April 2015

हाल ही में नेपाल में भूकंप आया तो उसके झटके (ट्रेमर) पूरे भारत देश में महसूस किए गए. कई स्थानों पर दहशत और बदहवासी का माहौल रहा, और सोशल मीडिया के दौर में नकली (फेक) संदेशों के माध्यम से अफवाहें भी फैलीं. भोपाल में मंत्रालय के आसपास ऐसी दहशत फैली कि न केवल वहाँ बल्कि स्कूल कॉलेजों में छुट्टी घोषित कर दी गई, जबकि न्यूमार्केट और पुराने भोपाल क्षेत्र में बाजारों में काम-काज अबाधित चलता रहा. ऐसे में सही और सटीक जानकारी कैसे और कहाँ से मिलेगी? खासकर जब आप कहीं बाहर हों और आस पास कोई टीवी-रेडियो न हो. मैं भी बाजार किसी काम से गया हुआ था, तो मेरे फ़ोन में संदेश आया कि भोपाल में भूकंप आया है और सुरक्षित बाहर निकलो. मैंने धन्यवाद दिया और कहा कि मैं तो वैसे ही बाहर बाजार में घूम रहा हूँ. और, भूकंप आता है तो बिना बताए, एक दो मिनट के लिए - किसी को सावधान करने का समय ही नहीं मिलता,  और फिर जब दोबारा आता है (ऑफ़्टर शॉक) तब इसकी मारक क्षमता कम ही होती है. साथ ही, भोपाल आदि क्षेत्र (हो सकता है कि आपका क्षेत्र भी इसी श्रेणी में आता हो) भीषण भूकंप की पट्टी में आते ही नहीं हैं, ऐसे में घबराने वाली बात नहीं होती.

मगर सवाल यह है कि ऐसे समय में समाचारों से अपडेट कैसे रहा जाए?

यदि आपके पास एंड्रायड स्मार्ट फ़ोन है, और उसमें आपने डेटा प्लान (वाई फ़ाई विकल्प भी चलेगा) डलवाया हुआ है, तब इसका विकल्प है आपके पास. गूगल समाचार से आप रह सकते हैं अपडेट. मैंने पाया कि गूगल समाचार में नेपाल में भूकंप आने के दस मिनट के भीतर एक अपडेट आ गया था. और, सबसे बड़ी बाद,  इसका भारतीय, हिंदी संस्करण भी है.

कैसे इंस्टाल करें?

अपने एंड्रायड स्मार्टफ़ोन (यदि आपने अपने कंप्यूटर से सिंक कर रखा है तो कंप्यूटर से भी यह कर सकते हैं) में गूगल ऐप्प स्टोर जाएं. वहां google news सर्च करें. वहाँ गूगल समाचार ऐप्प दिखेगा -

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इस ऐप्प को इंस्टाल करें. ध्यान दें कि गूगल समाचार ऐप्प ही हो और इसके डेवलपर के रूप में गूगल इंक. लिखा हो. नहीं तो मिलते जुलते ऐप्प से समस्या हो सकती है.

इंस्टाल होने के बाद इस ऐप्प को खोलें. इसे अपने क्षेत्र व भाषा के लिए थोड़ा कस्टमाइज करना होगा ताकि बेहतर उपयोग हो सके. इससे पहले अपने मोबाइल की सेटिंग में जाकर स्थान (लोकेशन) एनेबल कर लें (यदि एनेबल नहीं है, और सेटिंग पूरा होने के बाद इसे डिसेबल भी कर सकते हैं). शुरू में यह ऐप्प आपसे स्थान के बारे में इनपुट मांगेगा. आप चाहें तो कोई भी विकल्प चुनकर अपना लोकेशन दर्ज कर सकते हैं. सबसे अच्छा विकल्प यह है कि आप मैप्स विकल्प चुनकर अपना स्थान इनपुट करें और उसे चुनें.

अब आप ऐप्प के ऊपरी दाएं कोने में दिए सेटिंग बदलने के तीन खड़ी बिंदुओं को टच करें. आपको नीचे दिए गए स्क्रीनशॉट अनुसार चेंज एडीशन्स का विकल्प मिलेगा. उसे टच करें.

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आपको ढेरों विकल्प मिलेंगे. नीचे स्क्रॉल करते जाएं. एकदम नीचे की ओर आपको हिन्दी (India) का विकल्प मिलेगा. इसे चुनें. आप देखेंगे कि अन्य भारतीय भाषाओं के लिए भी विकल्प हैं. यदि आप अन्य भारतीय भाषी हैं तो वांछित भाषा चुन सकते हैं.

