February 2015

प्रतिष्ठित टेड वार्तालापों की श्रृंखला में हिंदी में प्रथम प्रस्तुति देने का ऐतिहासिक महत्व का कार्य किया है दिव्य प्रकाश ने. नीचे एम्बेडेड यू ट्यूब वीडियो पर पूरा मनोरंजक व्याख्यान देख-सुन सकते हैं. प्रस्तुति का स्क्रिप्ट नीचे है, जिसे दिव्य प्रकाश के फ़ेसबुक वाल से साभार प्रकाशित किया जा रहा है.

 

देवियों और भाइयों,

आज से पाँच- साढ़े पाँच साल पहले मैं एमबीए कॉलेज में पाया जाता था। एमबीए में इतनी presentations होती हैं कि कई बार आपको ये डाउट होता है कि कहीं आप masters in power point तो नहीं कर रहे । खैर आपको बिलकुल भी टेंशन लेने की जरूरत नहीं है मैं कोई प्रेजेंटेशन लेकर नहीं आया । यहाँ टेडx SIBM Bengluru में मुझे बुलाने के लिए पूरी टीम का बहुत धन्यवाद, ज़्यादा धन्यवाद इस बात का कि आपने मुझे हिन्दी में बोलने की पर्मिशन दी।

हिन्दी दुनिया में चौथे नंबर पर सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा है। इसको दुनिया भर में करीब 50 करोड़ लोग बोलते हैं। आपकी जेब में जितने भी रूपय का नोट पड़ा हो, आप उसको कभी ध्यान से देखेंगे तो पायेंगे हर नोट में 17 अलग अलग भाषाओं में लिखा होता है। जिसमें से दो भाषाएँ जिनका फॉन्ट बड़ा होता है उनमें से एक हिन्दी है और दूसरी इंग्लिश। ये फॉन्ट साइज़ इन दोनों भाषाओं के dominance के बारे में बताता है। हिंदुस्तान में daily करीब 13 करोड़ न्यूज़ पेपर छापते हैं जिसमें से करीब 6.5 करोड़ हिन्दी के होते हैं, अगर एमबीए की language में कहा जाए तो हिन्दी न्यूज़ पपेर्स का मार्केट share almost 50% है।

मैं जिस स्कूल में 12th पढ़कर पास हुआ, वो हिन्दी मीडियम का था। स्कूल की एक महीने की फीस एक रूपाय अस्सी पैसे हुआ करती थी। मैं अपने मोहल्ले में इंग्लिश मीडियम में पढ़ने वाले कई लड़कों को बड़े surprise से  देखता था, जब वे शाम को क्रिकेट खेलते हुए बताते थे कि उनके स्कूल में एक बार हिन्दी में बोलने पर 10 रूपय फ़ाइन लगता है।

हम सभी की जिंदगी में एक फैमिली होती है, दोस्त होते हैं, एक गर्ल फ्रेंड या एक बॉय फ्रेंड होते हैं और किस्मत बहुत ही अच्छी हुई तो एक से ज़्यादा गर्ल फ्रेंड या बॉय फ्रेंड होते हैं. जैसे ये लोग हमारी जिंदगी का हिस्सा होते हैं। ऐसे ही अंकलआपकी जिंदगी का हिस्सा होते हैं । जो आपसे जब भी  मिलते हैं तो डाइरेक्ट्ली या इंड्रेक्टल्ी या silent मोड में घूरते हुए बस इतना ही कहते हैं

“बेटा तुमसे नही हो पाएगा”

वो चाहे आईआईटी jee का पेपर हो, कैट crack करना हो या फिर UPSC हो.

मेरी कॉलोनी में भी ऐसे ही अंकल थे। अंकल फ़ॉरेन रिटर्न थे, इसलिए मोहल्ले में उनकी बहुत इज्ज़त थी ठीक वैसे ही जैसे कि आज कल आईटी कंपनी में, onsite वाले बंदे की होती है जो रोज़ रोज़ वहाँ से “feeling awesome”, “feeling excited”, के साथ फोटो update कर कर के आपकी टाइम लाइन को भर देता है। अंकल की कॉलोनी में इज़्ज़त इसलिए भी थी क्यूंकी वो अपने बेटे से केवल इंग्लिश में बात करते थे।

देवियों और भाइयों,

अंकल ये मानते थे कि अगर कोई IIT में नहीं पढ़ा तो समझिये लड़का कमजोर है कुछ नहींकरेगा आवारा निकलेगा । IIT का Exam हुआ मैं रहा majority में, selection हुआ नहीं । अंकल आए और बोला “देखा हमने पहले ही कहा था, लड़का कमजोर है, कुछ नहीं करेगा, आवारा निकलेगा”।

