टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

क्या आप भी फ़ेसबुक पर नहीं हैं?

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ज्यादा दिन नहीं हुए. यही कोई तीन-चार साल पहले की बात है. कोई आमो-खास मिलता था तो बड़े गर्व से बताता था कि वो (भी) फ़ेसबुक पर है. कोई आमो-खास मिलता था तो पूछता था - क्या आप (भी) फ़ेसबुक पर हैं? यदि आप फ़ेसबुक पर नहीं होते थे, और सामने वाला फ़ेसबुक पर होता था तो, वो सामने वाला थोड़ा फूल जाता था - क्योंकि वो फ़ेसबुक पर होता था, और आप नहीं होते थे. फ़ेसबुक पर होना एक किस्म का स्टेटस सिंबल था. तब लोग डिजिटल डिवाइड की बड़ी-बड़ी बातें करते थे.

जल्द ही दुनिया की सारी जनसंख्या फ़ेसबुक पर आने लगी. कुछ दिन पहले, एक रेकॉर्ड बना. एक ही दिन में एक अरब उपयोगकर्ताओं ने फ़ेसबुक के पन्नों को रंगा. यदि आप भी फ़ेसबुक पर हैं, तो आप जानते होंगे कि अधिकांश जनता फ़ेसबुक के पन्ने कैसे रंगती है. बहरहाल, वो मुद्दा अलग है. अभी तो सेलेब्रेशन यह है कि दुनिया के हर सातवें व्यक्ति ने फ़ेसबुक का उपयोग उस दिन किया. जल्द ही यह स्थिति होगी कि दुनिया में जितने आदमी हैं, उससे डेढ़-दो गुने लोग फ़ेसबुक का उपयोग एक ही दिन में करेंगे.

अब आप पूछेंगे कि भई, ये क्या माजरा है - जितने तो लोग नहीं हैं उससे कहीं ज्यादा लोग फ़ेसबुक का उपयोग कैसे कर लेंगे? तो आपको शायद फर्जी फ़ेसबुक प्रोफ़ाइलों के बारे में जानकारी नहीं है. एक अपने लिए, और एक अपने छद्म आवरण के लिए! फ़ेसबुक है ही इसीलिए. कंबल ओढ़ो और घी पियो!

जिस तरह फ़ैशन का रिवर्स ट्रेंड आता है, जल्द ही फ़ेसबुक का रिवर्स ट्रैंड आएगा. बल्कि कुछ मामलों में आ चुका है. जल्द ही लोग गर्व से कहेंगे - आई एम नॉट ऑन फ़ेसबुक! जब दुनिया का हर आदमी फ़ेसबुक पर सवा-डेढ़ बार आ चुका होगा, तब स्टेटस सिंबल ये होगा कि कोई फ़ेसबुक पर न हो. कुछ बुद्धिजीवी किस्म के लोग इस ओर चल पड़े हैं. वो फ़ेसबुक के पन्नों पर उकसाती हुई पोस्टें जानबूझ कर लिखते हैं, और जब दूसरे निठल्ले फ़ेसबुकिये, जिनके पास अपना कुछ कहने-सुनाने का नहीं होता या जिनका कहा-सुना कोई सुनता-पढ़ता-लाइक नहीं करता वो इन्हें फ़्लैग करते हैं, तो जाहिर है ऐसी पोस्टें और ऐसे बुद्धिजीवी लेखकों को फ़ेसबुक का बॉट (कोई आदमी नहीं, बल्कि स्वचालित सिस्टम, जो कुछ अल्गोरिद्म के आधार पर निर्णय लेता है) बैन कर देता है तो चहुँओर हल्ला मचाते हैं कि व्यवस्था के विरुद्ध लिखने पर व्यवस्था के कहने और व्यवस्था के इशारे पर उन्हें फ़ेसबुक से निकाल बाहर किया गया. और वे गर्व से बताते फिरते हैं, इतराते फिरते हैं कि (अब) वे फ़ेसबुक पर नहीं हैं!

यूँ तो मैं भी आम जनता की तरह फ़ेसबुक पर इसके जन्म समय से हूँ, पर अब सोचता हूँ कि जब दुनिया की पूरी जनसंख्या फ़ेसबुक पर आ जाएगी तो, कुछ स्पेशल लोगों को तो बाहर रहना ही चाहिए ना? तो मैं भी सोच रहा हूँ कि अपने फ़ेसबुक पन्ने पर कोई भड़काता पोस्ट लिख मारूं, जिससे कि उस पोस्ट में कमेंट करते हुए प्रशंसक व विरोधी आपस में लड़ मरें - एक दूसरे का वास्तविक रूप दिखा दें - जैसे कि आजकल हिंदी कवियों-साहित्यकारों के फ़ेसबुक पन्नों पर होने लगा है - और, नतीजतन मेरी पोस्ट फ़्लैग हो जाए, और मेरा फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल बैन हो जाए.

और, मैं गर्व से कह सकूं - अब मैं भी फ़ेसबुक पर नहीं हूँ!

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