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हो गया. अब आप गूगल समाचार से अपडेट रह सकते हैं. हमेशा. आप देखेंगे कि 10-15 मिनट पहले की खबरें अपडेट हो गई हैं -

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और हाँ, इस ऐप्प से मौसम का हाल-चाल भी जान सकते हैं -

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और, बोनस में - इस ऐप्प में कई अन्य श्रेणियाँ भी हैं - जैसे कि टेक्नोलॉज़ी, बिजनेस, मनोरंजन, कंप्यूटर तकनीकी आदि आदि. जैसे कि यह - विश्व :

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टेक्नोलॉज़ी नित्यप्रति तिगप्र की राह में है. आप कहेंगे – तिगप्र? अरे भाई, यह प्रगति है, बस उल्टा लिखा है. ठीक वैसे ही जैसे कि प्रगति मेरे जैसे कुछ लोगों के लिए उलटी ही होती है – समस्या बढ़ाने वाली!

उदाहरण के लिए टेलीविज़न को ही ले लो. पुराने जमाने में श्वेतश्याम टीवी होता था. दो या तीन तरह के 14 इंची या 20 इंची मॉडल होते थे, और तीन-चार निर्माता. आज की तरह खरीदने के लिए कोई झंझट नहीं होता था – कि आठ सौ पचहत्तर किस्म के टीवी सेटों में से कौन सा खरीदा जाए! और, चैनल भी एक ही होता था. दूरदर्शन. टीवी का प्लग लगाया, बिजली का बटन चालू किया और बस. टीवी चालू. फिर आप आराम से बैठकर चित्रहार और कृषिदर्शन देख सकते थे सरकारी समाचार नुमा प्रोपेगंडा के बीच.

आह! क्या दिन थे वे. टीवी चालू-बंद करना, टीवी के प्रोग्राम देखना कितने आसान थे. फिर अचानक टेक्नोलॉज़ी क्रांति हुई, और एक अदद रिमोट कंट्रोल आ गया टीवी को चालू बंद करने को. रिमोट कंट्रोल से आप अपने सोफे से उठे बिना ही दूर से टीवी चालू बंद कर सकते थे. यह टेक्नोलॉज़ी की प्रगति थी – परंतु मेरे जैसे लोगों की तो दुर्गति थी.

मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि रिमोट को किस तरह सीधा उल्टा पकड़ा जाए, कौन सा बटन चालू करने के लिए दबाया जाए, एक ही बटन क्यों चालू और बंद दोनों ही काम के लिए लिया जाता है, आवाज बढ़ाने वाले बटन को दबाता हूँ तो चैनल क्यों बदल जाता है, जब टीवी चालू करने के लिए कोई बटन दबाता हूँ तो क्यों ऑडियो रिसीवर से आवाज आनी बंद हो जाती है आदि आदि... और जब मैं सोच समझ कर याद कर कोई बटन दबाकर टीवी बंद करने की कोशिश करता हूँ तो आवाज और बढ़ जाती है, तब मैं सोचता हूँ कि रिमोट को ईंट की तरह उपयोग कर टीवी को ही पूरी तरह सदा सर्वदा के लिए क्यों न बंद कर दूँ!

खैर, नियमित उपयोग से अंततः रिमोट का थोड़ा बहुत उपयोग करना मैंने सीख ही लिया और जब मैं ठीक ढंग से रिमोट से टीवी चालू बंद कर लेता था, तो इस बीच प्रगति फिर से चली आई. अब आ गया मैजिक रिमोट. यह मैजिक रिमोट तो आपके हाथ में जादू की छड़ी है. एक तो सामान्य रिमोट से बटन बहुत ही कम मगर काम करने में दस गुना ज्यादा सक्षम. अब आप इसी एक मैजिक रिमोट के न केवल बटन को अबा-दबा कर बल्कि मैजिक रिमोट को जादुई छड़ी की तरह घुमा-फिरा कर – जेस्चर बनाकर - भी न केवल टीवी को चालू बंद किया जा सकता है बल्कि फ़िल्में देख सकते हैं, गाने सुन सकते हैं, यूएसबी ड्राइव चला सकते हैं, ईमेल भेज सकते हैं और मेरे विचार में तो मंगल ग्रह के निवासियों से भी इस जादुई रिमोट से संपर्क कर सकते हैं!

