टेढ़ी दुनिया पर रवि रतलामी की तिर्यक, तकनीकी रेखाएँ...

July 2015

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विंडोज 8 बुरी तरह फेल हो गया था - कम से कम मेरे लिए तो. मेरे कंप्यूटर में इंस्टाल/प्री-इंस्टाल दर्जनों ऐप्प/ऐप्लिकेशनों को चलाने के लिए न जाने क्या क्या पापड़ बेलने पड़ते थे. वे कहीं से नजर ही नहीं आते थे. ढूंढ-ढांढ कर प्रोग्रामों के शॉर्टकट के डेस्कटॉप आइकन बनाया तो डेस्कटॉप भर गया, और डेस्कटॉप चालू करने के लिए भी आपको एक अदद क्लिक या टैप मारना पड़ता था.

 

और, किसी एप्लीकेशन के खुलने पर उसे बंद करने का तो साला कोई विकल्प ही नहीं होता था. पता नहीं वो कहाँ जा कर मर जाता था या जिंदा रहता था. Sad smile(

 

ख़ैर, जो हो, अब विंडोज 10 के साथ मुझे मेरा पुराना डेस्कटॉप व स्टार्ट मेनू मिल गया. और न केवल यही, बल्कि बड़े  काम का टास्कबार फुल्ली रीलोडेड भी वापस मिल गया.

 

जैसा कि आप जानते हैं, यदि आप विंडोज 7 या बाद के संस्करण उपयोग में ले रहे हैं, तो विंडोज 10 को आप साल भर तक मुफ्त में  पा सकते हैं - मुफ़्त अपग्रेड के रूप में.

विंडोज 10 की और मुख्य बातें हैं -

 

  • घोषित रूप से यह विंडोज का आखिरी वर्जन होगा - यानी कोई बड़ा फेरबदल नहीं होगा, और यदि आपने यह विंडोज ले लिया या मुफ़्त अपग्रेड कर विंडोज 10 प्राप्त कर लिया तो भविष्य के तमाम अपग्रेड  आपको मुफ़्त मिलेंगे.
  • पब्लिक डिमांड पर इसमें स्टार्ट मेनू, टास्कबार आदि को वापस लाया गया है.
  • एकदम नया वेब ब्राउजर एज लाया गया है जो कि इंटरनेट को ज्यादा तेज ज्यादा अच्छा चलाने का दावा करता है. देखें, जनता की नजर में यह चढ़ता है या नहीं.
  • गीत-संगीत, वीडियो और ऑनलाइन मनोरंजन सामग्री प्रस्तुत करने के लिए अंतर्निर्मित ऐप्प हैं, जो बढ़िया चलते हैं. पीडीएफ जैसी तमाम अन्य फ़ाइलों को देखने की अंतर्निर्मित सुविधा भी है.
  • टास्क बार से सीधे ही कंप्यूटर में या ऑनलाइन सर्च कर सकते हैं
  • इसमें एक बड़ी सुविधा है कि आप अपने विंडोज फ़ोन या टैबलेट को डेस्कटॉप (एक अतिरिक्त) के रूप में उपयोग में ले सकते हैं.
  • यदि आपके उपकरण में हार्डवेयर हो तो, अब आपको सुरक्षा के लिए पासवर्ड की निर्भरता से मुक्ति मिल सकती है. बायोमैट्रिक सुरक्षा के तहत आपकी उंगलियों के निशान, चेहरा पहचान, और या ऑखों की पुतलियों - आइरिस- पहचान से पासवर्ड का काम लिया जा सकता है.
  • गेमिंग के दीवानों के लिए खुशखबरी है - एक्सबाक्स लाइव को विंडोज 10 में समाहित किया गया है.
  • इसका ऑप्टीमाइज़्ड डायरेक्टएक्स12 , नए पुराने सभी तरह के हार्डवेयरों को बेहतर तरीके से उपयोग में ले सकेगा.
  • यूनिवर्सल ऐप्प सिस्टम लागू किया गया है - एक ऐप्प इंस्टाल करने पर यह आपके खाते से जुड़े सभी उपकरणों पर उपलब्ध होगा.

