टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

September 2015

ज्यादा से ज्यादा भारतियों को इंटरनेट से जोड़ने की एक पहल - 1 करोड़ रेल यात्रियों प्रतिदिन से शुरुआत
जब मैं एक छात्र था, मैं चेन्नई सेंट्रल स्टेशन (तब मद्रास सेंट्रल के रूप में जाना जाता था) से आईआईटी खड़गपुर की दिन की रेल यात्रापसंद करता था । मुझे विभिन्न स्टेशनों पर उन्मत्त ऊर्जा की याद आज भी ताजा है और मैं भारतीय रेल के अविश्वसनीय स्तर और विस्तार पर अचम्भा करता था ।

आज गूगलप्लेक्स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

मुझे यह घोषणा करते हुए बहुत गर्व हो रहा है कि ये भारत के रेलवे स्टेशन हैं जो करोड़ों लोगों को ऑनलाइन लाने में मदद करेंगे । पिछले साल, भारत में 10 करोड़ लोगों ने पहली बार इंटरनेट उपयोग शुरू किया है । इसका मतलब यह है कि भारत में अब चीन को छोड़ कर हर देश से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं । पर चौंकाने वाली बात ये है की भारत में अभी भी 100 करोड़ से ज़्यादा लोग ऑनलाइन नहीं हैं ।
हम इन 100 करोड़ भारतवासियों को ऑनलाइन लाने में मदद करना चाहते हैं - ताकि उन्हें पूरे वेब तक पहुँच मिल सके, और वहां मौजूद जानकारी और अवसर भी । और किसी पुराने कनेक्शन से नहीं - तेज़ ब्रॉडबैंड से ताकि वे वेब का सबसे अच्छा अनुभव कर सकें । इसलिए आज, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के हमारे U.S. मुख्यालय में उपस्थित होने के अवसर पर, और उनकी डिजिटल इंडिया पहल के अनुरूप, हमने भारत भर में 400 रेलवे स्टेशनों में सार्वजनिक उच्च गति वाई-फाई उपलब्ध कराने के लिए एक नई परियोजना की घोषणा की है ।
हमारी पहुंच और ऊर्जा टीम की, भारतीय रेलवेज, जो कि दुनिया के सबसे बड़े रेलवे नेटवर्कों में से एक चला रही है, और रेलटेल, जो व्यापक फाइबर नेटवर्क के माध्यम से रेलवायर जैसी इंटरनेट सेवाएं प्रदान करता है, के साथ काम करते हुए आने वाले महीनों में पहले स्टेशनों को ऑनलाइन लाने की योजना है। यह नेटवर्क 2016 के अंत से पहले भारत में सबसे व्यस्त स्टेशनों में से 100 को कवर करने के लिए तेजी से विस्तार करेगा, और शेष स्टेशन उसके बाद जल्द ही कवर होंगे ।
जब सिर्फ पहले 100 स्टेशन ऑनलाइन होंगे, तब भी इस परियोजना के माध्यम से हर दिन 1 करोड़ से अधिक लोगों के लिए वाई-फाई उपलब्ध होगा। यह भारत में सबसे बड़ी सार्वजनिक वाई-फाई परियोजना होगी, और संभावित उपयोगकर्ताओं की संख्या के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी परियोजनाओं में गिनी जाएगी । यह वाई-फाई तेज़ भी होगा - भारत में अधिकतम लोग आज जो उपयोग करते हैं उसकी तुलना में कई गुना तेज़ । इस से यात्री जितनी देर इंतज़ार कर रहे हैं उतनी देर में एक उच्च परिभाषा वीडियो स्ट्रीम कर पाएंगे, अपने गंतव्य के बारे में कुछ अनुसंधान कर पाएंगे या कुछ वीडियो, एक पुस्तक या एक नया खेल डाउनलोड कर पाएंगे । सबसे अच्छी बात, यह सेवा शुरू में मुफ्त होगी, और भविष्य में इसे आत्मनिर्भर बनाने का दीर्घकालीन लक्ष्य है ताकि रेलटेल और अधिक भागीदारों के साथ अधिक स्टेशनों और अन्य स्थानों में इसका विस्तार किया जा सके ।

इस नक्शे में वो पहले 100 स्टेशन दर्शाये गए हैं जहाँ 2016 के अंत तक उच्च गति वाई-फाई होगा

हमें लगता है कि यह 30 करोड़ से अधिक भारतीय जो पहले से ही ऑनलाइन हैं और लगभग एक अरब से अधिक है जो नहीं हैं, उनके लिए इंटरनेट को सुलभ और उपयोगी बनाने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है ।
पर यह सिर्फ एक हिस्सा है । अधिक भारतीयों को सस्ती, उच्च गुणवत्ता वाले स्मार्टफोन्स प्राप्त करने के लिए, जो अधिकतम लोगों के लिए इंटरनेट का उपयोग प्राथमिक तरीका है, हमने पिछले साल एंड्राइड वन फ़ोन लांच किया था । सीमित बैंडविड्थ की चुनौतियों से निपटने में मदद करने के लिए, हम हाल ही में मोबाइल वेब पृष्ठों को तेजी से और कम डेटा के साथ लोड करने की सुविधा लाये हैं, यूट्यूब ऑफ़लाइन उपलब्ध बनाया है और ऑफलाइन मैप्स जल्द ही आने वाला है
भारतीयों, जिनमे से कई अंग्रेजी नहीं बोलते, के लिए वेब सामग्री और अधिक उपयोगी बनाने में मदद करने के लिए और अधिक स्थानीय भाषा की सामग्री को बढ़ावा देने के लिए हमने पिछले साल भारतीय भाषा इंटरनेट एलायंस की शुरूआत की है, और हमारे उत्पादों में अधिक से अधिक स्थानीय भाषा समर्थन का निर्माण किया है - हिंदी वॉयस खोज, उन्नत हिंदी कीबोर्ड और एंड्राइड के नवीनतम संस्करण में सात भारतीय भाषाओं के लिए समर्थन में सुधार । और अंत में, सभी भारतीयों को कनेक्टिविटी का लाभ लेने में मदद करने के लिए, हमने महिलाओं, जो कि आज भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं का सिर्फ एक तिहाई भाग हैं, की मदद करने में अपने प्रयास और तेज़ किये हैं ताकि वे वेब से अधिकतम लाभ उठा सकें ।
हज़ारों युवा भारतीय हर दिन चेन्नई सेंट्रल से निकलते हैं, जैसे मैं कई साल पहले निकलता था, सीखने और जानने के लिए उत्सुक, और अवसर की तलाश में । मेरी आशा है कि यह वाई-फाई परियोजना इन सब बातों को थोड़ा आसान कर देगी


सुन्दर पिचई, सीईओ, गूगल के द्वारा प्रकाशित से साभार

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आशीष श्रीवास्तव

पिछले कुछ दिनों से इस पर फ़ेसबुक पर बहस चल रही है। विद्वान अपने अपने तर्क दे रहे हैं, ज्ञान बांट रहे हैं। कुछ तर्क/कुतर्क मजेदार लगे, कुछ थोथा चना बाजे घना वाले भी थे। कुछ लोगों ने नेट न्युट्रिलिटी को "Survival of Fittest" से भी जोड़ दिया, कहने लगे कि नेट न्युट्रिलिटी संभव नहीं है, जो बेहतर है वही बचेगा। जाहिर है अधिकतर लोगों को नेट न्युट्रिलिटी का अर्थ ही नहीं पता।

नेट-बाबा आशीष जी महाराज को भी प्रवचन का मौका मिला:

सबसे पहले कुछ शब्दों से परिचय करते हैं -  

1. इंटरनेट सेवा प्रदाता (Internet Service Provider-ISP) - अर्थात वह कंपनी जो आपको इंटरनेट सेवा प्रदान कर रही है। यह सेवा आपको मोबाईल सेवा के द्वारा, केबल के द्वारा या लैंडलाईन के द्वारा हो सकती है।
उदाहरण :
मोबाईल इंटरनेट सेवा प्रदाता : एअरटेल, आइडीया, रिलायंस,
केबल इंटरनेट सेवा प्रदाता : हैथवे, एअरटेल ब्राडबैंड, तिकोना, रैपीडलिंक

2. इंटरनेट आधारित सेवा : वह सेवा जो आपको इंटरनेट पर उपलब्ध है, इन सेवाओ का किसी विशिष्ट ISP से कोई सीधा संबंध नहीं होता है। ये सेवायें निशुल्क या सशुल्क हो सकती है। इसके उदाहरण है, गूगल खोज, गूगल मेल, ब्लागर, वर्डप्रेस, फ़ेसबुक, स्कायप, याहू खोज, याहू मेसेंजर इत्यादि।

अथ श्री गुरु घंटाल बाबा आशीष महाराज उवाच :

3. संतजनों, नेट न्युट्रिलीटी का अर्थ है आपका ISP इंटरनेट आधारित सेवाओं में कोई भेदभाव नहीं करेगा। वह किसी भी सेवा का अन्य सेवाओं की तुलना में अधिक भुगतान नहीं मांगेगा या किसी विशिष्ट सेवा को प्राथमिकता नहीं देगा। यदि आपको कोई ISP कोई विशिष्ट इंटरनेट आधारित सेवा मुफ़्त उपलब्ध करा रहा है और अन्य सेवाओं के लिये भुगतान मांग रहा है तो यह नेट न्युट्रिलीटी का उल्लंघन है।
नेट न्युट्रिलीटी का अर्थ है कि यदि आपने 10GB/50 घंटे का भुगतान किया है तो आप इसे अपनी मर्जी के किसी भी सेवा के लिये प्रयोग करने के लिये स्वतंत्र है, आपका ISP किसी विशिष्ट सेवा जैसे स्कायप काल के लिये आपसे अतिरिक्त भुगतान नहीं मांग सकता है। आपका ISP किसी विशिष्ट सेवा का धीमा नहीं कर सकता है, नाही किसी विशिष्ट सेवा का मुफ़्त उपलब्ध करा कर उसे बढ़ावा दे सकता है।