इसके बाद मैंने एक प्राइवेट इंजीन्यरिंग कॉलेज से इंजीन्यरिंग पूरी की लेकिन वहाँ से placement नहीं हुआ। मैंने placement के लिए walk-in देना शुरू किया 2-3 महीने कहीं कुछ नहीं हुआ । इसी दौरान एक ad-agency के लिए फ्री में बहुत दिन तक ads लिखे । वो ads जो कभी भी मेरे नाम से release नहीं हुए लेकिन लिखने में मन लगने लगा । लगा यही तो करना चाहता था शुरू से । बस साथ में MBA हो गया । लेकिन लिखने का चस्का अब लग चुका था । uncle घर आते रहे और अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के बच्चों के “Package” बढ़ा-बढ़ा के बताते रहे । मैं कुछ नहीं बोला । इन सब के साथ मैं चुपचाप अपनी किताब पूरी करने लगा. जब किताब आई तो घर पे सब लोग बहुत खुश थे, वो सारे दोस्त खुश थे जिन्होने एक भी अच्छी चीज नहीं सिखायी सिवाए दोस्ती के । अंकल भी घर आए, चाय वाय पीते हुए सबको बताने लगे

“देखा हमने तो पहले ही कहा था, लड़का जरूर कुछ अलग करेगा।“

देवियों और भाइयों,

कहानी यहाँ खतम नहीं होती, अक्सर कहानियाँ कहानी खत्म होने के बाद ही शुरू होती हैं। अंकल पास आए और किताब अपने हाथ में उठकर पहला पन्ना पलटते ही बोले

“क्या यार, तुमने हिन्दी में किताब लिखी है, कमजोर ही रह गए तुम पढ़ाई में। तुम तो अच्छे खासे बी tech  हो, एमबीए भी किया है । किताब इंग्लिश में क्यूँ नहीं लिखी”

अब मैं अंकल को क्या समझता ये वो हिन्दी थी जिसमें मैंने लोरी सुनी थी, पहला प्यार किया था। मम्मी ने,हिन्दी मुझे,अपनी गोदी में प्यार से पुचकार सिखायी गयी थी और अङ्ग्रेज़ी मास्टर साब ने स्कूल में डंडा मार मार के सिखायी थी। अब भी जब इंग्लिश मूवी देखता हूँ तो सही बता रहा हूँ, सोचता हूँ कि subtitles होते तो कितना अच्छा रहता।

मैं आपके लिए बातचीत थोड़ी आसान करने के लिए पहले ही बता दूँ । इस दुनिया में ‘शुद्ध हिन्दी जैसा’ कुछ भी exist नहीं करता है और न ही कभी करता था। यकीन मानिए ये हिन्दी की सबसे खराब नहीं बल्कि सबसे अच्छी बात है कि कि वो कभी भी pure नहीं रही, शुद्ध नहीं रही । मैं एक example देता हूँ आपको

मैं कमरे में गया मैंने कमीज़ उतार कुर्सी पर रख दी, खिड़की खोली टेलिविजन चला दिया आकाश की ओर देखा। छ भाषाएँ हैं इसमें, कमरा- इटालियन है, कमीज़ अरबी, कुर्सी पोर्टगीज़ से, टीवी इंग्लिश से, आकाश संस्कृत से और बाकी जो बचा वो है हिन्दी ! हिन्दी को ऐसे ही दिल की भाषा नहीं कहा जाता। हिन्दी का दिल इतना बड़ा है कि वो अपने घर में बाकी सभी भाषाओं को आराम से जगह दे देती है। 

बंगलोरे मुंबई पुणे या दिल्ली में आप किसी चाय की टपरी पर जाकर कभी ऐसे ही बिना काम के खड़े हो जाओ तो वहाँ सुनोगे। एक frustrated employee दूसरे को बोल रहा होगा, अच्छा employee में frustrated silent होता है  

“क्या यार बॉस ने दिमाग का दही कर दिया, शाम को दारू पीकर दिमाग की battery रीचार्ज करनी पड़ेगी”

ये आज की हिन्दी है जो रोज़ जाने अनजाने में हम और आप बनाते हैं। कोई भी भाषा बना ही केवल वो सकता है जो उसका एक्सपेर्ट न हो। 