और हाँ, अपना प्यारा सॉलिटेयर  और माइन-स्वीपर भी वापस आ गया है.

अगली पोस्टों में हम इसकी हिंदी करेंगे - यानी हिंदी में काम करने संबंधी सुविधाओं के बारे में चर्चा करेंगे.

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ऐप्प इंस्टाल करें और धपाधप ब्लॉग पोस्टें लिखें. क्या लिखें, क्या छोड़ें की चिंता ऐप्प पर छोड़ दें. और, लगता है कि ऐप्प अपने कंसेप्ट के दिनों से ही खासा प्रभावशाली होने लगा है. एक ही चीज को कई एंगल से आप लिख सकेंगे. शायद  इसी लिए, आज के टाइम्स ऑफ इंडिया, भोपाल संस्करण में यह खबर दो बार छपी है - एक ही पेज पर, ठीक एक दूसरे के नीचे-ऊपर! एक बार लंबाई में, और दूसरी बार, ठीक नीचे - चौड़ाई में!

देखें -

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मैंने तो दोनों ही खबर को आनंद लेकर पढ़ा. लंबाई में छपे खबर का मजा कुछ और था, चौड़ाई में छपे खबर को पढ़ने का आनंद कुछ और आया. सही में! Smile

अब, ये तो तयशुदा बात है कि हैकर्स और फ़िशर्स मनमोहन सिंग को नहीं जानते थे, या फिर उन्हें जानने में रूचि नहीं थी. परंतु नरेन्द्र मोदी के मामले में मामला जरा उलटा है.

आज मेरे पास ये ईमेल आया. पक्का नाईजिरियन टाइप फ़िशिंग ईमेल.

और, देखिए, कि प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम, जाल के रूप में कैसे फेंका गया है -

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आप पूछेंगे कि ये मैं कैसे कह सकता हूँ कि ये जेनुइन ईमेल नहीं है, और फ़िशिंग ईमेल है.

तो एक तो इसकी भाषा फिशिंग की टिपिकल भाषा है तथा दूसरी यह कि यह मेरे एक डंप पड़े पुराने याहू के

ईमेल पते पर आया है जिसका स्पैम फ़िल्टर उतना ही पुराना, सड़ियल किस्म का है जितना पुराना यह ईमेल सेवा है. Smile

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और नहीं तो क्या! अलबत्ता, यदि आपने अब तक कोई कैप्सूल नहीं निगला हो तो बात दूसरी है. पर, फिर, जो पोलियो वैक्सीन आपने पिया-पिलाया होगा, वो भी मृत जंतु के अवशेष ही हैं! (आदि, आदि...)

माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस एंड्रायड मोबाइल / टैबलेट के लिए कुछ समय पहले जारी किया गया है. गूगल प्ले स्टोर पर माइक्रोसॉफ़्ट वर्ड से सर्च करते हैं तो इसके ऐप्प का विवरण कुछ इस तरह से आता है -

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और विवरण देखते हैं - वाह! यह तो बढ़िया विवरण दिखा रहा है. अपने मोबाइल में माइक्रोसॉफ़्ट वर्ड की सुविधा! क्या बात है!!

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चलिए, इंस्टाल कर ही लेते हैं. इंस्टाल करने के बाद इसका आइकन अलग अलग दिखता है - वर्ड, एक्सेल आदि का हर एक का अलग. जो जरूरत हो इंस्टाल करें, पूरा ऑफिस नहीं. क्योंकि इसका वर्ड का ही डाउनलोड 100 एमबी से अधिक है. और पता नहीं क्यों, दो-तीन बार डाउनलोड 99 प्रतिशत पूरा होने के बाद भी फेल हो जाता था. जैसे भी हो, हमने इंस्टाल कर लिया. अब इसके आइकन पर टच कर इसे चालू करते हैं -

 

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ऐप्प को पहली बार चालू करने में कुछ सेटिंग करने में समय लेता है -

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चलिए, अब कोई दस्तावेज खोलते हैं. अरे! यह क्या? ये तो मेरे यूनिकोड दस्तावेज को डब्बा दिखा रहा है. हद है! पूरा डब्बा ऐप्प है - हम  हिंदी वालों के लिए!!