4. फ़ेसबुक: यह एक व्यवसायिक कंपनी है, जिसका मूल उद्देश्य मुनाफ़ा कमाना है, यह समाजसेवा के लिये नहीं है। फ़ेसबुक किसी कारण से किसी देश को तरजीह दे रही है, इसका अर्थ है कि उसे उस देश में बाजार दिख रहा है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

लेकिन फ़ेसबुक के स्वामित्व का internet.org या उसका नया अवतार free basics नेट न्युट्रिलीटी का उल्लंघन है क्योंकि यह भारत में केवल रिलायंस के लिये उपलब्ध है। यह कानूनी रूप से गलत नहीं है लेकिन नैतिक रूप से तथा स्वस्थ प्रतियोगिता के खिलाफ है। इस सेवा के प्रयोग के लिये आपको रिलायंस की सेवा का प्रयोग करना होगा जोकि उपभोक्ता को किसी विशिष्ट सेवा प्रदाता की सेवा का प्रयोग करने मजबूर करना होगा। अंतत: विजेता फ़ेसबुक और रिलायंस होंगे, उपभोक्ता नहीं। उपभोक्ता को मुफ़्त में कुछ नहीं मिल रहा है, वह रिलायंस को सेवा के लिये भुगतान करेगा ही।

5.फ़ेसबुक पर अपनी तस्वीर तिरंगी करना: इसे किसी भी रूप से internet.org का समर्थन करने से नहीं जोड़ा जा सकता है। फ़ेसबुक ने यह जानबुझ कर किया या किसी प्रोग्रामर की गलती से हुआ, वह अलग बात है। लेकिन किसी भी तरह से फ़ेसबुक इन आंकड़ों काinternet.org के समर्थन में प्रयोग नहीं कर सकता। यह न केवल नैतिक रूप से गलत होगा, कानूनी रूप से भी गलत होगा।

6.आप अपनी तस्वीर तिरंगी करे या सप्तरंगी आपकी मर्जी, बस आपको ज्ञात होना चाहिये कि आप ऐसा क्यों कर रहे है। भेड़चाल का शिकार ना बने, आपका हर कदम आपका अपना सोचा समझा होना चाहिये।

7.तस्वीर तिरंगी ना करने का अर्थ डिजिटल इंडिया का विरोध नहीं होता, ना ही तस्वीर तिरंगी करने का अर्थ डिजिटल इंडिया का समर्थन होता है। आम जीवन में तकनीक का विरोध करने वालों ने भी ’फ़ेसबुक’ पर तस्वीर तिरंगी लगायी है।

8.डिजिटल इंडिया का ’केवल’ वर्तमान सरकार के विरोध के लिये विरोध भी गलत है। यह एक ऐसी क्रांति है जो LIC के कंप्युटराइजेशन से दशकों पहले प्रारंभ हुयी थी, जिसे नयी गति राजीव गांधी के कार्यकाल में मिली। पिछला दशक और यह दशक गवाह है कि इस क्रांति ने जीवन को किस तरह से बदला है। आप फ़ेसबुक का नेट न्युट्रिलिटी के उल्लंघन के लिये विरोध करे , वह जायज है, लेकिन डिजिटल इंडिया का विरोध का कोई तुक नहीं बनता है।

9. मेरा यह मानना है कि डिजिटल क्रांति से भ्रस्टाचार अवश्य कम होगा, इसमे अपनी करतूतें छिपाने के रास्ते कम होते हैं, हर कदम अपने निशान छोड़ जाता है।

10. कोई भी तकनीक/कदम यदि आम जीवन में सरलता, सुगमता लाये उसका स्वागत है।

(आशीष श्रीवास्तव के फ़ेसबुक पेज https://www.facebook.com/ashshri से साभार)

कुछ ही समय की देर है. यह सिद्ध हो गया है. आपका सारा का सारा कंप्यूटिंग कार्य अब मोबाइल फ़ोनों से ही होने लगेगा.

ताज़ा उदाहरण है - हिंदी ओसीआर.

हिंदी ओसीआर के लिए आउट-ऑफ़-द-बॉक्स सुविधा पीसी कंप्यूटरों के लिए गिनती के एक दो ही हैं. एक है इंडसैंज का हिंदी ओसीआर, तथा दूसरा टैसरेक्ट आधारित ओपन-सोर्स का बहुभाषी ओसीआर, जिसे हिंदी में काम करने के लिए बहुत सी सेटिंग अलग से करनी होती है.

परंतु यदि आप मोबाइलों में देखेंगे, तो आश्चर्यचकित रह जाएंगे.

लोकप्रिय एंड्रायड प्लेटफ़ॉर्म में गूगल प्ले स्टोर में हिंदी ओसीआर (hindi ocr) से खोज देखें.

कोई आधा दर्जन ओसीआर मिल जाएंगे, जिनमें आप केवल हिंदी भाषा का पैक अतिरिक्त डाउनलोड कर उसमें सीधे-सीधे काम कर सकते हैं. आपके मोबाइल में चूंकि अंतर्निर्मित कैमरा होता है, अतः आप किसी छपे हुए हिंदी पाठ को अपने मोबाइल के कैमरे से स्कैन कर सीधे ही ओसीआर कर सकते हैं. अलबत्ता पहले से खींचे गए हिंदी पाठ के चित्र पर भी काम करने का विकल्प उपलब्ध होता है. जबकि यही सुविधा हासिल करने के लिए आपको अपने डेस्कटॉप कंप्यूटर में अलग से एक अदद स्कैनर की आवश्यकता पड़ती है.

गूगल प्ले स्टोर पर हिंदी ओसीआर Hindi OCR on google play store

ठीक इसी तरह, यह सुविधा आईओएस यानी एप्पल आईफ़ोन प्लेटफ़ॉर्म में भी है. इसका मल्टी स्कैन एएचटी ओसीआर हिंदी भाषा में बढ़िया काम करता है -

 

एप्पल आईफ़ोन  का हिंदी में मल्टी स्कैन ओएचटी ओसीआर

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ओसीआर किए गए डिजिटाइज्ड  टैक्स्ट को आप सहेज सकते हैं, ईमेल के रूप में भेज सकते हैं या अपने क्लाउड में सहेज/लिंक बना कर साझा कर सकते हैं. हाँ, एक पूरे पाठ को स्कैन कर डिजिटाइज्ड करने में यह (आईफ़ोन 5 और नोट 2) काफी लंबा वक्त लेता है. शायद यह आधुनिक जमाने के ऑक्टाकोर प्रोसेसर युक्त नवीनतम हाई एंड फ़ोनों में तेजी से काम करे. और, वह दिन दूर नहीं जब हिंदी ओसीआर अंग्रेज़ी ओसीआर की तरह ऑन-द-फ़्लाई, रीयल टाइम में होने लगे.

 

टीप - उच्च गुणवत्ता के लिए हिंदी टैक्स्ट की इमेज स्कैन या फ़ोटो क्रिस्प, सही रौशनी में, सही पिक्सेल में और सीधा सपाट होना चाहिए. ऊपर के चित्र में आप देखेंगे कि हिंदी पाठ में जहाँ पेज की गोलाई का असर आ गया है, वहाँ पाठ ठीक से ओसीआर नहीं हो पाया है.

 

नोट 2 में ओसीआर किया गया पाठ (किसी तरह का सुधार नहीं किया गया है) -

प्राफेसर रोनदी की टाइम मशीन
7 नवम्बर
खास दुनिया में तीन अलगन्दालग जगहों पर तीन वैज्ञानिक एक समय में एक ही मशीन के
निर्माण में प्रयोग का रहे हैं । आमतौर पर ऐसा नहीं होता । लेकिन अभी तो ऐसा ही है ।
इन तीन वैज्ञानिक में यकीनन एक में भी हूं। और जिस मशीन पर काम हो रहा है, वह है-टाइम
मशीन ।

मैं जब कोलिज में विज्ञान की पढाई पूरी कर रहा था तभी मैंने एच. जी. बीस की एक
आश्चर्यजनक कहानी पढी थी-टाइम मशीना इसे पढ़ने के बाद, मेरे मन में इसी प्रकार का एक
यन्त्र तेयार करने को इच्छा जगी थी । इस इच्छा को मैंने कार्यरूप में परिणत भी किया था । लेकिन
मेरा सारा काम मोटे तीर पर एक सिद्धान्त की तरह ही विकसित हो रहा था । मेरी यह धारणा है
कि मेरे द्वारा विकसित सिद्धान्त की नीव काफी मज़बूत है । इस बात की पुष्टि तभी हो गयी थी
जब पिछली फरवरी में, सोन के मेड्रिड शहर में आयोजित वैज्ञानिकों के अंतर्राष्टीय सम्मेलन में
मैंने अपना शोघपूर्ण आलेख पढा। यहीं उपस्थित सभी वैज्ञानिकों ने मेरी मरपूर प्रशंसा की।
लेकिन मेरे पास इतना धन नहीं था कि मैं अपने खर्चीले प्रयोग जारी रख पाता । रुपये की कमी
के कारण इस बीच मेरा काम आगे बढ़ नहीं पाया ।

इसी बीच, जर्मनी के कोलोन शहर के वैज्ञानिक प्रो. क्लाइव अपनी टाइम मशीन को अंतिम
रूप दे रहे थे । उनका काम काफी जागे बढ़ गया या । उनके बारे में मुझे अपने जानि मित्र मि;
बिलहैम कोल से जानकारी मिली थी । प्रो. क्लाइव मेड्रिड वाले सम्मेलन में भी उपस्थित थे, जहाँ
मैंने अपना पर्चा पढा था । वहीं उनके साथ काफी देर तक बातचीत भी हुई थी । दुख इस बात
का है कि यह सारा काम पूरा किये जाने के पहले ही किसी हत्यारे ने उनकी जान ले ली । उस
हत्यारे का पता अब तक नहीं चल पाया है । इस घटना को बीते दो सप्ताह हो गए हैं । प्रो.
क्लाइव पदा-विज्ञानी थे और काफी सम्पन्न थे । विज्ञान के अलावा उनके और भी कई शौक ये।।
इनमें से एक था, कीमती और दुर्लभ वस्तुओं का संग्रह ।

इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि उनकी हत्या पेशेवर डाकुओं द्वारा की गई
थी । क्योकि प्रो. क्लाइव के काम करने बाले स्थान से, जो उनके घर का ही एक हिस्सा था, ऐसी
तीन बेशकीमती वजाकातेयाँ गायब हो गई थीं । ठीक उसी हत्या के बाद । क्लाइव की मोत किसी

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यदि हाँ, तो आपको थोड़ा-बहुत अपराध बोध तो हुआ ही होगा. मगर, ठहरिए, भाई साहब, बहन जी, वस्तुतः आपने अपराध ही किया है! गंभीर अपराध.