एक चीज़ ध्यान रखिएगा जब मैं प्रो हिन्दी या प्रो-मराठी, प्रो कन्नड बोल रहा हूँ इसका मतलब sये बिल्कुल नही है की मैं anti English कोई बात कह रहा हूँ, बल्कि जो काम हिन्दी ने हिन्दुस्तान को जोड़ने में आज़ादी से पहले किया वही काम आज इंग्लिश कर रही है और बहुत अच्छे से कर रही है। English as a language is amazing but it’s overrated। इंग्लिश नौकरी की भाषा बन गयी इसलिए बाकी सारी भाषायें back foot पर चली गईं। हिंदुस्तान दो हिस्सों में बँटता गया। एक जो इंग्लिश बोल लेते थे और दूसरे जो नहीं। और चूंकि आज़ादी के बाद इंग्लिश हिंदुस्तान के elite क्लास की भाषा बनी इसलिए मिडिल क्लास के लिए हमेशा से ही aspirational रही। । इससे दिक्कक ये हुई कि किसी बंदे की स्किल्स को, बंदे के पोटैन्श्यल को इंग्लिश के स्केल से नापा जाने लगा।

अंकल तो बोलते ही हैं “इंग्लिश speaking मतलब कि बंदा कॉन्फिडेंट है और बंदे की पर्स्नालिटी है”

देवियो और भाइयों,

मुद्दे की बात ये है कि as a society हमें उन सभी लोगों को केवल इसलिए डिस्काउंट नहीं मार देना चाहिए क्यूंकी वो इंग्लिश नहीं बोल पाते। जब आप ऐसे लोगों को सुनेगे तब आप आप सही में जान पाएंगे कि आपके आस पास चल क्या रहा है और तब आपको ये पता चलेगा दुनिया उतनी भी बुरी नहीं है जितनी सुबह न्यूज़ पेपर में लगती है।

मैं ऑनलाइन देख रहा था किसी  ने quora पर पूछ रखा था,

Why is Hindi literature in too much of darkness in present times?

ये सवाल मैंने अंकल से भी पूछा, अंकल बोले

“यार ये काम तो government का है, तुम इन सब चक्करों में कहाँ पड़ रहे हो” 

देवियों और भाइयों,

हिन्दी लिटरेचर इतना भी डार्कनेस में नहीं जितना अंकल को लगता है और इतनी अच्छी position में भी नहीं है कि government के भरोसे छोड़कर आराम से बैठ जाया जाए।

पिछले 10-15 सालों में, एक चीज जिसने हिन्दी लिटरेचर का सबसे ज्यादा नुकसान किया वो ये है कि, पुब्लिशेर्स ने हाइ MRP की किताबें छापीं, high MRP मतलब 500 रुपये से ऊपर की जिसकी वजह से हिन्दी के आम पाठक की purchasing पावर से किताब बाहर हो गईं।

ऐसा नहीं था कि हिन्दी में अच्छी किताबें बिलकुल नहीं आ रही थीं high MRP की वजह से किताबों के डिस्ट्रिब्यूशन की चेन डिस्टर्ब हुई। अच्छी किताबें आयीं भी तो वो उस scale पर distribute नहीं हुई जो होनी चाहिए थी।

इधर बेचारा हिन्दी लिटरेचर का reader वेट करता रहा कि उसकेलिए कुछ आएगा। लेकिन कुछ ऐसा खास आया नहीं। फिर जब 91 के बाद केबल टीवी आया तो धीरे धीरे reader बेचारा वहाँ शिफ्ट होता चला गया। चैनल बढ़ते गए, लाइफ की complexity बढ़ती गयी। reader बेचारा चैनल बदल बदल के वो राहत, वो सुकून आज भी खोज रहा है जो सुकून किताबें दिया करती थीं। पिछले 8-10 सालों में केबल टीवी पर, सोशल मीडिया, what app, ने वो अटैक कर दिया। हमारा attention span अब केवल twitter के 140 words जितना सिमटता जा रहा है। अब एक average reader की लाइफ साइकल ये है कि वो बचपन में कमिक्स से शुरू करता है और विडियो गेम, कार्टून,टीवी, सिनेमा से होता हूँ,daily न्यूज़ पेपर की heading जितना ही पढ़ पाता है।

इधर एक समस्या ये हुई कि हिन्दी में इतना मुश्किल लिखा जाने लगा जो average reader को समझ आता तो लेखक उसमें अपनी बेइज्जती महसूस करता। हिन्दी लिटरेचर जो readers के लिए होता था वो अब

to the intellectuals, for the intellectual, By the intellectuals होकर रह गया।

जैसे जैसे एक आम reader की जिंदगी मुश्किल होती गयी वो आसान से आसान किताबें ढूँढने लगा। वो सहारा उसको इंग्लिश पोपुलर fiction के translation ने दिया। आप कभी भी जाकर flipakart में बेस्ट सेल्लेर्स की लिस्ट पर जाइए और वहाँ किसी भी language हिन्दी, मराठी, तमिल पर फ़िल्टर लगा कर देख लीजिये। उस सेगमेंट में सबसे जादा बिकने वाली किताबें इंग्लिश के पोपुलर फिकशन के translation होंगे। 