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बहुत से लोग यात्रा संस्मरण लिखते हैं. बीहड़ जंगलों में जाते हैं और वहाँ के संस्मरण लिख मारते हैं. कई पश्चिमी, विकसित देशों की यात्रा करते हैं और अमेरिका, पेरिस और स्विटजरलैंड जैसे खूबसूरत देशों के उतने ही खूबसूरत, मगर आधे-अधूरे यात्रा संस्मरण लिखते हैं. आधे-अधूरे का अर्थ वे लोग भली प्रकार जानते हैं जिन्होंने ऐसे देशों के अपने यात्रा संस्मरण लिख मारे हैं. इधर, भारत के बहुत से लोग मलेशिया, सिंगापुर और बैंकाक की यात्राएं करने लगे हैं, मगर उनमें से अधिकांश अपने यात्रा संस्मरण नहीं लिखते. अब भई बहुत सी यात्राएं केवल स्वयं के संस्मरण के लिए भी तो होती हैं, सार्वजनिक लिखने बताने के लिए नहीं, और उनके सार्वजनिक होने पर स्वयं व आसपास के जीव-जगत में तूफान उठ खड़ा होने का डर बना रहता है.

बहुत दिनों से मैं भी एक अदद यात्रा संस्मरण लिखने के चक्कर में था. परंतु मेरे साथ बडी विकट समस्या थी. कोई यात्रा हो ही नहीं रही थी. अरसे से मैंने कोई यात्रा ही नहीं की थी. विश्वस्तरीय तो दूर की बात है, स्थानीय, मोहल्ला स्तरीय सम्मेलनों में भी एक अरसे से अतिथि के रूप में मुझे बुलाया नहीं गया तो मेरी यात्रा भी एक अरसे से नहीं हुई. मगर, जब फैशन में हो तभी भेड़चाल में चलना चाहिए. टाइट जींस के जमाने में बेलबॉटम पहनेंगे तो आप सब को बिना चुटकुले सुनाए हँसाने का प्रयास ही करेंगे. तो, अब जबकि यात्रा संस्मरण लिखने का टाइम है, मैं फ़ोकटिया, अव्यंग्य किस्म का व्यंग्य या घोर अपठनीय, अमौलिक किस्म की कहानी लिखकर अपने लेटेस्ट लैपटैब के कीबोर्ड को घिसना नहीं चाहता, कि जिससे लोगों का मुझपर हँसने का एक और मौका मिल जाए.

जहाँ चाह वहाँ राह. अचानक मुझे याद आया कि कल ही तो मैं सब्जी खरीदने, अपने घर से न्यूमार्केट (कृपया ध्यान दें, न्यूयॉर्क नहीं, न्यूमार्केट मेरे शहर का स्थानीय बाजार है, जिसका केवल नाम आधुनिक और रोमन टाइप है) तक की यात्रा पर गया था. वह अनुभव भी गजब का था – किसी भी घनघोर, बीहड़ जंगल की यात्रा से ज्यादा रोमांचक और किसी भी पश्चिमी देश की यात्रा से अधिक दिलचस्प! और ऐसा कि अंदर-बाहर का सारा अनुभव, सारा संस्मरण निचोड़ कर यहीं रख दूं!