जाहिर है, इस जादुई रिमोट से मैं बेहद घबराता हूँ. न जाने क्या क्या करम कर डालने की ताकत रखता है यह. शायद नाम भी इसीलिए इसका जादुई रिमोट रखा गया है. घर में जब तक जानकार नहीं होते हैं, इस जादुई रिमोट के आसपास भी मैं नहीं फटकता. यदि किसी दिन मुझसे इसका कोई बटन दब गया या मेरे हाथ से कोई जेस्चर बन गया तो पता चला कि टीवी सेट ही ग़ायब हो गया. भई, प्रगति की बात हो रही है, टेक्नोलॉज़ी एडवांसमेंट की बात हो रही है, कुछ भी हो सकता है.

मैंने तो अपने हिस्से की प्रगति देख और भुगत ली है. अब और नहीं! नहीं तो हमारे जैसे लोगों के लिए तो यह तिगप्र ही रहेगी!

(जग सुरैया के व्यंग्य – मेकिंग स्सेरगोर्प से प्रेरित)

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व्यंज़ल

प्यार का इजहार फ़ेसबुक में

दुश्मनी का वार फ़ेसबुक में

 

बर्थडे, एनिवर्सरी या वेलेंटाइन

सब वार त्यौहार फ़ेसबुक में

 

कौन असल और कौन फेक है

पहचानें कैसे यार फ़ेसबुक में

 

आंगन सूने हैं गलियाँ सूनी

बस मची है बहार फ़ेसबुक में

 

पागलों में रवि भी शामिल है

ढूंढने चला है प्यार फ़ेसबुक में

गूगल इनपुट टूल में कुछ समय पहले से हिंदी हस्तलेखन की सुविधा मिली हुई थी.

google handwriting tool

अब हस्तलेखन के लिए अलग से ऐप्प जारी किया गया है ( ऐप्प स्टोर में google handwriting input सर्च करें) जिसमें कोई 80 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में आप अपने कंप्यूटिंग उपकरण के टचस्क्रीन / टचपैड पर हस्तलेखन से बखूबी और बढ़िया टाइप कर सकते हैं. इससे पहले एंड्रायड उपकरणों में बोलकर हिंदी लिखने की सुविधा आ चुकी है.

हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाएँ हैं, जिनमें आप हस्तलिपि से टाइप कर सकते हैं -

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नेपाली, पंजाबी, मराठी, तमिल, तेलुगु, उड़िया, मलयालम, कन्नड़, गुजराती तथा बंगाली.

इसमें प्रेडिक्टिव टाइपिंग भी है, यानी आप क्या लिखना चाह रहे हैं यह अपने शब्द संग्रह से बता भी सकता है जिससे आपका काम आसान हो जाता है.

 

इस विधि से आप उंगली अथवा स्टाइलस से टाइप कर सकते हैं, और थोड़ी से रियाज से आप धड़ल्ले से टाइप कर सकते हैं.

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और, यह टूल हर जगह काम करता है. संपर्कों को ढूंढने में भी!

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नेट न्यूट्रैलिटी यानी अंतर्जाल या इंटरनेट निष्पक्षता से तो दुकालू भी बहुत परेशान है. वैसे भी, जब दुकालू के आस-पड़ोस की तमाम जनता जब वाट्सएप्प, फ़ेसबुक और ट्विटर पर न पहुंच गई, दुकालू ने नेट की तरफ ध्यान ही नहीं दिया था. सोचता था कि हमें क्या? पर जब उसने देखा कि जनता वाट्सएप्प, फेसबुक और ट्विटर पर घुसे रहती है, वहीं हँसती, गाती और रोती है, तो एक दिन उसने भी इंटरनेट पैक ले ही लिया.

पर, ये क्या. सत्यानाश हो इन आईएसपी का. इंटरनेटी कंपनियों का. कहीं निष्पक्षता हैये ही नहीं. आपके सापेक्ष में नेट न्यूट्रैलिटी के अलग माने हों, पर दुकालू की सोच अलग है, बड़ी है. अब देखो न, जब वो गूगल पर रासायनिक पदार्थ सोना और पीतल की खोज करता है तो गूगल बायस्ड होकर उसके सामने बेबी डॉल सनी लियोनी और उसका गाना दुनिया पीतल दी परोस देता है. इसी तरह जब वो शहजादे, साहबजादे, फेंकूराम, नौटंकीबाज आदि-आदि सर्च मारता है तो पता नहीं नेट की न्यूट्रैलिटी कहीं घास चरने चली जाती है और उल्टे सीधे प्रतिमानों को खोज कर बताती है – कभी किसी का पक्ष लेती है तो कभी किसी का.