और, अब आइंदा किसी को अनफ्रेंड या ब्लॉक करने से पहले दोबारा सोच लेना!!

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बड़े चले थे मुझे अनफ्रेंड करने!

स्पेलगुरू के पूर्व के एक संस्करण का रीव्यू मैंने यहाँ लिखा था.

अब इसका नया संस्करण कृतिदेव, चाणक्य अथवा यूनिकोड - किसी भी फ़ॉन्ट में लिखी सामग्री की वर्तनी जांच सकता है. साथ ही इनमें किसी भी फ़ॉन्ट में आपसी त्वरित कन्वर्शन भी कर सकता है.

इसका वर्तनी जांच का सिस्टम भी बहुत ही अलग और शानदार है.

गलत वर्तनी के प्रारंभ, मध्य और अंत में क्लिक या दायाँ क्लिक करने पर कई तरह के विकल्प मिलते हैं.

इसका शब्द भंडार विशाल है, और एमएस वर्ड तथा गूगल डॉक्स के वर्तनी जाँच से भी हर मामले में बेहतर है.

स्पेलगुरू की साइट http://bhashagiri.com  से आप अन्य जानकारी ले सकते हैं.

हिंदी पखवाड़े में विश्व हिंदी दिवस और विश्व हिंदी सम्मेलन धूमधाम से सम्पन्न हो गया, और इधर, चहुँओर अंग्रेज़ी का साम्राज्य और अधिक तेजी से पसरने लगा. हालात अब हिंदी को हिंग्लिश और रोहिंदी (रोमनहिंदी) की ओर धकेल रहे हैं.

एक ताज़ा उदाहरण - एक सच्चा योगी सन्यासी, जो सदा सर्वदा से स्वदेशी की वकालत करता रहा है, उसकी कंपनी ने जब स्वदेशी उत्पाद निकाले, तो उत्पादनों के विज्ञापन देते समय विज्ञापन एजेंसी ने स्वदेशी की हवा निकाल दी और सच्चा योगी सन्यासी को विदेशी घोषित कर दिया -

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वर्ल्ड क्लास क्वालिटी, लो प्राइस एंड 100% चेरिटी फ्रोम प्रोफिट्स।

ऐसी दिव्य भाषा एक सच्चा स्वदेशी प्रेमी ही तो लिख सकता है!

 

जाहिर है, हिंदी मर रही है और जो कुछ बची खुची रहेगी, वो रहेगी हिंग्लिश या रोहिंदी!

 

मगर, अगर यह, और ऐसा, हो रहा है तो आखिर क्यों और कैसे?

 

मुझे याद है, जब हम माध्यमिक स्कूल में पढ़ते थे तब अंग्रेज़ी हटाओ का नारा हमारे हिंदी प्रदेश - मध्य प्रदेश में भी आया था. तब, त्रिभाषा फार्मूले के तहत, अंग्रेज़ी माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा में अनिवार्य थी. तो सरकार ने अंग्रेज़ी की अनिवार्यता हटा दी. हमने जमकर खुशियां मनाई और अपनी स्कूली शिक्षा से इसे निकाल बाहर किया और स्कूल हिंदी मीडियम में पढ़े. मगर जैसे ही उच्च शिक्षा में आए, उच्च शिक्षा की कोई किताब हिंदी में थी ही नहीं. पढ़ने पढ़ाने को कोई शिक्षक हिंदी में मिलता ही नहीं था - अब भी नहीं है. प्रश्नपत्र हिंदी में आते ही नहीं थे. कहना न होगा कि गति सांप छछूंदर की तरह हो गई - न इधर के रहे न उधर के.

 

इस कहानी को बताने का उद्देश्य, आपने ठीक समझा - सरकारी अदूरदर्शिता पूर्ण आदेशों, और तात्कालिक राजनीतिक लाभ लेने के उद्देश्य से जारी किए गए आधे-अधूरे अदूरदर्शी नियम-कायदों की ओर ध्यान दिलाना है.

लंबे समय से भारत सरकार आईटी और कंप्यूटर की भाषा संबंधी नीतियों में भी यही और इसी तरह की अदूरदर्शिता पूर्ण नीतियाँ लागू करती करवाती आ रही है. ताज़ातरीन आईटी भाषा नीति में भी हिंदी और स्थानीय भाषाओं को वैकल्पिक / ऐच्छिक / डिज़ायरेबल की श्रेणी में रखा गया है, जाहिर है ऐसे में इस क्षेत्र में हिंदी और अन्य भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं की आईटी और कंप्यूटर क्षेत्रों में मृत्यु सुनिश्चित है. इससे बचने के लिए, हिंदी और अन्य भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए. इसकी प्रेरणा बांग्लादेश जैसे छोटे से देश से लेनी चाहिए. उदाहरण के लिए, जब फायरफ़ॉक्स ने अपना नया ऑपरेटिंग सिस्टम और नया मोबाइल फ़ोन जारी किया तो बांग्लादेश ने अपने देश में इसे जारी करने के लिए पूर्व शर्त रखी कि इंटरफ़ेस और कुंजीपट बांग्ला भाषा में तो होना ही चाहिए, वह भी बांग्लादेश की बांग्ला (ba_bn, न कि ba_in) में होना चाहिए न कि भारतीय बांग्ला में.

 

ग़नीमत है कि आईटी और कंप्यूटर क्षेत्रों में हिंदी के लिए कुछ स्वयंसेवी दल जी जान से लगे हुए हैं. जिससे हिंदी अपने रूप रंग को आईटी और कंप्यूटरों में बचाए हुए है. फायरफ़ॉक्स हिंदी स्थानीयकरण परियोजना भी इसी तरह का उपक्रम है जो अभी जीवंत और अग्रसक्रिय है. हाल ही में इस परियोजना से जुड़़े दल आपस में मिले और अपने अब तक के किये कार्यों की समीक्षा भी की.

mozilla hindi review 2015

विस्तृत समाचार आप आउटलुक पत्रिका की साइट पर यहाँ से पढ़ सकते हैं -

http://www.outlookhindi.com/media/social-media/hindi-pakhwada-media-review-on-mozilas-work-in-hindi-4049

प्रसंगवश, बीबीसी हिंदी में मेरा एक आलेख संपादित रूप से छपा था. उसे यहाँ प्रस्तुत करना समीचीन होगा -

हिंदी की बेहतरी के लिए भारत सरकार को ये 5 काम तुरंत ही करने चाहिए –

 

ज्यादा पुरानी बात नहीं है. एक दिन मेरे पास एक ईमेल आया. आईआईटी पास बंदे का पत्र था वह. पत्र में दुःखी स्वर में स्वीकारोक्ति थी कि नामी आईआईटी संस्थान से कंप्यूटर टेक्नोलॉज़ी में स्नातक होने के बावजूद वह हिंदी भाषा में लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम की उपलब्धता से अनभिज्ञ था. और, तब तक तो हिंदी समेत अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त, हमारा कंप्यूटर स्थानीय बोलियाँ - छत्तीसगढ़ी और मैथिली भी बोलने लग गया था – यानी इन भाषाओं में मुफ़्त व मुक्त स्रोत का लिनक्स जारी हो चुका था.

जाहिर है, तंत्र में गड़बड़ियाँ हैं, और शुरू से हैं. इन गड़बड़ियों को तुरंत ठीक किया जाना चाहिए. ये हैं कुछ उपाय जिनसे मामला बहुत कुछ सुलझ सकता है –

1

– कंप्यूटर तकनीकी की शिक्षा में एक प्रायोगिक विषय ‘स्थानीयकरण’ (लोकलाइज़ेशन) अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए. विषय में हिंदी अथवा राज्य की स्थानीय भाषा शामिल की जा सकती है. छात्र अपना प्रोजेक्ट अपनी पसंद की भाषा में करे. हिंदी भाषी हिंदी में करे, तमिलनाडु का तमिल में, उड़ीसा का ओडिया में.

2

– कंप्यूटिंग उपकरणों के साथ हिंदी/स्थानीय भाषा में हार्डवेयर कीबोर्ड की उपलब्धता अनिवार्य की जाए. टच स्क्रीन मोबाइल कंप्यूटिंग उपकरणों व ट्रांसलिट्रेशन औजारों का धन्यवाद, कि अब अपने कंप्यूटिंग उपकरणों में हिंदी में लिखने के लिए अधिक जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती. फिर भी, अभी भी बड़ी संख्या में जनता अच्छी खासी परेशान रहती है कि हिंदी में, आखिर, लिखें तो कैसे! हिंदी कीबोर्ड सामने रहेगा तो आदमी देख देख कर उपयोग करना सीख ही जाएगा. कंप्यूटिंग उपकरणों के इंटरफ़ेस व कीबोर्ड डिफ़ॉल्ट हिंदी/स्थानीय भाषा (यदि उपलब्ध हों) में ही हों. अभी होता यह है कि डिफ़ॉल्ट अंग्रेजी होता है, और हिंदी/स्थानीय भाषा का विकल्प होने के बावजूद सेटिंग में जाकर या अन्य डाउनलोड कर अथवा जुगाड़ से हिंदी/स्थानीय भाषा उपयोग में ली जाती है, जिससे लोग भाषाई कंप्यूटिंग से कन्नी काटते हैं.