तो, लीजिए पेश है न्यूमार्केट तक की गई मेरी एक रोमांचक, दिलचस्प यात्रा का संस्मरण –

जब मैं भरपूर तैयारी कर, सब्जी खरीदने, बाजार की ओर निकलने को उद्यत हुआ तो पत्नी ने टोका – एक थैला तो साथ में रख लो. मैंने उस नसीहत को हिकारत से नजरअंदाज कर दिया क्योंकि यदि मेरे जैसे लोग थैला साथ रख कर खरीदारी करेंगे तो बेचारी भारतीय गाएं तो भूखी मर जाएंगी. उन्हें पॉलीथीन की थैलियाँ खाने को कहाँ मिलेंगी? कौन उन्हें पॉलीथीन की थैलियाँ खरीदकर खिलाएगा? और, रंगबिरंगी पॉलीथीन की थैलियों में सब्जियाँ खरीदकर लाने का आनंद भी तो अलग है.

घर से निकल कर मैं वहाँ आ गया जिसे मुख्य सड़क कहा जाता है, जहाँ आधी सड़क पर वाहनों की बेतरतीब पार्किंग और बाकी आधे पर बेतरतीब वाहनों की रेलमपेल. सड़क पर सामने स्वच्छता अभियान का बड़ा सा नय़ा नकोर बिलबोर्ड लगा दिखा. स्वच्छ भारत सुंदर भारत. कुछ लोग आनन फानन में आसपास की बची खुची अगल बगल की दीवारों पर वही नारे पोतने में व्यस्त थे – स्वच्छ भारत सुंदर भारत. लगता है ठेकेदार का नया टेंडर पास हो गया था और रंगने-पोतने, बिलबोर्ड लगाने का वर्कऑर्डर जारी हो गया था. बिलबोर्ड के नीचे नगर निगम का कचरा पेटी शायद सदियों से, जैसे का तैसा रखा हुआ था – आधा खाली या आधा भरा – अपनी सुविधा और सोच से जो भी कह लें, और उसके इर्दगिर्द सारे शहर का कचरा फैला हुआ था. नारा लिखते-लिखते पेंटर को कुछ प्राकृतिक आवश्यकता महसूस हुई और उसने वहीं उस नए नारे पुते दीवार की ओट लेकर प्राकृतिक यूरिया से उस नए लिखे नारे को और स्वच्छ, और पवित्र करने का काम करने लगा. पत्नी के दिए हिदायत का सम्मान करते हुए मैंने भी अपने साथ लाए कचरे से भरे पॉलीथीन के थैले को वहीं कचरा पेटी के पास फेंका और आगे बढ़ चला.

मैं थोड़ा ही आगे बढ़ा था कि अचानक मेरे मुंह-हाथों में कुछ पानी के छींटे पड़ने जैसा महसूस हुआ. दूर-दूर तक बादलों का नामोनिशान नहीं था, फिर यह बिन-बादल बरसात? बात कुछ हजम नहीं हुई. पर, मामला तुरंत ही समझ में आ गया. एक महाशय गुटका खाते हुए मोटरसायकल पर चले आ रहे थे और सड़कों पर थूक की बरसात करते चले जा रहे थे. आदमी गुटका खाएगा तो थूकेगा ही. ये सरकार बड़ी निकम्मी है. गुटका खाने वालों का इतना खयाल ही नहीं रखती कि हर दस कदम पर एक-एक थूकदान रखवा दे, नहीं तो क्या लोग सड़कों के बजाय अपनी जेबों में थूकें!

थोड़ा आगे चला तो आगे सड़क जाम मिला. हर आदमी आगे निकलने के होड़ में लगा हुआ था, और जाम को और बड़ा, महा जाम बनाने में अपना संपूर्ण योगदान दे रहा था. मेरे पीछे आने वाले ने प्रेशर हॉर्न का बटन इतना और ऐसा दबाया कि लगा जाम उस हॉर्न की ध्वनि के प्रभाव से स्वयं साफ हो जाएगा, मगर ऐसा कुछ हुआ नहीं, और शायद हॉर्न बजाने वाले को भी हॉर्न के अप्रभावी होने का अहसास हो गया जो उसने हॉर्न बजाना बंद कर दिया. वैसे भी, उसकी तरह कई दूसरे, बल्कि सभी हॉर्न पे हॉर्न बजाए जा रहे थे. मगर, टेक्नॉलॉजी अभी शायद उतनी उन्नत नहीं हुई है कि हॉर्न दे मारने पर जाम स्वचालित हट जाए, या कोई जादुई रास्ता निकल जाए. भारत के लिए ऐसी किसी खोज की बहुत जरूरत है.

