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नेट न्युट्रिलिटी, फ़ेसबुक और तिरंगी तस्वीर

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आशीष श्रीवास्तव

पिछले कुछ दिनों से इस पर फ़ेसबुक पर बहस चल रही है। विद्वान अपने अपने तर्क दे रहे हैं, ज्ञान बांट रहे हैं। कुछ तर्क/कुतर्क मजेदार लगे, कुछ थोथा चना बाजे घना वाले भी थे। कुछ लोगों ने नेट न्युट्रिलिटी को "Survival of Fittest" से भी जोड़ दिया, कहने लगे कि नेट न्युट्रिलिटी संभव नहीं है, जो बेहतर है वही बचेगा। जाहिर है अधिकतर लोगों को नेट न्युट्रिलिटी का अर्थ ही नहीं पता।

नेट-बाबा आशीष जी महाराज को भी प्रवचन का मौका मिला:

सबसे पहले कुछ शब्दों से परिचय करते हैं -  

1. इंटरनेट सेवा प्रदाता (Internet Service Provider-ISP) - अर्थात वह कंपनी जो आपको इंटरनेट सेवा प्रदान कर रही है। यह सेवा आपको मोबाईल सेवा के द्वारा, केबल के द्वारा या लैंडलाईन के द्वारा हो सकती है।
उदाहरण :
मोबाईल इंटरनेट सेवा प्रदाता : एअरटेल, आइडीया, रिलायंस,
केबल इंटरनेट सेवा प्रदाता : हैथवे, एअरटेल ब्राडबैंड, तिकोना, रैपीडलिंक

2. इंटरनेट आधारित सेवा : वह सेवा जो आपको इंटरनेट पर उपलब्ध है, इन सेवाओ का किसी विशिष्ट ISP से कोई सीधा संबंध नहीं होता है। ये सेवायें निशुल्क या सशुल्क हो सकती है। इसके उदाहरण है, गूगल खोज, गूगल मेल, ब्लागर, वर्डप्रेस, फ़ेसबुक, स्कायप, याहू खोज, याहू मेसेंजर इत्यादि।

अथ श्री गुरु घंटाल बाबा आशीष महाराज उवाच :

3. संतजनों, नेट न्युट्रिलीटी का अर्थ है आपका ISP इंटरनेट आधारित सेवाओं में कोई भेदभाव नहीं करेगा। वह किसी भी सेवा का अन्य सेवाओं की तुलना में अधिक भुगतान नहीं मांगेगा या किसी विशिष्ट सेवा को प्राथमिकता नहीं देगा। यदि आपको कोई ISP कोई विशिष्ट इंटरनेट आधारित सेवा मुफ़्त उपलब्ध करा रहा है और अन्य सेवाओं के लिये भुगतान मांग रहा है तो यह नेट न्युट्रिलीटी का उल्लंघन है।
नेट न्युट्रिलीटी का अर्थ है कि यदि आपने 10GB/50 घंटे का भुगतान किया है तो आप इसे अपनी मर्जी के किसी भी सेवा के लिये प्रयोग करने के लिये स्वतंत्र है, आपका ISP किसी विशिष्ट सेवा जैसे स्कायप काल के लिये आपसे अतिरिक्त भुगतान नहीं मांग सकता है। आपका ISP किसी विशिष्ट सेवा का धीमा नहीं कर सकता है, नाही किसी विशिष्ट सेवा का मुफ़्त उपलब्ध करा कर उसे बढ़ावा दे सकता है।

4. फ़ेसबुक: यह एक व्यवसायिक कंपनी है, जिसका मूल उद्देश्य मुनाफ़ा कमाना है, यह समाजसेवा के लिये नहीं है। फ़ेसबुक किसी कारण से किसी देश को तरजीह दे रही है, इसका अर्थ है कि उसे उस देश में बाजार दिख रहा है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

लेकिन फ़ेसबुक के स्वामित्व का internet.org या उसका नया अवतार free basics नेट न्युट्रिलीटी का उल्लंघन है क्योंकि यह भारत में केवल रिलायंस के लिये उपलब्ध है। यह कानूनी रूप से गलत नहीं है लेकिन नैतिक रूप से तथा स्वस्थ प्रतियोगिता के खिलाफ है। इस सेवा के प्रयोग के लिये आपको रिलायंस की सेवा का प्रयोग करना होगा जोकि उपभोक्ता को किसी विशिष्ट सेवा प्रदाता की सेवा का प्रयोग करने मजबूर करना होगा। अंतत: विजेता फ़ेसबुक और रिलायंस होंगे, उपभोक्ता नहीं। उपभोक्ता को मुफ़्त में कुछ नहीं मिल रहा है, वह रिलायंस को सेवा के लिये भुगतान करेगा ही।

5.फ़ेसबुक पर अपनी तस्वीर तिरंगी करना: इसे किसी भी रूप से internet.org का समर्थन करने से नहीं जोड़ा जा सकता है। फ़ेसबुक ने यह जानबुझ कर किया या किसी प्रोग्रामर की गलती से हुआ, वह अलग बात है। लेकिन किसी भी तरह से फ़ेसबुक इन आंकड़ों काinternet.org के समर्थन में प्रयोग नहीं कर सकता। यह न केवल नैतिक रूप से गलत होगा, कानूनी रूप से भी गलत होगा।

6.आप अपनी तस्वीर तिरंगी करे या सप्तरंगी आपकी मर्जी, बस आपको ज्ञात होना चाहिये कि आप ऐसा क्यों कर रहे है। भेड़चाल का शिकार ना बने, आपका हर कदम आपका अपना सोचा समझा होना चाहिये।

7.तस्वीर तिरंगी ना करने का अर्थ डिजिटल इंडिया का विरोध नहीं होता, ना ही तस्वीर तिरंगी करने का अर्थ डिजिटल इंडिया का समर्थन होता है। आम जीवन में तकनीक का विरोध करने वालों ने भी ’फ़ेसबुक’ पर तस्वीर तिरंगी लगायी है।

8.डिजिटल इंडिया का ’केवल’ वर्तमान सरकार के विरोध के लिये विरोध भी गलत है। यह एक ऐसी क्रांति है जो LIC के कंप्युटराइजेशन से दशकों पहले प्रारंभ हुयी थी, जिसे नयी गति राजीव गांधी के कार्यकाल में मिली। पिछला दशक और यह दशक गवाह है कि इस क्रांति ने जीवन को किस तरह से बदला है। आप फ़ेसबुक का नेट न्युट्रिलिटी के उल्लंघन के लिये विरोध करे , वह जायज है, लेकिन डिजिटल इंडिया का विरोध का कोई तुक नहीं बनता है।

9. मेरा यह मानना है कि डिजिटल क्रांति से भ्रस्टाचार अवश्य कम होगा, इसमे अपनी करतूतें छिपाने के रास्ते कम होते हैं, हर कदम अपने निशान छोड़ जाता है।

10. कोई भी तकनीक/कदम यदि आम जीवन में सरलता, सुगमता लाये उसका स्वागत है।

(आशीष श्रीवास्तव के फ़ेसबुक पेज https://www.facebook.com/ashshri से साभार)

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