फिल्म हॅप्पी एंडिंग में गोविंदा का एक dialogue है

“लड़का लड़की भाग कर गले मिलते हैं तो मिलने दे, स्लो मोशन होने दे,sunset होने दे, गाना बजता है तो बजने दे, लोग पॉप कॉर्न लेकर बैठे हैं, 300 रूपय में लोगों को जीना मत सीखा”

ये डाइलॉग हिंदुस्तान के मिडिल क्लास की पूरी कहानी कह देता है। हम हर जगह बस entertain होना चाहते हैं, टीवी में, फिल्म में, लिटरेचर में, सोशल मीडिया में, वीकेंड में, weekday में, ऑफिस में, कॉलेज में या फिर घर में। 

हिन्दी लिटरेचर यूथ में इसलिए भी पोपुलर नहीं हुआ क्यूंकी जो आज यूथ है जब वो बच्चा था, तब हम बच्चों के लिए लिटरेचर को reinvent नही कर पाए. बावजूद इसके कि हमारे पास पंचतंत्र, तिलस्में होशरूबा, अलिफ लैला, तेनालीराम, चंदा मामा, चम्पक, सरस सलिल, बिल्लू पिंकी चाचा चौधरी, नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव थे।

हमारी नानी, दादी जब हमारा सर सहलाकर, हमें कहानियाँ सुनाकर सुलारही होती थीं तो वो कहानियाँ धीरे धीरे हमें अंदर से जगा रही होतीं थी। वो कहानियाँ हमें बताती थी कि दुनिया के बड़े से बड़े राक्षस को हराया जा सकता है। सच पूछिये तो कहानियों का असली काम बच्चों को सुलाना नहीं बल्कि बच्चों को जगाना है। किसी भी सोसाइटी में अगर टॉप writers बच्चों का लिटरेचर नहीं लिखते तो वो अपनी सोसाइटी का उससे बड़ा नुकसान नहीं कर सकते। जब वेस्ट में हैरी पॉटर पैदा हो रहा था उस दौरान हिन्दी के टॉप writers ने बच्चों के लिखना बंद कर दिया था।

और उधर अंकल अपने बेटे को इंग्लिश का average से average लिटरेचर देते रहे कि कुछ और नहीं तो कम से कम 2-4 नयी vocab ही सीखेगा।

हिन्दी जो पूरी दुनिया भर में पापुलर हुई उसका सबसे बड़ा ड्राईवर बॉलीवुड रहा। बॉलीवुड ने अपने डाइलॉग में इंग्लिश बहुत पहले ही मिक्स करना शुरू कर दिया था। दीवार में जब अमिताभ बच्चन बोलते हैं

“जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ”

वो ये नहीं कहते जाओ उस आदमी के हस्ताक्षर लेकर आओ”

बॉलीवुड बहुत पहले वैसे ही बोलने लगा था जैसे लोग अपनी day to day लाइफ में बोलते हैं।

उधर advertising में पेप्सी के “ये दिल मांगे मोर” ने हिंगलिश के लिए नयी दुनिया खोल दी।

“मेरा नंबर कब आएगा, या फिर इसको लगा डाला तो लाइफ झिंगालाला, hungry क्या, क्या आप क्लोज़ अप करते हैं”

तीसरा FM रेडियो हिंगलिश को गले लगाया।

ऐसा नहीं था बॉलीवुड ने, advertising ने, FM रेडियो ने हिंगलिश को अपनाया तब वो लोगों में पापुलर हुई इसका उल्टा है लोगों में जो वेरनाकुलर पोपुलर हो रही थी उसको इन तीनों मास मीडियम ने अपना लिया। जबकि literature में अभी भी बोलने वाली हिन्दी अलग थी और लिखने वाली हिन्दी अलग थी।

हिन्दी के कवि सम्मेलनों ने भले ही हिन्दी के लिटरेचर को फ़ायदा न पहुंचाया हो लेकिन हिन्दी को popularize करने में बहुत मदद की।