तरह-तरह के वाहनों के उतने ही तरह के हॉर्न की रिद्मिक आवाजों से पूरा वातावरण संगीतमय हो रहा था और जनता ट्रांस में जाने को उद्यत थी. कुछ नौवजवानों ने अपने मोबाइक के साइलेंसर को उखाड़ फेंका था, जिससे वातावरण में शिवमणि के ड्रम बीट्स जैसा जादुई इफ़ेक्ट आ रहा था. मनोरंजन के लिए जनता को कहीं और जाने की जरूरत ही नहीं. और, शायद जाम भी इसी वजह से था. कोई वहां से हिलने को तैयार ही नहीं था. उधर दूसरे कोने पर यातायात पुलिस बाकायदा चालान काटने में व्यस्त थी. उनके ऑफिस में हाल ही में कुछ ट्रांसफ़र पोस्टिंग हुए थे और वसूली के कई तरह के टॉरगेट – कुछ सेल्फ और कुछ ऊपर से आए - तय किए गए थे, जिसे पूरा करने में वे बेहद गंभीरता और ईमानदारी से व्यस्त थे.

पाँच मिनट के रास्ते को कोई पचास मिनट में तय कर अगले चौराहे पर पहुँचा तो पाया कि चौराहे पर लगे सिग्नल की आधी बत्तियाँ या तो टूटी हैं और या मालफंक्शन कर रही हैं. और बेपरवाह, बेफिक्र जनता, जो वैसे भी इन लाल-हरी बत्तियों की कोई परवाह नहीं करती, अपनी सहूलियत से एक दूसरे का ओवरटेक करती हुई चली जा रही थी. नजारा बेहद ही रोमांचक और सस्पेंस भरा था. इतना रोमांचक और सस्पेंस भरा कि मैट्रिक्स फिल्म का क्लाइमेक्स भी फेल हो जाए. चौराहे पर वाहनों की आवाजाही में इतना अविश्वसनीय पेंच था जितना कि टर्मिनेटर सीरीज की ताजातरीन फ़िल्म भी फेल खा जाए. दरअसल इस नई फिल्म टर्मिनेटर जेनेसिस के पिटने की एक वजह यह भी बताई जाती है. लोगों को टर्मिनेटर जेनेसिस के बजाए यूट्यूब पर इस चौराहे के यातायात के आधे घंटे के अपलोडेड क्लिप को देखने में ज्यादा आनंद, ज्यादा रोमांच आया और टर्मिनेटर यूं टर्मिनेट हो गया.

चहुँ ओर से आ रहे वाहनों के बीच में से निकलने के रोमांच और कहीं भी कोई भी कभी भी मुझे न ठोंक दे इस सस्पेंस को जीवंत अनुभव करते हुए मैं इस चौराहे से आगे बढ़ा तो दिखा कि रास्ते पर एक किनारे वाहनों की भीड़ खड़ी है. पास जाकर देखा तो पाया कि एक कोई बीस साल पुराने खटारा किस्म के वैन पर एक पोस्टर चिपका था – चलित वाहन प्रदूषण जाँच व प्रमाणन केंद्र. वहाँ ऑटो वाले, जिनके पेट्रोल चलित ऑटो से मिट्टी तेल की सुगंध आ रही थी और वे सभी घनघोर काला धुआँ छोड़ रहे थे, प्रदूषण जाँच प्रमाणन केंद्र चलाने वाले से बहस कर रहे था कि वो बिना किसी जांच पड़ताल के केवल सील ठप्पे लगाकर कागज का एक पुर्जा थमाने के बदले बीस रुपए किस बिना पर ले रहा था. मुझे अपने शहर के प्रदूषण में भले दिलचस्पी न हो, मगर इस बहस में दिलचस्पी पैदा हो रही थी और मैं भी मजमा लगाने वालों में शामिल हो गया था. मगर जल्द ही वहाँ खड़े ऑटो के निरंतर चलित इंजनों - जिसे अगली बार शायद चालू न हो के भय से चालू रखे गए थे – से निकलते धुएं से मुझे खांसी होने लगी और मैं मन मसोसता हुआ उस शानदार बहस, जिसके सामने टाइम्स नाऊ के अर्नब की बहसें भी पानी भरें, को छोड़ कर आगे बढ़ चला...