3

– सभी उत्पादों के उत्पाद निर्देशिका (यूजर मैनुअल) हिंदी/स्थानीय भाषा में उपलब्ध करवाना अनिवार्य किया जाए. इससे उत्पादों को समझना आसान होगा. साथ ही, इस कदम से भाषाई तकनीकज्ञों, अनुवादकों तथा सामग्री सृजकों की एक नई बड़ी खेप तैयार तो होगी ही, उद्योग जगत में रोजगार का एक नया, वृहद रास्ता भी बनेगा.

4

– सीडैक (आदि तमाम सरकारी उपक्रमों) के तमाम कंप्यूटिंग औजार व संसाधन आम जन के लिए निःशुल्क जारी किए जाएं. बड़े ही दुःख और बड़ी ईमानदारी से कह रहा हूँ कि यदि करदाताओं के पैसे से बने, सीडैक के तमाम भाषाई उत्पाद जैसे कि आईलीप / लीप ऑफ़िस आदि शुरुआत से ही आम जनता के लिए निःशुल्क उपयोग के लिए जारी कर दिए गए होते तो भारत की भाषाई कंप्यूटिंग का इतिहास कुछ और होता. आज वह दस गुना ज्यादा समृद्ध होती. ख़ैर, अभी भी समय है सुधर जाने का.

5

– अंतिम, परंतु महत्वपूर्ण – सभी सरकारी साइटों का हिंदीकरण/स्थानीयकरण हो और वे डिफ़ॉल्ट रूप में हिंदी/स्थानीय भाषा में खुलें. स्थान (लोकेशन) के हिसाब से ब्राउज़र पर स्थानीय भाषा दिखे. यदि सामग्री हिंदी/स्थानीय भाषा में उपलब्ध न हो तब ही अंग्रेज़ी में खुले. अंग्रेज़ी भाषा तो वैकल्पिक रूप से रहे. अभी तो तमाम सरकारी साइटों की डिफ़ॉल्ट (प्राथमिक) भाषा अंग्रेज़ी होती है. साथ ही, हिंदी/स्थानीय भाषा में सामग्री सृजन हो, न कि अंग्रेज़ी से हिंदी का फूहड़, अफसरी अनुवाद जिसे पढ़ने समझने में ही पसीना आए और आदमी अंग्रेज़ी पन्नों की ओर फिर से दौड़ लगा दे.

 

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1986 से कंप्यूटर पर हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में कार्य करने वाले भाषा अधिकारी श्री हरिराम ने अपने ब्लॉग प्रगत भारत में भी समय समय पर इन्हीं किस्म की समस्याओं को उठाते रहे हैं. पिछले 9 वें विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर उन्होंने कर्ता-धर्ताओं से 10 यक्ष प्रश्न पूछे थे, जो अनुत्तरित रहे हैं -

 

9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के प्रतिभागियों से 10 यक्ष प्रश्न
निम्न कुछ तथ्यपरक व चुनौतीपूर्ण प्रश्न 9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में पधारे विद्वानों से करते हुए इनका उत्तर एवं समाधान मांगा जाना चाहिए...
(1)
हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के लिए कई वर्षों से आवाज उठती आ रही है, कहा जाता है कि इसमें कई सौ करोड़ का खर्चा आएगा...
बिजली व पानी की तरह भाषा/राष्ट्रभाषा/राजभाषा भी एक इन्फ्रास्ट्रक्चर (आनुषंगिक सुविधा) होती है....
अतः चाहे कितना भी खर्च हो, भारत सरकार को इसकी व्यवस्था के लिए प्राथमिकता देनी चाहिए।
(2)
-- हिन्दी की तकनीकी रूप से जटिल (Complex) मानी गई है, इसे सरल बनाने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं?

-- कम्प्यूटरीकरण के बाद से हिन्दी का आम प्रयोग काफी कम होता जा रहा है...
-- -- हिन्दी का सर्वाधिक प्रयोग डाकघरों (post offices) में होता था, विशेषकर हिन्दी में पते लिखे पत्र की रजिस्ट्री एवं स्पीड पोस्ट की रसीद अधिकांश डाकघरों में हिन्दी में ही दी जाती थी तथा वितरण हेतु सूची आदि हिन्दी में ही बनाई जाती थी, लेकिन जबसे रजिस्ट्री और स्पीड पोस्ट कम्प्यूटरीकृत हो गए, रसीद कम्प्यूटर से दी जाने लगी, तब से लिफाफों पर भले ही पता हिन्दी (या अन्य भाषा) में लिखा हो, अधिकांश डाकघरों में बुकिंग क्लर्क डैटाबेस में अंग्रेजी में लिप्यन्तरण करके ही कम्प्यूटर में एण्ट्री कर पाता है, रसीद अंग्रेजी में ही दी जाने लगी है, डेलिवरी हेतु सूची अंग्रेजी में प्रिंट होती है।
-- -- अंग्रेजी लिप्यन्तरण के दौरान पता गलत भी हो जाता है और रजिस्टर्ड पत्र या स्पीड पोस्ट के पत्र गंतव्य स्थान तक कभी नहीं पहुँच पाते या काफी विलम्ब से पहुँचते हैं।
-- -- अतः मजबूर होकर लोग लिफाफों पर पता अंग्रेजी में ही लिखने लगे है।
डाकघरों में मूलतः हिन्दी में कम्प्यूटर में डैटा प्रविष्टि के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं?
(3)
-- -- रेलवे रिजर्वेशन की पर्चियाँ त्रिभाषी रूप में छपी होती हैं, कोई व्यक्ति यदि पर्ची हिन्दी (या अन्य भारतीय भाषा) में भरके देता है, तो भी बुकिंग क्लर्क कम्प्यूटर डैटाबेस में अंग्रेजी में ही एण्ट्री कर पाता है। टिकट भले ही द्विभाषी रूप में मुद्रित मिल जाती है, लेकिन उसमें गाड़ी व स्टेशन आदि का नाम ही हिन्दी में मुद्रित मिलते हैं, जो कि पहले से कम्प्यूटर के डैटा में स्टोर होते हैं, रिजर्वेशन चार्ट में नाम भले ही द्विभाषी मुद्रित मिलता है, लेकिन "नेमट्रांस" नामक सॉफ्टवेयर के माध्यम से लिप्यन्तरित होने के कारण हिन्दी में नाम गलत-सलत छपे होते हैं। मूलतः हिन्दी में भी डैटा एण्ट्री हो, डैटाबेस प्रोग्राम हो, इसके लिए व्यवस्थाएँ क्या की जा रही है?
(4)
-- -- मोबाईल फोन आज लगभग सभी के पास है, सस्ते स्मार्टफोन में भी हिन्दी में एसएमएस/इंटरनेट/ईमेल की सुविधा होती है, लेकिन अधिकांश लोग हिन्दी भाषा के सन्देश भी लेटिन/रोमन लिपि में लिखकर एसएमएस आदि करते हैं। क्योंकि हिन्दी में एण्ट्री कठिन होती है... और फिर हिन्दी में एक वर्ण/स्ट्रोक तीन बाईट का स्थान घेरता है। यदि किसी एक प्लान में अंग्रेजी में 150 अक्षरों के एक सन्देश के 50 पैसे लगते हैं, तो हिन्दी में 150 अक्षरों का एक सन्देश भेजने पर वह 450 बाईट्स का स्थान घेरने के कारण तीन सन्देशों में बँटकर पहुँचता है और तीन गुने पैसे लगते हैं... क्योंकि हिन्दी (अन्य भारतीय भाषा) के सन्देश UTF8 encoding में ही वेब में भण्डारित/प्रसारित होते हैं।
हिन्दी सन्देशों को सस्ता बनाने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं?
(5)
-- -- अंग्रेजी शब्दकोश में अकारादि क्रम में शब्द ढूँढना आम जनता के लिेए सरल है, हम सभी भी अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश में जल्दी से इच्छित शब्द खोज लेते हैं,
-- -- लेकिन हमें यदि हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश में कोई शब्द खोजना हो तो दिमाग को काफी परिश्रम करना पड़ता है और समय ज्यादा लगता है, आम जनता/हिन्दीतर भाषी लोगों को तो काफी तकलीफ होती है। हिन्दी संयुक्ताक्षर/पूर्णाक्षर को पहले मन ही मन वर्णों में विभाजित करना पड़ता है, फिर अकारादि क्रम में सजाकर तलाशना पड़ता है...
विभिन्न डैटाबेस देवनागरी के विभिन्न sorting order का उपयोग करते हैं।
हिन्दी (देवनागरी) को अकारादि क्रम युनिकोड में मानकीकृत करने तथा सभी के उपयोग के लिए उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
(6)
-- -- चाहे ऑन लाइन आयकर रिटर्न फार्म भरना हो, चाहे किसी भी वेबसाइट में कोई फार्म ऑनलाइन भरना हो, अधिकांशतः अंग्रेजी में ही भरना पड़ता है...
-- -- Sybase, powerbuilder आदि डैटाबेस अभी तक हिन्दी युनिकोड का समर्थन नहीं दे पाते। MS SQL Server में भी हिन्दी में ऑनलाइन डैटाबेस में काफी समस्याएँ आती हैं... अतः मजबूरन् सभी बड़े संस्थान अपने वित्तीय संसाधन, Accounting, production, marketing, tendering, purchasing आदि के सारे डैटाबेस अंग्रेजी में ही कम्प्यूटरीकृत कर पाते हैं। जो संस्थान पहले हाथ से लिखे हुए हिसाब के खातों में हिन्दी में लिखते थे। किन्तु कम्प्यूटरीकरण होने के बाद से वे अंग्रेजी में ही करने लगे हैं।
हिन्दी (देवनागरी) में भी ऑनलाइन फार्म आदि पेश करने के लिए उपयुक्त डैटाबेस उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
(7)
सन् 2000 से कम्प्यूटर आपरेटिंग सीस्टम्स स्तर पर हिन्दी का समर्थन इन-बिल्ट उपलब्ध हो जाने के बाद आज 12 वर्ष बीत जाने के बाद भी अभी तक अधिकांश जनता/उपयोक्ता इससे अनभिज्ञ है। आम जनता को जानकारी देने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
(8)
भारत IT से लगभग 20% आय करता है, देश में हजारों/लाखों IITs या प्राईवेट तकनीकी संस्थान हैं, अनेक कम्प्यूटर शिक्षण संस्थान हैं, अनेक कम्प्टूर संबंधित पाठ्यक्रम प्रचलित हैं, लेकिन किसी भी पाठ्यक्रम में हिन्दी (या अन्य भारतीय भाषा) में कैसे पाठ/डैटा संसाधित किया जाए? ISCII codes, Unicode Indic क्या हैं? हिन्दी का रेण्डरिंग इंजन कैसे कार्य करता है? 16 bit Open Type font और 8 bit TTF font क्या हैं, इनमें हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाएँ कैसे संसाधित होती हैं? ऐसी जानकारी देनेवाला कोई एक भी पाठ किसी भी कम्प्यूटर पाठ्यक्रम के विषय में शामिल नहीं है। ऐसे पाठ्यक्रम के विषय अनिवार्य रूप से हरेक computer courses में शामिल किए जाने चाहिए। हालांकि केन्द्रीय विद्यालयों के लिए CBSE के पाठ्यक्रम में हिन्दी कम्प्यूटर के कुछ पाठ बनाए गए हैं, पर यह सभी स्कूलों/कालेजों/शिक्षण संस्थानों अनिवार्य रूप से लागू होना चाहिए।
इस्की और युनिकोड(इण्डिक) पाठ्यक्रम अनिवार्य करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
(9)
हिन्दी की परिशोधित मानक वर्तनी के आधार पर समग्र भारतवर्ष में पहली कक्षा की हिन्दी "वर्णमाला" की पुस्तक का संशोधन होना चाहिए। कम्प्यूटरीकरण व डैटाबेस की "वर्णात्मक" अकारादि क्रम विन्यास की जरूरत के अनुसार पहली कक्षा की "वर्णमाला" पुस्तिका में संशोधन किया जाना चाहिए। सभी हिन्दी शिक्षकों के लिए अनिवार्य रूप से तत्संबंधी प्रशिक्षण प्रदान किए जाने चाहिए।
इसके लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
(10)
अभी तक हिन्दी की मानक वर्तनी के अनुसार युनिकोड आधारित कोई भी वर्तनी संशोधक प्रोग्राम/सुविधा वाला साफ्टवेयर आम जनता के उपयोग के लिए निःशुल्क डाउनलोड व उपयोग हेतु उपलब्ध नहीं कराया जा सका है। जिसके कारण हिन्दी में अनेक अशुद्धियाँ के प्रयोग पाए जाते हैं।

