल प्रोटीन का सस्ता सुलभ स्रोत गौमांस खाना अच्छा नहीं माना जाता, और अपने घरों में गौमांस खाने वालों को भीड़ पीट-पीट कर मार भी सकती है. वैसे, गाय बहुत ही शांत और अहिंसा प्रेमी जानवर है, मगर इस पर निबंध लिखना भी आजकल खतरे से खाली नहीं है. गाय के कारण भाई, भाई नहीं रहते, दोस्त, दोस्त नहीं रह पाते. इस लिहाज से यह आजकल टाइगर से भी ज्यादा खतरनाक हो गई है.

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(इस निबंध को आप 20 में से कितने नंबर देंगे?)

बीएसएनएल ने 7 सितम्बर 2015 को बड़े हो हल्ले के साथ डिजिटल इंडिया कैम्पेन के तहत अपने सभी ब्रॉडबैण्ड कनेक्शनों को न्यूनतम 2 एमबीपीएस करने की घोषणा की थी. ध्यान दीजिए, 7 सितम्बर 2015 को.

पता नहीं कितनों का ब्रॉडबैण्ड 512 केबीपीएस से 2 एमबीपीएस हुआ या कितनों का नहीं, मगर इसके सरकारी पोर्टल पर मामला अभी भी 512 केबीपीएस पर ही अटका है. नीचे का चित्र देखें -

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और, जैसा कि चित्र में दिया गया है - अप टू 2 एमबीपीएस टिल 1 जीबी (यानी कैपिंग??) , 512 बीयांड - तो इसका सीधा सा अर्थ है - जनता को मूर्ख बनाना. यदि ब्रॉडबैंड की न्यूनतम स्पीड 2 एमबीपीएस मान रहे हैं, और कैपिंग (आप देखेंगे कि कैपिंग तो मूर्खता भरा, बहुत कम 1 जीबी है) है, तो इस न्यूनतम 2 एमबीपीएस स्पीड का कोई अर्थ ही नहीं है. और, बीयांड 1 जीबी आप 512 भी क्यों दे रहे हो, 56 केबीपीएस ही देकर एहसान कर देते, क्योंकि आपने तो पूरी दुनिया में घोषणा कर दी है कि हम ब्रॉडबैंड न्यूनतम 2 एमबीपीएस दे रहे हैं!

जाहिर है, 7 सितम्बर की घोषणा केवल लफ़्फ़ाजी या जुमला ही थी. यदि न्यूनतम स्पीड 2 एमबीपीएस मान रहे हैं तो इस स्पीड पर ट्रू अनलिमिटेड कनेक्शन दें, तभी यह सही मायनों में न्यूनतम 2 एमबीपीएस होगा, अन्यथा यह चालाक नेता-अफसरों का मासूम जनता को बेवकूफ बनाने वाला काम ही है।

 

और, यदि यह प्लान साइट, 7 सितम्बर की घोषणा के बाद भी नए रेट से अपडेट नहीं हुई है, तब तो यह और भी अक्षम्य है!

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