>>> क्रमशः अगली किश्तों में जारी*...

*केवल तभी, जब आप पाठक चाहें J

खुशखबरी!

रचनाकार http://www.rachanakar.org/    अब गूगल प्ले स्टोर पर ऐप्प के रूप में उपलब्ध हो गया है.

गूगल प्ले स्टोर पर आप रचनाकार या rachanakar से सर्च करें और इस ऐप्प को इंस्टाल करें.

इस ऐप्प को इंस्टाल करने के बहुत से फायदे नीचे स्क्रीनशॉट से स्पष्ट हो जाएंगे, मगर फिर भी कुछ विशेष आकर्षण हैं -

  • रचनाकार में अब तक प्रकाशित रचनाओं पर एक समग्र दृष्टि
  • रचनाओं को क्रमित (सार्ट करने या छांटने) करने की अतिरिक्त सुविधा
  • नई रचनाएं प्रकाशित होने की सूचना (नोटिफिकेशन)
  • रचनाओं की सूची भिन्न तरीके से देखने की सुविधा
  • पसंदीदा रचनाओं को छांटने का तेज तरीका आदि.. आदि...

रचनाकार ऐप्प इंस्टाल करें, और साहित्य की दुनिया में खो जाएँ!

यदि आपने अपने मोबाइल या टैबलेट को डिवाइस मैनेजर के जरिए कंप्यूटर से जोड़ रखा है तो आप इस लिंक से भी इस ऐप्प को अपने मोबाइल उपकरण पर इंस्टाल कर सकते हैं -

https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org

 

और हाँ, महत्वपूर्ण बात यह कि इस ऐप्प को तकनीक द्रष्टा के श्री विनय प्रजापति ने बनाया है. उन्हें धन्यवाद.

 

ऐप्प का पहला पेज - जब रचनाकार ऐप्प लोड होता है -

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दूसरे पृष्ठ पर आपको श्रेणीवार रचनाओं की सूची दिखाई देती है -

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रचनाओं की सूची कई तरीके से देख सकते हैं - यह बिक आइकन वाला रूप है -

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यह सूची स्माल आइकन वाला है -

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आप इस ऐप्प की सेटिंग कई मनोवांछित तरीके से कर सकते हैं -

 

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रचनाओं को कई तरीके से छांट सकते हैं -

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साझा कर सकते हैं, अक्षरों का आकार बदल सकते हैं आदि आदि...

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और, अपनी प्रतिक्रिया तो दे ही सकते हैं. अच्छा हो यदि ऐप्प के जरिए दें, या फिर प्ले स्टोर में ऐप्प इंस्टाल कर और उसका अनुभव लेकर रेटिंग दर्ज करें तो और अच्छा.

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और, आपको आने वाले समय में सड़कों के ट्रैफिक महाजाम के बीच में से जैसे तैसे आने जाने व लेट या महालेट पहुँचने के लिए शुभकामनाएँ!

