गुरुवार, 26 मार्च 2015

प्रारब्ध - एक सत्य लघुकथा

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लेखक आज सुबह से ही प्रारब्ध पर एक तड़कता भड़कता लेख लिखने पर तुला था.

कंप्यूटर पर उसकी उंगलियाँ मानों नाच रही थीं. टॉपमोस्ट गीयर पर, फुल थ्रॉटल में.

उसका आलेख लगभग पूरा होने को था.

एकाध लिंक लगाने थे, एकाध शब्दों वाक्यों को दुरुस्त करना था. बस.

यह एक ऐसा आलेख था, जो वायरल हो सकता था. फ़ेसबुक, ट्विटर में नया ट्रैंड चलता और हिट होता.

हर ओर कॉपी-पेस्ट होता. कई कई बार रीसरफेस होकर लौटकर आता. इतना कि लोगबाग इस आलेख को 'अज्ञात' के नाम से संदर्भित करते.

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पर, ये क्या?

लेखक सोशल मीडिया पर 'पब्लिश' का बटन दबाता इससे पहले ही उसका वर्डप्रोसेसर क्रैश हो गया.

ऑटो सेव ऑप्शन लागू कर रखने, क्लाउड में काम करने के बावजूद प्रारब्ध पर लिखा वह धाँसू आलेख कबाड़ हो गया. नॉन रिट्रीवेबल हो गया.

 

प्रारब्ध?

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