एक और जो बड़ा प्रोब्लेम रहा हिन्दी लिटरेचर में कि यहाँ writers ने अपने आप को बुक promotions से काट लिया। हिन्दी न्यूज़ पेपर और न्यूज़ चैनल में भी हिन्दी किताबों बहुत कम स्पेस मिलता है,लोगों को पता ही नहीं चलता कि कौन सी किताब आई।

फाइव पॉइंट समवन के बाद से इंग्लिश राइटिंग के टॉप selling फ़ेस बदल गए। सलमान रश्दी, अमिताव घोष, वीएस नायपौल जितने इंपोर्टेंट थे उतने इंपोर्टेंट हमेशा रहेंगे लेकिन इंग्लिश पोपुलर राइटिंग ने वो ब्रिज बना दिया जहां पर reader ग्रेजुएट होकर उस लैड्ग्वेज के अच्छे लिटरेचर पर पहुँच जाता है।

हिन्दी अभी उस phase में है जहां पर ब्रिज बनना अभी शुरू हुआ है। पिछले 2-3 साल में हिन्दी के लेखकों के प्रोफ़ाइल बदलना शुरू हुए हैं, इंजीनियर, IIT/ IIM के बंदे, एमबीए किए हुए बंदे, ऐसे कई लोग राइटिंग में आए जिनहोने formally उस भाषा को नहीं पढ़ा था। ये वो लोग हैं जिनको अपनी बुक का प्रमोशन करने में कोई परेशानी नहीं है। जो ऑफिस में कॉलेज में ईमेल इंग्लिश में लिखते हैं और अपना लिटरेचर आम बोल चाल की भाषा में लिख रहे हैं। 

वो न केवल बदलते हुए हिंदुस्तान की कहानियाँ लाये बल्कि वो कहानियाँ ऐसे बोलती हैं जैसे हम और आप। वो कहानियाँ हमारी और आपकी हैं, जहाँ हमारा बचपन हमारे आज को जीभ बाहर निकाल कर चिढ़ा रहा है। जहां हमारी दुनियादारी, समझदारी से ऑफिस में अच्छी रेटिंग नहीं आती।जहाँ कहानियाँ है आपकी और आपके दोस्तों की, उन लड़कियों की जिसने आपको पहला प्यार हुआ लेकिन शादी नहीं हो पायी, मोहल्ले के उन भईया की जो हर बार मिलते ही पीठ पर हाथ थप थपाकर बड़ा ही casually बोल देते हैं

“टेंशन मत लो यार, सब सही हो जाएगा”,

Ultimately इस दुनिया का सारा लिटरेचर हमें यही तो बताता है सब सही हो जाएगा

इधर जो हिन्दी लिटरेचर थोड़ा बहुत पोपुलर हुआ उसमें सबसे बड़ा हाथ है

Online shopping sites का उसने डिस्ट्रिब्यूशन की जो चेन टूट गयी थी उसकी भरपाई करना शुरू कर दिया, दूसरा

सबसे बड़ा कोंट्रिब्यूशन रहा सोशल मीडिया का, हिन्दी के नए पॉपुलर लिटरेचर ने सोशल मीडिया को as डिस्ट्रिब्यूशन medium use किया। सोशल मीडिया पर हिन्दी के use ने तमाम नये रायटर दिये। ऐसे लोग जो बिना सोशल मीडिया के अपनी डायरी के पिछले पन्ने पर लिखा करते थे। सोशल मीडिया ने उस डायरी के आखिरी पन्ने को पूरी दुनिया के सामने खोल दिया।

मेरी किताब आने के बाद एक चीज सुनकर बड़ा अच्छा लगता है जब लोग बताते हैं कि मेरी किताब उनकी पहली हिंदी किताब है। लेकिन इससे भी अच्छा तब लगता है जब वही लोग किताब पढ़ने के बाद बोलते हैं-

“हिंदी इज कूल यार, हिंदी की कुछ और किताबें बताओ।”

हम New wave hindi writers को ये फिक्र नहीं है कि हमारी कहानियाँ इस दुनिया में बची रहेंगी या नहीं। हमारा काम बस इतना सा है कि हिंदी किताबों की दुनिया में हाथ पकड़कर उन लोगों को welcome कर पाये जो जो हिंदी की किताबें नहीं पढ़ते ।

और आप में से कभी कभी कोई रायटर बनना चाहता हो तो उससे बस इतना कहूँगा। अपनी कहानी दुनिया को वैसे ही लिख के सुनाओ जैसा तुम बोलते हो। उसको language की purity से, language के शो ऑफ, pollute मत करो। कहानी तुम्हारी है, आवाज़ भी तुम्हारी आनी चाहिए न।

