बुधवार, 19 अगस्त 2015

घूरों - खंडहरों के दिन भी फिरते हैं...

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ये तो, फिर भी, सरकारी स्कूल हैं!

पढ़ाई, इतनी इंटरेस्टिंग कभी नहीं रही थी - कसम से! सोच रहा हूँ, किसी सरकारी स्कूल में फिर से दाखिला ले लूँ!

 

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किसी सरकारी स्कूल में पढ़ना कैसा होता है, ये तुम क्या जानो नेता-नौकरशाह-न्यायाधीश बाबू!

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