इसके लिए क्या व्यवस्थाएँ की जा रही हैं?

 

हरिराम ने अपने प्रश्नों में कुछ जोड़ घटा कर 10 वें विश्व हिंदी सम्मेलन के कर्ताधर्ताओं से पूछा है -

 

10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के प्रतिभागियों से 10 यक्ष प्रश्न

निम्न कुछ तथ्यपरक व चुनौतीपूर्ण प्रश्न 10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में पधारे विद्वानों से किए जा रहे हैं। उत्तर अपेक्षित है।

(1)

-- इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड पर अधिकांश प्रत्याशियों एवं आम जनता का अभ्यास क्यों नहीं है?
सन् 1991 में भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा कम्प्यूटरों में भारतीय भाषाओं में काम करने की सुविधा के लिए इस्की कूट (ISCII code) के मानकीकरण के अन्तर्गत हिन्दी तथा 10 ब्राह्मी आधारित भारतीय भाषाओं के लिए एकसमान इनस्क्रिप्ट (Inscript) कीबोर्ड को मानकीकृत किया गया था। इसका व्यापक प्रचार भी किया गया। लेकिन सन् 2000 में विण्डोज में अन्तर्राष्ट्रीय युनिकोड (Unicode) मानक वाली हिन्दी भाषा की सुविधा अन्तःनिर्मित रूप से आने के बाद ‘इस्की कोड’ मृतप्रायः हो गए। किन्तु युनिकोड में भी इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड का वही मानक विद्यमान रहा। इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड के मानकीकरण के दीर्घ 21 वर्षों के बाद राजभाषा विभाग के दिनांक 17 फरवरी 2012 के तहत आदेश जारी किया गया कि "1 अगस्त 2012 से सभी नई भर्तियों के लिए टाइपिंग परीक्षा इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड पर लेना अनिवार्य हो।" हाल ही में अगस्त-2015 में एक केन्द्रीय सरकारी संगठन में हिन्दी पद के लिए हिन्दी टंकण परीक्षा हेतु 40 प्रत्याशी उपस्थित हुए। लेकिन कोई भी इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड पर परीक्षा देने में सक्षम नहीं था, सभी वापस चले गए, सिर्फ 3 प्रत्याशियों ने ही इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड पर परीक्षा देने का प्रयास किया, लेकिन लगभग 500 शब्दों के प्रश्नपत्र में से अधिकतम टंकण करनेवाला प्रत्याशी भी 10 मिनट के समय में सिर्फ 52 शब्द टाइप कर पाया। इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड पर आम जनता या प्रत्याशियों का अभ्यास न होने के क्या कारण हैं और इसका क्या निवारण किया जा रहा है?
(2)

-- हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटरों में इनपुट के लिए विद्यार्थियों तथा आम जनता के लिए इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड पर प्रशिक्षण व्यवस्था क्यों नहीं है?

राजभाषा विभाग द्वारा हिन्दी टंकण एवं आशुलिपि प्रशिक्षण भी पिछले लगभग 10-12 वर्षों से कम्प्यूटरों पर ही दिया जा रहा है। मानकीकृत इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड पर टंकण करने हेतु प्रशिक्षण दिया जाता है। किन्तु यह प्रशिक्षण केवल केन्द्रीय सरकारी कर्मचारियों को ही दिया जाता है। विद्यार्थियों तथा सरकारी नौकिरियों में टंकण तथा आशुलिपिक पदों पर नई भर्ती के लिए प्रत्याशियों या आम जनता को इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड पर प्रशिक्षण देने हेतु देशभर में कोई पर्याप्त/उचित व्यवस्था कब तक की जाएगी?

(3)
-- डाकघरों से हिन्दी में पते लिखे पत्रों की रजिस्ट्री एवं स्पीड पोस्ट की रसीदें हिन्दी में कबसे मिलेंगी?

डाकघरों (post offices) में स्पीड पोस्ट या रजिस्टरी से हिन्दी में पते लिखे पत्र भेजने पर भी रसीद अंग्रेजी में ही दी जाती है, क्योंकि बुकिंग क्लर्क केवल अंग्रेजी में कम्प्यूटर में टाइप करता है। 1991 अर्थात् गत 24 वर्ष पहले से इन्स्क्रिप्ट की बोर्ड मानकीकृत होने के तथा निःशुल्क व अन्तर्निर्मित रूप से सन् 2000 से सभी कम्प्यूटरों उपलब्ध होने के बावजूद अभी तक डाकघरों में हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में पते लिखे पत्रों की बुकिंग रसीद केवल अंग्रेजी में ही क्यों दी जा रही है? इसीप्रकार रेलवे रिजर्वेशन काउंटर पर टिकट लेते वक्त बुकिंग क्लर्क कम्प्यूटर में हिन्दी में विवरण कबसे दर्ज करेंगे?
(4)
-- भारत में बिकने वाले सभी मोबाईल/स्मार्टफोन में हिन्दी आदि संविधान में मान्यताप्राप्त 22 भाषाओं में एस.एम.एस., ईमेल आदि करने हेतु पाठ के आदान-प्रदान की सुविधा अनिवार्य रूप से क्यों नहीं मिलती?