New wave हिन्दी राइटिंग ने जिस तरह से हिन्दी को reinvent किया है। ये कोई बड़ी बात नहीं है कि अगले 7-8 सालों में आप यूं ही किसी दिन सुबह चाय पीते हुए इंग्लिश के किसी बड़े न्यूज़ पेपर के पहले पेज पर किसी हिन्दी किताब का ऍड देखें।

देवियों और भाइयों, हिन्दी किताबों की दुनिया में आपका स्वागत है।

ये किस्से हैं तुम्हारे, तुम सा ही बोलते हैं।

फुरसत से तुम मिलो तो सब राज़ खोलते हैं॥

अपने पुराने कल को तुम आज का पता दो,

वो भी तो हैं तुम्हारे, इतना कभी जता दो।।

इन सब कहानियों के हीरो तो यार तुम हो,

कंधे पे हाथ रखकर पहला कदम बढ़ा दो।।

-दिव्य प्रकाश दुबे

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(एआईबी रोस्ट पर अमूल का विज्ञापन - साभार अमूल )

खुदा ख़ैर करे, अभी, चंद रोज पहले तक मुझे रोस्ट बीन्स और चिकन रोस्ट का ही पता था, परंतु दुनिया भले ही गोल हो, है यह बहुत बड़ी. बहुत ही बड़ी.

अखबारों और सोशल मीडिया में हो रहे हल्ले से पता चला कि कोई एआईबी रोस्ट भी होता है. और, जब पता चला तो मानव खोजी मन कहाँ ठहरता है भला? ऊपर से, भले ही यू-ट्यूब पर एक एडमिन खास इसके संस्करणों को अपलोड होते ही डिलीट मारने बैठा हो, मगर अपलोडर – तू डाल डाल तो मैं पात पात की तर्ज पर सैकड़ों हजारों अलग-अलग नामों से रोस्टिया रहे हैं और इस एक ही एपिसोड के हजारों वर्शन तमाम वीडियो साइटों पर भिन्न भिन्न नामों से दर्शन दे रहे हैं. ऐसे में, मासूम दर्शक चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने रोस्ट हो ही जा रहा है.

आपने ठीक समझा. आप ही की तरह हर कोई मुफ़्त में रोस्टिया रहा है, और अपने तरीके से रोस्टिया रहा है. किसी को यह भरपूर हँसी मजाक लग रहा है तो किसी देल्ही-बेली... को हिंसक लग रहा है. रोस्ट का मामला कुछ-कुछ ऐसा ही है - बिटर कॉफी का प्याला किसी को कड़वा लग सकता है तो किसी को किक दे सकता है.

वैसे, मेरा बचपन उस मुहल्ले में गुजरा है, जहां बच्चों के जबान पर माँ-पप्पा के बजाए रोस्टेड बोली और उपमाएँ पहले चढ़ती है. मैंने पूरे मुहल्ले के संभ्रांत नागरिकों को सार्वजनिक नल से एक बाल्टी पानी पहले पाने के लिए सार्वजनिक रूप से एक दूसरे को भयंकर-रोस्ट करते हुए देखा-सुना है. और यही नहीं, उस मुहल्ले के रहवासी पारिवारिक सदस्यों के बीच रोस्टियाना संवादों का आपसी आदान-प्रदान भी बेहद आम था. ऐसे में पूरे मुहल्ले के पूरे के पूरे वाशिंदों के ऊपर एफआईआर होनी चाहिए थी और सारा मुहल्ला जेल में बंद होना चाहिए था – या कि मुहल्ले को ही जेल हो जाना चाहिए था.

मजेदार यह भी है कि तथाकथित रोस्ट में जनता ने रोस्ट होने के लिए 4 हजार रुपए खर्च किए. जनता तो वैसे भी कई तरीके से रोस्ट होती रही है. महंगाई, इनकम टैक्स, सर्विस टैक्स आदि-आदि की मार तो है ही, अच्छे दिनों का दिवा-स्वप्न और फ्री बिजली-वाईफ़ाई जैसे लोकलुभावन वादों से भी जनता खुद ही रोस्ट हो रही है - क्योंकि जनता जानती है कि ऐसा होने से तो रहा!

भले ही थोड़ा सॉफ़्ट किस्म का लगे, परंतु एक नेता अपने भाषणों में विरोधी को रोस्ट करते ही रहता है. हिंदी लेखकों-कवियों-संपादकों की जमात भी दूसरे खेमे को रोस्ट-पे-रोस्ट करते रहते हैं. ये बात अलग है कि हिंदी का पाठक अपनी निगाहें फेर कर इन छोटे-बड़े-स्थापित-सम्मानित रचनाकारों को रोस्ट कर डालता है.