 

दुकालू जब जब भी, काम की साइट जैसे कि रेल्वे रिजर्वेशन की साइट खोलता है, कमबख्त खुलती ही नहीं. खासकर तत्काल टिकिट के समय. जबकि फ्लिपकार्ट और स्नैपडील जैसी साइटें एक स्नैप में झट और फट से खुलती हैं. जब भी कभी कोई मजेदार वीडियो देखना होता है, तो साइट बफरिंग चालू कर देती है, और जब कोई विज्ञापन का वीडियो चलता है तो साइट झकाझक चलती है. अब बताओ? और करो बात नेट न्यूट्रैलिटी की!

दुकालू के लिए नेट न्यूट्रैलिटी के मायने अहम हैं. अभी तो वो इस बात से परेशान रहता है कि ये नेट वालों को कैसे पता चल जाता है कि वो भोपाल के किसी मोहल्ले से नेट चला रहा है, और कौन-कौन सी कैसी-कैसी साइटें देख रहा है. ऐसे में नेट कैसे न्यूट्रल रह सकता है भला? नेट न्यूट्रैलिटी के लिए ये मुआ ट्रैकिंग सिस्टम बंद होना चाहिए. और, न केवल ब्राउज़रों में इतिहास की सुविधा खत्म होनी चाहिए, निजी / गुप्त विंडो की सुविधा पुख्ता होनी चाहिए – ऐसी कि आईएसपी भी ट्रैक न कर सकें, तभी तो हम सभी को सही नेट न्यूट्रैलिटी मिलेगी!

दुकालू इस बात से भी परेशान रहता है कि जब तब टोरेंट, द पायरेट बे जैसी साइटों पर सरकार प्रतिबंध लगा देती है और इंटरनेट का पूरा मजा उपभोक्ताओं को लेने नहीं देती. नेट न्यूट्रैलिटी तभी है जब तक कि ऐसी साइटें जिंदा हैं. नहीं तो इंटरनेट का मतलब ही क्या? सरकारी दफ़्तरों में बैठे मंदबुद्धि किस्म के लोग जब तब बैन लगा देते हैं, पर, ईश्वर इन्हें माफ करें, इन्हें पता नहीं होता कि ये क्या कर रहे हैं. इधर बैन लगता है, जनता उधर कई-गुना विभिन्न प्रॉक्सी तरीकों से उनका ज्यादा से ज्यादा उपयोग करने लगती है. कभी कभी तो लगता है कि बैन लगाया ही प्रचार प्रसार के लिए जाता है. और, अगर ऐसा है तो भी यह नेट न्यूट्रैलिटी के खिलाफ तो हैये ही!

इधर इंटरनेटी विज्ञापनों ने तो नेट न्यूट्रैलिटी की वाट लगा दी है. इंटरनेट पर दुकालू जिस साइट पर भी जाता है, अपने आप को विज्ञापनों के बीच झांकता हुआ पाता है. पता ही नहीं चलता कि विज्ञापन के बीच सामग्री है कि सामग्री के बीच विज्ञापन. इंटरनेट पर जो चीज वो सर्च करता है, उसी का और उससे मिलती जुलती चीजों का विज्ञापन उसको परोसा जाता है. अब, कहाँ गई नेट की न्यूट्रैलिटी? और तो और, जिस सामान को सर्च कर दुकालू इंटरनेट पर छः महीने पहले खरीद चुका होता है, उसका विज्ञापन इंटरनेट पर उसका रोज पीछा करता है. अरे, भाई, टेक्नोलॉज़ी जब इतनी एडवांस हो गई है, जब इतनी ट्रैकिंग कर चुके होते हो कि बंदा क्या सर्च कर रहा है, क्या खरीदना चाहता है, तो यह भी दस्तावेज़ीकृत कर लो कि बंदे ने यह आइटम अलां दिनांक को फलां साइट से ऑनलाइन खरीद लिया है, लिहाजा, अब इसे किसी दूसरी चीज का विज्ञापन तो परोसो!