-- राजभाषा विभाग द्वारा सभी इलेक्ट्रानिक उपकरण द्विभाषी/बहुभाषी ही खरीदने के लिए 1984 से आदेश जारी किए गए हैं, लेकिन भारत में बिकनेवाले सभी मोबाईल/स्मार्टफोन में हिन्दी तथा संविधान में मान्यताप्राप्त 22 भाषाओं की सुविधा अनिवार्य रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। इसके लिए ट्राई द्वारा आदेश क्यों नहीं जारी जाते? कब तक यह सुविधाएँ अनिवार्य रूप से उपलब्ध होंगी?
(5)
हिन्दी माध्यम से विज्ञान, तकनीकी, वाणिज्य, मेडिकल, अभियांत्रिकी आदि की उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम कब तक उपलब्ध होंगे?
अभी तक विज्ञान, तकनीकी, वाणिज्य, मेडिकल, अभियांत्रिकी आदि की उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम हिन्दी में क्यों उपलब्ध नहीं कराए जा सके हैं तथा कब तक उपलब्ध करा दिए जाएँगे एवं इन विषयों में हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में शिक्षा कबसे शुरू हो पाएगी?
(6)
केन्द्रीय सरकारी नौकरियों में नई भर्ती के लिए अंग्रेजी के साथ साथ हिन्दी में भी काम करने में सक्षम प्रत्याशियों को प्राथमिकता दिए के आदेश कब से जारी होंगे?
अभी तक केन्द्र सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए अंग्रेजी का ज्ञान होना अनिवार्य है। राजभाषा अधियनियम के अनुसार केन्द्रीय सरकारी कर्मचारियों को हिन्दी शिक्षण योजना के अन्तर्गत हिन्दी का सेवाकालीन प्रशिक्षण दिलाया जाता है एवं परीक्षाएँ पास करने पर पुरस्कार स्वरूप आर्थिक लाभ दिए जाते हैं, जिसमें केन्द्र सरकार को काफी खर्च करना पड़ता है और हिन्दी प्रशिक्षण प्राप्त कर्मचारी भी हिन्दी में सरकारी काम पूरी तरह नहीं कर पाते। अतः बेहतर तथा बचत देते वाला उपाय यह होगा यदि आम जनता व प्रत्याशियों के लिए हिन्दी प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए एवं अंग्रेजी के साथ साथ हिन्दी का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त कर्मचारियों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जाए। यह व्यवस्था कब तक लागू की जाएगी?
(7)
"भारतीय मानक - देवनागरी लिपि एवं हिन्दी वर्तनी" आईएस 16500:2012 भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा अगस्त 2012 में नवीनतम मानक जारी किए गए थे, जिनका व्यापक प्रचार किया जाना तथा इन्हें सभी हिन्दी कर्मियों, हिन्दी शिक्षकों, प्राध्यापकों, हिन्दी भाषियों को निःशुल्क जारी किया जाना आवश्यक है? लेकिन इस पुस्तिका को बेचा जा रहा है और केवल खरीदनेवाले व्यक्ति को ही इसका उपयोग करने का लाईसैंस जारी किया जा रहा है। क्या मानकों के अनुसार देवनागरी लिपि तथा हिन्दी वर्तनी का उपयोग करने के लिए हरेक हिन्दी-कर्मियों, हिन्दी-भाषियों को भारतीय मानक ब्यूरो से लाईसैंस खरीदना होगा? यदि हाँ, तो क्या सभी हिन्दी-भाषी लाईसैंस खरीद पाएँगे? इसप्रकार विश्वभर में शुद्ध हिन्दी का उपयोग कैसे सफल हो पाएगा? इन मानकों के आधार पर बने हिन्दी वर्तनीशोधक (spell checker) सभी साफ्टवेयर तथा ईमेल व इंटरनेट ब्राऊजरों पर कब तक उपलब्ध हो सकेंगे?
(8)
"भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के “भारतीय भाषाओं के लिए प्रौद्योगिकी विकास” प्रभाग द्वारा हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के लाखों रुपये मूल्य के सॉफ्टवेयर उपकरण निःशुल्क उपलब्ध कराए जा रहे हैं। वेबसाइट पर ये निःशुल्क डाउनलोड के लिेए भी उपलब्ध कराए गए हैं। किन्तु अधिकांश लोग इतना भारी डाउनलोड करने में समर्थ नहीं हो पाते। मांगकर्ता व्यक्ति को इनकी सी.डी. भी निःशुल्क भेजी जाती है। इसमें सरकार का काफी खर्च भी होता है। यदि इनमें से हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के कुछ प्रमुख फोंट्स एवं सॉफ्टवेयरों को विण्डोज, लिनक्स, आईओएस आदि आपरेटिंग सीस्टम्स के ओटोमेटिक अपडेट के पैच में शामिल करवा दिया जाए तो अनिवार्यतः भारत में प्रयोग होनेवाले सभी कम्प्यूटरों में ये स्वतः उपलब्ध हो सकते हैं और विश्वभर की समस्त जनता हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं का उपयोग करने में समर्थ हो पाती और सरकार के खर्च की भी बचत होती। यह कार्य कब तक करवा दिया जाएगा?
(9)
"युनिकोड में हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के मूल व्यंजनों, संयुक्ताक्षरों की एनकोडिंग नहीं हुई है, जिसके कारण इन भाषाओं की प्रोसेसिंग "रेण्डरिंग इंजिन" आदि तीन-स्तरीय जटिल अलगोरिद्म के तहत होती है और ‘पेजमेकर’, ‘कोरल ड्रा’ आदि डी.टी.पी. पैकेज के पुराने वर्सन में युनिकोडित भारतीय फोंट्स का प्रयोग नहीं हो पाता। इनके नए वर्सन काफी मंहगे होने के कारण छोटे प्रेस प्रयोग नहीं कर पाते। युनिकोडित हिन्दी फोंट से पी.डी.एफ. बनी फाइल को वापस पाठ (text) रूप में सही रूप में बदलना भी संभव नहीं हो पाता। और समाचार-पत्रों/पत्रिकाओं को अपने मुद्रित अंक के लिए पुराने 8-बिट फोंट में पाठ संसाधित करना पड़ता है तथा वेबसाइट पर ई-पत्र-पत्रिका के लिए युनिकोडित 16-बिट फोंट में संसाधित करने की दोहरी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। जिससे हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं का प्रयोग कठिन बन जाता है। युनिकोड में मूल व्यंजनों तथा संयुक्ताक्षरों की एनकोडिंग करवाने या इण्डिक कम्प्यूटिंग को एकस्तरीय और सरल बनाने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं।

(10)
भारत को अंग्रेजों की दासता से स्वाधीन हुए 68 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक अंग्रेजी की दासता से स्वाधीन नहीं हो पाया। इसका एक कारण है शिक्षा में हिन्दी की नहीं अंग्रेजी की अनिवार्यता है। शिक्षा भले ही मौलिक अधिकार के अन्तर्गत आती है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था प्रान्तीय सरकारों के अधीन हो रही है। यदि शिक्षा प्रणाली को केन्द्र सरकार अपने हाथ में लेती और त्रिभाषी(प्रान्तीय भाषा – हिन्दी – अंग्रेजी) फार्मूले को भी सही रीति लागू करे तो पहली से 10वीं कक्षा तक सिर्फ 10 वर्ष में अधिकांश जनता हिन्दी में निपुण हो जाती। यदि गाँव-गाँव में केन्द्रीय विद्यालय, हर प्रखण्ड/जिला स्तर पर केन्द्रीय महाविद्यालय और हर प्रान्त में केन्द्रीय विश्वविद्यालय चालू कर दिए जाएँ तो समग्र भारत में हिन्दी और भारतीय भाषाओं का समुचित विकास और प्रयोग सुनिश्चत हो सकता है। इस दिशा में क्या कदम उठाए जा रहे हैं और इसे कब तक लागू किया जा सकेगा?
उल्लेखनीय है कि 9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के विद्वानों से 10 यक्ष प्रश्न पूछे गए थे, जिनका उत्तर अभी तक अपेक्षित है।

n हरिराम

प्रीतीश नंदी टेक्नोलॉजी से सुलझती समस्याएं

(आज के दैनिक भास्कर में प्रीतीश नंदी का टेक्नोलॉज़ी पर एक बढ़िया आलेख आया है. इसे साभार यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है. मूल आलेख आप यहाँ -

http://www.bhaskar.com/news/ABH-pritish-nandi-in-dainik-bhaskar-5115634-NOR.html पढ़ सकते हैं)

आज के तकनीकी विशेषज्ञों की सबसे अच्छी बात यह है कि वे हमारी कुछ सबसे पुरानी समस्याए सुलझा रहे हैं। ऐसी समस्याएं, जो कोई कभी सुलझाना ही नहीं चाहता था, क्योंकि मुनाफा यथास्थिति में ही था, इसलिए कोई नहीं चाहता था कि ये दूर हों। हर कोई इससे पैसे कमा रहा था। फिर तकनीक के विशेषज्ञ आए और उन्होंने सारा खेल बिगाड़ दिया। आइए कुछ उदाहरण देखते हैं :

टैक्सी एप ने वह कर दिखाया है, जो कोई सरकार अब तक नहीं कर सकी थी। वे सड़कों पर निजी कारों की संख्या घटा रहे हैं और हमें सार्वजनिक वाहनों का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। अब लोगों और कंपनियों को ज्यादा कारें खरीदने की जरूरत नहीं है। आप बेहतरीन ड्राइव पर जाना चाहते हैं? टैक्सी एप आपके दरवाजे पर बीएमडब्ल्यू एक्स 5 खड़ी कर देगा। आपको किफायती ड्राइव सु‌विधाजनक लगती है? आपका एप ऑटो को वहां बुला देगा, जहां आप मौजूद हैं। यदि ट्रैफिक में फंस गए हैं, तो बाइकर एप की मदद लेकर बाहर निकल आइए। मजदूर संगठन इनका विरोध करेंगे। ड्राइवर के दुर्व्यवहार के हर मामले को प्रतिद्वंद्वी उछालेंगे। नेता इन एप पर प्रतिबंध लगाना चाहेंगे। परंतु हम आम लोगों को ये एप बहुत प्रिय हैं।

बुकिंग एप ने फिल्में देखना, खेल आयोजनों का लुत्फ उठाना, संगीत सम्मेलनों में जाना, नाटकों का आनंद लेना बहुत आसान बना दिया है। हमारे लिए बस टिकट, रेल और हवाई जहाज के ही नहीं विंबलडन के टिकट खरीदना भी आसान हो गया है। होटल बुकिंग तो बहुत ही मजेदार हो गई है। अब बढ़ा-चढ़ाकर दरें बताने वाले बुकिंग कार्ड को विदाकर, वास्तविक दरों पर होटल बुक कीजिए। एप से सबसे अच्छी बात यह हुई है कि बिचौलिए बाहर हो गए हैं। जीवन अब आसान हो गया है। आप अब यूरो रेल की सीट भी बुक करा सकते हैं। आपको किसी चीज के लिए किसी के आगे गिड़गिड़ाने की जरूरत नहीं है। शॉपिंग भी बहुत अासान हो गई है। अब आपको भूसे में सुई ढूंढ़ने की जरूरत नहीं है। सिर्फ सही एप की तलाश करनी है। फिर कीमतों की तुलना करने वाले एप भी हैं। ये सिर्फ प्रोडक्ट, ब्रैंड या किराना सामान की कीमतों की तुलना नहीं करते बल्कि मकान के लिए लोन, कार लोन, हैल्थ इंशोरेन्स की लागत की तुलना भी करते हैं। उन्होंने अनुमान के आधार पर फैसले लेना खत्म कर दिया है। मेरा तो यह अनुभव है कि एप के जरिये खरीदी सस्ती पड़ती है। अब कृत्रिम रूप से किसी चीज की कमी पैदा करना कठिन हो गया है। सामान घर तक पहुंचाना मुफ्त है। ज्यादातर स्थानीय एप स्टोर जरूरत की चीजें दो घंटे में पहुंचा देते हैं, वह भी सामान मिलने के बाद भुगतान की सहूलियत पर। विदेशों से सामान मंगवाने पर हफ्ता लगता है। अापको मिला सामान पसंद न आए तो चिंता की बात नहीं। वे इसे वापस ले लेंगे, फिर चाहे गलती आपकी हो।