इससे पहले कि मैं आपको और, इतना अधिक रोस्ट कर डालूं कि आप अनसब्स्क्राइब बटन पर क्लिक करने की सोचने लगें, मामला यहीं बंद करता हूँ, इस उम्मीद के साथ कि आपकी रोस्टिया टिप्पणियों का सदैव इंतजार रहेगा.

आई लव रोस्ट! ये रोस्टी हम नहीं छोड़ेंगे!

तकनीक दिनोंदिन स्मार्ट होती जा रही है. यहाँ तक कि, एक जमाने में बुद्धू बक्सा कहा जाने वाला टीवी भी अब स्मार्ट हो गया है. ठीक है, परंतु क्या आप स्वयं इतने स्मार्ट हुए भी हैं या नहीं कि इन स्मार्ट तकनीकों का स्मार्ट तरीके से प्रयोग करें, नहीं तो मामला उल्टे गले पड़ जाए!

 

उदाहरण के लिए, यदि आपने अपने बेडरूम में स्मार्ट टीवी लगाया हुआ है तो क्या आपको यह पता है कि आपका स्मार्ट टीवी आपके बेडरूम में की जाने वाली इंटीमेट बातों को रेकार्ड कर उन्हें इंटरनेट पर अपलोड कर सकता है? और, यदि स्मार्ट टीवी में कैमरा लगा है तो ...?

 

जी हाँ, यह संभव है.

तो क्या स्मार्ट टीवी नहीं खरीदें?

जी नहीं, स्मार्ट टीवी जरूर खरीदें. और यदि नहीं भी खरीदना चाहें तो क्रोमकास्ट जैसे डांगल से अपने टीवी को स्मार्ट अवश्य बनाएं. आखिर दुनिया स्मार्ट हो रही है तो आपका टीवी क्यों नहीं?

हाँ, कुछ उपायों से आप इस तरह की समस्याओं से बच सकते हैं और अपने स्मार्ट टीवी का भरपूर उपयोग स्मार्ट तरीके से कर सकते हैं.

 

आपकी आवाज, हावभाव पहचानता है आपका स्मार्ट टीवी :

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(एल जी स्मार्ट टीवी - टीवी में सर्च करने के लिए आपकी आवाज सुनता हुआ आपका स्मार्ट टीवी - शुक्र है कि यह फंक्शन तब चालू होता है जब आप अपने रिमोट के माइक्रोफ़ोन बटन को दबाते हैं.)

स्मार्ट टीवी में दो प्रमुख बातें होती / हो सकती हैं. आपकी जिंदगी आसान बनाने के लिए, तथा आवाज और हावभाव से टीवी कंट्रोल करने व स्काईप जैसी सेवाओं से वीडियो टेलीफोनी  का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए इसमें अंतर्निर्मित कैमरा तथा आवाज पहचानने हेतु रिमोट में माइक्रोफ़ोन होता है. जब आप स्काईप जैसी सेवा चालू करते हैं तो ये स्वचालित सक्रिय हो जाते हैं. इसी प्रकार यदि आप टीवी को आवाज या हावभाव से नियंत्रित करने हेतु तैयार कर देते हैं तो इसका कैमरा तथा आवाज पहचानने वाला माइक्रोफ़ोन चालू हो जाता है और आपके हावभाव तथा आवाज को पहचान कर टीवी के फंक्शनों को नियंत्रित करता है.  कुछ स्मार्ट टीवी के माइक्रोफ़ोन हमेशा सुनने वाले मोड में होते हैं और जैसे ही आप कुछ पूर्व निर्धारित शब्द जैसे कि -  "हाई टीवी" कहते हैं तो यह आपकी आवाज को रेकार्ड करने लगते हैं कि आप आखिर क्या कहना या करना चाह रहे हैं. और यदि आप कहेंगे "हाई टीवी स्टार्ट" तो आपका टीवी चालू हो जाएगा, और आप कहेंगे "हाई टीवी शट डाउन" तो यह बंद हो जाएगा. आमतौर पर, सामान्य उपयोग हेतु ये सेवाएं सुरक्षित, समस्या रहित मानी जाती हैं.

 

तो फिर समस्या कहाँ है?