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वर्णन

तकनीक द्रष्टा एक लोकप्रिय अग्रणी हिंदी ब्लॉग है। इस ब्लॉग के द्वारा लाखों ब्लॉगर्स ब्लॉग, ब्लॉगिंग और ब्लॉग से अच्छी कमाई के करने के विभिन्न तरीक़ों के बारे में सीखते हैं। यह वर्ष २००८ से पुरस्कृत इंटरनेट मार्केटिंग ब्लॉग है।

गूगल ब्लॉगर, ब्लॉगर विजेट्स, ऐडसेंस, वर्डप्रेस, डिस्कस कमेंट सिस्टम, यूटूब, फ़ीडबर्नर, ब्लॉगिंग टिप्स, ब्लॉगिंग की प्रमुख ग़लतियाँ, सर्च इंजन ऑप्टिमाइज़ेशन, ऑनलाइन कमाई, हिंदी उपकरण (हिंदी टाइपिंग टूल, फ़ॉन्ट परिवर्तन आदि), पोस्ट सुरक्षा, एंड्रायड ऐप्स, एंड्रॉयड टिप्स एंड ट्रिक्स, सोशल मीडिया, सोशल मीडिया मार्केटिंग, स्मार्टफ़ोन, कम्प्यूटर टिप्स और ट्रिक्स, कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयर (जैसे माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस, इंडिक इनपुट आदि), तकनीकी गैजेट, ब्लॉग से कमाई इत्यादि के बारे में हज़ारों लेख प्रकाशित कर चुका है और नियमित रूप से प्रकाशित कर रहा है।

तकनीक द्रष्टा को इंजीनियर विनय प्रजापति द्वारा स्थापित किया गया व संचालित किया जा रहा है। तकनीक द्रष्टा उन ब्लॉगरों के लिए प्रेरणा स्रोत है जो ब्लॉगिंग करते हैं और प्रोफ़ेशनल ब्लॉगर बनने की इच्छा रखते हैं। जैसे एक पौधे का बीज बोकर उसकी देखभाल की जाती है जिसे पौधे पर फल लगें उसी प्रकार तकनीक द्रष्टा ब्लॉग ऐप्प अपने सभी पाठकों का पूरा ध्यान रखते हैं

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ऐप्प इंस्टाल करने के लिए इस लिंक पर जाएँ (आप अपने कंप्यूटर से भी इसे अपने डिवाइस पर इंस्टाल कर सकते हैं) -

https://play.google.com/store/apps/details?id=com.tech.prevue

या ऐप्प स्टोर पर तकनीद द्रष्टा या Tech Prevue सर्च करें

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digital india

 

अब आप यदि कन्फ़्यूज़ हो रहे हों, कि ये ‘अंकीय भारत’ क्या बला है, तो, केवल आपके लिए क्लीयर करे दे रहे हैं – दुकालूज़ डिजिटल इंडिया.

तो, किस्सा ये है कि जब दुकालू को पता चला कि उसका भारत, उसका अपना भारत, डिजिटल इंडिया बन गया है तो जाहिर है कि वो भी बड़ा खुश हुआ.

मारे खुशी के, उसने अपना स्मार्टफ़ोन उठाया और सोशल मीडिया में अपना खुशी वाला स्टेटस अपडेट करना चाहा. मगर ये क्या? उसके स्मार्टफ़ोन ने चेताया कि इंटरनेट अभी बंद है.

हद है! ब्रॉडबैंड फिर से बंद. कल ही तो पिछले पंद्रह दिनों से बंद ब्रॉडबैंड ठीक हुआ था. कोई न कोई सरकारी महकमा कोई न कोई प्लान जब देखो तब ले आता है और सड़क को खोद डालता है, जिसके कारण केबल कट जाता है. इन अनवरत किस्म के कामों के चलते पिछले छः महीने में सड़क पर कोई पचासवीं बार खुदाई हुई थी, और कोई उतनी ही बार दुकालू का इंटरनेट ब्रॉडबैंड बंद रहा था. लगता है कि किसी महकमे को कोई नया फंड जारी हुआ है, और अब वो इस फंड को खपाने को इस सड़क का इक्यावनवीं बार पोस्टमार्टम करेगा. यानी अब अगले पंद्रह दिनों के लिए ब्रॉडबैंड फिर से बंद.