बर्बादी का सवाल ही नहीं। एप ने इस्तेमाल की गई चीजों के लिए बड़ा बाजार खड़ा कर दिया है। अब आपके पास एप है, जो चौबीसों घंटे पुरानी चीजों का रोमांचक बाजार चला रहे हैं। आप वहां सौदेबाजी करके अपनी सामान की अच्छी कीमत वसूल सकते हैं। आपको ऐसी गारंटी मिलेगी, जो कोई सेकंड हैंड कार बेचने वाला नहीं दे सकता। ऑफिस सप्लाई एप ने वे स्टोर हटा दिए हैं, जहां पड़े-पड़े पीली पड़ चुकी स्टेशनरी का विशाल भंडार होता था। स्टैपलर, प्रिंटिंग इंक, पेन, फाइलें और फोल्डरों का अंबार होता था। आपको घटिया सामग्री की झंझट से भी नहीं निपटना पड़ता। आप सर्वश्रेष्ठ में से चुनाव कर सकते हैं, जो प्राय: ऑनलाइन पर बेहतर कीमत में मिलता है। उससे सस्ता जो आप वास्तविक बाजार में नकली चीनी सामान खरीदने के लिए चुकाते हैं।

किताबें तो मेरी जीवन-रेखा हैं। किसी किताब की तलाश में किताबों की दुकानों पर भटकने की बजाय (आज के बुकस्टोर उन किताबों को शेल्फ पर जगह नहीं देते, जो खबरों में नहीं होतीं) अब आप एप के जरिये मनचाही किताब खरीद सकते हैं। यदि उनके पास नहीं हैं, तो वे कहीं से मंगा देंगे। सेकंड हैंड कॉपी चाहते हैं तो वह भी उपलब्ध है। ऐसे ही मैंने लेस्ली चार्टरीज (चीनी मूल के ब्रिटिश लेखक, जिन्होंने सेंट नामक पात्र के आस-पास साहसिक कथाएं बुनीं) का कलेक्शन खड़ा किया। इसके अलावा आप एथन हंट (मिशन इम्पॉसिबल फिल्म सीरिज का पात्र) के युग में ‘द सेंट’ हासिल कर सकते हैं? मैंने वुडी एलन (अमेरिकी लेखक, अभिनेता) की पटकथाएं, ग्राउचो मार्क्स (अमेरिकी कॉमेडियन) वहां से हासिल किए। मैंने तो बालासाहेब के लिए डेविड लो (न्यूजीलैंड के कार्टूनिस्ट, जिन्होंने ब्रिटेन में काम किया) के कार्टूनों की किताबें भी ऐसे ही मंगाई थीं। वे दशकों से छप ही नहीं रही थीं। अपने गणितीय कौशल को आजमाने के िलए मार्टिन गार्डनर्स भी मुझे वहीं से मिले। मुझे टकी (ग्रीक मूल के पत्रकार लेखक, स्पेक्टेटर पत्रिका में उनका कॉलम ‘हाई लाइफ’ प्रकाशित होता था।) की कॉपी वहीं मिली। और हां, पहले संस्करण की एलिस इन वंडरलैंड की दुर्लभ प्रति भी मुझे वहीं से मिली। चूंकि मैंने मेरी लाइब्रेरी दे दी है, अब मैं नई किताबें किंडल पर डाउनलोड करता हूं। इससे मैं दुर्लभ किताबों के दीमक का शिकार बनने से लगने वाले सदमे से बच जाता हूं।

आप शायद न जानते हों, लेकिन शो बिज़नेस में ज्वैलरी, शूज, घड़ियां, हैंडबैग जैसी डिजाइनर चीजें उधार लेने के लिए एप का ही उपयोग होता है। फैशन ज्यादा टिकता नहीं। समझदार लोग इस पर ज्यादा खर्च नहीं करते। जब जरूरत हो किराए पर मंगवा लीजिए। फर्नीचर व फाइन आर्ट की चीजें भी। किराये पर मंगवाइए, इस्तेमाल कीजिए और बदल दीजिए। डीवीडी का जमाना गया और सीडी का भी। अब आप पसंदीदा फिल्म या टीवी शो स्ट्रीमिंग एप पर देख सकते हैं। गाने भी सुन सकते हैं। वे ज्यादातर मुफ्त ही होते हैं। वे दिन हवा हुए जब आपको एक गाना सुनने के लिए पूरी कैसेट खरीदनी पड़ती थी।

यहां तक कि आपके लैपटॉप को भी कोई चीज स्टोर करके रखने की जरूरत नहीं है। अाप क्लाउड पर रखिए और जरूरत पड़ने पर ले लीजिए। आपको ऐसी हार्ड डिस्क की जरूत नहीं है, जिसकी इनकम टैक्स वाले जांच करें। अापको तो सिर्फ एक वर्चुअल वॉल्ट की जरूरत है। ढेर सारे एप हैं, जो आपको यह सुविधा दे सकते हैं। किंतु टैक्स वालों के लिए दुनिया खत्म नहीं हुई है। क्रेडिट और डेबिट कार्ड के स्वाइप, एटीएम से लेन-देन, मोबाइल वॉलेट, बिटक्वॉइन तक सबकुछ ट्रैस किया जा सकता है। इन्हें अब नकदी ढूंढ़ने के लिए कालीन उलटने और कबर्ड की तलाशी लेने की जरूरत नहीं है। सब कुछ खुले में है। अपना दिमाग और डेटा का इस्तेमाल करो। घरों, दफ्तरों पर छापा मारने से तो यह मजेदार है।

प्रीतीश नंदी
वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म निर्माता

pritishnandy@gmail.com

वह दिन दूर नहीं जब हर भारतीय के हाथ में एक अदद स्मार्टफ़ोन होगा.

 

ऐसे में वह दूसरों से सोशल मीडिया - जैसे कि फ़ेसबुक, ट्विटर आदि के जरिए ही जुड़ा रहेगा और यह प्रत्यक्ष है, चूंकि इन सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के उपयोगकर्ताओं की संख्या दिन दूनी बढ़ती ही जा रही है, जिसमें अधिकांश उपयोगकर्ता भारत जैसे जनसंख्या संपन्न देशों से हैं.

क्या हमें ट्विटर जैसे सोशल मीडिया का भारतीय विकल्प नहीं मिल सकता?

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बिलकुल मिल सकता है. http://मूषक.भारत (http://mooshak.in) के अनुराग गौड़ का न केवल यह मानना है, बल्कि वे तो आपके लिए खास - एंड्रायड स्मार्टफ़ोन के लिए  - ट्विटर जैसा सामाजिक नेटवर्क ऐप्प लेकर आए हैं जिसके जरिए आप कुछ कुछ वाट्स ऐप्प की तरह और बहुत कुछ ट्विटर की तरह आपसी संवाद कर सकते हैं.

 

अनुराग गौड़ सीईओ मूषक ceo mooshak.in

 

आपसी संवाद में आसानी और अपने विशिष्ट हिंदी मय फ़ीचरों के कारण मूषक ऐप्प तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और हजारों लोगों ने इसे इंस्टाल किया है.

इस ऐप्प की कुछ प्रमुख सुविधाएँ -

इसका यूआरएल हिंदी - देवनागरी में है, खाता देवनागरी में बना सकते हैं. पूरा ऐप्प देवनागरी हिंदी प्राथमिक भाषा में है, ऐप्प को हिंदी भाषियों को खास ध्यान में रखकर बनाया गया है.

 

mooshak1

#बोलेगा_भारत

भारत में निर्मित और भारत की पहली पसंद

- मूषक का उद्देश्य हिंदी और देवनागरी को आज की पीढ़ी के लिए सामयिक और प्रचलित बनाना है |
- हमें लग रहा है कि टेक्नोलॉजी हमारी हिंदी का स्वरुप बदल रही है और इसका पहला लक्षण हिंदी को कंप्यूटर और फ़ोन पर रोमन लिपि में लिखा जाना है और दूसरा हिंदी के सरल शब्दों का भी अंग्रेजी के शब्दों से बदला जाना है |
- मूषक के द्वारा हम सामाजिक प्रक्रिया को सही मायनों में गणतांत्रिक बनाना चाहते हैं जहाँ गण की आवाज़ गण की भाषा में ही उठे |
- ये बाजारवाद का युग है और इन्टरनेट विचारों का बाज़ार है | अंग्रेजी वहां की अग्रणी मुद्रा है | मूषक हिंदी में हिंदी के लिए बना है |
- मूषक का उद्देश्य हिंदी को अपना एक मंच देना है ताकि उसकी आवाज सुनाई पड़े उन्हें जिनका काम हिंदी के बिना नहीं चलता |
- मूषक के लिए ये शुरूआती दिन है और अपने सीमित संसाधनों में हमने प्रयास किया की इसे उत्कृष्ट बनाया जाये और हमारा प्रयास है की तकनीकी स्तर पर मूषक निरंतर सुधरता रहे | यह हमारा वादा है कि हम कुछ ऐसा बनायेंगे जिस पर भारत को गर्व हो |
- मूषक सम्पूर्णत भारत में निर्मित है और आपके समर्थन के बिना ये आगे नहीं बढ़ पायेगा |
- हमें यकीन है मूषक की सफलता प्रेरित करेगी अन्य युवाओं और प्रकल्पों को हिंदी में कई और App बनाने के लिए |