समस्या वहाँ आ सकती है, जब आपका स्मार्ट टीवी आपके आवाज को ठीक से पहचानने के लिए आपके आवाज को रेकॉर्ड कर रीयल टाइम में अपने क्लाउड सर्वरों अथवा किन्हीं तृतीय पक्ष की सेवा पाने के लिए (जैसे कि स्पीच रिकग्नीशन अथवा स्पीच टू टैक्स्ट / टैक्स्ट ट्रांसलेटर सेवा आदि के लिए) उनके क्लाउड सर्वरों पर अपलोड करता है. आमतौर पर सभी स्मार्ट टीवी यह करते हैं. स्थानीय रूप से ऑफलाइन में आमतौर पर यह कार्य नहीं होता क्योंकि आपका स्मार्ट टीवी और उसमें रखा डेटाबेस इतना सक्षम नहीं होता, और इस कार्य के लिए प्रायः ऑनलाइन डेटा और वृहद सक्षम तंत्र की आवश्यकता होती है.

उदाहरण के लिए, आप अपने स्मार्ट टीवी में अपनी आवाज का उपयोग करते हुए कोई खोज कर रहे हैं. परंतु इसबीच आप कुछ आपसी वार्तालाप भी कर लेते हैं तो वह सारा कुछ रेकॉर्ड हो जाएगा और आपके स्मार्ट टीवी से संबद्ध सर्वरों पर पहचानने के लिए भेज दिया जाएगा, जो कि आप कतई नहीं चाहेंगे. ऊपर से, चूंकि आपका स्मार्ट टीवी इंटरनेट से कनेक्टेड व ऑनलाइन होता है तो उसमें भी हैकिंग से नियंत्रण प्राप्त कर उसके बेजा उपयोग के खतरे वैसे भी हैं.

 

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(स्मार्ट टीवी का स्मार्ट पैनल)

 

 

तो फिर इस समस्या से कैसे निपटें?

आसान है. बस, अपने स्मार्ट टीवी को चलाते समय थोड़ा स्मार्टनेस दिखाएं. निम्न उपायों को आजमा कर इन खतरों को कम कर सकते हैं.

1 - यदि अपने स्मार्ट टीवी का उपयोग ऑनलाइन नहीं कर रहे हों तो भले ही थोड़ा झंझट भरा हो, इसका नेट कनेक्शन बंद कर रखें.

2 - स्मार्ट टीवी का कैमरा यदि उपयोग में न आ रहा हो तो उसे बंद कर रखें.

3 -  स्मार्ट टीवी की सेटिंग में मोशन रिकग्नीशन बंद कर रखें.

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(एल जी स्मार्ट टीवी का मैजिक रिमोट जिसमें आवाज से नियंत्रण करने के लिए माइक्रोफ़ोन है जिसका नियंत्रण एक अलग बटन से किया जा सकता है)

4 - टीवी पर माइक्रोफोन का चिह्न दिखाई दे रहा हो तो यह मान लें कि आपका स्मार्ट टीवी आसपास हो रही तमाम आवाजों को रेकॉर्ड कर रहा है. ऐसे में सावधानी बरतें तथा कार्य समाप्त (जैसे कि स्काईप कॉल पूरा)  हो जाने के बाद माइक्रोफ़ोन बंद कर दें.

5 - आवाज नियंत्रण सुविधा का इस्तेमाल न करें या करें तो ध्यान रखें कि उस वक्त दूसरे किस्म के वार्तालाप न करें.

यदि आपको अपने कंप्यूटर या लैपटॉप में हिंदी में काम करना हो, तो अभी भी तमाम जुगाड़ करने होते हैं, और हिंदी का भौतिक कुंजीपट (वही, फ़िजीकल कीबोर्ड) तो ढूंढे से नहीं मिलता.

परंतु, मोबाइल फ़ोनों के बाजार ने कंपनियों को दूसरे ढंग से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है.

नीचे के स्क्रीनशॉट देखें -

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हैंडसेट का बड़ा किया गया चित्र नीचे देखें -

 

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कीबोर्ड में डिफ़ॉल्ट अंग्रेज़ी के साथ साथ हिंदी भी न केवल अंतर्निर्मित है, बल्कि आसान प्रयोग के लिए, छपा हुआ भी है! सीखने रटने का झंझट भी नहीं.

ये है बाजार की महिमा!!

कौन सुंदर कौन असुंदर 

सुंदरता के पैमाने असुंदर 


बनानी है गर दुनिया सुंदर 

कर ले अपनी निगाह सुंदर 


फकत वक्त की बात तो है 

आज सुंदर कल को असुंदर 


असुंदर लोग ही फिर क्यों 

ढूंढा फिरा करते हैं सुंदर


सत्य असुंदर,  असत्य सुंदर
सुंदर रवि तेरी बात असुंदर


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