चलो, कोई बात नहीं. दुकालू ने सोचा, डिजिटल होना है तो बैकअप प्लान से काम करना ही होगा. उसने मोबाइल डेटा चालू किया. यहाँ पर भी सिग्नल के आइकन में प्रश्नवाचक चिह्न लगा हुआ था – याने सिग्नल नहीं था. पिछले सप्ताह उसका मोबाइल डेटा कोई दो दिन बंद रहा था. बाद में अखबारों में समाचार पढ़कर पता चला था कि उसके क्षेत्र के मोबाइल टावर को कुर्क कर लिया गया था क्योंकि वो बिना अनुमति के पिछले दस सालों से चल रहा था. उड़ती खबर ये थी कि टावर चलाने वालों ने स्थानीय प्रशासन को हफ़्ता-महीना नहीं चुकाया तो कुर्की हो गई थी. अबकी बार भी शायद इसी तरह का कोई दूसरा मसला हो जिसके कारण मोबाइल सिग्नल बंद है.

दुकालू ने शांति बनाए रखी. स्टेटस अपडेट की ही तो बात है. अपनी डिजिटल होने की खुशी वो बाद में भी किसी अच्छे दिनों में व्यक्त कर लेगा.

दुकालू को याद आया कि उसे तो आज एक ई-फ़ॉर्म जरूरी में भरना था. इंडिया डिजिटल हो गई थी, सो ऑफ़िसों में अब काग़ज़ी फ़ॉर्म भरना मना था. उसका नेट बंद था, सो उसने सोचा कि चलो किसी साइबर कैफ़े या डिजिटल इंडिया सर्टिफ़ाइड कियास्क से वो ई-फ़ॉर्म भर लिया जाए.

कियास्कों में लंबी लाइनें लगी हुई थीं. हर किसी को कोई न कोई ई-फ़ॉर्म भरना था. पता चला कि कई मुहल्लों के इंटरनेट बंद हैं और कियास्कों पर लोग टूटे पड़ रहे हैं. भीड़ के कारण अथवा अन्य किसी दीगर कारण के चलते कियास्कों पर इंटरनेट स्लो है, जिससे लाइन बढ़ती ही जा रही थी. दुकालू को लगा कि इस कियास्क वालों ने कॉन्सपीरेसी कर उनके जैसों का ब्रॉडबैंड बंद करवाया है ताकि इनका धंधा बढ़िया चले. वह इस बारे में सोच ही रहा था कि एक रहस्यमय किस्म का आदमी उसके पास पहुँचा, और धीरे से उसी रहस्यमयी अंदाज से दुकालू को समझाया कि यदि उसे इस लंबी लाइन से छुटकारा पाना है और जल्दी से ई-फ़ॉर्म भरना है तो उसका काम प्रायरिटी में करवा सकता है जिसके लिए अलग से पैसे लगेंगे.

दुकालू खुश हो गया. उसे लंबी लाइन से निजात मिल गई. उसने तयशुदा ऊपरी पैसे देकर सौदा किया और मिनटों में अपना ई-फ़ॉर्म जमा की रसीद लेकर घर आ गया. इंडिया डिजिटल हुआ तो क्या हुआ, काम करने करवाने के रास्ते तो अब भी बढ़िया ही हैं – एनॉलॉग किस्म के.

दुकालू वापस घर आया. नेट नहीं है तो क्या हुआ. आज वो दिन भर टीवी देखेगा.

उसने टीवी सेटटॉप बॉक्स का रिमोट उठाया. अपना पसंदीदा सूर्यटीवी लगाया. वह ब्लैंक था. और उस पर कोई सूचना आ रही थी.

अरे! यह क्या? इस पर तो सरकार ने बैन लगा दिया है!

डिजिटल इंडिया जिंदाबाद! दुकालू फ्रस्ट्रेट होकर चिल्लाया. इधर पड़ोसियों को गपशप का नया विषय मिल गया  – दुकालू पर फिर से देशभक्ति का दौरा पड़ा है.

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