सबसे बड़ी समस्या तो नेट पैक की है. दुकालू का दिल्ली वासी मित्र जहाँ फ्रीवाईफ़ाई में नेट चलाता है तो यहाँ उसे 10 पैसे प्रति किलोबाइट के महंगे पैक से ले-देकर गुजारा करना पड़ता है. कोई अमीर आदमी बड़ा खर्च कर अनलिमिटेड, ऑप्टीकल फ़ाइबर कनेक्शन से नेट चलाकर शान बघारता है तो कोई 2 जी के 56 केबीपीएस के टूटते-जुड़ते इंटरनेट के सहारे गुजर-बसर करता है. कोई कंपनी 100 रुपए में 1 जीबी डाटा प्लान देती है तो कोई कंपनी 100 रुपए में 5 जीबी दे देती है. ऐसे में नेट न्यूट्रैलिटी की बात करना तो बेमानी है. कहाँ है नेट न्यूट्रैलिटी? कहाँ है? कहाँ है? सरकार इस बारे में क्या कर रही है? ट्राई क्या कर रहा है? नेट ऐक्सेस को मूलभूत अधिकार में शामिल किया जाना चाहिए और हर किसी के लिए निःशुल्क वाईफ़ाई प्रदान किया जाना चाहिए. तभी हासिल होगी असली नेट न्यूट्रैलिटी.

नेट न्यूट्रैलिटी जब तक पूरी तरह हासिल नहीं होगी, दुकालू का इंटरनेट पर जीना मुहाल है. ले देकर तो आया था, अब पता नहीं दुकालू कब इंटरनेट को बाय-बाय कर दे! दुकालुओं को नेट पर बनाए रखने के लिए नेट न्यूट्रैलिटी हासिल करना और उसे बनाए रखना परम आवश्यक है. नेट न्यूट्रैलिटी जिंदाबाद!

(चित्र - नेट न्यूट्रैलिटी गूगल सर्च कोलॉज)

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... जिसके बारे में मुझको सब पता है...

 

येल्लो! अब अपने हाथों में ऐसा कैमरा आने वाला है जो किसी भी चीज का केमिकल कंपोजीशन तुरत-फुरत बता देगा. जरा याद करिए अपने हाईस्कूल के जमाने को जब कैमिस्ट्री लैब में किसी साल्ट के कैमिकल कंपोजीशन के बारे में पता लगाने के लिए कितने और कैसे कैसे पापड़ बेलने पड़ते थे. अब वो सारे प्रोसीजर डालिए रद्दी की टोकरी में और साल्ट पर अपने कैमरे के लैंस को फ़ोकस करिए और स्क्रीन पर पढ़ लीजिए - 20 प्रतिशत ऑक्सीज़न और 80 प्रतिशत नाइट्रोजन. और, यह कोई हवाबाजी नहीं है!

जाहिर है, यह कैमरा खरा सोना और खोटे सिक्के को तो शटर झपकाते ही पहचान लेगा. और, यदि इसके प्रयोग को आगे बढ़ाया जाए, इसके सोर्स को ओपन कर दिया जाए तो इसके प्रयोग की अंतहीन संभावनाएं भी हो सकेंगी. कुछेक की कल्पनाएं तो की ही जा सकती हैं -

  • यह आपके ( माने, किसी के ) दिमाग में लगे जंग के प्रतिशत को बता देगा
  • यह सामने वाले के मन में (आपके प्रति) भरे साइनाइड का पता लगा लेगा - यानी आप पता कर सकेंगे कि सामने वाला भले कह रहा हो - आई लव यू, जिसका वस्तुतः अर्थ होगा - आई हेट यू!
  • यह दो लोगों के बीच बन रही (या टूट रही,) कैमिस्ट्री (यानी आने वाले दिनों में होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं) को बता देगा
  • आपको अपनी कार में डाले जा रहे पेट्रोल / डीजल में एडल्ट्रेशन का पता लगता रहेगा जिससे आप निश्चिंत रहेंगे कि कार का माइलेज क्या होगा और कब मेंटेनेंस करवाना होगा.
  • मिलावट की बात निकली है तो आप कभी भी कहीं भी पता कर सकेंगे कि जो दूध आप पी रहे हैं उसमें कितना पानी, यूरिया और डिटर्जेंट मिला है, और प्रोटीन कंपनसेशन के लिए आपको कितना क्या और कुछ खाना-पीना होगा.

सदा सर्वदा की तरह, यह सूची अंतहीन हो सकती है. पर, कुछ नायाब खयाल तो आपके मन में भी आ रहे होंगे? तो बताएँ?

अब आपका एंड्रायड उपकरण (फ़ोन या टैबलेट) हिंदी बोलने लगा है.