मूषक की विशेषता :

•  खाता बनाने के लिए फ़ोन नंबर आवश्यक है जिससे Troll करना मुश्किल होगा और पूरी सुरक्षा मिलेगी.
• ५०० अक्षर की शब्द सीमा
• स्वत लिप्यान्तरण (Transliteration) | तो अगर आपको हिंदी टाइपिंग नहीं भी आती है तो कोई फ़िक्र नहीं, आप इंग्लिश में टाइप कीजिये और मूषक उसे देवनागरी में दिखा देगा |
आपके चारों ओर क्या चल रहा है यह जानने के लिए चौपाल जहाँ आप उन खातों से भी समाचार पा सकते हैं जिनका आप अनुसरण नहीं कर रहे हैं |
• चित्र, चलचित्र, गाने डालने की सुविधा |

आपका यूजर नाम @ नाम देवनागरी में लिख सकते हैं |

मूषक ऐप्प के कुछ स्क्रीनशॉट -

 

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mooshak4

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इस नाचीज को राष्ट्रीय भाष्य गौरव पुरस्कार 15-16 प्रदान करने की घोषणा हाल ही में की गई है -

राष्ट्रीय भाष्य गौरव पुरस्कार २०१५-२०१६> Bhashya gaurav आनंद ही आनंद फाउंडेशन वर्ष २०१५ – २०१६ के लिए राष्ट्रीय भाष्य गौरव पुरस्कार की घोषणा करता है। इस घोषणा के साथ भारतीय भाषाओं के प्रोत्साहन के लिए चयनित व्यक्तियों को उनके योगदान के लिए सहर्ष धन्यवाद ज्ञापित करता है। वर्ष २०१५ -१६ के लिए निम्नांकित नाम राष्ट्रीय भाष्य गौरव चुनाव समिति के द्वारा चुने गये हैं-

१. आदरणीय सर्वश्री शहरोज़ क़मर – रांची , झारखंड, भारत

२. आदरणीय अनुराग शर्मा – पिट्सबर्ग , संयुक्त राज्य अमेरिका

३. आदरणीय सुशील सिद्धार्थ – दरिया गंज , नई दिल्ली, भारत

४. आदरणीय शाहिद मिर्ज़ा शाहिद – सरधना ( मेरठ) , उत्तर प्रदेश, भारत

५. आदरणीय सरवत जमाल – बस्ती , उत्तर प्रदेश, भारत

६. आदरणीय रवि रतलामी – भोपाल , मध्य प्रदेश, भारत

७. आदरणीय राकेश खण्डेलवाल – सिल्वर स्प्रिंग , संयुक्त राज्य अमेरिका

 

चयनित व्यक्तियों को राष्ट्रीय भाष्य गौरव पुरस्कार, ९ मार्च –२०१६ “कवि दिवस” के मौके पर बैतूल शहर में श्रद्धेय विवेक जी के द्वारा प्रदान किया जायेगा। अधिक जानकारी आप ऊपर स्लाइडशेयर की स्लाइडों में नेविगेट कर जान सकते हैं.

 

आनंद ही आनंद फाउंडेशन को धन्यवाद एवं साथी पुरस्कृतों को हार्दिक बधाईयाँ!

 

अन्य विवरण आप ऊपर स्लाइड शो को प्ले कर देख सकते हैं.

gandhi hindi mujhe angreji nahi aati firefox hindi poster

फ़ायरफ़ॉक्स समेत अब दुनिया के तमाम बड़े, नामचीन ब्राउज़र जैसे कि क्रोम, ओपेरा, सफारी, एज (पूर्व नाम इंटरनेट एक्सप्लोरर) हिंदी में आ चुके हैं. 

अब तो सुधर जाओ, हिंदी दिवस, हिंदी पखवाड़े के लिए ही सही, अपने ब्राउज़र को हिंदी में रंग दो.

सेटिंग में जाओ, भाषा चुनो और हिंदी चुन लो. बस.

मोबाइल हो या कंप्यूटर - सभी में.

अब गूगल डॉक्स में बोल कर हिंदी लिखने की उम्दा सुविधा उपलब्ध हो गई है.

गूगल डॉक्स को आप चाहें अपने मोबाइल या टैबलेट से प्रयोग करें चाहे पर्सनल कंप्यूटरों या लैपटॉप से, सभी जगह से समान और बढ़िया परिणाम मिलते हैं.

हाँ, यदि आपका इनपुट डिवाइस - यानी माइक्रोफ़ोन उम्दा हो, नॉइन कैंसिल करने वाला टाइप हो (आमतौर पर उन्नत स्मार्टफ़ोन में ये आते हैं) तो परिणाम 99% शुद्धता का होता है, और यदि आपका इंटरनेट कनेक्शन (अभी यह सुविधा ऑनलाइन ही है) बढ़िया है तो क्या कहने!

यकीन नहीं होता? नीचे स्क्रीनशॉट देखें. पूरा पैराग्राफ एक ही सांस में बोलकर लिखा गया है, और गलती? लगभग शून्य!

जै हो टेक्नोलॉज़ी की!!

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ज्यादा दिन नहीं हुए. यही कोई तीन-चार साल पहले की बात है. कोई आमो-खास मिलता था तो बड़े गर्व से बताता था कि वो (भी) फ़ेसबुक पर है. कोई आमो-खास मिलता था तो पूछता था - क्या आप (भी) फ़ेसबुक पर हैं? यदि आप फ़ेसबुक पर नहीं होते थे, और सामने वाला फ़ेसबुक पर होता था तो, वो सामने वाला थोड़ा फूल जाता था - क्योंकि वो फ़ेसबुक पर होता था, और आप नहीं होते थे. फ़ेसबुक पर होना एक किस्म का स्टेटस सिंबल था. तब लोग डिजिटल डिवाइड की बड़ी-बड़ी बातें करते थे.

जल्द ही दुनिया की सारी जनसंख्या फ़ेसबुक पर आने लगी. कुछ दिन पहले, एक रेकॉर्ड बना. एक ही दिन में एक अरब उपयोगकर्ताओं ने फ़ेसबुक के पन्नों को रंगा. यदि आप भी फ़ेसबुक पर हैं, तो आप जानते होंगे कि अधिकांश जनता फ़ेसबुक के पन्ने कैसे रंगती है. बहरहाल, वो मुद्दा अलग है. अभी तो सेलेब्रेशन यह है कि दुनिया के हर सातवें व्यक्ति ने फ़ेसबुक का उपयोग उस दिन किया. जल्द ही यह स्थिति होगी कि दुनिया में जितने आदमी हैं, उससे डेढ़-दो गुने लोग फ़ेसबुक का उपयोग एक ही दिन में करेंगे.

अब आप पूछेंगे कि भई, ये क्या माजरा है - जितने तो लोग नहीं हैं उससे कहीं ज्यादा लोग फ़ेसबुक का उपयोग कैसे कर लेंगे? तो आपको शायद फर्जी फ़ेसबुक प्रोफ़ाइलों के बारे में जानकारी नहीं है. एक अपने लिए, और एक अपने छद्म आवरण के लिए! फ़ेसबुक है ही इसीलिए. कंबल ओढ़ो और घी पियो!

जिस तरह फ़ैशन का रिवर्स ट्रेंड आता है, जल्द ही फ़ेसबुक का रिवर्स ट्रैंड आएगा. बल्कि कुछ मामलों में आ चुका है. जल्द ही लोग गर्व से कहेंगे - आई एम नॉट ऑन फ़ेसबुक! जब दुनिया का हर आदमी फ़ेसबुक पर सवा-डेढ़ बार आ चुका होगा, तब स्टेटस सिंबल ये होगा कि कोई फ़ेसबुक पर न हो. कुछ बुद्धिजीवी किस्म के लोग इस ओर चल पड़े हैं. वो फ़ेसबुक के पन्नों पर उकसाती हुई पोस्टें जानबूझ कर लिखते हैं, और जब दूसरे निठल्ले फ़ेसबुकिये, जिनके पास अपना कुछ कहने-सुनाने का नहीं होता या जिनका कहा-सुना कोई सुनता-पढ़ता-लाइक नहीं करता वो इन्हें फ़्लैग करते हैं, तो जाहिर है ऐसी पोस्टें और ऐसे बुद्धिजीवी लेखकों को फ़ेसबुक का बॉट (कोई आदमी नहीं, बल्कि स्वचालित सिस्टम, जो कुछ अल्गोरिद्म के आधार पर निर्णय लेता है) बैन कर देता है तो चहुँओर हल्ला मचाते हैं कि व्यवस्था के विरुद्ध लिखने पर व्यवस्था के कहने और व्यवस्था के इशारे पर उन्हें फ़ेसबुक से निकाल बाहर किया गया. और वे गर्व से बताते फिरते हैं, इतराते फिरते हैं कि (अब) वे फ़ेसबुक पर नहीं हैं!

यूँ तो मैं भी आम जनता की तरह फ़ेसबुक पर इसके जन्म समय से हूँ, पर अब सोचता हूँ कि जब दुनिया की पूरी जनसंख्या फ़ेसबुक पर आ जाएगी तो, कुछ स्पेशल लोगों को तो बाहर रहना ही चाहिए ना? तो मैं भी सोच रहा हूँ कि अपने फ़ेसबुक पन्ने पर कोई भड़काता पोस्ट लिख मारूं, जिससे कि उस पोस्ट में कमेंट करते हुए प्रशंसक व विरोधी आपस में लड़ मरें - एक दूसरे का वास्तविक रूप दिखा दें - जैसे कि आजकल हिंदी कवियों-साहित्यकारों के फ़ेसबुक पन्नों पर होने लगा है - और, नतीजतन मेरी पोस्ट फ़्लैग हो जाए, और मेरा फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल बैन हो जाए.

और, मैं गर्व से कह सकूं - अब मैं भी फ़ेसबुक पर नहीं हूँ!

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