यानी न केवल आपके एंड्रायड स्क्रीन के माल को, बल्कि गूगल प्ले की हिंदी किताबों, हिंदी टैक्स्ट फ़ाइल या हिंदी की डाक्यूमेंट फ़ाइल  की सामग्री को भी अब आप सुनकर इस्तेमाल कर सकते हैं.

इसके लिए गूगल प्लेस्टोर से गूगल टैक्स्ट टू स्पीच इंस्टाल करें. आमतौर पर यह प्रीइंस्टाल होता है. इसके नवीनतम संस्करण पर अपडेट करें.

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ऊपर के चित्र में आपको दिखेगा कि हिंदी नाउ सपोर्टेड. पर हिंदी पैक स्वयं इंस्टाल नहीं होता.

 

सेटिंग में जाकर इनेबल करना होगा.

स्टेप-बाई-स्टेप विधि -

 

एंड्रायड फ़ोन में सेटिंग >  एक्सेसिबिलिटी > टैक्स्ट टू स्पीच आउटपुट >  में जाएं और गूगल टैक्स्ट टू स्पीच इंजन के बाजू में दिए गियर बाक्स को टच करें.

आपको इंस्टाल वाइस डेटा का विकल्प दिखेगा. इसे टच करें और उपलब्ध विकल्पों में से हिंदी भाषा डाउनलोड करें.

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हिंदी भाषा डाउनलोड होने के बाद आपका एंड्रायड फ़ोन हिंदी में बोलने बताने के लिए तैयार हो जाएगा.

सेटिंग >  एक्सेसिबिलिटी > टैक्स्ट टू स्पीच आउटपुट >  में डिफ़ॉल्ट लैंगुएज स्टेटस में जाकर  पक्का कर लें कि  हिंदी सेट है. यदि नहीं तो उपलब्ध भाषा विकल्प में हिंदी सलेक्ट कर लें.

 

अब गूगल प्ले बुक्स में जाकर  किसी भी हिंदी की किताब को पढ़ने के लिए खोलें - जैसे कि नीचे के चित्र में दिया गया है. फिर ऊपरी दाएं कोने में तीन खड़ी बिंदुओं को टच कर संदर्भित मेन्यू को खोलें. यह नीचे दिए चित्र अनुसार दिखेगा.

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अब रीड अलाउड मेन्यू को टच करें.

आप अपनी हिंदी किताब को अब सुनकर "पढ़" सकते हैं. ध्यान दें कि स्पीच इंजन चालू होने में थोड़ा समय लग सकता है जो कि आपके स्मार्टफ़ोन या टैबलेट की क्षमता के मुताबिक हो सकता है.

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ऊपर के चित्र में पीले रंग से हाइलाइट किए पाठ को गूगल एंड्रायड हिंदी स्पीक इंजन बोलकर पढ़ रहा है. आवाज की गुणवत्ता अच्छी है, और अभी केवल स्त्री आवाज ही है. हालांकि थोड़ी सी मशीनी पढ़ाई है, मगर आवाज कर्णप्रिय और खनकती हुई है, जो अच्छी लगती है. हाँ, वाक्य और शब्दों के बीच का अंतराल जरूर कभी कभी उलझ जाता है और पाठ के सुनने के आनंद में कमी करता है, मगर, मशीनी आवाज में यह बात तो शायद बनी ही रहनी है.

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यह पुस्तक के पृष्ठों को स्वयं ही आगे पलट कर पढ़ता है. यानी जब तक आप इसे रोकेंगे नहीं, पूरी किताब पढ़कर ही दम लेगा!

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एंड्रायड के स्क्रीन रीडिंग और गूगल प्ले की किताब को तो आप हिंदी में सुन लिए. क्या क्लिपबोर्ड और अन्यत्र भंडारित आपकी हिंदी टैक्स्ट फ़ाइलों का क्या? इसके लिए वाइस रीडिंग (Voice Reading) नामक मुफ़्त ऐप्प गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड करें और अपने एंड्रायड फ़ोन में कहीं भी उपलब्ध हिंदी पाठों को सुनें - क्लिपबोर्ड में कॉपी अथवा टैक्स्ट फ़ाइलें अथवा रचनाकार.ऑर्ग वेबसाइट में प्रकाशित कहानी भी! 

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हाँ, इस आलेख को भी आप अब अपने एंड्रायड मोबाइल पर सुन सकते हैं!

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